06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1841–1850
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1841–1850
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ददर्शाथ मुनिश्रेष्ठमुत्तङ्कममितौजसम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार मरुभूमिके समतल प्रदेशमें पहुँचकर महाबाहु श्रीकृष्णने अमिततेजस्वी मुनिश्रेष्ठ उत्तंकका दर्शन किया ॥ ७ ॥
सतं सम्पूज्य तेजस्वी मुनिं पृथुललोचनः ।
पूजितस्तेन च तदा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ ८ ॥
विशाल नेत्रोंवाले तेजस्वी श्रीकृष्ण उत्तंक मुनिकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा पूजित हुए । तत्पश्चात् उन्होंने मुनिका कुशल- समाचार पूछा ॥ ८ ॥
स पृष्टः कुशलं तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् ।
उत्तङ्को ब्राह्मणश्रेष्ठस्ततः पप्रच्छ माधवम् ॥ ९ ॥
उनके कुशल- मंगल पूछनेपर विप्रवर उत्तंकने भी मधुसूदन माधवकी पूजा करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ९ ॥
कच्चिच्छौरे त्वया गत्वा कुरुपाण्डवसद्म तत् ।
कृतं सौभ्रात्रमचलं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १० ॥
' शूरनन्दन! क्या तुम कौरवों और पाण्डवोंके घर जाकर उनमें अविचल भ्रातृभाव स्थापित कर आये? यह बात मुझे विस्तारके साथ बताओ ॥ १० ॥
अपि संधाय तान् वीरानुपावृत्तोऽसि केशव ।
सम्बन्धिनः स्वदयितान् सततं वृष्णिपुङ्गव ॥ ११ ॥
केशव! क्या तुम उन वीरोंमें संधि कराकर ही लौट रहे हो? वृष्णिपुंगव! वे कौरव, पाण्डव तुम्हारे सम्बन्धी तथा तुम्हें सदा ही परम प्रिय रहे हैं ॥ ११ ॥
कच्चित् पाण्डुसुताः पञ्च धृतराष्ट्रस्य चात्मजाः ।
लोकेषु विहरिष्यन्ति त्वया सह परंतप ॥ १२ ॥
‘ परंतप! क्या पाण्डुके पाँचों पुत्र और धृतराष्ट्रके भी सभी आत्मज संसारमें तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचर सकेंगे? ॥
स्वराष्ट्रे ते च राजानः कच्चित् प्राप्स्यन्ति वै सुखम् ।
कौरवेषु प्रशान्तेषु त्वया नाथेन केशव ॥ १३ ॥
‘ केशव! तुम- जैसे रक्षक एवं स्वामीके द्वारा कौरवोंके शान्त कर दिये जानेपर अब पाण्डवनरेशोंको अपने राज्यमें सुख तो मिलेगा न? ॥ १३ ॥
या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत ।
अपि सा सफला तात कृता ते भरतान् प्रति ॥ १४ ॥
' तात! मैं सदा तुमसे इस बातकी सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्नसे कौरव-पाण्डवोंमें मेल हो जायगा । मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियोंके सम्बन्धमें तुमने वह सफल तो किया है न? ' ॥ १४ ॥
श्रीभगवानुवाच
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कृतो यत्नो मया पूर्वं सौशाम्ये कौरवान् प्रति ।
नाशक्यन्त यदा साम्ये ते स्थापयितुमञ्जसा ॥ १५ ॥
ततस्ते निधनं प्राप्ताः सर्वे ससुतबान्धवाः । श्रीभगवान्ने कहा — महर्षे! मैंने पहले कौरवोंके पास जाकर उन्हें शान्त करनेके लिये बड़ा प्रयत्न किया, परंतु वे किसी तरह संधिके लिये तैयार न किये जा सके । जब उन्हें समतापूर्ण मार्गमें स्थापित करना असम्भव हो गया, तब वे सब- के5--सबस अपने पुत्र और बन्धु - बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये ॥ १५३ ॥
न दिष्टमप्यतिक्रान्तुं शक्यं बुद्धया बलेन वा ॥ १६ ॥
महर्षे विदितं भूयः सर्वमेतत् तवानघ ।
तेऽत्यक्रामन् मतिं मह्यं भीष्मस्य विदुरस्य च ॥ १७ ॥
महर्षे! प्रारब्धके विधानको कोई बुद्धि अथवा बलसे नहीं मिटा सकता। अनघ! आपको तो ये सब बातें मालूम ही होंगी कि कौरवोंने मेरी, भीष्मजीकी तथा विदुरजीकी सम्मतिको भी ठुकरा दिया ॥ १६-१७ ॥ ततो यमक्षयं जग्मुः समासाद्येतरेतरम् ।
पञ्चैव पाण्डवाः शिष्टा हतामित्रा हतात्मजाः ।
धार्तराष्ट्राश्च निहताः सर्वे ससुतबान्धवाः ॥ १८ ॥
इसीलिये वे आपसमें लड़-भिड़कर यमलोक जा पहुँचे । इस युद्धमें केवल पाँच पाण्डव ही अपने शत्रुओं को मारकर जीवित बच गये हैं । उनके पुत्र भी मार डाले गये हैं । धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जो गान्धारीके पेटसे पैदा हुए थे, अपने पुत्र और बान्धवोंसहित नष्ट हो गये ॥ १८ ॥
इत्युक्तवचने कृष्णे भृशं क्रोधसमन्वितः ।
उत्तङ्क इत्युवाचैनं रोषादुत्फुल्ललोचनः ॥ १ ९ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके इतना कहते ही उत्तंक मुनि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे और रोषसे
आँखें फाड़ - फाड़कर देखने लगे । उन्होंने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा ॥ १ ९ ॥
उत्तङ्क उवाच
यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राताः कुरुपुङ्गवाः ।
सम्बन्धिनः प्रियास्तस्माच्छप्स्येऽहं त्वामसंशयम् ॥ २० ॥
उत्तंक बोले — श्रीकृष्ण! कौरव तुम्हारे प्रिय सम्बन्धी थे, तथापि शक्ति रखते हुए भी
तुमने उनकी रक्षा न की । इसलिये मैं तुम्हें अवश्य शाप दूँगा ॥ २० ॥
न च ते प्रसभं यस्मात् ते निगृह्य निवारिताः ।
तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन ॥ २१ ॥
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मधुसूदन! तुम उन्हें जबर्दस्ती पकड़कर रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया । इसलिये मैं क्रोधमें भरकर तुम्हें शाप दूँगा ॥ २१ ॥
त्वया शक्तेन हि सता मिथ्याचारेण माधव ।
ते परीताः कुरुश्रेष्ठा नश्यन्तः स्म ह्युपेक्षिताः ॥ २२ ॥
माधव! कितने खेदकी बात है, तुमने समर्थ होते हुए भी मिथ्याचारका आश्रय लिया । युद्धमें सब ओरसे आये हुए वे श्रेष्ठ कुरुवंशी नष्ट हो गये और तुमने उनकी उपेक्षा कर दी ॥ २२ ॥
वासुदेव उवाच
शृणु मे विस्तरेणेदं यद् वक्ष्ये भृगुनन्दन ।
गृहाणानुनयं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव ॥ २३ ॥
श्रीकृष्णने कहा – भृगुनन्दन! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तारपूर्वक सुनिये ।
भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय- विनय स्वीकार कीजिये ॥ २३ ॥
श्रुत्वा च मे तदध्यात्मं मुञ्चेथाः शापमद्य वै ।
न च मां तपसाल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान् ॥ २४ ॥
न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर । मैं आपको अध्यात्मतत्त्व सुना रहा हूँ । उसे सुननेके पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आज मुझे शाप दीजियेगा । तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्षे! आप यह याद रखिये कि कोई भी पुरुष थोड़ी- सी तपस्याके बलपर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता । मैं नहीं चाहता कि आपकी तपस्या नष्ट हो जाय ॥ २४ ॥
तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः ॥ २५ ॥
कौमारं ब्रह्मचर्यं ते जानामि द्विजसत्तम ।
दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम् ॥ २६ ॥
आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है । आपने गुरुजनोंको भी सेवासे संतुष्ट किया है । द्विजश्रेष्ठ! आपने बाल्यावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है । ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं । इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर संचित किये हुए आपके तपका मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ ॥ २५-२६ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कृष्णोत्तङ्कसमागमे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कके उपाख्यानमें श्रीकृष्ण और उत्तङ्कका समागमविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना उत्तङ्क उवाच
ब्रूहि केशव तत्त्वेन त्वमध्यात्ममनिन्दितम् ।
श्रुत्वा श्रेयोऽभिधास्यामि शापं वा ते जनार्दन ॥ १ ॥
उत्तंकने कहा — केशव! जनार्दन! तुम यथार्थरूपसे उत्तम अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करो । उसे सुनकर मैं तुम्हारे कल्याणके लिये आशीर्वाद दूँगा अथवा शाप प्रदान करूँगा ॥ वासुदेव उवाच
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि भावान् मदाश्रयान् ।
तथा रुद्रान् वसून् वापि विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ २ ॥
श्रीकृष्णने कहा— ब्रह्मर्षे! आपको यह विदित होना चाहिये कि तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण — ये सभी भाव मेरे ही आश्रित हैं । रुद्रों और वसुओंको भी आप मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ २ ॥
मयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चाप्यहम् ।
स्थित इत्यभिजानीहि मा तेऽभूदत्र संशयः ॥ ३ ॥
सम्पूर्ण भूत मुझमें हैं और सम्पूर्ण भूतोंमें मैं स्थित हूँ। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें । इसमें आपको संशय नहीं होना चाहिये ॥ ३ ॥
तथा दैत्यगणान् सर्वान् यक्षगन्धर्वराक्षसान् ।
नागानप्सरसश्चैव विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ ४ ॥
विप्रवर! सम्पूर्ण दैत्यगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग और अप्सराओंको मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ ४ ॥
सदसच्चैव यत् प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च ।
अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम् ॥ ५ ॥
विद्वान् लोग जिसे सत्- असत्, व्यक्त - अव्यक्त और क्षर- अक्षर कहते हैं, यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ ५ ॥
ये चाश्रमेषु वै धर्माश्चतुर्धा विदिता मुने ।
वैदिकानि च सर्वाणि विद्धि सर्वं मदात्मकम् ॥ ६ ॥
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मुने! चारों आश्रमोंमें जो चार प्रकारके धर्म प्रसिद्ध हैं तथा जो सम्पूर्ण वेदोक्त कर्म हैं, उन सबको मेरा स्वरूप ही समझिये ॥ ६ ॥
असच्च सदसच्चैव यद् विश्वं सदसत् परम् ।
मत्तः परतरं नास्ति देवदेवात् सनातनात् ॥ ७ ॥
असत्, सदसत् तथा उससे भी परे जो अव्यक्त जगत् है, वह भी मुझ सनातन देवाधिदेवसे पृथक् नहीं है ॥ ७ ॥
ओङ्कारप्रमुखान् वेदान् विद्धि मां त्वं भृगूद्वह ।
यूपं सोमं चरुं होमं त्रिदशाप्यायनं मखे ॥ ८ ॥
होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन ।
अध्वर्युः कल्पकश्चापि हविः परमसंस्कृतम् ॥ ९ ॥
भृगुश्रेष्ठ! ॐकारसे आरम्भ होनेवाले चारों वेद मुझे ही समझिये । यज्ञमें यूप, सोम, चरु, देवताओंको तृप्त करनेवाला होम, होता और हवन सामग्री भी मुझे ही जानिये । भृगुनन्दन! अध्वर्यु, कल्पक और अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ हविष्य–ये सब मेरे ही स्वरूप हैं ॥
उद्गाता चापि मां स्तौति गीताघोषैर्महाध्वरे ।
प्रायश्चित्तेषु मां ब्रह्मन् शान्तिमङ्गलवाचकाः ॥ १० ॥
स्तुवन्ति विश्वकर्माणं सततं द्विजसत्तम ।
मम विद्धि सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम ॥ ११ ॥
मानसं दयितं विप्र सर्वभूतदयात्मकम् । बड़े - बड़े यज्ञोंमें उद्गाता उच्च स्वरसे सामगान करके मेरी ही स्तुति करते हैं । ब्रह्मन्! प्रायश्चित्त - कर्ममें शान्तिपाठ तथा मंगलपाठ करनेवाले ब्राह्मण सदा मुझ विश्वकर्माका ही स्तवन करते हैं । द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना- रूप जो धर्म है, वह मेरा परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र है । मेरे मनसे उसका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ १०-११३ || तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ॥ १२ ॥
बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम ।
धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥ १३ ॥
तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव । भार्गव! उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ । साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत - सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ ॥ १२-१३३ ॥ अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः ॥ १४ ॥
