06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1441–1450
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1441–1450
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नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातरूप चार सींगोंको धारण करनेवाले शब्दब्रह्मस्वरूप, ७६४ गदाग्रजः - गदसे पहले जन्म लेनेवाले श्रीकृष्ण ॥ ९ ४ ॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ९ ५ ॥
७६५ चतुर्मूर्तिः - राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नरूप चार मूर्तियोंवाले, ७६६ चतुर्बाहुः - चार भुजाओंवाले, ७६७ चतुर्व्यूहः - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – इन चार व्यूहोंसे युक्त, ७६८ चतुर्गतिः- सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्यरूप चार परम गतिस्वरूप, ७६ ९ चतुरात्मा- मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, ७७० चतुर्भावः-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थोंके उत्पत्तिस्थान, ७७१ चतुर्वेदवित्- चारों वेदोंके अर्थको भलीभाँति जाननेवाले, ७७२ एकपात्- एक पादवाले यानी एक पाद ( अंश ) -से समस्त विश्वको व्याप्त करनेवाले ॥ ९ ५ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गा दुरावासो दुरारिहा ॥ ९ ६ ॥
७७३ समावर्तः - संसारचक्रको भलीभाँति घुमानेवाले, ७७४ अनिवृत्तात्मा- सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहींसे भी हटा हुआ नहीं है, ऐसे, ७७५ दुर्जयः-किसीसे भी जीतनेमें न आनेवाले, ७७६ दुरतिक्रमः-जिनकी आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं कर सके, ऐसे, ७७७ दुर्लभः- बिना भक्तिके प्राप्त न होनेवाले, ७७८ दुर्गमः - कठिनतासे जाननेमें आनेवाले, ७७९ दुर्गः कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, ७८० दुरावासः - बड़ी कठिनतासे योगीजनोंद्वारा हृदयमें बसाये जानेवाले, ७८१ दुरारिहा - दुष्ट मार्गमें चलनेवाले दैत्योंका वध करनेवाले ॥ ९ ६ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ९७ ॥
७८२ शुभाङ्गः - कल्याणकारक सुन्दर अंगोंवाले, ७८३ लोकसारङ्गः - लोकोंके सारको ग्रहण करनेवाले, ७८४ सु तन्तुः सुन्दर विस्तृत जगत्रूप तन्तुवाले, ७८५ तन्तु वर्धनः-पूर्वोक्त जगत्- तन्तुको बढ़ानेवाले, ७८६ इन्द्रकर्मा -इन्द्रके समान कर्मवाले, ७८७ महाकर्मा-बड़े - बड़े कर्म करनेवाले, ७८८ कृतकर्मा - जो समस्त कर्तव्य कर्म कर चुके हों, जिनका कोई कर्तव्य शेष न रहा हो – ऐसे कृतकृत्य, ७८ ९ कृतागमः स्वोचित अनेक कार्योंको पूर्ण करनेके लिये अवतार धारण करके आनेवाले ॥ ९ ७ ॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ९ ८ ॥
७ ९ ० उद्भवः - स्वेच्छासे श्रेष्ठ जन्म धारण करनेवाले, ७ ९ १ सुन्दरः - परम सुन्दर, ७ ९ २ सुन्दः - परम करुणाशील, ७ ९ ३ रत्ननाभः -रत्नके समान सुन्दर नाभिवाले, ७९४ सुलोचनः - सुन्दर नेत्रोंवाले, ७९ ५ अर्क: -ब्रह्मादि पूज्य पुरुषोंके भी पूजनीय, ७ ९ ६
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वाजसनः - याचकोंको अन्न प्रदान करनेवाले, ७९७ शृङ्गी-प्रलयकालमें सींगयुक्त मत्स्यविशेषका रूप धारण करनेवाले, ७ ९ ८ जयन्तः शत्रुओंको पूर्णतया जीतनेवाले, ७९९ सर्वविज्जयी - सब कुछ जाननेवाले और सबको जीतनेवाले ॥ ९ ८ ॥
