06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1321–1330
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1321–1330
पृष्ठ 1321
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दान देनेवाला, उसे ग्रहण करनेवाला, देय वस्तु, उपक्रम ( उसे देनेका प्रयत्न ), देश और काल — इन छः वस्तुओंके गुणोंसे युक्त दान उत्तम बताया जाता है ॥ तेषां सम्पद्विशेषांश्च कीर्त्यमानान् निबोध मे ।
आदिप्रभृति यः शुद्धो मनोवाक्कायकर्मभिः ।
सत्यवादी जितक्रोधस्त्वलुब्धो नाभ्यसूयकः ॥
श्रद्धावानास्तिकश्चैव एवं दाता प्रशस्यते ॥
अब मैं इन छहोंके विशेष गुणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो । जो आदिकालसे ही मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा शुद्ध हो, सत्यवादी, क्रोधविजयी, लोभहीन, अदोषदर्शी, श्रद्धालु और आस्तिक हो, ऐसा दाता उत्तम बताया गया है ॥
शुद्धो दान्तो जितक्रोधस्तथादीनकुलोद्भवः ।
श्रुतचारित्रसम्पन्नस्तथा बहुकलत्रवान् ॥
पञ्चयज्ञपरो नित्यं निर्विकारशरीरवान् ।
एतान् पात्रगुणान् विद्धि तादृक् पात्रं प्रशस्यते ॥
जो शुद्ध, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, उदार एवं उच्च कुलमें उत्पन्न, शास्त्रज्ञान एवं सदाचारसे सम्पन्न, बहुतसे स्त्री- पुत्रोंसे संयुक्त, पंचयज्ञपरायण तथा सदा नीरोग शरीरसे युक्त हो, वही दान लेनेका उत्तम पात्र है । उपर्युक्त गुणोंको ही दानपात्रके उत्तम गुण समझो । ऐसे पात्रकी ही प्रशंसा की जाती है ॥
पितृदेवाग्निकार्येषु तस्य दत्तं महत् फलम् ।
यद् यदर्हति यो लोके पात्रं तस्य भवेच्च सः ॥
देवता, पितर और अग्निहोत्रसम्बन्धी कार्योंमें उसको दिये हुए दानका महान् फल होता है । लोकमें जो जिस वस्तुके योग्य हो, वही उस वस्तुको पानेका पात्र होता है ॥
मुच्येदापदमापन्नो येन पात्रं तदस्य तु ।
अन्नस्य क्षुधितं पात्रं तृषितं तु जलस्य वै ॥
एवं पात्रेषु नानात्वमिष्यते पुरुषं प्रति । जिस वस्तुके पानेसे आपत्तिमें पड़ा हुआ मनुष्य आपत्तिसे छूट जाय, उस वस्तुका वही पात्र है । भूखा मनुष्य अन्नका और प्यासा जलका पात्र है । इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके लिये दानके भिन्न -भिन्न पात्र होते हैं ॥
जारश्चोरश्च षण्ढश्च हिंस्रः समयभेदकः ।
लोकविघ्नकराश्चान्ये वर्जिताः सर्वशः प्रिये ॥
प्रिये! चोर, व्यभिचारी, नपुंसक, हिंसक, मर्यादा -भेदक और लोगोंके कार्यमें विघ्न डालनेवाले अन्यान्य पुरुष सब प्रकारसे दानमें वर्जित हैं अर्थात् उन्हें दान नहीं देना चाहिये ॥ परोपघाताद् यद् द्रव्यं चौर्याद् वा लभ्यते नृभिः ।
पृष्ठ 1322
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
निर्दयाल्लभ्यते यच्च धूर्तभावेन वै तथा ॥
अधर्मादर्थमोहाद् वा बहूनामुपरोधनात् ।
लभ्यते यद् धनं देवि तदत्यन्तविगर्हितम् ॥
देवि! दूसरोंका वध या चोरी करनेसे मनुष्योंको जो धन मिलता है, निर्दयता तथा धूर्तता करनेसे जो प्राप्त होता है, अधर्मसे, धनविषयक मोहसे तथा बहुत- से प्राणियोंकी जीविकाका अवरोध करनेसे जो धन प्राप्त होता है, वह अत्यन्त निन्दित है ॥
तादृशेन कृतं धर्मं निष्फलं विद्धि भामिनि ।
तस्मान्न्यायागतेनैव दातव्यं शुभमिच्छता ॥
भामिनि! ऐसे धनसे किये हुए धर्मको निष्फल समझो । अतः शुभकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको न्यायतः प्राप्त हुए धनके द्वारा ही दान करना चाहिये ॥
यद् यदात्मप्रियं नित्यं तत् तद् देयमिति स्थितिः ।
