06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1481–1490
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1481–1490
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पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन भीष्म उवाच
इत्युक्तः स नृपस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।
शृणु राजन्नगस्त्यस्य माहात्म्यं ब्राह्मणस्य ह ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! वायु देवताके ऐसा कहनेपर भी राजा कार्तवीर्य अर्जुन चुपचाप ही बैठे रह गया, कुछ बोल न सका । तब वायुदेव पुनः उससे बोले — ' राजन्! अब ब्राह्मणजातीय अगसत्यका माहात्म्य सुनो- ॥ १ ॥
असुरैर्निर्जिता देवा निरुत्साहाश्च ते कृताः ।
यज्ञाश्चैषां हृताः सर्वे पितॄणां च स्वधास्तथा ॥ २ ॥
कर्मेज्या मानवानां च दानवैर्हेहयर्षभ ।
भ्रष्टैश्वर्यास्ततो देवाश्चेरुः पृथ्वीमिति श्रुतिः ॥ ३ ॥
‘ हैहयराज! प्राचीन समयमें असुरोंने देवताओंको परास्त करके उनका उत्साह नष्ट कर दिया । दानवोंने देवताओंके यज्ञ, पितरोंके श्राद्ध तथा मनुष्योंके कर्मानुष्ठान लुप्त कर दिये । तब अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हुए देवतालोग पृथ्वीपर मारे- मारे फिरने लगे । ऐसा सुननेमें आया है ॥ २-३ ॥
ततः कदाचित् ते राजन् दीप्तमादित्यवर्चसम् ।
ददृशुस्तेजसा युक्तमगस्त्यं विपुलव्रतम् ॥ ४ ॥
‘ राजन्! तदनन्तर एक दिन देवताओंने सूर्यके समान प्रकाशमान, तेजस्वी, दीप्तिमान् और महान् व्रतधारी अगस्त्यको देखा ॥ ४ ॥
अभिवाद्य तु तं देवाः पृष्ट्वा कुशलमेव च ।
इदमूचुर्महात्मानं वाक्यं काले जनाधिप ॥ ५ ॥
‘ जनेश्वर! उन्हें प्रणाम करके देवताओंने उनका कुशल- समाचार पूछा और समयपर उन महात्मासे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
दानवैर्युधि भग्नाः स्म तथैश्वर्याच्च भ्रंशिताः ।
तदस्मान्नो भयात् तीव्रात् त्राहि त्वं मुनिपुङ्गव ॥ ६ ॥
' मुनिवर! दानवोंने हमें युद्धमें हराकर हमारा ऐश्वर्य छीन लिया है । इस तीव्र भयसे आप हमारी रक्षा करें ' ॥ ६ ॥
इत्युक्तः स तदा देवैरगस्त्यः कुपितोऽभवत् ।
प्रजज्वाल च तेजस्वी कालाग्निरिव संक्षये ॥ ७ ॥
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' देवताओंके ऐसा कहनेपर तेजस्वी अगस्त्य मुनि कुपित हो गये और प्रलयकालके अग्निकी भाँति रोषसे जल उठे ॥ ७ ॥
तेन दीप्तांशुजालेन निर्दग्धा दानवास्तदा ।
अन्तरिक्षान्महाराज निपेतुस्ते सहस्रशः ॥ ८ ॥
‘ महाराज! उनकी प्रज्वलित किरणोंके स्पर्शसे उस समय सहस्रों दानव दग्ध होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ८ ॥
दह्यमानास्तु ते दैत्यास्तस्यागस्त्यस्य तेजसा ।
उभौ लोकौ परित्यज्य गताः काष्ठां तु दक्षिणाम् ॥ ९ ॥
‘ अगस्त्यके तेजसे दग्ध होते हुए दैत्य दोनों लोकोंका परित्याग करके दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ ९ ॥
