06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1331–1340
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1331–1340
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इसीलिये गौओंका दान सबसे उत्कृष्ट बताया जाता है । गौओंकी पूजा तथा उनके प्रति की हुई भक्ति मनुष्यकी आयु बढ़ानेवाली होती है ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानं महाफलम् ।
भूमिदानसमं दानं लोके नास्तीति निश्चयः ॥
इसके बाद मैं भूमिदानका महत्त्व बतलाऊँगा । भूमिदानका महान् फल है । संसारमें
भूमिदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है । यही धर्मात्मा पुरुषोंका निश्चय है ॥
गृहयुक् क्षेत्रयुग् वापि भूमिभागः प्रदीयते ।
सुखभोगं निराक्रोशं वास्तुपूर्वं प्रकल्प्य च ॥
ग्रहीतारमलंकृत्य वस्त्रपुष्पानुलेपनैः ।
सभृत्यं सपरीवारं भोजयित्वा यथेष्टतः ॥
यो दद्याद् दक्षिणां काले त्रिरद्भिर्गृह्यतामिति ॥
गृह अथवा क्षेत्रसे युक्त भू- भागका दान करना चाहिये । जहाँ सुख भोगनेकी सुविधा हो, जो अनिन्दनीय स्थान हो, वहाँ वास्तुपूजनपूर्वक गृह बनाकर दान लेनेवालेको वस्त्र, पुष्पमाला तथा चन्दनसे अलंकृत करके सेवक और परिवारसहित उसे यथेष्ट भोजन करावे । तत्पश्चात् यथासमय तीन बार हाथमें जल लेकर 'दान ग्रहण कीजिये ' ऐसा कहकर उसे उस भूमिका दान एवं दक्षिणा दे ॥ एवं भूम्यां प्रदत्तायां श्रद्धया वीतमत्सरैः । यावत् तिष्ठति सा भूमिस्तावत् तस्य फलं विदुः । इस प्रकार ईर्ष्यारहित पुरुषोंद्वारा श्रद्धापूर्वक भूदान दिये जानेपर जबतक वह भूमि रहती है, तबतक दाता उसके दानजनित फलका उपभोग करते हैं ॥
भूमिदः स्वर्गमारुह्य रमते शाश्वतीः समाः ।
अचला ह्यक्षया भूमिः सर्वकामान् दुधुक्षति ॥
भूमिदान देनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाकर सदा ही सुख भोगता है; क्योंकि यह अचल एवं अक्षय भूमि सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करती है ॥
यत् किंचित् कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः ।
अपि गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन मुच्यते ॥
जीविकाके लिये कष्ट पानेवाला पुरुष जो कोई भी पाप करता है, गायके कान बराबर भूमिका दान करनेसे भी मुक्त हो जाता है ॥
सुवर्ण रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च ।
सर्वमेतन्महाभागे भूमिदाने प्रतिष्ठितम् ॥
महाभागे! भूमिदानमें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न - इन सबका दान प्रतिष्ठित है ॥ भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।
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ब्रह्मलोकाय संसिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ स्वामीके कल्याण-साधनमें तत्पर हो युद्धमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले शूरवीर योद्धा उत्तम सिद्धि पाकर ब्रह्मलोककी यात्रा करते हैं; परंतु वे भी भूमिदान करनेवालेको लाँघ नहीं पाते हैं ॥
हलकृष्टां महीं दद्याद् यत्सबीजफलान्विताम् ।
सुकूपशरणां वापि सा भवेत् सर्वकामदा ॥
जहाँ सुन्दर कूआँ और रहनेके लिये घर बना हो, जो हलसे जोती गयी हो और जिसमें बीजसहित फल लगे हों, ऐसी भूमिका दान करना चाहिये । वह सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली होती है ॥
