06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2041–2050
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2041–2050
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बभूव शुक्लवृत्तः स धर्मात्मा नियतेन्द्रियः ॥ २५ ॥
वे अपनी स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ रहकर तपस्यामें संलग्न थे । ब्राह्मणदेवता शुद्ध आचार- विचारसे रहनेवाले धर्मात्मा और जितेन्द्रिय थे ॥ २५ ॥
षष्ठे काले सदा विप्रो भुङ्क्ते तैः सह सुव्रतः ।
षष्ठे काले कदाचित् तु तस्याहारो न विद्यते ॥ २६ ॥
भुङ्क्तेऽन्यस्मिन् कदाचित् स षष्ठे काले द्विजोत्तमः । वे उत्तम व्रतधारी द्विज सदा छठे कालमें अर्थात् तीन - तीन दिनपर ही स्त्री - पुत्र आदिके साथ भोजन किया करते थे । यदि किसी दिन उस समय भोजन न मिला तो दूसरा छठा काल आनेपर ही वे द्विजश्रेष्ठ अन्न ग्रहण करते थे ॥ २६३ ॥
कदाचिद् धर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे ॥ २७ ॥
विद्यत तदा विप्राः संचयस्तन्निबोधत ।
क्षीणौषधिसमावेशे द्रव्यहीनोऽभवत् तदा ॥ २८ ॥
ब्राह्मणो! सुनो । एक समय वहाँ बड़ा भयंकर अकाल पड़ा । उन दिनों उन धर्मात्मा ब्राह्मणके पास अन्नका संग्रह तो था नहीं, खेतोंका अन्न भी सूख गया था । अतः वे सर्वथा निर्धन हो गये थे ॥ २७-२८ ॥
काले कालेऽस्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम् ।
क्षुधापरिगताः सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते ॥ २ ९ ॥
उञ्छं तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे । -सब बारंबार छठा काल आता; किंतु उन्हें भोजन नहीं मिलता था। अतः वे सब- के-भूखे ही रह जाते थे । एक दिन ज्येष्ठ शुक्लपक्षमें दोपहरीके समय उस परिवारके सब लोग उञ्छ लानेके लिये चले ॥ २ ९ ३ ॥ उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च विप्रस्तपसि संस्थितः ॥ ३० ॥
उञ्छमप्राप्तवानेव ब्राह्मणः क्षुच्छ्रमान्वितः ।
स तथैव क्षुधाविष्टः सार्धं परिजनेन ह ॥ ३१ ॥
क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः । तपस्यामें लगे हुए वे ब्राह्मणदेवता गर्मी और भूख दोनोंसे कष्ट पा रहे थे । भूख और परिश्रमसे पीड़ित होनेपर भी वे उञ्छ न पा सके । उन्हें अन्नका एक दाना भी नहीं मिला; अतः परिवारके सभी लोगोंके साथ उसी तरह भूखसे पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा । वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्टसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे ॥ ३०-३१ ॥ अथ षष्ठे गते काले यवप्रस्थमुपार्जयन् ॥ ३२ ॥
यवप्रस्थं तु तं सक्तूनकुर्वन्त तपस्विनः ।
कृतजप्याह्निकास्ते तु हुत्वा चाग्निं यथाविधि ॥ ३३ ॥
कुडवं कुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विनः ।
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तदनन्तर एक दिन पुनः छठा काल आनेतक उन्होंने सेरभर जौका उपार्जन किया । उन तपस्वी ब्राह्मणोंने उस जौका सत्तू तैयार किया और जप तथा नैत्यिक नियम पूर्ण करके अग्निमें विधिपूर्वक आहुति देनेके पश्चात् वे सब लोग एक -एक कुडव अर्थात् एक- एक पाव सत्तू बाँटकर खानेके लिये उद्यत हुए ॥ ३२-३३३ ॥ अथागच्छद् द्विजः कश्चिदतिथिर्भुञ्जतां तदा ॥ ३४ ॥
ते तं दृष्ट्वातिथिं प्राप्तं प्रहृष्टमनसोऽभन् ।
तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा ॥ ३५ ॥
वे भोजनके लिये अभी बैठे ही थे कि कोई ब्राह्मण अतिथि उनके यहाँ आ पहुँचा । उस अतिथिको आया देख वे मन - ही - मन बहुत प्रसन्न हुए । उस अतिथिको प्रणाम करके उन्होंने उससे कुशल- मंगल पूछा ॥ ३४-३५ ॥
विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ।
अनसूयवो विक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः ॥ ३६ ॥
त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ।
स ब्रह्मचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम् ॥ ३७ ॥
कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा । ब्राह्मण - परिवारके सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मनको वशमें रखनेवाले, दोषदृष्टिसे रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे । उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अभिमान, मद और क्रोधको सर्वथा त्याग दिया था । क्षुधासे कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मणको अपने ब्रह्मचर्य और गोत्रका परस्पर परिचय देते हुए वे कुटीमें ले गये ॥ ३६-३७ ¾ ॥ इदमर्घ्यं च पाद्यं च बृसी चेयं तवानघ ॥ ३८ ॥
शुचयः सक्तवश्चेमे नियमोपार्जिताः प्रभो ।
प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मया दत्ता द्विजर्षभ ॥ ३ ९ ॥
तत्पश्चात् वहाँ उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणने कहा- ' भगवन्! अनघ! आपके लिये ये अर्घ्य, पाद्य और आसन मौजूद हैं तथा न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए ये परम पवित्र सत्तू आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं । द्विजश्रेष्ठ! मैंने प्रसन्नतापूर्वक इन्हें आपको अर्पण किया है । आप स्वीकार करें' ॥ ३८-३९ ॥
इत्युक्तः प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विजः ।
भक्षयामास राजेन्द्र न च तुष्टिं जगाम सः ॥ ४० ॥
राजेन्द्र! ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर अतिथिने एक पाव सत्तू लेकर खा लिया; परंतु उतनेसे वह तृप्त नहीं हुआ ॥ ४० ॥
स उञ्छवृत्तिस्तं प्रेक्ष्य क्षुधापरिगतं द्विजम् ।
आहारं चिन्तयामास कथं तुष्टो भवेदिति ॥ ४१ ॥
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उस उञ्छवृत्तिवाले द्विजने देखा कि ब्राह्मण अतिथि तो अब भी भूखे ही रह गये हैं ।
तब वे उसके लिये आहारका चिन्तन करने लगे कि यह ब्राह्मण कैसे संतुष्ट हो? ॥ ४१ ॥
तस्य भार्याब्रवीद् वाक्यं मद्भागो दीयतामिति ।
गच्छत्वेष यथाकामं परितुष्टो द्विजोत्तमः ॥ ४२ ॥
तब ब्राह्मणकी पत्नीने कहा - ' नाथ! यह मेरा भाग इन्हें दे दीजिये, जिससे ये ब्राह्मणदेवता इच्छानुसार तृप्तिलाभ करके यहाँसे पधारें' ॥ ४२ ॥
इति ब्रुवन्तीं तां साध्वीं भार्यां स द्विजसत्तमः ।
क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा तान् सक्तून् नाभ्यनन्दत ॥ ४३ ॥
अपनी पतिव्रता पत्नीकी यह बात सुनकर उन द्विजश्रेष्ठने उसे भूखी जानकर उसके दिये हुए सत्तूको लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४३ ॥
आत्मानुमानतो विद्वान् स तु विप्रर्षभस्तदा ।
जानन् वृद्धां क्षुधार्तां च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम् ॥ ४४ ॥
त्वगस्थिभूतां वेपन्तीं ततो भार्यामुवाच ह । उन विद्वान् ब्राह्मणशिरोमणिने अपने ही अनुमानसे यह जान लिया कि यह मेरी वृद्धा स्त्री स्वयं भी क्षुधासे कष्ट पा रही है, थकी है और अत्यन्त दुर्बल हो गयी है । इस तपस्विनीके शरीरमें चमड़ेसे ढकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया है और यह काँप रही है । उसकी अवस्थापर दृष्टिपात करके उन्होंने पत्नीसे कहा— ॥ ४४ ॥
अपि कीटपतङ्गानां मृगाणां चैव शोभने ॥ ४५ ॥
स्त्रियो रक्ष्याश्च पोष्याश्च न त्वेवं वक्तुमर्हसि । ' शोभने! अपनी स्त्रीकी रक्षा और पालन- पोषण करना कीट- पतंग और पशुओंका भी कर्तव्य है; अतः तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ४५३ ॥
अनुकम्प्यो नरः पत्न्या पुष्टो रक्षित एव च ॥ ४६ ॥
' जो पुरुष होकर भी स्त्रीके द्वारा अपना पालन- पोषण और संरक्षण करता है, वह मनुष्य दयाका पात्र है ॥ ४६ ॥
प्रपतेद् यशसो दीप्तात् स च लोकान् न चाप्नुयात् ।
धर्मकामार्थकार्याणि शुश्रूषा कुलसंततिः ॥ ४७ ॥
दारेष्वधीनो धर्मश्च पितॄणामात्मनस्तथा । ‘ वह उज्ज्वल कीर्तिसे भ्रष्ट हो जाता है और उसे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति नहीं होती । धर्म, काम और अर्थ - सम्बन्धी कार्य, सेवा- शुश्रूषा तथा वंशपरम्पराकी रक्षा – ये सब स्त्रीके ही अधीन हैं । पितरोंका तथा अपना धर्म भी पत्नीके ही आश्रित है ॥ ४७ ॥
न वेत्ति कर्मतो भार्यारक्षणे योऽक्षमः पुमान् ॥ ४८ ॥
अयशो महदाप्नोति नरकांश्चैव गच्छति ।
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'जो पुरुष स्त्रीकी रक्षा करना अपना कर्तव्य नहीं मानता अथवा जो स्त्रीकी रक्षा करनेमें असमर्थ है, वह संसारमें महान् अपयशका भागी होता है और परलोकमें जानेपर उसे नरकोंमें गिरना पड़ता है' ॥ ४८३ ॥
इत्युक्ता सा ततः प्राह धर्मार्थों नौ समौ द्विज ॥ ४ ९ ॥ सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे । पतिके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणी बोली- ' ब्रह्मन्! हम दोनोंके धर्म और अर्थ समान हैं, अतः आप मुझपर प्रसन्न हों और मेरे हिस्सेका यह पावभर सत्तू ले लें ( और लेकर इसे अतिथिको दे दें ) ॥ ४ ९ ३ ॥ सत्यं रतिश्च धर्मश्च स्वर्गश्च गुणनिर्जितः ॥ ५० ॥
स्त्रीणां पतिसमाधीनं कांक्षितं च द्विजर्षभ । ‘ द्विजश्रेष्ठ! स्त्रियोंका सत्य, धर्म, रति, अपने गुणोंसे मिला हुआ स्वर्ग तथा उनकी सारी अभिलाषा पतिके ही अधीन है ॥ ५० ॥
ऋतुर्मातुः पितुर्बीजं दैवतं परमं पतिः ॥ ५१ ॥
भर्तुः प्रसादान्नारीणां रतिपुत्रफलं तथा । ‘ माताका रज और पिताका वीर्य– इन दोनोंके मिलनेसे ही वंशपरम्परा चलती है । स्त्रीके लिये पति ही सबसे बड़ा देवता है । नारियोंको जो रति और पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है, वह पतिका ही प्रसाद है ॥ ५१३ ॥
पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्तासि भरणाच्च मे ॥ ५२ ॥
पुत्रप्रदानाद् वरदस्तस्मात् सक्तून् प्रयच्छ मे । आप पालन करनेके कारण मेरे पति, भरण- पोषण करनेसे भर्ता और पुत्र प्रदान करनेके कारण वरदाता हैं, इसलिये मेरे हिस्सेका सत्तू अतिथिदेवताको अर्पण कीजिये ॥ ५२ ॥
जरापरिगतो वृद्धः क्षुधार्तो दुर्बलो भृशम् ॥ ५३ ॥
उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शितः । ' आप भी तो जराजीर्ण, वृद्ध, क्षुधातुर, अत्यन्त दुर्बल, उपवाससे थके हुए और क्षीणकाय हो रहे हैं । ( फिर आप जिस तरह भूखका कष्ट सहन करते हैं, उसी प्रकार मैं भी सह लूँगी ) ' ॥ ५३३ ॥
इत्युक्तः स तया सक्तून् प्रगृह्येदं वचोऽब्रवीत् ॥ ५४ ॥
द्विज सक्तूनिमान् भूयः प्रतिगृह्णीष्व सत्तम । पत्नीके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणने सत्तू लेकर अतिथिसे कहा - ' साधुपुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप यह सत्तू भी पुनः ग्रहण कीजिये ' ॥ ५४ ॥
स तान् प्रगृह्य भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद् द्विजः ।
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तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत् ॥ ५५ ॥
अतिथि ब्राह्मण उस सत्तूको भी लेकर खा गया; किंतु संतुष्ट नहीं हुआ । यह देखकर उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको बड़ी चिन्ता हुई ॥ ५५ ॥
पुत्रउवाच
सक्तूनिमान् प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम ।
इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत् करोम्यहम् ॥ ५६ ॥
तब उनके पुत्रने कहा- सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पिताजी! आप मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर ब्राह्मणको दे दीजिये । मैं इसीमें पुण्य मानता हूँ, इसलिये ऐसा कर रहा हूँ ॥ ५६ ॥
भवान् हि परिपाल्यो मे सर्वदैव प्रयत्नतः ।
साधूनां काङ्क्षितं यस्मात् पितुर्वृद्धस्य पालनम् ॥ ५७ ॥
मुझे सदा यत्नपूर्वक आपका पालन करना चाहिये; क्योंकि साधु पुरुष सदा इस बातकी अभिलाषा रखते हैं कि मैं अपने बूढ़े पिताका पालन - पोषण करूँ ॥ ५७ ॥
पुत्रार्थो विहितो ह्येष वार्धके परिपालनम् ।
श्रुतिरेषा हि विप्रर्षे त्रिषु लोकेषु शाश्वती ॥ ५८ ॥
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पुत्र होनेका यही फल है कि वह वृद्धावस्थामें पिताकी रक्षा करे । ब्रह्मर्षे! तीनों लोकोंमें यह सनातन श्रुति प्रसिद्ध है ॥ ५८ ॥
प्राणधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया ।
प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥ ५ ९ ॥
प्राणधारणमात्रसे आप तप कर सकते हैं । देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित हुआ प्राण ही परम धर्म है ॥ ५ ९ ॥ पितोवाच
अपि वर्षसहस्री त्वं बाल एव मतो मम ।
उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवेत् सुतात् ॥ ६० ॥
पिताने कहा- बेटा! तुम हजार वर्षके हो जाओ तो भी हमारे लिये बालक ही हो ।
पिता पुत्रको जन्म देकर ही उससे अपनेको कृतकृत्य मानता है ॥ ६० ॥
बालानां क्षुद् बलवती जानाम्येतदहं प्रभो ।
वृद्धोऽहं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक ॥ ६१ ॥
सामर्थ्यशाली पुत्र! मैं इस बातको अच्छी तरह जानता हूँ कि बच्चोंकी भूख बड़ी प्रबल होती है । मैं तो बूढ़ा हूँ । भूखे रहकर भी प्राण धारण कर सकता हूँ । तुम यह सत्तू खाकर बलवान् होओ — अपने प्राणोंकी रक्षा करो ॥ ६१ ॥
जीर्णेन वयसा पुत्र न मां क्षुद् बाधतेऽपि च ।
दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम् ॥ ६२ ॥
बेटा! जीर्ण अवस्था हो जानेके कारण मुझे भूख अधिक कष्ट नहीं देती है । इसके सिवा मैं दीर्घकालतक तपस्या कर चुका हूँ; इसलिये अब मुझे मरनेका भय नहीं है ॥ ६२ ॥
पुत्रउवाच
अपत्यमस्मि ते पुंसस्त्राणात् पुत्र इति स्मृतः ।
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात् त्राह्यात्मानमिहात्मना ॥ ६३ ॥
पुत्र बोला - तात! मैं आपका पुत्र हूँ, पुरुषका त्राण करनेके कारण ही संतानको पुत्र कहा गया है । इसके सिवा पुत्र पिताका अपना ही आत्मा माना गया है; अतः आप अपने आत्मभूत पुत्रके द्वारा अपनी रक्षा कीजिये ॥ ६३ ॥
पितोवाच
रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च ।
परीक्षितश्च बहुधा सक्तूनादद्मि ते सुत ॥ ६४ ॥
पिताने कहा- बेटा! तुम रूप, शील ( सदाचार और सद्भाव) तथा इन्द्रियसंयमके द्वारा मेरे ही समान हो । तुम्हारे इन गुणोंकी मैंने अनेक बार परीक्षा कर ली है, अतः मैं
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तुम्हारा सत्तू लेता हूँ ॥ ६४ ॥
इत्युक्त्वाऽऽदाय तान् सक्तून् प्रीतात्मा द्विजसत्तमः ।
प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा ॥ ६५ ॥
यों कहकर श्रेष्ठ ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक वह सत्तू ले लिया और हँसते हुए- से उस ब्राह्मण अतिथिको परोस दिया ॥ ६५ ॥
भुक्त्वा तानपि सक्तून् स नैव तुष्टो बभूव ह ।
उञ्छवृत्तिस्तु धर्मात्मा व्रीडामनुजगाम ह ॥ ६६ ॥
वह सत्तू खाकर भी ब्राह्मण देवताका पेट न भरा । यह देखकर उञ्छवृत्तिधारी धर्मात्मा ब्राह्मण बड़े संकोचमें पड़ गये ॥ ६६ ॥
तं वै वधूः स्थिता साध्वी ब्राह्मणप्रियकाम्यया ।
सक्तूनादाय संहृष्टा श्वशुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ६७ ॥
उनकी पुत्रवधू भी बड़ी सुशीला थी । वह ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके पास जा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने उन श्वशुरदेवसे बोली- ॥ ६७ ॥
संतानात् तव संतानं मम विप्र भविष्यति ।
सक्तूनिमानतिथये गृहीत्वा सम्प्रयच्छ मे ॥ ६८ ॥
‘ विप्रवर! आपकी संतानसे मुझे संतान प्राप्त होगी; अतः आप मेरे परम पूज्य हैं । मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर आप अतिथि देवताको अर्पित कीजिये ॥ ६८ ॥
तव प्रसादान्निर्वृत्ता मम लोकाः किलाक्षयाः ।
पुत्रेण तानवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥ ६ ९ ॥
‘ आपकी कृपासे मुझे अक्षय लोक प्राप्त हो गये । पुत्रके द्वारा मनुष्य उन लोकोंमें जाते हैं, जहाँ जाकर वह कभी शोकमें नहीं पड़ता ॥ ६ ९ ॥
धर्माद्या हि यथा त्रेता वह्नित्रेता तथैव च ।
तथैव पुत्रपौत्राणां स्वर्गस्त्रेता किलाक्षयः ॥ ७० ॥
‘ जैसे धर्म तथा उससे संयुक्त अर्थ और काम– ये तीनों स्वर्गके प्राप्ति करानेवाले हैं तथा जैसे आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि- ये तीनों स्वर्गके साधन हैं, उसी प्रकार पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र — ये त्रिविध संतानें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं ॥ ७० ॥
पितॄन् ऋणात् तारयति पुत्र इत्यनुशुश्रुम ।
पुत्रपौत्रैश्च नियतं साधुलोकानुपाश्नुते ॥ ७१ ॥
' हमने सुना है कि पुत्र पिताको पितृऋणसे छुटकारा दिला देता है । पुत्रों और पौत्रोंके द्वारा मनुष्य निश्चय ही श्रेष्ठ लोकोंमें जाते हैं ' ॥ ७१ ॥
श्वशुर उवाच वातातपविशीर्णाङ्गीं त्वां विवर्णां निरीक्ष्य वै ।
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कर्षितों सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम् ॥ ७२ ॥
कथं सक्तून् ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातकः ।
कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ७३ ॥
श्वशुरने कहा — बेटी! हवा और धूपके मारे तुम्हारा सारा शरीर सूख रहा है —शिथिल होता जा रहा है । तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है । उत्तम व्रत और आचारका पालन करनेवाली पुत्री! तुम बहुत दुर्बल हो गयी हो । क्षुधाके कष्टसे तुम्हारा चित्त अत्यन्त व्याकुल है । तुम्हें ऐसी अवस्थामें देखकर भी तुम्हारे हिस्सेका सत्तू कैसे ले लूँ । ऐसा करनेसे तो मैं धर्मकी हानि करनेवाला हो जाऊँगा । अतः कल्याणमय आचरण करनेवाली कल्याणि! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ७२-७३ ॥
षष्ठे काले व्रतवतीं शौचशीलतपोऽन्विताम् ।
कृच्छ्रवृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं शुभे ॥ ७४ ॥
तुम प्रतिदिन शौच, सदाचार और तपस्यामें संलग्न रहकर छठे कालमें भोजन करनेका व्रत लिये हुए हो । शुभे! बड़ी कठिनाईसे तुम्हारी जीविका चलती है । आज सत्तू लेकर तुम्हें निराहार कैसे देख सकूँगा ॥ ७४ ॥
बाला क्षुधार्ता नारी च रक्ष्या त्वं सततं मया ।
उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि बान्धवनन्दिनी ॥ ७५ ॥
एक तो तुम अभी बालिका हो, दूसरे भूखसे पीड़ित हो रही हो, तीसरे नारी हो और चौथे उपवास करते - करते अत्यन्त दुबली हो गयी हो; अतः मुझे सदा तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि तुम अपनी सेवाओंद्वारा बान्धवजनोंको आनन्दित करनेवाली हो ॥ ७५ ॥
स्नुषोवाच
गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम् ।
देवातिदेवस्तस्मात् त्वं सक्तूनादत्स्व मे प्रभो ॥ ७६ ॥
पुत्रवधू बोली - भगवन्! आप मेरे गुरुके भी गुरु, देवताओंके भी देवता और सामान्य देवताकी अपेक्षा भी अतिशय उत्कृष्ट देवता हैं, अतः मेरा दिया हुआ यह सत्तू स्वीकार कीजिये ॥ ७६ ॥
देहः प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरोः ।
तव विप्र प्रसादेन लोकान् प्राप्स्यामहे शुभान् ॥ ७७ ॥
मेरा यह शरीर, प्राण और धर्म - सब कुछ बड़ोंकी सेवाके लिये ही है । विप्रवर! आपके प्रसादसे मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ७७ ॥
अवेक्ष्या इति कृत्वाहं दृढभक्तेति वा द्विज ।
चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादातुमर्हसि ॥ ७८ ॥
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अतः आप मुझे अपना दृढ़ भक्त, रक्षणीय और विचारणीय मानकर अतिथिको देनेके लिये यह सत्तू स्वीकार कीजिये ॥ ७८ ॥
श्वशुर उवाच
अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे ।
या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे ॥ ७ ९ ॥
तस्मात् सक्तून् ग्रहीष्यामि वधु नार्हसि वञ्चनाम् ।
गणयित्वा महाभागे त्वां हि धर्मभृतां वरे ॥ ८० ॥
श्वशुरने कहा- बेटी! तुम सती- साध्वी नारी हो और सदा ऐसे ही शील एवं सदाचारका पालन करनेसे तुम्हारी शोभा है । तुम धर्म तथा व्रतके आचरणमें संलग्न होकर सर्वदा गुरुजनोंकी सेवापर ही दृष्टि रखती हो; इसलिये बहू! मैं तुम्हें पुण्यसे वंचित न होने दूँगा । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाभागे! पुण्यात्माओंमें तुम्हारी गिनती करके मैं तुम्हारा दिया हुआ सत्तू अवश्य स्वीकार करूँगा ॥ ७ ९ -८० ॥
इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून् प्रादाद् द्विजातये ।
ततस्तुष्टोऽभवद् विप्रस्तस्य साधोर्महात्मनः ॥ ८१ ॥
ऐसा कहकर ब्राह्मणने उसके हिस्सेका भी सत्तू लेकर अतिथिको दे दिया । इससे वह ब्राह्मण उन उञ्छवृत्तिधारी साधु महात्मापर बहुत संतुष्ट हुआ ॥ ८१ ॥
प्रीतात्मा स तु तं वाक्यमिदमाह द्विजर्षभम् ।
वाग्मी तदा द्विजश्रेष्ठो धर्मः पुरुषविग्रहः ॥ ८२ ॥
वास्तवमें उस श्रेष्ठ द्विजके रूपमें मानव-विग्रहधारी साक्षात् धर्म ही वहाँ उपस्थित थे । वे प्रवचनकुशल धर्म संतुष्टचित्त होकर उन उञ्छवृत्तिधारी श्रेष्ठ ब्राह्मणसे इस प्रकार बोले - ॥ ८२ ॥
शुद्धेन तव दानेन न्यायोपात्तेन धर्मतः ।
यथाशक्ति विसृष्टेन प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम ।
अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभिः ॥ ८३ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! तुमने अपनी शक्तिके अनुसार धर्मपूर्वक जो न्यायोपार्जित शुद्ध अन्नका दान दिया है, इससे तुम्हारे ऊपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अहो! स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले देवता भी वहाँ तुम्हारे दानकी घोषणा करते हैं ॥ ८३ ॥
गगनात् पुष्पवर्षं च पश्येदं पतितं भुवि ।
सुरर्षिदेवगन्धर्वा ये च देवपुरःसराः ॥ ८४ ॥
स्तुवन्तो देवदूताश्च स्थिता दानेन विस्मिताः ।
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‘देखो, आकाशसे भूतलपर यह फूलोंकी वर्षा हो रही है । देवर्षि, देवता, गन्धर्व तथा और भी जो देवताओंके अग्रणी पुरुष हैं, वे और देवदूतगण तुम्हारे दानसे विस्मित हो तुम्हारी स्तुति करते हुए खड़े हैं ॥ ८४ ॥
ब्रह्मर्षयो विमानस्था ब्रह्मलोकचराश्च ये ॥ ८५ ॥
काङ्क्षन्ते दर्शनं तुभ्यं दिवं व्रज द्विजर्षभ । ‘ द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मलोकमें विचरनेवाले जो ब्रह्मर्षिगण विमानोंमें रहते हैं, वे भी तुम्हारे दर्शनकी इच्छा रखते हैं; इसलिये तुम स्वर्गलोकमें चलो ॥ ८५३ ॥
पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वया ॥ ८६ ॥
अनागताश्च बहवः सुबहूनि युगान्युत । ' तुमने पितृलोकमें गये हुए अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर दिया। अनेक युगोंतक भविष्यमें होनेवाली जो संतानें हैं, वे भी तुम्हारे पुण्य- प्रतापसे तर जायँगी ' ॥ ८६ ॥
ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेन तपसा तथा ॥ ८७ ॥
असंकरेण धर्मेण तस्माद् गच्छ दिवं द्विज । ‘ अतः ब्रह्मन्! तुम अपने ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तप तथा संकरतारहित धर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चलो ॥ ८७ ॥
श्रद्धया परया यस्त्वं तपश्चरसि सुव्रत ॥ ८८ ॥
तस्माद् देवाश्च दानेन प्रीता ब्राह्मणसत्तम । ‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणशिरोमणे! तुम उत्तम श्रद्धाके साथ तपस्या करते हो; इसलिये देवता तुम्हारे दानसे अत्यन्त संतुष्ट हैं ॥ ८८३ ॥
सर्वमेतद्धि यस्मात् ते दत्तं शुद्धेन चेतसा ॥ ८९ ॥
कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो विजितः कर्मणा त्वया । ‘ इस प्राण- संकटके समय भी यह सब सत्तू तुमने शुद्ध हृदयसे दान किया है; इसलिये तुमने उस पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर ली है ॥ ८ ९ ॥ क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धिं व्यपोहति ॥ ९ ० ॥
क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह ।
बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम् ॥ ९ १ ॥
' भूख मनुष्यकी बुद्धिको चौपट कर देती है । धार्मिक विचारको मिटा देती है । क्षुधासे ज्ञान लुप्त हो जानेके कारण मनुष्य धीरज खो देता है । जो भूखको जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्गपर विजय पाता है ॥ ९ ० - ९ १ ॥
यदा दानरुचिः स्याद् वै तदा धर्मो न सीदति ।
अनवेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च ॥ ९ २ ॥
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया ।