06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2061–2070
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2061–2070
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द्विनवतितमोऽध्यायः महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा जनमेजय उवाच
धर्मागतेन त्यागेन भगवन् स्वर्गमस्ति चेत् ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा — भगवन्! धर्मके द्वारा प्राप्त हुए धनका दान करनेसे यदि स्वर्ग मिलता है तो यह सब विषय मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल हैं ॥ १ ॥
तस्योञ्छवृत्तेर्यद् वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् ।
कथितं तु मम ब्रह्मंस्तथ्यमेतदसंशयम् ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! उञ्छवृत्ति धारण करनेवाले ब्राह्मणको न्यायतः प्राप्त हुए सत्तूका दान करनेसे जिस महान् फलकी प्राप्ति हुई, उसका आपने मुझसे वर्णन किया । निस्संदेह यह सब ठीक ॥ २ ॥
कथं हि सर्वयज्ञेषु निश्चयः परमोऽभवत् ।
एतदर्हसि मे वक्तुं निखिलेन द्विजर्षभ ॥ ३ ॥
परंतु सभी यज्ञोंमें यह उत्तम निश्चय कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है । द्विजश्रेष्ठ! इस विषयका मुझसे पूर्णतः प्रतिपादन कीजिये ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अगस्त्यस्य महायज्ञे पुरावृत्तमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! इस विषयमें पहले अगस्त्य मुनिके महान् यज्ञमें जो घटना घटित हुई थी, उस प्राचीन इतिहासका जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥
पुरागस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥
महाराज! पहलेकी बात है, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले महातेजस्वी अगस्त्य एक समय बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ५ ॥
तत्राग्निकल्पा होतार आसन् सत्रे महात्मनः ।
मूलाहाराः फलाहाराः साश्मकुट्टा मरीचिपाः ॥ ६ ॥
परिपृष्टिका वैघसिकाः प्रसंख्यानास्तथैव च ।
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यतयो भिक्षवश्चात्र बभूवुः पर्यवस्थिताः ॥ ७ ॥
उन महात्माके यज्ञमें अग्निके समान तेजस्वी होता थे । जिनमें फल, मूलका आहार करनेवाले, अश्मकुट्ट, मरीचिप, परिपृष्टिकर, वैघसिक और प्रसंख्याने' आदि अनेक प्रकारके यति एवं भिक्षु उपस्थित थे ॥ ६-७ ॥
सर्वे प्रत्यक्षधर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।
दमे स्थिताश्च सर्वे ते हिंसादम्भविवर्जिताः ॥ ८ ॥
वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्चाप्यबाधिताः ।
उपातिष्ठन्त तं यज्ञं यजन्तस्ते महर्षयः ॥ ९ ॥
वे सब- के - सब प्रत्यक्ष धर्मका पालन करनेवाले, क्रोध- विजयी, जितेन्द्रिय, मनोनिग्रहपरायण, हिंसा और दम्भसे रहित तथा सदा शुद्ध सदाचारमें स्थित रहनेवाले थे । उन्हें किसी भी इन्द्रियके द्वारा कभी बाधा नहीं पहुँचती थी। ऐसे- ऐसे महर्षि वह यज्ञ करानेके लिये वहाँ उपस्थित थे ॥ ८ - ९ ॥
यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् ।
तस्मिन् सत्रे तु यद् वृत्तं यद् योग्यं च तदाभवत् ॥ १० ॥
भगवान् अगस्त्य मुनिने उस यज्ञके लिये यथाशक्ति विशुद्ध अन्नका संग्रह किया था ।
उस समय उस यज्ञमें वही हुआ, जो उसके योग्य था ॥ १० ॥
तथा ह्यनेकैर्मुनिभिर्महान्तः क्रतवः कृताः ।
एवंविधे त्वगस्त्यस्य वर्तमाने तथाध्वरे ।
नववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥
उनके सिवा और भी अनेक मुनियोंने बड़े- बड़े यज्ञ किये थे। भरतश्रेष्ठ! महर्षि अगस्त्यका ऐसा यज्ञ जब चालू हो गया, तब देवराज इन्द्रने वहाँ वर्षा बंद कर दी ॥ ११ ॥
ततः कर्मान्तरे राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ।
कथेयमभिनिर्वृत्ता मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥
राजन्! तब यज्ञकर्मके बीचमें अवकाश मिलनेपर जब विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनि एक- दूसरेसे मिलकर एक स्थानपर बैठे, तब उनमें महात्मा अगस्त्यजीके सम्बन्धमें इस प्रकार चर्चा होने लगी- ॥ १२ ॥
अगस्त्यो यजमानोऽसौ ददात्यन्नं विमत्सरः ।
न च वर्षति पर्जन्यः कथमन्नं भविष्यति ॥ १३ ॥
' महर्षियो! सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि हमारे यजमान हैं । वे ईर्ष्यारहित हो श्रद्धापूर्वक सबको अन्न देते हैं । परंतु इधर मेघ जलकी वर्षा नहीं कर रहा है । तब भविष्यमें अन्न कैसे पैदा होगा? ॥ १३ ॥
सत्रं चेदं महद् विप्रा मुनेर्द्वादशवार्षिकम् ।
न वर्षिष्यति देवश्च वर्षाण्येतानि द्वादश ॥ १४ ॥
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‘ ब्राह्मणो! मुनिका यह महान् सत्र बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला है; परंतु इन्द्रदेव इन बारह वर्षोंमें वर्षा नहीं करेंगे ॥ १४ ॥
एतद् भवन्तः संचिन्त्य महर्षेरस्य धीमतः ।
अगस्त्यस्यातितपसः कर्तुमर्हन्त्यनुग्रहम् ॥ १५ ॥
‘ यह सोचकर आपलोग इन अत्यन्त तपस्वी बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यपर अनुग्रह करें ( जिससे इनका यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जाय) ' ॥ १५ ॥
इत्येवमुक्ते वचने ततोऽगस्त्यः प्रतापवान् ॥ १६ ॥
प्रोवाच वाक्यं स तदा प्रसाद्य शिरसा मुनीन् । उनके ऐसा कहनेपर प्रतापी अगस्त्य उन मुनियोंको सिरसे प्रणाम करके उन्हें राजी करते हुए इस प्रकार बोले – ॥ १६३ ॥
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ॥ १७ ॥
चिन्तायज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । ‘ यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं चिन्तनमात्रके द्वारा मानसिक यज्ञ करूँगा । यह यज्ञकी सनातन विधि है ॥ १७३ ॥
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ॥ १८ ॥
स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । ' यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं स्पर्शयज्ञ करूँगा । यह भी यज्ञकी सनातन विधि है ' ॥ १८६३ ॥
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ॥ १ ९ ॥ ध्येयात्मना हरिष्यामि यज्ञानेतान् यतव्रतः । ‘ यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं व्रत-नियमोंका पालन करता हुआ ध्यानद्वारा ध्येयरूपसे स्थित हो इन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा ॥ १ ९ ३ ॥ बीजयज्ञो मयायं वै बहुवर्षसमाचितः ॥ २० ॥
बीजैर्हि तं करिष्यामि नात्र विघ्नो भविष्यति । ‘ यह बीज - यज्ञ मैंने बहुत वर्षोंसे संचित कर रखा है । उन बीजोंसे ही मैं अपना यज्ञ पूरा कर लूँगा । इसमें कोई विघ्न नहीं होगा ॥ २०३ ॥
दं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथंचन ॥ २१ ॥
वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्षं भविष्यति । ' इन्द्रदेव यहाँ वर्षा करें अथवा यहाँ वर्षा न हो, इसकी मुझे परवा नहीं है, मेरे इस यज्ञको किसी तरह व्यर्थ नहीं किया जा सकता ॥ २१ ॥
अथवाभ्यर्थनामिन्द्रो न करिष्यति कामतः ॥ २२ ॥
स्वयमिन्द्रो भविष्यामि जीवयिष्यामि च प्रजाः ।
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‘ अथवा यदि इन्द्र इच्छानुसार जल बरसानेके लिये की हुई मेरी प्रार्थना पूर्ण नहीं करेंगे तो मैं स्वयं इन्द्र हो जाऊँगा और समस्त प्रजाके जीवनकी रक्षा करूँगा ॥ यो यदाहारजातश्च स तथैव भविष्यति ॥ २३ ॥
विशेषं चैव कर्तास्मि पुनः पुनरतीव हि । ‘ जो जिस आहारसे उत्पन्न हुआ है, उसे वही प्राप्त होगा तथा मैं बारंबार अधिक मात्रामें विशेष आहारकी भी व्यवस्था करूँगा ॥ २३३ ॥
अद्येह स्वर्णमभ्येतु यच्चान्यद् वसु किंचन ॥ २४ ॥
त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागम्यतां स्वयम् । ' तीनों लोकोंमें जो सुवर्ण या दूसरा कोई धन है, वह सब आज यहाँ स्वतः आ जाय ॥ २४ ॥
दिव्याश्चाप्सरसां संघा गन्धर्वाश्च सकिन्नराः ॥ २५ ॥
विश्वावसुश्च ये चान्ये तेऽप्युपासन्तु मे मखम् ।
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महर्षि अगस्त्यकी यज्ञके समय प्रतिज्ञा
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‘ दिव्य अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व, किन्नर, विश्वावसु तथा जो अन्य प्रमुख गन्धर्व हैं, वे सब यहाँ आकर मेरे यज्ञकी उपासना करें ॥ २५३ ॥
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च यत् किंचिद् वसु विद्यते ॥ २६ ॥
सर्वं तदिह यज्ञेषु स्वयमेवोपतिष्ठतु ।
स्वर्गः स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वयमेव तु ॥ २७ ॥
'उत्तर कुरुवर्षमें जो कुछ धन है, वह सब स्वयं यहाँ मेरे यज्ञोंमें उपस्थित हो । स्वर्ग, स्वर्गवासी देवता और धर्म स्वयं यहाँ विराजमान हो जायँ' ॥ २६-२७ ॥
इत्युक्ते सर्वमेवैतदभवत् तपसा मुनेः ।
तस्य दीप्ताग्निमहसस्त्वगस्त्यस्यातितेजसः ॥ २८ ॥
प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, अतिशय कान्तिमान् महर्षि अगस्त्यके इतना कहते ही उनकी तपस्याके प्रभावसे ये सारी वस्तुएँ वहाँ प्रस्तुत हो गयीं ॥ २८ ॥
ततस्ते मुनयो हृष्टा ददृशुस्तपसो बलम् ।
विस्मिता वचनं प्राहुरिदं सर्वे महार्थवत् ॥ २ ९ ॥
उन महर्षियोंने बड़े हर्षके साथ महर्षिके उस तपोबलको प्रत्यक्ष देखा । देखकर वे सब लोग आश्चर्यचकित हो गये और इस प्रकार महान् अर्थसे भरे हुए वचन बोले ॥ २ ९ ॥ ऋषय ऊचुः
प्रीताः स्म तव वाक्येन न त्विच्छामस्तपोव्ययम् ।
तैरेव यज्ञैस्तुष्टाः स्म न्यायेनेच्छामहे वयम् ॥ ३० ॥
ऋषि बोले- महर्षे! आपकी बातोंसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है । हम आपकी तपस्याका व्यय होना नहीं चाहते हैं । हम आपके उन्हीं यज्ञोंसे संतुष्ट हैं और न्यायसे उपार्जित अन्नकी ही इच्छा रखते हैं ॥ ३० ॥
यज्ञं दीक्षां तथा होमान् यच्चान्यन्मृगयामहे ।
न्यायेनोपार्जिताहाराः स्वकर्माभिरता वयम् ॥ ३१ ॥
यज्ञ, दीक्षा, होम तथा और जो कुछ हम खोजा करते हैं, वह सब हमें यहाँ प्राप्त है । न्यायसे उपार्जित किया हुआ अन्न ही हमारा भोजन है और हम सदा अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं ॥ ३१ ॥
वेदांश्च ब्रह्मचर्येण न्यायतः प्रार्थयामहे ।
न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वयम् ॥ ३२ ॥
हम ब्रह्मचर्यका पालन करके न्यायतः वेदोंको प्राप्त करना चाहते हैं और अन्तमें न्यायपूर्वक ही हम घर छोड़कर निकले हैं ॥ ३२ ॥
धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वयम् ।
भवतः सम्यगिष्टा तु बुद्धिर्हिंसाविवर्जिता ॥ ३३ ॥
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एतामहिंसां यज्ञेषु ब्रूयास्त्वं सततं प्रभो प्रीतास्ततो भविष्यामो वयं तु द्विजसत्तम ॥ ३४ ॥
विसर्जिताः समाप्तौ च सत्रादस्माद् व्रजामहे । धर्मशास्त्रमें देखे गये विधि- विधानसे ही हम तपस्या करेंगे । आपको हिंसारहित बुद्धि ही अधिक प्रिय है; अतः प्रभो! आप यज्ञोंमें सदा इस अहिंसाका ही प्रतिपादन करें । द्विजश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे हम आपपर बहुत प्रसन्न होंगे । यज्ञकी समाप्ति होनेपर जब आप हमें विदा करेंगे, तब हम यहाँसे अपने घरको जायँगे ॥ ३३-३४३ ॥ तथा कथयतां तेषां देवराजः पुरंदरः ॥ ३५ ॥
ववर्ष सुमहातेजा दृष्ट्वा तस्य तपोबलम् ।
आसमाप्तेश्च यज्ञस्य तस्यामितपराक्रमः ॥ ३६ ॥
निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय । जनमेजय! जब ऋषि लोग ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महा तेजस्वी देवराज इन्द्रने महर्षिका तपोबल देखकर पानी बरसाना आरम्भ किया । जबतक उस यज्ञकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक अमितपराक्रमी इन्द्रने वहाँ इच्छानुसार वर्षा की ॥ ३५-३६३ ॥
प्रसादयामास च तमगस्त्यं त्रिदशेश्वरः ।
स्वयमभ्येत्य राजर्षे पुरस्कृत्य बृहस्पतिम् ॥ ३७ ॥
राजर्षे! देवेश्वर इन्द्रने स्वयं आकर बृहस्पतिको आगे करके अगस्त्य ऋषिको मनाया ॥ ३७ ॥
ततो यज्ञसमाप्तौ तान् विससर्ज महामुनीन् ।
अगस्त्यः परमप्रीतः पूजयित्वा यथाविधि ॥ ३८ ॥
तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर अत्यन्त प्रसन्न हुए अगस्त्यजीने उन महामुनियोंकी विधिवत् पूजा करके सबको विदा कर दिया ॥ ३८ ॥
जनमेजय उवाच
कोऽसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै ।
प्राह मानुषवद् वाचमेतत् पृष्टो वदस्व मे ॥ ३ ९ ॥
जनमेजयने पूछा — मुने! सोनेके मस्तकसे युक्त वह नेवला कौन था, जो मनुष्योंकी-सी बोली बोलता था? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये ॥ ३ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच
एतत् पूर्वं न पृष्टोऽहं न चास्माभिः प्रभाषितम् ।
श्रूयतां नकुलो योऽसौ यथा वाक् तस्य मानुषी ॥ ४० ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! यह बात न तो तुमने पहले पूछी थी और न मैंने बतायी थी । अब पूछते हो तो सुनो । वह नकुल कौन था और उसकी मनुष्योंकी - सी बोली
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कैसे हुई, यह सब बता रहा हूँ ॥ ४० ॥
श्राद्धं संकल्पयामास जमदग्निः पुरा किल ।
होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम् ॥ ४१ ॥
पूर्वकालकी बात है, एक दिन जमदग्नि ऋषिने श्राद्ध करनेका संकल्प किया । उस समय उनकी होमधेनु स्वयं ही उनके पास आयी और मुनिने स्वयं ही उसका दूध दुहा ॥ ४१ ॥
तत् पयः स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ ।
तच्च क्रोधस्वरूपेण पिठरं धर्म आविशत् ॥ ४२ ॥
उस दूधको उन्होंने नये पात्रमें, जो सुदृढ़ और पवित्र था, रख दिया । उस पात्रमें धर्मने क्रोधका रूप धारण करके प्रवेश किया ॥ ४२ ॥
जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद् विप्रिये कृते ।
इति संचिन्त्य धर्मः स धर्षयामास तत् पयः ॥ ४३ ॥
धर्म उन मुनिश्रेष्ठकी परीक्षा लेना चाहते थे । उन्होंने सोचा, देखूँ तो ये अप्रिय करनेपर क्या करते हैं? इसीलिये उन्होंने उस दूधको क्रोधके स्पर्शसे दूषित कर दिया ॥ ४३ ॥
तमाज्ञाय मुनिः क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह ।
स तु क्रोधस्ततो राजन् ब्राह्मणीं मूर्तिमास्थितः ।
जिते तस्मिन् भृगुश्रेष्ठमभ्यभाषदमर्षणः ॥ ४४ ॥
राजन्! मुनिने उस क्रोधको पहचान लिया; किंतु उसपर वे कुपित नहीं हुए । तब क्रोधने ब्राह्मणका रूप धारण किया । मुनिके द्वारा पराजित होनेपर उस अमर्षशील क्रोधने उन भृगुश्रेष्ठसे कहा – ॥ ४४ ॥
जितोऽस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः ।
लोके मिथ्या प्रवादोऽयं यत्त्वयास्मि विनिर्जितः ॥ ४५ ॥
' भृगुश्रेष्ठ! मैं तो पराजित हो गया । मैंने सुना था कि भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े क्रोधी होते हैं; परंतु लोकमें प्रचलित हुआ यह प्रवाद आज मिथ्या सिद्ध हो गया; क्योंकि आपने मुझे जीत लिया ॥ ४५ ॥
वशे स्थितोऽहं त्वय्यद्य क्षमावति महात्मनि ।
बिभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ४६ ॥
‘ प्रभो! आज मैं आपके वशमें हूँ । आपकी तपस्यासे डरता हूँ । साधो! आप क्षमाशील महात्मा हैं, मुझपर कृपा कीजिये ' ॥ ४६ ॥
जमदग्निरुवाच
साक्षाद् दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः ।
न त्वयापकृतं मेऽद्य न च मे मन्युरस्ति वै ॥ ४७ ॥
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जमदग्नि बोले — क्रोध! मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष देखा है । तुम निश्चिन्त होकर यहाँसे जाओ । तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है; अतः आज तुमपर मेरा रोष नहीं है ॥ ४७ ॥
यान् समुद्दिश्य संकल्पः पयसोऽस्य कृतो मया ।
पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्धयस्व गम्यताम् ॥ ४८ ॥
मैंने जिन पितरोंके उद्देश्यसे इस दूधका संकल्प किया था, वे महाभाग पितर ही उसके स्वामी हैं । जाओ, उन्हींसे इस विषयमें समझो ॥ ४८ ॥
इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत ।
पितॄणामभिषङ्गाच्च नकुलत्वमुपागतः ॥ ४ ९ ॥
मुनिके ऐसा कहनेपर क्रोधरूपधारी धर्म भयभीत हो वहाँसे अदृश्य हो गये और पितरोंके शापसे उन्हें नेवला होना पड़ा ॥ ४ ९ ॥
स तान् प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति ।
तैश्चाप्युक्तः क्षिपन् धर्मं शापस्यान्तमवाप्स्यसि ॥ ५० ॥
इस शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन्होंने पितरोंको प्रसन्न किया । तब पितरोंने कहा —'तुम धर्मराज युधिष्ठिरपर आक्षेप करके इस शापसे छुटकारा पा जाओगे ' ॥ ५० ॥
तैश्चोक्तो यज्ञियान् देशान् धर्मारण्यं तथैव च ।
जुगुप्समानो धावन् स तं यज्ञं समुपासदत् ॥ ५१ ॥
उन्होंने ही उस नेवलेको यज्ञसम्बन्धी स्थान और धर्मारण्यका पता बताया था । वह धर्मराजकी निन्दाके उद्देश्यसे दौड़ता हुआ उस यज्ञमें जा पहुँचा था ॥ ५१ ॥
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः ।
मुक्तः शापात् ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद् युधिष्ठिरः ॥ ५२ ॥
धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप करते हुए सेरभर सत्तूके दानका माहात्म्य बताकर क्रोधरूपधारी धर्म शापसे मुक्त हो गया और वह धर्मराज युधिष्ठिरमें स्थित हो गया ॥ ५२ ॥
एवमेतत् तदा वृत्ते यज्ञे तस्य महात्मनः ।
पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलोऽन्तर्हितस्तदा ॥ ५३ ॥
इस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरका यज्ञ समाप्त होनेपर यह घटना घटी थी और वह नेवला हमलोगोंके देखते - देखते वहाँसे गायब हो गया था ॥ ५३ ॥
3. खाद्य पदार्थको पत्थरपर फोड़कर खानेवाले । २. सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले । ३. पूछकर दिये हुए अन्नको ही लेनेवाले । ४. यज्ञशिष्ट अन्नको ही भोजन करनेवाले । ५. तत्त्वका विचार करनेवाले । * संचित अन्नका व्यय किये बिना ही उसके स्पर्शमात्रसे देवताओंको तृप्त करनेकी जो भावना है, उसका नाम स्पर्शयज्ञ
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(वैष्णव धर्म -पर्व )