06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1781–1790

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1781–1790

पृष्ठ 1781

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ध्रुवं पश्यति रूपाणि दीपाद् दीपशतं यथा । जैसे एक दीपसे सैकड़ों दीप जला लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा यत्र - तत्र अनेक रूपोंमें उपलब्ध होता है । ऐसा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष निःसन्देह सब रूपोंको एकसे ही उत्पन्न देखता है ॥ ६० ॥

स वै विष्णुश्च मित्रश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ॥ ६१ ॥

स हि धाता विधाता च स प्रभुः सर्वतोमुखः ।

हृदयं सर्वभूतानां महानात्मा प्रकाशते ॥ ६२ ॥

वास्तवमें वही परमात्मा विष्णु, मित्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति, धाता, विधाता, प्रभु, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण प्राणियोंका हृदय तथा महान् आत्माके रूपमें प्रकाशित है ॥ ६१-६२ ॥ तं विप्रसंघाश्च सुरासुराश्च यक्षाः पिशाचाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे महर्षयश्चैव सदा स्तुवन्ति ॥ ६३ ॥

ब्राह्मणसमुदाय, देवता, असुर, यक्ष, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षस, भूत और सम्पूर्ण महर्षि भी सदा उस परमात्माकी स्तुति करते हैं ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 1782

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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता ब्रह्मोवाच मनुष्याणां तु राजन्यः क्षत्रियो मध्यमो गुणः कुञ्जरो वाहनानां च सिंहश्चारण्यवासिनाम् ॥ १ ॥

अविः पशूनां सर्वेषामहिस्तु बिलवासिनाम् ।

गवां गोवृषभश्चैव स्त्रीणां पुरुष एव च ॥ २ ॥

ब्रह्माजीने कहा – महर्षियो! मनुष्योंका राजा तो रजोगुणसे युक्त क्षत्रिय है । सवारियोंमें हाथी, बनवासियोंमें सिंह, समस्त पशुओंमें भेड़ और बिलमें रहनेवालोंमें सर्प, गौओंमें बैल एवं स्त्रियोंमें पुरुष प्रधान है ॥ १-२ ॥

न्यग्रोधो जम्बुवृक्षश्च पिप्पलः शाल्मलिस्तथा ।

शिंशपा मेषशृङ्गश्च तथा कीचकवेणवः ॥ ३ ॥

एते द्रुमाणां राजानो लोकेऽस्मिन् नात्र संशयः । बरगद, जामुन, पीपल, सेमल, शीशम, मेषशृंग ( मेढ़ासिंगी ) और पोले बाँस - ये इस लोकमें वृक्षोंके राजा हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३३ ॥

हिमवान् पारियात्रश्च सह्यो विन्ध्यस्त्रिकूटवान् ॥ ४ ॥

श्वेतो नीलश्च भासश्च कोष्ठवांश्चैव पर्वतः ।

गुरुस्कन्धो महेन्द्रश्च माल्यवान् पर्वतस्तथा ॥ ५ ॥

एते पर्वतराजानो गणानां मरुतस्तथा ।

सूर्यो ग्रहाणामधिपो नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ॥ ६ ॥

हिमवान्, पारियात्र, सह्य, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान् पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान् पर्वत– ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं । गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं ॥ ४–६ ॥

यमः पितॄणामधिपः सरितामथ सागरः ।

अम्भसां वरुणो राजा मरुतामिन्द्र उच्यते ॥ ७ ॥

यमराज पितरोंके और समुद्र सरिताओंके स्वामी हैं । वरुण जलके और इन्द्र मरुद्गणोंके स्वामी कहे जाते हैं ॥ ७ ॥

अर्कोऽधिपतिरुष्णानां ज्योतिषामिन्दुरुच्यते ।

पृष्ठ 1783

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अग्निर्भूतपतिर्नित्यं ब्राह्मणानां बृहस्पतिः ॥ ८ ॥

उष्णप्रभाके अधिपति सूर्य हैं और ताराओंके स्वामी चन्द्रमा कहे गये हैं । भूतोंके नित्य अधीश्वर अग्निदेव हैं तथा ब्राह्मणोंके स्वामी बृहस्पति हैं ॥ ८ ॥

ओषधीनां पतिः सोमो विष्णुर्बलवतां वरः ।

त्वष्टाधिराजो रूपाणां पशूनामीश्वरः शिवः ॥ ९ ॥

ओषधियोंके स्वामी सोम हैं तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णु हैं । रूपोंके अधिपति सूर्य और पशुओंके ईश्वर भगवान् शिव हैं ॥ ९ ॥

दीक्षितानां तथा यज्ञो देवानां मघवा तथा ।

दिशामुदीची विप्राणां सोमो राजा प्रतापवान् ॥ १० ॥

दीक्षा ग्रहण करनेवालोंके यज्ञ और देवताओंके इन्द्र अधिपति हैं । दिशाओंकी स्वामिनी उत्तर दिशा है एवं ब्राह्मणोंके राजा प्रतापी सोम हैं ॥ १० ॥

कुबेरः सर्वरत्नानां देवतानां पुरंदरः ।

एव भूताधिपः सर्गः प्रजानां च प्रजापतिः ॥ ११ ॥

सब प्रकारके रत्नोंके स्वामी कुबेर, देवताओंके स्वामी इन्द्र और प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं । यह भूतोंके अधिपतियोंका सर्ग है ॥ ११ ॥

सर्वेषामेव भूतानामहं ब्रह्ममयो महान् ।

भूतं परतरं मत्तो विष्णोर्वापि न विद्यते ॥ १२ ॥

मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका महान् अधीश्वर और ब्रह्ममय हूँ । मुझसे अथवा विष्णुसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ १२ ॥

राजाधिराजः सर्वेषां विष्णुर्ब्रह्ममयो महान् ।

ईश्वरत्वं विजानीध्वं कर्तारमकृतं हरिम ॥ १३ ॥

ब्रह्ममय महाविष्णु ही सबके राजाधिराज हैं, उन्हींको ईश्वर समझना चाहिये । वे श्रीहरि सबके कर्ता हैं, किंतु उनका कोई कर्ता नहीं है ॥ १३ ॥

नरकिन्नरयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

देवदानवनागानां सर्वेषामीश्वरो हि सः ॥ १४ ॥

वे विष्णु ही मनुष्य, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, देव, दानव और नाग सबके अधीश्वर हैं ॥ १४ ॥

भगदेवानुयातानां सर्वासां वामलोचना ।

माहेश्वरी महादेवी प्रोच्यते पार्वती हि सा ॥ १५ ॥

उमां देवीं विजानीध्वं नारीणामुत्तमां शुभाम् ।

रतीनां वसुमत्यस्तु स्त्रीणामप्सरसस्तथा ॥ १६ ॥

कामी पुरुष जिनके पीछे फिरते हैं, उन सबमें सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्री प्रधान है । एवं जो माहेश्वरी, महादेवी और पार्वती नामसे कही जाती हैं, उन मंगलमयी उमादेवीको स्त्रियोंमें

पृष्ठ 1784

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सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियोंमें स्वर्णविभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं ॥ १५-१६ ॥

धर्मकामाश्च राजानो ब्राह्मणा धर्मसेतवः ।

तस्माद् राजा द्विजातीनां प्रयतेत स्म रक्षणे ॥ १७ ॥

राजा धर्म- पालनके इच्छुक होते हैं और ब्राह्मण धर्मके सेतु हैं । अतः राजाको चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणोंकी रक्षाका प्रयत्न करे ॥ १७ ॥

राज्ञां हि विषये येषामवसीदन्ति साधवः ।

हीनास्ते स्वगुणैः सर्वैः प्रेत्य चोन्मार्गगामिनः ॥ १८ ॥

जिन राजाओंके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंको कष्ट होता है, वे अपने समस्त राजोचित गुणोंसे हीन हो जाते और मरनेके बाद नीच गतिको प्राप्त होते हैं ॥ १८ ॥

राज्ञां हि विषये येषां साधवः परिरक्षिताः ।

तेऽस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते सुखं प्रेत्य च भुञ्जते ॥ १ ९ ॥

प्राप्नुवन्ति महात्मान इति वित्त द्विजर्षभाः । द्विजवरो! जिनके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंकी सब प्रकारसे रक्षा की जाती है, वे महामना नरेश इस लोकमें आनन्दके भागी होते हैं और परलोकमें अक्षय सुख प्राप्त करते हैं, ऐसा समझो ॥ १ ९ ॥ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नियतं धर्मलक्षणम् ॥ २० ॥

अहिंसा परमो धर्मो हिंसा चाधर्मलक्षणा ।

प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्याः कर्मलक्षणाः ॥ २१ ॥

अब मैं सबके नियत धर्मके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्मका लक्षण (स्वरूप) है । प्रकाश देवताओंका और यज्ञ आदि कर्म मनुष्योंका लक्षण है ॥ २०-२१ ॥

शब्दलक्षणमाकाशं वायुस्तु स्पर्शलक्षणः ।

ज्योतिषां लक्षणं रूपमापश्च रसलक्षणाः ॥ २२ ॥

शब्द आकाशका, वायु स्पर्शका, रूप तेजका और रस जलका लक्षण है ॥ २२ ॥

धारिणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा ।

स्वरव्यञ्जनसंस्कारा भारती शब्दलक्षणा ॥ २३ ॥

गन्ध सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका लक्षण है तथा स्वर- व्यंजनकी शुद्धिसे युक्त वाणीका लक्षण शब्द है ॥ २३ ॥

मनसो लक्षणं चिन्ता चिन्तोक्ता बुद्धिलक्षणा ।

मनसा चिन्तितानर्थान् बुद्धया चेह व्यवस्यति ॥ २४ ॥

बुद्धिर्हि व्यवसायेन लक्ष्यते नात्र संशयः ।

पृष्ठ 1785

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चिन्तन मनका और निश्चय बुद्धिका लक्षण है; क्योंकि मनुष्य इस जगत्‌में मनके द्वारा चिन्तन की हुई वस्तुओंका बुद्धिसे ही निश्चय करते हैं, निश्चयके द्वारा ही बुद्धि जाननेमें आती है, इसमें संदेह नहीं है ॥ २४ ॥

लक्षणं मनसो ध्यानमव्यक्तं साधुलक्षणम् ॥ २५ ॥

प्रवृत्तिलक्षणो योगो ज्ञानं संन्यासलक्षणम् ।

तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान् ॥ २६ ॥

मनका लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण बाहरसे व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है ) । योगका लक्षण प्रवृति और संन्यासका लक्षण ज्ञान है । इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञानका आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे ॥ २५-२६ । |

संन्यासी ज्ञानसंयुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम् ।

अतीतो द्वन्द्वमभ्येति तमोमृत्युजरातिगः ॥ २७ ॥

ज्ञानयुक्त संन्यासी मौत और बुढ़ापाको लाँघकर सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे परे हो अज्ञानान्धकारके पार पहुँचकर परमगतिको प्राप्त होता है ॥ २७ ॥

धर्मलक्षणसंयुक्तमुक्तं वो विधिवन्मया ।

गुणानां ग्रहणं सम्यग् वक्ष्माम्यहमतः परम् ॥ २८ ॥

महर्षियो! यह मैंने तुमलोगोंसे लक्षणोंसहित धर्मका विधिवत् वर्णन किया । अब यह बतला रहा हूँ कि किस गुणको किस इन्द्रियसे ठीक- ठीक ग्रहण किया जाता है ॥ २८ ॥

पार्थिवो यस्तु गन्धो वै प्राणेन हि स गृह्यते ।

घ्राणस्थश्च तथा वायुर्गन्धज्ञाने विधीयते ॥ २ ९ ॥

पृथ्वीका जो गन्ध नामक गुण है, उसका नासिकाके द्वारा ग्रहण होता है और नासिकामें स्थित वायु उस गन्धका अनुभव करानेमें सहायक होती है ॥ २ ९ ॥

अपां धातू रसो नित्यं जिह्वया स तु गृह्यते ।

जिह्वास्थश्च तथा सोमो रसज्ञाने विधीयते ॥ ३० ॥

जलका स्वाभाविक गुण रस है, जिसको जिह्वाके द्वारा ग्रहण किया जाता है और जिह्वामें स्थित चन्द्रमा उस रसके आस्वादनमें सहायक होता है ॥ ३० ॥

ज्योतिषश्च गुणो रूपं चक्षुषा तच्च गृह्यते ।

चक्षुःस्थश्च सदाऽऽदित्यो रूपज्ञाने विधीयते ॥ ३१ ॥

तेजका गुण रूप है और वह नेत्रमें स्थित सूर्यदेवताकी सहायतासे नेत्रके द्वारा सदा देखा जाता है ॥ ३१ ॥

वायव्यस्तु सदा स्पर्शस्त्वाचा प्रज्ञायते च सः ।

त्वक्स्थश्चैव सदा वायुः स्पर्शने स विधीयते ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 1786

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वायुका स्वाभाविक गुण स्पर्श है, जिसका त्वचाके द्वारा ज्ञान होता है और त्वचामें स्थित वायुदेव उस स्पर्शका अनुभव करानेमें सहायक होता है ॥ ३२ ॥

आकाशस्य गुणो ह्येष श्रोत्रेण च स गृह्यते ।

श्रोत्रस्थाश्च दिशः सर्वाः शब्दज्ञाने प्रकीर्तिताः ॥ ३३ ॥

आकाशके गुण शब्दका कानोंके द्वारा ग्रहण होता है और कानमें स्थित सम्पूर्ण दिशाएँ शब्दके श्रवणमें सहायक बतायी गयी हैं ॥ ३३ ॥

मनसश्च गुणश्चिन्ता प्रज्ञया स तु गृह्यते ।

हृदिस्थश्चेतनो धातुर्मनोज्ञाने विधीयते ॥ ३४ ॥

मनका गुण चिन्तन है, जिसका बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया जाता है और हृदयमें स्थित चेतन ( आत्मा ) मनके चिन्तन - कार्यमें सहायता देता है ॥ ३४ ॥

बुद्धिरध्यवसायेन ज्ञानेन च महांस्तथा ।

निश्चित्य ग्रहणाद् व्यक्तमव्यक्तं नात्र संशयः ॥ ३५ ॥

निश्चयके द्वारा बुद्धिका और ज्ञानके द्वारा महत्तत्त्वका ग्रहण होता है । इनके कार्योंसे ही इनकी सत्ताका निश्चय होता है और इसीसे इन्हें व्यक्त माना जाता है, किंतु वास्तवमें तो अतीन्द्रिय होनेके कारण ये बुद्धि आदि अव्यक्त ही हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३५ ॥

अलिङ्गग्रहणो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ।

तस्मादलिङ्गः क्षेत्रज्ञः केवलं ज्ञानलक्षणः ॥ ३६ ॥

नित्य क्षेत्रज्ञ आत्माका कोई ज्ञापक लिंग नहीं है; क्योंकि वह (स्वयंप्रकाश और) निर्गुण है । अतः क्षेत्रज्ञ अलिंग (किसी विशेष लक्षणसे रहित ) है; अतः केवल ज्ञान ही उसका लक्षण ( स्वरूप ) माना गया है ॥ ३६ ॥

अव्यक्तं क्षेत्रमुद्दिष्टं गुणानां प्रभवाप्ययम् ।

सदा पश्याम्यहं लीनो विजानामि शृणोमि च ॥ ३७ ॥

गुणोंकी उत्पत्ति और लयके कारणभूत अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र कहते हैं । मैं उसमें संलग्न होकर सदा उसे जानता और सुनता हूँ ॥ ३७ ॥

पुरुषस्तद् विजानीते तस्मात् क्षेत्रज्ञ उच्यते ।

गुणवृत्तं तथा वृत्तं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ॥ ३८ ॥

आदिमध्यावसानान्तं सृज्यमानमचेतनम् ।

न गुणा विदुरात्मानं सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ ३ ९ ॥

आत्मा क्षेत्रको जानता है, इसलिये वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है । क्षेत्रज्ञ आदि, मध्य और अन्तसे युक्त समस्त उत्पत्तिशील अचेतन गुणोंके कार्यको और उनकी क्रियाको भी भलीभाँति जानता है, किंतु बारंबार उत्पन्न होनेवाले गुण आत्माको नहीं जान पाते ॥ ३८-३९ ॥ न सत्यं विन्दते कश्चित् क्षेत्रज्ञस्त्वेव विन्दति ।

पृष्ठ 1787

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1787 का मूल पृष्ठ
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गुणानां गुणभूतानां यत् परं परमं महत् ॥ ४० ॥

जो गुणों और गुणोंके कार्योंसे अत्यन्त परे है, उस परम महान् सत्यस्वरूप क्षेत्रज्ञको कोई नहीं जानता, परंतु वह सबको जानता है ॥ ४० ॥

तस्माद् गुणांश्च सत्त्वं च परित्यज्येह धर्मवित् ।

क्षीणदोषो गुणातीतः क्षेत्रज्ञं प्रविशत्यथ ॥ ४१ ॥

अतः इस लोकमें जिसके दोषोंका क्षय हो गया है, वह गुणातीत धर्मज्ञ पुरुष सत्त्व ( बुद्धि ) और गुणोंका परित्याग करके क्षेत्रज्ञके शुद्ध स्वरूप परमात्मामें प्रवेश कर जाता है ॥ ४१ ॥

निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वाहाकार एव च ।

अचलश्चानिकेतश्च क्षेत्रज्ञः स परो विभुः ॥ ४२ ॥

क्षेत्रज्ञ सुख- दुखादि द्वन्द्वोंसे रहित, किसीको नमस्कार न करनेवाला, स्वाहाकाररूप

यज्ञादि कर्म न करनेवाला, अचल और अनिकेत है । वही महान् विभु है ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु -शिष्य- संवादविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1788

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1788 का मूल पृष्ठ
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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः सब पदार्थोंके आदि-अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन ब्रह्मोवाच

यदादिमध्यपर्यन्तं ग्रहणोपायमेव च ।

नामलक्षणसंयुक्तं सर्वं वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ १ ॥

ब्रह्माजीने कहा – महर्षिगण! अब मैं सम्पूर्ण पदार्थोंके नाम-लक्षणोंसहित आदि, मध्य और अन्तका तथा उनके ग्रहणके उपायका यथार्थ वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥

अहः पूर्वं ततो रात्रिर्मासाः शुक्लादयः स्मृताः ।

श्रवणादीनि ऋक्षाणि ऋतवः शिशिरादयः ॥ २ ॥

पहले दिन है फिर रात्रि; ( अतः दिन रात्रिका आदि है । इसी प्रकार ) शुक्लपक्ष महीनेका, श्रवण नक्षत्रोंका और शिशिर ऋतुओंका आदि है ॥ २ ॥

भूमिरादिस्तु गन्धानां रसानामाप एव च ।

रूपाणां ज्योतिरादित्यः स्पर्शानां वायुरुच्यते ॥ ३ ॥

शब्दस्यादिस्तथाऽऽकाशमेष भूतकृतो गुणः । गन्धोंका आदि कारण भूमि है । रसोंका जल, रूपोंका ज्योतिर्मय आदित्य, स्पर्शोका

वायु और शब्दका आदिकारण आकाश है । ये गन्ध आदि पञ्चभूतोंसे उत्पन्न गुण हैं ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि भूतानामादिमुत्तमम् ॥ ४ ॥

आदित्यो ज्योतिषामादिरग्निर्भूतादिरुच्यते ।

सावित्री सर्वविद्यानां देवतानां प्रजापतिः ॥ ५ ॥

अब मैं भूतोंके उत्तम आदिका वर्णन करता हूँ। सूर्य समस्त ग्रहोंका और जठरानल सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि बतलाया जाता है । सावित्री सब विद्याओंकी और प्रजापति देवताओंके आदि हैं ॥ ४-५ ॥

ओङ्कारः सर्ववेदानां वचसां प्राण एव च ।

यदस्मिन् नियतं लोके सर्वं सावित्रिरुच्यते ॥ ६ ॥

ॐकार सम्पूर्ण वेदोंका और प्राण वाणीका आदि है । इस संसारमें जो नियत उच्चारण है, वह सब गायत्री कहलाता है ॥ ६ ॥

गायत्री च्छन्दसामादिः प्रजानां सर्ग उच्यते ।

गावश्चतुष्पदामादिर्मनुष्याणां द्विजातयः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1789

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छन्दोंका आदि गायत्री और प्रजाका आदि सृष्टिका प्रारम्भ काल है । गौएँ चौपायोंकी और ब्राह्मण मनुष्योंके आदि हैं ॥ ७ ॥

श्येनः पतत्रिणामादिर्यज्ञानां हुतमुत्तमम् ।

सरीसृपाणां सर्वेषां ज्येष्ठः सर्पो द्विजोत्तमाः ॥ ८ ॥

द्विजवरो! पक्षियोंमें बाज, यज्ञोंमें उत्तम आहुति और सम्पूर्ण रेंगकर चलनेवाले जीवोंमें साँप श्रेष्ठ है ॥

कृतमादिर्युगानां च सर्वेषां नात्र संशयः ।

हिरण्यं सर्वरत्नानामोषधीनां यवास्तथा ॥ ९ ॥

सत्ययुग सम्पूर्ण युगोंका आदि है, इसमें संशय नहीं है । समस्त रत्नोंमें सुवर्ण और अन्नोंमें जौ श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥

सर्वेषां भक्ष्यभोज्यानामन्नं परममुच्यते ।

द्रवाणां चैव सर्वेषां पेयानामाप उत्तमाः ॥ १० ॥

सम्पूर्ण भक्ष्य- भोज्य पदार्थोंमें अन्न श्रेष्ठ कहा जाता है । बहनेवाले और सभी पीनेयोग्य पदार्थोंमें जल उत्तम है ॥

स्थावराणां तु भूतानां सर्वेषामविशेषतः ।

ब्रह्मक्षेत्रं सदा पुण्यं प्लक्षः प्रथमतः स्मृतः ॥ ११ ॥

समस्त स्थावर भूतोंमें सामान्यतः ब्रह्मक्षेत्र - पाकर नामवाला वृक्ष श्रेष्ठ एवं पवित्र माना गया है ॥ ११ ॥

अहं प्रजापतीनां च सर्वेषां नात्र संशयः ।

मम विष्णुरचिन्त्यात्मा स्वयम्भूरिति स स्मृतः ॥ १२ ॥

सम्पूर्ण प्रजापतियोंका आदि मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है । मेरे आदि अचिन्त्यात्मा

भगवान् विष्णु हैं । उन्हींको स्वयम्भू कहते हैं ॥ १२ ॥

पर्वतानां महामेरुः सर्वेषामग्रजः स्मृतः ।

दिशां च प्रदिशां चोर्ध्वं दिक्पूर्वा प्रथमा तथा ॥ १३ ॥

समस्त पर्वतोंमें सबसे पहले महामेरुगिरिकी उत्पत्ति हुई है । दिशा और विदिशाओंमें पूर्व दिशा उत्तम और आदि मानी गयी है ॥ १३ ॥

तथा त्रिपथगा गङ्गा नदीनामग्रजा स्मृता ।

तथा सरोदपानानां सर्वेषां सागरोऽग्रजः ॥ १४ ॥

सब नदियोंमें त्रिपथगा गंगा ज्येष्ठ मानी गयी है । सरोवरोंमें सर्वप्रथम समुद्रका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ १४ ॥

देवदानवभूतानां पिशाचोरगरक्षसाम् ।

नरकिन्नरयक्षाणां सर्वेषामीश्वरः प्रभुः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1790

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देव, दानव, भूत, पिशाच, सर्प, राक्षस, मनुष्य, किन्नर और समस्त यक्षोंके स्वामी भगवान् शंकर हैं ॥ १५ ॥

आदिर्विश्वस्य जगतो विष्णुर्ब्रह्ममयो महान् ।

भूतं परतरं यस्मात् त्रैलोक्ये नेह विद्यते ॥ १६ ॥

सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण ब्रह्मस्वरूप महाविष्णु हैं । तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ १६ ॥

आश्रमाणां च सर्वेषां गार्हस्थ्यं नात्र संशयः ।

लोकानामादिरव्यक्तं सर्वस्यान्तस्तदेव च ॥ १७ ॥

सब आश्रमोंका आदि गृहस्थ आश्रम है, इसमें संदेह नहीं है । समस्त जगत्का आदि और अन्त अव्यक्त प्रकृति ही है ॥ १७ ॥

अहान्यस्तमयान्तानि उदयान्ता च शर्वरी ।

सुखस्यान्तं सदा दुःखं दुःखस्यान्तं सदा सुखम् ॥ १८ ॥

दिनका अन्त है सूर्यास्त और रात्रिका अन्त है सूर्योदय । सुखका अन्त सदा दुःख है और दुःखका अन्त सदा सुख है ॥ १८ ॥

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।

संयोगाश्च वियोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ १ ९ ॥

समस्त संग्रहका अन्त है विनाश, उत्थानका अन्त है पतन, संयोगका अन्त है वियोग और जीवनका अन्त है मृत्यु ॥ १ ९ ॥

सर्वं कृतं विनाशान्तं जातस्य मरणं ध्रुवम् ।

अशाश्वतं हि लोकेऽस्मिन् सदा स्थावरजङ्गमम् ॥ २० ॥

जिन - जिन वस्तुओंका निर्माण हुआ है, उनका नाश अवश्यम्भावी है । जो जन्म ले चुका है उसकी मृत्यु निश्चित है । इस जगत्में स्थावर या जंगम कोई भी सदा रहनेवाला नहीं है ॥ २० ॥

इष्टं दत्तं तपोऽधीतं व्रतानि नियमाश्च ये ।

सर्वमेतद् विनाशान्तं ज्ञानस्यान्तो न विद्यते ॥ २१ ॥

जितने भी यज्ञ, दान, तप, अध्ययन, व्रत और नियम हैं, उन सबका अन्तमें विनाश होता है, केवल ज्ञानका अन्त नहीं होता ॥ २१ ॥

तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ।

निर्ममो निरहंकारो मुच्यते सर्वपाप्मभिः ॥ २२ ॥

इसलिये विशुद्ध ज्ञानके द्वारा जिसका चित्त शान्त हो गया है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हो चुकी हैं तथा जो ममता और अहंकारसे रहित हो गया है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता ॥ २२ ॥