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ९९ ॥
८०० सुवर्णबिन्दुः - सुन्दर अक्षर और बिन्दुसे युक्त ओंकारस्वरूप, ८०१ अक्षोभ्यः-किसीके द्वारा भी क्षुभित न किये जा सकनेवाले, ८०२ सर्ववागीश्वरेवरः - समस्त वाणीपतियोंके यानी ब्रह्मादिके भी स्वामी, ८०३ महाहृदः -ध्यान करनेवाले जिसमें गोता लगाकर आनन्दमें मग्न होते हैं, ऐसे परमानन्दके महान् सरोवर, ८०४ महागर्तः-महान् रथवाले, ८०५ महाभूतः - त्रिकालमें कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, ८०६ महानिधिः - सबके महान् निवास स्थान ॥ ९९ ॥
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः । १०० ॥
८०७ कुमुदः-कु अर्थात् पृथ्वीको उसका भार उतारकर प्रसन्न करनेवाले, ८०८ कुन्दरः -हिरण्याक्षको मारनेके लिये पृथ्वीको विदीर्ण करनेवाले, ८० ९ कुन्दः - परशुराम-अवतारमें पृथ्वी प्रदान करनेवाले, ८१० पर्जन्यः -बादलकी भाँति समस्त इष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, ८११ पावनः -स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले, ८१२ अनिलः - सदा प्रबुद्ध रहनेवाले, ८१३ अमृताशः -जिनकी आशा कभी विफल न हो - ऐसे अमोघसंकल्प, ८१४ अमृतवपुः- जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो— ऐसे नित्य विग्रह, ८१५ सर्वज्ञः - सदा- सर्वदा सब कुछ जाननेवाले, ८१६ सर्वतोमुखः-सब ओर मुखवाले यानी जहाँ कहीं भी उनके भक्त भक्तिपूर्वक पत्र - पुष्पादि जो कुछ भी अर्पण करें, उसे भक्षण करनेवाले ॥ १०० ॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ १०१ ॥
८१७ सुलभः - नित्य- निरन्तर चिन्तन करनेवालेको और एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको बिना ही परिश्रमके सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, ८१८ सुव्रतः- सुन्दर भोजन करनेवाले यानी अपने भक्तोंद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पण किये हुए पत्र-- पुष्पादि मामूली भोजनको भी परम श्रेष्ठ मानकर खानेवाले, ८१ ९ सिद्धः - स्वभावसे ही समस्त सिद्धियोंसे युक्त, ८२० शत्रुजित्- देवता और सत्पुरुषोंके शत्रुओंको जीतनेवाले, ८२१ शत्रुतापनः -देव- शत्रुओंको तपानेवाले, ८२२ न्यग्रोधः - वटवृक्षरूप, ८२३ उदुम्बरः कारणरूपसे आकाशके भी ऊपर रहनेवाले, ८२४ अश्वत्थः - पीपल वृक्षस्वरूप, ८२५ चाणूरान्ध्रनिषूदनः-चाणूर नामक अन्ध्रजातिके वीर मल्लको मारनेवाले ॥ १०१ ॥
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद् भयनाशनः ॥ १०२ ॥
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८२६ सहस्रार्चिः - अनन्त किरणोंवाले सूर्यरूप, ८२७ सप्तजिह्वः -काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुचि- इन सात जिह्वाओंवाले अग्निस्वरूप, ८२८ सप्तैधाः सात दीप्तिवाले अग्निस्वरूप, ८२ ९ सप्तवाहनः सात घोड़ोंवाले सूर्यरूप, ८३० अमूर्तिः- मूर्तिरहित निराकार, ८३१ अनघः सब प्रकारसे निष्पाप, ८३२ अचिन्त्यः-किसी प्रकार भी चिन्तन करनेमें न आनेवाले अव्यक्तस्वरूप, ८३३ भयकृत्- दुष्टोंको भयभीत करनेवाले, ८३४ भयनाशनः - स्मरण करनेवालोंके और सत्पुरुषोंके भयका नाश करनेवाले ॥ १०२ ॥
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ १०३ ॥
