06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1491–1500
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1491–1500
पृष्ठ 1491
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार भीष्म उवाच
तूष्णीमासीदर्जुनस्तु पवनस्त्वब्रवीत् पुनः ।
शृणु मे ब्राह्मणेष्वेव मुख्यं कर्म जनाधिप ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इतनेपर भी कार्तवीर्य चुप ही रहा । तब वायु देवताने फिर कहा — नरेश्वर! ब्राह्मणोंके और भी जो श्रेष्ठ कर्म हैं, उनका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
मदस्यास्यमनुप्राप्ता यदा सेन्द्रा दिवौकसः ।
तदैव च्यवनेनेह हृता तेषां वसुन्धरा ॥ २ ॥
जब इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मदके मुखमें पड़ गये थे, उसी समय च्यवनने उनके अधिकारकी सारी भूमि हर ली थी ( तथा कप नामक दानवोंने उनके स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लिया था ) ॥ ||
उभौ लोकौ हृतौ मत्वा ते देवा दुःखिताऽभवन् ।
शोकार्ताश्च महात्मानं ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ ३ ॥
अपने दोनों लोकोंका अपहरण हुआ जान वे देवता बहुत दुःखी हो गये और शोकसे आतुर हो महात्मा ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ३ ॥
देवा ऊचुः
मदास्यव्यतिषक्तानामस्माकं लोकपूजित ।
च्यवनेन हृता भूमिः कपैश्चैव दिवं प्रभो ॥ ४ ॥
देवता बोले — लोकपूजित प्रभो! जिस समय हम मदके मुखमें पड़ गये थे, उस समय च्यवनने हमारी भूमि हर ली थी और कप नामक दानवोंने स्वर्गलोकपर अधिकार कर लिया ॥ ४ ॥
ब्रह्मोवाच
गच्छध्वं शरणं विप्रानाशु सेन्द्रा दिवौकसः ।
प्रसाद्य तानुभौ लोकाववाप्स्यथ यथा पुरा ॥ ५ ॥
ब्रह्माजी ने कहा - इन्द्रसहित देवताओ! तुमलोग शीघ्र ही ब्राह्मणोंकी शरणमें जाओ ।
उन्हें प्रसन्न कर लेनेपर तुमलोग पहलेकी भाँति दोनों लोक प्राप्त कर लोगे ॥ ५ ॥
पृष्ठ 1492
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ते ययुः शरणं विप्रानूचुस्ते कान् जयामहे ।
इत्युक्तास्ते द्विजान् प्राहुर्जयतेह कपानिति ॥ ६ ॥
तब देवतालोग ब्राह्मणोंकी शरणमें गये । ब्राह्मणोंने पूछा- ' हम किनको जीतें? ' उनके इस तरह पूछनेपर देवताओंने ब्राह्मणोंसे कहा- ' आपलोग कप नामक दानवोंको परास्त कीजिये ' ॥ ६ ॥
भूगतान् हि विजेतारो वयमित्यब्रुवन् द्विजाः ।
ततः कर्म समारब्धं ब्राह्मणैः कपनाशनम् ॥ ७ ॥
तब ब्राह्मणोंने कहा—' हम उन दानवोंको पृथ्वीपर लाकर परास्त करेंगे। ' तदनन्तर ब्राह्मणोंने कपविनाशक कर्म आरम्भ किया ॥ ७ ॥
तच्छ्रुत्वा प्रेषितो दूतो ब्राह्मणेभ्यो धनी कपैः ।
स च तान् ब्राह्मणानाह धनी कपवचो यथा ॥ ८ ॥
इसका समाचार सुनकर कपोंने ब्राह्मणोंके पास अपना धनी नामक दूत भेजा, उसने उन ब्राह्मणोंसे कपोंका संदेश इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥
भवद्भिः सदृशाः सर्वे कपाः किमिह वर्तते ।
सर्वे वेदविदः प्राज्ञाः सर्वे च क्रतुयाजिनः ॥ ९ ॥
सर्वे सत्यव्रताश्चैव सर्वे तुल्या महर्षिभिः ।
श्रीश्चैव रमते तेषु धारयन्ति श्रियं च ते ॥ १० ॥
‘ ब्राह्मणो! समस्त कप नामक दानव आपलोगोंके ही समान हैं । फिर उनके विरुद्ध यहाँ क्या हो रहा है? सभी कप वेदोंके ज्ञाता और विद्वान् हैं । सब- के - सब यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं । सभी सत्यप्रतिज्ञ हैं और सब- के - सब महर्षियोंके तुल्य हैं। श्री उनके यहाँ रमण करती है और वे श्रीको धारण करते हैं ' ॥ ९ -१० ॥
वृथादारान् न गच्छन्ति वृथामांसं न भुञ्जते ।
दीप्तमग्निं जुह्वते च गुरूणां वचने स्थिताः ॥ ११ ॥
‘ वे परायी स्त्रियोंसे समागम नहीं करते । मांसको व्यर्थ समझकर उसे कभी नहीं खाते हैं । प्रज्वलित अग्निमें आहुति देते और गुरुजनोंकी आज्ञामें स्थित रहते हैं ॥ ११ ॥
सर्वे च नियतात्मानो बालानां संविभागिनः ।
उपेत्य शनकैर्यान्ति न सेवन्ति रजस्वलाम् ।
स्वर्गतिं चैव गच्छन्ति तथैव शुभकर्मिणः ॥ १२ ॥
‘ वे सभी अपने मनको संयममें रखते हैं । बालकोंको उनका भाग बाँट देते हैं । निकट आकर धीरे - धीरे चलते हैं। रजस्वला स्त्रीका कभी सेवन नहीं करते । शुभकर्म करते हैं और स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ १२ ॥
अभुक्तवत्सु नाश्नन्ति गर्भिणीवृद्धकादिषु ।
पूर्वाह्णेषु न दीव्यन्ति दिवा चैव न शेरते ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1493
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' गर्भवती स्त्री और वृद्ध आदिके भोजन करनेसे पहले भोजन नहीं करते हैं । पूर्वाह्णमें जुआ नहीं खेलते और दिनमें नींद नहीं लेते हैं ॥ १३ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्गुणैर्युक्तान् कथं कपान् ।
विजेष्यथ निवर्तध्वं निवृत्तानां सुखं हि वः ॥ १४ ॥
'इनसे तथा अन्य बहुत - से गुणोंद्वारा संयुक्त हुए कप नामक दानवोंको आपलोग क्यों पराजित करना चाहते हैं? इस अवांछनीय कार्यसे निवृत्त होइये, क्योंकि निवृत्त होनेसे ही आपलोगोंको सुख मिलेगा' ॥ १४ ॥
ब्राह्मणा ऊचुः
कपान्वयं विजेष्यामो ये देवास्ते वयं स्मृताः ।
तस्माद् वध्याः कपाऽस्माकं धनिन् याहि यथाऽऽगतम् ॥ १५ ॥
तब ब्राह्मणोंने कहा- जो देवता हैं, वे हमलोग हैं; अतः देवद्रोही कप हमारे लिये वध्य हैं । इसलिये हम कपोंके कुलको पराजित करेंगे । धनी! तुम जैसे आये हो उसी तरह लौट जाओ ॥ १५ ॥
धनी गत्वा कपानाह न वो विप्राः प्रियंकराः ।
गहीत्वास्त्राण्यतो विप्रान् कपाः सर्वे समाद्रवन् ॥ १६ ॥
धनीने जाकर कपोंसे कहा- 'ब्राह्मणलोग आपका प्रिय करनेको उद्यत नहीं हैं । '. यह सुनकर अस्त्र- शस्त्र हाथमें ले सभी कप ब्राह्मणोंपर टूट पड़े ॥ १६ ॥
समुदग्रध्वजान् दृष्ट्वा कपान् सर्वे द्विजातयः ।
व्यसृजन् ज्वलितानग्नीन् कपानां प्राणनाशनान् ॥ १७ ॥
उनकी ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं । कपोंको आक्रमण करते देख सभी ब्राह्मण उन कपोंपर प्रज्वलित एवं प्राणनाशक अग्निका प्रहार करने लगे ॥ १७ ॥
ब्रह्मसृष्टा हव्यभुजः कपान् हत्वा सनातनाः ।
नभसीव यथाभ्राणि व्यराजन्त नराधिप ॥ १८ ॥
नरेश्वर! ब्राह्मणोंके छोड़े हुए सनातन अग्निदेव उन कपोंका संहार करके आकाशमें बादलोंके समान प्रकाशित होने लगे ॥ १८ ॥
हत्वा वै दानवान् देवाः सर्वे सम्भूय संयुगे ।
तेनाभ्यजानन् हि तदा ब्राह्मणैर्निहतान् कपान् ॥ १ ९ ॥
