श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1161–1170

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1161–1170

पृष्ठ 1161

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उमोवाच ( भगवन् देवदेवेश नमस्ते वृषभध्वज । श्रोतुमिच्छाम्यहं देव धर्ममाश्रमिणां विभो । उमा बोलीं- भगवन्! देवदेवेश्वर! वृषभध्वज! देव! आपको नमस्कार है । प्रभो! अब मैं आश्रमियोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

तथाश्रमगतं धर्मं शृणु देवि समाहिता ।

आश्रमाणां तु यो धर्मः क्रियते ब्रह्मवादिभिः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! एकाग्रचित्त होकर आश्रमधर्मका वर्णन सुनो । ब्रह्मवादी मुनियोंने आश्रमोंका जो धर्म निश्चित किया है, वही यहाँ बताया जा रहा है ॥

गृहस्थः प्रवरस्तेषां गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रितः ।

पञ्चयज्ञक्रिया शौचं दारतुष्टिरतन्द्रिता ॥

ऋतुकालाभिगमनं दानयज्ञतपांसि च ।

अविप्रवासस्तस्येष्टः स्वाध्यायश्चाग्निपूर्वकम् ॥

आश्रमोंमें गृहस्थ- आश्रम सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह गार्हस्थ्य धर्मपर प्रतिष्ठित है । पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान, बाहर- भीतरकी पवित्रता, अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहना, आलस्यको त्याग देना, ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करना, दान, यज्ञ और तपस्यामें लगे रहना, परदेश न जाना और अग्निहोत्रपूर्वक वेद- शास्त्रोंका स्वाध्याय करना — ये गृहस्थके अभीष्ट धर्म हैं ॥

तथैव वानप्रस्थस्य धर्माः प्रोक्ताः सनातनाः ।

गृहवासं समुत्सृज्य निश्चित्यैकमनाः शुभैः ॥

वन्यैरेव सदाहारैर्वर्तयेदिति च स्थितिः । इसी प्रकार वानप्रस्थ आश्रमके सनातन धर्म बताये गये हैं । वानप्रस्थ आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छावाला पुरुष एकचित्त होकर निश्चय करनेके पश्चात् घरका रहना छोड़कर वनमें चला जाय और वनमें प्राप्त होनेवाले उत्तम आहारोंसे ही जीवन - निर्वाह करे । यही उसके लिये शास्त्रविहित मर्यादा है ॥ भूमिशय्या जटाश्मश्रुचर्मवल्कलधारणम् ॥

देवतातिथिसत्कारो महाकृच्छ्राभिपूजनम् ।

अग्निहोत्रं त्रिषवणं तस्य नित्यं विधीयते ॥

ब्रह्मचर्यं क्षमा शौचं तस्य धर्मः सनातनः ।

एवं स विगते प्राणे देवलोके महीयते ॥

पृष्ठ 1162

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पृथ्वीपर सोना, जटा और दाढ़ी- मूंछ रखना, मृगचर्म और वल्कल वस्त्र धारण करना, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करना, महान् कष्ट सहकर भी देवताओंकी पूजा आदिका निर्वाह करना - यह वानप्रस्थ का नियम है । उसके लिये प्रतिदिन अग्निहोत्र और त्रिकाल - स्नानका विधान है । ब्रह्मचर्य, क्षमा और शौच आदि उसका सनातन धर्म है । ऐसा करनेवाला वानप्रस्थ प्राणत्यागके पश्चात् देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥

यतिधर्मास्तथा देवि गृहांस्त्यक्त्वा यतस्ततः ।

आकिञ्चन्यमनारम्भः सर्वतः शौचमार्जवम् ॥

सर्वत्र भैक्षचर्या च सर्वत्रैव विवासनम् ।

सदा ध्यानपरत्वं च दोषशुद्धिः क्षमा दया ॥

तत्त्वानुगतबुद्धित्वं तस्य धर्मविधिर्भवेत् । देवि! यतिधर्म इस प्रकार है । संन्यासी घर छोड़कर इधर- उधर विचरता रहे । वह अपने पास किसी वस्तुका संग्रह न करे । कर्मोंके आरम्भ या आयोजनसे दूर रहे । सब ओरसे पवित्रता और सरलताको वह अपने भीतर स्थान दे । सर्वत्र भिक्षासे जीविका चलावे । सभी स्थानोंसे वह विलग रहे। सदा ध्यानमें तत्पर रहना, दोषोंसे शुद्ध होना, सबपर क्षमा और दयाका भाव रखना तथा बुद्धिको तत्त्वके चिन्तनमें लगाये रखना – ये सब संन्यासीके लिये धर्मकार्य हैं ॥

बुभुक्षितं पिपासार्तमतिथिं श्रान्तमागतम् ।

अर्चयन्ति वरारोहे तेषामपि फलं महत् ॥

वरारोहे! जो भूख - प्यास से पीड़ित और थके - मादे आये हुए अतिथिकी सेवा- पूजा करते हैं, उन्हें भी महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥

पात्रमित्येव दातव्यं सर्वस्मै धर्मकाङ्क्षिभिः ।

आगमिष्यति यत् पात्रं तत् पात्रं तारयिष्यति ॥

धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि अपने घरपर आये हुए सभी अतिथियोंको दानका उत्तम पात्र समझकर दान दें । उन्हें यह विश्वास रखना चाहिये कि आज जो पात्र आयेगा, वह हमारा उद्धार कर देगा ।

काले सम्प्राप्तमतिथिं भोक्तुकाममुपस्थितम् ।

यस्तं सम्भावयेत् तत्र व्यासोऽयं समुपस्थितः ॥

समयपर भोजनकी इच्छासे आये अथवा उपस्थित हुए अतिथिका जो समादर करता है, वहाँ ये साक्षात् भगवान् व्यास उपस्थित होते हैं ॥

तस्य पूजां यथाशक्त्या सौम्यचित्तः प्रयोजयेत् ।

चित्तमूलो भवेद् धर्मो धर्ममूलं भवेद् यशः ॥

अतः कोमलचित्त होकर उस अतिथिकी यथा- शक्ति पूजा करनी चाहिये; क्योंकि धर्मका मूल है चित्तका विशुद्ध भाव और यशका मूल है धर्म ॥

पृष्ठ 1163

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तस्मात् सौम्येन चित्तेन दातव्यं देवि सर्वथा ।

सौम्यचित्तस्तु यो दद्यात् तद्धि दानमनुत्तमम् ॥

अतः देवि! सर्वथा सौम्यचित्तसे दान देना चाहिये; क्योंकि जो सौम्यचित्त होकर दान देता है, उसका वह दान सर्वोत्तम होता है ॥

यथाम्बुबिन्दुभिः सूक्ष्मैः पतद्भिर्मेदिनीतले ।

केदाराश्च तटाकानि सरांसि सरितस्तथा ॥

तोयपूर्णानि दृश्यन्ते अप्रतर्क्यानि शोभने ।

अल्पमल्पमपि ह्येकं दीयमानं विवर्धते ॥

शोभने! जैसे भूतलपर वर्षाके समय गिरती हुई जलकी छोटी- छोटी बूँदोंसे ही खेतोंकी क्यारियाँ, तालाब, सरोवर और सरिताएँ अतर्क्य भावसे जलपूर्ण दिखायी देती हैं, उसी प्रकार एक - एक करके थोड़ा- थोड़ा दिया हुआ दान भी बढ़ जाता है ॥

पीडयापि च भृत्यानां दानमेव विशिष्यते ।

पुत्रदारधनं धान्यं न मृताननुगच्छति ॥

भरण - पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंको थोड़ा- सा कष्ट देकर भी यदि दान किया जा सके तो दान ही श्रेष्ठ माना गया है । स्त्री - पुत्र, धन और धान्य- ये वस्तुएँ मरे हुए पुरुषोंके साथ नहीं जाती हैं ॥

श्रेयो दानं च भोगश्च धनं प्राप्य यशस्विनी ।

दानेन हि महाभागा भवन्ति मनुजाधिपाः ॥

नास्ति भूमौ दानसमं नास्ति दानसमो निधिः ।

नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ॥

यशस्विनी! धन पाकर उसका दान और भोग करना भी श्रेष्ठ है; परंतु दान करनेसे मनुष्य महान् सौभाग्यशाली नरेश होते हैं । इस पृथ्वीपर दानके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है । दानके समान कोई निधि नहीं है । सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और असत्यसे बढ़कर कोई पातक नही है ॥

आश्रमे यस्तु तप्येत तपो मूलफलाशनः ।

आदित्याभिमुखो भूत्वा जटावल्कलसंवृतः ॥

मण्डूकशायी हेमन्ते ग्रीष्मे पञ्चतपा भवेत् ।

सम्यक् तपश्चरन्तीह श्रद्दधाना वनाश्रमे ॥

गृहाश्रमस्य ते देवि कलां नार्हन्ति षोडशीम् । जो वानप्रस्थ आश्रममें फल- मूल खाकर जटा बढ़ाये, वल्कल पहने, सूर्यकी ओर मुँह करके तपस्या करता है, हेमन्त ऋतुमें मेढककी भाँति जलमें सोता है और ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्निका ताप सहन करता है । इस प्रकार जो लोग वानप्रस्थ आश्रममें रहकर श्रद्धापूर्वक

पृष्ठ 1164

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उत्तम तप करते हैं, वे भी गृहस्थाश्रमके पालनसे होनेवाले धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते ॥ उमोवाच गृहाश्रमस्य या चर्या व्रतानि नियमाश्च ये ॥

यथा च देवताः पूज्याः सततं गृहमेधिना ।

यद् यच्च परिहर्तव्यं गृहिणा तिथिपर्वसु ॥

तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यमानं त्वया विभो । उमाने कहा — प्रभो! गृहस्थाश्रमका जो आचार है, जो व्रत और नियम हैं, गृहस्थको सदा जिस प्रकारसे देवताओंकी पूजा करनी चाहिये तथा तिथि और पर्वोंके दिन उसे जिस-जिस वस्तुका त्याग करना चाहिये, वह सब मैं आपके मुखसे सुनना चाहती हूँ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच गृहाश्रमस्य यन्मूलं फलं धर्मोऽयमुत्तमः ॥

पादैश्चतुर्भिः सततं धर्मो यत्र प्रतिष्ठितः ।

सारभूतं वरारोहे दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ॥

तदहं ते प्रवक्ष्यामि श्रूयतां धर्मचारिणि । श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! गृहस्थ आश्रमका जो मूल और फल है, यह उत्तम धर्म जहाँ अपने चारों चरणोंसे सदा विराजमान रहता है, वरारोहे! जैसे दहीसे घी निकाला जाता है, उसी प्रकार जो सब धर्मोंका सारभूत है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ । धर्मचारिणि! सुनो ॥ शुश्रूषन्ते ये पितरं मातरं च गृहाश्रमे ।

भर्तारं चैव या नारी अग्निहोत्रं च ये द्विजाः ।

तेषु तेषु च प्रीणन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥

पितरः पितृलोकस्थाः स्वधर्मेण स रज्यते । जो लोग गृहस्थ - आश्रममें रहकर माता -पिताकी सेवा करते हैं, जो नारी पतिकी सेवा करती है तथा जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र कर्म करते हैं, उन सबपर इन्द्र आदि देवता, पितृलोकनिवासी पितर प्रसन्न होते हैं एवं वह पुरुष अपने धर्मसे आनन्दित होता है ॥ उमोवाच मातापितृवियुक्तानां का चर्या गृहमेधिनाम् ॥ विधवानां च नारीणां भवानेतद् ब्रवीतु मे । उमाने पूछा- जिन गृहस्थोंके माता- पिता न हों, उनकी अथवा विधवा स्त्रियोंकी जीवनचर्या क्या होनी चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

पृष्ठ 1165

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देवतातिथिशुश्रूषा गुरुवृद्धाभिवादनम् ॥

अहिंसा सर्वभूतानामलोभः सत्यसंधता ।

ब्रह्मचर्यं शरण्यत्वं शौचं पूर्वाभिभाषणम् ॥

कृतज्ञत्वमपैशुन्यं सततं धर्मशीलता ।

दिने द्विरभिषेकं च पितृदैवतपूजनम् ॥

गवाह्निकप्रदानं च संविभागोऽतिथिष्वपि ।

दीपं प्रतिश्रयं चैव दद्यात् पाद्यासनं तथा ॥

पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा द्वादशेऽप्यष्टमेऽपि वा ।

चतुर्दशे पञ्चदशे ब्रह्मचारी सदा भवेत् ॥

श्मश्रुकर्म शिरोऽभ्यङ्गमञ्जनं दन्तधावनम् ।

नैतेष्वहस्सु कुर्वीत तेषु लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – देवता और अतिथियोंकी सेवा, गुरुजनों तथा वृद्ध पुरुषोंका अभिवादन, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, लोभको त्याग देना, सत्यप्रतिज्ञ होना, ब्रह्मचर्य, शरणागतवत्सलता, शौचाचार, पहले बातचीत करना, उपकारीके प्रति कृतज्ञ होना, किसीकी चुगली न खाना, सदा धर्मशील रहना, दिनमें दो बार स्नान करना, देवता और पितरोंका पूजन करना, गौओंको प्रतिदिन अन्नका ग्रास और घास देना, अतिथियोंको विभागपूर्वक भोजन देना, दीप, ठहरनेके लिये स्थान तथा पाद्य और आसन देना, पंचमी, षष्ठी, द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमाको सदा ब्रह्मचर्यका पालन करना, इन तिथियोंपर मूँछ मुड़ाने, सिरमें तेल लगाने, आँखमें अंजन करने तथा दाँतुन करने एवं दाँत धोने आदिका कार्य न करे । जो इन विधि - निषेधोंका पालन करते हैं, उनके यहाँ लक्ष्मी प्रतिष्ठित होती हैं ॥

व्रतोपवासनियमस्तपो दानं च शक्तितः ।

भरणं भृत्यवर्गस्य दीनानामनुकम्पनम् ॥

परदारनिवृत्तिश्च स्वदारेषु रतिः सदाः । व्रत और उपवासका नियम पालना, तपस्या करना, यथाशक्ति दान देना, पोष्यवर्गका पोषण करना, दीनोंपर कृपा रखना, परायी स्त्रीसे दूर रहना तथा सदा ही अपनी स्त्रीसे प्रेम रखना गृहस्थका धर्म है ॥ शरीरमेकं दम्पत्योर्विधात्रा पूर्वनिर्मितम् ॥ तस्मात् स्वदारनिरतो ब्रह्मचारी विधीयते । विधाताने पूर्वकालमें पति- पत्नीका एक ही शरीर बनाया था; अतः अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहनेवाला पुरुष ब्रह्मचारी माना जाता है ॥ शीलवृत्तविनीतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च ॥ आर्जवे वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिणः ।

पृष्ठ 1166

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प्रियातिथेश्च क्षान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च ॥ गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्यैः कृत्यमाश्रमैः । जो शील और सदाचारसे विनीत है, जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखा है, जो सरलतापूर्वक बर्ताव करता है और समस्त प्राणियोंका हितैषी है, जिसको अतिथि प्रिय है, जो क्षमाशील है, जिसने धर्मपूर्वक धनका उपार्जन किया है - ऐसे गृहस्थके लिये अन्य आश्रमोंकी क्या आवश्यकता है? ॥ यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ॥ तथा गृहाश्रमं प्राप्य सर्वे जीवन्ति चाश्रमाः । जैसे सभी जीव माताका सहारा लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम गृहस्थ- आश्रमका आश्रय लेकर ही जीवन- यापन करते हैं ॥ राजानः सर्वपाषण्डाः सर्वे रङ्गोपजीविनः ॥

व्यालग्रहाश्च डम्भाश्च चोरा राजभटास्तथा ।

सविद्याः सर्वशीलज्ञाः सर्वे वै विचिकित्सकाः ॥

दूराध्वानं प्रपन्नाश्च क्षीणपथ्योदना नराः ।

एते चान्ये च बहवः तर्कयन्ति गृहाश्रमम् ॥

राजा, पाखण्डी, नट, सपेरा, दम्भ, चोर, राजपुरुष, विद्वान्, सम्पूर्ण शीलोंके जानकार, सभी संशयालु तथा दूरके रास्तेपर आये हुए पाथेयरहित राही — ये तथा और भी बहुत - से मनुष्य गृहस्थ - आश्रमपर ही ताक लगाये रहते हैं ॥

मार्जारा मूषिकाः श्वानः सूकराश्च शुकास्तथा ।

कपोतका कर्कटकाः सरीसृपनिषेवणाः ॥

अरण्यवासिनश्चान्ये सङ्घा ये मृगपक्षिणाम् ।

एवं बहुविधा देवि लोकेऽस्मिन् सचराचराः ॥

गृहे क्षेत्रे बिले चैव शतशोऽथ सहस्रशः ।

गृहस्थेन कृतं कर्म सर्वैस्तैरिह भुज्यते ॥

देवि! चूहे, बिल्ली, कुत्ते, सुअर, तोते, कबूतर, कर्कटक ( काक आदि ), सरीसृपसेवी— ये तथा और भी बहुत - से मृग- पक्षियोंके वनवासी समुदाय हैं तथा इसी तरह इस जगत्में जो नाना प्रकारके सैकड़ों और हजारों चराचर प्राणी घर, क्षेत्र और बिलमें निवास करते हैं, वे सब - के - सब यहाँ गृहस्थके किये हुए कर्मको ही भोगते हैं ॥

उपयुक्तं च यत् तेषां मतिमान् नानुशोचति ।

धर्म इत्येव संकल्प्य यस्तु तस्य फलं शृणु ॥

जो वस्तु उनके उपयोगमें आ गयी, उसके लिये जो बुद्धिमान् पुरुष कभी शोक नहीं करता, इन सबका पालन करना धर्म ही है, ऐसा समझकर संतुष्ट रहता है, उसे मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो ॥

पृष्ठ 1167

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सर्वयज्ञप्रणीतस्य हयमेधेन यत् फलम् । वर्षे स द्वादशे देवि फलेनैतेन युज्यते ॥ ) देवि! जो सम्पूर्ण यज्ञोंका सम्पादन कर चुका है, उसे अश्वमेधयज्ञसे जो फल मिलता है, वही फल इस गृहस्थको बारह वर्षोंतक पूर्वोक्त नियमोंका पालन करनेसे प्राप्त हो जाता है ॥ उमोवाच

उक्तस्त्वया पृथग्धर्मश्चातुर्वर्ण्यहितः शुभः ।

सर्वव्यापी तुतु यो धर्मो भगवंस्तद् ब्रवीहि मे ॥ ६१ ॥

उमाने कहा — भगवन्! आपने चारों वर्णोंके लिये हितकारी एवं शुभ धर्मका पृथक्- पृथक् वर्णन किया है । अब मुझे वह धर्म बतलाइये, जो सब वर्णोंके लिये समानरूपसे उपयोगी हो ॥ ६१ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ब्राह्मणा लोकसारेण सृष्टा धात्रा गुणार्थिना ।