८३५ अणुः - अत्यन्त सूक्ष्म, ८३६ बृहत्- सबसे बड़े, ८३७ कृशः - अत्यन्त पतले और हलके, ८३८ स्थूलः - अत्यन्त मोटे और भारी, ८३ ९ गुणभृत्- समस्त गुणोंको धारण करनेवाले, ८४० निर्गुणः सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणोंसे अतीत, ८४१ महान् गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और ज्ञान आदिकी अतिशयताके कारण परम महत्त्वसम्पन्न, ८४२ अधृतः-जिनको कोई भी धारण नहीं कर सकता-ऐसे निराधार, ८४३ स्वधृतः - अपने - आपसे धारित यानी अपनी ही महिमामें स्थित, ८४४ स्वास्यः - सुन्दर मुखवाले, ८४५ प्राग्वंशः-जिनसे समस्त वंश - परम्परा आरम्भ हुई है - ऐसे समस्त पूर्वजोंके भी पूर्वज आदिपुरुष, ८४६ वंशवर्धनः -जगत्- प्रपंचरूप वंशको और यादव वंशको बढ़ानेवाले ॥ १०३ ॥
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ १०४ ॥
८४७ भारभृत्- शेषनाग आदिके रूपमें पृथ्वीका भार उठानेवाले और अपने भक्तोंके योगक्षेमरूप भारको वहन करनेवाले, ८४८ कथितः- वेद- शास्त्र और महापुरुषोंद्वारा जिनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका बारंबार कथन किया गया है, ऐसे सबके द्वारा वर्णित, ८४ ९ योगी- नित्य समाधियुक्त, ८५० योगीशः- समस्त योगियोंके स्वामी, ८५१ सर्वकामदः-समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, ८५२ आश्रमः- सबको विश्राम देनेवाले, ८५३ श्रमणः- दुष्टोंको संतप्त करनेवाले, ८५४ क्षामः- प्रलयकालमें सब प्रजाका क्षय करनेवाले, ८५५ सुपर्णः - वेदरूप सुन्दर पत्तोंवाले ( संसारवृक्षस्वरूप), ८५६ वायुवाहनः वायुको गमन करनेके लिये शक्ति देनेवाले ॥ १०४ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमो यमः ॥ १०५ ॥
८५७ धनुर्धरः - धनुषधारी श्रीराम, ८५८ धनुर्वेदः - धनुर्विद्याको जाननेवाले श्रीराम, ८५ ९ दण्डः - दमन करनेवालोंकी दमनशक्ति, ८६० दमयिता- यम और राजा आदिके रूपमें दमन करनेवाले, ८६१ दमः - दण्डका कार्य यानी जिनको दण्ड दिया जाता है, उनका सुधार, ८६२ :-सब -,अपराजितः शत्रुओंद्वारा पराजित न होनेवाले ८६३ सर्वसहः- कुछ सहन करनेकी
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सामर्थ्यसे युक्त, अतिशय तितिक्षु, ८६४ नियन्ता- सबको अपने - अपने कर्तव्यमें नियुक्त करनेवाले, ८६५ अनियमः - नियमोंसे न बँधे हुए, जिनका कोई भी नियन्त्रण करनेवाला नहीं, ऐसे परमस्वतन्त्र, ८६६ अयम: -जिनका कोई शासक नहीं ॥ १०५ ॥
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ १०६ ॥
८६७ सत्त्ववान्- बल, वीर्य, सामर्थ्य आदि समस्त तत्त्वोंसे सम्पन्न, ८६८ सात्त्विकः-सत्त्वगुणप्रधानविग्रह, ८६ ९ सत्यः सत्यभाषणस्वरूप, ८७० सत्यधर्मपरायणः-यथार्थ भाषण और धर्मके परम आधार, ८७१ अभिप्रायः- प्रेमीजन जिनको चाहते हैं — ऐसे परम इष्ट, ८७२ प्रियार्हः - अत्यन्त प्रिय वस्तु समर्पण करनेके लिये योग्य पात्र, ८७३ अर्हः - सबके परम पूज्य, ८७४ प्रियकृत्-भजनेवालोंका प्रिय करनेवाले, ८७५ प्रीतिवर्धनः- अपने प्रेमियोंके प्रेमको बढ़ानेवाले ॥ १०६ ॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग् विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥
८७६ विहायसगतिः -आकाशमें गमन करनेवाले, ८७७ ज्योतिः - स्वयंप्रकाशस्वरूप, ८७८ सुरुचिः - सुन्दर रुचि और कान्तिवाले, ८७ ९ हुतभुक्- यज्ञमें हवन की हुई समस्त हविको अग्निरूपसे भक्षण करनेवाले, ८८० विभुः सर्वव्यापी, ८८१ रविः - समस्त रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य, ८८२ विरोचनः -विविध प्रकारसे प्रकाश फैलानेवाले, ८८३ सूर्य: -शोभाको प्रकट करनेवाले, ८८४ सविता-समस्त जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ८८५ रविलोचनः - सूर्यरूप नेत्रोंवाले ॥ १०७ ॥
