06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1171–1180

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1171–1180

पृष्ठ 1171

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यो मार्गमनुयातीमं पदं तस्य च विद्यते ॥ ८८ ॥

यह मोक्षधर्मके ज्ञाता सत्पुरुषोंका वेदप्रतिपादित धर्म एवं सन्मार्ग है । जो इस मार्गपर चलता है, उसको ब्रह्मपदकी प्राप्ति होती है ॥ ८८ ॥

चतुर्विधा भिक्षवस्ते कुटीचकबहूदकौ ।

हंसः परमहंसश्च यो यः पश्चात् स उत्तमः ॥ ८९ ॥

संन्यासी चार प्रकारके होते हैं— कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस । इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है ॥ ८ ९ ॥

अतः परतरं नास्ति नावरं न तिरोग्रतः ।

अदुःखमसुखं सौम्यमजरामरमव्ययम् ॥ ९ ० ॥

इस परमहंस धर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले आत्म- ज्ञानसे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं है । यह परमहंस-ज्ञान किसीसे निष्कृष्ट नहीं है । परमहंस-ज्ञानके सम्मुख परमात्मा तिरोहित नहीं है । यह दुःख - सुखसे रहित सौम्य अजर- अमर और अविनाशी पद है ॥ ९ ० ॥ उमोवाच

गार्हस्थ्यो मोक्षधर्मश्च सज्जनाचरितस्त्वया ।

भाषितो जीवलोकस्य मार्गः श्रेयस्करो महान् ॥ ९ १ ॥

उमा बोलीं- भगवन्! आपने सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए गार्हस्थ्यधर्म और मोक्षधर्मका वर्णन किया । ये दोनों ही मार्ग जीवजगत्‌का महान् कल्याण करनेवाले हैं ॥ ९ १ ॥

ऋषिधर्मं तु धर्मज्ञ श्रोतुमिच्छाम्यतः परम् ।

स्पृहा भवति मे नित्यं तपोवननिवासिषु ॥ ९ २ ॥

धर्मज्ञ! अब मैं ऋषिधर्म सुनना चाहती हूँ। तपोवननिवासी मुनियोंके प्रति सदा ही मेरे मनमें स्नेह बना रहता है ॥ ९ २ ॥

आज्यधूमोद्भवो गन्धो रुणद्धीव तपोवनम् ।

तं दृष्ट्वा मे मनः प्रीतं महेश्वर सदा भवेत् ॥ ९ ३ ॥

महेश्वर! ये ऋषिलोग जब अग्निमें घीकी आहुति देते हैं, उस समय उसके धूमसे प्रकट हुई सुगन्ध मानो सारे तपोवनमें छा जाती है । उसे देखकर मेरा चित्त सदा प्रसन्न रहता है ॥ ९ ३ ॥ एतन्मे संशयं देव मुनिधर्मकृतं विभो ।

सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञ देवदेव वदस्व मे ।

निखिलेन मया पृष्टं महादेव यथातथम् ॥ ९ ४ ॥

विभो! देव! यह मैंने मुनिधर्मके सम्बन्धमें जिज्ञासा प्रकट की है । देवदेव! आप सम्पूर्ण धर्मोंका तत्त्व जाननेवाले हैं, अतः महादेव! मैंने जो कुछ पूछा है, उसका पूर्णरूपसे यथावत्

पृष्ठ 1172

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वर्णन कीजिये ॥ ९ ४ ॥ श्रीभगवानुवाच

हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि मुनिधर्ममनुत्तमम् ।

यं कृत्वा मुनयो यान्ति सिद्धिं स्वतपसा शुभे ॥ ९ ५ ॥

श्रीभगवान् शिव बोले- शुभे! तुम्हारे इस प्रश्नसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है । अब मैं मुनियोंके सर्वोत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, जिसका पालन करके वे अपनी तपस्याके द्वारा परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं ॥

