06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1691–1700
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1691–1700
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जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि –ये गन्धोंको नहीं समझ पाते, किंतु नासिका उसका अनुभव करती है ॥ ६ ॥
घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न रसानधिगच्छन्ति जिह्वा तानधिगच्छति ॥ ७ ॥
नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि–ये रसोंका आस्वादन नहीं कर सकते ।
केवल जिह्वा उसका स्वाद ले सकती है ॥ ७ ॥
घ्राणं जिह्वा तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति ॥ ८ ॥
नासिका, जीभ, कान, त्वचा, मन और बुद्धि –ये रूपका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते; किंतु नेत्र इनका अनुभव करते हैं ॥ ८ ॥
घ्राणं जिह्वा ततश्चक्षुः श्रोत्रं बुद्धिर्मनस्तथा ।
न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक् च तानधिगच्छति ॥ ९ ॥
नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन –ये स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकते; किंतु त्वचाको उसका ज्ञान होता है ॥ ९ ॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न शब्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति ॥ १० ॥
नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, मन और बुद्धि–इन्हें शब्दका ज्ञान नहीं होता; किंतु कानको होता है ॥ १० ॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं बुद्धिरेव च ।
संशयं नाधिगच्छन्ति मनस्तमधिगच्छति ॥ ११ ॥
नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और बुद्धि- ये संशय ( संकल्प- विकल्प) नहीं कर सकते । यह काम मनका है ॥ ११ ॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं मन एव च ।
न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति ॥ १२ ॥
इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन- वे किसी बातका निश्चय नहीं कर सकते । निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है ॥ १२ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
इन्द्रियाणां च संवादं मनसश्चैव भामिनि ॥ १३ ॥
भामिनि! इस विषयमें इन्द्रियों और मनके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १३ ॥
मन उवाच नाघ्राति मामृते घ्राणं रसं जिह्वा न वेत्ति च ।
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रूपं चक्षुर्न गृह्णाति त्वक् स्पर्शं नावबुध्यते ॥ १४ ॥
न श्रोत्रं बुध्यते शब्दं मया हीनं कथंचन ।
प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मि सनातनम् ॥ १५ ॥
एक बार मनने इन्द्रियोंसे कहा- मेरी सहायताके बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रसका स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकती और कानोंको शब्द नहीं सुनायी दे सकता । इसलिये मैं सब भूतोंमें श्रेष्ठ और सनातन हूँ ॥ १४-१५ ॥
अगाराणीव शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नयः ।
इन्द्रियाणि न भासन्ते मया हीनानि नित्यशः ॥ १६ ॥
‘ मेरे बिना समस्त इन्द्रियाँ बुझी लपटोंवाली आग और सूने घरकी भाँति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं ॥ १६ ॥
काष्ठानीवार्द्रशुष्काणि यतमानैरपीन्द्रियैः ।
गुणार्थान् नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तवः ॥ १७ ॥
संसारके सभी जीव इन्द्रियोंके यत्न करते रहनेपर भी मेरे बिना उसी प्रकार विषयोंका अनुभव नहीं कर सकते, जिस प्रकार कि सूखे - गीले काष्ठ कोई अनुभव नहीं कर सकते ॥ १७ ॥
इन्द्रियाण्यूचुः
एवमेतद् भवेत् सत्यं यथैतन्मन्यते भवान् ।
ऋतेऽस्मानस्मदर्थांस्त्वं भोगान् भुङ्क्ते भवान् यदि ॥ १८ ॥