उस समय सब देवताओंने युद्धमें संगठित होकर दानवोंका संहार कर डाला । किंतु उस समय उन्हें यह मालूम नहीं था कि ब्राह्मणोंने कपोंका विनाश कर डाला है ॥ १ ९ ॥
अथागम्य महातेजा नारदोऽकथयद् विभो ।
यथा हता महाभागैस्तेजसा ब्राह्मणैः कपाः ॥ २० ॥
पृष्ठ 1494
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रभो! तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने आकर यह बात बतायी कि किस प्रकार महाभाग ब्राह्मणोंने अपने तेजसे कपोंका नाश किया है ॥ २० ॥
नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रीताः सर्वे दिवौकसः ।
प्रशशंसुर्द्विजांश्चापि ब्राह्मणांश्च यशस्विनः ॥ २१ ॥
नारदजीकी बात सुनकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने द्विजों और यशस्वी ब्राह्मणोंकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ २१ ॥
तेषां तेजस्तथा वीर्यं देवानां ववृधे ततः ।
अवाप्नुवंश्चामरत्वं त्रिषु लोकेषु पूजितम् ॥ २२ ॥
तदनन्तर देवताओंके तेज और पराक्रमकी वृद्धि होने लगी । उन्होंने तीनों लोकोंमें सम्मानित होकर अमरत्व प्राप्त कर लिया ॥ २२ ॥
इत्युक्तवचनं वायुमर्जुनः प्रत्युवाच ह ।
प्रतिपूज्य महाबाहो यत् तच्छृणु युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
महाबाहु युधिष्ठिर! जब वायुने इस प्रकार ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाया, तब कार्तवीर्य अर्जुनने उनके वचनोंकी प्रशंसा करके जो उत्तर दिया, उसे सुनो ॥ २३ ॥
अर्जुन उवाच
जीवाम्यहं ब्राह्मणार्थं सर्वथा सततं प्रभो ।
ब्रह्मण्यो ब्राह्मणेभ्यश्च प्रणमामि च नित्यशः ॥ २४ ॥
अर्जुन बोला- प्रभो! मैं सब प्रकारसे और सदा ब्राह्मणोंके लिये ही जीवन धारण करता हूँ, ब्राह्मणोंका भक्त हूँ और प्रतिदिन ब्राह्मणोंको प्रणाम करता हूँ ॥ २४ ॥
दत्तात्रेयप्रसादाच्च मया प्राप्तमिदं बलम् ।
लोके च परमा कीर्तिर्धर्मश्चाचरितो महान् ॥ २५ ॥
विप्रवर दत्तात्रेयजीकी कृपासे मुझे इस लोकमें महान् बल, उत्तम कीर्ति और महान् धर्मकी प्राप्ति हुई है ॥ २५ ॥
अहो ब्राह्मणकर्माणि मया मारुत तत्त्वतः ।
त्वया प्रोक्तानि कार्त्स्न्येन श्रुतानि प्रयतेन च ॥ २६ ॥
वायुदेव! बड़े हर्षकी बात है कि आपने मुझसे ब्राह्मणोंके अद्भुत कर्मोंका यथावत् वर्णन किया और मैंने ध्यान देकर उन सबको श्रवण किया है ॥ २६ ॥
वायुरुवाच
ब्राह्मणान् क्षात्रधर्मेण पालयस्वेन्द्रियाणि च ।
भृगुभ्यस्ते भयं घोरं तत् तु कालाद् भविष्यति ॥ २७ ॥
वायुने कहा- राजन्! तुम क्षत्रिय धर्मके अनुसार ब्राह्मणोंकी रक्षा और इन्द्रियोंका संयम करो । तुम्हें भृगुवंशी ब्राह्मणोंसे घोर भय प्राप्त होनेवाला है; परंतु यह दीर्घकालके
पृष्ठ 1495
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पश्चात् सम्भव होगा ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेव और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
पृष्ठ 1496
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः भीष्मजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणानर्चसे राजन् सततं संशितव्रतान् ।
