06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1771–1780

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1771–1780

पृष्ठ 1771

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एकचत्वारिंशोऽध्यायः अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन ब्रह्मोवाच

य उत्पन्नो महान् पूर्वमहंकारः स उच्यते ।

अहमित्येव सम्भूतो द्वितीयः सर्ग उच्यते ॥ १ ॥

ब्रह्माजीने कहा- महर्षियो! जो पहले महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ था, वही अहंकार कहा जाता है । जब वह अहंरूपमें प्रादुर्भूत होता है, तब वह दूसरा सर्ग कहलाता है ॥ १ ॥

अहंकारश्च भूतादिकारिक इति स्मृतः ।

तेजसश्चेतना धातुः प्रजासर्गः प्रजापतिः ॥ २ ॥

यह अहंकार भूतादि विकारोंका कारण है, इसलिये वैकारिक माना गया है । यह रजोगुणका स्वरूप है, इसलिये तैजस् है । इसका आधार चेतन आत्मा है । सारी प्रजाकी सृष्टि इसीसे होती है, इसलिये इसको प्रजापति कहते हैं ॥

देवानां प्रभवो देवो मनसश्च त्रिलोककृत् ।

अहमित्येव तत्सर्वमभिमन्ता स उच्यते ॥ ३ ॥

यह श्रोत्रादि इन्द्रियरूप देवोंका और मनका उत्पत्ति- स्थान एवं स्वयं भी देवस्वरूप है, इसलिये इसे त्रिलोकीका कर्त्ता माना गया है । यह सम्पूर्ण जगत् अहंकारस्वरूप है, इसलिये यह अभिमन्ता कहा जाता है ॥

अध्यात्मज्ञानतृप्तानां मुनीनां भावितात्मनाम् ।

स्वाध्यायक्रतुसिद्धानामेष लोकः सनातनः ॥ ४ ॥

जो अध्यात्मज्ञानमें तृप्त, आत्माका चिन्तन करनेवाले और स्वाध्यायरूपी यज्ञमें सिद्ध हैं, उन मुनिजनोंको यह सनातन लोक प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

अहंकारेणाहरतो गुणानिमान् भूतादिरेवं सृजते स भूतकृत् । वैकारिकः सर्वमिदं विचेष्टते स्वतेजसा रञ्जयते जगत् तथा ॥ ५ ॥

समस्त भूतोंका आदि और सबको उत्पन्न करनेवाला वह अहंकारका आधारभूत जीवात्मा अहंकारके द्वारा सम्पूर्ण गुणोंकी रचना करता है और उनका उपभोग करता है ।

यह जो कुछ भी चेष्टाशील जगत् है, वह विकारोंके कारणरूप अहंकारका ही स्वरूप है ।

वह अहंकार ही अपने तेजसे सारे जगत्को रजोमय ( भोगोंका इच्छुक ) बनाता है ॥ ५ ॥

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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश ब्रह्मोवाच

अहंकारात् प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै ।

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ १ ॥

- ब्रह्माजीने कहा – महर्षिगण! अहंकारसे पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज —ये पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए हैं ॥ १ ॥

तेषु भूतानि मुह्यन्ति महाभूतेषु पञ्चसु ।

शब्दस्पर्शनरूपेषु रसगन्धक्रियासु च ॥ २ ॥

इन्हीं पञ्च महाभूतोंमें अर्थात् इनके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक विषयोंमें समस्त प्राणी मोहित रहते हैं ॥ २ ॥

महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते ।

सर्वप्राणभृतां धीरा महदभ्युद्यते भयम् ॥ ३ ॥

धैर्यशाली महर्षियो! महाभूतोंका नाश होते समय जब प्रलयका अवसर आता है, उस समय समस्त प्राणियोंको महान् भय प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