यह सुनकर इन्द्रियोंने कहा- महोदय! यदि आप भी हमारी सहायता लिये बिना ही विषयोंका अनुभव कर सकते तो हम आपकी इस बातको सच मान लेतीं ॥ १८ ॥
यद्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम् ।
भोगान् भुङ्क्ते भवान् सत्यं यथैतन्मन्यते तथा ॥ १ ९ ॥
हमारा लय हो जानेपर भी आप तृप्त रह सकें, जीवन धारण कर सकें और सब प्रकारके भोग भोग सकें तो आप जैसा कहते और मानते हैं, वह सब सत्य हो सकता ॥ १ ९ ॥
अथवास्मासु लीनेषु तिष्ठत्सु विषयेषु च ।
यदि संकल्पमात्रेण भुङ्क्ते भोगान् यथार्थवत् ॥ २० ॥
अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु नित्यदा ।
घ्राणेन रूपमादत्स्व रसमादत्स्व चक्षुषा ॥ २१ ॥
श्रोत्रेण गन्धानादत्स्व स्पर्शानादत्स्व जिह्वया ।
त्वचा च शब्दमादत्स्व बुद्धया स्पर्शमथापि च ॥ २२ ॥
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अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये । इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्वाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये ॥ २०–२२ ॥
बलवन्तो ह्यनियमा नियमा दुर्बलीयसाम् ।
भोगानपूर्वानादत्स्व नोच्छिष्टं भोक्तुमर्हति ॥ २३ ॥
आप- जैसे बलवान् लोग नियमोंके बन्धनमें नहीं रहते, नियम तो दुर्बलोंके लिये होते हैं । आप नये ढंगसे नवीन भोगोंका अनुभव कीजिये । हमलोगोंकी जूठन खाना आपको शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥
यथा हि शिष्यः शास्तारं श्रुत्यर्थमभिधावति ।
ततः श्रुतमुपादाय श्रुत्यर्थमुपतिष्ठति ॥ २४ ॥
विषयानेवमस्माभिर्दर्शितानभिमन्यसे ।
अनागतानतीतांश्च स्वप्ने जागरणे तथा ॥ २५ ॥
जैसे शिष्य श्रुतिके अर्थको जाननेके लिये उपदेश करनेवाले गुरुके पास जाता है और उनसे श्रुतिके अर्थका ज्ञान प्राप्त करके फिर स्वयं उसका विचार और अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाये हुए भूत और भविष्य - विषयोंका उपभोग करते हैं ॥ २४-२५ ॥
वैमनस्यं गतानां च जन्तूनामल्पचेतसाम् ।
अस्मदर्थे कृते कार्ये दृश्यते प्राणधारणम् ॥ २६ ॥
जो मनरहित हुए मन्दबुद्धि प्राणी हैं, उनमें भी हमारे लिये ही कार्य किये जानेपर प्राण-धारण देखा जाता है ॥ २६ ॥
बहूनपि हि संकल्पान् मत्वा स्वप्नानुपास्य च ।
बुभुक्षया पीड्यमानो विषयानेव धावति ॥ २७ ॥
बहुत - से संकल्पोंका मनन और स्वप्नोंका आश्रय लेकर भोग भोगनेकी इच्छासे पीड़ित हुआ प्राणी विषयोंकी ओर ही दौड़ता है ॥ २७ ॥
अगारमद्वारमिव प्रविश्य संकल्पभोगान् विषये निबद्धान् । प्राणक्षये शान्तिमुपैति नित्यं दारुक्षयेऽग्निर्ज्वलितो यथैव ॥ २८ ॥
विषय- वासनासे अनुविद्ध संकल्पजनित भोगोंका उपभोग करके प्राणशक्तिके क्षीण होनेपर मनुष्य बिना दरवाजेके घरमें घुसे हुए मनुष्यकी भाँति उसी तरह शान्त हो जाता है,
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जैसे समिधाओंके जल जानेपर प्रज्वलित अग्नि स्वयं ही बुझ जाती है ॥ २८ ॥
कामं तु नः स्वेषु गुणेषु सङ्गः
कामं च नान्योन्यगुणोपलब्धिः ।
अस्मान् विना नास्ति तवोपलब्धि- स्तावदृते त्वां न भजेत् प्रहर्षः ॥ २ ९ ॥
भले ही हमलोगोंकी अपने - अपने गुणोंके प्रति आसक्ति हो और भले ही हम परस्पर एक- दूसरेके गुणोंको न जान सकें; किंतु यह बात सत्य है कि आप हमारी सहायताके बिना किसी भी विषयका अनुभव नहीं कर सकते । आपके बिना तो हमें केवल हर्षसे ही वंचित होना पड़ता है ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमेंब्राह्मणगीताविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
इस श्लोकका सारांश इस प्रकार समझना चाहिये - पहले आत्मा मनको उच्चारण करनेके लिये प्रेरित करता है, तब मन जठराग्निको प्रज्वलित करता है । जठराग्निके प्रज्वलित होनेपर उसके प्रभावसे प्राणवायु अपानवायुसे जा मिलता है । उसके बाद वह वायु उदानवायुके प्रभावसे ऊपर चढ़कर मस्तकमें टकराता है और फिर व्यानवायुके प्रभावसे कण्ठ - तालु आदि स्थानोंमें होकर वेगसे वर्ण उत्पन्न कराता हुआ वैखरीरूपसे मनुष्योंके कानमें प्रविष्ट होता है । जब प्राणवायुका वेग निवृत्त हो जाता है, तब वह फिर समानभावसे चलने लगता है ।