बलिस्तु यजते यज्ञमश्वमेधं महीं गतः ।
येऽन्येऽधस्था महीस्थाश्च ते न दग्धा महासुराः ॥ १० ॥
‘ उस समय राजा बलि पृथ्वीपर आकर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे । अतः जो दैत्य उनके साथ पृथ्वीपर थे और दूसरे जो पातालमें थे, वे ही दग्ध होनेसे बचे ॥ १० ॥
ततो लोकाः पुनः प्राप्ताः सुरैः शान्तभयैर्नृप ।
अथैनमब्रुवन् देवा भूमिष्ठानसुरान् जहि ॥ ११ ॥
‘नरेश्वर! तत्पश्चात् देवताओंका भय शान्त हो जानेपर वे पुनः अपने - अपने लोकमें चले आये । तदनन्तर देवताओंने अगस्त्यजीसे फिर कहा - ' अब आप पृथ्वीपर रहनेवाले असुरोंका भी नाश कर डालिये ' ॥ ११ ॥
इत्युक्तः प्राह देवान् स न शक्तोऽस्मि महीगतान् ।
दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न शक्यामीति पार्थिव ॥ १२ ॥
' पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अगस्त्यजी उनसे बोले- ' अब मैं भूतलनिवासी
असुरोंको नहीं दग्ध कर सकता; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी ।
इसलिये यह कार्य मेरे लिये असम्भव है ' ॥ १२ ॥
एवं दग्धा भगवता दानवाः स्वेन तेजेसा ।
अगस्त्येन तदा राजंस्तपसा भावितात्मना ॥ १३ ॥
' राजन्! इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् अगस्त्यने अपने तप और तेजसे दानवोंको दग्ध कर दिया था ॥ १३ ॥
ईदृशश्चाप्यगस्त्यो हि कथितस्ते मयानघ ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमगस्त्यात् क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥
‘निष्पाप नरेश! अगस्त्य ऐसे प्रभावशाली बताये गये हैं, जो ब्राह्मण ही हैं । यह बात मैं कहता हूँ, तुम अगस्त्य मुनिसे श्रेष्ठ किसी क्षत्रियको जानते हो तो बताओ ' ॥ १४ ॥
भीष्म उवाच
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इत्युक्तः स तदा तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।
शृणु राजन् वसिष्ठस्य मुख्यं कर्म यशस्विनः ॥ १५ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! उनके ऐसा कहनेपर भी कार्तवीर्य अर्जुन चुप ही रहा । तब वायु देवता फिर बोले— ' राजन्! अब यशस्वी ब्राह्मण वसिष्ठ मुनिका श्रेष्ठ कर्म सुनो ॥ १५ ॥
आदित्याः सत्रमासन्त सरो वै मानसं प्रति ।
वसिष्ठं मनसा गत्वा ज्ञात्वा तत् तस्य गौरवम् ॥ १६ ॥
'एक समय देवताओंने वसिष्ठ मुनिके गौरवको जानकर मन- ही-मन उनकी शरण जाकर मानसरोवरके तटपर यज्ञ आरम्भ किया ॥ १६ ॥
यजमानांस्तु तान् दृष्ट्वा सर्वान् दीक्षानुकर्शितान् ।
हन्तुमैच्छन्त शैलाभाः खलिनो नाम दानवाः ॥ १७ ॥
‘ समस्त देवता यज्ञकी दीक्षा लेकर दुबले हो रहे थे । उन्हें यज्ञ करते देख पर्वतके समान शरीरवाले ‘ खली ' नामक दानवोंने उन सबको मार डालनेका विचार किया ( फिर तो दोनों दलोंमें युद्ध छिड़ गया) ॥ १७ ॥
अदूरात् तु ततस्तेषां ब्रह्मदत्तवरं सरः ।
