06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1211–1220

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220

पृष्ठ 1211

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बहुत वर्षोंके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं । गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ २२-२३ ॥

न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजकः ।

लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्रितो मधुरं वचः ॥ २४ ॥

सर्ववर्णप्रियकरः सर्वभूतहितः सदा ।

अद्वेषी सुमुखः श्लक्ष्णः स्निग्धवाणीप्रदः सदा ॥ २५ ॥

स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसकः ।

यथार्हसत्क्रियापूर्वमर्चयन्तवतिष्ठति ॥ २६ ॥

मार्गार्हाय ददन्मार्गं गुरुं गुरुवदर्चयन् ।

अतिथिप्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजकः ॥ २७ ॥

एवंभूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते ।

ततो मानुषतां प्राप्य विशिष्टकुलजो भवेत् ॥ २८ ॥

देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोंका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है । तत्पश्चात् मानव- योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है ॥ २४–२८ ॥

तत्रासौ विपुलैर्भोगैः सर्वरत्नसमायुतः ।

यथार्हदाता चार्हेषु धर्मचर्यापरो भवेत् ॥ २ ९ ॥

उस जन्ममें वह महान् भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है ॥ २ ९ ॥

सम्मतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृतः ।

स्वकर्मफलमाप्नोति स्वयमेव नरः सदा ॥ ३० ॥

वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं ।

इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोंका फल सदा स्वयं ही भोगता है ॥ ३० ॥

उदात्तकुलजातीय उदात्ताभिजनः सदा ।

एष धर्मो मया प्रोक्तो विधात्रा स्वयमीरितः ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1212

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धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थानमें जन्म धारण करता है । यह साक्षात् ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका मैंने वर्णन किया है ॥ ३१ ॥

यस्तु रौद्रसमाचारः सर्वसत्त्वभयंकरः ।

हस्ताभ्यां यदि वा पद्भ्यां रज्ज्वा दण्डेन वा पुनः ॥ ३२ ॥

लोष्टैः स्तम्भैरायुधैर्वा जन्तून् बाधति शोभने ।

हिंसार्थं निकृतिप्रज्ञः प्रोद्वेजयति चैव ह ॥ ३३ ॥

उपक्रामति जन्तूंश्च उद्वेगजननः सदा ।

एवंशीलसमाचारो निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३४ ॥

शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है, जिससे समस्त जीवोंको भय प्राप्त होता है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेलेसे मारकर, खम्भोंमें बाँधकर तथा घातक शस्त्रोंका प्रहार करके जीव- जन्तुओंको सताता है, छल- कपटमें प्रवीण होकर हिंसाके लिये उन जीवोंमें उद्वेग पैदा करता है तथा उद्वेगजनक होकर सदा उन जन्तुओंपर आक्रमण करता है, ऐसे स्वभाव और आचारवाले मनुष्यको नरकमें गिरना पड़ता है ॥

स वै मनुष्यतां गच्छेद् यदि कालस्य पर्ययात् ।

बह्वाबाधपरिक्लिष्टे जायते सोऽधमे कुले ॥ ३५ ॥

यदि वह कालचक्रके फेरसे फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो अनेक प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे कष्ट उठानेवाले अधम कुलमें उत्पन्न होता है ॥ ३५ ॥

लोकद्वेष्योऽधमः पुंसां स्वयं कर्मफलैः कृत्तैः ।

एष देवि मनुष्येषु बोद्धव्यो ज्ञातिबन्धुषु ॥ ३६ ॥

देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोंके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति-बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं ॥

अपरः सर्वभूतानि दयावाननुपश्यति ।

मैत्रदृष्टिः पितृसमो निर्वैरो नियतेन्द्रियः ॥ ३७ ॥

नोद्वेजयति भूतानि न विघातयते तथा ।

हस्तपादैः सुनियतैर्विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ॥ ३८ ॥

न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नायुधेन च ।

उद्वेजयति भूतानि श्लक्ष्णकर्मा दयापरः ॥ ३ ९ ॥

एवंशीलसमाचारः स्वर्गे समुपजायते ।

तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत् ॥ ४० ॥

इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ - पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे,