अनन्तो हुतभुग् भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ १०८ ॥
८८६ अनन्तः - सब प्रकारसे अन्तरहित, ८८७ हुतभुक् - यज्ञमें हवन की हुई सामग्रीको उन- उन देवताओंके रूपमें भक्षण करनेवाले, ८८८ भोक्ता जगत्का पालन करनेवाले, ८८९ सुखदः- भक्तोंको दर्शनरूप परम सुख देनेवाले, ८ ९० नैकजः- धर्मरक्षा, साधुरक्षा आदि परम विशुद्ध हेतुओंसे स्वेच्छापूर्वक अनेक जन्म धारण करनेवाले, ८ ९ १ अग्रजः-सबसे पहले जन्मनेवाले आदिपुरुष, ८ ९२ अनिर्विण्णः-पूर्णकाम होनेके कारण उकताहटसे रहित, ८ ९ ३ सदामर्षी - सत्पुरुषोंपर क्षमा करनेवाले, ८ ९ ४ लोकाधिष्ठानम्-समस्त लोकोंके आधार, ८ ९ ५ अद्भूतः -अत्यन्त आश्चर्यमय ॥ १०८ ॥
सनात् सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत् स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ १० ९ ॥
८९ ६ सनात्- अनन्तकालस्वरूप, ८ ९ ७ सनातनतमः - सबके कारण होनेसे ब्रह्मादि पुरुषोंकी अपेक्षा भी परम पुराणपुरुष, ८ ९ ८ कपिलः-महर्षि कपिलावतार, ८ ९९ कपिः-सूर्यदेव, ९ ०० अप्ययः-सम्पूर्ण जगत् के लयस्थान, ९ ०१ स्वस्तिदः -परमानन्दरूप मंगल
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देनेवाले, ९ ०२ स्वस्तिकृत्- आश्रितजनोंका कल्याण करनेवाले, ९ ०३ स्वस्ति-कल्याणस्वरूप, ९ ०४ स्वस्तिभुक् - भक्तोंके परम कल्याणकी रक्षा करनेवाले, ९ ०५ स्वस्तिदक्षिणः -कल्याण करनेमें समर्थ और शीघ्र कल्याण करनेवाले ॥ १० ९ ॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ११० ॥
९ ०६ अरौद्रः - सब प्रकारके रुद्र ( क्रूर) भावोंसे रहित शान्तिमूर्ति, ९ ०७ कुण्डली -सूर्यके समान प्रकाशमान मकराकृति कुण्डलोंको धारण करनेवाले, ९०८ चक्री- सुदर्शनचक्रको धारण करनेवाले, ९ ० ९ विक्रमी- सबसे विलक्षण पराक्रमशील, ९ १० ऊर्जितशासनः-जिनका श्रुति- स्मृतिरूप शासन अत्यन्त श्रेष्ठ है — ऐसे अतिश्रेष्ठ शासन करनेवाले, ९ ११ शब्दातिगः - शब्दकी जहाँ पहुँच नहीं, ऐसे वाणीके अविषय, ९ १२ शब्दसहः - कठोर शब्दोंको सहन करनेवाले, ९ १३ शिशिरः-त्रितापपीड़ितोंको शान्ति देनेवाले शीतलमूर्ति, ९ १४ शर्वरीकरः - ज्ञानियोंकी रात्रि संसार और अज्ञानियोंकी रात्रि ज्ञान- इन दोनोंको उत्पन्न करनेवाले ॥ ११० ॥
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११ ॥
९ १५ अक्रूरः - सब प्रकारके क्रूरभावोंसे रहित, ९ १६ पेशलः-मन, वाणी और कर्म— सभी दृष्टियोंसे सुन्दर होनेके कारण परम सुन्दर, ९ १७ दक्षः- सब प्रकारसे समृद्ध, परमशक्तिशाली और क्षणमात्रमें बड़े - से - बड़ा कार्य कर देनेवाले महान् कार्यकुशल, ९ १८ दक्षिणः - संहारकारी, ९ १ ९ क्षमिणां वरः- क्षमा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९ २० विद्वत्तमः-विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ परम विद्वान्, ९ २१ वीतभयः- सब प्रकारके भयसे रहित, ९ २२ पुण्यश्रवणकीर्तनः - जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपका श्रवण और कीर्तन परम पावन हैं; ऐसे ॥ १११ ॥
उत्तारणी दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ११२ ॥
