06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2201–2210

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2201–2210

पृष्ठ 2201

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नरेश्वर! आत्मवेत्ता विद्वानोंने आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक — ये तीन प्रकारके दुःख बतलाये हैं ॥

यस्माद् वै त्रायते दुःखाद् यजमानं हुतोऽनलः ।

तस्मात् तु विधिवत् प्रोक्तमग्निहोत्रमिति श्रुतौ ॥

विधिवत् होम करनेपर अग्नि इन तीनों प्रकारके दुःखोंसे यजमानका त्राण करता है, इसलिये उस कर्मको वेदमें अग्निहोत्र नाम दिया गया है ॥

तदग्निहोत्रं सृष्टं वै ब्राह्मणा लोककर्तृणा ।

वेदाश्चाप्यग्निहोत्रं तु जज्ञिरे स्वयमेव तु ॥

विश्वविधाता ब्रह्माजीने ही सबसे पहले अग्निहोत्रको प्रकट किया । वेद और अग्निहोत्र स्वतः उत्पन्न हुए हैं ॥

अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ।

रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ॥

वेदाध्ययनका फल अग्निहोत्र है ( अर्थात् वेद पढ़कर जिसने अग्निहोत्र नहीं किया, उसका वह अध्ययन निष्फल है ) । शास्त्रज्ञानका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्र है तथा धनकी सफलता दान और उपभोग करनेमें है ॥

त्रिवेदमन्त्रसंयोगादग्निहोत्रं प्रवर्तते ।

ऋग्यजुः सामभिः पुण्यैः स्थाप्यते सूत्रसंयुतैः ॥

तीनों वेदोंके मन्त्रोंके संयोगसे अग्निहोत्रकी प्रवृत्ति होती है। ऋक्, यजुः और सामवेदके पवित्र मन्त्रों तथा मीमांसासूत्रोंके द्वारा अग्निहोत्र- कर्मका प्रतिपादन किया जाता है ॥ वसन्ते ब्राह्मणस्य स्यादाधेयोऽग्निर्नराधिप । वसन्तो ब्राह्मणो ज्ञेयो वेदयोनिः स उच्यते ॥ नरेश्वर! - वसन्त ऋतुकोत्र ब्राह्मणका स्वरूप समझना चाहिये तथा वह वेदकी योनिरूप है, इसलिये ब्राह्मणको वसन्त ऋतुमें अग्निकी स्थापना करनी चाहिये ॥ अग्न्याधेयं तु येनाथ वसन्ते क्रियतेऽनघ । तस्य श्रीर्ब्रह्मवृद्धिश्च ब्राह्मणस्य विवर्धते । निष्पाप! जो वसन्त- ऋतुमें अग्न्याधान करता है, उस ब्राह्मणकी श्रीवृद्धि होती है तथा उसका वैदिक ज्ञान भी बढ़ता है ॥ क्षत्रियस्याग्निराधेयो ग्रीष्मे श्रेष्ठः स वै नृप ।

येनाधानं तु वै ग्रीष्मे क्रियते तस्य वर्धते ।

श्रीः प्रजाः पशवश्चैव वित्तं तेजो बलं यशः ॥

राजन्! क्षत्रियके लिये ग्रीष्म ऋतुमें अग्न्याधान करना श्रेष्ठ माना गया है । जो क्षत्रिय ग्रीष्म-ऋतुमें अग्नि- स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, पशु, धन, तेज, बल और

पृष्ठ 2202

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यशकी अभिवृद्धि होती है ॥

शरदृतौ तु वैश्यस्य ह्याधानीयो हुताशनः ।

शरद्रात्रं स्वयं वैश्यो वैश्ययोनिः स उच्यते ॥

शरत्कालकी रात्रि साक्षात् वैश्यका स्वरूप है, इसलिये वैश्यको शरद् ऋतुमें अग्निका आधान करना चाहिये; उस समयकी स्थापित की हुई अग्निको वैश्य योनि कहते हैं ॥

शरद्याधानमेवं वै क्रियते येन पाण्डव ।

तस्यापि श्रीः प्रजायुश्च पशवोऽर्थश्च वर्धते ॥

पाण्डुनन्दन! जो वैश्य शरद् ऋतुमें अग्निकी स्थापना करता है, उसकी सम्पत्ति, प्रजा, आयु, पशु और धनकी वृद्धि होती है ॥