यद् यस्माज्जायते भूतं तत्र तत् प्रविलीयते ।

लीयन्ते प्रतिलोमानि जायन्ते चोत्तरोत्तरम् ॥ ४ ॥

जो भूत जिससे उत्पन्न होता है, उसका उसीमें लय हो जाता है । ये भूत अनुलोमक्रमसे एकके बाद एक प्रकट होते हैं और विलोमक्रमसे इनका अपने - अपने कारणमें लय होता है ॥ ४ ॥

ततः प्रलीने सर्वस्मिन् भूते स्थावरजङ्गमे ।

स्मृतिमन्तस्तदा धीरा न लीयन्ते कदाचन ॥ ५ ॥

इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर भूतोंका लय हो जानेपर भी स्मरणशक्तिसे सम्पन्न धीर-हृदय योगी पुरुष कभी नहीं लीन होते ॥ ५ ॥

शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः ।

क्रियाः करणनित्याः स्युरनित्या मोहसंज्ञिताः ॥ ६ ॥

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा इनको ग्रहण करनेकी क्रियाएँ — ये कारणरूपसे ( अर्थात् सूक्ष्म मनःस्वरूप होनेके कारण ) नित्य हैं; अतः इनका भी

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प्रलयकालमें लय नहीं होता। जो (स्थूल पदार्थ) अनित्य हैं उनको मोहके नामसे पुकारा जाता है ॥ ६ ॥

लोभप्रजनसम्भूता निर्विशेषा ह्यकिंचनाः ।

मांसशोणितसंघाता अन्योन्यस्योपजीविनः ॥ ७ ॥

बहिरात्मान इत्येते दीनाः कृपणजीविनः । लोभ, लोभपूर्वक किये जानेवाले कर्म और उन कर्मोंसे उत्पन्न समस्त फल समानभावसे वास्तवमें कुछ भी नहीं है । शरीरके बाह्य अंग रक्त - मांसके संघात आदि एक- दूसरेके सहारे रखनेवाले हैं । इसीलिये ये दीन और कृपण माने गये हैं ॥ ७३ ॥

प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च ॥ ८ ॥

अन्तरात्मनि चाप्येते नियताः पञ्च वायवः ।

वाङ्मनोबुद्धिभिः सार्द्धमिदमष्टात्मकं जगत् ॥ ९ ॥

प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान–ये पाँच वायु नियतरूपसे शरीरके भीतर निवास करते हैं; अतः ये सूक्ष्म हैं । मन, वाणी और बुद्धिके साथ गिननेसे इनकी संख्या आठ होती है । ये आठ इस जगत्के उपादान कारण हैं ॥ ८ - ९ ॥

त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक् च संयताः ।

विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी ॥ १० ॥

अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते न दहने मनः सदा ।

स तद् ब्रह्म शुभं याति तस्माद् भूयो न विद्यते ॥ ११ ॥

जिसकी त्वचा, नासिका, कान, आँख, रसना और वाक्– ये इन्द्रियाँ वशमें हों, मन शुद्ध हो और बुद्धि एक निश्चयपर स्थिर रहनेवाली हो तथा जिसके मनको उपर्युक्त इन्द्रियादिरूप आठ अग्नियाँ संतप्त न करती हों, वह पुरुष उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त होता है, जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ १०-११ ॥

एकादश च यान्याहुरिन्द्रियाणि विशेषतः ।

अहंकारात् प्रसूतानि तानि वक्ष्याम्यहं द्विजाः ॥ १२ ॥

द्विजवरो! अहंकारसे उत्पन्न हुई जो मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतलायी जाती हैं, उनका अब विशेषरूपसे वर्णन करूँगा, सुनो ॥ १२ ॥

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी ।

पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग् दशमी भवेत् ॥ १३ ॥

इन्द्रियग्राम इत्येष मन एकादशं भवेत् ।

एतं ग्रामं जयेत् पूर्वं ततो ब्रह्म प्रकाशते ॥ १४ ॥

कान, त्वचा, आँख, रसना, पाँचवीं नासिका तथा हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक्— यह दस इन्द्रियोंका समूह है । मन ग्यारहवाँ है । मनुष्यको पहले इस समुदायपर विजय प्राप्त करना चाहिये । तत्पश्चात् उसे ब्रह्मका साक्षात्कार होता है ॥ १३-१४ ॥