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त्रयोविंशोऽध्यायः प्राण, अपान आदिका संवाद और ब्रह्माजीका सबकी श्रेष्ठता बतलाना ब्राह्मणउवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सुभगे पञ्चहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा – प्रिये! अब पञ्चहोताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसके विषयमें एक प्राचीन दृष्टान्त बतलाया जाता है ॥ १ ॥
प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च ।
पञ्चहोतॄंस्तथैतान् वै परं भावं विदुर्बुधाः ॥ २ ॥
प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान - ये पाँचों प्राण पाँच होता हैं । विद्वान् पुरुष इन्हें सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ॥ ब्राह्मण्युवाच
स्वभावात् सप्तहोतार इति मे पूर्विका मतिः ।
यथा वै पञ्चहोतारः परो भावस्तदुच्यताम् ॥ ३ ॥
ब्राह्मणी बोली – नाथ! पहले तो मैं समझती थी कि स्वभावतः सात होता हैं; किंतु अब आपके मुँहसे पाँच होताओंकी बात मालूम हुई । अतः ये पाँचों होता किस प्रकार हैं? आप इनकी श्रेष्ठताका वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
ब्राह्मणउवाच
प्राणेन सम्भृतो वायुरपानो जायते ततः ।
अपाने सम्भृतो वायुस्ततो व्यानः प्रवर्तते ॥ ४ ।
व्यानेन सम्भृतो वायुस्ततोदानः प्रवर्तते ।
उदाने सम्भृतो वायुः समानो नाम जायते ॥ ५ ॥
तेऽपृच्छन्त पुरा सन्तः पूर्वजातं पितामहम् ।
यो नः श्रेष्ठस्तमाचक्ष्व स नः श्रेष्ठो भविष्यति ॥ ६ ॥
ब्राह्मणने कहा – प्रिये! वायु प्राणके द्वारा पुष्ट होकर अपानरूप, अपानके द्वारा पुष्ट होकर व्यानरूप, व्यानसे पुष्ट होकर उदानरूप, उदानसे परिपुष्ट होकर समानरूप होता है । एक बार इन पाँचों वायुओंने सबके पूर्वज पितामह ब्रह्माजीसे प्रश्न किया — ‘ भगवन्! हममें जो श्रेष्ठ हो उसका नाम बता दीजिये, वही हमलोगोंमें प्रधान होगा ' ॥ ४–६ ॥
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ब्रह्मोवाच यस्मिन् प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । यस्मिन् प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति सवै श्रेष्ठो गच्छत यत्र कामः ॥ ७ ॥
ब्रह्माजीने कहा – प्राणधारियोंके शरीरमें स्थित हुए तुमलोगोंमेंसे जिसका लय हो जानेपर सभी प्राण लीन हो जायँ और जिसके संचरित होनेपर सब -के - सब संचार करने
लगें, वही श्रेष्ठ है । अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ॥ ७ ॥
प्राण उवाच मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ ८ ॥
यह सुनकर प्राणवायुने अपान आदिसे कहा- मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब - के - सब संचार करने लगते हैं, इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ । देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ ( फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा ) ॥ ८ ॥
ब्राह्मणउवाच
प्राणः प्रालीयत ततः पुनश्च प्रचचार ह ।
समानश्चाप्युदानश्च वचोऽब्रूतां पुनः शुभे ॥ ९ ॥
ब्राह्मण कहते हैं - शुभे! यों कहकर प्राणवायु थोड़ी देरके लिये छिप गया और उसके बाद फिर चलने लगा । तब समान और उदानवायु उससे पुनः बोले – ॥ ९ ॥
न त्वं सर्वमिदं व्याप्य तिष्ठसीह यथा वयम् ।
न त्वं श्रेष्ठो हि नः प्राण अपानो हि वशे तव ।
प्रचचार पुनः प्राणस्तमपानोऽभ्यभाषत ॥ १० ॥
‘ प्राण! जैसे हमलोग इस शरीरमें व्याप्त हैं, उस तरह तुम इस शरीरमें व्याप्त होकर नहीं रहते । इसलिये तुम हमलोगोंसे श्रेष्ठ नहीं हो । केवल अपान तुम्हारे वशमें है [अतः तुम्हारे लय होनेसे हमारी कोई हानि नहीं हो सकती ] । ' तब प्राण पुनः पूर्ववत् चलने लगा । तदनन्तर अपान बोला ॥ १० ॥
