06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1501–1510
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1501–1510
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ये यज्ञकर्ता श्रीकृष्ण प्रत्येक मासमें यज्ञ करते हैं । प्रत्येक यज्ञमें वेदज्ञ ब्राह्मण इन्हींके गुण गाते हैं । ये ही तीन नाभियों, तीन धामों और सात अश्वोंसे युक्त इस संवत्सर- चक्रको धारण करते हैं ॥ २३ ॥
महातेजाः सर्वगः सर्वसिंहः कृष्णो लोकान् धारयते यथैकः । हंसं तमोघ्नं च तमेव वीर कृष्णं सदा पार्थ कर्तारमेहि ॥ २४ ॥
वीर कुन्तीनन्दन! ये महातेजस्वी और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले सर्वसिंह श्रीकृष्ण अकेले ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। तुम इन श्रीकृष्णको ही अन्धकारनाशक सूर्य और समस्त कार्योंका कर्ता समझो ॥ २४ ॥
स एकदा कक्षगतो महात्मा तुष्टो विभुः खाण्डवे धूमकेतुः । स राक्षसानुरगांश्चावजित्य सर्वत्रगः सर्वमग्नौ जुहोति ॥ २५ ॥
इन्हीं महात्मा वासुदेवने एक बार अग्निस्वरूप होकर खाण्डव वनकी सूखी लकड़ियोंमें व्याप्त हो पूर्णतः तृप्तिका अनुभव किया था । ये सर्वव्यापी प्रभु ही राक्षसों और नागोंको जीतकर सबको अग्निमें ही होम देते हैं ॥ २५ ॥
स एव पार्थाय श्वेतमश्वं प्रायच्छत्
स एवाश्वानथ सर्वांश्चकार ।
स बन्धुरस्तस्य रथस्त्रिचक्र- स्त्रिवृच्छिराश्चतुरश्वस्त्रिनाभिः ॥ २६ ॥
इन्होंने ही अर्जुनको श्वेत अश्व प्रदान किया था । इन्होंने ही समस्त अश्वोंकी सृष्टि की थी । ये ही संसाररूपी रथको बाँधनेवाले बन्धन हैं । सत्त्व, रज और तम – ये तीन गुण ही इस रथके चक्र हैं। ऊर्ध्व, मध्य और अधः –जिसकी गति है। काल, अदृष्ट, इच्छा और संकल्प — ये चार जिसके घोड़े हैं । सफेद, काला और लाल रंगका त्रिविध कर्म ही जिसकी नाभि है । वह संसार- रथ इन श्रीकृष्णके ही अधिकारमें है ॥ २६ ॥
स विहायो व्यदधात् पञ्चनाभिः स निर्ममे गां दिवमन्तरिक्षम् । सोऽरण्यानि व्यसृजत् पर्वतांश्च हृषीकेशोऽमितदीप्ताग्नितेजाः ॥ २७ ॥
पाँचों भूतोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णने ही आकाशकी सृष्टि की है । इन्होंने ही पृथ्वी, स्वर्गलोक और अन्तरिक्षकी रचना की है, अत्यन्त प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी इन हृषीकेशने ही वन और पर्वतोंको उत्पन्न किया है ॥ २७ ॥
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अलंघयद् वै सरितो जिघांसन् शक्रं वज्रं प्रहरन्तं निरास । स महेन्द्रः स्तूयते वै महाध्वरे विप्रैरेको ऋक्सहस्रैः पुराणैः ॥ २८ ॥
इन्हीं वासुदेवने वज्रका प्रहार करनेके लिये उद्यत हुए इन्द्रको मार डालनेकी इच्छासे कितनी ही सरिताओंको लाँघा और उन्हें परास्त किया था । वे ही महेन्द्ररूप हैं । ब्राह्मण बड़े-बड़े यज्ञोंमें सहस्रों पुरानी ऋचाओंद्वारा एकमात्र इन्हींकी स्तुति करते हैं ॥ २८ ॥
