06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2191–2200

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2191–2200

पृष्ठ 2191

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2191 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अहं चापि न जानामि गतिं तस्य नराधिप ॥

शूद्रान्नरसपुष्टाङ्गोऽप्यधीयानो हि नित्यशः ।

जपतो जुह्वतो वापि गतिरूर्ध्वं न विद्यते ॥

नरेश्वर! जिसका शरीर मरणाशौचका अन्न खाकर मोटा हुआ हो, जो शूद्रका अन्न भोजन करता हो और शूद्रके ही अन्नके रससे पुष्ट हुआ हो, उस ब्राह्मणकी किस प्रकार गति होती है, मैं नहीं जानता; क्योंकि प्रतिदिन स्वाध्याय, जप और होम करनेपर भी उसकी उत्तम गति नहीं होती ॥

आहिताग्निश्च यो विप्रः शूद्रान्नान्न निवर्तते ।

पञ्च तस्य प्रणश्यन्ति आत्मा ब्रह्म त्रयोऽग्नयः ॥

जो ब्राह्मण प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेपर भी शूद्रके अन्नसे बचा न रहता हो, उसके आत्मा, वेदाध्ययन और तीनों अग्नि- इन पाँचोंका नाश हो जाता है ॥

शूद्रप्रेषणकर्तुश्च ब्राह्मणस्य विशेषतः ।

भूमावन्नं प्रदातव्यं श्वशृगालसमो हि सः ॥

शूद्रकी सेवा करनेवाले ब्राह्मणको खानेके लिये विशेषतः जमीनपर ही अन्न डाल देना चाहिये; क्योंकि वह कुत्ते और गीदड़के ही समान होता है ॥

प्रेतभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।

अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥

जो ब्राह्मण मूर्खतावश मरे हुए शूद्रके शवके पीछे - पीछे श्मशानभूमिमें जाता है, उसको तीन रातका अशौच लगता है ॥

त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् ।

प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्धयति ॥

तीन रात पूर्ण होनेपर किसी समुद्रमें मिलनेवाली नदीके भीतर स्नान करके सौ बार प्राणायाम करे और घी पीवे तो वह शुद्ध होता है ॥

अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजोत्तमाः ।

पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं ते प्राप्नुवन्ति हि ॥

जो श्रेष्ठ द्विज किसी अनाथ ब्राह्मणके शवको श्मशानमें ले जाते हैं, उन्हें पग - पगपर अश्वमेध- यज्ञका फल मिलता है ॥

न तेषामशुभं किंचित् पापं वा शुभकर्मणाम् ।

जलावगाहनादेव सद्यः शौचं विधीयते ॥

उन शुभ कर्म करनेवालोंको किसी प्रकारका अशुभ या पाप नहीं लगता । वे जलमें स्नान करनेमात्रसे तत्काल शुद्ध हो जाते हैं ॥

शूद्रवेश्मनि विप्रेण क्षीरं वा यदि वा दधि ।

निवृत्तेन न भोक्तव्यं विद्धि शूद्रान्नमेव तत् ॥

पृष्ठ 2192

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2192 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

निवृत्तिमार्गपरायण ब्राह्मणको शूद्रके घरमें दूध या दही भी नहीं खाना चाहिये । उसे भी शूद्रान्न ही समझना चाहिये ॥