फेनपानामृषीणां यो धर्मो धर्मविदां सताम् ।

तन्मे शृणु महाभागे धर्मज्ञे धर्ममादितः ॥ ९ ६ ॥

महाभागे! धर्मज्ञे! सबसे पहले धर्मवेत्ता साधुपुरुष फेनप ऋषियोंका जो धर्म है, उसीका मुझसे वर्णन सुनो ॥

उञ्छन्ति सततं ये ते ब्राह्मयं फेनोत्करं शुभम् ।

अमृतं ब्रह्मणा पीतमध्वरे प्रसृतं दिवि ॥ ९ ७ ॥

पूर्वकालमें ब्रह्माजीने यज्ञ करते समय जिसका पान किया तथा जो स्वर्गमें फैला हुआ है, वह अमृत (ब्रह्माजीके द्वारा पीया गया इसलिये ) ब्राह्म कहलाता है । उसके फेनको जो थोड़ा - थोड़ा संग्रह करके सदा पान करते हैं ( और उसीके आधारपर जीवन - निर्वाह करके तपस्यामें लगे रहते हैं, वे फेनप- कहलाते हैं ॥ ९ ७ ॥

एष तेषां विशुद्धानां फेनपानां तपोधने ।

धर्मचर्याकृतो मार्गो बालखिल्यगणैः शृणु ॥ ९ ८ ॥

तपोधने! यह धर्माचरणका मार्ग उन विशुद्ध फेनप महात्माओंका ही मार्ग है । अब बालखिल्य नामवाले ऋषिगणोंद्वारा जो धर्मका मार्ग बताया गया है, उसको सुनो ॥ ९ ८ ॥

वालखिल्यास्तपःसिद्धा मुनयः सूर्यमण्डले ।

उञ्छे तिष्ठन्ति धर्मज्ञाः शाकुनीं वृत्तिमास्थिताः ॥ ९९ ॥

वालखिल्यगण तपस्यासे सिद्ध हुए मुनि हैं। वे सब धर्मोंके ज्ञाता हैं और सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं । वहाँ वे उञ्छवृत्तिका आश्रय ले पक्षियोंकी भाँति एक- एक दाना बीनकर उसीसे जीवन - निर्वाह करते हैं ॥ ९९ ॥

मृगनिर्मोकवसनाश्चीरवल्कलवाससः ।

निर्द्वन्द्वाःसत्पथं प्राप्ता वालखिल्यास्तपोधनाः ॥ १०० ॥

मृगछाला, चीर और वल्कल-ये ही उनके वस्त्र हैं । वे बालखिल्य शीत - उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, सन्मार्गपर चलनेवाले और तपस्याके धनी हैं ॥ १०० ॥

अङ्गुष्ठपर्वमात्रा ये भूत्वा स्वे स्वे व्यवस्थिताः ।

तपश्चरणमीहन्ते तेषां धर्मफलं महत् ॥ १०१ ॥

पृष्ठ 1173

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उनमेंसे प्रत्येकका शरीर अंगूठेके सिरेके बराबर है । इतने लघुकाय होनेपर भी वे अपने - अपने कर्तव्यमें स्थित हो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं । उनके धर्मका फल महान् है ॥ १०१ ॥

ते सुरैः समतां यान्ति सुरकार्यार्थसिद्धये ।

द्योतयन्ति दिशः सर्वास्तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ १०२ ॥

वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उनके समान रूप धारण करते हैं । वे तपस्यासे सम्पूर्ण पापोंको दग्ध करके अपने तेजसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हैं ॥ १०२ ॥

ये त्वन्ये शुद्धमनसो दयाधर्मपरायणाः ।

सन्तश्चक्रचराः पुण्याः सोमलोकचराश्च ये ॥ १०३ ॥

पितृलोकसमीपस्थास्त उञ्छन्ति यथाविधि । इनके अतिरिक्त दूसरे भी बहुत- से शुद्धचित्त, दयाधर्मपरायण एवं पुण्यात्मा संत हैं, जिनमें कुछ चक्रचर ( चक्रके समान विचरनेवाले ), कुछ सोमलोकमें रहनेवाले तथा कुछ पितृलोकके निकट निवास करनेवाले हैं । ये सब शास्त्रीय विधिके अनुसार उञ्छवृत्तिसे जीविका चलाते हैं ॥ १०३३ ॥

सम्प्रक्षालाश्मकुट्टाश्च दन्तोलूखलिकाश्च ते ॥ १०४ ॥

सोमपानां च देवानामूष्मपाणां तथैव च ।

उञ्छन्ति ये समीपस्थाः सदारा नियतेन्द्रियाः ॥ १०५ ॥

कोई ऋषि सम्प्रक्षाल’, कोई अश्मकुट्ट? और कोई दन्तोलूखलिक हैं । ये लोग सोमप ( चन्द्रमाकी किरणोंका पान करनेवाले ) और उष्णप ( सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) देवताओंके निकट रहकर अपनी स्त्रियों सहित उञ्छवृत्तिसे जीवन- निर्वाह करते और इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं ॥ १०४-१०५ ॥

तेषामग्निपरिस्पन्दः पितॄणां चार्चनं तथा ।

यज्ञानां चैव पञ्चानां यजनं धर्म उच्यते ॥ १०६ ॥

अग्निहोत्र, पितरोंका पूजन (श्राद्ध ) और पंचमहा - यज्ञोंका अनुष्ठान यह उनका मुख्य धर्म कहा जाता है ॥

एष चक्रचरैर्देवि देवलोकचरैर्द्विजैः ।

ऋषिधर्मः सदा चीर्णो योऽन्यस्तमपि मे शृणु ॥ १०७ ॥

देवि! चक्रकी तरह विचरनेवाले और देवलोकमें निवास करनेवाले पूर्वोक्त ब्राह्मणोंने इस ऋषिधर्मका सदा ही अनुष्ठान किया है । इसके अतिरिक्त दूसरा भी जो ऋषियोंका धर्म है, उसे मुझसे सुनो ॥ १०७ ॥

सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु ज्ञेयोऽऽत्मा संयतेन्द्रियैः ।

कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ॥ १०८ ॥

पृष्ठ 1174

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सभी आर्षधर्मोंमें इन्द्रियसंयमपूर्वक आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है । फिर काम

और क्रोधको भी जीतना चाहिये । ऐसा मेरा मत है ॥ १०८ ॥

अग्निहोत्रपरिस्पन्दो धर्मरात्रिसमासनम् ।

सोमयज्ञाभ्यनुज्ञानं पञ्चमी यज्ञदक्षिणा ॥ १० ९ ॥

प्रत्येक ऋषिके लिये अग्निहोत्रका सम्पादन, धर्मसत्रमें स्थिति, सोमयज्ञका अनुष्ठान, यज्ञविधिका ज्ञान और यज्ञमें दक्षिणा देना–इन पाँच कर्मोंका विधान आवश्यक है ॥ १० ९ ॥

नित्यं यज्ञक्रिया धर्मः पितृदेवार्चने रतिः ।

सर्वातिथ्यं च कर्तव्यमन्नेनोञ्छार्जितेन वै ॥ ११० ॥

नित्य यज्ञका अनुष्ठान और धर्मका पालन करना चाहिये । देवपूजा और श्राद्धमें प्रीति -रखना चाहिये । उञ्छवृत्तिसे उपार्जित किये हुए अन्नके द्वारा सबका आतिथ्य -सत्कारस करनाऋषियोंका परम कर्तव्य है ॥

