06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1681–1690
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1681–1690
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एवमुक्तः स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव ।
सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे ॥ ५ ॥
पत्नीके ऐसा कहनेपर वे शान्तचित्तवाले ब्राह्मण देवता हँसते हुए -से बोले –‘सौभाग्यशालिनि! तुम पापसे सदा दूर रहती हो; अतः तुम्हारे इस कथनके लिये मैं बुरा नहीं मानता ॥ ५ ॥
ग्राह्यं दृश्यं च सत्यं वा यदिदं कर्म विद्यते ।
एतदेव व्यवस्यन्ति कर्म कर्मेति कर्मिणः ॥ ६ ॥
' संसारमें जो ग्रहण करनेयोग्य दीक्षा और व्रत आदि हैं तथा इन आँखोंसे दिखायी देनेवाले जो स्थूल कर्म हैं, उन्हींको वस्तुतः कर्म माना जाता है । कर्मठ लोग ऐसे ही कर्मको कर्मके नामसे पुकारते हैं ॥ ६ ॥
मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः ।
नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते ॥ ७ ॥
‘ किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं । इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है ॥ ७ ॥
कर्मणा मनसा वाचा शुभं वा यदि वाशुभम् ।
जन्मादिमूर्तिभेदान्तं कर्म भूतेषु वर्तते ॥ ८ ॥
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मनसे, वाणीसे तथा क्रियाद्वारा जो भी शुभ या अशुभ कार्य होता है, वह तथा जन्म, स्थिति, विनाश एवं शरीरभेद आदि कर्म प्राणियोंमें विद्यमान हैं ॥ ८ ॥
रक्षोभिर्वध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु वर्त्मसु ।
आत्मस्थमात्मना तेभ्यो दृष्टमायतनं मया ॥ ९ ॥
' जब राक्षसों — दुर्जनोंने जहाँ सोम और घृत आदि दृश्य द्रव्योंका उपयोग होता है, उन कर्म- मार्गोंका विनाश आरम्भ कर दिया, तब मैंने उनसे विरक्त होकर स्वयं ही अपने भीतर स्थित हुए आत्माके स्थानको देखा ॥ ९ ॥
यत्र तद् ब्रह्म निर्द्वन्द्वं यत्र सोमः सहाग्निना ।
व्यवायं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारयन् ॥ १० ॥
'जहाँ द्वन्द्वोंसे रहित वह परब्रह्म परमात्मा विराजमान है, जहाँ सोम अग्निके साथ नित्य समागम करता है तथा जहाँ सब भूतोंको धारण करनेवाला धीर समीर निरन्तर चलता रहता है ॥ १० ॥
यत्र ब्रह्मादयो युक्तास्तदक्षरमुपासते ।
विद्वांसः सुव्रता यत्र शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ ११ ॥
'जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शान्तचित्त जितेन्द्रिय विद्वान् योगयुक्त होकर उस अविनाशी ब्रह्मकी उपासना करते हैं ॥ ११ ॥
घ्राणेन न तदाघ्रेयं नास्वाद्यं चैव जिह्वया ।
स्पर्शनेन तदस्पृश्यं मनसा त्ववगम्यते ॥ १२ ॥
‘ वह अविनाशी ब्रह्म घ्राणेन्द्रियसे सूँघने और जिह्वाद्वारा आस्वादन करनेयोग्य नहीं है । स्पर्शेन्द्रिय — त्वचाद्वारा उसका स्पर्श भी नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिके द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है ॥ १२ ॥
चक्षुषामविषह्यं च यत् किंचिच्छ्रवणात् परम् ।
अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम् ॥ १३ ॥
'वह नेत्रोंका विषय नहीं हो सकता । वह अनिर्वचनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रियकी पहुँचसे सर्वथा परे है । गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी लक्षण उसमें उपलब्ध नहीं है ॥ १३ ॥