लोकांस्तारयितुं कृत्स्नान् मर्त्येषु क्षितिदेवताः ॥ ६२ ॥

तेषामपि प्रवक्ष्यामि धर्मकर्मफलोदयम् ।

ब्राह्मणेषु हि यो धर्मः स धर्मः परमो मतः ॥ ६३ ॥

श्रीमहेश्वरने कहा- देवि! गुणोंकी अभिलाषा रखनेवाले जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने समस्त लोकोंका उद्धार करनेके लिये जगत्की सार वस्तुद्वारा मृत्युलोकमें ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है । ब्राह्मण इस भूमण्डलके देवता हैं, अतः पहले उनके ही धर्म - कर्म और उनके फलोंका वर्णन करता हूँ, क्योंकि ब्राह्मणोंमें जो धर्म होता है, उसे ही परम धर्म माना जाता है ॥ ६२-६३ ॥

इमे ते लोकधर्मार्थं त्रयः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।

पृथिव्यां सर्जने नित्यं सृष्टांस्तानपि मे शृणु ॥ ६४ ॥

ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये तीन प्रकारके धर्मका विधान किया है । पृथ्वीकी सृष्टिके साथ ही इन तीनों धर्मोंकी सृष्टि हो गयी है, इनको भी तुम मुझसे सुनो ॥ ६४ ॥

वेदोक्तः परमो धर्मः स्मृतिशास्त्रगतोऽपरः ।

शिष्टाचीर्णोऽपरः प्रोक्तस्त्रयो धर्माः सनातनाः ॥ ६५ ॥

पहला है वेदोक्त धर्म, जो सबसे उत्कृष्ट धर्म है । दूसरा है वेदानुकूल स्मृति- शास्त्रमें वर्णित — स्मार्तधर्म और तीसरा है शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरित धर्म ( शिष्टाचार) । ये तीनों धर्म सनातन हैं ॥ ६५ । |

त्रैविद्यो ब्राह्मणो विद्वान् न चाध्ययनजीवकः ।

त्रिकर्मा त्रिपरिक्रान्तो मैत्र एष स्मृतो द्विजः ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 1168

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जो तीनों वेदोंका ज्ञाता और विद्वान् हो; पढ़ने- पढ़ानेका काम करके जीविका न चलाता हो; दान, धर्म और यज्ञ- इन तीन कर्मोंका सदा अनुष्ठान करता हो; काम, क्रोध और लोभ— इन तीनों दोषोंका त्याग कर चुका हो और सब प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव -रखता हो — ऐसा पुरुष ही वास्तवमें ब्राह्मण माना गया है ॥ ६६ ॥

षडिमानि तु कर्माणि प्रोवाच भुवनेश्वरः ।

वृत्त्यर्थं ब्राह्मणानां वै शृणु धर्मान् सनातनान् ॥ ६७ ॥

सम्पूर्ण भुवनोंके स्वामी ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंकी जीविकाके लिये ये छः कर्म बताये हैं;

जो उनके लिये सनातन धर्म हैं । इनके नाम सुनो ॥ ६७ ॥

यजनं याजनं चैव तथा दानप्रतिग्रहौ ।

अध्यापनं चाध्ययनं षट्कर्मा धर्मभाग् द्विजः ॥ ६८ ॥

यजन- याजन ( यज्ञ करना- कराना ), दान देना, दान लेना, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना ।

इन छः कर्मोंका आश्रय लेनेवाला ब्राह्मण धर्मका भागी होता है ॥ ६८ ॥

नित्यः स्वाध्यायिता धर्मो धर्मो यज्ञः सनातनः ।

दानं प्रशस्यते चास्य यथाशक्ति यथाविधि ॥ ६ ९ ॥

इनमें भी सदा स्वाध्यायशील होना ब्राह्मणका मुख्य धर्म है, यज्ञ करना सनातन धर्म है और अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक दान देना उसके लिये प्रशस्त धर्म है ॥

शमस्तूपरमो धर्मः प्रवृत्तः सत्सु नित्यशः ।

गृहस्थानां विशुद्धानां धर्मस्य निचयो महान् ॥ ७० ॥

सब प्रकारके विषयोंसे उपरत होना शम कहलाता है । यह सत्पुरुषोंमें सदा दृष्टिगोचर होता है । इसका पालन करनेसे शुद्ध चित्तवाले गृहस्थोंको महान् धर्म-राशिकी प्राप्ति होती है ॥ ७० ॥