हताहता वै तत्रैते जीवन्त्याप्लुत्य दानवाः ॥ १८ ॥
‘ उनके पास ही मानसरोवर था, जिसके लिये ब्रह्माजीके द्वारा दैत्योंको यह वरदान प्राप्त था कि ' इसमें डुबकी लगानेसे तुम्हें नूतन जीवन प्राप्त होगा'; अतः उस समय दानवोंमेंसे जो हताहत होते थे, उन्हें दूसरे दानव उठाकर सरोवरमें फेंक देते थे और वे उसके जलमें डुबकी लगाते ही जी उठते थे ॥ १८ ॥
ते प्रगृह्य महाघोरान् पर्वतान् परिघान् द्रुमान् ।
विक्षोभयन्तः सलिलमुत्थितं शतयोजनम् ॥ १ ९ ॥
अभ्यद्रवन्त देवांस्ते सहस्राणि दशैव हि ।
ततस्तैरर्दिता देवाः शरणं वासवं ययुः ॥ २० ॥
‘ फिर सरोवरके जलको सौ योजन ऊँचे उछालते तथा हाथमें महाघोर पर्वत, परिघ एवं वृक्ष लिये हुए वे देवताओंपर टूट पड़ते थे । उन दानवोंकी संख्या दस हजारकी थी । जब उन्होंने देवताओंको अच्छी तरह पीड़ित किया, तब वे भागकर इन्द्रकी शरणमें गये ॥ १ ९ -२० । |
स च तैर्व्यथितः शक्रो वसिष्ठं शरणं ययौ ।
ततोऽभयं ददौ तेभ्यो वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ २१ ॥
तदा तान् दुःखितान् ज्ञात्वा आनृशंस्यपरो मुनिः ।
अयत्नेनादहत् सर्वान् खलिनः स्वेन तेजसा ॥ २२ ॥
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' इन्द्रको भी उन दैत्योंसे भिड़कर महान् क्लेश उठाना पड़ा; अतः वे वसिष्ठजीकी शरणमें गये । तब उन भगवान् वसिष्ठ मुनिने, जो बड़े ही दयालु थे, देवताओंको दुखी जानकर उन्हें अभयदान दे दिया और बिना किसी प्रयत्नके ही अपने तेजसे उन समस्त खली नामके दानवोंको दग्ध कर डाला ॥ २१-२२ ॥
कैलासं प्रस्थितां चैव नदीं गङ्गां महातपाः ।
आनयत् तत्सरो दिव्यं तया भिन्नं च तत्सरः ॥ २३ ॥
सरो भिन्नं तया नद्या सरयूः सा ततोऽभवत् ।
हताश्च खलिनो यत्र स देशः खलिनोऽभवत् ॥ २४ ॥
' इतना ही नहीं -वे महातपस्वी मुनि कैलासकी ओर प्रस्थित हुई गंगा नदीको उस दिव्य सरोवरमें ले आये । गंगाजीने उसमें आते ही उस सरोवरका बाँध तोड़ डाला । गंगासे सरोवरका भेदन होनेपर जो स्रोत निकला, वही सरयू नदीके नामसे प्रसिद्ध हुआ । जिस स्थानपर खली नामक दानव मारे गये, वह देश खलिन नामसे विख्यात हुआ ॥ २३-२४ ॥
एवं सेन्द्रा वसिष्ठेन रक्षितास्त्रिदिवौकसः ।
ब्रह्मदत्तवराश्चैव हता दैत्या महात्मना ॥ २५ ॥
‘इस प्रकार महात्मा वसिष्ठने इन्द्रसहित देवताओंकी रक्षा की और ब्रह्माजीने जिनके लिये वर दिया था, ऐसे दैत्योंका भी संहार कर डाला ॥ २५ ॥
एतत् कर्म वसिष्ठस्य कथितं हि मयानघ ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं वसिष्ठात् क्षत्रियं वरम् ॥ २६ ॥
‘निष्पाप नरेश! मैंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठजीके इस कर्मका वर्णन किया है । मैं कहता हूँ, ब्राह्मण श्रेष्ठ है । यदि वसिष्ठसे बड़ा कोई क्षत्रिय है तो बताओ ' ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और कार्तवीर्य अर्जुनका संवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥
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षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः अत्रि और च्यवन ऋषिके प्रभावका वर्णन भीष्म उवाच
इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तूष्णीमभूद् वायुस्तमब्रवीत् ।
शृणु मे हैहयश्रेष्ठ कर्मात्रेः सुमहात्मनः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उनके ऐसा कहनेपर भी जब कार्तवीर्य अर्जुन कोई उत्तर न देकर चुप ही बैठा रहा, तब वायु देवता पुनः इस प्रकार बोले- हैहयश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे महात्मा अत्रिके महान् कर्मका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
घोरे तमस्ययुध्यन्त सहिता देवदानवाः ।
अविध्यत शरैस्तत्र स्वर्भानुः सोमभास्करौ ॥ २ ॥
' प्रचीन कालमें एक बार देवता और दानव सब घोर अन्धकारमें एक- दूसरेके साथ युद्ध करते थे । वहाँ राहुने अपने बाणोंसे चन्द्रमा और सूर्यको घायल कर दिया था ( इसलिये सब ओर घोर अन्धकार छा गया था ) ॥ २ ॥
अथ ते तमसा ग्रस्ता निहन्यन्ते स्म दानवैः ।
देवा नृपतिशार्दूल सहैव बलिभिस्तदा ॥ ३ ॥
नृपश्रेष्ठ! फिर तो अन्धकारमें फँसे हुए देवतालोग कुछ सूझ न पड़नेके कारण एक साथ ही बलवान् दानवोंके हाथसे मारे जाने लगे ॥ ३ ॥
असुरैर्वध्यमानास्ते क्षीणप्राणा दिवौकसः ।
अपश्यन्त तपस्यन्तमत्रिं विप्रं तपोधनम् ॥ ४ ॥
अथैनमब्रुवन् देवाः शान्तक्रोधं जितेन्द्रियम् ।
असुरैरिषुभिर्विद्धौ चन्द्रादित्याविमावुभौ ॥ ५ ॥
वयं वध्यामहे चापि शत्रुभिस्तमसावृते ।
नाधिगच्छाम शान्तिं च भयात् त्रायस्व नः प्रभो ॥ ६ ॥
असुरोंकी मार खाकर देवताओंकी प्राणशक्ति क्षीण हो चली और वे भागकर तपस्यामें संलग्नहुए तपोधन विप्रवर अत्रि मुनिके पास गये । वहाँ उन्होंने उन क्रोधशून्य जितेन्द्रिय मुनिका दर्शन किया और इस प्रकार कहा - ' प्रभो! असुरोंने अपने बाणोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यको घायल कर दिया है और अब घोर अन्धकार छा जानेके कारण हम भी शत्रुओंके हाथसे मारे जा रहे हैं । हमें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती है । आप कृपा करके हमारी रक्षा कीजिये ' ॥ ४–६ ॥ अत्रिरुवाच
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कथं रक्षामि भवतस्तेऽब्रुवंश्चन्द्रमा भव ।
तिमिरघ्नश्च सविता दस्युहन्ता च नो भव ॥ ७ ॥
अत्रिने कहा- मैं किस प्रकार आपलोगोंकी रक्षा करूँ? देवता बोले – ' आप अन्धकारको नष्ट करनेवाले चन्द्रमा और सूर्यका रूप धारण कीजिये और हमारे शत्रु बने हुए इन डाकू दानवोंका नाश कर डालिये ' ॥ ७ ॥
एवमुक्तस्तदात्रिर्वै तमोनुदभवच्छशी ।
अपश्यत् सौम्यभावाच्च सोमवत् प्रियदर्शनः ॥ ८ ॥
दृष्ट्वा नातिप्रभं सोमं तथा सूर्यं च पार्थिव ।
