06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1711–1720
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1711–1720
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तस्मिन् वने सप्त महाद्रुमाश्च फलानि सप्तातिथयश्च सप्त । सप्ताश्रमाः सप्त समाधयश्च दीक्षाश्च सप्तैतदरण्यरूपम् ॥ ७ ॥
वहाँ सात बड़े -बड़े वृक्ष हैं, सात उन वृक्षोंके फल हैं तथा सात ही उन फलोंके भोक्ता अतिथि हैं । सात आश्रम हैं । वहाँ सात प्रकारकी समाधि और सात प्रकारकी दीक्षाएँ हैं । यही उस वनका स्वरूप है ॥ ७ ॥
पञ्चवर्णानि दिव्यानि पुष्पाणि च फलानि च ।
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ ८ ॥
वहाँके वृक्ष पाँच प्रकारके रंगोंके दिव्य पुष्पों और फलोंकी सृष्टि करते हुए सब ओरसे वनको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ ८ ॥
सुवर्णानि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च ।
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ ९ ॥
वहाँ दूसरे वृक्षोंने सुन्दर दो रंगवाले पुष्प और फल उत्पन्न करते हुए उस वनको सब ओरसे व्याप्त कर रखा है ॥ ९ ॥
सुरभीणि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च ।
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ १० ॥
तीसरे वृक्ष वहाँ सुगन्धयुक्त दो रंगवाले पुष्प और फल प्रदान करते हुए उस वनको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ १० ॥
सुरभीण्येकवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च ।
सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद् वनम् ॥ ११ ॥
चौथे वृक्ष सुगन्धयुक्त केवल एक रंगवाले पुष्प और फलोंकी सृष्टि करते हुए उस वनके सब ओर फैले हैं ॥ ११ ॥
बहून्यव्यक्तवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च ।
विसृजन्तौ महावृक्षौ तद् वनं व्याप्य तिष्ठतः ॥ १२ ॥
वहाँ दो महावृक्ष बहुत - से अव्यक्त रंगवाले पुष्प और फलोंकी रचना करते हुए उस वनको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ १२ ॥
एको वह्निः सुमना ब्राह्मणोऽत्र पञ्चेन्द्रियाणि समिधश्चात्र सन्ति । तेभ्यो मोक्षाः सप्त फलन्ति दीक्षा गुणाः फलान्यतिथयः फलाशाः ॥ १३ ॥
उस वनमें एक ही अग्नि है, जीव शुद्धचेता ब्राह्मण है, पाँच इन्द्रियाँ समिधाएँ हैं । उनसे जो मोक्ष प्राप्त होता है, वह सात प्रकारका है । इस यज्ञकी दीक्षाका फल अवश्य होता है ।
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गुण ही फल है । सात अतिथि ही फलोंके भोक्ता हैं ॥ १३ ॥
आतिथ्यं प्रतिगृह्णन्ति तत्र तत्र महर्षयः ।
अचितेषु प्रलीनेषु तेष्वन्यद् रोचते वनम् ॥ १४ ॥
वे महर्षिगण इस यज्ञमें आतिथ्य ग्रहण करते हैं और पूजा स्वीकार करते ही उनका लय हो जाता है । तत्पश्चात् वह ब्रह्मरूप वन विलक्षणरूपसे प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥
प्रज्ञावृक्षं मोक्षफलं शान्तिच्छायासमन्वितम् ।
ज्ञानाश्रयं तृप्तितोयमन्तः क्षेत्रज्ञभास्करम् ॥ १५ ॥
उसमें प्रज्ञारूपी वृक्ष शोभा पाते हैं, मोक्षरूपी फल लगते हैं और शान्तिमयी छाया फैली रहती है । ज्ञान वहाँका आश्रयस्थान और तृप्ति जल है। उस वनके भीतर आत्मारूपी सूर्यका प्रकाश छाया रहता है ॥ १५ ॥
येऽधिगच्छन्ति तं सन्तस्तेषां नास्ति भयं पुनः ।
ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक् च तस्य नान्तोऽधिगम्यते ॥ १६ ॥
जो श्रेष्ठ पुरुष उस वनका आश्रय लेते हैं, उन्हें फिर कभी भय नहीं होता । वह वन
ऊपर- नीचे तथा इधर- उधर सब ओर व्याप्त है । उसका कहीं भी अन्त नहीं है ॥ १६ ॥
सप्त स्त्रियस्तत्र वसन्ति सद्य- स्त्ववाङ्मुखा भानुमत्यो जनित्र्यः । ऊर्ध्वं रसानाददते प्रजाभ्यः सर्वान् यथा सत्यमनित्यता च ॥ १७ ॥
वहाँ सात स्त्रियाँ निवास करती हैं, जो लज्जाके मारे अपना मुँह नीचेकी ओर किये रहती हैं । वे चिन्मय ज्योतिसे प्रकाशित होती हैं । वे सबकी जननी हैं और वे उस वनमें रहनेवाली प्रजासे सब प्रकारके उत्तम रस उसी प्रकार ग्रहण करती हैं, जैसे अनित्यता सत्यको ग्रहण करती है ॥ १७ ॥
तत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनस्तत्रोपयन्ति च ।
सप्त सप्तर्षयः सिद्धा वसिष्ठप्रमुखैः सह ॥ १८ ॥
सात सिद्ध सप्तर्षि वसिष्ठ आदिके साथ उसी वनमें लीन होते और उसीसे उत्पन्न होते हैं ॥ १८ ॥
यशो वर्चो भगश्चैव विजयः सिद्धतेजसः ।
एवमेवानुवर्तन्ते सप्त ज्योतींषि भास्करम् ॥ १ ९ ॥
यश, प्रभा, भग ( ऐश्वर्य), विजय, सिद्धि ( ओज) और तेज – ये सात ज्योतियाँ उपर्युक्त आत्मारूपी सूर्यका ही अनुसरण करती हैं ॥ १ ९ ॥
गिरयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः ।
नद्यश्च सरितो वारि वहन्त्यो ब्रह्मसम्भवम् ॥ २० ॥
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उस ब्रह्मतत्त्वमें ही गिरि, पर्वत, झरनें, नदी और सरिताएँ स्थित हैं, जो ब्रह्मजनित जल बहाया करती हैं ॥ २० ॥
नदीनां सङ्गमश्चैव वैताने समुपह्वरे ।
स्वात्मतृप्ता यतो यान्ति साक्षादेव पितामहम् ॥ २१ ॥
नदियोंका संगम भी उसीके अत्यन्त गूढ़ हृदयाकाशमें संक्षेपसे होता है । जहाँ योगरूपी यज्ञका विस्तार होता रहता है । वही साक्षात् पितामहका स्वरूप है । आत्मज्ञानसे तृप्त पुरुष उसीको प्राप्त होते हैं ॥ २१ ॥
कृशाशाः सुव्रताशाश्च तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
आत्मन्यात्मानमाविश्य ब्रह्माणं समुपासते ॥ २२ ॥
जिनकी आशा क्षीण हो गयी है, जो उत्तम व्रतके पालनकी इच्छा रखते हैं । तपस्यासे जिनके सारे पाप दग्ध हो गये हैं । वे ही पुरुष अपनी बुद्धिको आत्मनिष्ठ करके परब्रह्मकी उपासना करते हैं ॥ २२ ॥
शममप्यत्र शंसन्ति विद्यारण्यविदो जनाः ।
तदारण्यमभिप्रेत्य यथाधीरभिजायत ॥ २३ ॥
विद्या ( ज्ञान ) -के ही प्रभावसे ब्रह्मरूपी वनका स्वरूप समझमें आता है । इस बातको जाननेवाले मनुष्य इस वनमें प्रवेश करनेके उद्देश्यसे शम ( मनोनिग्रह ) - की ही प्रशंसा करते हैं, जिससे बुद्धि स्थिर होती है ॥ २३ ॥
एतदेवेदृशं पुण्यमरण्यं ब्राह्मणा विदुः ।
विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिता ॥ २४ ॥
ब्राह्मण ऐसे गुणवाले इस पवित्र वनको जानते हैं और तत्त्वदर्शीके उपदेशसे प्रबुद्ध हुए आत्मज्ञानी पुरुष उस ब्रह्मवनको शास्त्रतः जानकर शम आदि साधनोंके अनुष्ठानमें लग जाते हैं ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीतासम्बन्धी सत्ताईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
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अष्टाविंशोऽध्यायः ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद* ब्राह्मणउवाच गन्धान् न जिघ्रामि रसान् न वेद्मि रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि । न चापि शब्दान् विविधान् शृणोमि न चापि संकल्पमुपैमि कंचित् ॥ १ ॥
