06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2071–2080
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2071–2080
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[ युधिष्ठिरका वैष्णव - धर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन ] जनमेजय उवाच
अश्वमेधे पुरा वृत्ते केशवं केशिसूदनम् ।
धर्मसंशयमुद्दिश्य किमपृच्छत् पितामहः ॥
जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! पूर्वकालमें जब मेरे पितामह महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध - यज्ञ पूर्ण हो गया, तब उन्होंने धर्मके विषयमें संदेह होनेपर भगवान् श्रीकृष्णसे कौन- सा प्रश्न किया? ॥ वैशम्पायन उवाच
पश्चिमेनाश्वमेधेन यदा स्नातो युधिष्ठिरः ।
तदा राजा नमस्कृत्य केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजीने कहा – राजन्! अश्वमेध यज्ञके बाद जब धर्मराज युधिष्ठिरने अवभृथ- स्नान कर लिया, तब भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ॥ वशिष्ठाद्यास्तपोयुक्ता मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ।
श्रोतुकामाः परं गुह्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम् ।
तथा भागवताश्चैव ततस्तं पर्यवारयन् ॥
उस समय वसिष्ठ आदि तत्त्वदर्शी तपस्वी मुनिगण तथा अन्य भक्तगण उस परम गोपनीय उत्तम वैष्णव - धर्मको सुननेकी इच्छासे भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर बैठ गये ॥ युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वतस्तव भावेन पादमूलमुपागतम् ।
यदि जानासि मां भक्तं स्निग्धं वा भक्तवत्सल ॥
धर्मगुह्यानि सर्वाणि वेत्तुमिच्छामि तत्त्वतः ।
धर्मान् कथय मे देव यद्यनुग्रहभागहम् ॥
युधिष्ठिर बोले— भक्तवत्सल! मैं सच्चे भक्तिभावसे आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! यदि आप मुझे अपना प्रेमी या भक्त समझते हैं और यदि मैं आपके अनुग्रहका अधिकारी होऊँ तो मुझसे वैष्णव धर्मोंका वर्णन कीजिये । मैं उनके सम्पूर्ण रहस्योंको यथार्थ रूपसे जानना चाहता हूँ ॥
श्रुता मे मानवा धर्मा वाशिष्ठाः काश्यपास्तथा ।
गार्गीया गौतमीयाश्च तथा गोपालकस्य च ॥
पराशरकृताः पूर्वा मैत्रेयस्य च धीमतः ।
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औमा माहेश्वराश्चैव नन्दिधर्माश्च पावनाः ॥ मैंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, गोपालक, पराशर, बुद्धिमान् मैत्रेय, उमा, महेश्वर और नन्दिद्वारा कहे हुए पवित्र धर्मोंका श्रवण किया है ॥ ब्रह्मणा कथिता ये च कौमाराश्च श्रुता मया । धूमायनकृता धर्माः काण्डवैश्वानरा अपि ।
भार्गवा याज्ञवल्क्याश्च मार्कण्डेयकृता अपि ।
भारद्वाजकृता ये च बृहस्पतिकृताश्च ये ॥
कुणेश्च कुणिबाहोश्च विश्वामित्रकृताश्च ये ।
सुमन्तुजैमिनिकृताः शाकुनेयास्तथैव च ॥
पुलस्त्यपुलहोद्गीताः पावकीयास्तथैव च ।
अगस्त्यगीता मौद्गल्याः शाण्डिल्याः शलभायनाः ॥
बालखिल्यकृता ये च ये च सप्तर्षिभिस्तथा ।
आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च ॥
प्राजापत्यास्तथा याम्या माहेन्द्राश्च श्रुता मया ।
वैयाघ्रव्यासकीयाश्च विभाण्डककृताश्च ये ॥