यतः प्रवर्तते तन्त्रं यत्र च प्रतितिष्ठति ।
प्राणोऽपानः समानश्च व्यानश्चोदान एव च ॥ १४ ॥
तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च । ‘ उसीसे सृष्टि आदिका विस्तार होता है और उसीमें उसकी स्थिति है । प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान - से उसीसे प्रकट होते और फिर उसीमें प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ १४ ३ ॥ समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः ॥ १५ ॥
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तस्मिंल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च ।
अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति ।
तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ न मुञ्चतः ॥ १६ ॥
' समान और व्यान – इन दोनोंके बीचमें प्राण और अपान विचरते हैं । उस अपानसहित प्राणके लीन होनेपर समान और व्यानका भी लय हो जाता है । अपान और प्राणके बीचमें उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है । इसीलिये सोये हुए पुरुषको प्राण और अपान नहीं छोड़ते हैं ॥ १५-१६ ॥
प्राणानामायतत्वेन तमुदानं प्रचक्षते ।
तस्मात् तपो व्यवस्यन्ति मद्गतं ब्रह्मवादिनः ॥ १७ ॥
‘ प्राणोंका आयतन ( आधार) होनेके कारण उसे विद्वान् पुरुष उदान कहते हैं । इसलिये वेदवादी मुझमें स्थित तपका निश्चय करते हैं ॥ १७ ॥
तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम् ।
अग्निर्वैश्वानरो मध्ये सप्तधा दीव्यतेऽन्तरा ॥ १८ ॥
'एक दूसरेके सहारे रहनेवाले तथा सबके शरीरोंमें संचार करनेवाले उन पाँचों प्राणवायुओंके मध्यभागमें जो समान वायुका स्थान नाभिमण्डल है, उसके बीचमें स्थित हुआ वैश्वानर अग्नि सात रूपोंमें प्रकाशमान है ॥ १८ ॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् च श्रोत्रं च पञ्चमम् ।
मनो बुद्धिश्च सप्तैता जिह्वा वैश्वानरार्चिषः ॥ १ ९ ॥
घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च ।
मन्तव्यमथ बोद्धव्यं ताः सप्त समिधो मम ॥ २० ॥
‘ घ्राण ( नासिका ), जिह्वा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान एवं मन तथा बुद्धि — ये उस वैश्वानर अग्निकी सात जिह्वाएँ हैं । सूँघनेयोग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीनेयोग्य रस, स्पर्श करनेयोग्य`वस्तु, सुननेयोग्य शब्द, मनके द्वारा मनन करने और बुद्धिके द्वारा समझने योग्य विषय — ये सात मुझ वैश्वानरकी समिधाएँ हैं ॥ १ ९ -२० ॥
घ्राता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पञ्चमः ।
मन्ता बोद्धा च सप्तैते भवन्ति परमर्त्विजः ॥ २१ ॥
‘ सूँघनेवाला, खानेवाला, देखनेवाला, स्पर्श करने वाला, पाँचवाँ श्रवण करनेवाला एवं मनन करनेवाला और समझनेवाला - ये सात श्रेष्ठ ऋत्विज् हैं ॥ २१ ॥
प्रेये पेये च दृश्ये च स्पृश्ये श्रव्ये तथैव च ।
मन्तव्येऽप्यथ बोद्धव्ये सुभगे पश्य सर्वदा ॥ २२ ॥
' सुभगे! सूँघनेयोग्य, पीनेयोग्य, देखनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, सुनने, मनन करने तथा समझनेयोग्य विषय –इन सबके ऊपर तुम सदा दृष्टिपात करो ( इनमें हविष्य- बुद्धि करो ) ॥ २२ ॥
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हवींष्यग्निषु होतारः सप्तधा सप्त सप्तसु ।
सम्यक् प्रक्षिप्य विद्वांसो जनयन्ति स्वयोनिषु ॥ २३ ॥
' पूर्वोक्त सात होता उक्त सात हविष्योंका सात रूपोंमें विभक्त हुए वैश्वानरमें भलीभाँति हवन करके ( अर्थात् विषयोंकी ओरसे आसक्ति हटाकर) विद्वान् पुरुष अपने तन्मात्रा आदि योनियोंमें शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं ॥ २३ ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।
मनो बुद्धिश्च सप्तैता योनिरित्येव शब्दिताः ॥ २४ ॥
' पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन और बुद्धि - ये सात योनि कहलाते हैं ॥ २४ ॥
हविर्भूता गुणाः सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं गुणम् ।
अन्तर्वासमुषित्वा च जायन्ते स्वासु योनिषु ॥ २५ ॥
' इनके जो समस्त गुण हैं, वे हविष्यरूप हैं । जो अग्निजनित गुण ( बुद्धिवृत्ति) -में प्रवेश करते हैं । वे अन्तःकरणमें संस्काररूपसे रहकर अपनी योनियोंमें जन्म लेते हैं ॥ २५ ॥
तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलये भूतभावने ।
ततः संजायते गन्धस्ततः संजायते रसः ॥ २६ ॥
‘ वे प्रलयकालमें अन्तःकरणमें ही अवरुद्ध रहते और भूतोंकी सृष्टिके समय वहींसे प्रकट होते हैं । वहींसे गन्ध और वहींसे रसकी उत्पत्ति होती है ॥ २६ ॥
ततः संजायते रूपं ततः स्पर्शोऽभिजायते ।
ततः संजायते शब्दः संशयस्तत्र जायते ।
ततः संजायते निष्ठा जन्मैतत् सप्तधा विदुः ॥ २७ ॥
‘ वहींसे रूप, स्पर्श और शब्दका प्राकट्य होता है । संशयका जन्म भी वहीं होता है और निश्चयात्मिका बुद्धि भी वहीं पैदा होती है । यह सात प्रकारका जन्म माना गया है ॥ २७ ॥
अनेनैव प्रकारेण प्रगृहीतं पुरातनैः ।
पूर्णाहुतिभिरापूर्णास्त्रिभिः पूर्यन्ति तेजसा ॥ २८ ॥
' इसी प्रकारसे पुरातन ऋषियोंने श्रुतिके अनुसार घ्राण आदिका रूप ग्रहण किया है । ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय – इन तीन आहुतियोंसे समस्त लोक परिपूर्ण हैं । वे सभी लोक आत्मज्योतिसे परिपूर्ण होते हैं' ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्रह्मगीतासु विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
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एकविंशोऽध्यायः दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन ब्राह्मणउवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
निबोध दशहोतॄणां विधानमथ यादृशम् ॥ १ ॥
ब्राह्मण कहते हैं — प्रिये! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं । दस होता मिलकर जिस प्रकार यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वह सुनो ॥ १ ॥
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चरणौ करौ ।
उपस्थं वायुरिति वा होतॄणि दश भामिनि ॥ २ ॥
भामिनि! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा ( वाक् और रसना), नासिका, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा- से दस होता हैं ॥ २ ॥
शब्दस्पर्शी रूपरसौ गन्धो वाक्यं क्रिया गतिः ।
रेतोमूत्रपुरीषाणां त्यागो दश हवींषि च ॥ ३ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, वीर्य, मूत्रका त्याग और मल- त्याग— ये दस विषय ही दस हविष्य हैं ॥ ३ ॥
दिशो वायू रविश्चन्द्रः पृथ्व्यग्नी विष्णुरेव च ।
इन्द्रः प्रजापतिर्मित्रमग्नयो दश भामिनि ॥ ४ ॥
