06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1431–1440
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1431–1440
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ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८ ॥
४१६ ऋतुः -ऋतुस्वरूप, ४१७ सुदर्शनः- भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे देनेवाले, ४१८ कालः - सबकी गणना करनेवाले, ४१ ९ परमेष्ठी - अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेके स्वभाववाले, ४२० परिग्रहः- शरणार्थियोंके द्वारा सब ओरसे ग्रहण किये जानेवाले, ४२१ उग्रः - सूर्यादिके भी भयके कारण, ४२२ संवत्सरः - सम्पूर्ण भूतोंके वासस्थान, ४२३ दक्षः-सब कार्योंको बड़ी कुशलतासे करनेवाले, ४२४ विश्रामः - विश्रामकी इच्छावाले मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाले, ४२५ विश्वदक्षिणः- बलिके यज्ञमें समस्त विश्वको दक्षिणारूपमें प्राप्त करनेवाले ॥ ५८ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ५ ९ ॥
४२६ विस्तारः - समस्त लोकोंके विस्तारके स्थान, ४२७ स्थावरस्थाणुः - स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी आदि, स्थितिशील पदार्थोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, ४२८ प्रमाणम्- ज्ञानस्वरूप होनेके कारण स्वयं प्रमाणरूप, ४२ ९ बीजमव्ययम्- संसारके अविनाशी कारण, ४३० अर्थः-सुखस्वरूप होनेके कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय, ४३१ अनर्थः - पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित, ४३२ महाकोशः - बड़े खजानेवाले, ४३३ महाभोगः - यथार्थ सुखरूप महान् भोगवाले, ४३४ महाधनः - अतिशय यथार्थ धनस्वरूप ॥ ५ ९ ॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ६० ॥
४३५ अनिर्विण्णः - उकताहटरूप विकारसे रहित, ४३६ स्थविष्ठः- विराट्रूपसे स्थित, ४३७ अभूः - अजन्मा, ४३८ धर्मयूपः- धर्मके स्तम्भरूप, ४३ ९ महामखः - महान् यज्ञस्वरूप, ४४० नक्षत्रनेमिः - समस्त नक्षत्रोंके केन्द्रस्वरूप, ४४१ नक्षत्री - चन्द्ररूप, ४४२ क्षमः समस्त कार्योंमें समर्थ, ४४३ क्षामः समस्त जगत्के निवासस्थान, ४४४ समीहनः - सृष्टि आदिके लिये भलीभाँति चेष्टा करनेवाले ॥ ६० ॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ६१ ॥
४४५ यज्ञः - भगवान् विष्णु, ४४६ इज्य: - पूजनीय, ४४७ महेज्यः - सबसे अधिक उपासनीय, ४४८ क्रतुः - स्तम्भयुक्त यज्ञस्वरूप, ४४ ९ सत्रम्- सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले, ४५० सतां गतिः - सत्पुरुषोंकी परम गति, ४५१ सर्वदर्शी- समस्त प्राणियोंको और उनके कार्योंको देखनेवाले, ४५२ विमुक्तात्मा- सांसारिक बन्धनसे नित्यमुक्त आत्मस्वरूप, ४५३ सर्वज्ञः - सबको जाननेवाले, ४५४ ज्ञानमुत्तमम् - सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप ॥ ६१ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
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मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ६२ ॥