उपक्रममिमं विद्धि दातॄणां परमं हितम् ॥
जो- जो अपनेको प्रिय लगे, उसी उसी वस्तुका सदा दान करना चाहिये; यही मर्यादा
है । इस प्रयत्न या चेष्टाको ही उपक्रम समझो । यह दाताओंके लिये परम हितकारक है ॥
पात्रभूतं तु दूरस्थमभिगम्य प्रसाद्य च ।
दाता दानं तथा दद्याद् यथा तुष्येत तेन सः ॥
दानका सुयोग्य पात्र ब्राह्मण यदि दूरका निवासी हो तो उसके पास जाकर उसे प्रसन्न करके दाता इस प्रकार दान दे, जिससे वह संतुष्ट हो जाय ॥ एष दानविधिः श्रेष्ठः समाहूय तु मध्यमः ॥
पूर्वं च पात्रतां ज्ञात्वा समाहूय निवेद्य च ।
शौचाचमनसंयुक्तं दातव्यं श्रद्धया प्रिये ॥
यह दानकी श्रेष्ठ विधि है । दानपात्रको जो अपने घर बुलाकर दान दिया जाता है, वह मध्यम श्रेणीका दान है । प्रिये! पहले पात्रताका ज्ञान प्राप्त करके फिर उस सुपात्र ब्राह्मणको घर बुलावे । उसके सामने अपना दानविषयक विचार प्रस्तुत करे । पश्चात् स्वयं ही स्नान आदिसे पवित्र हो आचमन करके श्रद्धापूर्वक अभीष्ट वस्तुका दान करे ॥
याचितॄणां तु परममाभिमुख्यं पुरस्कृतम् ।
सम्मानपूर्वं संग्राह्यं दातव्यं देशकालयोः ॥
अपात्रेभ्योऽपि चान्येभ्यो दातव्यं भूतिमिच्छता ॥
याचकोंको सामने पाकर उन्हें सम्मानपूर्वक अपनाना और देश- कालके अनुसार दान देना चाहिये । ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे दूसरे अपात्र पुरुषोंको भी आवश्यकता होनेपर अन्न- वस्त्र आदिका दान करें ॥
पात्राणि सम्परीक्ष्यैव दात्रा वै दानमात्रया ।
अतिशक्त्या परं दानं यथाशक्त्या तु मध्यमम् ॥
पृष्ठ 1323
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयं चापरं दानं नानुरूपमिवात्मनः ॥ पात्रोंकी परीक्षा करके दाता यदि दानकी मात्रा अपनी शक्तिसे भी अधिक करे तो वह उत्तम दान है । यथाशक्ति किया हुआ दान मध्यम है और तीसरा अधम श्रेणीका दान है, जो अपनी शक्तिके अनुरूप न हो ॥
यथा सम्भावितं पूर्वं दातव्यं तत् तथैव च ।
पुण्यक्षेत्रेषु यद्दत्तं पुण्यकालेषु वा तथा ॥
तच्छोभनतरं विद्धि गौरवाद् देशकालयोः । पहले जैसा बताया गया है, उसी प्रकार दान देना चाहिये । पुण्य क्षेत्रोंमें तथा पुण्यके अवसरोंपर जो कुछ दिया जाता है, उसे देश और कालके गौरवसे अत्यन्त शुभकारक समझो ॥ उमोवाच यश्च पुण्यतमो देशस्तथा कालश्च शंस मे ॥ उमाने पूछा — प्रभो! पवित्रतम देश और काल क्या है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
कुरुक्षेत्रं महानद्यो यच्च देवर्षिसेवितम् ।
गिरिर्वरश्च तीर्थानि देशभागेषु पूजितः ॥
ग्रहीतुमीप्सते यत्र तत्र दत्तं महाफलम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! कुरुक्षेत्र, गङ्गा आदि बड़ी- बड़ी नदियाँ, देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा सेवित स्थान एवं श्रेष्ठ पर्वत—ये सब - के - सब तीर्थ हैं । जहाँ देशके सभी भागोंमें पूजित श्रेष्ठ पुरुष दान ग्रहण करना चाहता हो, वहाँ दिये हुए दानका महान् फल होता है ॥
शरद्वसन्तकालश्च पुण्यमासस्तथैव च ।
शुक्लपक्षश्च पक्षाणां पौर्णमासी च पर्वसु ॥
पितृदैवतनक्षत्रनिर्मलो दिवसस्तथा ।
तच्छोभनतरं विद्धि चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ॥
शरद् और वसन्तका समय, पवित्र मास, पक्षोंमें शुक्लपक्ष, पर्वोंमें पौर्णमासी, मघानक्षत्रयुक्त निर्मल दिवस, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण- इन सबको अत्यन्त शुभकारक काल समझो ||
दाता देयं च पात्रं च उपक्रमयुता क्रिया ।