निष्पन्नसस्यां पृथिवीं यो ददाति द्विजन्मनाम् ।
विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शक्रलोकं स गच्छति ॥
जो उपजी हुई खेतीसे युक्त भूमिका ब्राह्मणोंके लिये दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो इन्द्रलोक जाता है ॥
यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रमभिवर्धयेत् ।
एवं सर्वफलैर्भूमिर्दातारमभिवर्धयेत् ॥
जैसे माता दूध पिलाकर अपने पुत्रका पालन- पोषण करती है, उसी प्रकार भूमि सम्पूर्ण मनोवांछित फल देकर दाताको अभ्युदयशील बनाती है ॥
ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् ।
ग्राहयित्वा निजां भूमिं न यान्ति यमसादनम् ॥
जो लोग उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, अग्निहोत्री एवं सदाचारी ब्राह्मणको अपनी भूमि देते हैं, वे यमलोकमें कभी नहीं जाते हैं ॥
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि दृश्यते ।
तथा भूमेः कृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥
जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी प्रतिदिन वृद्धि होती देखी जाती है, उसी प्रकार किये हुए भूमिदानका महत्त्व प्रत्येक नयी फसल पैदा होनेपर बढ़ता जाता है ॥
यथा बीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले ।
तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानगुणार्जिताः ॥
जैसे पृथ्वीपर बिखेरे हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, उसी प्रकार भूमिदानके गुणोंसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण मनोवांछित भोग अंकुरित होते और बढ़ते हैं ॥
पितरः पितृलोकस्था देवताश्च दिवि स्थिताः ।
संतर्पयन्ति भोगैस्तं यो ददाति वसुंधराम् ॥
जो भूमिका दान करता है, उसे पितृलोकनिवासी पितर और स्वर्गवासी देवता अभीष्ट भोगोंद्वारा तृप्त करते हैं ॥
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दीर्घायुष्यं वराङ्गत्वं स्फीतां च श्रियमुत्तमाम् ।
परत्र लभते मर्त्यः सम्प्रदाय वसुंधराम् ॥
भूमिदान करके मनुष्य परलोकमें दीर्घायु, सुन्दर शरीर और बढ़ी चढ़ी उत्तम सम्पत्ति पाता है ॥ एतत् सर्वं मयोद्दिष्टं भूमिदानस्य यत् फलम् । श्रद्दधानैर्नरैर्नित्यं श्राव्यमेतत् सनातनम् । यह सब मैंने भूमिदानका फल बताया है । श्रद्धालु पुरुषोंको प्रतिदिन यह सनातन दानमाहात्म्य सुनना चाहिये ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि कन्यादानं यथाविधि ।
कन्या देया महादेवि परेषामात्मनोऽपि वा ॥
अब मैं विधिपूर्वक कन्यादानका माहात्म्य बताऊँगा । महादेवि! दूसरोंकी और अपनी भी कन्याका दान करना चाहिये ॥
कन्यां शुद्धव्रताचारां कुलरूपसमन्विताम् ।
यस्मै दित्सति पात्राय तेनापि भृशकामिताम् ॥
जो शुद्ध व्रत एवं आचारवाली, कुलीन एवं सुन्दर रूपवाली कन्याका किसी सुपात्र पुरुषको दान करना चाहता है, उसे इस बातपर भी ध्यान रखना चाहिये कि वह सुपात्र व्यक्ति उस कन्याको बहुत चाहता है या नहीं ( वह पुरुष उसे चाहता हो तभी उसके साथ उस कन्याका विवाह करना चाहिये ) ॥
प्रथमं तां समाकल्प्य बन्धुभिः कृतनिश्चयाम् ।
कारयित्वा गृहं पूर्वं दासीदासपरिच्छदैः ॥