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बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चाहुः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च ।

श्रोत्रादीन्यपि पञ्चाहुर्बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः ॥ १५ ॥

अविशेषाणि चान्यानि कर्मयुक्तानि यानि तु ।

उभयत्र मनो ज्ञेयं बुद्धिस्तु द्वादशी भवेत् ॥ १६ ॥

इन इन्द्रियोंमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं और पाँच कर्मेन्द्रिय । वस्तुतः कान आदि पाँच इन्द्रियोंको ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं और उनसे भिन्न शेष जो पाँच इन्द्रियाँ हैं, वे कर्मेन्द्रिय कहलाती हैं । मनका सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय– दोनोंसे है और बुद्धि बारहवीं है ॥ १५-१६ ॥

इत्युक्तानीन्द्रियाण्येतान्येकादश यथाक्रमम् ।

मन्यन्ते कृतमित्येवं विदित्वा तानि पण्डिताः ॥ १७ ॥

इस प्रकार क्रमशः ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन किया गया । इनके तत्त्वको अच्छी तरह जाननेवाले विद्वान् अपनेको कृतार्थ मानते हैं ॥ १७ ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं विविधमिन्द्रियम् ।

आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्ममुच्यते ॥ १८ ॥

अधिभूतं तथा शब्दो दिशस्तत्राधिदैवतम् । अब समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके भूत, अधिभूत आदि विविध विषयोंका वर्णन किया जाता है । आकाश पहला भूत है । कान उसका अध्यात्म ( इन्द्रिय ), शब्द उसका अधिभूत ( विषय ) और दिशाएँ उसकी अधिदैवत ( अधिष्ठातृ देवता) हैं ॥ १८३ ॥

द्वितीयं मारुतो भूत त्वगध्यात्मं च विश्रुता ॥ १ ९ ॥ स्प्रष्टव्यमधिभूतं च विद्युत् तत्राधिदैवतम् । वायु दूसरा भूत है । त्वचा उसका अध्यात्म तथा स्पर्श उसका अधिभूत सुना गया है और विद्युत् उसका अधिदैवत है ॥ १ ९ ३ ॥ तृतीयं ज्योतिरित्याहुश्चक्षुरध्यात्ममुच्यते ॥ २० ॥

अधिभूतं ततो रूपं सूर्यस्तत्राधिदैवतम् । तीसरे भूतका नाम है तेज । नेत्र उसका अध्यात्म, रूप उसका अधिभूत और सूर्य उसका अधिदैवत कहा जाता है ॥ २० ॥

चतुर्थमापो विज्ञेयं जिह्वा चाध्यात्ममुच्यते ॥ २१ ॥

अधिभूतं रसश्चात्र सोमस्तत्राधिदैवतम् । जलको चौथा भूत समझना चाहिये । रसना उसका अध्यात्म, रस उसका अधिभूत और चन्द्रमा उसका अधिदैवत कहा जाता है ॥ २१ ॥

पृथिवी पञ्चमं भूतं घ्राणश्चाध्यात्ममुच्यते ॥ २२ ॥

अधिभूतं तथा गन्धो वायुस्तत्राधिदैवतम् ।

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पृथ्वी पाँचवाँ भूत है । नासिका उसका अध्यात्म, गन्ध उसका अधिभूत और वायु उसका अधिदैवत कहा जाता है ॥ २२ ॥

एषु पञ्चसु भूतेषु त्रिषु यश्च विधिः स्मृताः ॥ २३ ॥

इन पाँच भूतोंमें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवरूप तीन भेद माने गये हैं ॥ २३ ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं विविधमिन्द्रियम् ।

पादावध्यात्ममित्याहुर्ब्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः ॥ २४ ॥