९ २३ उत्तारणः - संसार-सागरसे पार करनेवाले, ९ २४ दुष्कृतिहा-पापोंका और पापियोंका नाश करनेवाले, ९ २५ पुण्यः -स्मरण आदि करनेवाले समस्त पुरुषोंको पवित्र कर देनेवाले, ९ २६ दुःस्वप्ननाशनः- ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन करनेसे बुरे स्वप्नोंका नाश करनेवाले, ९ २७ वीरहा- शरणागतोंकी विविध गतियोंका यानी संसार-चक्रका नाश करनेवाले, ९ २८ रक्षणः- सब प्रकारसे रक्षा करनेवाले, ९ २ ९ सन्तः - विद्या, विनय और धर्म आदिका प्रचार करनेके लिये संतोंके रूपमें प्रकट होनेवाले, ९ ३० जीवन: - समस्त प्रजाको प्राणरूपसे जीवित रखनेवाले, ९ ३१ पर्यवस्थितः -समस्त विश्वको व्याप्त करके स्थित रहनेवाले ॥ ११२ ॥
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
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चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ ११३ ॥
९ ३२ अनन्तरूपः - अमितरूपवाले, ९ ३३ अनन्तश्रीः- अपरिमित शोभासम्पन्न, ९ ३४ जितमन्युः:--सबर प्रकारसे क्रोधको जीत लेनेवाले, ९ ३५ भयापहः - भक्तभयहारी, ९ ३६ चतुरस्रः- मंगलमूर्ति, ९ ३७ गभीरात्मा- गम्भीर मनवाले, ९ ३८ विदिशः- अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार विभागपूर्वक नाना प्रकारके फल देनेवाले, ९ ३ ९ व्यादिशः - सबको यथायोग्य विविध आज्ञा देनेवाले, ९ ४० दिशः- वेदरूपसे समस्त कर्मोंका फल बतलानेवाले ॥ ११३ ॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ११४ ॥
९ ४१ अनादिः -जिसका आदि कोई न हो ऐसे सबके कारणस्वरूप, ९ ४२ भूर्भुव: - पृथ्वीके भी आधार, ९ ४३ लक्ष्मीः- समस्त शोभायमान वस्तुओंकी शोभास्वरूप, ९ ४४ सुवीरः- उत्तम योधा, ९ ४५ रुचिराङ्गदः - परम रुचिकर कल्याणमय बाजूबंदोंको धारण करनेवाले, ९ ४६ जननः -प्राणिमात्रको उत्पन्न करनेवाले, ९४७ जनजन्मादिः -जन्म लेनेवालोंके जन्मके मूल कारण, ९ ४८ भीमः- दुष्टोंको भय देनेवाले, ९ ४ ९ भीमपराक्रमः-अतिशय भय उत्पन्न करनेवाले, पराक्रमसे युक्त ॥ ११४ ॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ ११५ ॥
९ ५० आधारनिलयः - आधारस्वरूप पृथ्वी आदि समस्त भूतोंके स्थान, ९ ५१ अधाता-जिसका कोई भी बनानेवाला न हो ऐसे स्वयं स्थित, ९ ५२ पुष्पहासः - पुष्पकी भाँति विकसित हास्यवाले, ९ ५३ प्रजागरः-भली प्रकार जाग्रत् रहनेवाले नित्यप्रबुद्ध, ९ ५४ ऊर्ध्वगः - सबसे ऊपर रहनेवाले, ९ ५५ सत्पथाचारः - सत्पुरुषोंके मार्गका आचरण करनेवाले मर्यादापुरुषोत्तम, ९ ५६ प्राणदः - परीक्षित् आदि मरे हुओंको भी जीवन देनेवाले, ९ ५७ प्रणवः -ॐकारस्वरूप, ९ ५८ पणः- यथायोग्य व्यवहार करनेवाले ॥ ११५ ॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ ११६ ॥
९५ ९ प्रमाणम्-स्वतः सिद्ध होनेसे स्वयं प्रमाणस्वरूप, ९ ६० प्राणनिलयः प्राणोंके आधारभूत, ९ ६१ प्राणभृत्- समस्त प्राणोंका पोषण करनेवाले, ९ ६२ प्राणजीवनः-प्राणवायुके संचारसे प्राणियोंको जीवित रखनेवाले, ९ ६३ तत्त्वम्- यथार्थ तत्त्वरूप, ९ ६४ तत्त्ववित्-यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ९ ६५ एकात्मा- अद्वितीयस्वरूप, ९ ६६ जन्ममृत्युजरातिगः - जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा आदि शरीरके धर्मोसे सर्वथा अतीत ॥ ११६ । |
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ ११७ ॥