४५५ सुव्रतः- प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतोंवाले, ४५६ सुमुखः - सुन्दर और प्रसन्न मुखवाले, ४५७ सूक्ष्मः- अणुसे भी अणु, ४५८ सुघोषः - सुन्दर और गम्भीर वाणी बोलनेवाले, ४५९ सुखदः - अपने भक्तोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले, ४६० सुहृत्-प्राणिमात्रपर अहैतुकी दया करनेवाले परम मित्र, ४६१ मनोहरः - अपने रूप- लावण्य और मधुर भाषणादिसे सबके मनको हरनेवाले, ४६२ जितक्रोधः क्रोधपर विजय करनेवाले अर्थात् अपने साथ अत्यन्त अनुचित व्यवहार करनेवालेपर भी क्रोध न करनेवाले, ४६३ वीरबाहुः - अत्यन्त पराक्रमशील भुजाओंसे युक्त, ४६४ विदारणः- अधर्मियोंको नष्ट करनेवाले ॥ ६२ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
४६५ स्वापनः -प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको अज्ञाननिद्रामें शयन करानेवाले, ४६६ स्ववशः - स्वतन्त्र, ४६७ व्यापी - आकाशकी भाँति सर्वव्यापी ४६८ नैकात्मा - प्रत्येक युगमें लोकोद्धारके लिये अनेक रूप धारण करनेवाले, ४६ ९ नैककर्मकृत् जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न -भिन्न अवतारोंमें मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करनेवाले, ४७० वत्सरः - सबके निवास स्थान, ४७१ वत्सलः- भक्तोंके परम स्नेही, ४७२ वत्सी-वृन्दावनमें बछड़ोंका पालन करनेवाले, ४७३ रत्नगर्भः - रत्नोंको अपने गर्भमें धारण करनेवाले समुद्ररूप, ४७४ धनेश्वरः-:-सब प्रकारके धनोंके स्वामी ॥ ६३ ॥
धर्मगुब् धर्मकृद् धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥
४७५ धर्मगुप् - धर्मकी रक्षा करनेवाले, ४७६ धर्म- कृत्- धर्मकी स्थापना करनेके लिये स्वयं धर्मका आचरण करनेवाले, ४७७ धर्मी- सम्पूर्ण धर्मोंके आधार, ४७८ सत्- सत्यस्वरूप, ४७ ९ असत्- स्थूल जगत्स्वरूप, ४८० क्षरम्- सर्वभूतमय, ४८१ अक्षरम्-अविनाशी, ४८२ अविज्ञाता - क्षेत्रज्ञ जीवात्माको विज्ञाता कहते हैं, उनसे विलक्षण भगवान् विष्णु, ४८३ सहस्रांशुः-हजारों किरणोंवाले सूर्यस्वरूप, ४८४ विधाता - सबको अच्छी प्रकार धारण करनेवाले, ४८५ कृतलक्षणः श्रीवत्स आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले ॥ ६४ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ६५ ॥
४८६ गभस्तिनेमिः - किरणोंके बीचमें सूर्यरूपसे स्थित, ४८७ सत्त्वस्थः- अन्तर्यामीरूपसे समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाले, ४८८ सिंहः- भक्त प्रह्लादके लिये नृसिंहरूप धारण करनेवाले, ४८९ भूतमहेश्वरः- सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वर, ४ ९० आदिदेवः -सबके आदि कारण और दिव्यस्वरूप, ४ ९ १ महादेवः - ज्ञानयोग
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और ऐश्वर्य आदि महिमाओंसे युक्त, ४ ९ २ देवेशः- समस्त देवोंके स्वामी, ४ ९ ३ देवभृद्गुरुः-देवोंका विशेषरूपसे भरण - पोषण करनेवाले उनके परम गुरु ॥ ६५ ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ६६ ॥
४९४ उत्तरः - संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाले और सर्वश्रेष्ठ, ४ ९ ५ गोपतिः-गोपालरूपसे गायोंकी रक्षा करनेवाले, ४ ९ ६ गोप्ता- समस्त प्राणियोंका पालन और रक्षा करनेवाले, ४ ९ ७ ज्ञानगम्यः -ज्ञानके द्वारा जाननेमें आनेवाले, ४ ९ ८ पुरातनः सदा एकरस रहनेवाले, सबके आदि पुराणपुरुष, ४ ९९ शरीरभूतभृत्- शरीरके उत्पादक पञ्चभूतोंका प्राणरूपसे पालन करनेवाले, ५०० भोक्ता -निरतिशय आनन्दपुंजको भोगनेवाले, ५०१ कपीन्द्रः - बंदरोंके स्वामी श्रीराम, ५०२ भूरिदक्षिण: - श्रीरामादि अवतारोंमें यज्ञ करते समय बहुत- सी दक्षिणा प्रदान करनेवाले ॥ ६६ ॥
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ ६७ ॥
५०३ सोमपः - यज्ञोंमें देवरूपसे और यजमानरूपसे सोमरसका पान करनेवाले, ५०४ अमृतपः - समुद्रमन्थनसे निकाला हुआ अमृत देवोंको पिलाकर स्वयं पीनेवाले, ५०५ सोमः-ओषधियोंका पोषण करनेवाले चन्द्रमारूप, ५०६ पुरुजित्- बहुतोंको विजय लाभ करनेवाले, ५०७ पुरुसत्तमः- विश्वरूप और अत्यन्त श्रेष्ठ, ५०८ विनयः - दुष्टोंको दण्ड देनेवाले, ५० ९ जयः -सबपर विजय प्राप्त करनेवाले, ५१० सत्यसंधः- सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, ५११ दाशार्हः-दाशार्हकुलमें प्रकट होनेवाले, ५१२ सात्वतां पतिः - यादवोंके और अपने भक्तोंके स्वामी ॥ ६७ ॥
जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ६८ ॥
५१३ जीवः - क्षेत्रज्ञरूपसे प्राणोंको धारण करनेवाले, ५१४ विनयितासाक्षी - अपने शरणापन्न भक्तोंके विनय भावको तत्काल प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले, ५१५ मुकुन्द: -मुक्तिदाता, ५१६ अमितविक्रमः- वामनावतारमें पृथ्वी नापते समय अत्यन्त विस्तृत पैर रखनेवाले, ५१७ अम्भोनिधिः- जलके निधान समुद्रस्वरूप, ५१८ अनन्तात्मा - अनन्तमूर्ति, ५१ ९ महोदधिशयः- प्रलयकालके महान् समुद्रमें शयन करनेवाले, ५२० अन्तकः-प्राणियोंका संहार करनेवाले मृत्युस्वरूप ॥ ६८ ॥
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ६ ९ ॥
५२१ अजः - अकार भगवान् विष्णुका वाचक है, उससे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मास्वरूप, ५२२ महार्हः - पूजनीय, ५२३ स्वाभाव्यः- नित्य सिद्ध होनेके कारण स्वभावसे ही उत्पन्न न होनेवाले, ५२४ जितामित्रः- रावण- शिशुपालादि शत्रुओंको जीतनेवाले, ५२५ प्रमोदनः-
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स्मरणमात्रसे नित्य प्रमुदित करनेवाले, ५२६ आनन्दः-आनन्दस्वरूप, ५२७ नन्दनः - सबको प्रसन्न करनेवाले, ५२८ नन्दः-सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, ५२ ९ सत्यधर्मा - धर्मज्ञानादि सब गुणोंसे युक्त, ५३० त्रिविक्रमः - तीन डगमें तीनों लोकोंको नापनेवाले ॥ ६ ९ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ७० ॥
५३१ महर्षिः कपिलाचार्यः- सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, ५३२ कृतज्ञः - अपने भक्तोंकी सेवाको बहुत मानकर अपनेको उनका ऋणी समझनेवाले, ५३३ मेदिनीपतिः - पृथ्वीके स्वामी, ५३४ त्रिपदः - त्रिलोकीरूप तीन पैरोंवाले विश्वरूप, ५३५ त्रिदशाध्यक्षःकरनेवाले - देवताओंके स्वामी, ५३६ महाशृङ्गः-मत्स्यावतारमें महान् सींग धारण, ५३७५३७ कृतान्तकृत्- स्मरण करनेवालोंके समस्त कर्मोंका अन्त करनेवाले ॥ ७० ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ७१ ॥
५३८ महावराहः -हिरण्याक्षका वध करनेके लिये महावराहरूप धारण करनेवाले, ५३ ९ गोविन्दः -नष्ट हुई पृथ्वीको पुनः प्राप्त कर लेनेवाले, ५४० सुषेणः - पार्षदोंके समुदायरूप सुन्दर सेनासे सुसज्जित, ५४१ कनकाङ्गदी- सुवर्णका बाजूबंद धारण करनेवाले, ५४२ गुह्यः-हृदयाकाशमें छिपे रहनेवाले, ५४३ गभीरः - अतिशय गम्भीर स्वभाववाले, ५४४ गहनः -जिनके स्वरूपमें प्रविष्ट होना अत्यन्त कठिन हो – ऐसे, ५४५ गुप्तः-वाणी और मनसे जाननेमें न आनेवाले, ५४६ चक्रगदाधरः - भक्तोंकी रक्षा करनेके लिये चक्र और गदा आदि दिव्य आयुधोंको धारण करनेवाले ॥ ७१ ॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ७२ ॥