अधिभूतं तु गन्तव्यं विष्णुस्तत्राधिदैवतम् । अब कर्मेन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विषयोंका निरूपण किया जाता है । तत्त्वदर्शी ब्राह्मण दोनों पैरोंको अध्यात्म कहते हैं और गन्तव्य स्थानको उनके अधिभूत तथा विष्णुको उनके अधिदैवत बतलाते हैं ॥ २४ ॥

अवाग्गतिरपानश्च पायुरध्यात्ममुच्यते ॥ २५ ॥

अधिभूतं विसर्गश्च मित्रस्तत्राधिदैवतम् । निम्न गतिवाला अपान एवं गुदा अध्यात्म कहा गया है और मलत्याग उसका अधिभूत तथा मित्र उसके अधिदेवता हैं ॥ २५३ ॥

प्रजनः सर्वभूतानामुपस्थोऽध्यात्ममुच्यते ॥ २६ ॥

अधिभूतं तथा शुक्रं दैवतं च प्रजापतिः । सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला उपस्थ अध्यात्म है और वीर्य उसका अधिभूत तथा प्रजापति उसके अधिष्ठाता देवता कहे गये हैं ॥ २६३ ॥

हस्तावध्यात्ममित्याहुरध्यात्मविदुषो जनाः ॥ २७ ॥

अधिभूतं च कर्माणि शक्रस्तत्राधिदैवतम् । अध्यात्मतत्त्वको जाननेवाले पुरुष दोनों हाथोंको अध्यात्म बतलाते हैं । कर्म उनके अधिभूत और इन्द्र उनके अधिदेवता हैं ॥ २७३ ॥

वैश्वदेवी ततः पूर्वा वागध्यात्ममिहोच्यते ॥ २८ ॥

वक्तव्यमधिभूतं च वह्निस्तत्राधिदैवतम् । विश्वकी देवी पहली वाणी यहाँ अध्यात्म कही गयी है । वक्तव्य उसका अधिभूत तथा अग्नि उसका अधिदैवत है ॥ २८३ ॥

अध्यात्मं मन इत्याहुः पञ्चभूतात्मचारकम् ॥ २ ९ ॥ अधिभूतं च संकल्पश्चन्द्रमाश्चाधिदैवतम् । पञ्चभूतोंका संचालन करनेवाला मन अध्यात्म कहा गया है । संकल्प उसका अधिभूत है और चन्द्रमा उसके अधिष्ठाता देवता माने गये हैं ॥ २ ९ ३ ॥ अहंकारस्तथाध्यात्मं सर्वसंसारकारकम् ॥ ३० ॥

अभिमानोऽधिभूतं च रुद्रस्तत्राधिदैवतम् ।

पृष्ठ 1777

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सम्पूर्ण संसारको जन्म देनेवाला अहंकार अध्यात्म है और अभिमान उसका अधिभूत तथा रुद्र उसके अधिष्ठाता देवता हैं ॥ ३० ॥

अध्यात्मं बुद्धिरित्याहुः षडिन्द्रियविचारिणी ॥ ३१ ॥

अधिभूतं तु मन्तव्यं ब्रह्मा तत्राधिदैवतम् । पाँच इन्द्रियों और छठे मनको जाननेवाली बुद्धिको अध्यात्म कहते हैं । मन्तव्य उसका अधिभूत और ब्रह्मा उसके अधिदेवता हैं ॥ ३१ ॥

त्रीणि स्थानानि भूतानां चतुर्थं नोपपद्यते ॥ ३२ ॥

स्थलमापस्तथाऽऽकाशं जन्म चापि चतुर्विधम् ।

अण्डजोद्भिज्जसंस्वेदजरायुजमथापि च ॥ ३३ ॥

चतुर्धा जन्म इत्येतद् भूतग्रामस्य लक्ष्यते । प्राणियोंके रहनेके तीन ही स्थान हैं— जल, थल और आकाश । चौथा स्थान सम्भव नहीं है । देहधारियोंका जन्म चार प्रकारका होता है— अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज । समस्त भूत - समुदायका यह चार प्रकारका ही जन्म देखा जाता है ॥ ३२-३३३ || अपराण्यथ भूतानि खेचराणि तथैव च ॥ ३४ ॥

