06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1851–1860

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1851–1860

पृष्ठ 1851

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आकाश और पृथ्वीके बीचका जो भाग है, वह आपके उदरसे व्याप्त हो रहा है । आपकी भुजाओंने सम्पूर्ण दिशाओंको घेर लिया है । अच्युत! यह सारा दृश्य -प्रपंच आप ही हैं ॥ ८ ॥

संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय्यमुत्तमम् ।

पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टुमिच्छामि शाश्वतम् ॥ ९ ॥

देव! अब अपने इस उत्तम एवं अविनाशी स्वरूपको फिर समेट लीजिये । मैं आप सनातन पुरुषको पुनः अपने पूर्वरूपमें ही देखना चाहता हूँ ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

तमुवाच प्रसन्नात्मा गोविन्दो जनमेजय ।

वरं वृणीष्वेति तदा तमुत्तङ्कोऽब्रवीदिदम् ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! मुनिकी बात सुनकर सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने कहा - ' महर्षे! आप मुझसे कोई वर माँगिये । ' तब उत्तंकने कहा - ॥ १० ॥

पर्याप्त एष एवाद्य वरस्त्वत्तो महाद्युते ।

यत् ते रूपमिदं कृष्ण पश्यामि पुरुषोत्तम ॥ ११ ॥

' महातेजस्वी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! आपके इस स्वरूपका जो मैं दर्शन कर रहा हूँ, यही मेरे लिये आज आपकी ओरसे बहुत बड़ा वरदान प्राप्त हो गया ' ॥ ११ ॥

तमब्रवीत् पुनः कृष्णो मा त्वमत्र विचारय ।

अवश्यमेतत् कर्तव्यममोघं दर्शनं मम ॥ १२ ॥

यह सुनकर श्रीकृष्णने फिर कहा – ' मुने! आप इसमें कोई अन्यथा विचार न करें ।

आपको अवश्य ही मुझसे वर माँगना चाहिये; क्योंकि मेरा दर्शन अमोघ है ' ॥ १२ ॥

उत्तङ्क उवाच

अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो ।

तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरुष्वेतद्धि दुर्लभम् ॥ १३ ॥

उत्तंक बोले- प्रभो! यदि वर माँगना आप मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य मानते हैं तो मैं यही चाहता हूँ कि मुझे यहाँ यथेष्ट जल प्राप्त हो; क्योंकि इस मरुभूमिमें जल बड़ा ही दुर्लभ है ॥ १३ ॥

ततः संहृत्य तत् तेजः प्रोवाचोत्तङ्कमीश्वरः ।

एष्टव्ये सति चिन्त्योऽहमित्युक्त्वा द्वारकां ययौ ॥ १४ ॥

तब भगवान्ने अपने उस तेजोमय स्वरूपको समेटकर उत्तंक मुनिसे कहा — ‘ मुने! जब आपको जलकी इच्छा हो, तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा । ' ऐसा कहकर वे द्वारका चले गये ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1852

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ततः कदाचिद् भगवानुत्तङ्कस्तोयकाङ्क्षया ।

तृषितः परिचक्राम मरौ सस्मार चाच्युतम् ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् एक दिन उत्तंक मुनिको बड़ी प्यास लगी । वे पानीकी इच्छासे उस मरुभूमिमें चारों ओर घूमने लगे । घूमते - घूमते उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण किया ॥ १५ ॥

ततो दिग्वाससं धीमान् मातङ्गं मलपङ्किनम् ।

अपश्यत मरौ तस्मिन् श्वयूथपरिवारितम् ॥ १६ ॥

इतनेहीमें उन बुद्धिमान् मुनिको उस मरुप्रदेशमें कुत्तोंके झुंडसे घिरा हुआ एक नंग-धड़ंग चाण्डाल दिखायी पड़ा, जिसके शरीरमें मैल और कीचड़ जमी हुई थी ॥ १६ ॥

भीषणं बद्धनिस्त्रिंशं बाणकार्मुकधारिणम् ।

तस्याधः स्रोतसोऽपश्यद् वारि भूरि द्विजोत्तमः ॥ १७ ॥

वह देखनेमें बड़ा भयंकर था । उसने कमरमें तलवार बाँध रखी थी और हाथोंमें धनुष-बाण धारण किये थे । द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने देखा - उसके नीचे पैरोंके समीप एक छिद्रसे प्रचुर जलकी धारा गिर रही है ॥ १७ ॥

स्मरन्नेव च तं प्राह मातङ्गः प्रहसन्निव ।

एह्युत्तङ्क प्रतीच्छस्व मत्तो वारि भृगूद्वह ॥ १८ ॥

कृपा हि मे सुमहती त्वां दृष्ट्वा तृट् समाश्रितम् ।

इत्युक्तस्तेन स मुनिस्तत् तोयं नाभ्यनन्दत ॥ १ ९ ॥

मुनिको पहचानते ही वह जोर- जोर से हँसता हुआ सा बोला- ' भृगकुलतिलक उत्तंक! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो । तुम्हें प्याससे पीड़ित देखकर मुझे तुमपर बड़ी दया आ रही है । ' चाण्डालके ऐसा कहनेपर भी मुनिने उसके जलका अभिनन्दन नहीं किया — उसे लेनेसे इनकार कर दिया ॥ १८-१९ ॥

चिक्षेप च स तं धीमान् वाग्भिरुग्राभिरच्युतम् ।

पुनः पुनश्च मातङ्गः पिबस्वेति तमब्रवीत् ॥ २० ॥

उस समय बुद्धिमान् उत्तंकने अपने कठोर वचनों द्वारा भगवान् श्रीकृष्णपर भी आक्षेप किया । उधर चाण्डाल - '! ' बारंबारआग्रह करने लगा -'महर्षे जल पी लीजिये ॥ २० ॥

न चापिबत् स सक्रोधः क्षुभितेनान्तरात्मना ।

स तथा निश्चयात् तेन प्रत्याख्यातो महात्मना ॥ २१ ॥

उत्तंकने उस जलको नहीं पीया । वे अत्यन्त कुपित हो उठे थे । उनके अन्तःकरणमें बड़ा क्षोभ था । उन महात्माने अपने निश्चयपर अटल रहकर चाण्डालको जवाब दे दिया ॥ २१ ॥

श्वभिः सह महाराज तत्रैवान्तरधीयत ।

उत्तङ्कस्तं तथा दृष्ट्वा ततो व्रीडितमानसः ॥ २२ ॥

मेने प्रलब्धमात्मानं कृष्णेनामित्रघातिना ।

पृष्ठ 1853

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महाराज! मुनिके इनकार करते ही कुत्तोंसहित वह चाण्डाल वहीं अन्तर्धान हो गया । यह देख उत्तंक मन - ही - मन बहुत लज्जित हुए और सोचने लगे कि ' शत्रुघाती श्रीकृष्णने मुझे ठग लिया ' ॥ २२३ ॥

अथ तेनैव मार्गेण शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २३ ॥

आजगाम महाबुद्धिरुत्तङ्कश्चेनमब्रवीत् ।

न युक्तं तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम ॥ २४ ॥

सलिलं विप्रमुख्येभ्यो मातङ्गस्रोतसा विभो । तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये । उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा - ' पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है' ॥ २३-२४३ ॥ इत्युक्तवचनं तं तु महाबुद्धिर्जनार्दनः ॥ २५ ॥

उत्तङ्कं श्लक्ष्णया वाचा सान्त्वयन्निदमब्रवीत् । उत्तंकके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् जनार्दनने उन्हें मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए कहा— यादृशेनेह॥ २५ रूपेण॥ योग्यं दातुं धृतेन वै ॥ २६ ॥

तादृशं खलु ते दत्तं यच्च त्वं नावबुध्यथाः । ‘ महर्षे! वहाँ जैसा रूप धारण करके वह जल आपके लिये देना उचित था, उसी रूपसे दिया गया; किंतु आप उसे समझ न सके ॥ २६ ॥

मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्रपाणिः पुरंदरः ॥ २७ ॥

उत्तङ्कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभुः ।

स मामुवाच देवेन्द्रो न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत् ॥ २८ ॥

अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद् भृगुनन्दन ।

अमृतं देयमित्येव मयोक्तः स शचीपतिः ॥ २ ९ ॥

‘ भृगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो । मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि ‘ मनुष्य अमर नहीं हो सकता । इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये । ' परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तङ्कको तो अमृत ही देना है ॥ २७–२९ ॥

स मां प्रसाद्य देवेन्द्रः पुनरेवेदमब्रवीत् ।

यदि देयमवश्यं वै मातङ्गोऽहं महामते ॥ ३० ॥

भूत्वामृतं प्रदास्यामि भार्गवाय महात्मने ।

यद्येवं प्रतिगृह्णाति भार्गवोऽमृतमद्य वै ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1854

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प्रदातुमेष गच्छामि भार्गवस्यामृतं विभो ।

प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन दास्यामि न कथंचन ॥ ३२ ॥

' तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले – ' सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा । यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा ' ॥ ३०–३२ ॥

स तथा समयं कृत्वा तेन रूपेण वासवः ।

उपस्थितस्त्वया चापि प्रत्याख्यातोऽमृतं ददत् ॥ ३३ ॥

‘ इस तरहकी शर्त करके साक्षात् इन्द्र चाण्डालके रूपमें यहाँ उपस्थित हुए थे और आपको अमृत दे रहे थे; परंतु आपने उन्हें ठुकरा दिया ॥ ३३ ॥

चाण्डालरूपी भगवान् सुमहांस्ते व्यतिक्रमः ।

यत् तु शक्यं मया कर्तुं भूय एव तवेप्सितम् ॥ ३४ ॥

‘ आपने चाण्डालरूपधारी भगवान् इन्द्रको ठुकराया है, यह आपका महान् अपराध है ।

अच्छा, आपकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मैं पुनः जो कुछ कर सकता हूँ, करूँगा ॥ ३४ ॥

तोयेप्सां तव दुर्धर्षां करिष्ये सफलामहम् ।

येष्वहःसु च ते ब्रह्मन् सलिलेप्सा भविष्यति ॥ ३५ ॥

तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णाः पयोधराः ।

रसवच्च प्रदास्यन्ति तोयं ते भृगुनन्दन ॥ ३६ ॥

उत्तङ्कमेघा इत्युक्ताः ख्यातिं यास्यन्ति चापि ते । ‘ब्रह्मन्! आपकी तीव्र पिपासाको मैं अवश्य सफल करूँगा । जिन दिनों आपको जल पीनेकी इच्छा होगी, उन्हीं दिनों मरुप्रदेशमें जलसे भरे हुए मेघ प्रकट होंगे । भृगुनन्दन! वे आपको सरस जल प्रदान करेंगे और इस पृथ्वीपर उत्तंक मेघके नामसे विख्यात होंगे ' ॥

इत्युक्तः प्रीतिमान् विप्रः कृष्णेन स बभूव ह ।

अद्याप्युत्तङ्कमेघाश्च मरौ वर्षन्ति भारत ॥ ३७ ॥

भारत! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर विप्रवर उत्तंक मुनि बड़े प्रसन्न हुए । इस समय भी मरुभूमिमें उत्तंक मेघ प्रकट होकर जलकी वर्षा करते हैं ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कोपाख्यानमें कृष्णवाक्यविषयक पचपनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1855

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पृष्ठ 1856

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना जनमेजय उवाच

उत्तङ्कः केन तपसा संयुक्तो वै महामनाः ।

यः शापं दातुकामोऽभूद् विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! महात्मा उत्तंक मुनिने ऐसी कौन-सी तपस्या की थी, जिससे वे सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् विष्णुको भी शाप देनेका संकल्प कर बैठे? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

उत्तङ्को महता युक्तस्तपसा जनमेजय ।

गुरुभक्तः स तेजस्वी नान्यत् किंचिदपूजयत् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा-जनमेजय! उत्तंक मुनि बड़े भारी तपस्वी, तेजस्वी और गुरुभक्त थे। उन्होंने जीवनमें गुरुके सिवा दूसरे किसी देवताकी आराधना नहीं की थी ॥ २ ॥

सर्वेषामृषिपुत्राणामेष आसीन्मनोरथः ।

औत्तङ्कीं गुरुवृत्तिं वै प्राप्नुयामेति भारत ॥ ३ ॥

भरतनन्दन! जब वे गुरुकुलमें रहते थे, उन दिनों सभी ऋषिकुमारोंके मनमें यह अभिलाषा होती थी कि हमें भी उत्तंकके समान गुरुभक्ति प्राप्त हो ॥ ३ ॥

गौतमस्य तु शिष्याणां बहूनां जनमेजय ।

उत्तङ्केऽभ्यधिका प्रीतिः स्नेहश्चैवाभवत् तदा ॥ ४ ॥

जनमेजय! गौतमके बहुत- से शिष्य थे, परंतु उनका प्रेम और स्नेह सबसे अधिक उत्तंकमें ही था ॥

स तस्य दमशौचाभ्यां विक्रान्तेन च कर्मणा ।

सम्यक् चैवोपचारेण गौतमः प्रीतिमानभूत् ॥ ५ ॥

उत्तंकके इन्द्रियसंयम, बाहर- भीतरकी पवित्रता, पुरुषार्थ, कर्म और उत्तमोत्तम सेवासे गौतम बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ ५ ॥

अथ शिष्यसहस्राणि समनुज्ञातवानृषिः । उत्तङ्कं परया प्रीत्या नाभ्यनुज्ञातुमैच्छत ।

पृष्ठ 1857

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तं क्रमेण जरा तात प्रतिपेदे महामुनिम् ॥ ६ ॥

उन महर्षिने अपने सहस्रों शिष्योंको पढ़ाकर घर जानेकी आज्ञा दे दी; परंतु उत्तङ्कपर अधिक प्रेम होनेके कारण वे उन्हें घर जानेकी आज्ञा नहीं देना चाहते थे । तात! क्रमशः उन महामुनि उत्तंकको वृद्धावस्था प्राप्त हुई ॥ ६ ॥

न चान्वबुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सलः ।

ततः कदाचिद् राजेन्द्र काष्ठान्यानयितुं ययौ ॥ ७ ॥

उत्तङ्कः काष्ठभारं च महान्तं समुपानयत् । किंतु वे गुरुवत्सल महर्षि यह नहीं जान सके कि मेरा बुढ़ापा आ गया । राजेन्द्र! एक दिन उत्तंक मुनि लकड़ियाँ लानेके लिये वनमें गये और वहाँसे काठका बहुत बड़ा बोझ उठा लाये ॥ ७३ ॥

स तद्भाराभिभूतात्मा काष्ठभारमरिंदम ॥ ८ ॥

निचिक्षेप क्षितौ राजन् परिश्रान्तो बुभुक्षितः ।

तस्य काष्ठे विलग्नाभूज्जटा रूप्यसमप्रभा ॥ ९ ॥

ततः काष्ठैः सह तदा पपात धरणीतले । शत्रुदमन नरेश! बोझ भारी होनेके कारण वे बहुत थक गये । उनका शरीर लकड़ियोंके भारसे दब गया था । वे भूखसे पीड़ित हो रहे थे । जब आश्रमपर आकर उस बोझको वे जमीनपर गिराने लगे, उस समय चाँदीके तारकी भाँति सफेद रंगकी उनकी जटा लकड़ीमें चिपक गयी थी, जो उन लकड़ियोंके साथ ही जमीनपर गिर पड़ी ॥ ८ - ९ ३ ॥ ततः स भारनिष्पिष्टः क्षुधाविष्टश्च भारत ॥ १० ॥

दृष्ट्वा तां वयसोऽवस्थां रुरोदार्तस्वरस्तदा । भारत! भारसे तो वे पिस ही गये थे, भूखने भी उन्हें व्याकुल कर दिया था । अतः अपनी उस अवस्थाको देखकर वे उस समय आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १०३ ॥

ततो गुरुसुता तस्य पद्मपत्रनिभानना ॥ ११ ॥

जग्राहाश्रूणि सुश्रोणी करेण पृथुलोचना ।

पितुर्नियोगाद् धर्मज्ञा शिरसावनता तदा ॥ १२ ॥

तब कमलदलके समान प्रफुल्ल मुखवाली विशाललोचना परम सुन्दरी धर्मज्ञ गुरुपुत्रीने पिताकी आज्ञा पाकर विनीत भावसे सिर झुकाये वहाँ आयी और अपने हाथोंमें उसने मुनिके आँसू ग्रहण कर लिये ॥

तस्या निपेततुर्दग्धौ करौ तैरश्रुबिन्दुभिः ।

न हि तानश्रुपातांस्तु शक्ता धारयितुं मही ॥ १३ ॥

उन अश्रुबिन्दुओंसे उसके दोनों हाथ जल गये और आँसुओंसहित पृथ्वीसे जा लगे ।

परंतु पृथ्वी भी उन गिरते हुए अश्रुबिन्दुओंके धारण करनेमें असमर्थ हो गयी ॥ १३ ॥

गौतमस्त्वब्रवीद् विप्रमुत्तङ्कं प्रीतमानसः ।

पृष्ठ 1858

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कस्मात् तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मनः ।

स स्वैरं ब्रूहि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १४ ॥

फिर गौतमने प्रसन्नचित्त होकर विप्रवर उत्तंकसे पूछा - ' बेटा! आज तुम्हारा मन शोकसे व्याकुल क्यों हो रहा है? मैं इसका यथार्थ कारण सुनना चाहता हूँ। ब्रह्मर्षे! तुम निःसंकोच होकर सारी बातें बताओ ' ॥ १४ ॥

उत्तङ्क उवाच

भवद्गतेन मनसा भवत्प्रियचिकीर्षया ।

भवद्भक्तिगतेनेह भवद्भावानुगेन च ॥ १५ ॥

जयं नावबुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे ।

शतवर्षोषितं मां हि न त्वमभ्यनुजानिथाः ॥ १६ ॥

उत्तंकने कहा — गुरुदेव! मेरा मन सदा आपमें लगा रहा । आपहीका प्रिय करनेकी इच्छासे मैं निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहा, मेरा सम्पूर्ण अनुराग आपहीमें रहा है और आपहीकी भक्तिमें तत्पर रहकर मैंने न तो लौकिक सुखको जाना और न मुझे आये हुए इस बुढ़ापाका ही पता चला । मुझे यहाँ रहते हुए सौ वर्ष बीत गये तो भी आपने मुझे घर जानेकी आज्ञा नहीं दी ॥ १५-१६ ॥

भवता त्वभ्यनुज्ञाताः शिष्याः प्रत्यवरा मम ।

उपपन्ना द्विजश्रेष्ठ शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १७ ॥

द्विजश्रेष्ठ! मेरे बाद सैकड़ों और हजारों शिष्य आपकी सेवामें आये और अध्ययन पूरा करके आपकी आज्ञा लेकर चले गये ( केवल मैं ही यहाँ पड़ा हुआ हूँ) ॥ १७ ॥

गौतम उवाच

त्वत्प्रीतियुक्तेन मया गुरुशुश्रूषया तव ।

व्यतिक्रामन्महाकालो नावबुद्धो द्विजर्षभ ॥ १८ ॥

गौतमने कहा – विप्रवर! तुम्हारी गुरुशुश्रूषासे तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया था । इसीलिये इतना अधिक समय बीत गया तो भी मेरे ध्यानमें यह बात नहीं आयी ॥ १८ ॥

किं त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं प्रति भार्गव ।

अनुज्ञां प्रतिगृह्य त्वं स्वगृहान् गच्छ मा चिरम् ॥ १ ९ ॥

भृगुनन्दन! यदि आज तुम्हारे मनमें यहाँसे जानेकी इच्छा हुई है तो मेरी आज्ञा स्वीकार करो और शीघ्र ही यहाँसे अपने घरको चले जाओ ॥ १ ९ ॥ उत्तङ्क उवाच

गुर्वर्थं कं प्रयच्छामि ब्रूहि त्वं द्विजसत्तम ।

तमुपाहृत्य गच्छेयमनुज्ञातस्त्वया विभो ॥ २० ॥

पृष्ठ 1859

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उत्तंकने पूछा – द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! मैं आपको गुरुदक्षिणामें क्या दूँ? यह बताइये । उसे आपको अर्पित करके आज्ञा लेकर घरको जाऊँ ॥ २० ॥

गौतम उवाच

दक्षिणा परितोषो वै गुरूणां सद्भिरुच्यते ।

तव ह्याचरतो ब्रह्मंस्तुष्टोऽहं वै न संशयः ॥ २१ ॥

गौतमने कहा — ब्रह्मन्! सत्पुरुष कहते हैं कि गुरुजनोंको संतुष्ट करना ही उनके लिये सबसे उत्तम दक्षिणा है । तुमने जो सेवा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह ।

युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान् ॥ २२ ॥

ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज ।

एतामृतेऽङ्गना नान्या त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम् ॥ २३ ॥

भृगुकुलभूषण! इस तरह तुम मुझे पूर्ण संतुष्ट जानो । यदि आज तुम सोलह वर्षके तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नीरूपसे अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूँगा; क्योंकि इसके सिवा दूसरी कोई स्त्री तुम्हारे तेजको नहीं सह सकती ॥ २२-२३ ॥

ततस्तां प्रतिजग्राह युवा भूत्वा यशस्विनीम् ।

गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥

तब उत्तंकने तपोबलसे तरुण होकर उस यशस्विनी गुरुपुत्रीका पाणिग्रहण किया ।

तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा पाकर वे गुरुपत्नीसे बोले— ॥ २४ ॥

कं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थं विनियुङ्क्ष्व माम् ।

प्रियं हितं च काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ॥ २५ ॥

‘ माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं गुरुदक्षिणामें आपको क्या दूँ? अपना धन और प्राण देकर भी मैं आपका प्रिय एवं हित करना चाहता हूँ ॥ २५ ॥

यद् दुर्लभं हि लोकेऽस्मिन् रत्नमत्यद्भुतं महत् ।

तदानयेयं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥ २६ ॥

'इस लोकमें जो अत्यन्त दुर्लभ, अद्भुत एवं महान् रत्न हो, उसे भी मैं तपस्याके बलसे ला सकता हूँ; इसमें संशय नहीं है ' ॥ २६ ॥

अहल्योवाच

परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ ।

पर्याप्तमेतद् भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम् ॥ २७ ॥

अहल्या बोली - निष्पाप ब्राह्मण! मैं तुम्हारे भक्ति- भावसे सदा संतुष्ट हूँ । बेटा! मेरे लिये इतना ही बहुत है । तुम्हारा कल्याण हो । अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ॥ २७ ॥

पृष्ठ 1860

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वैशम्पायन उवाच

उत्तङ्कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद्वचः ।

आज्ञापयस्व मां मातः कर्तव्यं च तव प्रियम् ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! गुरुपत्नीकी बात सुनकर उत्तंकने फिर कहा - ' माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये - मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना है ' ॥ २८ ॥

अहल्योवाच

सौदासपत्न्या विधृते दिव्ये ये मणिकुण्डले ।

ते समानय भद्रं ते गुर्वर्थः सुकृतो भवेत् ॥ २ ९ ॥

अहल्या बोली - बेटा! राजा सौदासकी रानीने जो दो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण कर रखे हैं, उन्हें ले आओ । तुम्हारा कल्याण हो । उनके ला देनेसे तुम्हारी गुरु - दक्षिणा पूरी हो जायगी ॥ २ ९ ॥

स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय ।

गुरुपत्नीप्रियार्थं वै ते समानयितुं तदा ॥ ३० ॥

जनमेजय! तब ‘ बहुत अच्छा' कहकर उत्तंकने गुरुपत्नीकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनका प्रिय करनेकी इच्छासे उन कुण्डलोंको लानेके लिये चल दिये ॥ ३० ॥

स जगाम ततः शीघ्रमुत्तङ्को ब्राह्मणर्षभः ।

सौदासं पुरुषादं वै भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥ ३१ ॥

ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक नरभक्षी राक्षसभावको प्राप्त हुए राजा सौदाससे उन मणिमय कुण्डलोंकी याचना करनेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए ॥ ३१ ॥

गौतमस्त्वब्रवीत् पत्नीमुत्तङ्को नाद्य दृश्यते ।

इति पृष्टा तमाचष्ट कुण्डलार्थे गतं च सा ॥ ३२ ॥

उनके चले जानेपर गौतमने पत्नीसे पूछा — ' आज उत्तंक क्यों नहीं दिखायी देता है? ' पतिके इस प्रकार पूछनेपर अहल्याने कहा- ' वह सौदासकी महारानीके कुण्डल ले आनेके लिये गया ' ॥ ३२ ॥

ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम् ।

शप्तः स पार्थिवो नूनं ब्राह्मणं तं वधिष्यति ॥ ३३ ॥

यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा – ' देवि! यह तुमने अच्छा नहीं किया । राजा सौदास

शापवश राक्षस हो गये हैं । अतः वे उस ब्राह्मणको अवश्य मार डालेंगे ' ॥ ३३ ॥

अहल्योवाच

अजानन्त्या नियुक्तः स भगवन् ब्राह्मणो मया ।

भवत्प्रसादान्न भयं किंचित् तस्य भविष्यति ॥ ३४ ॥