५४७ वेधाः - सब कुछ विधान करनेवाले, ५४८ स्वाङ्गः - कार्य करनेमें स्वयं ही सहकारी, ५४ ९ अजितः-किसीके द्वारा न जीते जानेवाले, ५५० कृष्णः श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, ५५१ दृढः - अपने स्वरूप और सामर्थ्यसे कभी भी च्युत न होनेवाले, ५५२ सङ्कर्षणोऽच्युतः-प्रलयकालमें एक साथ सबका संहार करनेवाले और जिनका कभी किसी भी कारणसे पतन न हो सके — ऐसे अविनाशी, ५५३ वरुणः- जलके स्वामी वरुणदेवता, ५५४ वारुणः-वरुणके पुत्र वशिष्ठस्वरूप, ५५५ वृक्षः - अश्वत्थवृक्षरूप, ५५६ पुष्कराक्षः - कमलके समान नेत्रवाले, ५५७ महामनाः- संकल्पमात्रसे उत्पत्ति, पालन और संहार आदि समस्त लीला करनेकी शक्तिवाले ॥ ७२ ॥
भगवान् भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ७३ ॥
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५५८ भगवान्-उत्पत्ति और प्रलय, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जाननेवाले एवं सर्वैश्वर्यादि छहों भगोंसे युक्त, ५५ ९ भगहा- अपने भक्तोंका प्रेम बढ़ानेके लिये उनके ऐश्वर्यका हरण करनेवाले, ५६० आनन्दी - परम सुखस्वरूप, ५६१ वनमाली-वैजयन्ती वनमाला धारण करनेवाले, ५६२ हलायुधः- हलरूप शस्त्रको धारण करनेवाले बलभद्रस्वरूप, ५६३ आदित्यः -अदितिपुत्र वामन- भगवान्, ५६४ ज्योतिरादित्यः-सूर्यमण्डलमें विराजमान ज्योतिः स्वरूप, ५६५ सहिष्णुः - समस्त द्वन्द्वोंको सहन करनेमें समर्थ, ५६६ गतिसत्तमः- सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप ॥ ७३ ॥
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिविस्पृक् सर्वदृग् व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ७४ ॥
५६७ सुधन्वा- अतिशय सुन्दर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, ५६८ खण्डपरशुः-शत्रुओंका खण्डन करनेवाले फरसेको धारण करनेवाले परशुरामस्वरूप, ५६ ९ दारुणः-सन्मार्गविरोधियोंके लिये महान् भयंकर, ५७० द्रविणप्रदः - अर्थार्थी भक्तोंको धन- सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, ५७१ दिविस्पृक्- स्वर्गलोकतक व्याप्त, ५७२ सर्वदृग् व्यासः - सबके द्रष्टा एवं वेदका विभाग करनेवाले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासस्वरूप, ५७३ वाचस्पतिरयोनिजः-विद्याके स्वामी तथा बिना योनिके स्वयं ही प्रकट होनेवाले ॥ ७४ ॥
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ७५ ॥
५७४ त्रिसामा -देवव्रत आदि तीन साम श्रुतियोंद्वारा जिनकी स्तुति की जाती है — ऐसे परमेश्वर, ५७५ सामगः सामवेदका गान करनेवाले, ५७६ साम- सामवेदस्वरूप, ५७७ निर्वाणम्- परमशान्तिके निधान परमानन्दस्वरूप, ५७८ भेषजम्- संसार- रोगकी ओषधि, ५७ ९ भिषक् - संसाररोगका नाश करनेके लिये गीतारूप उपदेशामृतका पान करानेवाले परम वैद्य, ५८० संन्यासकृत्- मोक्षके लिये संन्यासाश्रम और संन्यासयोगका निर्माण करनेवाले, ५८१ शमः -उपशमताका उपदेश देनेवाले, ५८२ शान्तः - परम शान्तस्वरूप, ५८३ निष्ठा- सबकी स्थितिके आधार अधिष्ठानस्वरूप, ५८४ शान्तिः - परम शान्तिस्वरूप, ५८५ परायणम्- मुमुक्षु पुरुषोंके परम प्राप्य स्थान ॥ ७५ ॥
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ७६ ॥
५८६ शुभाङ्गः-अति मनोहर परम सुन्दर अंगोंवाले, ५८७ शान्तिदः - परम शान्ति देनेवाले, ५८८ स्रष्टा- सर्गके आदिमें सबकी रचना करनेवाले, ५८९ कुमुदः - पृथ्वीपर प्रसन्नतापूर्वक लीला करनेवाले, ५ ९० कुवलेशयः-जलमें शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले, ५ ९ १ गोहितः- गोपालरूपसे गायोंका और अवतार धारण करके भार उतारकर पृथ्वीका हित करनेवाले, ५ ९ २ गोपतिः- पृथ्वीके और गायोंके स्वामी, ५ ९ ३ गोप्ता- अवतार धारण करके सबके सम्मुख प्रकट होते समय अपनी मायासे अपने स्वरूपको आच्छादित