निवृत्तिरुपभोगेषु गोरसानां शमे रतिः ।

स्थण्डिले शयने योगः शाकपर्णनिषेवणम् ॥ १११ ॥

फलमूलाशनं वायुरापः शैवलभक्षणम् ।

ऋषीणां नियमा ह्येते यैर्जयन्त्यजितां गतिम् ॥ ११२ ॥

विषयभोगोंसे निवृत्त रहना, गोरसका आहार करना, शमके साधनमें प्रेम रखना, खुले मैदान चबूतरेपर सोना, योगका अभ्यास करना, साग- पातका सेवन करना, फल- मूल खाकर रहना, वायु, जल और सेवारका आहार करना - ये ऋषियोंके नियम हैं । इनका पालन करनेसे वे अजित— सर्वश्रेष्ठ गतिको प्राप्त करते हैं ॥

विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।

अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ॥ ११३ ॥

अतिथिं काङ्क्षमाणो वै शेषान्नकृतभोजनः ।

सत्यधर्मरतः शान्तो मुनिधर्मेण युज्यते ॥ ११४ ॥

स्तम्भी न च मानी स्यान्नाप्रसन्नो न विस्मितः ।

मित्रामित्रसमो मैत्रो यः स धर्मविदुत्तमः ॥ ११५ ॥

जब गृहस्थोंके यहाँ रसोईघरका धुआँ निकलना बंद हो जाय, मूसलसे धान कूटनेकी आवाज न आये — सन्नाटा छाया रहे, चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके सब लोग भोजन कर चुकें, बर्तनोंका इधर- उधर ले जाया जाना रुक जाय और भिक्षुक भीख माँगकर लौट गये हों, ऐसे समयतक ऋषिको अतिथियोंकी बाट जोहनी चाहिये और उसके बचे - खुचे अन्नको स्वयं ग्रहण करना चाहिये । ऐसा करने से सत्यधर्ममें अनुराग रखनेवाला शान्त पुरुष मुनिधर्मसे युक्त होता है अर्थात् उसे मुनिधर्मके पालनका फल मिलता है । जिसे गर्व और अभिमान नहीं है, जो अप्रसन्न और विस्मित नहीं होता, शत्रु और मित्रको समान समझता

पृष्ठ 1175

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तथा सबके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही धर्मवेत्ताओंमें उत्तम ऋषि है ॥ ११३– ११५ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४१ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०६३ श्लोक मिलाकर कुल २२१३ श्लोक हैं ) * यहाँ आचार्य नीलकण्ठके मतमें श्मशान शब्दसे काशीका महाश्मशान ही गृहीत होता है । इसीलिये वहाँ शवके दर्शनसे शिवके दर्शनका फल माना जाता है । * कुछ लोग दूध पीनेके समय बछड़ोंके मुँहमें लगे हुए फेनको ही वह अमृत मानते हैं, उसीका पान करनेवाले उनके मतमें फेनप हैं । आचार्य नीलकण्ठ अन्नके अग्रभाग ( रसोईसे निकाले गये अग्राशन) को फेन और उसका उपयोग करनेवालेको फेनप कहते हैं । 3- जो भोजनके पश्चात् पात्रको धो- पोंछकर रख देते हैं, दूसरे दिनके लिये कुछ भी नहीं बचाते हैं, उन्हें सम्प्रक्षाल कहते हैं । २- पत्थरसे फोड़कर खानेवालेको अश्मकुट्ट कहते हैं । ३- जो दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं अर्थात् अन्नको ओखलीमें न कूटकर दाँतोंसे ही चबाकर खाते हैं वे दन्तोलूखलिक कहलाते हैं ।

पृष्ठ 1176

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द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः उमा - महेश्वर- संवाद, वानप्रस्थ - धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा उमोवाच

देशेषु रमणीयेषु नदीनां निर्झरेषु च ।

स्रवन्तीनां निकुञ्जेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ १ ॥

देशेषु च पवित्रेषु फलवत्सु समाहिताः ।

मूलवत्सु च मेध्येषु वसन्ति नियतव्रताः ॥ २ ॥

पार्वतीने कहा- भगवन्! नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले एकाग्रचित्त वानप्रस्थी महात्मा नदियोंके रमणीय तटप्रदेशोंमें, झरनोंमें, सरिताओंके तटवर्ती निकुंजोंमें, पर्वतोंपर, वनोंमें और फल - मूलसे सम्पन्न पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं ॥ १-२ ॥

तेषामपि विधिं पुण्यं श्रोतुमिच्छामि शङ्कर ।

वानप्रस्थेषु देवेश स्वशरीरोपजीविषु ॥ ३ ॥

कल्याणकारी देवेश्वर! वानप्रस्थी महात्मा अपने शरीरको ही कष्ट पहुँचाकर जीवन-निर्वाह करते हैं; अतः उनके पालन करनेयोग्य जो पवित्र कर्तव्य या नियम है, उसीको मैं सुनना चाहती हूँ ॥ ३ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

वानप्रस्थेषु यो धर्मस्तं मे शृणु समाहिता ।

श्रुत्वा चैकमना देवि धर्मबुद्धिपरा भव ॥ ४ ॥

भगवान् महेश्वरने कहा- देवि! ( गृहस्थ एवं) वानप्रस्थोंका जो धर्म है, उसको मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो और सुनकर एकचित्त हो अपनी बुद्धिको धर्ममें लगाओ ॥ ४ ॥

संसिद्धैर्नियमैः सद्भिर्वनवासमुपागतैः ।

वानप्रस्थैरिदं कर्म कर्तव्यं शृणु यादृशम् ॥ ५ ॥

नियमोंका पालन करके सिद्ध हुए वनवासी साधु वानप्रस्थोंको यह कर्म करना चाहिये ।

कैसा कर्म? यह बताता हूँ, सुनो ॥ ५ ॥

( भूत्वा पूर्वं गृहस्थस्तु पुत्रानृण्यमवाप्य च ।

कलत्रकार्यं संतृप्य कारणात् संत्यजेद् गृहम् ॥

मनुष्य पहले गृहस्थ होकर पुत्रोंके उत्पादन -द्वारा पितरोंके ऋणसे उऋण हो पत्नीसे सम्पन्न होनेवाले कार्यकी पूर्ति करके धर्मसम्पादनके लिये गृहका परित्याग कर दे ॥ अवस्थाप्य मनो धृत्या व्यवसायपुरस्सरः ।

पृष्ठ 1177

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निर्द्वन्द्वो वा सदारो वा वनवासाय सव्रजेत् ॥ मनको धैर्यपूर्वक स्थिर करके मनुष्य दृढ़ निश्चयके साथ निर्द्वन्द्व ( एकाकी ) होकर अथवा स्त्रीको साथ रखकर वनवासके लिये प्रस्थान करे ॥

देशाः परमपुण्या ये नदीवनसमन्विताः ।

अबोधमुक्ताः प्रायेण तीर्थायतनसंयुताः ॥

तत्र गत्वा विधिं ज्ञात्वा दीक्षां कुर्याद् यथाक्रमम् ।

दीक्षित्वैकमना भूत्वा परिचर्यां समाचरेत् ॥

नदी और वनसे युक्त जो परम पुण्यमय प्रदेश हैं, वे प्रायः अज्ञानसे मुक्त और तीर्थों तथा देवस्थानोंसे सुशोभित हैं । उनमें जाकर विधिका ज्ञान प्राप्त करके क्रमशः ऋषिधर्मकी दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होनेके पश्चात् एकचित्त हो परिचर्या आरम्भ करे ॥