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९ ६७ भूर्भुवःस्वस्तरुः - ' भूः भुवः स्वः ' तीनों लोकोंवाले, संसारवृक्षस्वरूप, ९ ६८ तारः-संसार- सागरसे पार उतारनेवाले, ९ ६ ९ सविता-सबको उत्पन्न करनेवाले, ९७० प्रपितामहः - पितामह ब्रह्माके भी पिता, ९ ७१ यज्ञः - यज्ञस्वरूप, ९७२ यज्ञपतिः:--समस्त यज्ञोंके अधिष्ठाता, ९ ७३ यज्वा यजमानरूपसे यज्ञ करनेवाले, ९७४ यज्ञाङ्गः - समस्त यज्ञरूप अंगोंवाले, वाराहस्वरूप, ९ ७५ यज्ञवाहनः यज्ञोंको चलानेवाले ॥ ११७ ॥
यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ ११८ ॥
९ ७६ यज्ञभृत् - यज्ञोंको धारण करनेवाले, ९ ७७ यज्ञकृत् - यज्ञोंके रचयिता, ९ ७८ यज्ञी-समस्त यज्ञ जिसमें समाप्त होते हैं - ऐसे यज्ञशेषी, ९ ७ ९ यज्ञभुक् - समस्त यज्ञोंके भोक्ता, ९ ८० यज्ञसाधनः - ब्रह्मयज्ञ, जपयज्ञ आदि बहुत - से यज्ञ जिनकी प्राप्तिके साधन हैं ऐसे, ९ ८१ यज्ञान्तकृत्- यज्ञोंका फल देनेवाले, ९ ८२ यज्ञगुह्यम्- यज्ञोंमें गुप्त निष्काम यज्ञस्वरूप, ९ ८३ अन्नम्- समस्त प्राणियोंके अन्न यानी अन्नकी भाँति उनकी सब प्रकारसे तुष्टि- पुष्टि करनेवाले, ९ ८४ अन्नादः- समस्त अन्नोंके भोक्ता ॥ ११८ ॥
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ ११ ९ ॥
९ ८५ आत्मयोनिः -जिनका कारण दूसरा कोई नहीं ऐसे स्वयं योनिस्वरूप, ९ ८६ स्वयंजातः - स्वयं अपने-आप स्वेच्छापूर्वक प्रकट होनेवाले, ९८७ वैखानः - पातालवासी हिरण्याक्षका वध करनेके लिये पृथ्वीको खोदनेवाले, वाराह- अवतारधारी, ९८८ सामगायनः - सामवेदका गान करनेवाले, ९८९ देवकीनन्दनः -देवकीपुत्र, ९९ ० स्रष्टा-समस्त लोकोंके रचयिता, ९९ १ क्षितीशः - पृथ्वीपति, ९९ २ पापनाशनः- स्मरण, कीर्तन, पूजन और ध्यान आदि करनेसे समस्त पापसमुदायका नाश करनेवाले ॥ ११ ९ ॥
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १२० ॥
९९३ शङ्खभृत्- पाञ्चजन्यशंखको धारण करनेवाले, ९९ ४ नन्दकी - नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले, ९९ ५ चक्री-सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले, ९९ ६ शार्ङ्गधन्वा-शार्ङ्गधनुषधारी, ९९ ७ गदाधरः- कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले, ९९ ८ रथाङ्गपाणिः - भीष्मकी प्रतिज्ञा रखनेके लिये सुदर्शन चक्रको हाथमें धारण करनेवाले श्रीकृष्ण, ९९९ अक्षोभ्यः-जो किसी प्रकार भी विचलित नहीं किये जा सके, ऐसे, १००० सर्वप्रहरणायुधः - ज्ञात और अज्ञात जितने भी युद्धादिमें काम आनेवाले अस्त्र- शस्त्र हैं, उन सबको धारण करनेवाले ॥ १२० ॥
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति
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यहाँ हजार नामोंकी समाप्ति दिखलानेके लिये अन्तिम नामको दुबारा लिखा गया है । मंगलवाची होनेसे ॐकारका स्मरण किया गया है । अन्तमें नमस्कार करके भगवान्की पूजा की गयी है ।
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १२१ ॥
इस प्रकार यह कीर्तन करने योग्य महात्मा केशवके दिव्य एक हजार नामोंका पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया ॥ १२१ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचित् सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ १२२ ॥