गृहोपकरणैश्चैव पशुधान्येन संयुताम् ।
तदर्थिने तदर्हाय कन्यां तां समलङ्कृताम् ॥
सविवाहं यथान्यायं प्रयच्छेदग्निसाक्षिकम् ॥
पहले बन्धुओंके साथ सलाह करके कन्याके विवाहका निश्चय करे, तत्पश्चात् उसे वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित करे । फिर उसके लिये मण्डप बनाकर दास-दासी, अन्यान्य सामग्री, घरके आवश्यक उपकरण, पशु और धान्यसे सम्पन्न एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुई उस कन्याका उसे चाहनेवाले योग्य वरको अग्निदेवकी साक्षितामें यथोचित रीतिसे विवाहपूर्वक दान करे ॥ वृत्त्यायतीं यथा कृत्वा सद्गृहे तौ निवेशयेत् ॥
एवं कृत्वा वधूदानं तस्य दानस्य गौरवात् ।
प्रेत्यभावे महीयेत स्वर्गलोके यथासुखम् ॥
पुनर्जातश्च सौभाग्यं कुलवृद्धिं तथाऽऽप्नुयात् ॥
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भविष्यमें जीवन- निर्वाहके लिये पूर्ण व्यवस्था करके उन दोनों दम्पतिको उत्तम गृहमें ठहरावे । इस प्रकार वधू- वेषमें कन्याका दान करके उस दानकी महिमासे दाता मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें सुख और सम्मानके साथ रहता है । फिर जन्म लेनेपर उसे सौभाग्य प्राप्त होता है तथा वह अपने कुलको बढ़ाता है ॥
विद्यादानं तथा देवि पात्रभूताय वै ददत् ।
प्रेत्यभावे लभेन्मर्त्यो मेधां वृद्धिं धृतिं स्मृतिम् ॥
देवि! सुपात्र शिष्यको विद्यादान देनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात् वृद्धि, बुद्धि, धृति और स्मृति प्राप्त करता है ॥
अनुरूपाय शिष्याय यश्च विद्यां प्रयच्छति ।
यथोक्तस्य प्रदानस्य फलमानन्त्यमश्नुते ॥
जो सुयोग्य शिष्यको विद्या दान करता है, उसे शास्त्रोक्त दानका अक्षय फल प्राप्त होता है ॥
दापनं त्वथ विद्यानां दरिद्रेभ्योऽर्थवेदनैः ।
स्वयं दत्तेन तुल्यं स्यादिति विद्धि शुभानने ॥
शुभानने! निर्धन छात्रोंको धनकी सहायता देकर विद्या प्राप्त कराना भी स्वयं किये हुए विद्यादानके समान है, ऐसा समझो ।
एवं ते कथितान्येव महादानानि मानिनि ।
त्वत्प्रियार्थं मया देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
मानिनि! देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारी प्रसन्नताके लिये ये बड़े - बड़े दान बताये हैं । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच
भगवन् देवदेवेश कथं देयं तिलान्वितम् ।
तस्य तस्य फलं ब्रूहि दत्तस्य च कृतस्य च ॥
उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! तिलका दान कैसे करना चाहिये? और करनेका फल क्या होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तिलकल्पविधिं देवि तन्मे शृणु समाहिता ॥
समृद्धैरसमृद्धैर्वा तिला देया विशेषतः ।
तिलाः पवित्राः पापघ्नाः सुपुण्या इति संस्मृताः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – तुम एकाग्रचित्त होकर मुझसे तिलकल्पकी विधि सुनो । मनुष्य धनी हों या निर्धन, उन्हें विशेषरूपसे तिलोंका दान करना चाहिये; क्योंकि तिल पवित्र, पापनाशक और पुण्यमय माने गये हैं ॥
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न्यायतस्तु तिलान् शुद्धान् संहत्याथ स्वशक्तितः ।
तिलराशिं पुनः कुर्यात् पर्वताभं सरत्नकम् ॥
महान्तं यदि वा स्तोकं नानाद्रव्यसमन्वितम् ॥
सुवर्णरजताभ्यां च मणिमुक्ताप्रवालकैः ।
अलंकृत्य यथायोगं सपताकं सवेदिकम् ॥
सभूषणं सवस्त्रं च शयनासनसम्मितम् ।
प्रायशः कौमुदीमासे पौर्णमास्यां विशेषतः ।
भोजयित्वा च विधिवद् ब्राह्मणानर्हतो बहून् ॥
स्वयं कृतोपवासश्च वृत्तशौचसमन्वितः ।
दद्यात् प्रदक्षिणीकृत्य तिलराशिं सदक्षिणम् ॥
अपनी शक्तिके अनुसार न्यायपूर्वक शुद्ध तिलोंका संग्रह करके उनकी पर्वताकार राशि बनावे । वह राशि छोटी हो या बड़ी उसे नाना प्रकारके द्रव्यों तथा रत्नोंसे युक्त करे। फिर यथाशक्ति सोना, चाँदी, मणि, मोती और मूँगोंसे अलंकृत करके पताका, वेदी, भूषण, वस्त्र, शय्या और आसनसे सुशोभित करे । प्रायः आश्विन मासमें विशेषतः पूर्णिमा तिथिको बहुत-से सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर स्वयं उपवास करके शौचाचार- सम्पन्न हो उन ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके दक्षिणासहित उस तिलराशिका दान करे ॥
एकस्यापि बहूनां वा दातव्यं भूतिमिच्छता ।
तस्य दानफलं देवि अग्निष्टोमेन संयुतम् ॥
कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि वह एक ही पुरुषको या अनेक व्यक्तियोंको दान दे ।
देवि! उनके दानका फल अग्निष्टोम यज्ञके समान होता है ॥
केवलं वा तिलैरेव भूमौ कृत्वा गवाकृतिम् ।
सवस्त्रकं सरत्नं च पुंसा गोदानकांक्षिणा ॥
तदर्हाय प्रदातव्यं तस्य गोदानतः फलम् ॥
अथवा पृथ्वीपर केवल तिलोंसे ही गौकी आकृति बनाकर गोदानके फलकी इच्छा रखनेवाला पुरुष रत्न और वस्त्रसहित उस तिल- धेनुका सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे । इससे दाताको गोदान करनेका फल मिलता है ॥
शरावांस्तिलसम्पूर्णान् सहिरण्यान् सचम्पकान् ।
नृपो ददद् ब्राह्मणाय स पुण्यफलभाग् भवेत् ॥
जो राजा सुवर्ण और चम्पासे युक्त तथा तिलसे भरे हुए शरावों ( पुरवों ) का ब्राह्मणको दान करता है, वह पुण्य- फलका भागी होता है ॥
एवं तिलमयं देयं नरेण हितमिच्छता ।
नानादानफलं भूयः शृणु देवि समाहिता ॥
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देवि! अपना हित चाहनेवाले मनुष्यको इसी प्रकार तिलमयी धेनुका दान करना चाहिये । अब पुनः एकाग्रचित्त होकर नाना प्रकारके दानोंका फल सुनो ॥
बलमायुष्यमारोग्यमन्नदानाल्लभेन्नरः ।
पानीयदस्तु सौभाग्यं रसज्ञानं लभेन्नरः ॥
अन्नदान करनेसे मनुष्यको बल, आयु और आरोग्यकी प्राप्ति होती है । जलदान करनेवाला पुरुष सौभाग्य तथा रसका ज्ञान प्राप्त करता है ॥
वस्त्रदानाद् वपुःशोभामलंकारं लभेन्नरः ।
दीपदो बुद्धिवैशद्यं द्युतिशोभां लभेन्नरः ॥
वस्त्रदान करनेसे मनुष्य शारीरिक शोभा और आभूषण लाभ करता है । दीपदान करनेवालेकी बुद्धि निर्मल होती है तथा उसे द्युति एवं शोभाकी प्राप्ति होती है ॥
राजबीजाविमोक्षं तु छत्रदो लभते फलम् ।
दासीदासप्रदानात् तु भवेत् कर्मान्तभाङ्नरः ॥
दासीदासं च विविधं लभेत् प्रेत्य गुणान्वितम् ॥
छत्रदान करनेवाला पुरुष किसी भी जन्ममें राजवंशसे अलग नहीं होता । दासी और दासोंका दान करनेसे मनुष्य कर्मोंका अन्त कर देता है और मृत्युके पश्चात् उत्तम गुणोंसे युक्त भाँति- भाँतिके दासों और दासियोंको प्राप्त करता है ॥ यानानि वाहनं चैव तदर्हाय ददन्नरः ।
पादरोगपरिक्लेशान्मुक्तः श्वसनवाहवान् ।