कल्योत्थानं च शौचं च सर्वदेवप्रणामनम् ।

शकृदालेपनं काये त्यक्तदोषप्रमादता ॥

सायम्प्रातश्चाभिषेकं चाग्निहोत्रं यथाविधि ।

काले शौचं च कार्यं च जटावल्कलधारणम् ॥

सततं वनचर्या च समित्कुसुमकारणात् ।

नीवाराग्रयणं काले शाकमूलोपचायनम् ॥

सदायतनशौचं च तस्य धर्माय चेष्यते । सबेरे उठना, शौचाचारका पालन करना, सब देवताओंको मस्तक झुकाना, शरीरमें गायका गोबर लगाकर नहाना, दोष और प्रमादका त्याग करना, सायंकाल और प्रातःकाल स्नान एवं विधिवत् अग्निहोत्र करना, ठीक समयपर शौचाचारका पालन करना, सिरपर जटा और कटिप्रदेशमें वल्कल धारण करना, समिधा और पुष्पका संग्रह करनेके लिये सदा वनमें विचरना, समयपर नीवारसे आग्रयण कर्म ( नवशस्येष्टि यज्ञका सम्पादन) करना, साग और मूलका संकलन करना तथा सदा अपने घरको शुद्ध रखना- आदि कार्य वानप्रस्थ

मुनिके लिये अभीष्ट है । इनसे उसके धर्मकी सिद्धि होती है ॥

अतिथीनामाभिमुख्यं तत्परत्वं च सर्वदा ॥

पाद्यासनाभ्यां सम्पूज्य तथाहारनिमन्त्रणम् ।

अग्राम्यपचनं काले पितृदेवार्चनं तथा ॥

पश्चादतिथिसत्कारस्तस्य धर्माः सनातनाः । पहले अतिथियोंके सम्मुख जाय, फिर सदा उनकी सेवामें तत्पर रहे । पाद्य और आसन आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें भोजनके लिये बुलावे । समयपर ऐसी वस्तुओंसे रसोई बनावे, जो गाँवमें पैदा न हुई हों । उस रसोईके द्वारा पहले देवताओं और पितरोंका पूजन करे । तत्पश्चात् अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन करावे । ऐसा करनेवाले वानप्रस्थको सनातन धर्मकी सिद्धि प्राप्त होती है ॥

पृष्ठ 1178

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शिष्टैर्धर्मासने चैव धर्मार्थसहिताः कथाः ॥ प्रतिश्रयविभागश्च भूमिशय्या शिलासु वा । धर्मासनपर बैठे हुए शिष्ट पुरुषोंद्वारा उसे धर्मार्थयुक्त कथाएँ सुननी चाहिये । उसे अपने

लिये पृथक् आश्रम बना लेना चाहिये । वह पृथ्वी अथवा प्रस्तरकी शय्यापर सोये ॥

व्रतोपवासयोगश्च क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥

दिवारात्रं यथायोगं शौचं धर्मस्य चिन्तनम् । ) वानप्रस्थ मुनि व्रत और उपवासमें तत्पर रहे, दूसरोंपर क्षमाका भाव रखे, अपनी इन्द्रियोंको वशमें करे । दिन - रात यथासम्भव शौचाचारका पालन करके धर्मका चिन्तन करे ॥

त्रिकालमभिषेकं च पितृदेवार्चनं तथा ।

अग्निहोत्रपरिस्पन्द इष्टिहोमविधिस्तथा ॥ ६ ॥

उन्हें दिनमें तीन बार स्नान, पितरों और देवताओंका पूजन, अग्निहोत्र तथा विधिवत् यज्ञ करने चाहिये ॥

नीवारग्रहणं चैव फलमूलनिषेवणम् ।

इङ्गुदैरण्डतैलानां स्नेहार्थे च निषेवणम् ॥ ७ ॥

वानप्रस्थको जीविकाके लिये नीवार ( तिन्नीका चावल ) और फल- मूलका सेवन करना चाहिये तथा शरीरमें स्निग्धता लाने या तेलसे होनेवाले कार्योंके निर्वाहके लिये इंगुद और रेड़ीके तेलका सेवन करना उचित है ॥ ७ ॥

योगचर्याकृतैः सिद्धैः कामक्रोधविवर्जितैः ।

वीरशय्यामुपासद्भिर्वीरस्थानोपसेविभिः ॥ ८ ॥

उन्हें योगका अभ्यास करके उसमें सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये । काम और क्रोधको त्याग देना चाहिये । वीरासनसे बैठकर वीरस्थान ( विशाल और घने जंगल ) में निवास करने चाहिये ॥ ८ ॥

युक्तैर्योगवहैः सद्भिग्रष्मे पञ्चतपैस्तथा ।

मण्डूकयोगनियतैर्यथान्यायं निषेविभिः ॥ ९ ॥

मनको एकाग्र रखकर योगसाधनमें तत्पर रहना चाहिये । श्रेष्ठ वानप्रस्थको गर्मीमें पंचाग्नि सेवन करना चाहिये। हठयोगशास्त्रमें प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अभ्यासमें नियमपूर्वक लगे रहना चाहिये । किसी भी वस्तुका न्यायानुकूल सेवन करना चाहिये ॥ ९ ॥

वीरासनरतैर्नित्यं स्थण्डिले शयनं तथा ।

शीततोयाग्नियोगश्च चर्तव्यो धर्मबुद्धिभिः ॥ १० ॥

सदा वीरासनसे बैठना और वेदी या चबूतरेपर सोना चाहिये । धर्ममें बुद्धि रखनेवाले वानस्थ मुनियोंको शीततोयाग्नियोगका आचरण करना चाहिये अर्थात् उन्हें सर्दीकी

पृष्ठ 1179

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1179 का मूल पृष्ठ
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मौसममें रातको जलके भीतर बैठना या खड़े रहना, बरसातमें खुले मैदानमें सोना और ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्निका सेवन करना चाहिये ॥ १० ॥

अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शैवलोत्तरभोजनैः ।

अश्मकुट्टैस्तथा दान्तैः सम्प्रक्षालैस्तथापरैः ॥ ११ ॥

वे वायु अथवा जल पीकर रहें । सेवारका भोजन करें । पत्थरसे अन्न या फलको कूँचकर खायँ अथवा दाँतोंसे चबाकर ही भक्षण करें । सम्प्रक्षालके नियमसे रहें अर्थात् दूसरे दिनके लिये आहार संग्रह करके न रखें ॥

चीरवल्कलसंवीतैर्मृगचर्मनिवासिभिः ।

कार्या यात्रा यथाकालं यथाधर्मं यथाविधि ॥ १२ ॥

अधोवस्त्रकी जगह चीर और वल्कल पहनें, उत्तरीयके स्थानमें मृगछालेसे ही अपने अंगोंको आच्छादित करें । उन्हें समयके अनुसार धर्मके उद्देश्यसे विधिपूर्वक तीर्थ आदि स्थानोंकी ही यात्रा करनी चाहिये ॥ १२ ॥

वननित्यैर्वनचरैर्वनस्थैर्वनगोचरैः ।

वनं गुरुमिवासाद्य वस्तव्यं वनजीविभिः ॥ १३ ॥

वानप्रस्थको सदा वनमें ही रहना, वनमें ही विचरना, वनमें ही ठहरना, वनके ही मार्गपर चलना और गुरुकी भाँति वनकी शरण लेकर वनमें ही जीवन- निर्वाह करना चाहिये ॥ १३ ॥

तेषां होमक्रिया धर्मः पञ्चयज्ञनिषेवणम् ।

भागं च पञ्चयज्ञस्य वेदोक्तस्यानुपालनम् ॥ १४ ॥

प्रतिदिन अग्निहोत्र और पंचमहायज्ञोंका सेवन वानप्रस्थोंका धर्म है । उन्हें विभागपूर्वक वेदोक्त पंच - यज्ञोंका निरन्तर पालन करना चाहिये ॥ १४ ॥

अष्टमीयज्ञपरता चातुर्मास्यनिषेवणम् ।

पौर्णमासादयो यज्ञा नित्ययज्ञस्तथैव च ॥ १५ ॥

अष्टमी तिथिको होनेवाले अष्टका श्राद्धरूप यज्ञमें तत्पर रहना, चातुर्मास्य व्रतका सेवन करना, पौर्णमास और दर्शादि यज्ञ तथा नित्ययज्ञका अनुष्ठान करना वानप्रस्थ मुनिका धर्म है ॥ १५ ॥

विमुक्ता दारसंयोगैर्विमुक्ताः सर्वसंकरैः ।

विमुक्ताः सर्वपापैश्च चरन्ति मुनयो वने ॥ १६ ॥

वानप्रस्थ मुनि स्त्री - समागम, सब प्रकारके संकर तथा सम्पूर्ण पापोंसे दूर रहकर वनमें विचरते रहते हैं ॥ १६ ॥

स्रुग्भाण्डपरमा नित्यं त्रेताग्निशरणाः सदा ।

सन्तः सत्पथनित्या ये ते यान्ति परमां गतिम् ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1180

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स्रुक् - सुवा आदि यज्ञपात्र ही उनके लिये उत्तम उपकरण हैं । वे सदा आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियोंकी शरण लेकर सदा उन्हींकी परिचर्यामें लगे रहते हैं और नित्य सन्मार्गपर चलते हैं । इस प्रकार अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे श्रेष्ठ पुरुष परमगतिको प्राप्त होते ॥ १७ ॥

ब्रह्मलोकं महापुण्यं सोमलोकं च शाश्वतम् ।

गच्छन्ति मुनयः सिद्धाः सत्यधर्मव्यपाश्रयाः ॥ १८ ॥

वे मुनि सत्यधर्मका आश्रय लेनेवाले और सिद्ध होते हैं, अतः महान् पुण्यमय ब्रह्मलोक तथा सनातन सोमलोकमें जाते हैं ॥ १८ ॥

एष धर्मो मया देवि वानप्रस्थाश्रितः शुभः ।

विस्तरेणाथ सम्पन्नो यथास्थूलमुदाहृतः ॥ १९ ॥

देवि! यह मैंने तुम्हारे निकट विस्तारयुक्त एवं मंगलमय वानप्रस्थधर्मका स्थूलभावसे वर्णन किया है ॥ उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेश सर्वभूतनमस्कृत ।

यो धर्मो मुनिसंघस्य सिद्धिवादेषु तं वद ॥ २० ॥

उमादेवी बोलीं- भगवन्! सर्वभूतेश्वर! समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित महेश्वर! ज्ञानगोष्ठियोंमें मुनि- समुदायका जो धर्म निश्चित किया गया है, उसे बताइये ॥

सिद्धिवादेषु संसिद्धास्तथा वननिवासिनः ।

स्वैरिणो दारसंयुक्तास्तेषां धर्मः कथं स्मृतः ॥ २१ ॥

ज्ञानगोष्ठियोंमें जो सम्यक् सिद्ध बताये गये हैं, वे वनवासी मुनि कोई तो एकाकी ही स्वच्छन्द विचरते हैं, कोई पत्नीके साथ रहते हैं । उनका धर्म कैसा माना गया है? ॥ २१ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

स्वैरिणस्तपसा देवि सर्वे दारविहारिणः ।

तेषां मौण्ड्यं कषायश्च वासे रात्रिश्च कारणम् ॥ २२ ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! सभी वानप्रस्थ तपस्यामें संलग्न रहते हैं, उनमेंसे कुछ तो स्वच्छन्द विचरनेवाले होते हैं ( स्त्रीको साथ नहीं रखते ) और कुछ अपनी - अपनी स्त्रीके साथ रहते हैं । स्वच्छन्द विचरनेवाले मुनि सिर मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहनते हैं; ( उनका कोई एक स्थान नहीं होता ) किंतु जो स्त्रीके साथ रहते हैं, वे रात्रिको अपने आश्रममें ही ठहरते हैं ॥ २२ ॥

त्रिकालमभिषेकश्च होत्रं त्वृषिकृतं महत् ।

समाधिसत्पथस्थानं यथोद्दिष्टनिषेवणम् ॥ २३ ॥