कं तु कर्मोदयं दृष्ट्वा तानर्चसि जनाधिप ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजन्! आप सदा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंकी पूजा किया करते थे । अतः जनेश्वर! मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन - सा लाभ देखकर उनका पूजन करते थे? ॥ १ ॥
कां वा ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा महाव्रत ।
तानर्चसि महाबाहो सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ २ ॥
महान् व्रतधारी महाबाहो! ब्राह्मणोंकी पूजासे भविष्यमें मिलनेवाले किस फलकी ओर दृष्टि रखकर आप उनकी आराधना करते थे? यह सब मुझे बताइये ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
एष ते केशवः सर्वमाख्यास्यति महामतिः ।
व्युष्टिं ब्राह्मणपूजायां दृष्टव्युष्टिर्महाव्रतः ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! ये महान् व्रतधारी परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण ब्राह्मण- पूजासे होनेवाले लाभका प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके हैं; अतः वही तुमसे इस विषयकी सारी बातें बतायेंगे ॥ ३ ॥
बलं श्रोत्रे वाङ्मनश्चक्षुषी च ज्ञानं तथा सविशुद्धं ममाद्य । देहन्यासो नातिचिरान्मतो मे न चाति तूर्णं सविताद्य याति ॥ ४ ॥
आज मेरा बल, मेरे कान, मेरी वाणी, मेरा मन और मेरे दोनों नेत्र तथा मेरा विशुद्ध ज्ञान भी सब एकत्रित हो गये हैं । अतः जान पड़ता है कि अब मेरा शरीर छूटनेमें अधिक विलम्ब नहीं है । आज सूर्यदेव अधिक तेजीसे नहीं चलते हैं ॥ ४ ॥
उक्ता धर्मा ये पुराणे महान्तो राजन् विप्राणां क्षत्रियाणां विशां च । तथा शूद्राणां धर्ममुपासते च शेषं कृष्णादुपशिक्षस्व पार्थ ॥ ५ ॥
पृष्ठ 1497
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पार्थ! पुराणोंमें जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके ( अलग- अलग) धर्म बतलाये गये हैं तथा सब वर्णोंके लोग जिस- जिस धर्मकी उपासना करते हैं, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया है । अब जो कुछ बाकी रह गया हो, उसकी भगवान् श्रीकृष्णसे शिक्षा लो ॥ ५ ॥
अहं ह्येनं वेद्मि तत्त्वेन कृष्णं योऽयं हि यच्चास्य बलं पुराणम् । अमेयात्मा केशवः कौरवेन्द्र सोऽयं धर्मं वक्ष्यति संशयेषु ॥ ६ ॥
इन श्रीकृष्णका जो स्वरूप है और जो इनका पुरातन बल है, उसे ठीक - ठीक मैं जानता हूँ । कौरवराज! भगवान् श्रीकृष्ण अप्रमेय हैं; अतः तुम्हारे मनमें संदेह होनेपर यही तुम्हें धर्मका उपदेश करेंगे ॥ ६ ॥
कृष्णः पृथ्वीमसृजत् खं दिवं च कृष्णस्य देहान्मेदिनी सम्बभूव । वराहोऽयं भीमबलः पुराणः स पर्वतान् व्यसृजद् वै दिशश्च ॥ ७ ॥
श्रीकृष्णने ही इस पृथ्वी, आकाश और स्वर्गकी सृष्टि की है । इन्हींके शरीरसे पृथ्वीका प्रादुर्भाव हुआ है । यही भयंकर बलवाले वराहके रूपमें प्रकट हुए थे तथा इन्हीं पुराण-पुरुषने पर्वतों और दिशाओंको उत्पन्न किया है ॥ ७ ॥
अस्य चाधोऽथान्तरिक्षं दिवं च दिशश्चतस्रो विदिशश्चतस्रः । सृष्टिस्तथैवेयमनुप्रसूता स निर्ममे विश्वमिदं पुराणम् ॥ ८ ॥
अन्तरिक्ष, स्वर्ग, चारों दिशाएँ तथा चारों कोण– ये सब भगवान् श्रीकृष्णसे नीचे हैं । इन्हींसे सृष्टिकी परम्परा प्रचलित हुई है तथा इन्होंने ही इस प्राचीन विश्वका निर्माण किया है ॥ ८ ॥
अस्य नाभ्यां पुष्करं सम्प्रसूतं यत्रोत्पन्नः स्वयमेवामितौजाः । तेनाच्छिन्नं तत् तमः पार्थ घोरं यत् तत् तिष्ठत्यर्णवं तर्जयानम् ॥ ९ ॥
कुन्तीनन्दन! सृष्टिके आरम्भमें इनकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ और उसीके भीतर अमित तेजस्वी ब्रह्माजी स्वतः प्रकट हुए। जिन्होंने उस घोर अन्धकारका नाश किया है, जो समुद्रको भी डाँट बताता हुआ सब ओर व्याप्त हो रहा था ( अर्थात् जो अगाध और अपार था ) ॥ ९ ॥
कृते युगे धर्म आसीत् समग्र-
पृष्ठ 1498
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्त्रेताकाले ज्ञानमनुप्रपन्नः । बलं त्वासीद् द्वापरे पार्थ कृष्णः कलौ त्वधर्मः क्षितिमेवाजगाम ॥ १० ॥
पार्थ! सत्ययुगमें श्रीकृष्ण सम्पूर्ण धर्मरूपसे विराजमान थे, त्रेतामें पूर्णज्ञान या विवेकरूपमें स्थित थे, द्वापरमें बलरूपसे स्थित हुए थे और कलियुगमें अधर्मरूपसे इस पृथ्वीपर आयेंगे ( अर्थात् उस समय अधर्म ही बलवान् होगा ) ॥ १० ॥
स एव पूर्वं निजघान दैत्यान् स पूर्वदेवश्च बभूव सम्राट् । स भूतानां भावनो भूतभव्यः स विश्वस्यास्य जगतश्चाभिगोप्ता ॥ ११ ॥
इन्होंने ही प्रचीनकालमें दैत्योंका संहार किया और ये ही दैत्यसम्राट् बलिके रूपमें प्रकट हुए । ये भूतभावन प्रभु ही भूत और भविष्य इनके ही स्वरूप हैं तथा ये ही इस सम्पूर्ण जगत्के रक्षा करनेवाले हैं ॥ ११ ॥
यदा धर्मो ग्लाति वंशे सुराणां तदा कृष्णो जायते मानुषेषु । धर्मे स्थित्वा स तु वै भावितात्मा परांश्च लोकानपरांश्च पाति ॥ १२ ॥
जब धर्मका ह्रास होने लगता है, तब ये शुद्ध अन्तःकरणवाले श्रीकृष्ण देवताओं तथा मनुष्योंके कुलमें अवतार लेकर स्वयं धर्ममें स्थित हो उसका आचरण करते हुए उसकी स्थापना तथा पर और अपर लोकोंकी रक्षा करते हैं ॥ १२ ॥
त्याज्यं त्यक्त्वा चासुराणां वधाय कार्याकार्ये कारणं चैव पार्थ । कृतं करिष्यत् क्रियते च देवो राहुं सोमं विद्धि च शक्रमेनम् ॥ १३ ॥
कुन्तीनन्दन! ये त्याज्य वस्तुका त्याग करके असुरोंका वध करनेके लिये स्वयं कारण बनते हैं । कार्य, अकार्य और कारण सब इन्हींके स्वरूप हैं । ये नारायणदेव ही भूत, भविष्य और वर्तमान कालमें किये जानेवाले कर्मरूप हैं । तुम इन्हींको राहु, चन्द्रमा और इन्द्र समझो ॥ १३ ॥
स विश्वकर्मा स हि विश्वरूपः
स विश्वभुग् विश्वसृग् विश्वजिच्च ।
स शूलभृच्छोणितभृत् कराल- स्तं कर्मभिर्विदितं वै स्तुवन्ति ॥ १४ ॥
पृष्ठ 1499
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीकृष्ण ही विश्वकर्मा, विश्वरूप, विश्वभोक्ता, विश्वविधाता और विश्वविजेता हैं । वे ही एक हाथमें त्रिशूल और दूसरे हाथमें रक्तसे भरा खप्पर लिये विकरालरूप धारण करते हैं । अपने नाना प्रकारके कर्मोंसे जगत्में विख्यात हुए श्रीकृष्णकी ही सब लोग स्तुति करते ॥ १४ ॥
तं गन्धर्वाणामप्सरसां च नित्य- मुपतिष्ठन्ते विबुधानां शतानि । तं राक्षसाश्च परिसंवदन्ति रायस्पोषः स विजिगीषुरेकः ॥ १५ ॥
सैकड़ों गन्धर्व, अप्सराएँ तथा देवता सदा इनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं । राक्षस भी इनसे सम्मति लिया करते हैं । एकमात्र ये ही धनके रक्षक और विजयके अभिलाषी हैं ॥ १५ ॥
तमध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरे सामगाश्च स्तुवन्ति । तं ब्राह्मणा ब्रह्ममन्त्रैः स्तुवन्ति तस्मै हविरध्वर्यवः कल्पयन्ति ॥ १६ ॥
यज्ञमें स्तोतालोग इन्हींकी स्तुति करते हैं । सामगान करनेवाले विद्वान् रथन्तर साममें इन्हींके गुण गाते हैं । वेदवेत्ता ब्राह्मण वेदके मन्त्रोंसे इन्हींका स्तवन करते हैं और यजुर्वेदी अध्वर्यु यज्ञमें इन्हींको हविष्यका भाग देते हैं ॥ १६ ॥
स पौराणीं ब्रह्मगुहां प्रविष्टो महीसत्रं भारताग्रे ददर्श । स चैव गामुद्दधाराग्रयकर्मा विक्षोभ्य दैत्यानुरगान् दानवांश्च ॥ १७ ॥
भारत! इन्होंने ही पूर्वकालमें ब्रह्मरूप पुरातन गुहामें प्रवेश करके इस पृथ्वीका जलमें प्रलय होना देखा है । इन सृष्टिकर्म करनेवाले श्रीकृष्णने दैत्यों, दानवों तथा नागोंको विक्षुब्ध करके इस पृथ्वीका रसातलसे उद्धार किया है ॥ १७ ॥
तं घोषार्थे गीर्भिरिन्द्राः स्तुवन्ति स चापीशो भारतैकः पशूनाम् । तस्य भक्षान् विविधान् वेदयन्ति तमेवाजौ वाहनं वेदयन्ति ॥ १८ ॥
व्रजकी रक्षाके लिये गोवर्द्धन पर्वत उठानेके समय इन्द्र आदि देवताओंने इनकी स्तुति की थी । भरतनन्दन! ये एकमात्र श्रीकृष्ण ही समस्त पशुओं ( जीवों ) के अधिपति हैं । इनको नाना प्रकारके भोजन अर्पित किये जाते हैं । युद्धमें ये ही विजय दिलानेवाले माने जाते हैं ॥ १८ ॥
पृष्ठ 1500
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तस्यान्तरिक्षं पृथिवी दिवं च सर्वं वशे तिष्ठति शाश्वतस्य । स कुम्भे रेतः ससृजे सुराणां यत्रोत्पन्नमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥ १ ९ ॥ पृथ्वी, आकाश और स्वर्गलोक सभी इन सनातन पुरुष श्रीकृष्णके वशमें रहते हैं । इन्होंने कुम्भमें देवताओं ( मित्र और वरुण) -का वीर्य स्थापित किया था; जिससे महर्षि वसिष्ठकी उत्पत्ति हुई बतायी जाती है ॥ १ ९ ॥ समातरिश्वा विभुरश्ववाजी स रश्मिवान् सविता चादिदेवः । तेनासुरा विजिताः सर्व एव तद्विक्रान्तैर्विजितानीह त्रीणि ॥ २० ॥
ये ही सर्वत्र विचरनेवाले वायु हैं, तीव्रगामी अश्व हैं, सर्वव्यापी हैं, अंशुमाली सूर्य और आदि देवता हैं । इन्होंने ही समस्त असुरोंपर विजय पायी तथा इन्होंने ही अपने तीन पदोंसे तीनों लोकोंको नाप लिया था ॥ २० ॥
स देवानां मानुषाणां पितॄणां तमेवाहुर्यज्ञविदां वितानम् । स एव कालं विभजन्नुदेति तस्योत्तरं दक्षिणं चायने द्वे ॥ २१ ॥
ये श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देवताओं, पितरों और मनुष्योंके आत्मा हैं । इन्हींको यज्ञवेत्ताओंका
यज्ञ कहा गया है । ये ही दिन और रातका विभाग करते हुए सूर्यरूपमें उदित होते हैं ।
उत्तरायण और दक्षिणायन इन्हींके दो मार्ग हैं ॥ २१ ॥
तस्यैवोर्ध्वं तिर्यगधश्चरन्ति गभस्तयो मेदिनीं भासयन्तः । तं ब्राह्मणा वेदविदो जुषन्ति तस्यादित्यो भामुपयुज्य भाति ॥ २२ ॥
इन्हींके ऊपर- नीचे तथा अगल- बगलमें पृथ्वीको प्रकाशित करनेवाली किरणें फैलती हैं । वेदवेत्ता ब्राह्मण इन्हींकी सेवा करते हैं और इन्हींके प्रकाशका सहारा लेकर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं ॥ २२ ॥
स मासि मास्यध्वरकृद् विधत्ते तमध्वरे वेदविदः पठन्ति । स एवोक्तश्चक्रमिदं त्रिनाभि सप्ताश्वयुक्तं वहते वै त्रिधाम ॥ २३ ॥