रसाः स्नेहास्तथा गन्धा रत्नानि मणयस्तथा ।

काञ्चनानि च लौहानि ह्यग्निहोत्रकृतेऽभवन् ॥

सब प्रकारके रस, घी आदि स्निग्ध पदार्थ, सुगन्धित द्रव्य, रत्न, मणि, सुवर्ण और लोहा — इन सबकी उत्पत्ति अग्निहोत्रके लिये ही है ॥

आयुर्वेदो धनुर्वेदो मीमांसा न्यायविस्तरः ।

धर्मशास्त्रं च तत्सर्वमग्निहोत्रकृते कृतम् ॥

अग्निहोत्रको ही जाननेके लिये आयुर्वेद, धनुर्वेद, मीमांसा, विस्तृत न्याय- शास्त्र और धर्मशास्त्रका निर्माण किया गया है ॥

छन्दः शिक्षा च कल्पश्च तथा व्याकरणानि च ।

शास्त्रं ज्योतिर्निरुक्तं चाप्यग्निहोत्रकृते कृतम् ॥

छन्द, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्यौतिषशास्त्र और निरुक्त भी अग्निहोत्रके लिये ही रचे गये हैं ॥

इतिहासपुराणं च गाथाश्चोपनिषत् तथा ।

आथर्वणानि कर्माणि चाग्निहोत्रकृते कृतम् ॥

इतिहास, पुराण, गाथा, उपनिषद् और अथर्ववेदके कर्म भी अग्निहोत्रके लिये ही हैं ॥

तिथिनक्षत्रयोगानां मुहूर्तकरणात्मकम् ।

कालस्य वेदनार्थं तु ज्योतिर्ज्ञानं पुरानघ ॥

निष्पाप! तिथि, नक्षत्र, योग, मुहूर्त और करणरूप कालका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें ज्यौतिष - शास्त्रका निर्माण हुआ है ॥

ऋग्यजुःसाममन्त्राणां श्लोकतत्त्वार्थचिन्तनात् ।

प्रत्यापत्तिविकल्पानां छन्दोज्ञानं प्रकल्पितम् ॥

ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंके छन्दका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तथा संशय और विकल्पके निराकरणपूर्वक उनका तात्त्विक अर्थ समझनेके लिये छन्दःशास्त्रकी रचना की गयी है ॥

पृष्ठ 2203

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वर्णाक्षरपदार्थानां संधिलिङ्गं प्रकीर्तितम् ।

नामधातुविवेकार्थं पुरा व्याकरणं स्मृतम् ॥

वर्ण, अक्षर और पदोंके अर्थका, संधि और लिङ्गका तथा नाम और धातुका विवेक होनेके लिये पूर्वकालमें व्याकरणशास्त्रकी रचना हुई है ॥

यूपवेद्यध्वरार्थं तु प्रोक्षणश्रपणाय तु ।

यज्ञदैवतयोगर्थं शिक्षाज्ञानं प्रकल्पितम् ॥

यूप, वेदी और यज्ञका स्वरूप जाननेके लिये, प्रोक्षण और श्रपण (चरु पकाना ) आदिकी इतिकर्तव्यताको समझनेके लिये तथा यज्ञ और देवताके सम्बन्धका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शिक्षा नामक वेदांगकी रचना हुई है ॥

यज्ञपात्रपवित्रार्थं द्रव्यसम्भारणाय च ।

सर्वयज्ञविकल्पाय पुरा कल्पं प्रकीर्तितम् ॥

यज्ञके पात्रोंकी शुद्धि, यज्ञसम्बन्धी सामग्रियोंके संग्रह तथा समस्त यज्ञोंके वैकल्पिक विधानोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पूर्वकालमें कल्पशास्त्रका निर्माण किया गया है ||

नामधातुविकल्पानां तत्त्वार्थनियमाय च ।

सर्ववेदनिरुक्तानां निरुक्तमृषिभिः कृतम् ॥

सम्पूर्ण वेदोंमें प्रयुक्त नाम, धातु और विकल्पोंके तात्त्विक अर्थका निश्चय करनेके लिये ऋषियोंने निरुक्तकी रचना की है ॥

वेद्यर्थं पृथिवी सृष्टा सम्भारार्थं तथैव च ।

इध्मार्थमथ यूपार्थं ब्रह्मा चक्रे वनस्पतिम् ॥

यज्ञकी वेदी बनाने तथा अन्य सामग्रियोंको धारण करनेके लिये ब्रह्माजीने पृथ्वीकी सृष्टि की है । समिधा और यूप बनानेके लिये वनस्पतियोंकी रचना की है ॥

गावो यज्ञार्थमुत्पन्ना दक्षिणार्थं तथैव च ।

सुवर्णं रजतं चैव पात्रकुम्भार्थमेव च ॥

गौएँ यज्ञ और दक्षिणाके लिये उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि गोघृत और गोदक्षिणाके बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं होता । सुवर्ण और चाँदी – ये यज्ञके पात्र और कलश बनानेका काम लेनेके लिये पैदा हुए हैं ॥

दर्भाः संस्तरणार्थं तु रक्षसां रक्षणाय च ।

पूजनार्थं द्विजाः सृष्टास्तारका दिवि देवताः ॥

कुशोंकी उत्पत्ति हवनकुण्डके चारों ओर फैलाने और राक्षसोंसे यज्ञकी रक्षा करनेके लिये हुई है । पूजन करनेके लिये ब्राह्मणोंको, नक्षत्रोंको और स्वर्गके देवताओंको उत्पन्न किया गया है ॥

क्षत्रियाः रक्षणार्थं तु वैश्या वार्तानिमित्ततः ।

शुश्रूषार्थं त्रयाणां वै शूद्राः सृष्टाः स्वयम्भुवा ॥

पृष्ठ 2204

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सबकी रक्षाके लिये क्षत्रिय जातिकी सृष्टि की गयी है । कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य आदि जीविकाका साधन जुटानेके लिये वैश्योंकी उत्पत्ति हुई है और तीनों वर्णोंकी सेवाके लिये ब्रह्माजीने शूद्रोंको उत्पन्न किया है ॥

यथोक्तमग्निहोत्राणां शुश्रूषन्ति च ये द्विजाः ।

तैर्दत्तं सहुतं चेष्टं दत्तमध्यापितं भवेत् ॥

जो द्विज विधिपूर्वक अग्निहोत्रका सेवन करते हैं, उनके द्वारा दान, होम, यज्ञ और अध्यापन — ये समस्त कर्म पूर्ण हो जाते हैं ॥

एवमिष्टं च पूर्तं च यद् विप्रैः क्रियते नृप ।

तत् सर्वं सम्यगाहृत्य चादित्ये स्थापयाम्यहम् ॥

राजन्! इसी प्रकार ब्राह्मणोंके द्वारा जो यज्ञ करने, बगीचे लगाने और कुएँ खुदवाने आदिके कार्य होते हैं, उन सबके पुण्यको लेकर मैं सूर्यमण्डलमें स्थापित कर देता हूँ ॥

मया स्थापितमादित्ये लोकस्य सुकृतं हि तत् ।

धारयेद् यत् सहस्रांशुः सुकृतं ह्यग्निहोत्रिणाम् ॥

मेरे द्वारा आदित्यमें स्थापित किये हुए संसारके पुण्य और अग्निहोत्रियोंके सुकृतको सहस्रों किरणोंवाले सूर्यदेव धारण किये रहते हैं ॥

तस्मादप्रोषितैर्नित्यमग्निहोत्रं द्विजातिभिः ।

होतव्यं विधिवद् राजन्नूर्ध्वामिच्छन्ति ये गतिम् ॥

इसलिये राजन्! जो द्विज परदेशमें न रहते हों और ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन विधिपूर्वक अग्निहोत्र करना चाहिये ॥

आत्मवन्नावमन्तव्यमग्निहोत्रं युधिष्ठिर ।

न त्याज्यं क्षणमप्येतदग्निहोत्रं युधिष्ठिर ॥

महाराज युधिष्ठिर! अग्निहोत्रको अपने आत्माके समान समझकर कभी भी उसका अपमान या एक क्षणके लिये भी त्याग नहीं करना चाहिये ॥ बालाहिताग्नयो ये च शूद्रान्नाद् विरताः सदा ।

क्रोधलोभविनिर्मुक्ताः प्रातःस्नानपरायणाः ।

यथोक्तमग्निहोत्रं वै जुह्वते विजितेन्द्रियाः ॥

आतिथेयाः सदा सौम्या द्विकालं मत्परायणाः ।

ते यान्त्यपुनरावृत्तिं भित्त्वा चादित्यमण्डलम् ॥

जो बाल्यकालसे ही अग्निहोत्रका सेवन करते और शूद्रके अन्नसे सदा दूर रहते हैं, जो क्रोध और लोभसे रहित हैं, जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके जितेन्द्रियभावसे विधिवत् अग्निहोत्रका अनुष्ठान करते हैं, सदा अतिथिकी सेवामें लगे रहते हैं तथा शान्तभावसे रहकर दोनों समय मेरे परायण होकर मेरा ध्यान करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर मेरे परम धामको प्राप्त होते हैं, जहाँसे पुनः इस संसारमें नहीं लौटना पड़ता ॥

पृष्ठ 2205

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श्रुतिं केचिन्निन्दमानाः श्रुतिं दूष्यन्त्यबुद्धयः ।

प्रमाणं न च कुर्वन्ति ये यान्तीहापि दुर्गतिम् ॥

इस संसारमें कुछ मूर्ख मनुष्य श्रुतिपर दोषारोपण करते हुए उसकी निन्दा करते हैं तथा उसे प्रमाणभूत नहीं मानते, ऐसे लोगोंकी बड़ी दुर्गति होती है ॥

प्रमाणमितिहासं च वेदान् कुर्वन्ति ये द्विजाः ।

ते यान्त्यमरसायुज्यं नित्यमास्तिक्यबुद्धयः ॥

परंतु जो द्विज नित्य आस्तिक्यबुद्धिसे युक्त होकर वेदों और इतिहासोंको प्रामाणिक मानते हैं, वे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करते हैं ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 2206

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[ चान्द्रायण - व्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन] युधिष्ठिर उवाच

चक्रायुध नमस्तेऽस्तु देवेश गरुडध्वज ।

चान्द्रायणविधिं पुण्यमाख्याहि भगवन् मम ॥

युधिष्ठिरने कहा — चक्रधारी देवेश्वर! आपको नमस्कार है । गरुडध्वज भगवन्! अब आप मुझसे चान्द्रायणकी परम पावन विधिका वर्णन कीजिये ॥ श्रीभगवानुवाच

शृणु पाण्डव तत्त्वेन सर्वपापप्रणाशनम् ।

पापिनो येन शुद्ध्यन्ति तत् ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥

श्रीभगवान् बोले- पाण्डुनन्दन! समस्त पापोंका नाश करनेवाले चान्द्रायण- व्रतका यथार्थ वर्णन सुनो । इसके आचरणसे पापी मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं । उसे मैं तुम्हें पूर्णतया बताता हूँ ॥

ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वैश्यो वा चरितव्रतः ।

यथावत् कर्तुकामो वै तस्यैवं प्रथमा क्रिया ॥

शोधयेत् तु शरीरं स्वं पञ्चगव्येन यन्त्रितः ।

सशिरः कृष्णपक्षस्य ततः कुर्वीत वापनम् ॥

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य - जो कोई भी चान्द्रायण-व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करना चाहते हों, उनके लिये पहला काम यह है कि वे नियमके अंदर रहकर पञ्चगव्यके द्वारा समस्त शरीरका शोधन करें। फिर कृष्णपक्षके अन्तमें मस्तकसहित दाढ़ी - मूँछ आदिका मुण्डन करावें ॥

शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा मौञ्जीं बध्नीत मेखलाम् ।

पालाशदण्डमादाय ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥

तत्पश्चात् स्नान करके शुद्ध हो श्वेत वस्त्र धारण करें, कमरमें मूँजकी बनी हुई मेखला बाँधे और पलाशका दण्ड हाथमें लेकर ब्रह्मचारीके व्रतका पालन करते रहें ॥

कृतोपवासः पूर्वं तु शुक्लप्रतिपदि द्विजः ।

नदीसंगमतीर्थेषु शुचौ देशे गृहेऽपि वा ॥

द्विजको चाहिये कि वह पहले दिन उपवास करके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको नदियोंके संगमपर, किसी पवित्र स्थानमें अथवा घरपर ही व्रत आरम्भ करे ॥

आघारावाज्यभागौ च प्रणवं व्याहृतीस्तथा ।

वारुणं चैव पञ्चैव हुत्वा सर्वान् यथाक्रमम् ॥

सत्याय विष्णवे चेति ब्रह्मर्षिभ्योऽथ ब्रह्मणे ।

पृष्ठ 2207

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विश्वेभ्यो हि च देवेभ्यः सप्रजापतये तथा ॥ षडुक्ता जुहुयात् पश्चात् प्रायश्चित्ताहुतिं द्विजः । पहले नित्य - नियमसे निवृत्त होकर एक वेदीपर अग्निकी स्थापना करे और उसमें क्रमशः आघार, आज्यभाग, प्रणव, महाव्याहृति और पञ्चवारुण होम करके सत्य, विष्णु, ब्रह्मर्षिगण, ब्रह्मा, विश्वेदेव तथा प्रजापति– इन छः देवताओंके निमित्त हवन करे । अन्तमें प्रायश्चित्त होम करे ॥ अतः समापयेदग्निं शान्तिं कृत्वाथ पौष्टिकीम् ॥ प्रणम्य चाग्निं सोमं च भस्म धृत्वा यथाविधि ।

नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरुणाय च ।

आदित्याय नमस्कृत्वा ततः स्नायात् समाहितः ॥

फिर शान्ति और पौष्टिक कर्मका अनुष्ठान करके अग्निमें हवनका कार्य समाप्त कर दे । तत्पश्चात् अग्नि तथा सोमदेवताको प्रणाम करे और विधिपूर्वक शरीरमें भस्म लगाकर नदीके तटपर जा विशुद्धचित्त होकर सोम, वरुण तथा आदित्यको प्रणाम करके एकाग्र भावसे जलमें स्नान करे ॥

उत्तीर्योदकमाचम्य चासीनः पूर्वतोमुखः ।

प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रैरभिषेचनम् ॥

इसके बाद बाहर निकलकर आचमन करनेके पश्चात् पूर्वाभिमुख होकर बैठे और प्राणायाम करके कुशकी पवित्रीसे अपने शरीरका मार्जन करे ॥

आचान्तस्त्वभिवीक्षेत ऊर्ध्वबाहुर्दिवाकरम् ।

कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा कुर्याच्चैव प्रदक्षिणम् ॥

फिर आचमन करके दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यका दर्शन करे और हाथ जोड़कर खड़ा हो सूर्यकी प्रदक्षिणा करे ॥

नारायणं वा रुद्रं वा ब्रह्माणमथवापि वा ।

वारुणं मन्त्रसूक्तं वा प्राग्भोजनमथापि वा ॥

उसके बाद भोजनसे पूर्व ही नारायण, रुद्र, ब्रह्मा या वरुणसम्बन्धी सूक्तका पाठ करे ॥ वीरघ्नमृषथं वापि तथा चाप्यघमर्षणम् ।

गायत्री मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत् ततः ।

शतं वाष्टशतं वापि सहस्रमथवा परम् ॥

अथवा वीरघ्न, ऋषभ, अघमर्षण, गायत्री या मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले वैष्णव गायत्री-मन्त्रका जप करे । यह जप सौ बार या एक सौ आठ बार अथवा एक हजार बार करना चाहिये ॥ ततो मध्याह्नकाले वै पायसं यावकं हि वा ।

पृष्ठ 2208

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पाचयित्वा प्रयत्नेन प्रयतः सुसमाहितः ॥ तदनन्तर पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मध्याह्नकालमें यत्नपूर्वक खीर या जौकी लप्सी बनाकर तैयार करे ||

पात्रं तु सुसमादाय सौवर्णं राजतं तु वा ।

ताम्रं वा मृण्मयं वापि औदुम्बरमथापि वा ॥

वृक्षाणां यज्ञियानां तु पर्णैरार्द्रेरकुत्सितैः ।

पुटकेन तु गुप्तेन चरेद् भैक्षं समाहितः ॥

अथवा सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी या गूलरकी लकड़ीका पात्र अथवा यज्ञके लिये उपयोगी वृक्षोंके हरे पत्तोंका दोना बनाकर हाथमें ले ले और उसको ऊपरसे ढक ले । फिर सावधानतापूर्वक भिक्षाके लिये जाय ॥

ब्राह्मणानां गृहाणां तु सप्तानां नापरं व्रजेत् ।

गोदोहमात्रं तिष्ठेत् तु वाग्यतः संयतेन्द्रियः ॥

सात ब्राह्मणोंके घरपर जाकर भिक्षा माँगे, सातसे अधिक घरोंपर न जाय । गौ दुहनेमें जितनी देर लगती है, उतने ही समयतक एक द्वारपर खड़ा होकर भिक्षाके लिये प्रतीक्षा करे, मौन रहे और इन्द्रियोंपर काबू रखे ॥ न हसेन्न च वीक्षेत नाभिभाषेत वा स्त्रियम् ॥ भिक्षा माँगनेवाला पुरुष न तो हँसे, न इधर-उधर दृष्टि डाले और न किसी स्त्रीसे बातचीत करे ॥

दृष्ट्वा मूत्रं पुरीषं वा चाण्डालं वा रजस्वलाम् ।

पतितं च तथा श्वानमादित्यमवलोकयेत् ॥

यदि मल, मूत्र, चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित मनुष्य तथा कुत्तेपर दृष्टि पड़ जाय तो सूर्यका दर्शन करे ॥ ततस्त्वावसथं प्राप्तो भिक्षां निक्षिप्य भूतले ।

प्रक्षाल्य पादावाजान्वोर्हस्तावाकूर्परं पुनः ।

आचम्य वारिणा तेन वह्निं विप्रांश्च पूजयेत् ॥

तदनन्तर अपने निवासस्थानपर आकर भिक्षापात्रको जमीनपर रख दे और पैरोंको घुटनोंतक तथा हाथोंको दोनों कोहनियोंतक धो डाले । इसके बाद जलसे आचमन करके अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करे ॥

पञ्च सप्ताथवा कुर्याद् भागान् भैक्षस्य तस्य वै ।

तेषामन्यतमं पिण्डमादित्याय निवेदयेत् ॥

फिर उस भिक्षाके पाँच या सात भाग करके उतने ही ग्रास बना ले । उनमेंसे एक ग्रास सूर्यको निवेदन करे ॥ ब्रह्मणे चाग्नये चैव सोमाय वरुणाय च ।

पृष्ठ 2209

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विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो दद्यादन्नं यथाक्रमम् ॥ फिर क्रमशः ब्रह्मा, अग्नि, सोम, वरुण तथा विश्वेदेवोंको एक-एक ग्रास दे ॥ अवशिष्टमथैकं तु वक्त्रमात्रं प्रकल्पयेत् । अन्तमें जो एक ग्रास बच जाय, उसको ऐसा बना ले, जिससे वह सुगमतापूर्वक मुँहमें आ सके ॥

अङ्गुल्यग्रे स्थितं पिण्डं गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ।

अङ्गुलीभिस्त्रिभिः पिण्डं प्राश्नीयात् प्राङ्मुखः शुचिः ॥

फिर पवित्र भावसे पूर्वाभिमुख होकर उस ग्रासको दाहिने हाथकी अंगुलियोंके अग्रभागपर रखकर गायत्री मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे और तीन अंगुलियोंसे ही उसे मुँहमें डालकर खा जाय ॥

यथा च वर्धते सोमो हसते च यथा पुनः ।

तथा पिण्डाश्च वर्धन्ते हसन्ते च दिने दिने ॥

जैसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमें प्रतिदिन बढ़ता है और कृष्णपक्षमें प्रतिदिन घटता रहता है, उसी प्रकार ग्रासोंकी मात्रा भी शुक्लपक्षमें बढ़ती है और कृष्णपक्षमें घटती रहती है ॥ *

त्रिकालं स्नानमस्योक्तं द्विकालमथवा सकृत् ।

ब्रह्मचारी सदा वापि न च वस्त्रं प्रपीडयेत् ॥

चान्द्रायण - व्रत करनेवालेके लिये प्रतिदिन तीन समय, दो समय अथवा एक समय भी स्नान करनेका विधान मिलता है । उसे सदा ब्रह्मचारी रहना चाहिये और तर्पणके पूर्व वस्त्र नहीं निचोड़ना चाहिये ॥

स्थाने न दिवसं तिष्ठेद् रात्रौ वीरासनं व्रजेत् ।

भवेत् स्थण्डिलशायी वाप्यथवा वृक्षमूलिकः ॥

दिनमें एक जगह खड़ा न रहे, रातको वीरासनसे बैठे अथवा वेदीपर या वृक्षकी जड़पर सो रहे ॥

वल्कलं यदि वा क्षौमं शाणं कार्पासकं तथा ।

आच्छादनं भवेत् तस्य वस्त्रार्थं पाण्डुनन्दन ॥

पाण्डुनन्दन! उसे शरीर ढकनेके लिये वल्कल, रेशम, सन अथवा कपासका वस्त्र धारण करना चाहिये ॥

एवं चान्द्रायणे पूर्णे मासस्यान्ते प्रयत्नवान् ।

ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या दद्याच्चैव च दक्षिणाम् ॥

इस प्रकार एक महीने बाद चान्द्रायणव्रत पूर्ण होनेपर उद्योग करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे ॥

चान्द्रायणेन चीर्णेन यत् कृतं तेन दुष्कृतम् ।

तत् सर्वं तत्क्षणादेव भस्मीभवति काष्ठवत् ॥

पृष्ठ 2210

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चान्द्रायण- व्रतके आचरणसे मनुष्यके समस्त पाप सूखे काठकी भाँति तुरंत जलकर खाक हो जाते हैं ॥

ब्रह्महत्या च गोहत्या सुवर्णस्तैन्यमेव च ।

भ्रूणहत्या सुरापानं गुरोर्दारव्यतिक्रमः ॥

एवमन्यानि पापानि पातकीयानि यानि च ।

चान्द्रायणेन नश्यन्ति वायुना पांसवो यथा ॥

ब्रह्महत्या, गोहत्या, सुवर्णकी चोरी, भ्रूणहत्या, मदिरापान और गुरु - स्त्री - गमन तथा और भी जितने पाप या पातक हैं, वे चान्द्रायण- व्रतसे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे हवाके वेगसे धूल उड़ जाती है ॥

अनिर्दशाया गोः क्षीरमौष्ट्रमाविकमेव च ।

मृतसूतकयोश्चान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

जिस गौको ब्याये हुए दस दिन भी न हुए हों, उसका दूध तथा ऊँटनी एवं भेड़का दूध पी जानेपर और मरणाशौचका तथा जननाशौचका अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण व्रतका आचरण करे ॥

उपपातकिनश्चान्नं पतितान्नं तथैव च ।

शूद्रस्योच्छेषणं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

उपपातकी तथा पतितका अन्न और शूद्रका जूठा अन्न खा लेनेपर चान्द्रायण- व्रतका आचरण करना चाहिये ॥

आकाशस्थं तु हस्तस्थमधःस्रस्तं तथैव च ।

परहस्तस्थितं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

आकाशमें लटकते हुए वृक्ष आदिके फलोंको, हाथपर रखे हुए, नीचे गिरे हुए तथा दूसरेके हाथपर पड़े हुए अन्नको खा लेनेपर भी चान्द्रायण- व्रत करे ॥

अथाग्रे दिधिषोरन्नं दिधिषूपपतेस्तथा ।

परिवेत्तुस्तथा चान्नं परिवित्तान्नमेव च ॥

कुण्डान्नं गोलकान्नं च देवलान्नं तथैव च ।

तथा पुरोहितस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

बड़ी बहिनके अविवाहित रहते पहले विवाह कर लेनेवाली छोटी बहिनका तथा अपने भाईकी विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवालेका एवं बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाले छोटे भाईका और अविवाहित बड़े भाईका अन्न, कुण्डका, गोलकका और पुजारीका अन्न तथा पुरोहितका अन्न भोजन कर लेनेपर भी चान्द्रायण - व्रत करना चाहिये ॥

सुरासवं विषं सर्पिर्लाक्षा लवणमेव च ।

तैलं चापि च विक्रीणन् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