पृष्ठ 1213

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ढेले और घातक अस्त्र- शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है ॥ ३७–४० ॥

स चेत् कर्मक्षयान्मर्त्यो मनुष्येषूपजायते ।

अल्पाबाधो निरातङ्कः स जातः सुखमेधते ॥ ४१ ॥

सुखभागी निरायासो निरुद्वेगः सदा नरः ।

एष देवि सतां मार्गो बाधा यत्र न विद्यते ॥ ४२ ॥

फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु - लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है । वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है । सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न- बाधा नहीं आने पाती है ॥ ४१-४२ ॥ उमोवाच

इमे मनुष्या दृश्यन्ते ऊहापोहविशारदाः ।

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः प्रज्ञावन्तोऽर्थकोविदाः ॥ ४३ ॥

पार्वतीजीने पूछा — भगवन्! इन मनुष्योंमेंसे कुछ तो ऊहापोहमें कुशल, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और अर्थनिपुण देखे जाते हैं ॥ ४३ ॥

दुष्प्रज्ञाश्चापरे देव ज्ञानविज्ञानवर्जिताः ।

केन कर्मविशेषेण प्रज्ञावान् पुरुषो भवेत् ॥ ४४ ॥

देव! कुछ दूसरे मानव ज्ञान -विज्ञानसे शून्य और दुर्बुद्धि दिखायी देते हैं । ऐसी दशामें मनुष्य कौन- सा विशेष कर्म करनेसे बुद्धिमान् हो सकता है? ॥ ४४ ॥

अल्पप्रज्ञो विरूपाक्ष कथं भवति मानवः ।

एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वधर्मविदां वर ॥ ४५ ॥

विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ॥ ४५ ॥

जात्यन्धाश्चापरे देव रोगार्ताश्चापरे तथा ।

नराः क्लीबाश्च दृश्यन्ते कारणं ब्रूहि तत्र वै ॥ ४६ ॥

देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं ।

इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ ४६ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ब्राह्मणान् वेदविदुषः सिद्धान् धर्मविदस्तथा ।

परिपृच्छन्त्यहरहः कुशलाः कुशलं तथा ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1214

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वर्जयन्तोऽशुभं कर्म सेवमानाः शुभं तथा ।

लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिहलोके तथा सुखम् ॥ ४८ ॥

श्रीमहादेवजीने कहा- देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥

स चेन्मानुषतां याति मेधावी तत्र जायते ।

श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य कल्याणमुपजायते ॥ ४ ९ ॥

ऐसे आचरणवाला पुरुष यदि स्वर्गसे लौटकर फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो वह मेधावी होता है । शास्त्र उसकी बुद्धिका अनुसरण करता है, अतः वह सदा कल्याणका भागी होता है ॥ ४ ९ ॥

परदारेषु ये चापि चक्षुर्दुष्टं प्रयुञ्जते ।

तेन दुष्टस्वभावेन जात्यन्धास्ते भवन्ति ह ॥ ५० ॥

जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ॥

मनसा तु प्रदुष्टेन नग्नां पश्यन्ति ये स्त्रियम् ।

रोगार्तास्ते भवन्तीह नरा दुष्कृतकर्मिणः ॥ ५१ ॥

जो दूषित हृदयसे किसी नंगी स्त्रीकी ओर निहारते हैं, वे पापकर्मी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं ॥ ५१ ॥

ये तु मूढा दुराचारा वियोनौ मैथुने रताः ।

पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञा क्लीबत्वमुपयान्ति ते ॥ ५२ ॥

जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनि मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ॥