ब्राह्मण कहते हैं- मैं न तो गन्धोंको सूँघता हूँ, न रसोंका आस्वादन करता हूँ, न रूपको देखता हूँ, न किसी वस्तुका स्पर्श करता हूँ, न नाना प्रकारके शब्दोंको सुनता हूँ और न कोई संकल्प ही करता हूँ ॥ १ ॥
अर्थानिष्टान् कामयते स्वभावः सर्वान् द्वेष्यान् प्रद्विषते स्वभावः । कामद्वेषायुद्भवतः स्वभावात् प्राणापानौ जन्तुदेहान्निवेश्य ॥ २ ॥
स्वभाव ही अभीष्ट पदार्थोंकी कामना रखता है, स्वभाव ही सम्पूर्ण द्वेष्य वस्तुओंके प्रति द्वेष करता है । जैसे प्राण और अपान स्वभावसे ही प्राणियोंके शरीरोंमें प्रविष्ट होकर अन्न- पाचन आदिका कार्य करते रहते हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही राग और द्वेषकी उत्पत्ति होती है । तात्पर्य यह कि बुद्धि आदि इन्द्रियाँ स्वभावसे ही पदार्थोंमें बर्त रही हैं ॥ २ ॥
तेभ्यश्चान्यांस्तेषु नित्यांश्च भावान् भूतात्मानं लक्षयेरन् शरीरे । तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः ।कथंचित् कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥ ३ ॥
इन बाह्य इन्द्रियों और विषयोंसे भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्तिके वासनामय विषय एवं इन्द्रियाँ हैं तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको शरीरके भीतर योगीजन देख पाते हैं । उसी भूतात्मामें स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी काम, क्रोध, जरा और मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता ॥ ३ ॥
अकामयानस्य च सर्वकामा- नविद्विषाणस्य च सर्वदोषान् ।
न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा- स्तोयस्य बिन्दोरिव पुष्करेषु ॥ ४ ॥
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मैं सम्पूर्ण कामनाओंमेंसे किसीकी कामना नहीं करता । समस्त दोषोंसे भी कभी द्वेष नहीं करता । जैसे कमलके पत्तोंपर जल -बिन्दुका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरे स्वभावमें राग और द्वेषका स्पर्श नहीं है ॥ ४ ॥
नित्यस्य चैतस्य भवन्त्यनित्या निरीक्ष्यमाणस्य बहुस्वभावान् । न सज्जते कर्मसु भोगजालं दिवीव सूर्यस्य मयूखजालम् ॥ ५ ॥
जिनका स्वभाव बहुत प्रकारका है, उन इन्द्रिय आदिको देखनेवाले इस नित्यस्वरूप आत्माके लिये सब भोग अनित्य हो जाते हैं । अतः वे भोगसमुदाय उस विद्वान्को उसी प्रकार कर्मोंमें लिप्त नहीं कर सकते, जैसे आकाशमें सूर्यकी किरणोंका समुदाय सूर्यको लिप्त नहीं कर सकता ॥ ५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अध्वर्युयतिसंवादं तं निबोध यशस्विनि ॥ ६ ॥
यशस्विनि! इस विषयमें अध्वर्यु और यतिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, तुम उसे सुनो ॥ ६ ॥
प्रोक्ष्यमाणं पशुं दृष्ट्वा यज्ञकर्मण्यथाब्रवीत् ।
यतिरध्वर्युमासीनो हिंसेयमिति कुत्सयन् ॥ ७ ॥
किसी यज्ञ- कर्ममें पशुका प्रोक्षण होता देख वहीं बैठे हुए एक यतिने अध्वर्युसे उसकी निन्दा करते हुए कहा— ' यह हिंसा है ( अतः इससे पाप होगा ) ' ॥ ७ ॥
तमध्वर्युः प्रत्युवाच नायं छागो विनश्यति ।
श्रेयसा योक्ष्यते जन्तुर्यदि श्रुतिरियं तथा ॥ ८ ॥
अध्वर्युने यतिको इस प्रकार उत्तर दिया- ' यह बकरा नष्ट नहीं होगा । यदि ' पशुर्वै नीयमानः ' इत्यादि श्रुति सत्य है तो यह जीव कल्याणका ही भागी होगा ॥ ८ ॥
यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति ।
यदस्य वारिजं किंचिदपस्तत् सम्प्रवेक्ष्यति ॥ ९ ॥
‘ इसके शरीरका जो पार्थिव भाग है, वह पृथ्वीमें विलीन हो जायगा । इसका जो कुछ भी जलीय भाग है, वह जलमें प्रविष्ट हो जायगा ॥ ९ ॥
सूर्यं चक्षुर्दिशः श्रीत्रं प्राणोऽस्य दिवमेव च ।
आगमे वर्तमानस्य न मे दोषोऽस्ति कश्चन ॥ १० ॥
' नेत्र सूर्यमें, कान दिशाओंमें और प्राण आकाशमें ही लयको प्राप्त होगा । शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बर्ताव करनेवाले मुझको कोई दोष नहीं लगेगा ' ॥ १० ॥
यतिरुवाच
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प्राणैर्वियोगे च्छागस्य यदि श्रेयः प्रपश्यसि ।
छागार्थे वर्तते यज्ञो भवतः किं प्रयोजनम् ॥ ११ ॥
यतिने कहा — यदि तुम बकरेके प्राणोंका वियोग हो जानेपर भी उसका कल्याण ही देखते हो, तब तो यह यज्ञ उस बकरेके लिये ही हो रहा है । तुम्हारा इस यज्ञसे क्या प्रयोजन है? ॥ ११ ॥
अत्र त्वां मन्यतां भ्राता पिता माता सखेति च ।
मन्त्रयस्वैनमुन्नीय परवन्तं विशेषतः ॥ १२ ॥
श्रुति कहती है ' पशो! इस विषयमें तुझे तेरे भाई, पिता, माता और सखाकी अनुमति प्राप्त होनी चाहिये । ' इस श्रुतिके अनुसार विशेषतः पराधीन हुए इस पशुको ले जाकर इसके पिता माता आदिसे अनुमति लो ( अन्यथा तुझे हिंसाका दोष अवश्य प्राप्त होगा ) ॥ १२ ॥
एवमेवानुमन्येरंस्तान् भवान् द्रष्टुमर्हति ।
तेषामनुमतं श्रुत्वा शक्या कर्तुं विचारणा ॥ १३ ॥
पहले तुम्हें इस पशुके उन सम्बन्धियोंसे मिलना चाहिये । यदि वे भी ऐसा ही करनेकी अनुमति दे दें, तब उनका अनुमोदन सुनकर तदनुसार विचार कर सकते हो ॥ १३ ॥
प्राणा अप्यस्य छागस्य प्रापितास्ते स्वयोनिषु ।
शरीरं केवलं शिष्टं निश्चेष्टमिति मे मतिः ॥ १४ ॥
तुमने इस छागकी इन्द्रियोंको उनके कारणोंमें विलीन कर दिया है । मेरे विचारसे अब तो केवल इसका निश्चेष्ट शरीर ही अवशिष्ट रह गया है ॥ १४ ॥
इन्धनस्य तु तुल्येन शरीरेण विचेतसा ।
हिंसानिर्वेष्टुकामानामिन्धनं पशुसंज्ञितम् ॥ १५ ॥
यह चेतनाशून्य जड शरीर ईंधनके ही समान है, उससे हिंसाके प्रायश्चित्तकी इच्छासे यज्ञ करनेवालोंके लिये ईंधन ही पशु है (अतः जो काम ईंधनसे होता है, उसके लिये पशु-हिंसा क्यों की जाय? ) ॥ १५ ॥
अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम् ।
यदिहिंस्रं भवेत् कर्म तत् कार्यमिति विद्महे ॥ १६ ॥
वृद्ध पुरुषोंका यह उपदेश है कि अहिंसा सब धर्मोंमें श्रेष्ठ है, जो कार्य हिंसासे रहित हो वही करने योग्य है, यही हमारा मत है ॥ १६ ॥
अहिंसेति प्रतिज्ञेयं यदि वक्ष्याम्यतः परम् ।
शक्यं बहुविधं कर्तुं भवता कार्यदूषणम् ॥ १७ ॥
इसके बाद भी यदि मैं कुछ कहूँ तो यही कह सकता हूँ कि सबको यह प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये कि ' मैं अहिंसा - धर्मका पालन करूँगा । ' अन्यथा आपके द्वारा नाना प्रकारके कार्य - दोष सम्पादित हो सकते हैं ॥ १७ ॥
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अहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते ।
प्रत्यक्षतः साधयामो न परोक्षमुपास्महे ॥ १८ ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना ही हमें सदा अच्छा लगता है । हम प्रत्यक्ष फलके साधक हैं, परोक्षकी उपासना नहीं करते हैं ॥ १८ ॥
अध्वर्युरुवाच
भूमेर्गन्धगुणान् भुङ्क्षे पिबस्यापोमयान् रसान् ।