विप्राणां भोक्तुकामानामत्यन्तं चान्नकाङ्क्षिणाम् ।

यो विघ्नं कुरुते मर्त्यस्ततो नान्योऽस्ति पापकृत् ॥

अत्यन्त भूखे होनेके कारण अन्नकी इच्छावाले ब्राह्मणोंके भोजनमें जो मनुष्य विघ्न डालता है, उससे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं है ॥ सर्वे च वेदाः सह षड्भिरङ्गैः सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म । नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥ राजन्! यदि ब्राह्मण शील एवं सदाचारसे रहित हो जाय तो छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद, सांख्य, पुराण और उत्तम कुलका जन्म– ये सब मिलकर भी उसे सद्गति नहीं दे सकते ॥ ग्रहोपरागे विषुवेऽयनान्ते पित्र्ये मघासु स्वसुते च जाते । गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र दत्तं भवेन्निष्कसहस्रतुल्यम् ॥ पाण्डुनन्दन! ग्रहणके समय, विषुवयोगमें, अयन समाप्त होनेपर, पितृकर्म ( श्राद्ध आदि) -में, मघा- नक्षत्रमें, अपने यहाँ पुत्रका जन्म होनेपर तथा गयामें पिण्डदान करते समय जो दान दिया जाता है, वह एक हजार स्वर्णमुद्रा दान देनेके समान होता है ॥ वैशाखमासस्य तु या तृतीया- नवद्यासी कार्त्तिकशुक्लपक्षे । नभस्यमासस्य च कृष्णपक्षे त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे ॥ उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च श्राद्धस्य कालो ह्ययनद्वये च । पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः । श्राद्धं कृतं तेन समा सहस्रं रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति ॥ वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्लपक्षकी तृतीया, भाद्रपद मासकी कृष्णा त्रयोदशी, माघकी अमावास्या, चन्द्रमा और सूर्यका ग्रहण तथा उत्तरायण और दक्षिणायनके प्रारम्भिक दिन — ये श्राद्धके उत्तम काल हैं । इन दिनोंमें मनुष्य पवित्रचित्त होकर यदि

पृष्ठ 2193

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2193 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पितरोंके लिये तिलमिश्रित जलका भी दान कर दे तो उसके द्वारा एक हजार वर्षतक श्राद्ध

किया हुआ हो जाता है । यह रहस्य स्वयं पितरोंका बतलाया हुआ है ॥

यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति स्नेहाद् भयाद्वा यदि वार्थहेतोः । क्रूरं दुराचारमनात्मवन्तं ब्रह्मघ्नमेनं कवयो वदन्ति ॥ जो मनुष्य स्नेह या भयके कारण अथवा धन पानेकी इच्छासे एक पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन परोसनेमें भेद करता है, उसे विद्वान् पुरुष क्रूर, दुराचारी, अजितात्मा और ब्रह्महत्यारा बतलाते हैं ॥ धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन्ते परलोकमूढाः । तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नान्यत् सुखं देहसुखे रतानाम् ॥ शत्रुसूदन! जिनके पास धनका भण्डार भरा हुआ है और जो परलोकके विषयमें कुछ भी न जाननेके कारण सदा भोग - विलासमें ही रम रहे हैं, वे केवल दैहिक सुखमें ही आसक्त हैं । अतः उनके लिये इस लोकका ही सुख सुलभ है; पारलौकिक सुख तो उन्हें कभी नहीं मिलता ॥ ये चैव मुक्तास्तपसि प्रयुक्ताः

स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहम् ।

जितेन्द्रिया भूतहिते निविष्टा- स्तेषामसौ चापि परश्च लोकः ॥

जो विषयोंकी आसक्तिसे मुक्त होकर तपस्यामें संलग्न रहते हों, जिन्होंने नित्य स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर दिया हो, जो इन्द्रियोंको वशमें रखते हों और समस्त प्राणियोंके हित- साधनमें लगे रहते हों, उनके लिये इस लोकका भी सुख सुलभ है और परलोकका भी ॥ ये चैव विद्यां न तपो न दानं

न चापि मूढाः प्रजने यतन्ते ।

न चापि गच्छन्ति सुखानि भोगां- स्तेषामयं चापि परश्च नास्ति ॥

परंतु जो मूर्ख न विद्या पढ़ते हैं, न तप करते हैं, न दान देते हैं, न शास्त्रानुसार संतानोत्पादनका प्रयत्न करते हैं और न अन्य सुख भोगोंका ही अनुभव कर पाते हैं, उनके लिये न इस लोकमें सुख है न परलोकमें ॥ युधिष्ठिर उवाच

पृष्ठ 2194

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2194 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नारायण पुराणेश लोकावास नमोऽस्तु ते ।