तथा जो ब्रह्मा, कार्तिकेय, धूमायन, काण्ड, वैश्वानर, भार्गव, याज्ञवल्क्य और मार्कण्डेयके द्वारा भी कहे गये हैं एवं जो भरद्वाज और बृहस्पतिके बनाये हुए हैं तथा जो कुणि, कुणिबाहु, विश्वामित्र, सुमन्तु, जैमिनि, शकुनि, पुलस्त्य, पुलह, अग्नि, अगस्त्य, मुद्गल, शाण्डिल्य, शलभ, बालखिल्यगण, सप्तर्षि, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, प्रजापति, यम, महेन्द्र, व्याघ्र, व्यास और विभाण्डकके द्वारा कहे गये हैं, उनको भी मैंने सुना है ॥
नारदीयाः श्रुता धर्माः कापोताश्च श्रुता मया ।
तथा विदुरवाक्यानि भृगोरङ्गिरसस्तथा ॥
क्रौञ्चा मृदङ्गगीताश्च सौर्या हारीतकाश्च ये ।
ये पिशङ्गकृताश्चापि कापोतीयाः सुबालकाः ॥
उद्दालककृता धर्मा औशनस्यास्तथैव च ।
वैशम्पायनगीताश्च ये चान्येऽप्येवमादितः ॥
एवं जो नारद, कपोत, विदुर, भृगु, अंगिरा, क्रौंच, मृदंग, सूर्य, हारीत, पिशंग, कपोत, सुबालक, उद्दालक, शुक्राचार्य, वैशम्पायन तथा दूसरे दूसरे महात्माओंके द्वारा बताये हुए हैं, उन धर्मोंका भी मैंने आद्योपान्त श्रवण किया है ॥
एतेभ्यः सर्वधर्मेभ्यो देव त्वन्मुखनिःसृताः ।
पावनत्वात् पवित्रत्वाद् विशिष्टा इति मे मतिः ॥
परन्तु भगवन्! मुझे विश्वास है कि आपके मुखसे जो धर्म प्रकट हुए हैं, वे पवित्र और पावन होनेके कारण उपर्युक्त सभी धर्मोंसे श्रेष्ठ हैं ॥
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तस्माद्धि त्वां प्रपन्नस्य त्वद्भक्तस्य च केशव ।
युष्मदीयान् वरान् धर्मान् पुण्यान् कथय मेऽच्युत ॥
इसलिये केशव! अच्युत! आपकी शरणमें आये हुए मुझ भक्तसे आप अपने पवित्र एवं श्रेष्ठ धर्मोंका वर्णन कीजिये ॥ वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टस्तु धर्मज्ञो धर्मपुत्रेण केशवः ।
उवाच धर्मान् सूक्ष्मार्थान् धर्मपुत्रस्य हर्षितः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! धर्मपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार प्रश्न करनेपर सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे धर्मके सूक्ष्म विषयोंका वर्णन करने लगे – ॥
एवं ते यस्य कौन्तेय यत्नो धर्मेषु सुव्रत ।
तस्य ते दुर्लभो लोके न कश्चिदपि विद्यते ॥
‘ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन! तुम धर्मके लिये इतना उद्योग करते हो, इसलिये तुम्हें संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ॥
धर्मः श्रुतो वा दृष्टो वा कथितो वा कृतोऽपि वा ।
अनुमोदितो वा राजेन्द्र नयतीन्द्रपदं नरम् ॥
' राजेन्द्र! सुना हुआ, देखा हुआ, कहा हुआ, पालन किया हुआ और अनुमोदन किया हुआ धर्म मनुष्यको इन्द्रपदपर पहुँचा देता है ॥
धर्मः पिता च माता च धर्मो नाथः सुहृत् तथा ।
धर्मो भ्राता सखा चैव धर्मः स्वामी परंतप ॥
‘ परंतप! धर्म ही जीवका माता-पिता, रक्षक, सुहृद्, भ्राता, सखा और स्वामी है ॥
धर्मादर्थश्च कामश्च धर्माद् भोगाः सुखानि च ।
धर्मादैश्वर्यमेवाग्र्यं धर्मात् स्वर्गगतिः परा ॥
' अर्थ, काम, भोग, सुख, उत्तम ऐश्वर्य और सर्वोत्तम स्वर्गकी प्राप्ति भी धर्मसे ही होती है ॥
धर्मोऽयं सेवितः शुद्धस्त्रायते महतो भयात् ।
धर्माद् द्विजत्वं देवत्वं धर्मः पावयते नरम् ॥
‘ यदि इस विशुद्ध धर्मका सेवन किया जाय तो वह महान् भयसे रक्षा करता है । धर्मसे ही मनुष्यको ब्राह्मणत्व और देवत्वकी प्राप्ति होती है । धर्म ही मनुष्यको पवित्र करता है ॥
यदा च क्षीयते पापं कालेन पुरुषस्य तु ।
तदा संजायते बुद्धिर्धर्मं कर्तुं युधिष्ठिर ॥
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‘ युधिष्ठिर! जब काल -क्रमसे मनुष्यका पाप नष्ट हो जाता है, तभी उसकी बुद्धि धर्माचरणमें लगती है ॥
जन्मान्तरसहस्रैस्तु मनुष्यत्वं हि दुर्लभम् ।
तद् गत्वापीह यो धर्मं न करोति स्ववञ्चितः ॥
‘ हजारों योनियोंमें भटकनेके बाद भी मनुष्ययोनिका मिलना कठिन होता है । ऐसे दुर्लभ मनुष्य-जन्मको पाकर भी जो धर्मका अनुष्ठान नहीं करता, वह महान् लाभसे वंचित रह जाता है ॥
कुत्सिता ये दरिद्राश्च विरूपा व्याधितास्तथा ।
परद्वेष्याश्च मूर्खाश्च न तैर्धर्मः कृतः पुरा ॥
‘ आज जो लोग निन्दित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरोंके द्वेषपात्र और मूर्ख देखे जाते हैं, उन्होंने पूर्वजन्ममें धर्मका अनुष्ठान नहीं किया है ॥
ये च दीर्घायुषः शूराः पण्डिता भोगिनस्तथा ।
नीरोगा रूपसम्पन्नास्तैर्धर्मः सुकृतः पुरा ॥
‘किंतु जो दीर्घजीवी शूर- वीर, पण्डित, भोग- सामग्रीसे सम्पन्न, नीरोग और रूपवान् हैं, उनके द्वारा पूर्वजन्ममें निश्चय ही धर्मका सम्पादन हुआ है ॥
एवं धर्मः कृतः शुद्धो नयते गतिमुत्तमाम् ।
अधर्मं सेवते यस्तु तिर्यग्योन्यां पतत्यसौ ॥
‘इस प्रकार शुद्धभावसे किया हुआ धर्मका अनुष्ठान उत्तम गतिकी प्राप्ति कराता है, परंतु जो अधर्मका सेवन करते हैं, उन्हें पशु -पक्षी आदि तिर्यग्योनियोंमें गिरना पड़ता है ॥
इदं रहस्यं कौन्तेय शृणु धर्ममनुत्तमम् ।
कथयिष्ये परं धर्मं तव भक्तस्य पाण्डव ॥
‘ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें एक रहस्यकी बात बताता हूँ, सुनो । पाण्डुनन्दन! मैं तुझ भक्तसे परम धर्मका वर्णन अवश्य करूँगा ॥
इष्टस्त्वमसि मेऽत्यर्थं प्रपन्नश्चापि मां सदा ।
परमार्थमपि ब्रूयां किं पुनर्धर्मसंहिताम् ॥
' तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो और सदा मेरी शरणमें स्थित रहते हो । तुम्हारे पूछनेपर मैं परम गोपनीय आत्मतत्त्वका भी वर्णन कर सकता हूँ, फिर धर्मसंहिताके लिये तो कहना ही क्या है? ॥
इदं मे मानुषं जन्म कृतमात्मनि मायया ।
धर्मसंस्थापनार्थाय दुष्टानां नाशनाय च ॥
‘इस समय धर्मकी स्थापना और दुष्टोंका विनाश करनेके लिये मैंने अपनी मायासे मानव- शरीरमें अवतार धारण किया है ॥ मानुष्यं भावमापन्नं ये मां गृह्णन्त्यवज्ञया ।
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संसारान्तर्हि ते मूढास्तिर्यग्योनिष्वनेकशः ॥ 'जो लोग मुझे केवल मनुष्य - शरीरमें ही समझकर मेरी अवहेलना करते हैं, वे मूर्ख हैं और संसारके भीतर बारंबार तिर्यग्योनियोंमें भटकते रहते हैं ॥
ये च मां सर्वभूतस्थं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा ।
मद्भक्तांस्तान् सदा युक्तान् मत्समीपं नयाम्यहम् ॥
‘ इसके विपरीत जो ज्ञानदृष्टिसे मुझे सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित देखते हैं, वे सदा मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्त हैं, ऐसे भक्तोंको मैं परम धाममें अपने पास बुला लेता हूँ ॥
मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः ।
मद्भक्तानां तु मानुष्ये सफलं जन्म पाण्डव ॥
‘ पाण्डुपुत्र! मेरे भक्तोंका नाश नहीं होता, वे निष्पाप होते हैं । मनुष्योंमें उन्हींका जन्म सफल है, जो मेरे भक्त हैं ॥
अपि पापेष्वभिरता मद्भक्ताः पाण्डुनन्दन ।
मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
‘ पाण्डुनन्दन! पापोंमें अभिरत रहनेवाले मनुष्य भी यदि मेरे भक्त हो जायँ तो वे सारे पापोंसे वैसे ही मुक्त हो जाते हैं, जैसे जलसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रहता है ॥
जन्मान्तरसहस्रेषु तपसा भावितात्मनाम् ।
भक्तिरुत्पद्यते तात मनुष्याणां न संशयः ॥
‘ हजारों जन्मोंतक तपस्या करनेसे जब मनुष्योंका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब उसमें निःसंदेह भक्तिका उदय होता है ॥
यच्च रूपं परं गुह्यं कूटस्थमचलं ध्रुवम् ।
न दृश्यते तथा देवैर्मद्भक्तैर्दृश्यते यथा ॥
' मेरा जो अत्यन्त गोपनीय कूटस्थ, अचल और अविनाशी परस्वरूप है, उसका मेरे भक्तोंको जैसा अनुभव होता है, वैसा देवताओंको भी नहीं होता ॥
अपरं यच्च मे रूपं प्रादुर्भावेषु दृश्यते ।
तदर्चयन्ति सर्वार्थैः सर्वभूतानि पाण्डव ॥
‘ पाण्डव! जो मेरा अपरस्वरूप है, वह अवतार लेनेपर दृष्टिगोचर होता है । संसारके समस्त जीव सब प्रकारके पदार्थोंसे उसकी पूजा करते हैं ॥
कल्पकोटिसहस्रेषु व्यतीतेष्वागतेषु च ।
दर्शयामीह तद् रूपं यच्च पश्यन्ति मे सुराः ॥
‘ हजारों और करोड़ों कल्प आकर चले गये, पर जिस वैष्णवरूपको देवगण देखते हैं, उसी रूपसे मैं भक्तोंको दर्शन देता हूँ ॥
स्थित्युत्पत्त्यव्ययकरं यो मां ज्ञात्वा प्रपद्यते ।
अनुगृह्णाम्यहं तं वै संसारान्मोचयामि च ॥
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' जो मनुष्य मुझे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारका कारण समझकर मेरी शरण लेता है, उसके ऊपर कृपा करके मैं उसे संसार- बन्धनसे मुक्त कर देता हूँ ॥
अहमादिर्हि देवानां सृष्टा ब्रह्मादयो मया ।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य जगत् सर्वं सृजाम्यहम् ॥
‘ मैं ही देवताओंका आदि हूँ। ब्रह्मा आदि देवताओंकी मैंने ही सृष्टि की है । मैं ही अपनी प्रकृतिका आश्रय लेकर सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि करता हूँ ॥ तमोमूलोऽहमव्यक्तो रजोमध्ये प्रतिष्ठितः । ऊर्ध्वं सत्त्वं विना लोभं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यतः । ' मैं अव्यक्त परमेश्वर ही तमोगुणका आधार, रजोगुणके भीतर स्थित और उत्कृष्ट सत्त्वगुणमें भी व्याप्त हूँ । मुझे लोभ नहीं है । ब्रह्मासे लेकर छोटेसे कीड़ेतक सबमें मैं व्याप्त हो रहा हूँ ॥
मूर्द्धानं मे विद्धि दिवं चन्द्रादित्यौ च लोचने ।
गावोऽग्निर्ब्राह्मणो वक्त्रं मारुतः श्वसनं च मे ॥
'द्युलोकको मेरा मस्तक समझो । सूर्य और चन्द्रमा मेरी आँखें हैं । गौ, अग्नि और ब्राह्मण मेरे मुख हैं और वायु मेरी साँस है ॥ दिशो मे बाहवश्चाष्टौ नक्षत्राणि च भूषणम् ।
अन्तरिक्षमुरो विद्धि सर्वभूतावकाशकम् ।
मार्गो मेघानिलाभ्यां तु यन्ममोदरमव्ययम् ॥
' आठ दिशाएँ मेरी बाँहें, नक्षत्र मेरे आभूषण और सम्पूर्ण भूतोंको अवकाश देनेवाला अन्तरिक्ष मेरा वक्षःस्थल है । बादलों और हवाके चलनेका जो मार्ग है, उसे मेरा अविनाशी उदर समझो ॥
पृथिवीमण्डलं यद् वै द्वीपार्णववनैर्युतम् ।
सर्वसंधारणोपेतं पादौ मम युधिष्ठिर ॥
'युधिष्ठिर! द्वीप, समुद्र और जंगलोंसे भरा हुआ यह सबको धारण करनेवाला भूमण्डल मेरे दोनों पैरोंके स्थानमें है ॥
स्थितो ह्येकगुणः खेऽहं द्विगुणश्चास्मि मारुते ।
त्रिगुणोऽग्नौ स्थितोऽहं वै सलिले च चतुर्गुणः ॥
शब्दाद्या ये गुणाः पञ्च महाभूतेषु पञ्चसु ।
तन्मात्रासंस्थितः सोऽहं पृथिव्यां पञ्चधा स्थितः ॥
‘ आकाशमें मैं एक गुणवाला हूँ, वायुमें दो गुणवाला हूँ, अग्निमें तीन गुणवाला हूँ और जलमें चार गुणवाला हूँ । पृथ्वीमें पाँच गुणोंसे स्थित हूँ । वही मैं तन्मात्रारूप पञ्चमहाभूतोंमें शब्दादि पाँच गुणोंसे स्थित हूँ ॥ अहं सहस्रशीर्षस्तु सहस्रवदनेक्षणः ।
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सहस्रबाहूदरधृक् सहस्रोरु सहस्रपात् ॥ ‘ मेरे हजारों मस्तक, हजारों मुख, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएँ, हजारों उदर, हजारों ऊरु और हजारों पैर हैं ॥
धृत्वोर्वीं सर्वतः सम्यगत्यतिष्ठं दशाङ्गुलम् ।
सर्वभूतात्मभूतस्थः सर्वव्यापी ततोऽस्म्यहम् ॥
' मैं पृथ्वीको सब ओरसे धारण करके नाभिसे दस अंगुल ऊँचे सबके हृदयमें विराजमान हूँ । सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मारूपसे स्थित हूँ, इसलिये सर्वव्यापी कहलाता हूँ ॥
अचिन्त्योऽहमनन्तोऽहमजरोऽहमजो ह्यहम् ।
अनाद्योऽहमवध्योऽहमप्रमेयोऽहमव्ययः ॥
निर्गुणोऽहं निगूढात्मा निर्द्वन्द्वो निर्ममो नृप ।
निष्कलो निर्विकारोऽहं निदानममृतस्य तु ॥
सुधा चाहं स्वधा चाहं स्वाहा चाहं नराधिप । ‘ राजन्! मैं अचिन्त्य, अनन्त, अजर, अजन्मा, अनादि, अवध्य, अप्रमेय, अव्यय, निर्गुण, गुह्यस्वरूप, निर्द्वन्द्व, निर्मम, निष्कल, निर्विकार और मोक्षका आदि कारण हूँ । नरेश्वर! सुधा, स्वधा और स्वाहा भी मैं ही हूँ ॥ तेजसा तपसा चाहं भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ स्नेहपाशैर्गुणैर्बद्ध्वा धारयाम्यात्ममायया । 'मैंने ही अपने तेज और तपसे चार प्रकारके प्राणिसमुदायको स्नेहपाशरूप रज्जुसे बाँधकर अपनी मायासे धारण कर रखा है ॥
चातुराश्रमधर्मोऽहं चातुर्होत्रफलाशनः ।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्यज्ञश्चतुराश्रमभावनः ॥
'मैं चारों आश्रमोंका धर्म, चार प्रकारके होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका फल भोगनेवाला चतुर्व्यूह, चतुर्यज्ञ और चारों आश्रमोंको प्रकट करनेवाला हूँ ॥
संहृत्याहं जगत् सर्वं कृत्वा वै गर्भमात्मनः ।
शयामि दिव्ययोगेन प्रलयेषु युधिष्ठिर ॥
‘ युधिष्ठिर! प्रलयकालमें समस्त जगत्का संहार करके उसे अपने उदरमें स्थापित कर दिव्य योगका आश्रय ले मैं एकार्णवके जलमें शयन करता हूँ ॥
सहस्रयुगपर्यन्तां ब्राह्मीं रात्रिं महार्णवे ।
स्थित्वा सृजामि भूतानि जङ्गमानि स्थिराणि च ॥
'एक हजार युगोंतक रहनेवाली ब्रह्माकी रात पूर्ण होनेतक महार्णवमें शयन करनेके पश्चात् स्थावर- जंगम प्राणियोंकी सृष्टि करता हूँ ॥
कल्पे कल्पे च भूतानि संहरामि सृजामि च ।
न च मां तानि जानन्ति मायया मोहितानि मे ॥
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‘ प्रत्येक कल्पमें मेरे द्वारा जीवोंकी सृष्टि और संहारका कार्य होता है, किंतु मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे जीव मुझे नहीं जान पाते ॥
मम चैवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य नित्यशः ।
प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिर्नैवोपलभ्यते ॥
‘ प्रलयकालमें जब दीपकके शान्त होनेकी भाँति समस्त व्यक्त सृष्टि लुप्त हो जाती है, तब खोज करने योग्य मुझ अदृश्यरूपकी गतिका उनको पता नहीं लगता ॥
न तदस्ति क्वचिद् राजन् यत्राहं न प्रतिष्ठितः ।
न च तद् विद्यते भूतं मयि यन्न प्रतिष्ठितम् ॥
' राजन्! कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसमें मेरा निवास न हो तथा कोई ऐसा जीव नहीं है, जो मुझमें स्थित न हो ॥
यावन्मात्रं भवेद् भूतं स्थूलं सूक्ष्ममिदं जगत् ।
जीवभूतो ह्यहं तस्मिंस्तावन्मात्रं प्रतिष्ठितः ॥
‘जो कुछ भी स्थूल - सूक्ष्मरूप यह जगत् हो चुका है और होनेवाला है, उन सबमें उसी प्रकार मैं ही जीवरूपसे स्थित हूँ ॥
किं चात्र बहुनोक्तेन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
यद् भूतं यद् भविष्यच्च तत् सर्वमहमेव तु ॥
‘ अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि भूत और भविष्य जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ ॥
या सृष्टानि भूतानि मन्मयानि च भारत ।
मामेव न विजानन्ति मायया मोहितानि वै ॥
‘ भरतनन्दन! सम्पूर्ण भूत मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मेरे ही स्वरूप हैं । फिर भी मेरी मायासे मोहित रहते हैं, इसलिये मुझे नहीं जान पाते ॥
एवं सर्वं जगदिदं सदेवासुरमानुषम् ।
मत्तः प्रभवते राजन् मय्येव प्रविलीयते ॥
‘ राजन्! इस प्रकार देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त संसारका मुझसे ही जन्म और मुझमें ही लय होता है ' ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
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[ चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय ] वैशम्पायन उवाच
एवमात्मोद्भवं सर्वं जगदुद्दिश्य केशवः ।
धर्मान् धर्मात्मजस्याथ पुण्यानकथयत् प्रभुः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने सम्पूर्ण जगत्को अपनेसे उत्पन्न बतलाकर धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे पवित्र धर्मोंका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया – ॥
शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पापनाशनम् ।
कथ्यमानं मया पुण्यं धर्मशास्त्रफलं महत् ॥
‘ पाण्डुनन्दन! मेरे द्वारा कहे हुए धर्मशास्त्रका पुण्यमय, पापनाशक, पवित्र और महान् फल यथार्थ-रूपसे सुनो ॥
यः शृणोति शुचिर्भूत्वा एकचित्तस्तपोयुतः ।
स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धर्मं ज्ञेयं युधिष्ठिर ॥
श्रद्दधानस्य तस्येह यत् पापं पूर्वसंचितम् ।
विनश्यत्याशु तत् सर्वं मद्भक्तस्य विशेषतः ॥
‘ युधिष्ठिर! जो मनुष्य पवित्र और एकाग्रचित्त होकर तपस्यामें संलग्न हो स्वर्ग, यश और आयु प्रदान करनेवाले जाननेयोग्य धर्मका श्रवण करता है, उस श्रद्धालु पुरुषके— विशेषतः मेरे भक्तके पूर्वसंचित जितने पाप होते हैं, वे सब तत्काल नष्ट हो जाते हैं ' ॥ वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा वचः पुण्यं सत्यं केशवभाषितम् ।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुतं परम् ॥
देवब्रह्मर्षयः सर्वे गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
भूता यक्षग्रहाश्चैव गुह्यका भुजगास्तथा ॥
बालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिनः ।
तथा भागवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ॥
कौतूहलसमाविष्टाः प्रहृष्टेन्द्रियमानसाः ।
श्रोतुकामाः परं धर्मं वैष्णवं धर्मशासनम् ।
हृदि कर्तुं च तद्वाक्यं प्रणेमुः शिरसा नताः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! श्रीकृष्णका यह परम पवित्र और सत्य वचन सुनकर मन- ही- मन प्रसन्न हो धर्मके अद्भुत रहस्यका चिन्तन करते हुए सम्पूर्ण देवर्षि, ब्रह्मर्षि, गन्धर्व, अप्सराएँ, भूत, यक्ष, ग्रह, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्यगण, तत्त्वदर्शी
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योगी तथा पाँचों उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष उत्तम वैष्णव- धर्मका उपदेश सुनने तथा भगवान्की बात हृदयमें धारण करनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर वहाँ आये । उनके इन्द्रिय और मन अत्यन्त हर्षित हो रहे थे । आनेके बाद उन सबने मस्तक झुकाकर भगवान्को प्रणाम किया ॥ ततस्तान् वासुदेवेन दृष्टान् दिव्येन चक्षुषा ।
विमुक्तपापानालोक्य प्रणम्य शिरसा हरिम् ।
पप्रच्छ केशवं धर्मं धर्मपुत्रः प्रतापवान् ॥
भगवान्की दिव्य दृष्टि पड़नेसे वे सब निष्पाप हो गये । उन्हें उपस्थित देखकर महाप्रतापी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने भगवान्को प्रणाम करके इस प्रकार धर्मविषयक प्रश्न किया ॥ युधिष्ठिर उवाच
कीदृशी ब्राह्मणस्याथ क्षत्रियस्यापि कीदृशी ।
वैश्यस्य कीदृशी देव गतिः शूद्रस्य कीदृशी ॥
युधिष्ठिरने पूछा- देवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी पृथक् पृथक् कैसी गति होती है? ॥ श्रीभगवानुवाच
शृणु वर्णक्रमेणैव धर्मं धर्मभृतां वर ।
नास्ति किंचिन्नरश्रेष्ठ ब्राह्मणस्य तु दुष्कृतम् ॥
श्रीभगवान्ने कहा — नरश्रेष्ठ धर्मराज! ब्राह्मणादि वर्णोंके क्रमसे धर्मका वर्णन सुनो । ब्राह्मणके लिये कुछ भी दुष्कर नहीं है ॥
शिखायज्ञोपवीता ये संध्यां ये चाप्युपासते ।
यैश्च पूर्णाहुतिः प्राप्ता विधिवज्जुह्वते च ये ॥
वैश्वदेवं च ये चक्रुः पूजयन्त्यतिथींश्च ये ।
नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च जपयज्ञपराश्च ये ॥
सायं प्रातर्हताशाश्च शूद्रभोजनवर्जिताः ।
दम्भानृतविमुक्ताश्च स्वदारनिरताश्च ये ।
पञ्चयज्ञपरा ये च येऽग्निहोत्रमुपासते ॥
दहन्ति दुष्कृतं येषां हूयमानास्त्रयोऽग्नयः ।
नष्टदुष्कृतकर्माणो ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ॥
जो ब्राह्मण शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, संध्योपासना करते हैं, पूर्णाहुति देते हैं, विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, बलिवैश्वदेव और अतिथियोंका पूजन करते हैं, नित्य स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा जप यज्ञके परायण हैं; जो प्रातः काल और सायंकाल होम