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करनेवाले, ५ ९ ४ वृषभाक्षः-समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाली कृपादृष्टिसे युक्त, ५ ९ ५ वृषप्रियः - धर्मसे प्यार करनेवाले ॥ ७६ ॥
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ॥ ७७ ॥
५ ९ ६ अनिवर्ती - रणभूमिमें और धर्मपालनमें पीछे न हटनेवाले, ५ ९७ निवृत्तात्मा-स्वभावसे ही विषय- वासनारहित नित्य शुद्ध मनवाले, ५ ९८ संक्षेप्ता-विस्तृत जगत्को संहारकालमें संक्षिप्त यानी सूक्ष्म करनेवाले, ५ ९९ क्षेमकृत्- शरणागतकी रक्षा करनेवाले, ६०० शिवः - स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले कल्याणस्वरूप, ६०१ श्रीवत्सवक्षाः श्रीवत्स नामक चिह्नको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६०२ श्रीवासः-श्रीलक्ष्मीजीके वासस्थान, ६०३ श्रीपतिः - परमशक्तिरूपा श्रीलक्ष्मीजीके स्वामी, ६०४ श्रीमतां वरः- सब प्रकारकी सम्पत्ति और ऐश्वर्यसे युक्त ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंसे श्रेष्ठ ॥ ७७ ॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ७८ ॥
६०५ श्रीदः - भक्तोंको श्री प्रदान करनेवाले, ६०६ श्रीशः -लक्ष्मीके नाथ, ६०७ श्रीनिवासः - श्रीलक्ष्मीजीके अन्तःकरणमें नित्य निवास करनेवाले, ६०८ श्रीनिधिः समस्त श्रियोंके आधार, ६० ९ श्रीविभावनः- सब मनुष्योंके लिये उनके कर्मानुसार नाना प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, ६१० श्रीधरः -जगज्जननी श्रीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६११ श्रीकरः- स्मरण, स्तवन और अर्चन आदि करनेवाले भक्तोंके लिये श्रीका विस्तार करनेवाले, ६१२ श्रेयः-कल्याणस्वरूप, ६१३ श्रीमान्- सब प्रकारकी श्रियोंसे युक्त, ६१४ लोकत्रयाश्रयः-तीनों लोकोंके आधार ॥ ७८ ॥
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिज्र्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्माविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्न संशयः ॥ ७९ ॥
६१५ स्वक्षः - मनोहर कृपाकटाक्षसे युक्त परम सुन्दर आँखोंवाले, ६१६ स्वङ्गः-अतिशय कोमल, परम सुन्दर, मनोहर अंगोंवाले, ६१७ शतानन्दः - लीलाभेदसे सैकड़ों विभागोंमें विभक्त आनन्दस्वरूप, ६१८ नन्दिः - परमानन्दस्वरूप, ६१ ९ ज्योतिर्गणेश्वरः-नक्षत्रसमुदायोंके ईश्वर, ६२० विजितात्मा जिते हुए मनवाले, ६२१ अविधेयात्मा-जिनके असली स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके- ऐसे अनिर्वचनीयस्वरूप, ६२२ सत्कीर्तिः - सच्ची कीर्तिवाले, ६२३ छिन्नसंशयः - सब प्रकारके संशयोंसे रहित ॥ ७ ९ ॥
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ८० ॥
६२४ उदीर्णः - सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ, ६२५ सर्व तश्चक्षुः -समस्त वस्तुओंको सब दिशाओंमें सदा - सर्वदा देखनेकी शक्तिवाले, ६२६ अनीशः-जिनका दूसरा कोई शासक न
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हो– ऐसे स्वतन्त्र, ६२७ शाश्वतस्थिरः सदा एकरस स्थिर रहनेवाले, निर्विकार, ६२८ भूशयः - लंकागमनके लिये मार्गकी याचना करते समय समुद्रतटकी भूमिपर शयन -चिह्नोंसे, - -1करनेवाले ६२ ९ भूषणः स्वेच्छासे नाना अवतार लेकर अपने चरण भूमिकी शोभाबढ़ानेवाले, ६३० भूतिः - समस्त विभूतियोंके आधारस्वरूप, ६३१ विशोकः - सब प्रकारसे शोकरहित, ६३२ शोकनाशनः - स्मृतिमात्रसे भक्तोंके शोकका समूल नाश करनेवाले ॥ ८० ॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ८१ ॥
६३३ अर्चिष्मान् - चन्द्र- सूर्य आदि समस्त ज्योतियोंको देदीप्यमान करनेवाली अतिशय प्रकाशमय अनन्त किरणोंसे युक्त, ६३४ अर्चितः ब्रह्मादि समस्त लोकोंसे पूजे जानेवाले, ६३५ कुम्भः - घटकी भाँति सबके निवासस्थान, ६३६ विशुद्धात्मा- परम शुद्ध निर्मल आत्मस्वरूप, ६३७ विशोधनः - स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका नाश करके भक्तोंके अन्तःकरणको परम शुद्ध कर देनेवाले, ६३८ अनिरुद्धः - जिनको कोई बाँधकर नहीं रख सके — ऐसे चतुर्व्यूहमें अनिरुद्धस्वरूप, ६३ ९ अप्रतिरथः-प्रतिपक्षसे रहित, ६४० प्रद्युम्नः-परम श्रेष्ठ अपार धनसे युक्त चतुर्व्यूहमें प्रद्युम्नस्वरूप, ६४१ अमितविक्रमः - अपार पराक्रमी ॥ ८१ ॥
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ८२ ॥
६४२ कालनेमिनिहा- कालनेमि नामक असुरको मारनेवाले, ६४३ वीरः - परम शूरवीर, ६४४ शौरिः - शूरकुलमें उत्पन्न होनेवाले श्रीकृष्णस्वरूप, ६४५ शूरजनेश्वरः - अतिशय शूरवीरताके कारण इन्द्रादि शूरवीरोंके भी इष्ट, ६४६ त्रिलोकात्मा अन्तर्यामीरूपसे तीनों लोकोंके आत्मा, ६४७ त्रिलोकेशः-तीनों लोकोंके स्वामी, ६४८ केशवः- ब्रह्मा, विष्णु और शिव - स्वरूप, ६४ ९ केशिहा- केशी नामके असुरको मारनेवाले, ६५० हरिः - स्मरणमात्रसे समस्त पापोंका हरण करनेवाले ॥ ८२ ॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः ॥ ८३ ॥
६५१ कामदेवः - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंको चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओंके अधिष्ठाता परमदेव, ६५२ कामपालः - सकामी भक्तोंकी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले, ६५३ कामी- अपने प्रियतमोंको चाहनेवाले, ६५४ कान्तः - परम मनोहर स्वरूप, ६५५ कृतागमः - समस्त वेद और शास्त्रोंको रचनेवाले, ६५६ अनिर्देश्यवपुः - जिनके दिव्य स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके — ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले, ६५७ विष्णुः - शेषशायी भगवान् विष्णु, ६५८ वीरः- बिना ही पैरोंके गमन करनेकी दिव्य शक्तिसे युक्त, ६५ ९ अनन्तः -जिनके स्वरूप, शक्ति, ऐश्वर्य, सामर्थ्य
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और गुणोंका कोई भी पार नहीं पा सकता – ऐसे अविनाशी गुण, प्रभाव और शक्तियोंसे युक्त, ६६० धनञ्जयः - अर्जुनरूपसे दिग्विजयके समय बहुत सा धन जीतकर लानेवाले ॥ ८३ ॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ८४ ॥
६६१ ब्रह्मण्यः - तप, वेद, ब्राह्मण और ज्ञानकी रक्षा करनेवाले, ६६२ ब्रह्मकृत् - पूर्वोक्त तप आदिकी रचना करनेवाले, ६६३ ब्रह्मा ब्रह्मारूपसे जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ६६४ ब्रह्म - सच्चिदानन्दस्वरूप, ६६५ ब्रह्मविवर्धनः- पूर्वाक्त ब्रह्मशब्दवाची तप आदिकी वृद्धि करनेवाले, ६६६ ब्रह्मवित्- वेद और वेदार्थको पूर्णतया जाननेवाले, ६६७ ब्राह्मणः - समस्त वस्तुओंको ब्रह्मरूपसे देखनेवाले, ६६८ ब्रह्मी ब्रह्मशब्दवाची तपादि समस्त पदार्थोंके अधिष्ठान, ६६ ९ ब्रह्मज्ञः- अपने आत्मस्वरूप ब्रह्मशब्दवाची वेदको पूर्णतया यथार्थ जाननेवाले, ६७० ब्राह्मणप्रियः - ब्राह्मणोंको अतिशय प्रिय माननेवाले ॥ ८४ ॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ८५ ॥
