06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 221–230
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
पृष्ठ 221
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नमस्यन्ति महाराज वाङ्मनः कर्मभिर्विभुम् ॥ ४०२ ॥
महाराज! विद्याधर, दानव, गुह्यक, राक्षस तथा समस्त चराचर प्राणी मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ॥ ४०२ ॥
पुरस्ताद् धिष्ठितः शर्वो ममासीत् त्रिदशेश्वरः ।
पुरस्ताद् धिष्ठितं दृष्ट्वा ममेशानं च भारत ॥ ४०३ ॥
सप्रजापतिशक्रान्तं जगन्मामभ्युदैक्षत ।
ईक्षितुं च महादेवं न मे शक्तिरभूत् तदा ॥ ४०४ ॥
देवेश्वर शिव मेरे सामने खड़े थे । भारत! मेरे सामने महादेवजीको खड़ा देख प्रजापतियोंसे लेकर इन्द्रतक सारा जगत् मेरी ओर देखने लगा । किंतु उस समय महादेवजीको देखनेकी मुझमें शक्ति नहीं रह गयी थी ॥ ४०३-४०४ ॥
ततो मामब्रवीद् देवः पश्य कृष्ण वदस्व च ।
त्वया ह्याराधितश्चाहं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४०५ ॥
तब भगवान् शिवने मुझसे कहा -' श्रीकृष्ण! मुझे देखो, मुझसे वार्तालाप करो । तुमने पहले भी सैकड़ों और हजारों बार मेरी आराधना की है ॥ ४०५ ॥
त्वत्समो नास्ति मे कश्चित् त्रिषु लोकेषु वै प्रियः ।
शिरसा वन्दिते देवे देवी प्रीता ह्युमा तदा ।
ततोऽहमब्रुवं स्थाणुं स्तुतं ब्रह्मादिभिः सुरैः ॥ ४०६ ॥
‘ तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है । ' जब मैंने मस्तक झुकाकर महादेवजीको प्रणाम किया, तब देवी उमाको बड़ी प्रसन्नता हुई । उस समय मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा प्रशंसित भगवान् शिवसे इस प्रकार कहा ॥ ४०६ ॥
श्रीकृष्ण उवाच नमोऽस्तु ते शाश्वत सर्वयोने ब्रह्माधिपं त्वामृषयो वदन्ति । तपश्च सत्त्वं च रजस्तमश्च त्वामेव सत्यं च वदन्ति सन्तः ॥ ४०७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं— सबके कारणभूत सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है । ऋषि आपको ब्रह्माजीका भी अधिपति बताते हैं । साधु पुरुष आपको ही तप, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण तथा सत्यस्वरूप कहते हैं ॥ ४०७ ॥
त्वं वै ब्रह्मा च रुद्रश्च वरुणोऽग्निर्मनुर्भवः ।
धाता त्वष्टा विधाता च त्वं प्रभुः सर्वतोमुखः ॥ ४०८ ॥
आप ही ब्रह्मा, रुद्र, वरुण, अग्नि, मनु, शिव, धाता, विधाता और त्वष्टा हैं । आप ही सब ओर मुखवाले परमेश्वर हैं ॥ ४०८ ॥
पृष्ठ 222
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्वत्तो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
त्वया सृष्टमिदं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ४० ९ ॥
समस्त चराचर प्राणी आपहीसे उत्पन्न हुए हैं । आपने ही स्थावर- जंगम प्राणियोंसहित इस समस्त त्रिलोकीकी सृष्टि की है ॥ ४० ९ ॥ यानीन्द्रियाणीह मनश्च कृत्स्नं ये वायवः सप्त तथैव चाग्नयः । ये देवसंस्थास्तवदेवताश्च तस्मात् परं त्वामृषयो वदन्ति ॥ ४१० ॥
यहाँ जो - जो इन्द्रियाँ, जो सम्पूर्ण मन, जो समस्त वायु और सात अग्नियाँ * हैं, जो
देवसमुदायके अंदर रहनेवाले स्तवनके योग्य देवता हैं, उन सबसे परे आपकी स्थिति है ।
ऋषिगण आपके विषयमें ऐसा ही कहते हैं ॥ ४१० ॥
वेदाश्च यज्ञाः सोमश्च दक्षिणा पावको हविः ।
यज्ञोपगं च यत् किंचिद् भगवांस्तदसंशयम् ॥ ४११ ॥