पशूंश्च ये घातयन्ति ये चैव गुरुतल्पगाः ।

प्रकीर्णमैथुना ये च क्लीबा जायन्ति ते नसः ॥ ५३ ॥

जो पशुओंकी हत्या कराते, गुरुकी शय्यापर सोते और वर्णसंकर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करते हैं, वे मनुष्य नपुंसक होते हैं ॥ ५३ ॥

उमोवाच

सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च ।

श्रेयः कुर्वन्नवाप्नोति मानवो देवसत्तम ॥ ५४ ॥

पार्वतीने पूछा — देवश्रेष्ठ! कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन - सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है? ॥ ५४ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

पृष्ठ 1215

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श्रेयांसं मार्गमन्विच्छन् सदा यः पृच्छति द्विजान् ।

धर्मान्वेषी गुणाकांक्षी स स्वर्गं समुपाश्नुते ॥ ५५ ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सद्गुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ॥

यदि मानुषतां देवि कदाचित् स निगच्छति ।

मेधावी धारणायुक्तः प्रायस्तत्राभिजायते ॥ ५६ ॥

देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है ॥ ५६ ॥

एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारकः ।

नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाहृतः ॥ ५७ ॥

देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये । मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है ॥ ५७ ॥

उमोवाच

अपरे स्वल्पविज्ञाना धर्मविद्वेषिणो नराः ।

ब्राह्मणान् वेदविदुषो नेच्छन्ति परिसर्पितुम् ॥ ५८ ॥

पार्वतीने पूछा — भगवन्! दूसरे बहुत- से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं । वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं ॥ ५८ ॥

व्रतवन्तो नराः केचिच्छ्रद्धाधर्मपरायणाः ।

अव्रता भ्रष्टनियमास्तथान्ये राक्षसोपमाः ॥ ५ ९ ॥

कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमभ्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं ॥ ५ ९ ॥

यज्वानश्च तथैवान्ये निर्होमाश्च तथापरे ।

केन कर्मविपाकेन भवन्तीह वदस्व मे ॥ ६० ॥

कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं । किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ॥ ६० ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

आगमा लोकधर्माणां मर्यादाः सर्वनिर्मिताः ।

प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते च दृढव्रताः ॥ ६१ ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! शास्त्र लोकधर्मोंकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं । जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम

पृष्ठ 1216

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व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ॥

अधर्मं धर्ममित्याहुर्ये च मोहवशं गताः ।

अव्रता नष्टमर्यादास्ते प्रोक्ता ब्रह्मराक्षसाः ॥ ६२ ॥

जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं ॥ ६२ ॥

ते चेत्कालकृतोद्योगात् सम्भवन्तीह मानुषाः ।

निर्होमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमाः ॥ ६३ ॥

वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं ॥ ६३ ॥

एष देवि मया सर्वः संशयच्छेदनाय ते ।

कुशलाकुशलो नॄणां व्याख्यातो धर्मसागरः ॥ ६४ ॥

देवि! यह धर्मका समुद्र, धर्मात्माओंके लिये प्रिय और पापात्माओंके लिये अप्रिय है । मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह सब विस्तारपूर्वक बताया है ॥

पृष्ठ 1217

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[ राजधर्मका वर्णन ] उमोवाच

देवदेव नमस्तुभ्यं त्रियक्ष वृषभध्वज ।

श्रुतं मे भगवन् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वर ॥

उमाने कहा — देवदेव! त्रिलोचन! वृषभध्वज! भगवन्! महेश्वर! आपकी कृपासे मैंने पूर्वोक्त सब विषयोंको सुना है ॥

संगृहीतं मया तच्च तव वाक्यमनुत्तमम् ।

इदानीमस्ति संदेहो मानुषेष्विह कश्चन ॥

सुनकर आपके उस परम उत्तम उपदेशको मैंने बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया है । इस समय मनुष्योंके विषयमें एक संदेह ऐसा रह गया है, जिसका समाधान आवश्यक है ॥