अण्डजानि विजानीयात् सर्वांश्चैव सरीसृपान् । इनके अतिरिक्त जो दूसरे आकाशचारी प्राणी हैं तथा जो पेटसे चलनेवाले सर्प आदि हैं, उन सबको भी अण्डज जानना चाहिये ॥ ३४३ ॥

स्वेदजाः कृमयः प्रोक्ता जन्तवश्च यथाक्रमम् ॥ ३५ ॥

जन्म द्वितीयमित्येतज्जघन्यतरमुच्यते । पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जू आदि कीट और जन्तु स्वेदज कहे जाते हैं । यह क्रमशः दूसरा जन्म पहलेकी अपेक्षा निम्न स्तरका कहा जाता है ॥ ३५३ ॥

भित्त्वा तु पृथिवीं यानि जायन्ते कालपर्ययात् ॥ ३६ ॥

उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि द्विजसत्तमाः । द्विजवरो! जो पृथ्वीको फोड़कर समयपर उत्पन्न होते हैं, उन प्राणियोंको उद्भिज्ज कहते हैं ॥ ३६ ॥

द्विपादबहुपादानि तिर्यग्गतिमतीनि च ॥ ३७ ॥

जरायुजानि भूतानि विकृतान्यपि सत्तमाः । श्रेष्ठ ब्राह्मणो! दो पैरवाले, बहुत पैरवाले एवं टेढ़े - मेढ़े चलनेवाले तथा विकृत रूपवाले प्राणी जरायुज हैं ॥ ३७ ॥

द्विविधा खलु विज्ञेया ब्रह्मयोनिः सनातनी ॥ ३८ ॥

तपः कर्म च यत्पुण्यमित्येष विदुषां नयः ।

पृष्ठ 1778

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ब्राह्मणत्वका सनातन हेतु दो प्रकारका जानना चाहिये –तपस्या और पुण्यकर्मका अनुष्ठान यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ ३८ ॥

विविधं कर्म विज्ञेयमिज्या दानं च तन्मखे ॥ ३ ९ ॥ जातस्याध्ययनं पुण्यमिति वृद्धानुशासनम् । कर्मके अनेक भेद हैं, उनमें पूजा, दान और यज्ञमें हवन करना - ये प्रधान हैं । वृद्ध पुरुषोंका कथन है कि द्विजोंके कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषके लिये वेदोंका अध्ययन करना भी पुण्यका कार्य है ॥ ३ ९ १ ॥ एतद् यो वेत्ति विधिवद् युक्तः स स्याद् द्विजर्षभाः ॥ ४० ॥

विमुक्तः सर्वपापेभ्य इति चैव निबोधत । द्विजवरो! जो मनुष्य इस विषयको विधिपूर्वक जानता है, वह योगी होता है तथा उसे

सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है । इसे भलीभाँति समझो ॥ ४० ॥

यथावदध्यात्मविधिरेष वः कीर्तितो मया ॥ ४१ ॥

ज्ञानमस्य हि धर्मज्ञाः प्राप्तं ज्ञानवतामिह । इस प्रकार मैंने तुम लोगोंसे अध्यात्मविधिका यथावत् वर्णन किया । धर्मज्ञजन! ज्ञानी पुरुषोंको इस विषयका सम्यक् ज्ञान होता है ॥ ४१३ ॥

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च ।

सर्वाण्येतानि संधाय मनसा सम्प्रधारयेत् ॥ ४२ ॥

इन्द्रियों, उनके विषयों और पञ्च महाभूतोंकी एकताका विचार करके उसे मनमें अच्छी तरह धारण कर लेना चाहिये ॥ ४२ ॥

क्षीणे मनसि सर्वस्मिन् न जन्मसुखमिष्यते ।

ज्ञानसम्पन्नसत्त्वानां तत् सुखं विदुषां मतम् ॥ ४३ ॥

मनके क्षीण होनेके साथ ही सब वस्तुओंका क्षय हो जानेपर मनुष्यको जन्मके सुख ( लौकिक सुख - भोग आदि) की इच्छा नहीं होती । जिनका अन्तःकरण ज्ञानसे सम्पन्न होता है, उन विद्वानोंको उसीमें सुखका अनुभव होता है ॥ ४३ ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि सूक्ष्मभावकरीं शिवाम् ।

निवृत्तिं सर्वभूतेषु मृदुना दारुणेन च ॥ ४४ ॥

महर्षियो! अब मैं मनकी सूक्ष्म भावनाको जाग्रत् करनेवाली कल्याणमयी निवृत्तिके विषयमें उपदेश देता हूँ, जो कोमल और कठोर भावसे समस्त प्राणियोंमें रहती है ॥ ४४ ॥

गुणागुणमनासङ्गमेकचर्यमनन्तरम् ।

एतद् ब्रह्ममयं वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥ ४५ ॥

जहाँ गुण होते हुए भी नहींके बराबर हैं, जो अभिमानसे रहित और एकानाचर्यासे युक्त है तथा जिसमें भेद- दृष्टिका सर्वथा अभाव है, वही ब्रह्ममय बर्ताव बतलाया गया है, वही समस्त सुखोंका एकमात्र आधार है ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 1779

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विद्वान् कूर्म इवाङ्गानि कामान् संहृत्य सर्वशः ।

विरजाः सर्वतो मुक्तो यो नरः स सुखी सदा ॥ ४६ ॥

जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार जो विद्वान् मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको सब ओरसे संकुचित करके रजोगुणसे रहित हो जाता है, वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त एवं सदाके लिये सुखी हो जाता है ॥ ४६ ॥

कामानात्मनि संयम्य क्षीणतृष्णः समाहितः ।

सर्वभूतसुहृन्मित्रो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ४७ ॥

जो कामनाओंको अपने भीतर लीन करके तृष्णासे रहित, एकाग्रचित तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् और मित्र होता है, वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है ॥ ४७ ॥

इन्द्रियाणां निरोधेन सर्वेषां विषयैषिणाम् ।

मुनेर्जनपदत्यागादध्यात्माग्निः समिध्यते ॥ ४८ ॥

विषयोंकी अभिलाषा रखनेवाली समस्त इन्द्रियोंको रोककर जनसमुदायके स्थानका परित्याग करनेसे मुनिका अध्यात्मज्ञानरूपी तेज अधिक प्रकाशित होता है ॥ ४८ ॥

यथाग्निरिन्धनैरिद्धो महाज्योतिः प्रकाशते ।

तथेन्द्रियनिरोधेन महानात्मा प्रकाशते ॥ ४ ९ ॥

जैसे ईंधन डालनेसे आग प्रज्वलित होकर अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देती है, उसी प्रकार इन्द्रियोंका निरोध करनेसे परमात्माके प्रकाशका विशेष अनुभव होने लगता है ॥ ४ ९ ॥

यदा पश्यति भूतानि प्रसन्नात्माऽऽत्मनो हृदि ।

स्वयंज्योतिस्तदा सूक्ष्मात् सूक्ष्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ५० ॥

जिस समय योगी प्रसन्नचित्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थित देखने लगता है, उस समय वह स्वयंज्योतिःस्वरूप होकर सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म सर्वोत्तम परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ५० ॥