देशकालं तथेत्येषां सम्पच्छुद्धिः प्रकीर्तिता ॥
दाता हो, देनेकी वस्तु हो, दान लेनेवाला पात्र हो, उपक्रमयुक्त क्रिया हो और उत्तम देश- काल हो — इन सबका सम्पन्न होना शुद्धि कही गयी है ॥
पृष्ठ 1324
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
यदैव युगपत् सम्पत् तत्र दानं महद् भवेत् ॥
अत्यल्पमपि यद् दानमेभिः षड्भिर्गुणैर्युतम् ।
भूत्वानन्तं नयेत् स्वर्गं दातारं दोषवर्जितम् ॥
जब कभी एक समय इन सबका संयोग जुट जाय तभी दान देना महान् फलदायक होता है । इन छः गुणोंसे युक्त जो दान है, वह अत्यन्त अल्प होनेपर भी अनन्त होकर निर्दोष दाताको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है ॥ उमोवाच एवंगुणयुतं दानं दत्तं चाफलतां व्रजेत् । उमाने पूछा — प्रभो! इन गुणोंसे युक्त दान दिया गया हो तो क्या वह भी निष्फल हो सकता है? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदप्यस्ति महाभागे नराणां भावदोषतः ॥
कृत्वा धर्मं तु विधिवत् पश्चात्तापं करोति चेत् ।
श्लाघया वा यदि ब्रूयाद् वृथा संसदि यत् कृतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा - महाभागे! मनुष्योंके भाव- दोषसे ऐसा भी होता है । यदि कोई विधिपूर्वक धर्मका सम्पादन करके फिर उसके लिये पश्चात्ताप करने लगता है अथवा भरी सभामें उसकी प्रशंसा करते हुए बड़ी - बड़ी बातें बनाने लगता है, उसका वह धर्म व्यर्थ हो जाता है ॥ एते दोषा विवर्ज्याश्च दातृभिः पुण्यकांक्षिभिः ॥ सनातनमिदं वृत्तं सद्भिराचरितं तथा । पुण्यकी अभिलाषा रखनेवाले दाताओंको चाहिये कि वे इन दोषोंको त्याग दें । यह
दानसम्बन्धी आचार सनातन है । सत्पुरुषोंने सदा इसका आचरण किया है ॥
अनुग्रहात् परेषां तु गृहस्थानामृणं हि तत् ॥
इत्येवं मन आविश्य दातव्यं सततं बुधैः ॥
दूसरोंपर अनुग्रह करनेके लिये दान किया जाता है । गृहस्थोंपर तो दूसरे प्राणियोंका ऋण होता है, जो दान करनेसे उतरता है, ऐसा मनमें समझकर विद्वान् पुरुष सदा दान करता रहे ॥
एवमेव कृतं नित्यं सुकृतं तद् भवेन्महत् ।
सर्वसाधारणं द्रव्यमेवं दत्त्वा महत् फलम् ॥
इस तरह दिया हुआ सुकृत सदा महान् होता है । सर्वसाधारण द्रव्यका भी इसी तरह दान करनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ उमोवाच
पृष्ठ 1325
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भगवन् कानि देयानि धर्ममुद्दिश्य मानवैः ।
तान्यहं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा — भगवन्! मनुष्योंको धर्मके उद्देश्यसे किन- किन वस्तुओंका दान करना
चाहिये? यह मैं सुनना चाहती हूँ । आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
अजस्रं धर्मकार्यं च तथा नैमित्तिकं प्रिये ।
अन्नं प्रतिश्रयो दीपः पानीयं तृणमिन्धनम् ॥
स्नेहो गन्धश्च भैषज्यं तिलाश्च लवणं तथा ।
एवमादि तथान्यच्च दानमाजस्रमुच्यते ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – प्रिये! निरन्तर धर्मकार्य तथा नैमित्तिक कर्म करने चाहिये । अन्न, निवासस्थान, दीप, जल, तृण, ईंधन, तेल, गन्ध, ओषधि, तिल और नमक — ये तथा और भी बहुत - सी वस्तुएँ निरन्तर दान करनेकी वस्तुएँ बतायी गयी हैं ॥
अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् ।
तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छति मानवः ॥
अन्न मनुष्योंका प्राण है । जो अन्न दान करता है, वह प्राणदान करनेवाला होता है ।
अतः मनुष्य विशेषरूपसे अन्नका दान करना चाहता है ॥
ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमीप्सितम् ।
निदधाति निधिश्रेष्ठं सोऽनन्तं पारलौकिकम् ॥
अनुरूप ब्राह्मणको जो अभीष्ट अन्न प्रदान करता है, वह परलोकमें अपने लिये अनन्त एवं उत्तम निधिकी स्थापना करता है ॥
श्रान्तमध्वपरिश्रान्तमतिथिं गृहमागतम् ।
अर्चयीत प्रयत्नेन स हि यज्ञो वरप्रदः ॥
रास्तेका थका - माँदा अतिथि यदि घरपर आ जाय तो यत्नपूर्वक उसका आदर- सत्कार करे; क्योंकि वह अतिथि सत्कार मनोवांछित फल देनेवाला यज्ञ है ॥
पितरस्तस्य नन्दन्ति सुवृष्ट्या कर्षका इव ।
पुत्रो यस्य तु पौत्रो वा श्रोत्रियं भोजयिष्यति ॥
जिसका पुत्र अथवा पौत्र किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसके पितर उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे अच्छी वर्षा होनेसे किसान ॥
अपि चाण्डालशूद्राणामन्नदानं न गर्ह्यते ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन दद्यादन्नममत्सरः ॥
चाण्डाल और शूद्रोंको भी दिया हुआ अन्नदान निन्दित नहीं होता । अतः ईर्ष्या छोड़कर सब प्रकारके प्रयत्नद्वारा अन्नदान करना चाहिये ॥
पृष्ठ 1326
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अन्नदानाच्च लोकांस्तान् सम्प्रवक्ष्याम्यनिन्दिते ।
भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ॥
अनिन्दिते! अन्नदानसे जो लोक प्राप्त होते हैं उनका वर्णन करता हूँ । उन महामना दानी पुरुषोंको मिले हुए भवन देवलोकमें प्रकाशित होते हैं ॥
अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च ।
वैडूर्यार्चिःप्रकाशानि हेमरूप्यनिभानि च ॥
नानारूपाणि संस्थानां नानारत्नमयानि च ।
चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च ॥
तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च ।
यथेष्टभक्ष्यभोज्यानि शयनासनवन्ति च ॥
सर्वकामफलाश्चात्र वृक्षा भवनसंस्थिताः ।
वाप्यो बह्व्यश्च कूपाश्च दीर्घिकाश्च सहस्रशः ॥
उन भव्य भवनोंमें सैकड़ों तल्ले हैं । उनके भीतर जल और वन हैं । वे वैदूर्यमणिके तेजसे प्रकाशित होते हैं । उनमें सोने और चाँदी जैसी चमक है । उन गृहोंके अनेक रूप हैं । नाना प्रकारके रत्नोंसे उनका निर्माण हुआ है । वे चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल और क्षुद्र घण्टिकाओंकी झालरोंसे सुशोभित हैं। किन्हीं - किन्हींकी कान्ति प्रातः कालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होती है । उन महात्माओंके वे भवन स्थावर भी हैं और जंगम भी हैं । उनमें इच्छानुसार भक्ष्य - भोज्य पदार्थ उपलब्ध होते हैं । उत्तम शय्या और आसन बिछे रहते हैं । वहाँ सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले कल्पवृक्ष प्रत्येक घरमें विराजमान हैं । वहाँ बहुत - सी बावड़ियाँ, कुएँ और सहस्रों जलाशय हैं ॥
अरुजानि विशोकानि नित्यानि विविधानि च ।
भवनानि विचित्राणि प्राणदानां त्रिविष्टपे ॥
प्राणस्वरूप अन्न -दान करनेवाले लोगोंको स्वर्गमें जो भाँति - भाँतिके विचित्र भवन प्राप्त होते हैं, वे रोग - शोकसे रहित और नित्य ( चिरस्थायी ) हैं ॥
विवस्वतश्च सोमस्य ब्रह्मणश्च प्रजापतेः ।
विशन्ति लोकांस्ते नित्यं जगत्यन्नोदकप्रदाः ॥
जगत्में सदा अन्न और जलका दान करनेवाले मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा तथा प्रजापति ब्रह्माजीके लोकोंमें जाते हैं ॥
तत्र ते सुचिरं कालं विहृत्याप्सरसां गणैः ।