दुर्वासा वै तेन नान्येन शक्यो गृहे राजन् वासयितुं महौजाः । तमेवाहुरृषिमेकं पुराणं स विश्वकृद् विदधात्यात्मभावान् ॥ २ ९ ॥ राजन्! इन श्रीकृष्णके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो अपने घरमें महातेजस्वी दुर्वासाको ठहरा सके । इनको ही अद्वितीय पुरातन ऋषि कहते हैं । ये ही विश्वनिर्माता हैं और अपने स्वरूपसे ही अनेक पदार्थोंकी सृष्टि करते रहते हैं ॥ २ ९ ॥ वेदांश्च यो वेदयतेऽधिदेवो विधींश्च यश्चाश्रयते पुराणान् । कामे वेदे लौकिके यत्कलं च विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३० ॥
ये देवताओंके देवता होकर भी वेदोंका अध्ययन करते और प्राचीन विधियोंका आश्रय लेते हैं । लौकिक और वैदिक कर्मका जो फल है, वह सब श्रीकृष्ण ही हैं ऐसा विश्वास करो ॥ ३० ॥
ज्योतींषि शुक्लानि हि सर्वलोके यो लोका लोकपालास्त्रयश्च । त्रयोऽग्नयो व्याहृतयश्च तिस्रः सर्वे देवा देवकीपुत्र एव ॥ ३१ ॥
ये ही सम्पूर्ण लोकोंकी शुक्लज्योति हैं तथा तीनों लोक, तीनों लोकपाल, त्रिविध अग्नि, तीनों व्याहृतियाँ और सम्पूर्ण देवता भी ये देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ही हैं ॥ ३१ ॥
स वत्सरः स ऋतुः सोऽर्धमासः सोऽहोरात्रः स कला वै स काष्ठाः । मात्रा मुहूर्ताश्च लवाः क्षणाश्च विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३२ ॥
संवत्सर, ऋतु, पक्ष, दिन - रात, कला, काष्ठा, मात्रा, मुहूर्त, लव और क्षण— इन सबको श्रीकृष्णका ही स्वरूप समझो ॥ ३२ ॥
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चन्द्रादित्यौ ग्रहनक्षत्रताराः सर्वाणि दर्शान्यथ पौर्णमासम् । नक्षत्रयोगा ऋतवश्च पार्थ विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रसूतम् ॥ ३३ ॥
पार्थ! चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अमावास्या, पौर्णमासी, नक्षत्रयोग तथा ऋतु— इन सबकी उत्पत्ति श्रीकृष्णसे ही हुई है ॥ ३३ ॥
रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च साध्याश्च विश्वे मरुतां गणाश्च । प्रजापतिर्देवमातादितिश्च सर्वे कृष्णादृषयश्चैव सप्त ॥ ३४ ॥
रुद्र, आदित्य, वसु अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, प्रजापति, देवमाता अदिति और सप्तर्षि — ये सब - के - सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट हुए हैं ॥ ३४ ॥
वायुर्भूत्वा विक्षिपते च विश्व- मग्निर्भूत्वा दहते विश्वरूपः । आपो भूत्वा मज्जयते च सर्वं ब्रह्मा भूत्वा सृजते विश्वसंघान् ॥ ३५ ॥
ये विश्वरूप श्रीकृष्ण ही वायुरूप धारण करके संसारको चेष्टा प्रदान करते हैं, अग्निरूप होकर सबको भस्म करते हैं, झलका रूप धारण करके जगत्को डुबाते हैं और ब्रह्मा होकर सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करते हैं ॥ ३५ ॥
वेद्यं च यद् वेदयते च वेद्यं विधिश्च यश्च श्रयते विधेयम् । धर्मे च वेदे च बले च सर्वं चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ३६ ॥