अग्नी रूपं पयः स्रोतो वायुः स्पर्शनमेव च ।

मही पङ्कधरं घोरमाकाशश्रवणं तथा ॥ ५१ ॥

रोगशोकसमाविष्टं पञ्चस्रोतःसमावृतम् पञ्चभूतसमायुक्तं नवद्वारं द्विदैवतम् ॥ ५२ ॥

रजस्वलमथादृश्यं त्रिगुणं च त्रिधातुकम् ।

संसर्गाभिरतं मूढं शरीरमिति धारणा ॥ ५३ ॥

अग्नि जिसका रूप है, रुधिर जिसका प्रवाह है, पवन जिसका स्पर्श है, पृथ्वी जिसमें हाड़ - मासं आदि कठोर रूपमें प्रकट है, आकाश जिसका कान है, जो रोग और शोकसे चारों ओरसे घिरा हुआ है, जो पाँच प्रवाहोंसे आवृत है, जो पाँच भूतोंसे भलीभाँति युक्त है, जिसके नौ द्वार हैं, जिसके दो (जीव और ईश्वर ) देवता हैं, जो रजोगुणमय, अदृश्य ( नाशवान्), ( सुख, दुःख और मोहरूप) तीन गुणोंसे तथा वात, पित्त और कफ — इन तीन

पृष्ठ 1780

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धातुओंसे युक्त है, जो संसर्गमें रत और जड है, उसको शरीर समझना चाहिये ॥ ५१— ५३ ॥

दुश्चरं सर्वलोकेऽस्मिन् सत्त्वं प्रति समाश्रितम् ।

एतदेव हि लोकेऽस्मिन् कालचक्रं प्रवर्तते ॥ ५४ ॥

जिसका सम्पूर्ण लोकमें विचरण करना दुःखद है, जो बुद्धिके आश्रित है, वही इस लोकमें कालचक्र है ॥ ५४ ॥

एतन्महार्णवं घोरमगाधं मोहसंज्ञितम् ।

विक्षिपेत् संक्षिपेच्चैव बोधयेत् सामरं जगत् ॥ ५५ ॥

यह कालचक्र घोर अगाध और मोह नामसे कहा जानेवाला बड़ा भारी समुद्ररूप है । यह देवताओंके सहित समस्त जगत्का संक्षेप और विस्तार करता है तथा सबको जगाता है ॥ ५५ ॥

कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमथानृतम् ।

इन्द्रियाणां निरोधेन सदा त्यजति दुस्त्यजान् ॥ ५६ ॥

सदा इन्द्रियोंके निरोधसे मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य – इन सब दुस्तयज अवगुणोंको त्याग देता है ॥ ५६ ॥

यस्यैते निर्जिता लोके त्रिगुणाः पञ्चधातवः ।

व्योम्नि तस्य परं स्थानमानन्त्यमथ लभ्यते ॥ ५७ ॥

जिसने इस लोकमें तीन गुणोंवाले पाञ्चभौतिक देहका अभिमान त्याग दिया है, उसे अपने हृदयाकाशमें परब्रह्मरूप उत्तम पदकी उपलब्धि होती है— वह मोक्षको प्राप्त हो जाता है ॥ ५७ ॥

पञ्चेन्द्रियमहाकूलां मनोवेगमहोदकाम् ।

नदीं मोहहृदां तीर्त्वा कामक्रोधावुभौ जयेत् ॥ ५८ ॥

स सर्वदोषनिर्मुक्तस्ततः पश्यति तत्परम् । जिसमें पाँच इन्द्रियरूपी बड़े कगारे हैं, जो मनोवेग- रूपी महान् जलराशिसे भरी हुई है और जिसके भीतर मोहमय कुण्ड है, उस देहरूपी नदीको लाँघकर जो काम और क्रोध-दोनोंको जीत लेता है, वही सब दोषोंसे मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करता है ॥ ५८३ ॥

मनो मनसि संधाय पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ ५ ९ ॥ सर्ववित् सर्वभूतेषु विन्दत्यात्मानमात्मनि । जो मनको हृदयकमलमें स्थापित करके अपने भीतर ही ध्यानके द्वारा आत्मदर्शनका प्रयत्न करता है, वह सम्पूर्ण भूतोंमें सर्वज्ञ होता है और उसे अन्तःकरणमें परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है ॥ ५ ९ ३ ॥ एकधा बहुधा चैव विकुर्वाणस्ततस्ततः ॥ ६० ॥