श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन धर्मसारसमुच्चयम् ॥

युधिष्ठिरने कहा — भगवन्! आप साक्षात् नारायण, पुरातन ईश्वर और सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं । आपको नमस्कार है । अब मैं सम्पूर्ण धर्मोंका सार पूर्णतया श्रवण करना चाहता हूँ ॥ श्रीभगवानुवाच

धर्मसारं महाप्राज्ञ मनुना प्रोक्तमादितः ।

प्रवक्ष्यामि मनुप्रोक्तं पौराणं श्रुतिसंहितम् ॥

श्रीभगवान् बोले – महाप्राज्ञ! मनुजीने सृष्टिके आदिकालमें जो धर्मके सार- तत्त्वका वर्णन किया है, वह पुराणोंके अनुकूल और वेदके द्वारा समर्थित है । उसी मनुप्रोक्त धर्मका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ॥

अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः ।

दृष्टमात्रात् पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत तान् सदा ॥

अग्निहोत्री द्विज, कपिला गौ, यज्ञ करनेवाला पुरुष, राजा, संन्यासी और महासागर-ये दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देते हैं, इसलिये सदा इनका दर्शन करना चाहिये ॥

बहूनां न प्रदातव्या गौर्वस्त्रं शयनं स्त्रियः ।

तादृग्भूतं तु तद् दानं दातारं नोपतिष्ठति ॥

एक गौ, एक वस्त्र, एक शय्या और एक स्त्रीको कभी अनेक मनुष्योंके अधिकारमें नहीं देना चाहिये; क्योंकि वैसा करनेपर उस दानका फल दाताको नहीं मिलता ॥

मा ददात्विति यो ब्रूयाद् ब्राह्मणेषु च गोषु च ।

तिर्यग्योनिशतं गत्वा चण्डालेषूपजायते ॥

जो ब्राह्मणको और गौको आहार देते समय ' मत दो' कहकर मना करता है, वह सौ बार पशु - पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर अन्तमें चाण्डाल होता है ॥

ब्राह्मणस्वं च यद् दैवं दरिद्रस्यैव यद् धनम् ।

गुरोश्चापि हृतं राजन् स्वर्गस्थानपि पातयेत् ॥

राजन्! ब्राह्मणका, देवताका, दरिद्रका और गुरुका धन यदि चुरा लिया जाय तो वह स्वर्गवासियोंको भी नीचे गिरा देता है ॥

धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ।

द्वितीयं धर्मशास्त्राणि तृतीयं लोकसंग्रहः ॥

जो धर्मका तत्त्व जानना चाहते हैं, उनके लिये वेद मुख्य प्रमाण हैं, धर्मशास्त्र दूसरा प्रमाण है और लोकाचार तीसरा प्रमाण है ॥ आसमुद्राच्च यत् पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् ।

पृष्ठ 2195

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2195 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हिमाद्रिविन्ध्ययोर्मध्यमार्यावर्तं प्रचक्षते ॥ पूर्व समुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्रतक और हिमालय तथा विन्ध्याचलके बीचका जो देश है, उसे आर्यावर्त कहते हैं ॥

सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।

तद् देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त्तं प्रचक्षते ॥

सरस्वती और दृषद्वती- इन दोनों देवनदियोंके बीचका जो देवताओंद्वारा रचा हुआ देश है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं ॥

यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।

वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥

जिस देशमें चारों वर्णों तथा उनके अवान्तर भेदोंका जो आचार पूर्वपरम्परासे चला आता है, वही उनके लिये सदाचार कहलाता है ॥

कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनयः ।

एते ब्रह्मर्षिदेशास्तु ब्रह्मावर्तादनन्तराः ॥

कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल और शूरसेन - ये ब्रह्मर्षियोंके देश हैं और ब्रह्मावर्तके समीप हैं ॥

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।

स्वं चरित्रं च गृह्णीयुः पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥

इस देशमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंके पास जाकर भूमण्डलके सम्पूर्ण मनुष्योंको अपने-अपने आचरणकी शिक्षा लेनी चाहिये ||

हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विशसनादपि ।

प्रत्यगेव प्रयागात् तु मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥

हिमालय और विन्ध्याचलके बीचमें कुरुक्षेत्र से पूर्व और प्रयागसे पश्चिमका जो देश है, वह मध्यदेश कहलाता है ॥

कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।

सज्ञेयो याज्ञिको देशो म्लेच्छदेशस्ततः परम् ॥

जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग स्वभावतः विचरा करता है, वही यज्ञके लिये उपयोगी देश है; उससे भिन्न म्लेच्छोंका देश है ॥

एतान् विज्ञाय देशांस्तु संश्रयेरन् द्विजातयः ।

शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा निवसेद् वृत्तिकर्शितः ॥

इन देशोंका परिचय प्राप्त करके द्विजातियोंको इन्हीं में निवास करना चाहिये; किंतु शूद्र जीविका न मिलनेपर निर्वाहके लिये किसी भी देशमें निवास कर सकता है ॥

आचारः प्रथमो धर्मो ह्यहिंसा सत्यमेव च ।

दानं चैव यथाशक्ति नियमाश्च यमैः सह ॥

पृष्ठ 2196

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2196 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सदाचार, अहिंसा, सत्य, शक्तिके अनुसार दान तथा यम और नियमोंका पालन —ये मुख्य धर्म हैं ॥

वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् ।

कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टिपर्यन्त सब संस्कार वेदोक्त पवित्र विधियों और मन्त्रोंके अनुसार कराना चाहिये; क्योंकि संस्कार इहलोक और परलोकमें भी पवित्र करनेवाला है ॥

गर्भहोमैर्जातकर्मनामचौलोपनायनैः ।

स्वाध्यायैस्तद् व्रतैश्चैव विवाहस्नातकव्रतैः ॥

महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥

गर्भाधान- संस्कारमें किये जानेवाले हवनके द्वारा और जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, वेदोक्त व्रतोंके पालन, स्नातकके पालनेयोग्य व्रत, विवाह, पञ्चमहायज्ञोंके अनुष्ठान तथा अन्यान्य यज्ञोंके द्वारा इस शरीरको परब्रह्मकी प्राप्तिके योग्य बनाया जाता है ॥

धर्मार्थौ यदि न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा ।

विद्या तस्मिन् न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ॥

जिससे न धर्मका लाभ होता हो, न अर्थका तथा विद्याप्राप्तिके अनुकूल जो सेवा भी नहीं करता हो, उस शिष्यको विद्या नहीं पढ़नी चाहिये, ठीक उसी तरह जैसे ऊसर खेतमें उत्तम बीज नहीं बोया जाता ॥

लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽऽध्यात्मिकमेव वा ।

यस्माज्ज्ञानमिदं प्राप्तं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥

जिस पुरुषसे लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस गुरुको पहले प्रणाम करना चाहिये ॥

सव्येन सव्यं संगृह्य दक्षिणेन तु दक्षिणम् ।

न कुर्यादिकहस्तेन गुरोः पादाभिवादनम् ॥

अपने दाहिने हाथसे गुरुका दाहिना चरण और बायें हाथसे उनका बायाँ चरण

पकड़कर प्रणाम करना चाहिये । गुरुको एक हाथसे कभी प्रणाम नहीं करना चाहिये ॥

निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।

अध्यापयति चैवैनं स विप्रो गुरुरुच्यते ॥

जो गर्भाधान आदि सब संस्कार विधिवत् कराता है और वेद पढ़ाता है, वह ब्राह्मण गुरु कहलाता है ॥

कृत्वोपनयनं वेदान् योऽध्यापयति नित्यशः ।

सकल्पान् सरहस्यांश्च स चोपाध्याय उच्यते ॥

पृष्ठ 2197

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2197 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जो उपनयन- संस्कार कराकर कल्प और रहस्यों सहित वेदोंका नित्य अध्ययन कराता है, उसे उपाध्याय कहते हैं ॥

साङ्गांश्च वेदानध्याप्य शिक्षयित्वा व्रतानि च ।

विवृणोति च मन्त्रार्थानाचार्यः सोऽभिधीयते ॥

जो षडङ्गयुक्त वेदोंको पढ़ाकर वैदिक व्रतोंकी शिक्षा देता है और मन्त्रार्थोंकी व्याख्या करता है, वह आचार्य कहलाता है ॥

उपाध्यायाद् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।

पितुः शतगुणं माता गौरवेणातिरिच्यते ॥

गौरवमें दस उपाध्यायोंसे बढ़कर एक आचार्य, सौ आचार्योंसे बढ़कर पिता और सौ पितासे भी बढ़कर माता है ॥

एतेषामपि सर्वेषां गरीयान् ज्ञानदो गुरुः ।

गुरोः परतरं किंचिन्न भूतं न भविष्यति ॥

किंतु जो ज्ञान देनेवाले गुरु हैं, वे इन सबकी अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं । गुरुसे बढ़कर न कोई हुआ, न होगा ॥

तस्मात् तेषां वशे तिष्ठेच्छुश्रूषापरमो भवेत् ।

अवमानाद्धि तेषां तु नरकं स्यान्न संशयः ॥

इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त गुरुजनोंके अधीन रहकर उनकी सेवा- शुश्रूषामें लगे रहना चाहिये । इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि गुरुजनोंके अपमानसे नरकमें गिरना पड़ता है ॥

हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान् विद्याहीनान् वयोऽधिकान् ।

रूपद्रविणहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥

जो लोग किसी अंगसे हीन हों, जिनका कोई अंग अधिक हो, जो विद्यासे हीन, अवस्थाके बूढ़े, रूप और धनसे रहित तथा जातिसे भी नीच हों, उनपर आक्षेप नहीं करना चाहिये ॥

शपता यत् कृतं पुण्यं शप्यमानं तु गच्छति ।

शप्यमानस्य यत् पापं शपन्तमनुगच्छति ॥

क्योंकि आक्षेप करनेवाले मनुष्यका पुण्य, जिसका आक्षेप किया जाता है, उसके पास चला जाता है और उसका पाप आक्षेप करनेवालेके पास चला आता है ॥

नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् ।

द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं विवर्जयेत् ॥

नास्तिकता, वेदोंकी निन्दा, देवताओंपर दोषारोपण, द्वेष, दम्भ, अभिमान, क्रोध तथा कठोरता – इनका परित्याग कर देना चाहिये ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 2198

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2198 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन ] युधिष्ठिर उवाच

कथं तद् ब्राह्मणैर्देव होतव्यं क्षत्रियैः कथम् ।

वैश्यैर्वा देवदेवेश कथं वा सुहुतं भवेत् ॥

युधिष्ठिरने पूछा – देवदेवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको किस प्रकार हवन करना चाहिये? और उनके द्वारा किस प्रकार किया हुआ हवन शुभ होता है? ॥

कत्यग्नयः किमात्मानः स्थानं किं कस्य वा विभो ।

कतरस्मिन् हुते स्थानं कं व्रजेदाग्निहोत्रिकः ॥

विभो! अग्निके कितने भेद हैं? उनके पृथक् -पृथक् स्वरूप क्या हैं? किस अग्निका कहाँ स्थान है? अग्निहोत्री पुरुष किस अग्निमें हवन करके किस लोकको प्राप्त होता है? ॥

अग्निहोत्रनिमित्तं च किमुत्पन्नं पुरानघ ।

कथमेवाथ हूयन्ते प्रीयन्ते च सुराः कथम् ॥

निष्पाप! पूर्वकालमें अग्निहोत्र किसके निमित्तसे उत्पन्न हुआ था? देवताओंके लिये किस प्रकार हवन किया जाता है और कैसे उनकी तृप्ति होती है? ॥

विधिवन्मन्त्रवत् कृत्वा पूजितास्वग्नयः कथम् ।

कां गतिं वदतां श्रेष्ठ नयन्ति ह्यग्निहोत्रिणः ॥

प्रवक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! विधिके अनुसार मन्त्रोंसहित पूजा की जानेपर तीनों अग्नियाँ अग्निहोत्रीको किस प्रकार किस गतिको प्राप्त कराती हैं? ॥

दुर्हुताश्चापि भगवन्नविज्ञातास्त्रयोऽग्नयः ।

किमाहिताग्नेः कुर्वन्ति दुश्चीर्णा वापि केशव ॥

भगवन्! केशव! यदि तीनों अग्नियोंके स्वरूपको न जानकर उनमें अविधिपूर्वक हवन किया जाय अथवा उनकी उपासनामें त्रुटि रह जाय तो वे त्रिविध अग्नि अग्निहोत्रीका क्या अनिष्ट करते हैं? ॥ उत्सन्नाग्निस्तु पापात्मा कां योनिं देव गच्छति । एतत् सर्वं समासेन भक्त्या ह्युपगतस्य मे वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ सर्वाधिक नमोऽस्तु ते ॥ देवेश्वर! जिसने अग्निका परित्याग कर दिया हो, वह पापात्मा किस योनिमें जन्म लेता है? ये सारी बातें संक्षेपमें मुझे सुनाइये; क्योंकि मैं भक्तिभावसे आपकी शरणमें आया हूँ । भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, सबसे महान् हैं; अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् महापुण्यमिदं धर्मामृतं परम् ।

यत् तु तारयते युक्तान् ब्राह्मणानग्निहोत्रिणः ॥

पृष्ठ 2199

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2199 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीभगवान्‌ने कहा— राजन्! इस महान् पुण्यदायक और परम धर्मरूपी अमृतका वर्णन सुनो । यह धर्मपरायण अग्निहोत्री ब्राह्मणोंको भवसागरसे पार कर देता है ॥

ब्रह्मत्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते ।

सृष्टोऽग्निर्मुखतः पूर्वं लोकानां हितकाम्यया ॥

महातेजस्वी महाराज! मैंने सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्मस्वरूपसे सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की और लोगोंकी भलाईके लिये अपने मुखसे सर्वप्रथम अग्निको प्रकट किया ॥

यस्मादग्रे स भूतानां सर्वेषां निर्मितो मया ।

तस्मादग्नीत्यभिहितः पुराणज्ञैर्मनीषिभिः ॥

इस प्रकार अग्नि- तत्त्व मेरे द्वारा सब भूतोंके पहले उत्पन्न किया गया है, इसलिये पुराणोंके ज्ञाता मनीषी विद्वान् उसे अग्नि कहते हैं ॥

यस्मात् तु सर्वकृत्येषु पूर्वमस्मै प्रदीयते ।

आहुतिर्दीप्यमानाय तस्मादग्नीति कथ्यते ॥

समस्त कार्योंमें सबसे आगे प्रज्वलित आगमें ही आहुति दी जाती है, इसलिये यह अग्नि कहा जाता है ॥

यस्माच्च तु नयत्यग्रां गतिं विप्रान् सुपूजितः ।

तस्माच्च नयनाद् राजन् देवेष्वग्नीति कथ्यते ॥

राजन्! यह भलीभाँति पूजित होनेपर ब्राह्मणोंको अग्र्यगति ( परमपद ) - की प्राप्ति कराता है, इसलिये भी देवताओंमें अग्निके नामसे विख्यात है ॥

यस्माच्च दुर्हतः सोऽयमलं भक्षयितुं क्षणात् ।

यजमानं नरश्रेष्ठ क्रव्यादोऽग्निस्ततः स्मृतः ॥

सर्वभूतात्मको राजन् देवानामेष वै मुखम् । नरोत्तम! यदि इसमें विधिका उल्लङ्घन करके हवन किया जाय तो यह एक क्षणमें ही यजमानको खा जानेकी शक्ति रखता है, इसलिये अग्निको क्रव्याद कहा गया है । राजन्! यह अग्नि सम्पूर्ण भूतोंका स्वरूप और देवताओंका मुख है ॥

तेन सप्तर्षयः सिद्धाः संयतेन्द्रियबुद्धयः ।

गता ह्यमरसायुज्यं ते ह्यग्न्यर्चनतत्पराः ॥

अतः इन्द्रियों और मन- बुद्धिपर संयम रखनेवाले सिद्ध सप्तर्षिगण अग्निकी आराधनामें तत्पर रहनेके कारण ही देवताओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं ॥

अग्निहोत्रप्रकारं च शृणु राजन् समाहितः ।

त्रयाणां गुणनामानि वह्नीनामुच्यते मया ॥

राजन्! अब एकाग्रचित्त होकर अग्निहोत्रका प्रकार सुनो । अब मैं तीनों अग्नियोंके गुणके अनुसार नाम बता रहा हूँ ॥ गृहाणां हि पतित्वं हि गृहपत्यमिति स्मृतम् ।

पृष्ठ 2200

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2200 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गृहपत्यं तु यस्यासीत् तत् तस्माद् गार्हपत्यता ॥ गृहोंका आधिपत्य ही गृहपत्य माना गया है। यह गृहपत्य जिस अग्निमें प्रतिष्ठित है, वही ‘ गार्हपत्य अग्नि' के नामसे प्रसिद्ध है ॥

यजमानं तु यस्मात् तु दक्षिणां तु गतिं नयेत् ।

दक्षिणाग्निं तमाहुस्ते दक्षिणायतनं द्विजाः ॥

जो अग्नि यजमानको दक्षिण मार्गसे स्वर्गमें ले जाता है, उस दक्षिणमें रहनेवाले अग्निको ब्राह्मणलोग ' दक्षिणाग्नि' कहते हैं ॥

आहुतिः सर्वमाख्याति हव्यं वै वहनं स्मृतम् ।

सर्वहव्यवहो वह्निर्गतश्चाहवनीयताम् ॥

' आहुति' शब्द सर्वका वाचक है और हवन नाम ही है हव्यका । सब प्रकारके हव्यको स्वीकार करनेवाला वह्नि ' आहवनीय अग्नि' कहलाता है ॥

ब्रह्मा च गार्हपत्योऽग्निस्तस्मिन्नेव हि सोऽभवत् ।

दक्षिणाग्निस्त्वयं रुद्रः क्रोधात्मा चण्ड एव सः ॥

गार्हपत्य अग्नि ब्रह्माका स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्माजीसे ही उसका प्रादुर्भाव हुआ है और यह दक्षिणाग्नि रुद्रस्वरूप है, क्योंकि वह क्रोधरूप और प्रचण्ड है ॥ अहमाहवनीयोऽग्निराहोमाद् यस्य वै मुखे । होमके आरम्भसे लेकर अन्ततक जिसके मुखमें आहुति डाली जाती है, वह आहवनीय अग्नि स्वयं मैं हूँ ॥

पृथिवीमन्तरिक्षं च दिवमृषिगणैः सह ।

जयत्याहवनीयं यो जुहुयाद् भक्तिमान् नरः ॥

जो मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे प्रतिदिन आहवनीय अग्निमें हवन करता है, वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष और ऋषियों सहित स्वर्गलोकपर भी अधिकार प्राप्त कर लेता है ॥

आभिमुख्येन होमस्तु यस्य यज्ञेषु वर्तते ।

तेनाप्याहवनीयत्वं गतो वह्निर्महाद्युतिः ॥

यज्ञोंमें सब ओरसे अग्निके मुखमें हवन किया जाता है, इसलिये वह अत्यन्त कान्तिमान् अग्नि ‘ आहवनीय' संज्ञाको प्राप्त होता है ॥

आहोमादग्निहोत्रेषु यज्ञैर्वा यत्र सर्वशः ।

यस्मात् तस्मात् प्रवर्तन्ते ततो ह्याहवनीयता ॥

अग्निहोत्र अथवा अन्यान्य यज्ञोंमें होमके आरम्भसे ही अग्निके भीतर सब प्रकारसे आहुति डाली जाती है, इसलिये भी उसे आहवनीय कहते हैं ॥

आध्यात्मिकं चाधिदैवमाधिभौतिकमेव च ।

एतत् तापत्रयं प्रोक्तमात्मवद्भिर्नराधिप ॥