पञ्चयज्ञविशुद्धात्मा सत्यवागनसूयकः ।

दाता ब्राह्मणसत्कर्ता सुसंसृष्टनिवेशनः ॥ ७१ ॥

अमानी च सदाजिह्मः स्निग्धवाणीप्रदस्तथा ।

अतिथ्यभ्यागतरतिः शेषान्नकृतभोजनः ॥ ७२ ॥

पाद्यमर्घ्यं यथान्यायमासनं शयनं तथा ।

दीपं प्रतिश्रयं चैव यो ददाति स धार्मिकः ॥ ७३ ॥

गृहस्थ पुरुषको पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने मनको शुद्ध बनाना चाहिये । जो गृहस्थ सदा सत्य बोलता, किसीके दोष नहीं देखता, दान देता, ब्राह्मणोंका सत्कार करता, अपने घरको झाड़-बुहारकर साफ रखता, अभिमानको त्याग देता, सदा सरल भावसे रहता, स्नेहयुक्त वचन बोलता, अतिथि और अभ्यागतोंकी सेवामें मन लगाता, यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता और अतिथिको शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार पाद्य, अर्घ्य, आसन,

पृष्ठ 1169

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शय्या, दीपक तथा ठहरनेके लिये गृह प्रदान करता है, उसे धार्मिक समझना चाहिये ॥ ७१ —७३ ॥

प्रातरुत्थाय चाचम्य भोजनेनोपमन्त्र्य च ।

सत्कृत्यानुव्रजेद् यस्तु तस्य धर्मः सनातनः ॥ ७४ ॥

जो प्रातःकाल उठकर आचमन करके ब्राह्मणोंको भोजनके लिये निमन्त्रण देता और उसे ठीक समयपर सत्कारपूर्वक भोजन करानेके बाद कुछ दूरतक उसके पीछे - पीछे जाता है, उसके द्वारा सनातन धर्मका पालन होता है ॥ ७४ ॥

सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति निशानिशम् ।

शूद्रधर्मः समाख्यातस्त्रिवर्गपरिचारणम् ॥ ७५ ॥

शूद्र गृहस्थको अपनी शक्तिके अनुसार तीनों वर्णोंका निरन्तर सब प्रकारसे आतिथ्य-सत्कार करना चाहिये । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-इन तीन वर्णोंकी परिचर्यामें रहना उसके लिये प्रधान धर्म बतलाया गया है ॥ ७५ ॥

प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो गृहस्थेषु विधीयते ।

तमहं वर्तयिष्यामि सर्वभूतहितं शुभम् ॥ ७६ ॥

प्रवृत्तिरूप धर्मका विधान गृहस्थोंके लिये किया गया है । वह सब प्राणियोंका हितकारी और शुभ है । अब मैं उसीका वर्णन करता हूँ ॥ ७६ ॥

दातव्यमसकृच्छक्त्या यष्टव्यमसकृत् तथा ।

पुष्टिकर्मविधानं च कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ७७ ॥

अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको सदा अपनी शक्तिके अनुसार दान करना चाहिये ।

सदा यज्ञ करना चाहिये और सदा ही पुष्टिजनक कर्म करते रहना चाहिये ॥

धर्मेणार्थः समाहार्यो धर्मलब्धं त्रिधा धनम् ।

कर्तव्यं धर्मपरमं मानवेन प्रयत्नतः ॥ ७८ ॥

मनुष्यको धर्मके द्वारा धनका उपार्जन करना चाहिये । धर्मसे उपार्जित हुए धनके तीन भाग करने चाहिये और प्रयत्नपूर्वक धर्मप्रधान कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ७८ ॥

एकेनांशेन धर्मार्थौ कर्तव्यी भूतिमिच्छता ।

एकेनांशेन कामार्थ एकमंशं विवर्धयेत् ॥ ७९ ॥

अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको धनके उपर्युक्त तीन भागोंमेंसे एक भागके द्वारा धर्म और अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये । दूसरे भागको उपभोगमें लगाना चाहिये और तीसरे अंशको बढ़ाना चाहिये ( प्रवृत्तिधर्मका वर्णन किया गया है ) ॥ ७ ९ ॥

निवृत्तिलक्षणस्त्वन्यो धर्मो मोक्षाय तिष्ठति ।

तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु मे देवि तत्त्वतः ॥ ८० ॥

इससे भिन्न निवृत्तिरूप धर्म है । वह मोक्षका साधन है । देवि! मैं यथार्थरूपसे उसका स्वरूप बताता हूँ, उसे सुनो ॥ ८० ॥

पृष्ठ 1170

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सर्वभूतदया धर्मो न चैकग्रामवासिता ।

आशापाशविमोक्षश्च शस्यते मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥ ८१ ॥

मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनी चाहिये । यही उनका धर्म है । उन्हें सदा एक ही गाँवमें नहीं रहना चाहिये और अपने आशारूपी बन्धनोंको

तोड़नेका प्रयत्न करना चाहिये । यही मुमुक्षुके लिये प्रशंसाकी बात है ॥ ८१ ॥

न कुट्यां नोदके सङ्गो न वाससि न चासने ।

न त्रिदण्डेन शयने नाग्नौ न शरणालये ॥ ८२ ॥

मोक्षाभिलाषी पुरुषको न तो कुटीमें आसक्ति रखनी चाहिये न जलमें, न वस्त्रमें, न आसनमें; न त्रिदण्डमें, न शय्यामें, न अग्निमें और न किसी निवासस्थानमें ही आसक्त होना चाहिये ॥ ८२ ॥

अध्यात्मगतिचित्तो यस्तन्मनास्तत्परायणः ।

युक्त योगं प्रति सदा प्रतिसंख्यानमेव च ॥ ८३ ॥

मुमुक्षुको अध्यात्मज्ञानका ही चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करना चाहिये । उसे उसीमें सदा स्थित रहना चाहिये । निरन्तर योगाभ्यासमें प्रवृत्त होकर तत्त्वका विचार करते रहना चाहिये ॥ ८३ ॥

वृक्षमूलपरो नित्यं शून्यागारनिवेशनः ।

नदीपुलिनशायी च नदीतीररतिश्च यः ॥ ८४ ॥

विमुक्तः सर्वसङ्गेषु स्नेहबन्धेषु च द्विजः ।

आत्मन्येवात्मनो भावं समासज्जेत वै द्विजः ॥ ८५ ॥

संन्यासी द्विजको उचित है कि वह सब प्रकारकी आसक्तियों और स्नेहबन्धनोंसे मुक्त होकर सर्वदा वृक्षके नीचे, सूने घरमें अथवा नदीके किनारे रहता हुआ अपने अन्तःकरणमें ही परमात्माका ध्यान करे ॥ ८४-८५ ॥

स्थाणुभूतो निराहारो मोक्षदृष्टेन कर्मणा ।

परिव्रजेति यो युक्तस्तस्य धर्मः सनातनः ॥ ८६ ॥

जो युक्तचित्त होकर संन्यासी होता है और मोक्षोपयोगी कर्म श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदिके द्वारा समय व्यतीत करता हुआ निराहार ( विषयसेवनसे रहित) और ठूठे काठकी भाँति स्थिर रहता है, उसको सनातन धर्मका मोक्षरूप धर्म प्राप्त होता है ॥ ८६ ॥

न चैकत्र समासक्तो न चैकग्रामगोचरः ।

मुक्तातिनिर्मुक्तो न चैकपुलिनेशयः ॥ ८७ ॥

संन्यासी किसी एक स्थानमें आसक्ति न रखे, एक ही ग्राममें न रहे तथा किसी एक ही किनारेपर सर्वदा शयन न करे । उसे सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरना चाहिये ॥ ८७ ॥

एष मोक्षविदां धर्मो वेदोक्तः सत्पथः सताम् ।