06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2031–2040

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2031–2040

पृष्ठ 2031

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ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् साधु साध्विति भारत ॥ १५ ॥

तथैव द्विजसंघानां शंसतां विबभौ स्वनः । भारत! उस समय आकाशवाणी हुई- ' पाण्डवो! तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया । तुम्हें धन्यवाद! ' इसी प्रकार पाण्डवोंके सत्साहसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण- समूहोंका भी शब्द वहाँ स्पष्ट सुनायी दे रहा था ॥ १५३ ॥

द्वैपायनस्तथा कृष्णः पुनरेव युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥

प्रोवाच मध्ये विप्राणामिदं सम्पूजयन् मुनिः । तब मुनिवर द्वैपायनकृष्णने पुनः ब्राह्मणोंके बीचमें युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा - ॥ १६३ ॥

दत्तैषा भवता मह्यं तां ते प्रतिददाम्यहम् ॥ १७ ॥

हिरण्यं दीयतामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धरास्तु ते I

‘ राजन्! तुमने तो यह पृथ्वी मुझे दे ही दी । अब मैं अपनी ओरसे इसे वापस करता हूँ।

तुम इन ब्राह्मणोंको सुवर्ण दे दो और पृथ्वी तुम्हारे ही अधिकारमें रह जाय' ॥ १७ ॥

ततोऽब्रवीद् वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ १८ ॥

यथाऽऽह भगवान् व्यासस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि । तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा – ' धर्मराज! भगवान् व्यास जैसा कहते हैं, वैसा ही तुम्हें करना चाहिये ' ॥ १८३ ॥

इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठः प्रीतात्मा भ्रातृभिः सह ॥ १ ९ ॥ कोटिकोटिकृतां प्रादाद् दक्षिणां त्रिगुणां क्रतोः । यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और प्रत्येक ब्राह्मणोंको उन्होंने यज्ञके लिये एक - एक करोड़की तिगुनी दक्षिणा दी ॥ १ ९ ३ ॥ न करिष्यति तल्लोके कश्चिदन्यो नराधिपः ॥ २० ॥

यत् कृतं कुरुराजेन मरुत्तस्यानुकुर्वता । महाराज मरुत्तके मार्गका अनुसरण करनेवाले राजा युधिष्ठिरने उस समय जैसा महान् त्याग किया था, वैसा इस संसारमें दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा ॥ २०३३ ॥

प्रतिगृह्य तु तद् रत्नं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ २१ ॥

ऋत्विग्भ्यः प्रददौ विद्वांश्चतुर्धा व्यभजंश्च ते । विद्वान् महर्षि व्यासने वह सुवर्णराशि लेकर ब्राह्मणोंको दे दी और उन्होंने चार भाग करके उसे आपसमें बाँट लिया ॥ २१ ॥

धरण्या निष्क्रयं दत्त्वा तद्धिरण्यं युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥

धूतपापो जितस्वर्गो मुमुदे भ्रातृभिः सह ।

पृष्ठ 2032

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इस प्रकार पृथ्वीके मूल्यके रूपमें वह सुवर्ण देकर राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए । उनके सारे पाप धुल गये और उन्होंने स्वर्गपर अधिकार प्राप्त कर लिया ॥ २२ ॥

ऋत्विजस्तमपर्यन्तं सुवर्णनिचयं तथा ॥ २३ ॥

व्यभजन्त द्विजातिभ्यो यथोत्साहं यथासुखम् । उस अनन्त सुवर्णराशिको पाकर ऋत्विजोंने बड़े उत्साह और आनन्दके साथ उसे ब्राह्मणोंको बाँट दिया ॥ २३ ॥

यज्ञवाटे च यत् किंचिद् हिरण्यं सविभूषणम् ॥ २४ ॥

तोरणानि च यूपांश्च घटान् पात्रीस्तथेष्टकाः ।

युधिष्ठिराभ्यनुज्ञाताः सर्वं तद् व्यभजन् द्विजाः ॥ २५ ॥

यज्ञशालामें भी जो कुछ सुवर्ण या सोनेके आभूषण, तोरण, यूप, घड़े, बर्तन और ईंटें थीं, उन सबको भी युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर ब्राह्मणोंने आपसमें बाँट लिया ॥ २४-२५ ॥