वेद, यज्ञ, सोम, दक्षिणा, अग्नि, हविष्य तथा जो कुछ भी यज्ञोपयोगी सामग्री है, वह सब आप भगवान् ही हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४११ ॥
इष्टं दत्तमधीतं च व्रतानि नियमाश्च ये ।
ह्रीः कीर्तिः श्रीर्द्युतिस्तुष्टिः सिद्धिश्चैव तदर्पणी ॥ ४१२ ॥
यज्ञ, दान, अध्ययन, व्रत और नियम, लज्जा, कीर्ति, श्री, द्युति, तुष्टि तथा सिद्धि —ये सब आपके स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाले हैं ॥ ४१२ ॥
कामः क्रोधो भयं लोभो मदः स्तम्भोऽथ मत्सरः ।
आधयो व्याधयश्चैव भगवंस्तनवस्तव ॥ ४१३ ॥
भगवन्! काम, क्रोध, भय, लोभ, मद, स्तब्धता, मात्सर्य, आधि और व्याधि– ये सब आपके ही शरीर हैं ॥
कृतिर्विकारः प्रणयः प्रधानं बीजमव्ययम् ।
मनसः परमा योनिः प्रभावश्चापि शाश्वतः ॥ ४१४ ॥
क्रिया, विकार, प्रणय, प्रधान, अविनाशी बीज, मनका परम कारण और सनातन प्रभाव – ये भी आपके ही स्वरूप हैं ॥ ४१४ ॥
अव्यक्तः पावनोऽचिन्त्यः सहस्रांशुर्हिरण्मयः ।
आदिर्गणानां सर्वेषां भवान् वै जीविताश्रयः ॥ ४१५ ॥
अव्यक्त, पावन, अचिन्त्य, हिरण्मय सूर्यस्वरूप आप ही समस्त गणोंके आदिकारण तथा जीवनके आश्रय हैं ॥ ४१५ ॥
महानात्मा मतिर्ब्रह्मा विश्वः शम्भुः स्वयम्भुवः ।
बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च संवित् ख्यातिर्धृतिःस्मृतिः ॥ ४१६ ॥
पृष्ठ 223
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते ।
त्वां बुद्ध्वा ब्राह्मणो वेदात् प्रमोहं विनियच्छति ॥ ४१७ ॥
महान्, आत्मा, मति, ब्रह्मा, विश्व, शम्भु, स्वयम्भू, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, संवित्, ख्याति, धृति और स्मृति– इन चौदह पर्यायवाची शब्दोंद्वारा आप परमात्मा ही प्रकाशित होते हैं। वेदसे आपका बोध प्राप्त करके ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण मोहका सर्वथा नाश कर देता ||
हृदयं सर्वभूतानां क्षेत्रज्ञस्त्वमृषिस्तुतः ।
सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ॥ ४१८ ॥
ऋषियोंद्वारा प्रशंसित आप ही सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें स्थित क्षेत्रज्ञ हैं । आपके सब ओर हाथ - पैर हैं । सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं ॥ ४१८ ॥
सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ।
फलं त्वमसि तिग्मांशोर्निमेषादिषु कर्मसु ॥ ४१ ९ ॥
आपके सब ओर कान हैं और जगत्में आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं । जीवके आँख मीजने और खोलनेसे लेकर जितने कर्म हैं, उनके फल आप ही हैं ॥ ४१ ९ ॥
त्वं वै प्रभार्चिः पुरुषः सर्वस्य हृदि संश्रितः ।
अणिमा महिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ ४२० ॥
आप अविनाशी परमेश्वर ही सूर्यकी प्रभा और अग्निकी ज्वाला हैं । आप ही सबके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं । अणिमा, महिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियाँ तथा ज्योति भी आप ही हैं ॥ ४२० ॥
त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये ।
ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥ ४२१ ॥
आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है । जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ॥ ४२१ ॥
यस्त्वां ध्रुवं वेदयते गुहाशयं प्रभुं पुराणं पुरुषं च विग्रहम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥ ४२२ ॥
जो आपको अपनी हृदयगुहामें स्थित आत्मा, प्रभु, पुराण- पुरुष, मूर्तिमान् परब्रह्म, हिरण्मय पुरुष और बुद्धिमानोंकी परम गतिरूपमें निश्चित भावसे जानता है, वही बुद्धिमान् लौकिक बुद्धिका उल्लंघन करके परमात्म - भावमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४२२ ॥
विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि पडङ्गं त्वां च मूर्तितः ।
प्रधानविधियोगस्थस्त्वामेव विशते बुधः ॥ ४२३ ॥
पृष्ठ 224
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विद्वान् पुरुष महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा- इन सात सूक्ष्म तत्त्वोंको जानकर आपके स्वरूपभूत छः अंगोंका बोध प्राप्त करके प्रमुख विधियोगका आश्रय ले आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥ ४२३ ॥
एवमुक्ते मया पार्थ भवे चार्तिविनाशने ।
चराचरं जगत् सर्वं सिंहनादं तदाकरोत् ॥ ४२४ ॥
कुन्तीनन्दन! जब मैंने सबकी पीड़ाका नाश करनेवाले महादेवजीकी इस प्रकार स्तुति की, तब यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सिंहनाद कर उठा ॥ ४२४ ॥
तं विप्रसंघाश्च सुरासुराश्च नागाः पिशाचाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे महर्षयश्चैव तदा प्रणेमुः ॥ ४२५ ॥
ब्राह्मणोंके समुदाय, देवता, असुर, नाग, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षसगण, समस्त भूतगण तथा महर्षि भी उस समय भगवान् शिवको प्रणाम करने लगे ॥ ४२५ ॥
मम मूर्ध्नि च दिव्यानां कुसुमानां सुगन्धिनाम् ।
राशयो निपतन्ति स्म वायुश्च सुसुखो ववौ ॥ ४२६ ॥
मेरे मस्तकपर ढेर- के - ढेर दिव्य सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होने लगी तथा अत्यन्त सुखदायक हवा चलने लगी ॥ ४२६ ॥
निरीक्ष्य भगवान् देवीं ह्युमां मां च जगद्धितः ।
शतक्रतुं चाभिवीक्ष्य स्वयं मामाह शङ्करः ॥ ४२७ ॥
जगत्के हितैषी भगवान् शंकरने उमादेवीकी ओर देखकर मेरी ओर देखा और फिर इन्द्रपर दृष्टिपात करके स्वयं मुझसे कहा- ॥ ४२७ ॥
विदुः कृष्ण परां भक्तिमस्मासु तव शत्रुहन् ।
क्रियतामात्मनः श्रेयः प्रीतिर्हि त्वयि मे परा ॥ ४२८ ॥
' शत्रुहन् श्रीकृष्ण! मुझमें जो तुम्हारी पराभक्ति है, उसे सब लोग जानते हैं, अब तुम अपना कल्याण करो; क्योंकि तुम्हारे ऊपर मेरा विशेष प्रेम है ॥ ४२८ ॥
वृणीष्वाष्टौ वरान् कृष्ण दातास्मि तव सत्तम ।
ब्रूहि यादवशार्दूल यानिच्छसि सुदुर्लभान् ॥ ४२ ९ ॥
' सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! यदुकुलसिंह श्रीकृष्ण! मैं तुम्हें आठ वर देता हूँ । तुम जिन परम दुर्लभ वरोंको पाना चाहते हो, उन्हें बताओ ' ॥ ४२ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
पृष्ठ 225
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वका आख्यानविषयक चौदहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १४ ॥
( दाक्षिणात्य पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ४३३ श्लोक हैं) * गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य - ये पाँच वैदिक अग्नियाँ हैं । स्मार्त छठी और लौकिक सातवीं अग्नि है । * सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति और अनन्त शक्ति— ये महेश्वरके स्वरूपभूत छ: अङ्ग बताये गये हैं ।
पृष्ठ 226
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चदशोऽध्यायः शिव और पार्वतीका श्रीकृष्णको वरदान और उपमन्युके द्वारा महादेवजीकी महिमा श्रीकृष्णउवाच
मूर्ध्ना निपत्य नियतस्तेजःसंनिचये ततः ।
परमं हर्षमागत्य भगवन्तमथाब्रुवम् ॥ १ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं— भारत! तदनन्तर मनको वशमें करके तेजोराशिमें स्थित महादेवजीको मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर बड़े हर्षमें भरकर मैंने उन भगवान् शिवसे कहा- ॥ १ ॥
धर्मे दृढत्वं युधि शत्रुघातं यशस्तथाग्रयं परमं बलं च । योगप्रियत्वं तव संनिकर्षं वृणे सुतानां च शतं शतानि ॥ २ ॥
‘ धर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थिति, युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेकी क्षमता, श्रेष्ठ यश, उत्तम बल, योगबल, सबका प्रिय होना, आपका सांनिध्य तथा दस हजार पुत्र – ये ही आठ वर मैं माँग रहा हूँ' ॥ २ ॥
एवमस्त्विति तद्द्वाक्यं मयोक्तः प्राह शङ्करः ।
ततो मां जगतो माता धारिणी सर्वपावनी ॥ ३ ॥
उवाचोमा प्रणिहिता शर्वाणी तपसां निधिः ।
दत्तो भगवता पुत्रः साम्बो नाम तवानघ ॥। ४ ॥
मेरे इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकरने कहा, 'एवमस्तु— ऐसा ही हो । ' तब सबका धारण- पोषण करनेवाली सर्वपावनी तपोनिधि रुद्रपत्नी जगदम्बा उमादेवी एकाग्रचित्त होकर बोलीं- ' निष्पाप श्यामसुन्दर! भगवान्ने तुम्हें साम्ब नामक पुत्र दिया है ॥ ३-४ ॥
मत्तोऽप्यष्टौ वरानिष्टान् गृहाण त्वं ददामि ते ।
प्रणम्य शिरसा सा च मयोक्ता पाण्डुनन्दन ॥ ५ ॥
' अब मुझसे भी अभीष्ट आठ वर माँग लो । मैं तुम्हें वे वर प्रदान करती हूँ। ' पाण्डुनन्दन! तब मैंने जगदम्बाके चरणोंमें सिरसे प्रणाम करके उनसे कहा— ॥ ५ ॥
द्विजेष्वकोपं पितृतः प्रसादं शतं सुतानां परमं च भोगम् । कुले प्रीतिं मातृतश्च प्रसादं
पृष्ठ 227
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शमप्राप्तिं प्रवृणे चापि दाक्ष्यम् ॥ ६ ॥
' ब्राह्मणोंपर कभी मेरे मनमें क्रोध न हो । मेरे पिता मुझपर प्रसन्न रहें। मुझे सैकड़ों पुत्र प्राप्त हों । उत्तम भोग सदा उपलब्ध रहें । हमारे कुलमें प्रसन्नता बनी रहे । मेरी माता भी प्रसन्न रहें। मुझे शान्ति मिले और प्रत्येक कार्यमें कुशलता प्राप्त हो – ये आठ वर और माँगता हूँ' ॥ ६ ॥
उमोवाच एवं भविष्यत्यमरप्रभाव नाहं मृषा जातु वदे कदाचित् । भार्यासहस्राणि च षोडशैव तासु प्रियत्वं च तथाक्षयं च ॥ ७ ॥
प्रीतिं चाग्रयां बान्धवानां सकाशाद् ददामि तेऽहं वपुषः काम्यतां च । भोक्ष्यन्ते वै सप्ततिं वै शतानि गृहे तुभ्यमतिथीनां च नित्यम् ॥ ८ ॥
भगवती उमाने कहा - अमरोंके समान प्रभावशाली श्रीकृष्ण! ऐसा ही होगा । मैं कभी झूठ नहीं बोलती हूँ । तुम्हें सोलह हजार रानियाँ होंगी । उनका तुम्हारे प्रति प्रेम रहेगा । तुम्हें अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति होगी । बन्धु- बान्धवोंकी ओरसे तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त होगी । मैं तुम्हारे इस शरीरके सदा कमनीय बने रहनेका वर देती हूँ और तुम्हारे घरमें प्रतिदिन सात हजार अतिथि भोजन करेंगे * ॥ ७-८ ॥ वासुदेव उवाच
एवं दत्त्वा वरान् देवो मम देवी च भारत ।
अन्तर्हितः क्षणे तस्मिन् सगणो भीमपूर्वज ॥ ९ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- भरतनन्दन! भीमसेनके बड़े भैया! इस प्रकार महादेवजी तथा देवी पार्वती मुझे वरदान देकर अपने गणोंके साथ उसी क्षण अन्तर्धान हो गये ॥ ९ ॥
एतदत्यद्भुतं पूर्वं ब्राह्मणायातितेजसे ।
उपमन्यवे मया कृत्स्नं व्याख्यातं पार्थिवोत्तम ।
नमस्कृत्वा तु स प्राह देवदेवाय सुव्रत ॥ १० ॥
नृपश्रेष्ठ! यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त मैंने पहले महातेजस्वी ब्राह्मण उपमन्युको पूर्णरूपसे बताया था । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! उपमन्युने देवाधिदेव महादेवजीको नमस्कार करके इस प्रकार कहा ॥ १० ॥
पृष्ठ 228
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपमन्युरुवाच
नास्ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गतिः ।
नास्ति शर्वसमो दाने नास्ति शर्वसमो रणे ॥ ११ ॥
उपमन्यु बोले — महादेवजीके समान कोई देवता नहीं है । महादेवजीके समान कोई गति नहीं है । दानमें शिवजीकी समानता करनेवाला कोई नहीं है तथा युद्धमें भी भगवान् शंकरके समान दूसरा कोई वीर नहीं है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहन (इन्द्ररूपधारी महादेव)-की महिमाके प्रतिपादक पर्वकी कथामें पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
* यहाँ श्रीकृष्णके माँगे हुए आठ वरोंको एवं ' भविष्यति' इस वाक्यके द्वारा देनेके पश्चात् पार्वतीजी अपनी ओरसे आठ वर और देती हैं । इनमें ‘ अमरप्रभाव ' इस सम्बोधनके द्वारा देवोपम प्रभावका दान ही पहला वरदान सूचित किया गया है । ‘ मैं कभी झूठ नहीं बोलती' इस कथनके द्वारा ' तुम भी कभी झूठ नहीं बोलोगे ' यह दूसरा वर सूचित होता है । सोलह हजार रानियोंके प्राप्त होनेका वर तीसरा है । उनका प्रिय होना चौथा वर है । अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति पाँचवाँ वर है । बान्धवोंकी प्रीति छठा, शरीरकी कमनीयता सातवाँ और सात हजार अतिथियोंका भोजन आठवाँ वर है । इससे पहले जो सोलह और आठ वरके प्राप्त होनेकी बात कही गयी थी, उसकी संगति लग जाती है ।
पृष्ठ 229
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
षोडशोऽध्यायः उपमन्यु - श्रीकृष्ण - संवाद - महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल उपमन्युरुवाच
ऋषिरासीत् कृते तात तण्डिरित्येव विश्रुतः ।
दशवर्षसहस्राणि तेन देवः समाधिना ॥ १ ॥
आराधितोऽभूद् भक्तेन तस्योदर्कं निशामय ।
स दृष्टवान् महादेवमस्तौषीच्च स्तवैर्विभुम् ॥ २ ॥
उपमन्यु कहते हैं — तात! सत्ययुगमें तण्डि नामसे विख्यात एक ऋषि थे जिन्होंने भक्तिभावसे ध्यानके द्वारा दस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना की थी । उन्हें जो फल प्राप्त हुआ था, उसे बता रहा हूँ, सुनिये । उन्होंने महादेवजीका दर्शन किया और स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुकी स्तुति की ॥ १-२ ॥
इति तण्डिस्तपोयोगात् परमात्मानमव्ययम् ।
चिन्तयित्वा महात्मानमिदमाह सुविस्मितः ॥ ३ ॥
इस तरह तण्डिने तपस्यामें संलग्न होकर अविनाशी परमात्मा महामना शिवका चिन्तन करके अत्यन्त विस्मित हो इस प्रकार कहा था— ॥ ३ ॥
यं पठन्ति सदा सांख्याश्चिन्तयन्ति च योगिनः ।
परं प्रधानं पुरुषमधिष्ठातारमीश्वरम् ॥ ४ ॥
उत्पत्तौ च विनाशे च कारणं यं विदुर्बुधाः ।
देवासुरमुनीनां च परं यस्मान्न विद्यते ॥ ५ ॥
अजं तमहमीशानमनादिनिधनं प्रभुम् ।
अत्यन्तसुखिनं देवमनघं शरणं व्रजे ॥ ६ ॥
‘ सांख्यशास्त्रके विद्वान् पर, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदा जिनका गुणगान करते हैं, योगीजन जिनके चिन्तनमें लगे रहते हैं, विद्वान् पुरुष जिन्हें जगत्की उत्पत्ति और विनाशका कारण समझते हैं, देवताओं, असुरों और मुनियोंमें भी जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, उन अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनघ और अत्यन्त सुखी, प्रभावशाली ईश्वर महादेवजीकी मैं शरण लेता हूँ' ॥ ४-६ ॥
एवं ब्रुवन्नेव तदा ददर्श तपसां निधिम् ।
तमव्ययमनौपम्यमचिन्त्यं शाश्वतं ध्रुवम् ॥ ७ ॥
निष्कलं सकलं ब्रह्म निर्गुणं गुणगोचरम् ।
पृष्ठ 230
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
योगिनां परमानन्दमक्षरं मोक्षसंज्ञितम् ॥ ८ ॥
इतना कहते ही तण्डिने उन तपोनिधि, अविकारी, अनुपम, अचिन्त्य, शाश्वत, ध्रुव, निष्कल, सकल, निर्गुण एवं सगुण ब्रह्मका दर्शन प्राप्त किया, जो योगियोंके परमानन्द, अविनाशी एवं मोक्षस्वरूप हैं ॥ ७-८ ॥
मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् ।
अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम् ॥ ९ ॥
वे ही मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माजीकी भी गति हैं । मन और इन्द्रियोंके द्वारा उनका ग्रहण नहीं हो सकता । वे अग्राह्य, अचल, शुद्ध, बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य तथा मनोमय हैं ॥ ९ ॥
दुर्विज्ञेयमसंख्येयं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।
योनिं विश्वस्य जगतस्तमसः परतः परम् ॥ १० ॥
उनका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है । वे अप्रमेय हैं । जिन्होंने अपने अन्तःकरणको पवित्र एवं वशीभूत नहीं किया है, उनके लिये वे सर्वथा दुर्लभ हैं । वे ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं । अज्ञानमय अन्धकारसे अत्यन्त परे हैं ॥ १० ॥
यः प्राणवन्तमात्मानं ज्योतिर्जीवस्थितं मनः ।
तं देवं दर्शनाकाङ्क्षी बहून् वर्षगणानृषिः ॥ ११ ॥
तपस्युग्रे स्थितो भूत्वा दृष्ट्वा तुष्टाव चेश्वरम् ॥
जो देवता अपनेको प्राणवान्—जीवस्वरूप बनाकर उसमें मनोमय ज्योति बनकर स्थित हुए थे, उन्हींके दर्शनकी अभिलाषासे तण्डि मुनि बहुत वर्षोंतक उग्र तपस्यामें लगे रहे । जब उनका दर्शन प्राप्त कर लिया तब उन मुनीश्वरने जगदीश्वर शिवकी इस प्रकार स्तुति की ॥ ११ ॥
तण्डिरुवाच पवित्राणां पवित्रस्त्वं गतिर्गतिमतां वर ॥ १२ ॥
अत्युग्रं तेजसां तेजस्तपसां परमं तपः । तण्डिने कहा — सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर! आप पवित्रोंमें भी परम पवित्र तथा गतिशील प्राणियोंकी उत्तम गति हैं । तेजोंमें अत्यन्त उग्र तेज और तपस्याओंमें उत्कृष्ट तप हैं ॥ १२३ || विश्वावसुहिरण्याक्षपुरुहूतनमस्कृत ॥ १३ ॥
भूरिकल्याणद विभो परं सत्यं नमोऽस्तु ते । गन्धर्वराज विश्वावसु, दैत्यराज हिरण्याक्ष और देवराज इन्द्र भी आपकी वन्दना करते हैं । सबको महान् कल्याण प्रदान करनेवाले प्रभो! आप परम सत्य हैं । आपको नमस्कार है ॥ १३३ ॥