ये स्वयं वेद्यस्वरूप होकर भी वेदवेद्य तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करते हैं । विधिरूप होकर भी विहित कर्मोंका आश्रय लेते हैं । ये ही धर्म, वेद और बलमें स्थित हैं । तुम यह विश्वास करो कि सारा चराचर जगत् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है ॥ ३६ ॥
ज्योतिर्भूतः परमोऽसौ पुरस्तात् प्रकाशते यत्प्रभया विश्वरूपः । अपः सृष्ट्वा सर्वभूतात्मयोनिः पुराकरोत् सर्वमेवाथ विश्वम् ॥ ३७ ॥
ये विश्वरूपधारी श्रीकृष्ण परम ज्योतिर्मय सूर्यका रूप धारण करके पूर्व दिशामें प्रकट होते हैं । जिनकी प्रभासे सारा जगत् प्रकाशित होता है । ये समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिके
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स्थान हैं । इन्होंने पूर्वकालमें पहले जलकी सृष्टि करके फिर सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न किया था ॥ ३७ ॥
ऋतूनुत्पातान् विविधान्यद्भूतानि मेघान् विद्युत्सर्वमैरावतं च । सर्वं कृष्णात् स्थावरं जङ्गमं च विश्वात्मानं विष्णुमेनं प्रतीहि ॥ ३८ ॥
ऋतु, नाना प्रकारके उत्पात, अनेकानेक अद्भुत पदार्थ, मेघ, बिजली, ऐरावत और सम्पूर्ण चराचर जगत्की इन्हींसे उत्पत्ति हुई है । तुम इन्हींको समस्त विश्वका आत्मा - विष्णु समझो ॥ ३८ ॥
विश्वावासं निर्गुणं वासुदेवं
संकर्षणं जीवभूतं वदन्ति ।
ततः प्रद्युम्नमनिरुद्धं चतुर्थ- माज्ञापयत्यात्मयोनिर्महात्मा ॥ ३१ ॥
ये विश्वके निवासस्थान और निर्गुण हैं । इन्हींको वासुदेव, जीवभूत संकर्षण, प्रद्युम्न और चौथा अनिरुद्ध कहते हैं । ये आत्मयोनि परमात्मा सबको अपनी आज्ञाके अधीन रखते हैं ॥ ३ ९ ॥ स पञ्चाधा पञ्चजनोपपन्नं संचोदयन् विश्वमिदं सिसुक्षुः । ततश्चकारावनिमारुतौ च खं ज्योतिरम्भश्च तथैव पार्थ ॥ ४० ॥
कुन्तीकुमार! ये देवता, असुर, मनुष्य, पितर और तिर्यग् रूपसे पाँच प्रकारके संसारकी सृष्टि करनेकी इच्छा रखकर पञ्चभूतोंसे युक्त जगत्के प्रेरक होकर सबको अपने अधीन रखते हैं । उन्होंने ही क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशकी सृष्टि की है ॥ ४० ॥
स स्थावरं जङ्गमं चैवमेत- च्चतुर्विधं लोकमिमं च कृत्वा । ततो भूमिं व्यदधात् पञ्चबीजां द्यौः पृथिव्यां धास्यति भूरि वारि ॥। ४१ ॥ इन्होंने जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणियोंसे युक्त इस चराचर जगत्की सृष्टि करके चतुर्विध भूत- समुदाय और कर्म– इन पाँचोंकी बीजरूपा भूमिका निर्माण किया । ये ही आकाशस्वरूप बनकर इस पृथ्वीपर प्रचुर जलकी वर्षा करते हैं ॥ ४१ ॥
तेन विश्वं कृतमेतद्धि राजन् स जीवयत्यात्मनैवात्मयोनिः । ततो देवानसुरान् मानवांश्च
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लोकानृषींश्चापि पितॄन् प्रजाश्च । समासेन विधिवत्प्राणिलोकान् सर्वान् सदा भूतपतिः सिसृक्षुः ॥ ४२ ॥