जायन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणसंयुताः ॥
वे वहाँ चिरकालतक अप्सराओंके साथ विहार करके पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेते और समस्त कल्याणकारी गुणोंसे संयुक्त होते हैं ॥ बलसंहननोपेता नीरोगाश्चिरजीविनः ।
पृष्ठ 1327
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुलीना मतिमन्तश्च भवन्त्यन्नप्रदा नराः ॥ वे सबल शरीरसे सम्पन्न, नीरोग, चिरजीवी, कुलीन, बुद्धिमान् तथा अन्नदाता होते हैं ॥
तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ।
सर्वकालं च सर्वस्य सर्वत्र च सदैव च ॥
अतः अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा, सर्वत्र, सबके लिये, सब समय विशेषरूपसे अन्नदान करना चाहिये ॥
सुवर्णदानं परमं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
तस्मात् ते वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥
अपि पापकृतं क्रूरं दत्तं रुक्मं प्रकाशयेत् ॥
सुवर्णदान परम उत्तम, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला और महान् कल्याणकारी है । इसलिये तुमसे क्रमशः उसीका यथावत्रूपसे वर्णन करूँगा । दिया हुआ सुवर्णका दान क्रूर और पापाचारीको भी प्रकाशित कर देता है ॥
सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्यः सुचेतसः ।
देवतास्ते तर्पयन्ति समस्ता इति वैदिकम् ॥
जो शुद्ध हृदयवाले मनुष्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान करते हैं, वे समस्त
देवताओंको तृप्त कर देते हैं । यह वेदका मत है ॥
अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं चाग्निरुच्यते ।
तस्मात् सुवर्णदानेन तृप्ताः स्युः सर्वदेवताः ॥
अग्नि सम्पूर्ण देवताओंके स्वरूप हैं और सुवर्णको भी अग्निरूप ही बताया जाता है ।
इसलिये सुवर्णके दानसे समस्त देवता तृप्त होते हैं ॥
अग्न्यभावे तु कुर्वन्ति वह्निस्थानेषु काञ्चनम् ।
तस्मात् सुवर्णदातारः सर्वान् कामानवाप्नुयुः ॥
अग्निके अभावमें उसकी जगह सुवर्णको स्थापित करते हैं। अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं ॥
आदित्यस्य हुताशस्य लोकान् नानाविधान् शुभान् ।
काञ्चनं सम्प्रदायाशु प्रविशन्ति न संशयः ॥
सुवर्णका दान करके मनुष्य शीघ्र ही सूर्य एवं अग्निके नाना प्रकारके मङ्गलकारी लोकोंमें प्रवेश करते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥
अलंकारं कृतं चापि केवलात् प्रविशिष्यते ।
सौवर्णैर्ब्राह्मणं काले तैरलंकृत्य भोजयेत् ॥
य एतत् परमं दानं दत्त्वा सौवर्णमद्भुतम् ।
तिं मेधां वपुः कीर्तिं पुनर्जाते लभेद् ध्रुवम् ॥
पृष्ठ 1328
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
केवल सुवर्णकी अपेक्षा उसका आभूषण बनवाकर दान देना श्रेष्ठ माना गया है । अतः दानकालमें ब्राह्मणको सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करके भोजन करावे । जो यह अद्भुत एवं उत्कृष्ट सुवर्ण- दान करता है, वह पुनर्जन्म लेनेपर निश्चय ही सुन्दर शरीर, कान्ति, बुद्धि और कीर्ति पाता है ॥
तस्मात् स्वशक्त्या दातव्यं काञ्चनं भुवि मानवैः ।
न ह्येतस्मात् परं लोकेष्वन्यत् पापात् प्रमुच्यते ॥
अतः मनुष्योंको अपनी शक्तिके अनुसार पृथ्वीपर सुवर्णदान अवश्य करना चाहिये । संसारमें इससे बढ़कर कोई दान नहीं है । सुवर्णदान करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि गवां दानमनिन्दिते ।
न हि गोभ्यः परं दानं विद्यते जगति प्रिये ॥