६७१ महाक्रमः - बड़े वेगसे चलनेवाले, ६७२ महाकर्मा - भिन्न-भिन्न अवतारोंमें नाना प्रकारके महान् कर्म करनेवाले, ६७३ महातेजाः -जिसके तेजसे समस्त सूर्य आदि तेजस्वी देदीप्यमान होते हैं— ऐसे महान् तेजस्वी, ६७४ महोरगः-बड़े भारी सर्प यानी वासुकिस्वरूप, ६७५ महाक्रतुः -महान् यज्ञस्वरूप, ६७६ महायज्वा -लोकसंग्रहके लिये बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, ६७७ महायज्ञः-जपयज्ञ आदि भगवत्प्राप्तिके साधनरूप समस्त यज्ञ जिनकी विभूतियाँ हैं - ऐसे महान् यज्ञस्वरूप, ६७८ महाहविः-ब्रह्मरूप अग्निमें हवन किये जाने योग्य प्रपञ्चरूप हवि जिनका स्वरूप है — ऐसे महान् हविःस्वरूप ॥ ८५ ॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ८६ ॥
६७९ स्तव्यः - सबके द्वारा स्तुति किये जाने योग्य, ६८० स्तवप्रियः स्तुतिसे प्रसन्न होनेवाले, ६८१ स्तोत्रम्-जिनके द्वारा भगवान्के गुण-प्रभावका कीर्तन किया जाता है, वह स्तोत्र, ६८२ स्तुतिः - स्तवनक्रियास्वरूप, ६८३ स्तोता- स्तुति करनेवाले, ६८४ रणप्रियः-युद्धमें प्रेम करनेवाले, ६८५ पूर्ण: - समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण, ६८६ पूरयिता अपने भक्तोंको सब प्रकारसे परिपूर्ण करनेवाले, ६८७ पुण्यः - स्मरणमात्रसे पापोंका नाश करनेवाले पुण्यस्वरूप, ६८८ पुण्यकीर्तिः परमपावन कीर्तिवाले, ६८ ९ अनामयः - आन्तरिक और बाह्य सब प्रकारकी व्याधियोंसे रहित ॥ ८६ ॥
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ८७ ॥
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६ ९ ० मनोजवः - मनकी भाँति वेगवाले, ६ ९ १ तीर्थकर: -समस्त विद्याओंके रचयिता और उपदेशकर्ता, ६ ९ २ वसुरेताः - हिरण्यमय पुरुष ( प्रथम पुरुषसृष्टिका बीज ) जिनका वीर्य है — ऐसे सुवर्णवीर्य, ६ ९ ३ वसुप्रदः -प्रचुर धन प्रदान करनेवाले, ६ ९४ वसुप्रदः- अपने भक्तोंको मोक्षरूप महान् धन देनेवाले, ६ ९५ वासुदेवः - वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण, ६ ९ ६ वसुः-सबके अन्तःकरणमें निवास करनेवाले, ६९७ वसुमनाः समानभावसे सबमें निवास करनेकी शक्तिसे युक्त मनवाले, ६९८ हविः-यज्ञमें हवन किये जाने योग्य हविःस्वरूप ॥ ८७ ॥
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ८८ ॥
६ ९९ सद्गतिः - सत्पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य गतिस्वरूप, ७०० सत्कृतिः-जगत्की रक्षा आदि सत्कार्य करनेवाले, ७०१ सत्ता- सदा- सर्वदा विद्यमान सत्तास्वरूप, ७०२ सद्भूतिः -बहुत प्रकारसे बहुत रूपोंमें भासित होनेवाले, ७०३ सत्परायणः-सत्पुरुषोंके परम प्रापणीय स्थान, ७०४ शूरसेनः -हनुमानादि श्रेष्ठ शूरवीर योद्धाओंसे युक्त सेनावाले, ७०५ यदुश्रेष्ठः यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ, ७०६ सन्निवासः - सत्पुरुषोंके आश्रय, ७०७ सुयामुनः-जिनके परिकर यमुना तट निवासी गोपालबाल आदि अति सुन्दर हैं, ऐसे श्रीकृष्ण ॥ ८८ ॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ८ ९ ॥
७०८ भूतावासः - समस्त प्राणियोंके मुख्य निवास स्थान, ७०९ वासुदेवः - अपनी मायासे जगत्को आच्छादित करनेवाले परमदेव, ७१० सर्वासुनिलयः - समस्त प्राणियोंके आधार, ७११ अनलः - अपार शक्ति और सम्पत्तिसे युक्त, ७१२ दर्पहा- धर्मविरुद्ध मार्गमें चलनेवालोंके घमण्डको नष्ट करनेवाले, ७१३ दर्पदः- अपने भक्तोंको विशुद्ध उत्साह प्रदान करनेवाले, ७१४ दृप्तः-नित्यानन्दमग्न, ७१५ दुर्धरः-बड़ी कठिनतासे हृदयमें धारित होनेवाले, ७१६ अपराजितः- दूसरोंसे अजित ॥ ८९ ॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ ९ ० ॥