अनन्तरं द्विजातिभ्यः क्षत्रिया जहिरे वसु ।

तथा विट्शूद्रसंघाश्च तथान्ये म्लेच्छजातयः ॥ २६ ॥

ब्राह्मणोंके लेनेके बाद जो धन वहाँ पड़ा रह गया, उसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा म्लेच्छ जातिके लोग उठा ले गये ॥ २३ ॥

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे मुदिता जग्मुरालयान् ।

तर्पिता वसुना तेन धर्मराजेन धीमता ॥ २७ ॥

तदनन्तर सब ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक अपने घरोंको गये । बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने उन सबको उस धनके द्वारा पूर्णतः तृप्त कर दिया था ॥ २७ ॥

स्वमंशं भगवान् व्यासः कुन्त्यै साक्षाद्धि मानतः ।

प्रददौ तस्य महतो हिरण्यस्य महाद्युतिः ॥ २८ ॥

उस महान् सुवर्णराशिमेंसे महातेजस्वी भगवान् व्यासने जो अपना भाग प्राप्त किया था, उसे उन्होंने बड़े आदरके साथ कुन्तीको भेंट कर दिया ॥ २८ ॥

श्वशुरात् प्रीतिदायं तं प्राप्य सा प्रीतमानसा ।

चकार पुण्यकं तेन सुमहत् संघशः पृथा ॥ २९ ॥

श्वशुरकी ओरसे प्रेमपूर्वक मिले हुए उस धनको पाकर कुन्तीदेवी मन- ही- मन बहुत प्रसन्न हुईं और उसके द्वारा उन्होंने बड़े - बड़े सामूहिक पुण्य कार्य किये ॥ २ ९ ॥

गत्वा त्ववभृथं राजा विपाप्मा भ्रातृभिः सह ।

सभाज्यमानः शुशुभे महेन्द्रस्त्रिदशैरिव ॥ ३० ॥

यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान करके पापरहित हुए राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे सम्मानित हो इस प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे देवताओंसे पूजित देवराज इन्द्र सुशोभित होते हैं ॥ ३० ॥

पृष्ठ 2033

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पाण्डवाश्च महीपालैः समेतैरभिसंवृताः ।

अशोभन्त महाराज ग्रहास्तारागणैरिव ॥ ३१ ॥

महाराज! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंसे घिरे हुए पाण्डवलोग ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो तारोंसे घिरे हुए ग्रह सुशोभित हों ॥ ३१ ॥

राजभ्योऽपि ततः प्रादाद् रत्नानि विविधानि च ।

गजानश्वानलंकारान् स्त्रियो वासांसि काञ्चनम् ॥ ३२ ॥

तदनन्तर पाण्डवोंने यज्ञमें आये हुए राजाओंको भी तरह - तरहके रत्न, हाथी, घोड़े, आभूषण, स्त्रियाँ, वस्त्र और सुवर्ण भेंट किये ॥ ३२ ॥

तद् धनौघमपर्यन्तं पार्थः पार्थिवमण्डले ।

विसृजन् शुशुभे राजन् यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३३ ॥

राजन्! उस अनन्त धनराशिको भूपालमण्डलमें बाँटते हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिर कुबेरके समान शोभा पाते थे ॥ ३३ ॥

आनीय च तथा वीरं राजानं बभ्रुवाहनम् ।

प्रदाय विपुलं वित्तं गृहान् प्रास्थापयत् तदा ॥ ३४ ॥

तत्पश्चात् वीर राजा बभ्रुवाहनको अपने पास बुलाकर राजाने उसे बहुत सा धन देकर विदा किया ॥ ३४ ॥