अनिन्दिते! इसके बाद मैं गोदानका वर्णन करूँगा । प्रिये! इस संसारमें गौओंके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ॥
लोकान् सिसृक्षुणा पूर्वं गावः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
वृत्त्यर्थं सर्वभूतानां तस्मात् ता मातरः स्मृताः ॥
पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी इच्छावाले स्वयम्भू ब्रह्माजीने समस्त प्राणियोंकी जीवन-वृत्तिके लिये गौओंकी सृष्टि की थी । इसलिये वे सबकी माताएँ मानी गयी हैं ॥ लोकज्येष्ठा लोकवृत्त्यां प्रवृत्ता मय्यायत्ताः सोमनिष्यन्दभूताः । सौम्याः पुण्याः कामदाः प्राणदाश्च तस्मात् पूज्याः पुण्यकामैर्मनुष्यैः ॥ गौएँ सम्पूर्ण जगत्में ज्येष्ठ हैं । वे लोगोंको जीविका देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुई हैं। मेरे अधीन हैं और चन्द्रमाके अमृतमय द्रवसे प्रकट हुई हैं । वे सौम्य, पुण्यमयी, कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली तथा प्राणदायिनी हैं । इसलिये पुण्याभिलाषी मनुष्योंके लिये पूजनीय हैं ॥ धेनुं दत्त्वा निभृतां सुशीलां
कल्याणवत्सां च पयस्विनीं च ।
यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावत्समाः स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥
जो हृष्ट - पुष्ट, अच्छे स्वभाववाली, उत्तम बछड़ेसे युक्त एवं दूध देनेवाली गायका दान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक स्वर्गीय फल भोगता है ॥ प्रयच्छते यः कपिलां सचैलां सकांस्यदोहां कनकाग्र्यशृङ्गीम् । पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व-
पृष्ठ 1329
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मासप्तमं तारयते परत्र ॥ जो काँसके दुग्धपात्र और सोनेसे मढ़े हुए सींगोंवाली कपिला गौका वस्त्रसहित दान करता है, वह अपने पुत्रों, पौत्रों तथा सातवीं पीढ़ीतकके समस्त कुलका परलोकमें उद्धार कर देता है ॥ अन्तर्जाताः क्रीतका द्यूतलब्धाः प्राणक्रीताः सोदकाश्चौजसा वा । कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणार्थागताश्च द्वारैरेतैस्ताः प्रलब्धाः प्रदद्यात् ॥ जो अपने ही यहाँ पैदा हुई हों, खरीदकर लायी गयी हों, जुएमें जीत ली गयी हों, बदलेमें दूसरा कोई प्राणी देकर खरीदी गयी हों, जल हाथमें लेकर संकल्पपूर्वक दी गयी हों, अथवा युद्धमें बलपूर्वक जीती गयी हों, संकटसे छुड़ाकर लायी गयी हों, या पालन- पोषणके लिये आयी हों — इन द्वारोंसे प्राप्त हुई गौओंका दान करना चाहिये ॥
कृशाय बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये ।
प्रदाय नीरुजां धेनुं लोकान् प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥
जीविकाके बिना दुर्बल, अनेक पुत्रवाले, अग्निहोत्री, श्रोत्रिय ब्राह्मणको दूध देनेवाली नीरोग गायका दान करके दाता सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ॥
नृशंसस्य कृतघ्नस्य लुब्धस्यानृतवादिनः ।
हव्यकव्यव्यपेतस्य न दद्याद् गाः कथंचन ॥
जो क्रूर, कृतघ्न, लोभी, असत्यवादी और हव्य- कव्यसे दूर रहनेवाला हो, ऐसे मनुष्यको किसी तरह गौएँ नहीं देनी चाहिये ॥
समानवत्सां यो दद्याद् धेनुं विप्रे पयस्विनीम् ।
सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां सोमलोके महीयते ॥
जो मनुष्य समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी -सादी एवं दूध देनेवाली गायको वस्त्र ओढ़ाकर ब्राह्मणको दान करता है, वह सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