राजन्! इन्होंने ही इस विश्वको उत्पन्न किया है और ये ही आत्मयोनि श्रीकृष्ण अपनी ही शक्तिसे सबको जीवन प्रदान करते हैं । देवता, असुर, मनुष्य, लोक, ऋषि, पितर, प्रजा और संक्षेपतः सम्पूर्ण प्राणियोंको इन्हींसे जीवन मिलता है । ये भगवान् भूतनाथ ही सदा विधिपूर्वक समस्त भूतोंकी सृष्टिकी इच्छा रखते हैं ॥ ४२ ॥
शुभाशुभं स्थावरं जङ्गमं च विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि । यद् वर्तते यच्च भविष्यतीह सर्वं ह्येतत् केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ४३ ॥
शुभ- अशुभ और स्थावर- जंगमरूप यह सारा जगत् श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुआ है, इस बातपर विश्वास करो । भूत, भविष्य और वर्तमान सब श्रीकृष्णका ही स्वरूप है । यह तुम्हें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ॥ ४३ ॥
मृत्युश्चैव प्राणिनामन्तकाले साक्षात् कृष्णः शाश्वतो धर्मवाहः । भूतं च यच्चेह न विद्या किंचिद् विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ४४ ॥
प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर साक्षात् श्रीकृष्ण ही मृत्युरूप बन जाते हैं । ये धर्मके सनातन रक्षक हैं । जो बात बीत चुकी है तथा जिसका अभी कोई पता नहीं है, वे सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट होते हैं, यह निश्चितरूपसे जान लो ॥ ४४ ॥
यत् प्रशस्तं च लोकेषु पुण्यं यच्च शुभाशुभम् ।
तत्सर्वं केशवोऽचिन्त्यो विपरीतमतः परम् ॥ ४५ ॥
तीनों लोकोंमें जो कुछ भी उत्तम, पवित्र तथा शुभ या अशुभ वस्तु है, वह सब अचिन्त्य भगवान् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है, श्रीकृष्णसे भिन्न कोई वस्तु है, ऐसा सोचना अपनी विपरीत बुद्धिका ही परिचय देना है ॥ ४५ ॥
एतादृशः केशवोऽतश्च भूयो नारायणः परमश्चाव्ययश्च । मध्याद्यन्तस्य जगतस्तस्थुषश्च बुभूषतां प्रभवश्चाव्ययश्च ॥ ४६ ॥
भगवान् श्रीकृष्णकी ऐसी ही महिमा है । बल्कि ये इससे भी अधिक प्रभावशाली हैं । ये ही परम पुरुष अविनाशी नारायण हैं । ये ही स्थावर- जंगमरूप जगत्के आदि, मध्य और
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अन्त हैं तथा संसारमें जन्म लेनेकी इच्छावाले प्राणियोंकी उत्पत्तिके कारण भी ये ही हैं । इन्हींको अविकारी परमात्मा कहते हैं ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषमाहात्म्ये अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुषमाहात्म्यविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५८ ॥
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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना युधिष्ठिर उवाच
ब्रूहि ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं त्वं मधुसूदन ।
वेत्ता त्वमस्य चार्थस्य वेद त्वां हि पितामहः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- मधुसूदन! ब्राह्मणकी पूजा करनेसे क्या फल मिलता है? इसका आप ही वर्णन कीजिये; क्योंकि आप इस विषयको अच्छी तरह जानते हैं और मेरे पितामह भी आपको इस विषयका ज्ञाता मानते हैं ॥ १ ॥
वासुदेव उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् द्विजानां भरतर्षभ ।
यथा तत्त्वेन वदतो गुणान् वै कुरुसत्तम ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा – कुरुकुलतिलक भरतभूषण नरेश! मैं ब्राह्मणोंके गुणोंका यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ, आप ध्यान देकर सुनिये ॥ २ ॥
द्वारवत्यां समासीनं पुरा मां कुरुनन्दन ।
प्रद्युम्नः परिपप्रच्छ ब्राह्मणैः परिकोपितः ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! पहलेकी बात है, एक दिन ब्राह्मणोंने मेरे पुत्र प्रद्युम्नको कुपित कर दिया ।
उस समय मैं द्वारकामें ही था । प्रद्युम्नने मुझसे आकर पूछा— ॥ ३ ॥
किं फलं ब्राह्मणेष्वस्ति पूजायां मधुसूदन ।
ईश्वरत्वं कुतस्तेषामिहैव च परत्र च ॥ ४ ॥
'मधुसूदन! ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे क्या फल होता है? इहलोक और परलोकमें वे क्यों ईश्वरतुल्य माने जाते हैं? ॥ ४ ॥
सदा द्विजातीन् सम्पूज्य किं फलं तत्र मानद ।
एतद् ब्रूहि स्फुटं सर्वं सुमहान् संशयोऽत्र मे ॥ ५ ॥
‘ मानद! सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करके मनुष्य क्या फल पाता है? यह सब मुझे स्पष्टरूपसे बताइये, क्योंकि इस विषयमें मुझे महान् संदेह है' ॥ ४ ॥
इत्युक्ते वचने तस्मिन् प्रद्युम्नेन तथा त्वहम् ।
प्रत्यब्रुवं महाराज यत् तच्छृणु समाहितः ॥ ६ ॥
व्युष्टिं ब्राह्मणपूजायां रौक्मिणेय निबोध मे ।
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एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ ७ ॥
अस्मिँल्लोके रौक्मिणेय तथामुष्मिंश्च पुत्रक । महाराज! प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर मैंने उसको उत्तर दिया । रुक्मिणीनन्दन! ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे क्या फल मिलता है, यह मैं बता रहा हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो । बेटा! ब्राह्मणोंके राजा सोम ( चन्द्रमा) हैं । अतः ये इस लोक और परलोकमें भी सुख-दुःख देनेमें समर्थ होते हैं ॥ ६-७ ॥ ब्राह्मणप्रमुखं सौम्यं न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ ८ ॥
ब्राह्मणप्रतिपूजायामायुः कीर्तिर्यशो बलम् ।
लोका लोकेश्वराश्चैव सर्वे ब्राह्मणपूजकाः ॥ ९ ॥
ब्राह्मणोंमें शान्तभावकी प्रधानता होती है । इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है । ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे आयु, कीर्ति, यश और बलकी प्राप्ति होती है । समस्त लोक और लोकेश्वर ब्राह्मणोंके पूजक हैं ॥ ८ - ९ ॥
त्रिवर्गे चापवर्गे च यशःश्रीरोगशान्तिषु ।
देवतापितृपूजासु संतोष्याश्चैव नो द्विजाः ॥ १० ॥
धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये, मोक्षकी प्राप्तिके लिये और यश, लक्ष्मी तथा आरोग्यकी उपलब्धिके लिये एवं देवता और पितरोंकी पूजाके समय हमें ब्राह्मणोंको पूर्ण संतुष्ट करना चाहिये ॥ १० ॥
तत्कथं वै नाद्रियेयमीश्वरोऽस्मीति पुत्रक ॥ मा ते मन्युर्महाबाहो भवत्वत्र द्विजान् प्रति ॥ ११ ॥
बेटा! ऐसी दशामें मैं ब्राह्मणोंका आदर कैसे नहीं करूँ? महाबाहो! मैं ईश्वर ( सब कुछ करनेमें समर्थ) हूँ — ऐसा मानकर तुम्हें ब्राह्मणोंके प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
ब्राह्मणा हि महद्भूतमस्मिँल्लोके परत्र च ।
भस्म कुर्युर्जगदिदं क्रुद्धाः प्रत्यक्षदर्शिनः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण इस लोक और परलोकमें भी महान् माने गये हैं । वे सब कुछ प्रत्यक्ष देखते हैं और यदि क्रोधमें भर जायँ तो इस जगत्को भस्म कर सकते हैं ॥ १२ ॥
अन्यानपि सृजेयुश्च लोकाँल्लोकेश्वरांस्तथा ।
कथं तेषु न वर्तेरन् सम्यग् ज्ञानात् सुतेजसः ॥ १३ ॥
दूसरे- दूसरे लोक और लोकपालोंकी वे सृष्टि कर सकते हैं । अतः तेजस्वी पुरुष ब्राह्मणोंके महत्त्वको अच्छी तरह जानकर भी उनके साथ सवर्ताव क्यों न करेंगे? ॥ १३ ॥
अवसन्मद्गृहे तात ब्राह्मणो हरिपिङ्गलः ।
चीरवासा बिल्वदण्डी दीर्घश्मश्रुः कृशो महान् ॥ १४ ॥
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तात! पहलेकी बात है, मेरे घरमें एक हरित - पिंगल वर्णवाले ब्राह्मणने निवास किया था । वह चिथड़े पहिनता और बेलका डंडा हाथमें लिये रहता था । उसकी मूँछें और दाढ़ियाँ बढ़ी हुई थीं । वह देखनेमें दुबला- पतला और ऊँचे कदका था ॥ १४ ॥
दीर्घेभ्यश्च मनुष्येभ्यः प्रमाणादधिको भुवि ।
स स्वैरं चरते लोकान् ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ १५ ॥
इस भूतलपर जो बड़े - से - बड़े मनुष्य हैं, उन सबसे वह अधिक लंबा था और दिव्य तथा मानव लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करता था ॥ १५ ॥
इमां गाथां गायमानश्चत्वरेषु सभासु च ।
दुर्वाससं वासयेत् को ब्राह्मणं सत्कृतं गृहे ॥ १६ ॥
वे ब्राह्मण देवता जिस समय यहाँ पधारे थे, उस समय धर्मशालाओंमें और चौराहोंपर यह गाथा गाते फिरते थे कि ' कौन मुझ दुर्वासा ब्राह्मणको अपने घरमें सत्कारपूर्वक ठहरायेगा ॥ १६ ॥
रोषणः सर्वभूतानां सूक्ष्मेऽप्यपकृते कृते ।
परिभाषां च मे श्रुत्वा को नु दद्यात् प्रतिश्रयम् ॥ १७ ॥
यो मां कश्चिद् वासयीत न स मां कोपयेदिति । ‘ यदि मेरा थोड़ा- सा भी अपराध बन जाय तो मैं समस्त प्राणियोंपर अत्यन्त कुपित हो उठता हूँ । मेरे इस भाषणको सुनकर कौन मेरे लिये ठहरनेका स्थान देगा? जो कोई मुझे अपने घरमें ठहराये, वह मुझे क्रोध न दिलाये । इस बातके लिये उसे सतत सावधान रहना होगा' ॥ १७३ ॥
यस्मान्नाद्रियते कश्चित् ततोऽहं समवासयम् ॥ १८ ॥
स सम्भुङ्क्ते सहस्राणां बहूनामन्नमेकदा ।
एकदा सोऽल्पकं भुङ्क्ते न चैवैति पुनर्गृहान् ॥ १ ९ ॥