अपान उवाच मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति
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सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ ११ ॥
अपानने कहा — मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब--के - सब संचार करने लगते हैं । इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ । देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा) ॥ ११ ॥
ब्राह्मणउवाच
व्यानश्च तमुदानश्च भाषमाणमथोचतुः ।
अपान न त्वं श्रेष्ठोऽसि प्राणो हि वशगस्तव ॥ १२ ॥
ब्राह्मण कहते हैं - तब व्यान और उदानने पूर्वोक्त बात कहनेवाले अपानसे कहा - ' अपान! केवल प्राण तुम्हारे अधीन है, इसलिये तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो सकते' ॥ १२ ॥
अपानः प्रचचाराथ व्यानस्तं पुनरब्रवीत् ।
श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥ १३ ॥
यह सुनकर अपान भी पूर्ववत् चलने लगा । तब व्यानने उससे फिर कहा- ' मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ । मेरी श्रेष्ठताका कारण क्या है । वह सुनो ॥ १३ ॥
मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ १४ ॥
' मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब - के - सब संचार करने लगते हैं । इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ । देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ ( फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा ) ' ॥ १४ ॥
ब्राह्मणउवाच प्रालीयत ततो व्यानः पुनश्च प्रचचार ह ।
प्राणापानावुदानश्च समानश्च तमब्रुवन् ।
न त्वं श्रेष्ठोऽसि नो व्यान समानस्तु वशे तव ॥ १५ ॥
ब्राह्मण कहते हैं - तब व्यान कुछ देरके लिये लीन हो गया, फिर चलने लगा । उस समय प्राण, अपान, उदान और समानने उससे कहा -' व्यान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो, केवल समान वायु तुम्हारे वशमें है ' ॥ १५ ॥
प्रचचार पुनर्व्यानः समानः पुनरब्रवीत् ।
श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥ १६ ॥
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यह सुनकर व्यान पूर्ववत् चलने लगा । तब समानने पुनः कहा- ' मैं जिस कारणसे सबमें श्रेष्ठ हूँ, वह बताता हूँ सुनो ॥ १६ ॥
मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ १७ ॥
' मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब- के - सब संचार करने लगते हैं । इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ । देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ ( फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा ) ' ॥ १७ ॥
(ब्राह्मणउवाच
ततः समानः प्रालिल्ये पुनश्च प्रचचार ह ।
प्राणापानाबुदानश्च व्यानश्चैव तमब्रुवन् ॥
न त्वं समान श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव । ) ब्राह्मण कहते हैं - यह कहकर समान कुछ देरके लिये लीन हो गया और पुनः पूर्ववत् चलने लगा । उस समस प्राण, अपान, व्यान और उदानने उससे कहा — ' समान! तुम हमलोगोंसे श्रेष्ठ नहीं हो, केवल व्यान ही तुम्हारे वशमें है ' ॥
समानः प्रचचाराथ उदानस्तमुवाच ह ।
श्रेष्ठोऽहमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना ॥ १८ ॥
यह सुनकर समान पूर्ववत् चलने लगा । तब उदानने उससे कहा- ' मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, इसका क्या कारण है? यह सुनो ॥ १८ ॥
मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ॥ १ ९ ॥ ' मेरे लीन होनेपर प्राणियोंके शरीरमें स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होनेपर सब - के - सब संचार करने लगते हैं । इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ ( फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा ) ' ॥ १ ९ ॥ ततः प्रालीयतोदानः पुनश्च प्रचचार ह ।