ज्योतिषां पश्यसे रूपं स्पृशस्यनिलजान् गुणान् ॥ १ ९ ॥
शृणोष्याकाशजान् शब्दान् मनसा मन्यसे मतिम् ।
सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे ॥ २० ॥
अध्वर्युने कहा — यते! यह तो तुम मानते ही हो कि सभी भूतोंमें प्राण है, तो भी तुम पृथ्वीके गन्ध गुणोंका उपभोग करते हो, जलमय रसोंको पीते हो, तेजके गुण? रूपका दर्शन करते हो और वायुके गुण स्पर्शको छूते हो, आकाशजनित शब्दोंको सुनते हो और मनसे मतिका मनन करते हो ॥ १ ९ -२० ॥
प्राणादाने निवृत्तोऽसि हिंसायां वर्तते भवान् ।
नास्ति चेष्टा विना हिंसां किं वा त्वं मन्यसे द्विज ॥ २१ ॥
एक ओर तो तुम किसी प्राणीके प्राण लेनेके कार्यसे निवृत्त हो और दूसरी ओर हिंसामें लगे हुए हो । द्विजवर! कोई भी चेष्टा हिंसाके बिना नहीं होती । फिर तुम कैसे समझते हो कि तुम्हारे द्वारा अहिंसाका ही पालन हो रहा है? ॥ २१ ॥
यतिरुवाच
अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽयमात्मनः ।
अक्षरं तत्र सद्भावः स्वभावः क्षर उच्यते ॥ २२ ॥
यतिने कहा — आत्माके दो रूप हैं - एक अक्षर और दूसरा क्षर। जिसकी सत्ता तीनों कालोंमें कभी नहीं मिटती वह सत्स्वरूप अक्षर ( अविनाशी ) कहा गया है तथा जिसका सर्वथा और सभी कालोंमें अभाव है, वह क्षर कहलाता है ॥ २२ ॥
प्राणो जिह्वा मनः सत्त्वं सद्भावो रजसा सह ।
भावैरेतैर्विमुक्तस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ॥ २३ ॥
समस्य सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मनः ।
समन्तात् परिमुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥
प्राण, जिह्वा, मन और रजोगुणसहित सत्त्वगुण –ये रज अर्थात् मायासहित सद्भाव हैं । इन भावोंसे मुक्त निर्द्वन्द्व, निष्काम, समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेवाले, ममतारहित, जितात्मा तथा सब ओरसे बन्धनशून्य पुरुषको कभी और कहीं भी भय नहीं होता ॥ २३-२४ ॥
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अध्वर्युरुवाच
सद्भिरेवेह संवासः कार्यो मतिमतां वर ।
भवतो हि मतं श्रुत्वा प्रतिभाति मतिर्मम ॥ २५ ॥
भगवन् भगवद्बुद्धया प्रतिपन्नो ब्रवीम्यहम् ।
व्रतं मन्त्रकृतं कर्तुर्नापराधोऽस्ति मे द्विज ॥ २६ ॥
अध्वर्युने कहा – बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ यते! इस जगत् में आप जैसे साधुपुरुषोंके साथ ही निवास करना उचित है । आपका यह मत सुनकर मेरी बुद्धिमें भी ऐसी ही प्रतीति हो रही है । भगवन्! विप्रवर! मैं आपकी बुद्धिसे ज्ञानसम्पन्न होकर यह बात कह रहा हूँ कि वेदमन्त्रोंद्वारा निश्चित किये हुए व्रतका ही मैं पालन कर रहा हूँ । अतः इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है ॥ २५-२६ ॥ ब्राह्मणउवाच
उपपत्त्या यतिस्तूष्णीं वर्तमानस्ततः परम् ।
अध्वर्युरपि निर्मोहः प्रचचार महामखे ॥ २७ ॥
ब्राह्मण कहते हैं — प्रिये! अध्वर्युकी दी हुई युक्तिसे वह यति चुप हो गया और फिर कुछ नहीं बोला । फिर अध्वर्यु भी मोहरहित होकर उस महायज्ञमें अग्रसर हुआ ॥ २७ ॥
एवमेतादृशं मोक्षं सुसूक्ष्मं ब्राह्मणा विदुः ।
विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनार्थदर्शिना ॥ २८ ॥
इस प्रकार ब्राह्मण मोक्षका ऐसा ही अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप बताते हैं और तत्त्वदर्शी पुरुषके उपदेशके अनुसार उस मोक्ष- धर्मको जानकर उसका अनुष्ठान करते हैं ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक अट्ठाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