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भूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च । मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही इन्द्र हूँ । सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण भी मैं ही हूँ । समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि और संहार भी मेरे ही द्वारा होते हैं ॥ १४ ३ ॥ अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः ॥ १५ ॥
धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे ।
तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ॥ १६ ॥
अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ । जब- जब युगका परिवर्तन होता है, तब - तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न -भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ ॥ १५-१६ ॥
यदा त्वहं देवयोनौ वर्तामि भृगुनन्दन ।
तदाहं देववत् सर्वमाचरामि न संशयः ॥ १७ ॥
भृगुनन्दन! जब मैं देवयोनिमें अवतार लेता हूँ, तब देवताओंकी ही भाँति सारे आचार-विचारका पालन करता हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ १७ ॥
यदा गन्धर्वयोनौ वा वर्तामि भृगुनन्दन ।
तदा गन्धर्ववत् सर्वमाचरामि न संशयः ॥ १८ ॥
भृगुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले महर्षे! जब मैं गन्धर्व- योनिमें प्रकट होता हूँ, तब मेरे सारे आचार- विचार गन्धर्वोंके ही समान होते हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥
नागयोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत् ।
यक्षराक्षसयोन्योस्तु यथावद् विचराम्यहम् ॥ १ ९ ॥
जब मैं नागयोनिमें जन्म ग्रहण करता हूँ, तब नागोंकी तरह बर्ताव करता हूँ । यक्षों और राक्षसोंकी योनियोंमें प्रकट होनेपर उन्हींके आचार-विचारका यथावत् रूपसे पालन करता हूँ ॥ १ ९ ॥
मानुष्ये वर्तमाने तु कृपणं याचिता मया ।
न च ते जातसम्मोहा वचोऽगृह्णन्त मे हितम् ॥ २० ॥
इस समय मैं मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण हुआ हूँ, इसलिये कौरवोंपर अपनी ईश्वरीय शक्तिका प्रयोग न करके पहले मैंने दीनतापूर्वक ही संधिके लिये प्रार्थना की थी; परंतु उन्होंने मोहग्रस्त होनेके कारण मेरी हितकर बात नहीं मानी ॥ २० ॥
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उत्तङ्कमुनिकी श्रीकृष्णसे विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना
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भयं च महदुद्दिश्य त्रासिताः कुरवो मया ।
क्रुद्धेन भूत्वा तु पुनर्यथावदनुदर्शिताः ॥ २१ ॥
तेऽधर्मेणेह संयुक्ताः परीताः कालधर्मणा ।
धर्मेण निहता युद्धे गताः स्वर्गं न संशयः ॥ २२ ॥
इसके बाद क्रोधमें भरकर मैंने कौरवोंको बड़े - बड़े भय दिखाये और उन्हें बहुत डराया-धमकाया तथा यथार्थरूपसे युद्धका भावी परिणाम भी उन्हें दिखाया; परंतु वे तो अधर्मसे युक्त एवं कालसे ग्रस्त थे । अतः मेरी बात माननेको राजी न हुए । फिर क्षत्रिय- धर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये । इसमें संदेह नहीं कि वे सब-के- सब स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ २१-२२ ॥
लोकेषु पाण्डवाश्चैव गताः ख्यातिं द्विजोत्तम ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! पाण्डव अपने धर्माचरणके कारण समस्त लोकोंमें विख्यात हुए हैं । आपने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने यह सारा प्रसङ्ग कह सुनाया ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कृष्णवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें श्रीकृष्णका वचनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ५४ ॥
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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना उत्तङ्क उवाच
अभिजानामि जगतः कर्तारं त्वां जनार्दन ।
नूनं भवत्प्रसादोऽयमिति मे नास्ति संशयः ॥ १ ॥
उत्तंकने कहा –जनार्दन! मैं यह जानता हूँ कि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता हैं । निश्चय ही यह आपकी कृपा है (जो आपने मुझे अध्यात्मतत्त्वका उपदेश दिया), इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥
चित्तं च सुप्रसन्नं मे त्वद्भावगतमच्युत ।
विनिवृत्तं च मे शापादिति विद्धि परंतप ॥ २ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले अच्युत! अब मेरा चित्त अत्यन्त प्रसन्न और आपके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण हो गया है; अतः इसे शाप देनेके विचारसे निवृत्त हुआ समझें ॥ २ ॥
यदि त्वनुग्रहं कंचित् त्वत्तोऽर्हामि जनार्दन ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय ॥ ३ ॥
जनार्दन! यदि मैं आपसे कुछ भी कृपा प्राप्त करनेका अधिकारी होऊँ तो आप मुझे
अपना ईश्वरीय रूप दिखा दीजिये । आपके उस रूपको देखनेकी बड़ी इच्छा है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः स तस्मै प्रीतात्मा दर्शयामास तद् वपुः ।
शाश्वतं वैष्णवं धीमान् ददृशे यद् धनंजयः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तब परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें अपने उसी सनातन वैष्णव स्वरूपका दर्शन कराया, जिसे युद्धके प्रारम्भमें अर्जुनने देखा था ॥ ४ ॥
स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम् ।
सहस्रसूर्यप्रतिमं दीप्तिमत् पावकोपमम् ॥ ५ ॥
उत्तंक मुनिने उस विश्वरूपका दर्शन किया, जिसका स्वरूप महान् था । जो सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा बड़ी- बड़ी भुजाओंसे सुशोभित था । उससे प्रज्वलित अग्निके समान लपटें निकल रही थीं ॥ ५ ॥
सर्वमाकाशमावृत्य तिष्ठन्तं सर्वतोमुखम् । तद् दृष्ट्वा परमं रूपं विष्णोर्वैष्णवमद्भुतम् ।
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विस्मयं च ययौ विप्रस्तं दृष्ट्वा परमेश्वरम् ॥ ६ ॥
उसके सब ओर मुख था और वह सम्पूर्ण आकाशको घेरकर खड़ा था । भगवान् विष्णुके उस अद्भुत एवं उत्कृष्ट वैष्णव रूपको देखकर उन परमेश्वरकी ओर दृष्टिपात करके ब्रह्मर्षि उत्तंकको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ६ ॥
उत्तङ्क उवाच
( नमो नमस्ते सर्वात्मन् नारायण परात्पर ।
परमात्मन् पद्मनाभ पुण्डरीकाक्ष माधव ॥
उत्तंक बोले — सर्वात्मन्! परात्पर नारायण! आपको बारंबार नमस्कार है । परमात्मन्! पद्मनाभ! पुण्डरीकाक्ष! माधव! आपको नमस्कार है ॥
हिरण्यगर्भरूपाय संसारोत्तारणाय च ।
पुरुषाय पुराणाय चान्तर्यामाय ते नमः ॥
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं । आप संसार- सागरसे पार उतारनेवाले हैं । आप
ही अन्तर्यामी पुराण- पुरुष हैं । आपको नमस्कार है ॥
अविद्यातिमिरादित्यं भवव्याधिमहौषधिम् ।
संसारार्णवपारं त्वां प्रणमामि गतिर्भव ॥
आप अविद्यारूपी अन्धकारको मिटानेवाले सूर्य, संसाररूपी रोगके महान् औषध तथा
भवसागरसे पार करनेवाले हैं । आपको प्रणाम करता हूँ । आप मेरे आश्रय-दाता हों ॥
सर्ववेदैकवेद्याय सर्वदेवमयाय च ।
वासुदेवाय नित्याय नमो भक्तप्रियाय ते ॥
आप सम्पूर्ण वेदोंके एकमात्र वेद्यतत्त्व हैं । सम्पूर्ण देवता आपके ही स्वरूप हैं तथा
आप भक्तजनोंको अत्यन्त प्रिय हैं । आप नित्यस्वरूप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है ॥
दयया दुःखमोहान्मां समुद्धर्तुमिहार्हसि । कर्मभिर्बहुभिः पापैर्बद्धं पाहि जनार्दन || ) जनार्दन! आप स्वयं ही दया करके दुःखजनित मोहसे मेरा उद्धार करें । मैं बहुत- से
पाप-कर्मोंद्वारा बँधा हुआ हूँ । आप मेरी रक्षा करें ॥
विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।
पद्भ्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभः ॥ ७ ॥
विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत विश्वात्मन्! आपके दोनों पैरोंसे पृथ्वी और सिरसे आकाश व्याप्त है ॥ ७ ॥
द्यावापृथिव्योर्यन्मध्यं जठरेण तवावृतम् ।
भुजाभ्यामावृताश्चाशास्त्वमिदं सर्वमच्युत ॥ ८ ॥