विचित्रं रमणीयं च लभते यानवाहनम् ॥
जो मनुष्य सुयोग्य ब्राह्मणको रथ आदि यानों और वाहनोंका दान करता है, वह पैरसम्बन्धी रोगों और क्लेशोंसे मुक्त हो जाता है । उसकी सवारीमें वायुके समान वेगशाली घोड़े मिलते हैं । वह विचित्र एवं रमणीय यान और वाहन पाता है ॥
सेतुकूपतटाकानां कर्ता तु लभते नरः ।
दीर्घायुष्यं च सौभाग्यं तथा प्रेत्य गतिं शुभाम् ॥
पुल, कुआँ और पोखरा बनवानेवाला मानव दीर्घायु, सौभाग्य तथा मृत्युके पश्चात् शुभ गति प्राप्त कर लेता है ॥
वृक्षसंरोपको यस्तु छायापुष्पफलप्रदः ।
प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यमभिगम्यो भवेन्नरः ॥
जो वृक्ष लगानेवाला तथा छाया, फूल और फल प्रदान करनेवाला है, वह मृत्युके पश्चात् पुण्यलोक पाता है और सबके लिये मिलनेके योग्य हो जाता है ॥
यस्तु संक्रमकृल्लोके नदीषु जलहारिणाम् ।
लभेत् पुण्यफलं प्रेत्य व्यसनेभ्यो विमोक्षणम् ॥
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जो मनुष्य इस जगत्में नदियोंपर जल ले जानेवाले पुरुषोंकी सुविधाके लिये पुल निर्माण कराता है, वह मृत्युके पश्चात् उसका पुण्यफल पाता है और सब प्रकारके संकटोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
मार्गकृत् सततं मर्त्यो भवेत् संतानवान् पुनः ।
कायदोषविमुक्तस्तु तीर्थकृत् सततं भवेत् ॥
जो मनुष्य सदा मार्गका निर्माण करता है, वह संतानवान् होता है । तथा जो जलमें उतरनेके लिये सीढ़ी एवं पक्के घाट बनवाता है, वह शारीरिक दोषसे मुक्त हो जाता है ॥
औषधानां प्रदानात् तु सततं कृपयान्वितः ।
भवेद् व्याधिविहीनश्च दीर्घायुश्च विशेषतः ॥
जो सदा कृपापूर्वक रोगियोंको औषध प्रदान करता है, वह रोगहीन और विशेषतः दीर्घायु होता है ॥
अनाथान् पोषयेद् यस्तु कृपणान्धकपङ्गुकान् ।
स तु पुण्यफलं प्रेत्य लभते कृच्छ्रमोक्षणम् ॥
जो अनाथों, दीन-दुःखियों, अन्धों और पंगु मनुष्योंका पोषण करता है, वह मृत्युके पश्चात् उसका पुण्यफल पाता और संकटसे मुक्त हो जाता है ॥
वेदगोष्ठाः सभाः शाला भिक्षूणां च प्रतिश्रयम् ।
यः कुर्याल्लभते नित्यं नरः प्रेत्य शुभं फलम् ॥
जो मनुष्य वेदविद्यालय, सभाभवन, धर्मशाला तथा भिक्षुओंके लिये आश्रम बनाता है, वह मृत्युके पश्चात् शुभ फल पाता है ॥ विविधं विविधाकारं भक्ष्यभोज्यगुणान्वितम् । रम्यं सदैव गोवाटं यः कुर्याल्लभते नरः ।
प्रेत्यभावे शुभां जातिं व्याधिमोक्षं तथैव च ।
एवं नानाविधं द्रव्यं दानकर्ता लभेत् फलम् ॥
जो मानव उत्तम भक्ष्य - भोज्यसम्बन्धी गुणोंसे युक्त तथा नाना प्रकारकी आकृतिवाली भाँति - भाँतिकी रमणीय गोशालाओंका सदैव निर्माण करता है, वह मृत्युके पश्चात् उत्तम जन्म पाता और रोगमुक्त होता है । इस प्रकार भाँति- भाँतिके द्रव्योंका दान करनेवाला मनुष्य पुण्यफलका भागी होता है ॥
बुद्धिमायुष्यमारोग्यं बलं भाग्यं तथाऽऽगमम् ।
रूपेण सप्तधा भूत्वा मानुष्यं फलति ध्रुवम् ॥
बुद्धि, आयुष्य, आरोग्य, बल, भाग्य, आगम तथा रूप- इन सात भागोंमें प्रकट होकर मनुष्यका पुण्यकर्म अवश्य अपना फल देता है ॥ उमोवाच
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भगवन् देवदेवेश विशिष्टं यज्ञमुच्यते ।
लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने कहा — भगवन्! देवदेवेश्वर! लौकिक और वैदिक यज्ञको उत्तम बताया जाता है । अतः इस विषयका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
देवतानां तु पूजा या यज्ञेष्वेव समाहिता ।
यज्ञा वेदेष्वधीताश्च वेदा ब्राह्मणसंयुताः ॥
श्रीमहेश्वर बोले- देवि! देवताओंकी जो पूजा है, वह यज्ञोंके ही अन्तर्गत है । यज्ञोंका वेदोंमें वर्णन है और वेद ब्राह्मणोंके साथ हैं ॥
इदं तु सकलं द्रव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये ।
यज्ञार्थं विद्धि तत् सृष्टं लोकानां हितकाम्यया ॥
प्रिये! स्वर्गलोकमें या पृथ्वीपर जो द्रव्य दृष्टि- गोचर होता है, इस सबकी सृष्टि विधाताद्वारा लोकहितकी कामनासे यज्ञके लिये की गयी है, ऐसा समझो ॥
एवं विज्ञाय तत् कर्ता सदारः सततं द्विजः ।
प्रेत्यभावे लभेल्लोकान् ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
ऐसा समझकर जो द्विज सदा अपनी स्त्रीके साथ रहकर यज्ञ- कर्म करता है, वह ब्रह्मकर्ममें तत्पर रहनेके कारण मृत्युके पश्चात् पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ब्राह्मणेष्वेव तद् ब्रह्म नित्यं देवि समाहितम् ॥
तस्माद् विप्रैर्यथाशास्त्रं विधिदृष्टेन कर्मणा ।
यज्ञकर्म कृतं सर्वं देवता अभितर्पयेत् ॥
देवि! वह ब्रह्म ( वेद ) सदा ब्राह्मणोंमें ही स्थित है, अतः शास्त्र - विधिके अनुसार ब्राह्मणोंद्वारा किया हुआ सम्पूर्ण यज्ञकर्म देवताओंको तृप्त करता है ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव यज्ञार्थं प्रायशः स्मृताः ॥
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्वेदेषु परिकल्पितैः ।
सुशुद्धेर्यजमानैश्च ऋत्विग्भिश्च यथाविधि ॥
शुद्धैर्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चयः ॥
ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी उत्पत्ति प्रायः यज्ञके लिये ही मानी गयी है । शुद्ध यजमानों तथा ऋत्विजों - द्वारा किये गये वेदवर्णित अग्निष्टोम आदि यज्ञों एवं विशुद्ध द्रव्योपकरणोंसे यजन करना चाहिये, यह शास्त्रका निश्चय है ॥
तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानां तोषणं भवेत् ।
तुष्टेषु सर्वदेवेषु यज्वा यज्ञफलं लभेत् ॥
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इस प्रकार किये गये यज्ञोंमें देवताओंको संतोष होता है और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानको यज्ञका पूरा - पूरा फल मिलता है ॥
देवाः संतोषिता यज्ञैर्लोकान् संवर्धयन्त्युत ।
यज्ञोंद्वारा संतुष्ट किये हुए देवता सम्पूर्ण लोकोंकी वृद्धि करते हैं ॥
तस्माद् यज्वा दिवं गत्वामरैः सह मोदते ।
नास्ति यज्ञसमं दानं नास्ति यज्ञसमो निधिः ॥
सर्वधर्मसमुद्देशो देवि यज्ञे समाहितः । इसलिये यजमान स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है । यज्ञके समान कोई दान नहीं है और यज्ञके समान कोई निधि नहीं है । देवि! सम्पूर्ण धर्मोंका उद्देश्य यज्ञमें प्रतिष्ठित है ॥ एषा यज्ञकृता पूजा लौकिकीमपरां शृणु ॥ देवसत्कारमुद्दिश्य क्रियते लौकिकोत्सवः ॥ यह यज्ञद्वारा की गयी देवपूजा वैदिकी है । इससे भिन्न जो दूसरी लौकिकी पूजा है, उसका वर्णन सुनो । देवताओंके सत्कारके लिये लोकमें समय - समयपर उत्सव किया जाता है ॥
देवगोष्ठेऽधिसंस्कृत्य चोत्सवं यः करोति वै ।
यागान् देवोपहारांश्च शुचिर्भूत्वा यथाविधि ॥
देवान् संतोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्नुयात् ॥
देवि! जो देवालयमें देवताका संस्कार करके उत्सव मनाता है और पवित्र होकर विधिपूर्वक यज्ञ एवं देवताओंको उपहार समर्पित करके उन्हें संतुष्ट करता है, वह धर्मका पूरा - पूरा फल प्राप्त करता है ॥
गन्धमाल्यैश्च विविधैः परमान्नेन धूपनैः ।
बह्वीभिः स्तुतिभिश्चैव स्तुवद्भिः प्रयतैर्नरैः ॥
नृत्तैर्वाद्यैश्च गान्धर्वैरन्यैर्दृष्टिविलोभनैः ।
देवसत्कारमुद्दिश्य कुर्वते ये नरा भुवि ॥
तेषां भक्तिकृतेनैव सत्कारेणैव पूजिताः । तेनैव तोषं संयान्ति देवि देवास्त्रिविष्टपे । देवि! इस भूतलपर जो मनुष्य देवताओंके सत्कारके उद्देश्यसे नाना प्रकारके गन्ध, माल्य, उत्तम अन्न, धूपदान तथा बहुत-सी स्तुतियोंद्वारा स्तवन करते हैं और शुद्धचित्त हो नृत्य, वाद्य, गान तथा दृष्टिको लुभानेवाले अन्यान्य कार्यक्रमोंद्वारा देवाराधन करते हैं, उनके भक्तिजनित सत्कारसे ही पूजित हो देवता स्वर्गमें उतनेसे ही संतुष्ट हो जाते हैं ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन ] उमोवाच
पितृमेधः कथं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ।
सर्वेषां पितरः पूज्याः सर्वसम्पत्प्रदायिनः ॥
उमाने पूछा- देव! पितृमेध ( श्राद्ध ) कैसे किया जाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें । सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता पितर सभीके लिये पूजनीय होते हैं ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
पितृमेधं प्रवक्ष्यामि यथावत् तन्मनाः शृणु ।
देशकालौ विधानं च तत्क्रियायाः शुभाशुभम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! मैं पितृमेधका यथावत्रूपसे वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो । देश, काल, विधान तथा क्रियाके शुभाशुभ फलका भी वर्णन करूँगा ॥
लोकेषु पितरः पूज्या देवतानां च देवताः ।
शुचयो निर्मलाः पुण्या दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥
सभी लोकोंमें पितर पूजनीय होते हैं। वे देवताओंके भी देवता हैं। उनका स्वरूप शुद्ध,
निर्मल एवं पवित्र है । वे दक्षिणदिशामें निवास करते हैं ॥
यथा वृष्टिं प्रतीक्षन्ते भूमिष्ठाः सर्वजन्तवः ।
पितरश्च तथा लोके पितृमेधं शुभेक्षणे ॥
शुभेक्षणे! जैसे भूमिपर रहनेवाले सभी प्राणी वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार पितृलोकमें रहनेवाले पितर श्राद्धकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥
तस्य देशाः कुरुक्षेत्रं गया गङ्गा सरस्वती ।
प्रभासं पुष्करं चेति तेषु दत्तं महाफलम् ॥
- श्राद्धके लिये पवित्र देश हैं – कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, सरस्वती, प्रभास और पुष्कर – इन तीर्थस्थानोंमें दिया गया श्राद्धका दान महान फलदायक होता है ॥
तीर्थानि सरितः पुण्या विविक्तानि वनानि च ।
नदीनां पुलिनानीति देशाः श्राद्धस्य पूजिताः ॥
तीर्थ, पवित्र नदियाँ, एकान्त वन तथा नदियोंके तट– ये श्राद्धके लिये प्रशंसित देश हैं ॥
माघप्रोष्ठपदौ मासौ श्राद्धकर्मणि पूजितौ ।
पक्षयोः कृष्णपक्षश्च पूर्वपक्षात् प्रशस्यते ॥