* यह अध्याय क्षेपक हो तो कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि इसमें यह बात कही गयी है कि बुद्धि और इन्द्रियोंमें राग- द्वेषके रहते हुए भी विद्वान् कर्मोंमें लिप्त नहीं होता और यज्ञमें पशु- हिंसाका दोष नहीं लगता । किंतु यह कथन युक्तिविरुद्ध है ।
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एकोनत्रिंशोऽध्यायः - परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय कुलका संहार ब्राह्मणउवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भाविनि ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा — भामिनि! इस विषयमें भी कार्तवीर्य और समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् ।
येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ॥ २ ॥
पूर्वकालमें कार्तवीर्य अर्जुनके नामसे प्रसिद्ध एक राजा था, जिसकी एक हजार भुजाएँ थीं । उसने केवल धनुष - बाणकी सहायतासे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको अपने अधिकारमें कर लिया था ॥ २ ॥
स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन् बलदर्पितः ।
अवाकिरन् शरशतैः समुद्रमिति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥
सुना जाता है, एक दिन राजा कार्तवीर्य समुद्रके किनारे विचर रहा था । वहाँ उसने अपने बलके घमण्डमें आकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षासे समुद्रको आच्छादित कर दिया ॥ ३ ॥
तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह ।
मा मुञ्च वीर नाराचान् ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ४ ॥
मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः ।
वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो ॥ ५ ॥
तब समुद्रने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा –‘वीरवर! राजसिंह! मुझपर बाणोंकी वर्षा न करो । बोलो, तुम्हारी किस आज्ञाका पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणोंसे मेरे अन्दर रहनेवाले
प्राणियोंकी हत्या हो रही है । उन्हें अभय दान करो ' ॥ ४-५ ॥
अर्जुन उवाच
मत्समो यदि संग्रामे शरासनधरः क्वचित् ।
विद्यते तं समाचक्ष्व यः समासीत मां मृधे ॥ ६ ॥
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Milret कार्तवीर्य अर्जुन बोला- समुद्र! यदि कहीं मेरे समान धनुर्धर वीर मौजूद हो, जो युद्धमें मेरा मुकाबला कर सके तो उसका पता बता दो । फिर मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा ॥ ६ ॥
समुद्र उवाच
महर्षिर्जमदग्निस्ते यदि राजन् परिश्रुतः ।
तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावत् कर्तुमर्हति ॥ ७ ॥
समुद्रने कहा— राजन्! यदि तुमने महर्षि जमदग्निका नाम सुना हो तो उन्हींके आश्रमपर चले जाओ । उनके पुत्र परशुरामजी तुम्हारा अच्छी तरह सत्कार कर सकते हैं ॥ ७ ॥
ततः स राजा प्रययौ क्रोधेन महता वृतः ।
स तमाश्रममागम्य राममेवान्वपद्यत ॥ ८ ॥
स रामप्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभिः ।
आयासं जनयामास रामस्य च महात्मनः ॥ ९ ॥
ततस्तेजः प्रजज्वाल रामस्यामिततेजसः ।
प्रदहन् रिपुसैन्यानि तदा कमललोचने ॥ १० ॥