समानवत्सां यो दद्यात् कृष्णां धेनुं पयस्विनीम् ।
सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां लोकान् प्राप्नोत्यपाम्पतेः ॥
जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी - सादी एवं दूध देनेवाली काली गौको वस्त्र ओढ़ाकर उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह जलके स्वामी वरुणके लोकोंमें जाता है ॥
हिरण्यवर्णां पिङ्गाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंछन्नां यान्ति कौबेर सद्मनः ॥
जिसके शरीरका रंग सुनहरा, आँखें भूरी, साथमें बछड़ा और काँसकी दुहानी हो, उस गौको वस्त्र ओढ़ाकर दान करनेसे मनुष्य कुबेरके धाममें जाते हैं ॥ वायुरेणुसवर्णां च सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
पृष्ठ 1330
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रदाय वस्त्रसंछन्नां वायुलोके महीयते ॥ वायुसे उड़ी हुई धूलिके समान रंगवाली, बछड़े - सहित, दूध देनेवाली गायको कपड़ा ओढ़ाकर काँसके दुहानीके साथ दान देकर दाता वायुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
समानवत्सां यो धेनुं दत्त्वा गौरीं पयस्विनीम् ।
सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नामग्निलोके महीयते ॥
जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी- सादी, धौरी एवं दूध देनेवाली धेनुको वस्त्रसे आच्छादित करके उसका दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
युवानं बलिनं श्यामं शतेन सह यूथपम् ।
गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशृङ्गमलंकृतम् ॥
ऋषभं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाणां महात्मनाम् ।
ऐश्वर्यमभिजायन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥
जो लोग महामनस्वी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको नौजवान, बड़े सींगवाले, बलवान्, श्यामवर्ण, एक सौ गौओंसहित यूथपति गवेन्द्र ( साँड़ ) को पूर्णतः अलंकृत करके उसे श्रेष्ठ ब्राह्मणके हाथमें दे देते हैं, वे बारंबार जन्म लेनेपर ऐश्वर्यके साथ ही जन्म लेते हैं ॥
गवां मूत्रपुरीषाणि नोद्विजेत कदाचन ।
न चासां मांसमश्नीयाद् गोषु भक्तः सदा भवेत् ॥
गौओंके मल- मूत्रसे कभी उद्विग्न नहीं होना चाहिये और उनका मांस कभी नहीं खाना चाहिये । सदा गौओंका भक्त होना चाहिये ॥
ग्रासमुष्टिं परगवे दद्याद् संवत्सरं शुचिः ।
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ॥
जो पवित्र भावसे रहकर एक वर्षतक दूसरेकी गायको एक मुट्ठी ग्रास खिलाता है और स्वयं आहार नहीं करता, उसका वह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होता है ॥
गवामुभयतः काले नित्यं स्वस्त्ययनं वदेत् ।
न चासां चिन्तयेत् पापमिति धर्मविदो विदुः ॥
गौओंके पास प्रतिदिन दोनों समय उनके कल्याणकी बात कहनी चाहिये । कभी उनका
अनिष्ट - चिन्तन नहीं करना चाहिये । ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका मत है ॥
गावः पवित्रं परमं गोषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
कथंचिन्नावमन्तव्या गावो लोकस्य मातरः ॥
गौएँ परम पवित्र वस्तु हैं, गौओंमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं । अतः किसी तरह गौओंका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत्की माताएँ हैं ॥
तस्मादेव गवां दानं विशिष्टमिति कथ्यते ।
गोषु पूजा च भक्तिश्च नरस्यायुष्यतां वहेत् ॥