भामिनि! दिशा, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति और मित्र — ये दस देवता अग्नि हैं ॥ ४ ॥
दशेन्द्रियाणि होतॄणि हवींषि दश भाविनि ।
विषया नाम समिधो हूयन्ते तु दशाग्निषु ॥ ५ ॥
भाविनि! दस इन्द्रियरूपी होता दस देवतारूपी अग्निमें दस विषयरूपी हविष्य एवं समिधाओंका हवन करते हैं ( इस प्रकार मेरे अन्तरमें निरन्तर यज्ञ हो रहा है; फिर मैं अकर्मण्य कैसे हूँ? ) ॥ ५ ॥
चित्तं स्रुवश्च वित्तं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् ।
सुविभक्तमिदं सर्वं जगदासीदिति श्रुतम् ॥ ६ ॥
इस यज्ञमें चित्त ही स्रुवा तथा पवित्र एवं उत्तम ज्ञान ही धन है । यह सम्पूर्ण जगत् पहले भलीभाँति विभक्त था - ऐसा सुना गया है ॥ ६ ॥
सर्वमेवाथ विज्ञेयं चित्तं ज्ञानमवेक्षते ।
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रेतःशरीरभृत्काये विज्ञाता तु शरीरभृत् ॥ ७ ॥
जाननेमें आनेवाला यह सारा जगत् चित्तरूप ही है, वह ज्ञानकी अर्थात् प्रकाशककी अपेक्षा रखता है तथा वीर्यजनित शरीर-समुदायमें रहनेवाला शरीरधारी जीव उसको जाननेवाला है ॥ ७ ||
शरीरभृद् गार्हपत्यस्तस्मादन्यः प्रणीयते ।
मनश्चाहवनीयस्तु तस्मिन् प्रक्षिप्यते हविः ॥ ८ ॥
वह शरीरका अभिमानी जीव गार्हपत्य अग्नि है । उससे जो दूसरा पावक प्रकट होता है, वह मन है । मन आहवनीय अग्नि है । उसीमें पूर्वोक्त हविष्यकी आहुति दी जाती है ॥ ८ ॥
ततो वाचस्पतिर्जज्ञे तं मनः पर्यवेक्षते ।
रूपं भवति वैवर्णं समनुद्रवते मनः ॥ ९ ॥
उससे वाचस्पति ( वेदवाणी) -का प्राकट्य होता है । उसे मन देखता है । मनके अनन्तर रूपका प्रादुर्भाव होता है, जो नील- पीत आदि वर्णोंसे रहित होता है । वह रूप मनकी ओर दौड़ता है ॥ ९ ॥
ब्राह्मण्युवाच
कस्माद् वागभवत् पूर्वं कस्मात् पश्चान्मनोऽभवत् ।
मनसा चिन्तितं वाक्यं यदा समभिपद्यते ॥ १० ॥
ब्राह्मणी बोली - प्रियतम! किस कारणसे वाक्की उत्पत्ति पहले हुई और क्यों मन पीछे हुआ? जब कि मनसे सोचे- विचारे वचनको ही व्यवहारमें लाया जाता है ॥ १० ॥
केन विज्ञानयोगेन मतिश्चित्तं समास्थिता ।
समुन्नीता नाध्यगच्छत् को वै तां प्रतिबाधते ॥ ११ ॥
किस विज्ञानके प्रभावसे मति चित्तके आश्रित होती है? वह ऊँचे उठायी जानेपर विषयोंकी ओर क्यों नहीं जाती? कौन उसके मार्गमें बाधा डालता है? ॥ ११ ॥
ब्राह्मणउवाच
तामपानः पतिर्भूत्वा तस्मात् प्रेषत्यपानताम् ।
तां गतिं मनसः प्राहुर्मनस्तस्मादपेक्षते ॥ १२ ॥
ब्राह्मणने कहा – प्रिये! अपान पतिरूप होकर उस मतिको अपानभावकी ओर ले जाता है । वह अपानभावकी प्राप्ति मनकी गति बतायी गयी है, इसलिये मन उसकी अपेक्षा रखता है ॥ १२ ॥
प्रश्नं तु वाङ्मनसोर्मां यस्मात् त्वमनुपृच्छसि ।
तस्मात् ते वर्तयिष्यामि तयोरेव समाह्वयम् ॥ १३ ॥
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परंतु तुम मुझसे वाणी और मनके विषयमें ही प्रश्न करती हो, इसलिये मैं तुम्हें उन्हीं दोनोंका संवाद बताऊँगा ॥ १३ ॥
उभे वाङ्मनसी गत्वा भूतात्मानमपृच्छताम् ।
आवयोः श्रेष्ठमाचश्च छिन्धि नौ संशयं विभो ॥ १४ ॥
मन और वाणी दोनोंने जीवात्माके पास जाकर पूछा - 'प्रभो! हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? यह बताओ और हमारे संदेहका निवारण करो ' ॥ १४ ॥
मन इत्येव भगवांस्तदा प्राह सरस्वती ।
अहं वै कामधुक् तुभ्यमिति तं प्राह वागथ ॥ १५ ॥