दुःशलायाश्च तं पौत्रं बालकं भरतर्षभ ।

स्वराज्येऽथ पितुर्धीमान् स्वसुः प्रीत्या न्यवेशयत् ॥ ३५ ॥

भरतश्रेष्ठ! अपनी बहिन दुःशलाकी प्रसन्नताके लिये बुद्धिमान् युधिष्ठिरने उसके बालक पौत्रको पिताके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ३५ ॥

नृपतींश्चैव तान् सर्वान् सुविभक्तान् सुपूजितान् ।

प्रस्थापयामास वशी कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३६ ॥

जितेन्द्रिय कुरुराज युधिष्ठिरने सब राजाओंको अच्छी तरह धन दिया और उनका विशेष सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया ॥ ३६ ॥

गोविन्दं च महात्मानं बलदेवं महाबलम् ।

तथान्यान् वृष्णिवीरांश्च प्रद्युम्नाद्यान् सहस्रशः ॥ ३७ ॥

पूजयित्वा महाराज यथाविधि महाद्युतिः ।

भ्रातृभिः सहितो राजा प्रास्थापयदरिंदमः ॥ ३८ ॥

महाराज! इसके बाद महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण, महाबली बलदेव तथा प्रद्युम्न आदि अन्यान्य सहस्रों वृष्णिवीरोंकी विधिवत् पूजा करके भाइयोंसहित शत्रुदमन महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने उन सबको विदा किया ॥ ३७-३८ ॥

एवं बभूव यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः ।

बह्वन्नधनरत्नौघः सुरामैरेयसागरः ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 2034

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सर्पिःपङ्का ह्रदा यत्र बभूवुश्चान्नपर्वताः ।

रसालाकर्दमा नद्यो बभूवुर्भरतर्षभ ॥ ४० ॥

इस प्रकार बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ पूर्ण हुआ। उसमें अन्न, धन और रत्नोंके ढेर लगे हुए थे । देवताओंके मनमें अतिशय कामना उत्पन्न करनेवाली वस्तुओंका सागर लहराता था । कितने ही ऐसे तालाब थे, जिनमें घीकी कीचड़ जमी हुई थी और अन्नके तो पहाड़ ही खड़े थे । भरतभूषण! रससे भरी कीचड़रहित नदियाँ बहती थीं ॥ ३ ९ -४० ॥

पृष्ठ 2035

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महाराज युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञमें एक नेवलेका आगमन

पृष्ठ 2036

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भक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा ।

पशूनां बध्यतां चैव नान्तं ददृशिरे जनाः ॥ ४१ ॥

( पीपल और सोंठ मिलाकर जो मूँगका जूस तैयार किया जाता है, उसे ‘ खाण्डव ’ कहते हैं । उसीमें शक्कर मिला हुआ हो तो वह ' खाण्डवराग ' कहा जाता है । ) भक्ष्य - भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग कितनी मात्रामें बनाये और खाये जाते हैं तथा कितने पशु वहाँ बाँधे हुए थे, इसकी कोई सीमा वहाँके लोगोंको नहीं दिखायी देती थी ॥ ४१ ॥

मत्तप्रमत्तमुदितं सुप्रीतयुवतीजनम् ।

मृदङ्गशङ्खनादैश्च मनोरममभूत् तदा ॥ ४२ ॥

उस यज्ञके भीतर आये हुए सब लोग मत्त-प्रमत्त और आनन्द विभोर हो रहे थे । युवतियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ विचरण करती थीं । मृदंगों और शंखोंकी ध्वनियोंसे उस यज्ञशालाकी मनोरमता और भी बढ़ गयी थी ॥ ४२ ॥

दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम् ।

तं महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४३ ॥

कथयन्ति स्म पुरुषा नानादेशनिवासिनः । ‘जिसकी जैसी इच्छा हो, उसको वही वस्तु दी जाय । सबको इच्छानुसार भोजन कराया जाय’ – यह घोषणा दिन - रात जारी रहती थी- कभी बंद नहीं होती थी । हृष्ट- पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञ- महोत्सवकी चर्चा नाना देशोंके निवासी मनुष्य बहुत दिनोंतक करते रहे ॥ ४३३ ॥

वर्षित्वा धनधाराभिः कामै रत्नै रसैस्तथा ।

विपाप्मा भरतश्रेष्ठः कृतार्थः प्राविशत् पुरम् ॥ ४४ ॥

भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस यज्ञमें धनकी मूसलाधार वर्षा की । सब प्रकारकी कामनाओं, रत्नों और रसोंकी भी वर्षा की । इस प्रकार पापरहित और कृतार्थ होकर उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधसमाप्तौ एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधकी समाप्तिविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

पृष्ठ 2037

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नवतितमोऽध्यायः युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना जनमेजय उवाच

पितामहस्य मे यज्ञे धर्मराजस्य धीमतः ।

यदाश्चर्यमभूत् किंचित् तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा-ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके यज्ञमें यदि कोई आश्चर्यजनक घटना हुई हो तो आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रूयतां राजशार्दूल महदाश्चर्यमुत्तमम् ।

अश्वमेधे महायज्ञे निवृत्ते यदभूत् प्रभो ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा - नृपश्रेष्ठ! प्रभो! युधिष्ठिरका वह महान् अश्वमेध- यज्ञ जब पूरा हुआ, उसी समय एक बड़ी उत्तम किंतु महान् आश्चर्यमें डालनेवाली घटना घटित हुई, उसे बतलाता हूँ; सुनो ॥ २ ॥

तर्पितेषु द्विजाग्रयेषु ज्ञातिसम्बन्धिबन्धुषु ।

दीनान्धकृपणे वापि तदा भरतसत्तम ॥ ३ ॥

घुष्यमाणे महादाने दिक्षु सर्वासु भारत ।

पतत्सु पुष्पवर्षेषु धर्मराजस्य मूर्धनि ॥ ४ ॥

नीलाक्षस्तत्र नकुलो रुक्मपार्श्वस्तदानघ ।

वज्राशनिसमं नादममुञ्चद् वसुधाधिप ॥ ५ ॥

भरतश्रेष्ठ! भारत! उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, जातिवालों, सम्बन्धियों, बन्धु - बान्धवों, अन्धों तथा दीन - दरिद्रोंके तृप्त हो जानेपर जब युधिष्ठिरके महान् दानका चारों ओर शोर हो गया और धर्मराजके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा होने लगी उसी समय वहाँ एक नेवला आया ।

अनघ! उसकी आँखें नीली थीं और उसके शरीरके एक ओरका भाग सोनेका था ।

पृथ्वीनाथ! उसने आते ही एक बार वज्रके समान भयंकर गर्जना की ॥ ३–५ ॥

सकृदुत्सृज्य तन्नादं त्रासयानो मृगद्विजान् ।

मानुषं वचनं प्राह धृष्टो बिलशयो महान् ॥ ६ ॥

बिलनिवासी उस धृष्ट एवं महान् नेवलेने एक बार वैसी गर्जना करके समस्त मृगों और पक्षियोंको भयभीत कर दिया और फिर मनुष्यकी भाषामें कहा - ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2038

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सक्तुप्रस्थेन वो नायं यज्ञस्तुल्यो नराधिपाः ।

उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ॥ ७ ॥

' राजाओ! तुम्हारा यह यज्ञ कुरुक्षेत्रनिवासी एक उञ्छवृत्तिधारी उदार ब्राह्मणके सेरभर सत्तू दान करनेके बराबर भी नहीं हुआ है ' ॥ ७ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नकुलस्य विशाम्पते ।

विस्मयं परमं जग्मुः सर्वे ते ब्राह्मणर्षभाः ॥ ८ ॥

प्रजानाथ! नेवलेकी वह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ८ ॥

ततः समेत्य नकुलं पर्यपृच्छन्त ते द्विजाः ।

कुतस्त्वं समनुप्राप्तो यज्ञं साधुसमागमम् ॥ ९ ॥

तब वे सब ब्राह्मण उस नेवलेके पास जाकर उसे चारों ओरसे घेरकर पूछने लगे —‘नकुल! इस यज्ञमें तो साधु पुरुषोंका ही समागम हुआ है, तुम कहाँसे आ गये? ' ॥ ९ ॥

किं बलं परमं तुभ्यं किं श्रुतं किं परायणम् ।

कथं भवन्तं विद्याम यो नो यज्ञं विगर्हसे ॥ १० ॥

पृष्ठ 2039

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‘ तुममें कौन - सा बल और कितना शास्त्रज्ञान है? तुम किसके सहारे रहते हो? हमें किस तरह तुम्हारा परिचय प्राप्त होगा? तुम कौन हो, जो हमारे इस यज्ञकी निन्दा करते हो? ॥ १० ॥

अविलुप्यागमं कृत्स्नं विविधैर्यज्ञियैः कृतम् ।

यथागमं यथान्यायं कर्तव्यं च तथा कृतम् ॥ ११ ॥

‘ हमने नाना प्रकारकी यज्ञ - सामग्री एकत्रित करके शास्त्रीय विधिकी अवहेलना न करते हुए इस यज्ञको पूर्ण किया है । इसमें शास्त्रसंगत और न्याययुक्त प्रत्येक कर्तव्य- कर्मका यथोचित पालन किया गया है ॥ ११ ॥

पूजार्हाः पूजिताश्चात्र विधिवच्छास्त्रदर्शनात् ।

मन्त्राहुतिहुतश्चाग्निर्दत्तं देयममत्सरम् ॥ १२ ॥

'इसमें शास्त्रीय दृष्टिसे पूजनीय पुरुषोंकी विधिवत् पूजा की गयी है । अग्निमें मन्त्र पढ़कर आहुति दी गयी है और देनेयोग्य वस्तुओंका ईर्ष्यारहित होकर दान किया गया है ॥ १२ ॥

तुष्टा द्विजातयश्चात्र दानैर्बहुविधैरपि ।

क्षत्रियाश्च सुयुद्धेन श्राद्धैश्चापि पितामहाः ॥ १३ ॥

पालनेन विशस्तुष्टाः कामैस्तुष्टा वरस्त्रियः ।

अनुक्रोशैस्तथा शूद्रा दानशेषैः पृथग्जनाः ॥ १४ ॥

ज्ञातिसम्बन्धिनस्तुष्टाः शौचेन च तृपस्य नः ।

देवा हविर्भिः पुण्यैश्च रक्षणैः शरणागताः ॥ १५ ॥

‘ यहाँ नाना प्रकारके दानोंसे ब्राह्मणोंको, उत्तम युद्धके द्वारा क्षत्रियोंको, श्राद्धके द्वारा पितामहोंको, रक्षाके द्वारा वैश्योंको, सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करके उत्तम स्त्रियोंको, दयासे शूद्रोंको, दानसे बची हुई वस्तुएँ देकर अन्य मनुष्योंको तथा राजाके शुद्ध बर्तावसे ज्ञाति एवं सम्बन्धियोंको संतुष्ट किया गया है । इसी प्रकार पवित्र हविष्यके द्वारा देवताओंको और रक्षाका भार लेकर शरणागतोंको प्रसन्न किया गया है ॥ १३–१५ ॥

यदत्र तथ्यं तद् ब्रूहि सत्यं सत्यं द्विजातिषु ।

यथाश्रुतं यथादृष्टं पृष्टो ब्राह्मणकाम्यया ॥ १६ ॥

श्रद्धेयवाक्यः प्राज्ञस्त्वं दिव्यं रूपं बिभर्षि च ।

समागतश्च विप्रैस्त्वं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १७ ॥

' यह सब होनेपर भी तुमने क्या देखा या सुना है, जिससे इस यज्ञपर आक्षेप करते हो? इन ब्राह्मणोंके निकट इनके इच्छानुसार पूछे जानेपर तुम सच- सच बताओ; क्योंकि तुम्हारी बातें विश्वासके योग्य जान पड़ती हैं । तुम स्वयं भी बुद्धिमान् दिखायी देते और दिव्यरूप धारण किये हुए हो । इस समय तुम्हारा ब्राह्मणोंके साथ समागम हुआ है, इसलिये तुम्हें हमारे प्रश्नका उत्तर अवश्य देना चाहिये ' ॥ १६-१७ ॥

पृष्ठ 2040

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इति पृष्टो द्विजैस्तैः स प्रहसन् नकुलोऽब्रवीत् ।

नैषा मृषा मया वाणी प्रोक्ता दर्पेण वा द्विजाः ॥ १८ ॥

उन ब्राह्मणोंके इस प्रकार पूछनेपर नेवलेने हँसकर कहा -' विप्रवृन्द! मैंने आपलोगोंसे मिथ्या अथवा घमंडमें आकर कोई बात नहीं कही है ॥ १८ ॥

यन्मयोक्तमिदं वाक्यं युष्माभिश्चाप्युपश्रुतम् ।

सक्तुप्रस्थेन वो नायं यज्ञस्तुल्यो द्विजर्षभाः ॥ १ ९ ॥

' मैंने जो कहा है कि ' द्विजवरो! आपलोगोंका यह यज्ञ उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणोंके द्वारा किये हुए सेरभर सत्तूदानके बराबर भी नहीं है ' इसे आपने ठीक-ठीक सुना है ॥ १ ९ ॥

इत्यवश्यं मयैतद् वो वक्तव्यं द्विजसत्तमाः ।

शृणुताव्यग्रमनसः शंसतो मे यथातथम् ॥ २० ॥

‘ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसका कारण अवश्य आपलोगोंको बताने योग्य है। अब मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे आप लोग शान्तचित्त होकर सुनें ॥ २० ॥

अनुभूतं च दृष्टं च यन्मयाद्भुतमुत्तमम् ।

उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ॥ २१ ॥

‘ कुरुक्षेत्रनिवासी उञ्छवृत्तिधारी दानी ब्राह्मणके सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा और अनुभव किया है, वह बड़ा ही उत्तम एवं अद्भुत है ' ॥ २१ ॥

स्वर्गं येन द्विजाः प्राप्तः सभार्यः ससुतस्नुषः ।

यथा चार्धं शरीरस्य ममेदं काञ्चनीकृतम् ॥ २२ ॥

‘ ब्राह्मणो! उस दानके प्रभावसे पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूसहित उन द्विजश्रेष्ठने जिस प्रकार स्वर्गलोकपर अधिकार पा लिया और वहाँ जिस तरह उन्होंने मेरा यह आधा शरीर सुवर्णमय कर दिया, वह प्रसंग बता रहा हूँ' ॥ २२ ॥

नकुलउवाच

हन्त वो वर्तयिष्यामि दानस्य फलमुत्तमम् ।

न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद् द्विजाः ॥ २३ ॥

नकुल बोला -ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रनिवासी द्विजके द्वारा दिये गये न्यायोपार्जित थोड़े - से अन्नके दानका जो उत्तम फल देखनेमें आया है, उसे मैं आपलोगोंको बतलाता हूँ ॥ २३ ॥

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्बहुभिर्वृते ।

उञ्छवृत्तिर्द्विजः कश्चित् कापोतिरभवत् तदा ॥ २४ ॥

कुछ दिनों पहलेकी बात है, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें, जहाँ बहुत- से धर्मज्ञ महात्मा रहा करते हैं, कोई ब्राह्मण रहते थे । वे उञ्छवृत्तिसे अपना जीवन- निर्वाह करते थे । कबूतरके समान अन्नका दाना चुनकर लाते और उसीसे कुटुम्बका पालन करते थे ॥ २४ ॥

सभार्यः सह पुत्रेण सस्नुषस्तपसि स्थितः ।