प्रकाशमकरोदत्रिस्तपसा स्वेन संयुगे ॥ ९ ॥
जगद् वितिमिरं चापि प्रदीप्तमकरोत् तदा ॥ १० ॥
पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अत्रिने अन्धकारको दूर करनेवाले चन्द्रमाका रूप धारण किया और सोमके समान देखनेमें प्रिय लगने लगे । उन्होंने शान्तभावसे देवताओंकी ओर देखा । उस समय चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभा मन्द देखकर अत्रिने अपनी तपस्यासे उस युद्धभूमिमें प्रकाश फैलाया तथा सम्पूर्ण जगत्को अन्धकारशून्य एवं आलोकित कर दिया ॥ ८–१० ॥
व्यजयच्छत्रुसंघांश्च देवानां स्वेन तेजसा ।
अत्रिणा दह्यमानांस्तान् दृष्ट्वा देवा महासुरान् ॥ ११ ॥
पराक्रमैस्तेऽपि तदा व्यघ्नन्नत्रिसुरक्षिताः ।
उद्भासितश्च सविता देवास्त्राता हतासुराः ॥ १२ ॥
उन्होंने अपने तेजसे ही देवताओंके शत्रुओंको परास्त कर दिया । अत्रिके तेजसे उन महान् असुरोंको दग्ध होते देख अत्रिसे सुरक्षित हुए देवताओंने भी उस समय पराक्रम करके उन दैत्योंको मार डाला । अत्रिने सूर्यको तेजस्वी बनाया, देवताओंका उद्धार किया और असुरोंको नष्ट कर दिया ॥ ११-१२ ॥
अत्रिणा त्वथ सामर्थ्यं कृतमुत्तमतेजसा ।
द्विजेनाग्निद्वितीयेन जपता चर्मवाससा ॥ १३ ॥
फलभक्षेण राजर्षे पश्य कर्मात्रिणा कृतम् ।
तस्यापि विस्तरेणोक्तं कर्मात्रेः सुमहात्मनः ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमत्रितः क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥
अत्रि मुनि गायत्रीका जप करनेवाले, मृगचर्मधारी, फलाहारी, अग्निहोत्री और उत्तम तेजसे युक्त ब्राह्मण हैं । उन्होंने जो सामर्थ्य दिखलाया, जैसा महान् कर्म किया, उसपर दृष्टिपात करो । मैंने उन उत्तम महात्मा अत्रिका भी कर्म विस्तारपूर्वक बताया है । मैं कहता
हूँ ब्राह्मण श्रेष्ठ है । तुम बताओ अत्रिसे श्रेष्ठ कौन क्षत्रिय है? ॥ १३-१४ ॥
इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।
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शृणु राजन् महत्कर्म च्यवनस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी अर्जुन चुप ही रहा । तब वायु देवता फिर कहने लगे — राजन्! अब महात्मा च्यवनके माहात्म्यका वर्णन सुनो ॥ १५ ॥
अश्विनोः प्रतिसंश्रुत्य च्यवनः पाकशासनम् ।
प्रोवाच सहितो देवैः सोमपावश्विनौ कुरु ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंको सोमपान करानेकी प्रतिज्ञा करके इन्द्रसे कहा — ‘ देवराज! आप दोनों अश्विनीकुमारोंको देवताओंके साथ सोमपानमें सम्मिलित कर लीजिये ' ॥ १६ ॥
इन्द्र उवाच
अस्माभिर्निन्दितावेतौ भवेतां सोमपौ कथम् ।
देवैर्न सम्मितावेतौ तस्मान्मैवं वदस्व नः ॥ १७ ॥
इन्द्र बोले — विप्रवर! अश्विनीकुमार हमलोगोंके द्वारा निन्दित हैं । फिर ये सोमपानके अधिकारी कैसे हो सकते हैं । ये दोनों देवताओंके समान प्रतिष्ठित नहीं हैं; अतः उनके लिये इस तरहकी बात न कीजिये ॥ १७ ॥
अश्विभ्यां सह नेच्छामः सोमं पातुं महाव्रत ।
यदन्यद् वक्ष्यसे विप्र तत् करिष्यामि ते वचः ॥ १८ ॥
महान् व्रतधारी विप्रवर! हमलोग अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करना नहीं चाहते हैं । अतः इसको छोड़कर आप और जिस कामके लिये मुझे आज्ञा देंगे, उसे अवश्य मैं पूर्ण करूँगा ॥ १८ ॥
च्यवन उवाच
पिबेतामश्विनौ सोमं भवद्भिः सहिताविमौ ।
उभावेतावपि सुरौ सूर्यपुत्रौ सुरेश्वर ॥ १ ९ ॥
च्यवन बोले- देवराज! अश्विनीकुमार भी सूर्यके पुत्र होनेके कारण देवता ही हैं । अतः ये आप सब लोगोंके साथ निश्चय ही सोमपान कर सकते हैं ॥ १ ९ ॥
क्रियतां मद्वचो देवा यथा वै समुदाहृतम् ।
एतद् वः कुर्वतां श्रेयो भवेन्नैतदकुर्वताम् ॥ २० ॥
देवताओ! मैंने जैसी बात कही है, उसे आपलोग स्वीकार करें । ऐसा करनेमें ही आपलोगोंकी भलाई है; अन्यथा इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा ॥ २० ॥
इन्द्र उवाच
अश्विभ्यां सह सोमं वै न पास्यामि द्विजोत्तम ।
पिबन्त्वन्ये यथाकामं नाहं पातुमिहोत्सहे ॥ २१ ॥
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इन्द्रने कहा—द्विजश्रेष्ठ! निश्चय ही मैं दोनों अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान नहीं करूँगा । अन्य देवताओंकी इच्छा हो तो उनके साथ सोमरस पीयें । मैं तो नहीं पी सकता ॥ २१ ॥
च्यवन उवाच
न चेत् करिष्यसि वचो मयोक्तं बलसूदन ।
मया प्रमथितः सद्यः सोमं पास्यसि वै मखे ॥ २२ ॥
च्यवनने कहा — बलसूदन! यदि तुम सीधी तरह मेरी कही हुई बात नहीं मानोगे तो यज्ञमें मेरे द्वारा तुम्हारा अभिमान चूर्ण कर दिया जायगा, फिर तो तत्काल ही तुम सोमरस पीने लगोगे ॥ २२ ॥
वायुरुवाच
ततः कर्म समारब्धं हिताय सहसाश्विनोः ।
च्यवनेन ततो मन्त्रैरभिभूताः सुराऽभवन् ॥ २३ ॥
वायुदेवता कहते हैं - तदनन्तर च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंके हितके लिये सहसा यज्ञ आरम्भ किया । उनके मन्त्रबलसे समस्त देवता प्रभावित हो गये ॥ २३ ॥
तत् तु कर्म समारब्धं दृष्ट्वेन्द्रः क्रोधमूर्च्छितः ।
उद्यम्य विपुलं शैलं च्यवनं समुपाद्रवत् ॥ २४ ॥
उस यज्ञकर्मका आरम्भ होता देख इन्द्र क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और हाथमें एक विशाल पर्वत लेकर वे च्यवन मुनिकी ओर दौड़े ॥ २४ ॥
तथा वज्रेण भगवानमर्षाकुललोचनः ।
तमापतन्तं दृष्ट्वैव च्यवनस्तपसान्वितः ॥ २५ ॥
अद्भिः सिक्त्वास्तम्भयत् तं सवज्रं सहपर्वतम् । उस समय उनके नेत्र अमर्षसे आकुल हो रहे थे । भगवान् इन्द्रने वज्रके द्वारा भी मुनिपर आक्रमण किया । उनको आक्रमण करते देख तपस्वी च्यवनने जलका छींटा देकर वज्र और पर्वतसहित इन्द्रको स्तम्भित कर दिया-जडवत् बना दिया ॥ २५३ ॥
अथेन्द्रस्य महाघोरं सोऽसृजच्छत्रुमेव हि ॥ २६ ॥
मदं नामाहुतिमयं व्यादितास्यं महामुनिः ।
तस्य दन्तसहस्रं तु बभूव शतयोजनम् ॥ २७ ॥
द्वियोजनशतास्तस्य दंष्ट्राः परमदारुणाः ।
हनुस्तस्याभवद् भूमावास्यं चास्यास्पृशद् दिवम् ॥ २८ ॥
जिह्वामूले स्थितास्तस्य सर्वे देवाः सवासवाः ।
तिमेरास्यमनुप्राप्ता यथा मत्स्या महार्णवे ॥ २ ९ ॥
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इसके बाद उन महामुनिने अग्निमें आहुति डालकर इन्द्रके लिये एक अत्यन्त भयंकर शत्रु उत्पन्न किया, जिसका नाम मद था । वह मुँह फैलाकर खड़ा हो गया । उसकी ठोढ़ीका भाग जमीनमें सटा हुआ था और ऊपरवाला ओठ आकाशको छू रहा था । उसके मुँहके भीतर एक हजार दाँत थे, जो सौ - सौ योजन ऊँचे थे और उसकी भयंकर दाढ़ें दो - दो सौ योजन लंबी थीं । उस समय इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उसकी जिह्वाकी जड़में आ गये, ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें बहुत- से मत्स्य तिमि नामक महामत्स्यके मुखमें पड़ गये हों ॥ २६–२९ ॥
ते सम्मन्त्र्य ततो देवा मदस्यास्यसमीपगाः ।
अब्रुवन् सहिताः शक्रं प्रणमास्मै द्विजातये ॥ ३० ॥
अश्विभ्यां सह सोमं च पिबाम विगतज्वराः । फिर तो मदके मुखमें पड़े हुए देवताओंने आपसमें सलाह करके इन्द्रसे कहा
–‘देवराज! आप विप्रवर च्यवनको प्रणाम कीजिये ( इनसे विरोध करना अच्छा नहीं है ) ।
हमलोग निश्चिन्त होकर अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करेंगे' ॥ ३० ॥
ततः स प्रणतः शक्रश्चकार च्यवनस्य तत् ॥ ३१ ॥
च्यवनः कृतवानेतावश्विनौ सोमपायिनौ ।
ततः प्रत्याहरत् कर्म मदं च व्यभजन्मुनिः ॥ ३२ ॥
अक्षेषु मृगयायां च पाने स्त्रीषु च वीर्यवान् ॥ ३३ ॥
यह सुनकर इन्द्रने महामुनि च्यवनके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली । फिर च्यवनने अश्विनीकुमारोंको सोमरसका भागी बनाया और अपना यज्ञ समाप्त कर दिया । इसके बाद शक्तिशाली मुनिने जुआ, शिकार, मदिरा और स्त्रियोंमें मदको बाँट दिया ॥ ३१–३३ ॥
एतैर्दोषैर्नरा राजन् क्षयं यान्ति न संशयः ।
तस्मादेतान् नरो नित्यं दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ३४ ॥
राजन्! इन दोषोंसे युक्त मनुष्य अवश्य ही नाशको प्राप्त होते हैं, इसमें संशय नहीं है । अतः इन्हें सदाके लिये दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ३४ ॥
एतत् ते च्यवनस्यापि कर्म राजन् प्रकीर्तितम् ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं क्षत्रियं ब्राह्मणाद् वरम् ॥ ३५ ॥
नरेश्वर! यह तुमसे च्यवन मुनिका महान् कर्म भी बताया गया । मैं कहता हूँ– ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा तुम, बताओ कौन- सा क्षत्रिय ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है? ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और अ संवादविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १५६ ॥