तब भगवान् आत्मदेवने कहा-' मन ही श्रेष्ठ है। ' यह सुनकर सरस्वती बोलीं- ' मैं ही तुम्हारे लिये कामधेनु बनकर सब कुछ देती हूँ । ' इस प्रकार वाणीने स्वयं ही अपनी श्रेष्ठता बतायी ॥ १५ ॥
ब्राह्मणउवाच
स्थावरं जङ्गमं चैव विद्धयुभे मनसी मम ।
स्थावरं मत्सकाशे वै जङ्गमं विषये तव ॥ १६ ॥
ब्राह्मण देवता कहते हैं- प्रिये! स्थावर और जंगम ये दोनों मेरे मन हैं । स्थावर अर्थात् बाह्य इन्द्रियोंसे गृहीत होनेवाला जो यह जगत् है, वह मेरे समीप है और जंगम अर्थात् इन्द्रियातीत जो स्वर्ग आदि है, वह तुम्हारे अधिकारमें है ॥ १६ ॥
यस्तु तं विषयं गच्छेन्मन्त्रो वर्णः स्वरोऽपि वा ।
तन्मनो जङ्गमो नाम तस्मादसि गरीयसी ॥ १७ ॥
जो मन्त्र, वर्ण अथवा स्वर उस अलौकिक विषयको प्रकाशित करता है, उसका अनुसरण करनेवाला मन भी यद्यपि जंगम नाम धारण करता है तथापि वाणीस्वरूपा तुम्हारे द्वारा ही मनका उस अतीन्द्रिय जगत्में प्रवेश होता है । इसलिये तुम मनसे भी श्रेष्ठ एवं गौरवशालिनी हो ॥ १७ ॥
यस्मादपि समाधिस्ते स्वयमभ्येस्त शोभने ।
तस्मादुच्छ्वासमासाद्य प्रवक्ष्यामि सरस्वति ॥ १८ ॥
क्योंकि शोभामयी सरस्वति! तुमने स्वयं ही पास आकर समाधान अर्थात् अपने
पक्षकी पुष्टि की है । इससे मैं उच्छ्वास लेकर कुछ कहूँगा ॥ १८ ॥
प्राणापानान्तरे देवी वाग् वै नित्यं स्म तिष्ठति ।
प्रेर्यमाणा महाभागे विना प्राणमपानती ।
प्रजापतिमुपाधावत् प्रसीद भगवन्निति ॥ १ ९ ॥
महाभागे! प्राण और अपानके बीचमें देवी सरस्वती सदा विद्यमान रहती हैं । वह प्राणकी सहायताके बिना जब निम्नतम दशाको प्राप्त होने लगी, तब दौड़ी हुई प्रजापतिके
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पास गयी और बोली- ' भगवन्! प्रसन्न होइये ' ॥ १ ९ ॥
ततः प्राणः प्रादुरभूद् वाचमाप्याययन् पुनः ।
तस्मादुच्छ्वासमासाद्य न वाग् वदति कर्हिचित् ॥ २० ॥
तब वाणीको पुष्ट - सा करता हुआ पुनः प्राण प्रकट हुआ । इसीलिये उच्छ्वास लेते समय वाणी कभी कोई शब्द नहीं बोलती है ॥ २० ॥
घोषिणी जातनिर्घोषा नित्यमेव प्रवर्तते ।
तयोरपि च घोषिण्या निर्घोषैव गरीयसी ॥ २१ ॥
वाणी दो प्रकारकी होती है –एक घोषयुक्त (स्पष्ट सुनायी देनेवाली ) और दूसरी घोषरहित, जो सदा सभी अवस्थाओंमें विद्यमान रहती है । इन दोनोंमें घोषयुक्त वाणीकी अपेक्षा घोषरहित ही श्रेष्ठतम है ( क्योंकि घोषयुक्त वाणीको प्राणशक्तिकी अपेक्षा रहती है और घोषरहित उसकी अपेक्षाके बिना भी स्वभावतः उच्चरित होती रहती है ) ॥ २१ ॥
गौरिव प्रसवत्यर्थान् रसमुत्तमशालिनी ।
सततं स्यन्दते ह्येषा शाश्वतं ब्रह्मवादिनी ॥ २२ ॥
दिव्यादिव्यप्रभावेण भारती गौः शुचिस्मिते ।
एतयोरन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः स्यन्दमानयोः ॥ २३ ॥
शुचिस्मिते! घोषयुक्त ( वैदिक ) वाणी भी उत्तम गुणोंसे सुशोभित होती है । वह दूध देनेवाली गायकी भाँति मनुष्योंके लिये सदा उत्तम रस झरती एवं मनोवांछित पदार्थ उत्पन्न करती है और ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्वाणी ( शाश्वत ब्रह्म) -का बोध करानेवाली है । इस प्रकार वाणीरूपी गौ दिव्य और अदिव्य प्रभावसे युक्त है । दोनों ही सूक्ष्म हैं और अभीष्ट पदार्थका प्रस्रव करने वाली हैं । इन दोनोंमें क्या अन्तर है, इसको स्वयं देखो ॥ २२-२३ ॥ ब्राह्मण्युवाच
अनुत्पन्नेषु वाक्येषु चोद्यमाना विवक्षया ।