७१७ विश्वमूर्तिः-समस्त विश्व ही जिनकी मूर्ति है - ऐसे विराट्स्वरूप, ७१८ महामूर्तिः - बड़े रूपवाले, ७१ ९ दीप्तमूर्तिः स्वेच्छासे धारण किये हुए देदीप्यमान स्वरूपसे युक्त, ७२० अमूर्तिमान् -जिनकी कोई मूर्ति नहीं - ऐसे निराकार, ७२१ अनेकमूर्तिः - नाना अवतारोंमें स्वेच्छासे लोगोंका उपकार करनेके लिये बहुत मूर्तियोंको धारण करनेवाले, ७२२ अव्यक्तः - अनेक मूर्ति होते हुए भी जिनका स्वरूप किसी प्रकार व्यक्त न किया जा सके— ऐसे अप्रकटस्वरूप, ७२३ शतमूर्तिः - सैकड़ों मूर्तियोंवाले, ७२४ शताननः:-सैकड़ों-स् मुखोंवाले ॥ ९० ॥
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एको नैकः सवः कः किं यत् तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ९ १ ॥
७२५ एकः - सब प्रकारके भेद- भावोंसे रहित अद्वितीय, ७२६ नैकः - अवतार- भेदसे अनेक, ७२७ सवः -जिनमें सोमनामकी ओषधिका रस निकाला जाता है - ऐसे यज्ञ- स्वरूप, ७२८ कः - सुखस्वरूप, ७२ ९ किम्- विचारणीय ब्रह्मस्वरूप, ७३० यत्- स्वतःसिद्ध, ७३१ तत्- विस्तार करनेवाले, ७३२ पदमनुत्तमम्- मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य अत्युत्तम परमपदस्वरूप, ७३३ लोकबन्धुः-समस्त प्राणियोंके हित करनेवाले परम मित्र, ७३४ लोकनाथः - सबके द्वारा याचना किये जानेयोग्य लोकस्वामी, ७३५ माधवः - मधुकुलमें उत्पन्न होनेवाले, ७३६ भक्तवत्सलः - भक्तोंसे प्रेम करनेवाले ॥ ९ १ ॥
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ९ २ ॥
७३७ सुवर्णवर्णः - सोनेके समान पीतवर्णवाले, ७३८ हेमाङ्गः -सोनेके समान चमकीले अङ्गोंवाले, ७३ ९ वराङ्गः- परम श्रेष्ठ अंग- प्रत्यंगोंवाले, ७४० चन्दनाङ्गदी - चन्दनके लेप और बाजूबंदसे सुशोभित, ७४१ वीरहा शूरवीर असुरोंका नाश करनेवाले, ७४२ विषमः- जिनके समान दूसरा कोई नहीं - ऐसे अनुपम, ७४३ शून्यः - समस्त विशेषणोंसे रहित, ७४४ घृताशीः - अपने आश्रित जनोंके लिये कृपासे सने हुए द्रवित संकल्प करनेवाले, ७४५ अचलः - किसी प्रकार भी विचलित न होनेवाले - अविचल, ७४६ चलः - वायुरूपसे सर्वत्र गमन करनेवाले ॥ ९ २ ॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ९ ३ ॥
७४७ अमानी - स्वयं मान न चाहनेवाले, ७४८ मानदः- दूसरोंको मान देनेवाले, ७४ ९ मान्यः - सबके पूजनेयोग्य माननीय, ७५० लोकस्वामी-चौदह भुवनोंके स्वामी, ७५१ त्रिलोकधृक् - तीनों लोकोंको धारण करनेवाले, ७५२ सुमेधाः -अति उत्तम सुन्दर बुद्धिवाले, ७५३ मेधजः - यज्ञमें प्रकट होनेवाले, ७५४ धन्यः -नित्य कृतकृत्य होनेके कारण सर्वथा धन्यवादके पात्र, ७५५ सत्यमेधाः - सच्ची और श्रेष्ठ बुद्धिवाले, ७५६ धराधरः - अनन्त भगवान्के रूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ ९ ३ ॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ ९ ४ ॥
७५७ तेजोवृषः - अपने भक्तोंपर आनन्दमय तेजकी वर्षा करनेवाले, ७५८ द्युतिधरः-परम कान्तिको धारण करनेवाले, ७५९ सर्वशस्त्रभृतां वरः- समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, ७६० प्रग्रहः - भक्तोंके द्वारा अर्पित पत्र- पुष्पादिको ग्रहण करनेवाले, ७६१ निग्रहः - सबका निग्रह करनेवाले, ७६२ व्यग्रः- अपने भक्तोंको अभीष्ट फल देनेमें लगे हुए, ७६३ नैकशृङ्गः-