बेटा! जब कोई भी उनका आदर न कर सका तब मैंने उन्हें अपने घरमें ठहराया । वे कभी तो एक ही समय इतना अन्न भोजन कर लेते थे, जितनेसे कई हजार मनुष्य तृप्त हो सकते थे और कभी बहुत थोड़ा अन्न खाते तथा घरसे निकल जाते थे । उस दिन फिर घरको नहीं लौटते थे ॥ १८-१९ ॥
अकस्माच्च प्रहसति तथाकस्मात् प्ररोदिति ।
न चास्य वयसा तुल्यः पृथिव्यामभवत् तदा ॥ २० ॥
वे अकस्मात् जोर-जोरसे हँसने लगते और अचानक फूट- फूटकर रो पड़ते थे । उस समय इस पृथ्वीपर उनका समवयस्क कोई नहीं था ॥ २० ॥
अथ स्वावसथं गत्वा स शय्यास्तरणानि च ।
कन्याश्चालंकृता दग्ध्वा ततो व्यपगतः पुनः ॥ २१ ॥
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एक दिन अपने ठहरनेके स्थानपर जाकर वहाँ बिछी हुई शय्याओं, बिछौनों और वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हुई कन्याओंको उन्होंने जलाकर भस्म कर दिया और स्वयं वहाँसे खिसक गये ॥ २१ ॥
अथ मामब्रवीद् भूयः स मुनिः संशितव्रतः ।
कृष्ण पायसमिच्छामि भोक्तुमित्येव सत्वरः ॥ २२ ॥
फिर तुरंत ही मेरे पास आकर वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि मुझसे इस प्रकार बोले— ' कृष्ण! मैं शीघ्र ही खीर खाना चाहता हूँ' ॥ २२ ॥
तदैव तु मया तस्य चित्तज्ञेन गृहे जनः ।
सर्वाण्यन्नानि पानानि भक्ष्याश्चोच्चावचास्तथा ॥ २३ ॥
भवन्तु सत्कृतानीह पूर्वमेव प्रचोदितः ।
ततोऽहं ज्वलमानं वै पायसं प्रत्यवेदयम् ॥ २४ ॥
मैं उनके मनकी बात जानता था, इसलिये घरके लोगोंको पहलेसे ही आज्ञा दे दी थी कि ‘ सब प्रकारके उत्तम, मध्यम अन्नपान और भक्ष्य- भोज्य पदार्थ आदरपूर्वक तैयार किये जायँ । ' मेरे कथनानुसार सभी चीजें तैयार थीं ही, अतः मैंने मुनिको गरमागरम खीर निवेदन किया ॥ २३-२४ ॥
भूक्त्वैव स तु क्षिप्रं ततो वचनमब्रवीत् ।
क्षिप्रमङ्गानि लिम्पस्व पायसेनेति स स्म ह ॥ २५ ॥
उसको थोड़ा- सा ही खाकर वे तुरंत मुझसे बोले – ' कृष्ण! इस खीरको शीघ्र ही अपने सारे अंगोंमें पोत लो ' ॥ २५ ॥
अविमृश्यैव च ततः कृतवानस्मि तत् तथा ।
तेनोच्छिष्टेन गात्राणि शिरश्चैवाभ्यमृक्षयम् ॥ २६ ॥
मैंने बिना विचारे ही उनकी इस आज्ञाका पालन किया । वही जूठी खीर मैंने अपने सिरपर तथा अन्य सारे अंगोंमें पोत ली ॥ २६ ॥
स ददर्श तदाभ्याशे मातरं ते शुभाननाम् ।
तामपि स्मयमानां स पायसेनाभ्यलेपयम् ॥ २७ ॥
इतनेहीमें उन्होंने देखा कि तुम्हारी सुमुखी माता पास ही खड़ी खड़ी मुसकरा रही हैं । मुनिकी आज्ञा पाकर मैंने मुसकराती हुई तुम्हारी माताके अंगोंमें भी खीर लपेट दी ॥ २७ ॥
मुनिः पायसदिग्धाङ्गीं रथे तूर्णमयोजयत् ।
तमारुह्य रथं चैव निर्ययौ स गृहान्मम ॥ २८ ॥
जिसके सारे अंगोंमें खीर लिपटी हुई थी, उस महारानी रुक्मिणीको मुनिने तुरंत रथमें जोत दिया और उसी रथपर बैठकर वे मेरे घरसे निकले ॥ २८ ॥
अग्निवर्णो ज्वलन् धीमान् स द्विजो रथधुर्यवत् ।
प्रतोदेनातुदद् बालां रुक्मिणीं मम पश्यतः ॥ २ ९ ॥