किन्नु पूर्वं तदा देवी व्याजहार सरस्वती ॥ २४ ॥
ब्राह्मणीने पूछा — नाथ! जब वाक्य उत्पन्न नहीं हुए थे, उस समय कुछ कहनेकी इच्छासे प्रेरित की हुई सरस्वती देवीने पहले क्या कहा था? ॥ २४ ॥
ब्राह्मणउवाच प्राणेन या सम्भवते शरीरे प्राणादपानं प्रतिपद्यते च । उदानभूता च विसृज्य देहं व्यानेन सर्वं दिवमावृणोति ॥ २५ ॥
ततः समाने प्रतितिष्ठतीह
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इत्येव पूर्वं प्रजजल्प वाणी । तस्मान्मनः स्थावरत्वाद् विशिष्टं तथा देवी जङ्गमत्वाद् विशिष्टा ॥ २६ ॥
ब्राह्मणने कहा — प्रिये! वह वाक् प्राणके द्वारा शरीरमें प्रकट होती है, फिर प्राणसे अपानभावको प्राप्त होती है । तत्पश्चात् उदानस्वरूप होकर शरीरको छोड़कर व्यानरूपसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त कर लेती है । तदनन्तर समान वायुमें प्रतिष्ठित होती है । इस प्रकार वाणीने पहले अपनी उत्पत्तिका प्रकार बताया था । * इसलिये स्थावर होनेके कारण मन श्रेष्ठ है और जंगम होनेके कारण वाग्देवी श्रेष्ठ हैं ॥ २५-२६ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मण-गीताविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
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द्वाविंशोऽध्यायः मन - बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन- इन्द्रिय - संवादका वर्णन ब्राह्मणउवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सुभगे सप्तहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा – सुभगे! इसी विषयमें इस पुरातन इतिहासका भी उदाहरण दिया जाता है । सात होताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसे सुनो ॥ १ ॥
घ्राणश्चक्षुश्च जिह्वा च त्वक् श्रोत्रं चैव पञ्चमम् ।
मनो बुद्धिश्च सप्तैते होतारः पृथगाश्रिताः ॥ २ ॥
सूक्ष्मेऽवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतरम् ।
एतान् वै सप्तहोतॄंस्त्वं स्वभावाद् विद्धि शोभने ॥ ३ ॥
नासिका, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि- ये सात होता अलग-अलग रहते हैं । यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक- दूसरेको नहीं देखते हैं । शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो ॥ २-३ ॥ ब्राह्मण्युवाच
सूक्ष्मेऽवकाशे सन्तस्ते कथं नान्योन्यदर्शिनः ।
कथंस्वभावा भगवन्नेतदाचक्ष्व मे प्रभो ॥ ४ ॥
ब्राह्मणीने पूछा — भगवन्! जब सभी सूक्ष्म शरीरमें ही रहते हैं, तब एक- दूसरेको देख क्यों नहीं पाते? प्रभो! उनके स्वभाव कैसे हैं? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ॥
ब्राह्मणउवाच
गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता ।
परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कर्हिचित् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणने कहा – प्रिये! ( यहाँ देखनेका अर्थ है, जानना ) गुणोंको न जानना ही गुणवान्को न जानना कहलाता है और गुणोंको जानना ही गुणवान्को जानना है । ये नासिका आदि सात होता एक- दूसरेके गुणोंको कभी नहीं जान पाते हैं ( इसीलिये कहा गया है कि ये एक- दूसरेको नहीं देखते हैं ) ॥ ५ ॥
जिह्वा चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न गन्धानधिगच्छन्ति घ्राणस्तानधिगच्छति ॥ ६ ॥