प्राणापानौ समानश्च व्यानश्चैव तमब्रुवन् ।
उदान न त्वं श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव ॥ २० ॥
यह सुनकर उदान कुछ देरके लिये लीन हो गया और पुनः चलने लगा । तब प्राण, अपान, समान और व्यानने उससे कहा – 'उदान! तुम हमलोगोंसे श्रेष्ठ नहीं हो । केवल
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व्यान ही तुम्हारे वशमें है ' ॥ २० ॥
ब्राह्मणउवाच
ततस्तानब्रवीद् ब्रह्मा समवेतान् प्रजापतिः ।
सर्वे श्रेष्ठा न वा श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः ॥ २१ ॥
ब्राह्मण कहते हैं - तदनन्तर वे सभी प्राण ब्रह्माजीके पास एकत्र हुए । उस समय उन सबसे प्रजापति ब्रह्माने कहा -' वायुगण! तुम सभी श्रेष्ठ हो । अथवा तुममेंसे कोई भी श्रेष्ठ नहीं है । तुम सबका धारणरूप धर्म एक- दूसरेपर अवलम्बित है ॥ २१ ॥
सर्वे स्वविषये श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः ।
इति तानब्रवीत् सर्वान् समवेतान् प्रजापतिः ॥ २२ ॥
‘ सभी अपने - अपने स्थानपर श्रेष्ठ हो और सबका धर्म एक- दूसरेपर अवलम्बित है । ' इस प्रकार वहाँ एकत्र हुए सब प्राणोंसे प्रजापतिने फिर कहा- ॥ २२ ॥
एकः स्थिरश्चास्थिरश्च विशेषात् पञ्च वायवः ।
एक एव ममैवात्मा बहुधाप्युपचीयते ॥ २३ ॥
'एक ही वायु स्थिर और अस्थिररूपसे विराजमान है । उसीके विशेष भेदसे पाँच वायु होते हैं । इस तरह एक ही मेरा आत्मा अनेक रूपोंमें वृद्धिको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
परस्परस्य सुहृदो भावयन्तः परस्परम् ।
स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारयध्वं परस्परम् ॥ २४ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो । तुम कुशलपूर्वक जाओ और एक- दूसरेके हितैषी रहकर परस्परकी उन्नतिमें सहायता पहुँचाते हुए एक- दूसरेको धारण किये रहो ' ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मण-गीताविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल २५३ श्लोक हैं ) OF FULL
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चतुर्विंशोऽध्यायः देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन ब्राह्मणउवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादमृषेर्देवमतस्य च ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा — प्रिये! इस विषयमें देवर्षि नारद और देवमतके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥
देवमत उवाच
जन्तोः संजायमानस्य किं नु पूर्वं प्रवर्तते ।
प्राणोऽपानः समानो वा व्यानो वोदान एव च ॥ २ ॥
देवमतने पूछा — देवर्षे! जब जीव जन्म लेता है, उस समय सबसे पहले उसके शरीरमें किसकी प्रवृत्ति होती है? प्राण, अपान, समान, व्यान अथवा उदानकी? ॥ २ ॥
नारद उवाच
येनायं सृज्यते जन्तुस्ततोऽन्यः पूर्वमेति तम् ।
प्राणद्वन्द्वं हि विज्ञेयं तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत् ॥ ३ ॥
नारदजीने कहा — मुने! जिस निमित्त कारणसे इस जीवकी उत्पत्ति होती है, उससे भिन्न दूसरा पदार्थ भी पहले कारण-रूपसे उपस्थित होता है । वह है प्राणोंका द्वन्द्व । जो ऊपर ( देवलोक), तिर्यक् ( मनुष्यलोक ) और अधोलोक ( पशु आदि) में व्याप्त है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ३ ॥
देवमत उवाच
केनायं सृज्यते जन्तुः कश्चान्यः पूर्वमेति तम् ।
प्राणद्वन्द्वं च मे ब्रूहि तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत् ॥४ ॥
देवमतने पूछा – नारदजी! किस निमित्त कारणसे इस जीवकी सृष्टि होती है? दूसरा कौन पदार्थ पहले कारणरूपसे उपस्थित होता है तथा प्राणोंका द्वन्द्व क्या है, जो ऊपर, मध्यमें और नीचे व्याप्त है? ॥ ४ ॥
नारद उवाच
संकल्पाज्जायते हर्षः शब्दादपि च जायते ।
रसात् संजायते चापि रूपादपि च जायते ॥ ५ ॥