तुल्यप्राणशिरःकायो राजायमिति दृश्यते ।

केन कर्मविपाकेन सर्वप्राधान्यमर्हति ॥

मनुष्योंमें यह जो राजा दिखायी देता है, उसके भी प्राण, सिर और धड़ दूसरे मनुष्योंके समान ही हैं; फिर किस कर्मके फलसे यह सबमें प्रधान पद पानेका अधिकारी हुआ है? ॥

स चापि दण्डयन् मर्त्यान् भर्त्सयन् विविधानपि ।

प्रेत्यभावे कथं लोकाँल्लभते पुण्यकर्मणाम् ॥

राजवृत्तमहं तस्माच्छ्रोतुमिच्छामि मानद । यह राजा नाना प्रकारके मनुष्योंको दण्ड देता और उन्हें डाँटता- फटकारता है । यह मृत्युके पश्चात् कैसे पुण्यात्माओंके लोक पाता है? मानद! अतः मैं राजाके आचार-व्यवहारका वर्णन सुनना चाहती हूँ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि राजधर्मं शुभानने ॥

राजायत्तं हि यत् सर्वं लोकवृत्तं शुभाशुभम् ।

महतस्तपसो देवि फलं राज्यमिति स्मृतम् ॥

श्रीमहेश्वरने कहा- शुभानने! अब मैं तुम्हें राजधर्मकी बात बताऊँगा; क्योंकि जगत्का सारा शुभाशुभ आचार - व्यवहार राजाके ही अधीन है । देवि! राज्यको बहुत बड़ी तपस्याका फल माना गया है ॥

अराजके पुरा त्वासीत् प्रजानां संकुलं महत् ।

तद् दृष्ट्वा संकुलं ब्रह्मा मनुं राज्ये न्यवेशयत् ॥

प्राचीन कालकी बात है, सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी । प्रजापर महान् संकट आ गया । प्रजाकी यह संकटापन्न अवस्था देख ब्रह्माजीने मनुको राजसिंहासनपर बिठाया ॥ तदाप्रभृति संदृष्टं राज्ञां वृत्तं शुभाशुभम् ।

पृष्ठ 1218

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तन्मे शृणु वरारोहे तस्य पथ्यं जगद्धितम् ॥ तभीसे राजाओंका शुभाशुभ बर्ताव देखनेमें आया है । वरारोहे! राजाका जो आचरण जगत्के लिये हितकर और लाभदायक है, वह मुझसे सुनो ॥

यथा प्रेत्य लभेत् स्वर्गं यथा वीर्यं यशस्तथा ।

पित्र्यं वा भूतपूर्वं वा स्वयमुत्पाद्य वा पुनः ॥

राज्यधर्ममनुष्ठाय विधिवद् भोक्तुमर्हति ॥

जिस बर्तावके कारण वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गका भागी हो सकता है, वही बता रहा हूँ । उसमें जैसा पराक्रम और जैसा यश होना चाहिये, वह भी सुनो । पिताकी ओरसे प्राप्त हुए अथवा और पहलेसे चले आते हुए अथवा स्वयं ही पराक्रमद्वारा प्राप्त करके वशमें किये हुए राज्यको राजा धर्मका आश्रय ले विधिपूर्वक उपभोगमें लाये ॥

आत्मानमेव प्रथमं विनयैरुपपादयेत् ।

अनुभृत्यान् प्रजाः पश्चादित्येष विनयक्रमः ॥

पहले अपने आपको ही विनयसे सम्पन्न करे । तत्पश्चात् सेवकों और प्रजाओंको

विनयकी शिक्षा दे । यही विनयका क्रम है ॥

स्वामिनं चोपमां कृत्वा प्रजास्तद्वृत्तकाङ्क्षया ।

स्वयं विनयसम्पन्ना भवन्तीह शुभेक्षणे ॥

शुभेक्षणे! राजाको ही आदर्श मानकर उसके आचरण सीखनेकी इच्छासे प्रजावर्गके लोग स्वयं भी विनयसे सम्पन्न होते हैं ॥

स्वस्मात् पूर्वतरं राजा विनयत्येव वै प्रजाः ।

अपहास्यो भवेत्तादृक् स्वदोषस्यानवेक्षणात् ॥

जो राजा स्वयं विनय सीखनेके पहले प्रजाको ही विनय सिखाता है, वह अपने दोषोंपर दृष्टि न डालनेके कारण उपहासका पात्र होता है ॥

विद्याभ्यासैर्वृद्धयोगैरात्मानं विनयं नयेत् ।

विद्या धर्मार्थफलिनी तद्विदो वृद्धसंज्ञिताः ॥

विद्याके अभ्यास और वृद्ध पुरुषोंके संगसे अपने आपको विनयशील बनाये । विद्या धर्म

और अर्थरूप फल देनेवाली है । जो उस विद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको वृद्ध कहते हैं ॥

इन्द्रियाणां जयो देवि अत ऊर्ध्वमुदाहृतः ।

अजये सुमहान् दोषो राजानं विनिपातयेत् ॥

देवि! इसके बाद राजाको अपनी इन्द्रियोंपर विजय पाना चाहिये - यह बात बतायी गयी । इन्द्रियोंको काबूमें न रखनेसे जो महान् दोष प्राप्त होता है, वह राजाको नीचे गिरा देता है ॥

पञ्चैव स्ववशे कृत्वा तदर्थान् पञ्च शोषयेत् ।

षडुत्सृज्य यथायोगं ज्ञानेन विनयेन च ॥

पृष्ठ 1219

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शास्त्रचक्षुर्नयपरो भूत्वा भृत्यान् समाहरेत् ॥ पाँचों इन्द्रियोंको अपने अधीन करके उनके पाँचों विषयोंको सुखा डाले । ज्ञान और विनयके द्वारा आवश्यक प्रयत्न करके काम-क्रोध आदि छः दोषोंको त्याग दे तथा शास्त्रीय दृष्टिका सहारा लेकर न्यायपरायण हो सेवकोंका संग्रह करे ॥

वृत्तश्रुतकुलोपेतानुपधाभिः परीक्षितान् ।

अमात्यानुपधातीतान् सापसर्पान् जितेन्द्रियान् ॥

योजयेत यथायोगं यथार्ह स्वेषु कर्मसु ॥

जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न हों, जिनकी सचाई और ईमानदारीकी परीक्षा ले ली गयी हो, जो उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुए हों, जिनके साथ बहुत - से जासूस हों और जो जितेन्द्रिय हों -ऐसे अमात्योंको यथायोग्य अपने कर्मोंमें उनकी योग्यताके अनुसार नियुक्त करे ॥

अमात्या बुद्धिसम्पन्ना राष्ट्रं बहुजनप्रियम् ।

दुराधर्षं पुरश्रेष्ठं कोशः कृच्छ्रसहः स्मृतः ॥

अनुरक्तं बलं साम्नामद्वैधं मित्रमेव च ।

एताः प्रकृतयः स्वेषु स्वामी विनयतत्त्ववित् ॥

बुद्धिमान् मन्त्री, बहुजनप्रिय राष्ट्र, दुर्धर्ष श्रेष्ठ नगर या दुर्ग, कठिन अवसरोंपर काम देनेवाला कोष, सामनीतिके द्वारा राजामें अनुराग रखनेवाली सेना, दुविधेमें न पड़ा हुआ मित्र और विनयके तत्त्वको जाननेवाला राज्यका स्वामी – ये सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं ॥

प्रजानां रक्षणार्थाय सर्वमेतद् विनिर्मितम् ।

आभिः करणभूताभिः कुर्याल्लोकहितं नृपः ॥

प्रजाकी रक्षाके लिये ही यह सारा प्रबन्ध किया गया है । रक्षाकी हेतुभूत जो ये प्रकृतियाँ है, इनके सहयोगसे राजा लोकहितका सम्पादन करे ॥

आत्मरक्षा नरेन्द्रस्य प्रजारक्षार्थमिष्यते ।

तस्मात् सततमात्मानं संरक्षेदप्रमादवान् ॥

राजाको प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपनी रक्षा अभीष्ट होती है, अतः वह सदा सावधान होकर आत्मरक्षा करे ॥

भोजनाच्छादनस्नानाद् बहिर्निष्क्रमणादपि ।

नित्यं स्त्रीगणसंयोगाद् रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥

मनको वशमें रखनेवाला राजा भोजन - आच्छादन-स्नान, बाहर निकलना तथा सदा स्त्रियोंके समुदायसे संयोग रखना- इन सबसे अपनी रक्षा करे ॥

स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च शस्त्रादपि विषादपि ।

सततं पुत्रदारेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥

पृष्ठ 1220

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वह मनको सदा अपने अधीन रखकर स्वजनोंसे, दूसरोंसे, शस्त्रसे, विषसे तथा स्त्री- पुत्रोंसे भी निरन्तर अपनी रक्षा करे ॥

सर्वेभ्य एव स्थानेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ।

प्रजानां रक्षणार्थाय प्रजाहितकरो भवेत् ॥

आत्मवान् राजा प्रजाकी रक्षाके लिये सभी स्थानोंसे अपनी रक्षा करे और सदा प्रजाके हितमें संलग्न रहे ॥

प्रजाकार्यं तु तत्कार्यं प्रजासौख्यं तु तत्सुखम् ।

प्रजाप्रियं प्रियं तस्य स्वहितं तु प्रजाहितम् ॥

प्रजार्थं तस्य सर्वस्वमात्मार्थं न विधीयते ॥

प्रजाका कार्य ही राजाका कार्य है, प्रजाका सुख ही उसका सुख है, प्रजाका प्रिय ही उसका प्रिय है तथा प्रजाके हितमें ही उसका अपना हित होता है । प्रजाके हितके लिये ही उसका सर्वस्व है, अपने लिये कुछ भी नहीं है ॥

प्रकृतीनां हि रक्षार्थं रागद्वेषौ व्युदस्य च ।

उभयोः पक्षयोर्वादं श्रुत्वा चैव यथातथम् ॥

तमर्थं विमृशेद् बुद्ध्या स्वयमातत्त्वदर्शनात् ॥

प्रकृतियोंकी रक्षाके लिये राग-द्वेष छोड़कर किसी विवादके निर्णयके लिये पहले दोनों पक्षोंकी यथार्थ बातें सुन ले । फिर अपनी बुद्धिके द्वारा स्वयं उस मामलेपर तबतक विचार करे, जबतक कि उसे यथार्थताका सुस्पष्ट ज्ञान न हो जाय ॥

तत्त्वविद्भिश्च बहुभिः सहासीनो नरोत्तमैः ।

कर्तारमपराधं च देशकालौ नयानयौ ॥

ज्ञात्वा सम्यग्यथाशास्त्रं ततो दण्डं नयेन्नृषु ॥

तत्त्वको जाननेवाले अनेक श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ बैठकर परामर्श करनेके बाद अपराधी, अपराध, देश, काल, न्याय और अन्यायका ठीक -ठीक ज्ञान प्राप्त करके फिर शास्त्रके अनुसार राजा अपराधी मनुष्योंको दण्ड दे ॥ एवं कुर्वंल्लभेद् धर्मं पक्षपातविवर्जनात् ॥

प्रत्यक्षाप्तोपदेशाभ्यामनुमानेन वा पुनः ।

बोद्धव्यं सततं राज्ञा देशवृत्तं शुभाशुभम् ॥

पक्षपात छोड़कर ऐसा करनेवाला राजा धर्मका भागी होता है । प्रत्यक्ष देखकर, माननीय पुरुषोंके उपदेश सुनकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके राजाको सदा ही अपने देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानना चाहिये ॥

चारैः कर्मप्रवृत्त्या च तद् विज्ञाय विचारयेत् ।

अशुभं निर्हरेत् सद्यो जोषयच्छुभमात्मनः ॥