जो मनुष्य इस विष्णुसहस्रनामका सदा श्रवण करता है और जो प्रतिदिन इसका कीर्तन या पाठ करता है, उसका इस लोकमें तथा परलोकमें कहीं भी कुछ अशुभ नहीं होता ॥ १२२ ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ १२३ ॥
इस विष्णुसहस्रनामका श्रवण, पठन और कीर्तन करनेसे ब्राह्मण वेदान्त - पारगामी हो जाता है, क्षत्रिय युद्धमें विजय पाता है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शूद्र सुख पाता ॥ १२३ ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद् धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात् कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात् प्रजाम् ॥ १२४ ॥
धर्मकी इच्छावाला धर्मको पाता है, अर्थकी इच्छावाला अर्थ पाता है, भोगोंकी इच्छावाला भोग पाता है और संतानकी इच्छावाला संतान पाता है ॥ १२४ ॥
भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत् प्रकीर्तयेत् ॥ १२५ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १२६ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान् बलरूपगुणान्वितः ॥ १२७ ॥
जो भक्तिमान् पुरुष सदा प्रातःकालमें उठकर स्नान करके पवित्र हो मनमें विष्णुका ध्यान करता हुआ इस वासुदेव सहस्रनामका भली प्रकार पाठ करता है, वह महान् यश पाता है, जातिमें महत्त्व पाता है, अचल सम्पत्ति पाता है और अति उत्तम कल्याण पाता है तथा उसको कहीं भय नहीं होता । वह वीर्य और तेजको पाता है तथा आरोग्यवान्, कान्तिमान्, बलवान्, रूपवान् और सर्वगुणसम्पन्न हो जाता है ॥ १२५–१२७ ॥ रोगार्तो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
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भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ १२८ ॥
रोगातुर पुरुष रोगसे छूट जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ पुरुष बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत भयसे छूट जाता है और आपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे छूट जाता है ॥ १२८ ॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन् नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ १२ ९ ॥
जो पुरुष भक्तिसम्पन्न होकर इस विष्णुसहस्रनामसे पुरुषोत्तम भगवान्की प्रतिदिन स्तुति करता है, वह शीघ्र ही समस्त संकटोंसे पार हो जाता है ॥ १२ ९ ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १३० ॥
जो मनुष्य वासुदेवके आश्रित और उनके परायण है, वह समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध अन्तःकरणवाला हो सनातन परब्रह्मको पाता है ॥ १३० ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ १३१ ॥
वासुदेवके भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता है तथा उनको जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका भी भय नहीं रहता है ॥ १३१ ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १३२ ॥
जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भक्तिभावसे इस विष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, वह आत्मसुख, क्षमा, लक्ष्मी, धैर्य, स्मृति और कीर्तिको पाता है ॥ १३२ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३३ ॥
पुरुषोत्तमके पुण्यात्मा भक्तोंको किसी दिन क्रोध नहीं आता, ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होती, लोभ नहीं होता और उनकी बुद्धि कभी अशुद्ध नहीं होती ॥ १३३ ॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १३४ ॥
स्वर्ग, सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्रसहित आकाश, दस दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर — ये सब महात्मा वासुदेवके प्रभावसे धारण किये गये हैं ॥ १३४ ॥
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद् वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १३५ ॥
देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, सर्प और राक्षससहित यह स्थावर- जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णके अधीन रहकर यथायोग्य बरत रहे हैं ॥ १३५ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १३६ ॥
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इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल, धीरज, क्षेत्र, ( शरीर ) और क्षेत्रज्ञ ( आत्मा) —ये सब- के - सब श्रीवासुदेवके रूप हैं, ऐसा वेद कहते हैं ॥ १३६ ॥
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १३७ ॥
सब शास्त्रोंमें आचार प्रथम माना जाता है, आचारसे ही धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मके स्वामी भगवान् अच्युत हैं ॥ १३७ ॥
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १३८ ॥
ऋषि, पितर, देवता, पञ्च महाभूत, धातुएँ और स्थावर- जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत्— ये सब नारायणसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥ १३८ ॥
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्या शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत् सर्वं जनार्दनात् ॥ १३ ९ ॥
योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प आदि कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान—ये सब विष्णुसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १३ ९ ॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान् व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ १४० ॥
वे समस्त विश्वके भोक्ता और अविनाशी विष्णु ही एक ऐसे हैं, जो अनेक रूपोंमें विभक्त होकर भिन्न - भिन्न भूतविशेषोंके अनेक रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा त्रिलोकीमें व्याप्त होकर सबको भोग रहे हैं ॥ १४० ॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद् य इच्छेत् पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ १४१ ॥
जो पुरुष परम श्रेय और सुख पाना चाहता हो, वह भगवान् व्यासजीके कहे हुए इस विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे ॥ १४१ ॥
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ १४२ ॥
जो विश्वके ईश्वर जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले जन्मरहित कमललोचन भगवान् विष्णुका भजन करते हैं, वे कभी पराभव नहीं पाते हैं ॥ १४२ ॥
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विष्णुसहस्रनामकथने एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत व्यासनिर्मित शतसाहस्रीय संहितासम्बन्धी अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विष्णुसहस्रनामकथनविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा