06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 211–220

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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योगेश्वर नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वसम्भव । भगवन्! देव! आपको नमस्कार है । भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है । योगेश्वर! आपको नमस्कार है । विश्वकी उत्पत्तिके कारण! आपको नमस्कार है ॥ ३२७३ ॥

प्रसीद मम भक्तस्य दीनस्य कृपणस्य च ॥ ३२८ ॥

अनैश्वर्येण युक्तस्य गतिर्भव सनातन ।

सनातन परमेश्वर! आप मुझ दीन-दुःखी भक्तपर प्रसन्न होइये । मैं ऐश्वर्यसे रहित हूँ ।

आप ही मेरे आश्रयदाता हों ॥ ३२८३ ॥

यच्चापराधं कृतवानज्ञात्वा परमेश्वर ॥ ३२ ९ ॥

मद्भक्त इति देवेश तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि । परमेश्वर देवेश! मैंने अनजानमें जो अपराध किये हों, वह सब यह समझकर क्षमा कीजिये कि यह मेरा अपना ही भक्त है ॥ ३२ ९ ३ ॥ मोहितश्चास्मि देवेश त्वया रूपविपर्ययात् ॥ ३३० ॥

नार्घ्यं ते न मया दत्तं पाद्यं चापि महेश्वर । देवेश्वर! आपने अपना रूप बदलकर मुझे मोहमें डाल दिया । महेश्वर! इसीलिये न तो मैंने आपको अर्घ्य दिया और न पाद्य ही समर्पित किया ॥ ३३० ॥

एवं स्तुत्वाहमीशानं पाद्यमर्घ्यं च भक्तितः । ३३१ ॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा सर्वं तस्मै न्यवेदयम् । इस प्रकार भगवान् शिवकी स्तुति करके मैंने उन्हें भक्तिभावसे पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया। फिर दोनों हाथ जोड़कर उन्हें अपना सब कुछ समर्पित कर दिया ॥ ३३१३ ॥

ततः शीताम्बुसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विता ॥ ३३२ ॥

पुष्पवृष्टिः शुभा तात पपात मम मूर्धनि ।

दुन्दुभिश्च तदा दिव्यस्ताडितो देवकिङ्करैः ।

ववौ च मारुतः पुण्यः शुचिगन्धः सुखावहः ॥ ३३३ ॥

तात! तदनन्तर मेरे मस्तकपर शीतल जल और दिव्य सुगन्धसे युक्त फूलोंकी शुभ वृष्टि होने लगी । उसी समय देवकिङ्करोंने दिव्य दुन्दुभि बजाना आरम्भ किया और पवित्र गन्धसे युक्त पुण्यमयी सुखद वायु चलने लगी ॥ ३३२-३३३ ॥

ततः प्रीतो महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः ।

अब्रवीत् त्रिदशांस्तत्र हर्षयन्निव मां तदा ॥ ३३४ ॥

तब पत्नीसहित प्रसन्न हुए वृषभध्वज महादेवजीने मेरा हर्ष बढ़ाते हुए - से वहाँ सम्पूर्ण देवताओंसे कहा– ||

पश्यध्वं त्रिदशाः सर्वे उपमन्योर्महात्मनः ।

मयि भक्तिं परां नित्यमेकभावादवस्थिताम् ॥ ३३५ ॥

पृष्ठ 212

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‘ देवताओ! तुम सब लोग देखो कि महात्मा उपमन्युकी मुझमें नित्य एकभावसे बनी रहनेवाली कैसी उत्तम भक्ति है ' ॥ ३३५ ॥

एवमुक्तास्तदा कृष्ण सुरास्ते शूलपाणिना ।

ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे नमस्कृत्वा वृषध्वजम् ॥ ३३६ ॥

श्रीकृष्ण! शूलपाणि महादेवजीके ऐसा कहनेपर वे सब देवता हाथ जोड़ उन वृषभध्वज शिवजीको नमस्कार करके बोले – ॥ ३३६ ॥

भगवन् देवदेवेश लोकनाथ जगत्पते ।

लभतां सर्वकामेभ्यः फलं त्वत्तो द्विजोत्तमः ॥ ३३७ ॥

‘ भगवन्! देवदेवेश्वर! लोकनाथ! जगत्पते! ये द्विजश्रेष्ठ उपमन्यु आपसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंके अनुसार अभीष्ट फल प्राप्त करें' ॥ ३३७ ॥

एवमुक्तस्ततः शर्वः सुरैर्ब्रह्मादिभिस्तथा ।

आह मां भगवानीशः प्रहसन्निव शंकरः ॥ ३३८ ॥

ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवताओंके ऐसा कहनेपर सबके ईश्वर और कल्याणकारी भगवान् शिवने मुझसे हँसते हुए- से कहा ॥ ३३८ ॥

श्रीभगवानुवाच

वत्सोपमन्यो तुष्टोऽस्मि पश्य मां मुनिपुङ्गव ।

दृढभक्तोऽसि विप्रर्षे मया जिज्ञासितो ह्यसि ॥ ३३ ९ ॥

भगवान् शिवजी बोले - वत्स उपमन्यो! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ । मुनिपुङ्गव! तुम मेरी ओर देखो । ब्रह्मर्षे! मुझमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति है । मैंने तुम्हारी परीक्षा कर ली है ॥ ३३ ९ ॥

अनया चैव भक्त्या ते अत्यर्थं प्रीतिमानहम् ।

तस्मात् सर्वान् ददाम्यद्य कामांस्तव यथेप्सितान् ॥ ३४० ॥

तुम्हारी इस भक्तिसे मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है, अतः मैं तुम्हें आज तुम्हारी सभी मनोवाञ्छित कामनाएँ पूर्ण किये देता हूँ ॥ ३४० ॥

एवमुक्तस्य चैवाथ महादेवेन धीमता ।

हर्षादश्रूण्यवर्तन्त रोमहर्षस्त्वजायत ॥ ३४१ ॥

परम बुद्धिमान् महादेवजीके इस प्रकार कहनेपर मेरे नेत्रोंसे हर्षके आँसू बहने लगे और सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया ॥ ३४१ ॥

अब्रुवं च तदा देवं हर्षगद्गदया गिरा ।

जानुभ्यामवनीं गत्वा प्रणम्य च पुनः पुनः ॥ ३४२ ॥

तब मैंने धरतीपर घुटने टेककर भगवान्‌को बारंबार प्रणाम किया और हर्षगद्गद वाणीद्वारा महादेवजीसे इस प्रकार कहा- ॥ ३४२ ॥

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अद्यजातो ह्यहं देव सफल जन्म चाद्य मे ।

सुरासुरगुरुर्देवो यत् तिष्ठति ममाग्रतः ॥ ३४३

'देव! आज ही मैंने वास्तवमें जन्म ग्रहण किया है । आज मेरा जन्म सफल हो गया; क्योंकि इस समय मेरे सामने देवताओं और असुरोंके गुरु आप साक्षात् महादेवजी खड़े हैं ॥ ३४३ ॥

यं न पश्यन्ति चैवाद्धा देवा ह्यमितविक्रमम् ।

तमहं दृष्टवान् देवं कोऽन्यो धन्यतरो मया ॥ ३४४ ॥

‘जिन अमित पराक्रमी महादेवजीको देवता भी सुगमतापूर्वक देख नहीं पाते हैं उन्हींका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन मिला है; अतः मुझसे बढ़कर धन्यवादका भागी दूसरा कौन हो सकता है? ॥ ३४४ ॥

एवं ध्यायन्ति विद्वांसः परं तत्त्वं सनातनम् ।

तद् विशेषमिति ख्यातं यदजं ज्ञानमक्षरम् ॥ ३४५ ॥

' अजन्मा, अविनाशी, ज्ञानमय तथा सर्वश्रेष्ठ रूपसे विख्यात जो सनातन परम तत्त्व है, उसका ज्ञानी पुरुष इसी रूपमें ध्यान करते हैं ( जैसा कि आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ) ॥ ३४५ ॥

स एष भगवान् देवः सर्वसत्त्वादिरव्ययः ।

सर्वतत्त्वविधानज्ञः प्रधानपुरुषः परः ॥ ३४६ ॥

' जो सम्पूर्ण प्राणियोंका आदिकारण, अविनाशी, समस्त तत्त्वोंके विधानका ज्ञाता तथा प्रधान परम पुरुष है, वह ये भगवान् महादेवजी ही हैं ॥ ३४६ ॥

योऽसृजद् दक्षिणादङ्गाद् ब्रह्माणं लोकसम्भवम् ।

वामपार्श्वात् तथा विष्णुं लोकरक्षार्थमीश्वरः ॥ ३४७ ॥

'इन्हीं जगदीश्वरने अपने दाहिने अङ्गसे लोकस्रष्टा ब्रह्माको और बायें अङ्गसे जगत्की रक्षाके लिये विष्णुको उत्पन्न किया है ॥ ३४७ ॥

युगान्ते चैव सम्प्राप्ते रुद्रमीशोऽसृजत् प्रभुः ।

स रुद्रः संहरन् कृत्स्नं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ३४८ ॥

‘ प्रलयकाल प्राप्त होनेपर इन्हीं भगवान् शिवने रुद्रकी रचना की थी । वे ही रुद्र सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार करते हैं ॥ ३४८ ॥

कालो भूत्वा महातेजाः संवर्तक इवानलः ।

युगान्ते सर्वभूतानि ग्रसन्निव व्यवस्थितः ॥ ३४ ९ ॥

' वे ही महातेजस्वी काल होकर कल्पके अन्तमें समस्त प्राणियोंको अपना ग्रास बनाते हुए - से प्रलयकालीन अग्निके सदृश स्थित होते हैं ॥ ३४ ९ ॥

एष देवो महादेवो जगत् सृष्ट्वा चराचरम् ।

कल्पान्ते चैव सर्वेषां स्मृतिमाक्षिप्य तिष्ठति ॥ ३५० ॥

पृष्ठ 214

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‘ ये ही देवदेव महादेव चराचर जगत्की सृष्टि करके कल्पान्तमें सबकी स्मृति- शक्तिको मिटाकर स्वयं ही स्थित रहते हैं ॥ ३५० ॥

सर्वगः सर्वभूतात्मा सर्वभूतभवोद्भवः ।

आस्ते सर्वगतो नित्यमदृश्यः सर्वदैवतैः ॥ ३५१ ॥

‘ ये सर्वत्र गमन करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा तथा समस्त भूतोंके जन्म और वृद्धिके हेतु हैं । ये सर्वव्यापी परमेश्वर सदा सम्पूर्ण देवताओंसे अदृश्य रहते हैं ॥ ३५१ ॥

यदि देयो वरो मह्यं यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो ।

भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देव सुरेश्वर ॥ ३५२ ॥

‘ प्रभो! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो हे देव! हे सुरेश्वर! मेरी सदा आपमें भक्ति बनी रहे ॥ ३५२ ॥

अतीतानागतं चैव वर्तमानं च यद् विभो ।

जानीयामिति मे बुद्धिः प्रसादात् सुरसत्तम ॥ ३५३ ॥

' सुरश्रेष्ठ! विभो! आपकी कृपासे मैं भूत, वर्तमान और भविष्यको जान सकूँ; ऐसा मेरा निश्चय है ॥ ३५३ ॥

क्षीरोदनं च भुञ्जीयामक्षयं सह बान्धवैः ।

आश्रमे च सदास्माकं सांनिध्यं परमस्तु ते ॥ ३५४ ॥

‘ मैं अपने बन्धु - बान्धवोंसहित सदा अक्षय दूध - भातका भोजन प्राप्त करूँ और हमारे इस आश्रममें सदा आपका निकट निवास रहे ' ॥ ३५४ ॥

एवमुक्तः स मां प्राह भगवाँल्लोकपूजितः ।

महेश्वरो महातेजाश्चराचरगुरुः शिवः ॥ ३५५ ॥

मेरे ऐसा कहने पर लोकपूजित चराचरगुरु महातेजस्वी महेश्वर भगवान् शिव मुझसे यों बोले— ॥ ३५५ । | श्रीभगवानुवाच

अजरश्चामरश्चैव भव त्वं दुःखवर्जितः ।

यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥ ३५६ ॥

भगवान् शिवने कहा-ब्रह्मन्! तुम दुःखसे रहित अजर- अमर हो जाओ । यशस्वी, तेजस्वी तथा दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न बने रहो ॥ ३५६ ॥

ऋषीणामभिगम्यश्च मत्प्रसादाद् भविष्यसि ।

शीलवान् गुणसम्पन्नः सर्वज्ञः प्रियदर्शनः ॥ ३५७ ॥

मेरी कृपासे तुम ऋषियोंके भी दर्शनीय एवं आदरणीय होओगे तथा सदा शीलवान्, गुणवान्, सर्वज्ञ एवं प्रियदर्शन बने रहोगे ॥ ३५७ ॥

अक्षयं यौवनं तेऽस्तु तेजश्चैवानलोपमम् ।

पृष्ठ 215

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क्षीरोदः सागरश्चैव यत्र यत्रेच्छसि प्रियम् ॥ ३५८ ॥

तत्र ते भविता कामं सांनिध्यं पयसो निधेः । तुम्हें अक्षय यौवन और अग्निके समान तेज प्राप्त हो । तुम्हारे लिये क्षीरसागर सुलभ हो जायगा । तुम जहाँ - जहाँ प्रिय वस्तुकी इच्छा करोगे वहाँ- वहाँ तुम्हारी सारी कामना सफल होगी; और तुम्हें क्षीरसागरका सान्निध्य प्राप्त होगा ॥ ३५८३ ॥

क्षीरोदनं च भुङ्क्ष्व त्वममृतेन समन्वितम् ॥ ३५ ९ ॥

बन्धुभिः सहितः कल्पं ततो मामुपयास्यसि ।

अक्षया बान्धवाश्चैव कुलं गोत्रं च ते सदा ॥ ३६० ॥

तुम अपने भाई- बन्तुओंके साथ एक कल्पतक अमृतसहित दूध- भातका भोजन पाते रहो । तत्पश्चात् तुम मुझे प्राप्त हो जाओगे । तुम्हारे बन्धु -बान्धव, कुल तथा गोत्रकी परम्परा सदा अक्षय बनी रहेगी ॥

भविष्यति द्विजश्रेष्ठ मयि भक्तिश्च शाश्वती ।

सांनिध्यं चाश्रमे नित्यं करिष्यामि द्विजोत्तम ॥ ३६१ ॥

द्विजश्रेष्ठ! मुझमें तुम्हारी सदा अचल भक्ति होगी तथा द्विजप्रवर! तुम्हारे इस आश्रमके निकट मैं सदा अदृश्य रूपसे निवास करूँगा ॥ ३६१ ॥

तिष्ठ वत्स यथाकामं नोत्कण्ठां च करिष्यसि ।

स्मृतस्त्वया पुनर्विप्र करिष्यामि च दर्शनम् ॥ ३६२ ॥

बेटा! तुम इच्छानुसार यहाँ रहो । कभी किसी बात के लिये चिन्ता न करना । विप्रवर! तुम्हारे स्मरण करनेपर मैं पुनः तुम्हें दर्शन दूँगा ॥ ३६२ ॥

एवमुक्त्वा स भगवान् सूर्यकोटिसमप्रभः ।

ईशानः स वरान् दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३६३ ॥

ऐसा कहकर वे करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी भगवान् शंकर उपर्युक्त वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३६३ ॥

एवं दृष्टो मया कृष्ण देवदेवः समाधिना ।

तदवाप्तं च मे सर्वं यदुक्तं तेन धीमता ॥ ३६४ ॥

श्रीकृष्ण! इस प्रकार मैंने समाधिके द्वारा देवाधिदेव भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया । उन बुद्धिमान् महादेवजीने जो कुछ कहा था, वह सब मुझे प्राप्त हो गया ॥ ३६४ ॥

प्रत्यक्षं चैव ते कृष्ण पश्य सिद्धान् व्यवस्थितान् ।

ऋषीन् विद्याधरान् यक्षान् गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ३६५ ॥

श्रीकृष्ण! यह सब आप प्रत्यक्ष देख लें । यहाँ सिद्ध महर्षि, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराएँ विद्यमान हैं ॥ ३६५ ॥

पश्य वृक्षलतागुल्मान् सर्वपुष्पफलप्रदान् ।

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सर्वर्तुकुसुमैर्युक्तान् सुखपत्रान् सुगन्धिनः ॥ ३६६ ॥

देखिये, यहाँके वृक्ष, लता और गुल्म सब प्रकारके फूल और फल देनेवाले हैं । ये सभी ऋतुओंके फूलोंसे युक्त, सुखदायक पल्लवोंसे सम्पन्न और सुगन्धसे परिपूर्ण हैं ॥ ३६६ ॥

सर्वमेतन्महाबाहो दिव्यभावसमन्वितम् ।

प्रसादाद् देवदेवस्य ईश्वरस्य महात्मनः ॥ ३६७ ॥

महाबाहो! देवताओंके भी देवता तथा सबके ईश्वर महात्मा शिवके प्रसादसे ही यहाँ सब कुछ दिव्य भावसे सम्पन्न दिखायी देता है ॥ ३६७ ॥

वासुदेव उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रत्यक्षमिव दर्शनम् ।

विस्मयं परमं गत्वा अब्रुवं तं महामुनिम् ॥ ३६८ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - राजन्! उनकी यह बात सुनकर मानो मुझे भगवान् शिवका प्रत्यक्ष दर्शन हो गया हो, ऐसा प्रतीत हुआ । फिर बड़े विस्मयमें पड़कर मैंने उन महामुनिसे पूछा— ॥ ३६८ ॥

धन्यस्त्वमसि विप्रेन्द्र कस्त्वदन्योऽसि पुण्यकृत् ।

यस्य देवाधिदेवस्ते सांनिध्यं कुरुतेऽऽश्रमे ॥ ३६ ९ ॥

‘ विप्रवर! आप धन्य हैं । आपसे बढ़कर पुण्यात्मा पुरुष दूसरा कौन है? क्योंकि आपके इस आश्रममें साक्षात् देवाधिदेव महादेव निवास करते हैं ॥ ३६ ९ ॥

अपि तावन्ममाप्येवं दद्यात् स भगवान् शिवः ।

दर्शनं मुनिशार्दूल प्रसादं चापि शंकरः ॥ ३७० ॥

' मुनिश्रेष्ठ! क्या कल्याणकारी भगवान् शिव मुझे भी इसी प्रकार दर्शन देंगे? मुझपर भी कृपा करेंगे? ' ॥ उपमन्युरुवाच

द्रक्ष्यसे पुण्डरीकाक्ष महादेवं न संशयः ।

अचिरेणैव कालेन यथा दृष्टो मयानघ ॥ ३७१ ॥

उपमन्यु बोले - निष्पाप कमलनयन! जैसे मैंने भगवान्का दर्शन किया है, उसी प्रकार आप भी थोड़े ही समयमें महादेवजीका दर्शन प्राप्त करेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ ३७१ ॥

चक्षुषा चैव दिव्येन पश्याम्यमितविक्रमम् ।

षष्ठे मासि महादेवं द्रक्ष्यसे पुरुषोत्तम ॥ ३७२ ॥

पुरुषोत्तम! मैं दिव्य दृष्टिसे देख रहा हूँ । आप आजसे छठे महीनेमें अमित पराक्रमी महादेवजीका दर्शन करेंगे ॥ ३७२ ॥

षोडशाष्टौ वरांश्चापि प्राप्स्यसि त्वं महेश्वरात् ।

सपत्नीकाद् यदुश्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३७३ ॥

पृष्ठ 217

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यदुश्रेष्ठ! पत्नीसहित महादेवजीसे आप सोलह और आठ वर प्राप्त करेंगे । यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३७३ ॥

अतीतानागतं चैव वर्तमानं च नित्यशः ।

विदितं मे महाबाहो प्रसादात् तस्य धीमतः ॥ ३७४ ॥

महाबाहो! बुद्धिमान् महादेवजीके कृपा प्रसादसे मुझे सदा ही भूत, भविष्य और वर्तमान- तीनों कालका ज्ञान प्राप्त है ॥ ३७४ ॥

एतान् सहस्रशश्चान्यान् समनुध्यातवान् हरः ।

कस्मात् प्रसादं भगवान् न कुर्यात् तव माधव ॥ ३७५ ॥

माधव! भगवान् हरने यहाँ रहनेवाले इन सहस्रों मुनियोंको कृपापूर्ण हृदयसे अनुगृहीत किया है । फिर आपपर वे अपना कृपाप्रसाद क्यों नहीं प्रकट करेंगे ॥ ३७५ ॥

त्वादृशेन हि देवानां श्लाघनीयः समागमः ।

ब्रह्मण्येनानृशंसेन श्रद्दधानेन चाप्युत ॥ ३७६ ॥

जप्यं तु ते प्रदास्यामि येन द्रक्ष्यसि शंकरम् । आप- जैसे ब्राह्मणभक्त, कोमलस्वभाव और श्रद्धालु पुरुषका समागम देवताओंके लिये भी प्रशंसनीय है । मैं आपको जपनेयोग्य मन्त्र प्रदान करूंगा, जिससे आप भगवान् शंकरका दर्शन करेंगे ॥ ३७६३ ॥

श्रीकृष्ण उवाच अब्रुवं तमहं ब्रह्मंस्त्वत्प्रसादान्महामुने ॥ ३७७ ॥

द्रक्ष्ये दितिजसंघानां मर्दनं त्रिदशेश्वरम् । श्रीकृष्ण कहते हैं - तब मैंने उनसे कहा -ब्रह्मन्! महामुने! मैं आपके कृपाप्रसादसे दैत्यदलोंका दलन करनेवाले देवेश्वर महादेवजीका दर्शन अवश्य करूँगा ॥ ३७७३ ॥

एवं कथयतस्तस्य महादेवाश्रितां कथाम् ॥ ३७८ ॥

दिनान्यष्टौ ततो जग्मुर्मुहूर्तमिव भारत ।

दिनेऽष्टमे तु विप्रेण दीक्षितोऽहं यथाविधि ॥ ३७ ९ ॥

भरतनन्दन! इस प्रकार महादेवजीकी महिमासे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कहते हुए उन मुनीश्वरके आठ दिन एक मुहूर्तके समान बीत गये । आठवें दिन विप्रवर उपमन्युने विधिपूर्वक मुझे दीक्षा दी ॥

दण्डी मुण्डी कुशी चीरी घृताक्तो मेखली कृतः ।

मासमेकं फलाहारो द्वितीयं सलिलाशनः ॥ ३८० ॥

उन्होंने मेरा सिर मुड़ा दिया । मेरे शरीरमें घी लगाया तथा मुझसे दण्ड, कुशा, चीर एवं मेखला धारण कराया । मैं एक महीनेतक फलाहार करके रहा और दूसरे महीनेमें केवल जलका आहार किया ॥ ३८० ॥

पृष्ठ 218

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तृतीयं च चतुर्थं च पञ्चमं चानिलाशनः ।

एकपादेन तिष्ठंश्च ऊर्ध्वबाहुरतन्द्रितः ॥ ३८१ ॥

तीसरे, चौथे और पाँचवें महीनेमें मैं दोनों बाँहें ऊपर उठाये एक पैरसे खड़ा रहा ।

आलस्यको अपने पास नहीं आने दिया । उन दिनों वायुमात्र ही मेरा आहार रहा ॥ ३८१ ॥

तेजः सूर्यसहस्रस्य अपश्यं दिवि भारत ।

तस्य मध्यगतं चापि तेजसः पाण्डुनन्दन ॥ ३८२ ॥

इन्द्रायुधपिनद्धाङ्गं विद्युन्मालागवाक्षकम् ।

नीलशैलचयप्रख्यं वलाकाभूषिताम्बरम् ॥ ३८३ ॥

भारत! पाण्डुनन्दन! छठे महीनेमें आकाशके भीतर मुझे सहस्रों सूर्योंका- सा तेज दिखायी दिया । उस तेजके भीतर एक और तेजोमण्डल दृष्टिगोचर हुआ, जिसका सर्वांग इन्द्रधनुषसे परिवेष्टित था । विद्युन्माला उसमें झरोखेके समान प्रतीत होती थी । वह तेज नील पर्वतमालाके समान प्रकाशित होता था । उस द्विविध तेजके कारण वहाँका आकाश बकपंक्तियोंसे विभूषित- सा जान पड़ता था ॥ ३८२-३८३ ॥

तत्र स्थितश्च भगवान् देव्या सह महाद्युतिः ।

तपसा तेजसा कान्त्या दीप्तया सह भार्यया ॥ ३८४ ॥

उस नील तेजके भीतर महातेजस्वी भगवान् शिव तप, तेज, कान्ति तथा अपनी तेजस्विनी पत्नी उमादेवीके साथ विराजमान थे ॥ ३८४ ॥

रराज भगवांस्तत्र देव्या सह महेश्वरः ।

सोमेन सहितः सूर्यो यथा मेघस्थितस्तथा ॥ ३८५ ॥

उस नील तेजमें पार्वती देवीके साथ स्थित हुए भगवान् महेश्वर ऐसी शोभा पा रहे थे मानो चन्द्रमाके साथ सूर्य श्याम मेघके भीतर विराज रहे हों ॥ ३८५ ॥

संहृष्टरोमा कौन्तेय विस्मयोत्फुल्ललोचनः ।

अपश्यं देवसंघानां गतिमार्तिहरं हरम् ॥ ३८६ ॥

कुन्तीनन्दन! जो सम्पूर्ण देवसमुदायकी गति हैं तथा सबकी पीड़ा हर लेते हैं, उन भगवान् हरको जब मैंने देखा, तब मेरे रोंगटे खड़े हो गये और मेरे नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे ॥ ३८६ ॥

किरीटिनं गदिनं शूलपाणिं व्याघ्राजिनं जटिलं दण्डपाणिम् । पिनाकिनं वज्रिणं तीक्ष्णदंष्ट्रं शुभाङ्गदं व्यालयज्ञोपवीतम् ॥ ३८७ ॥

भगवान्के मस्तकपर मुकुट था । उनके हाथमें गदा, त्रिशूल और दण्ड शोभा पाते थे । सिरपर जटा थी । उन्होंने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा था । पिनाक और वज्र भी उनकी शोभा

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बढ़ा रहे थे । उनकी दाढ़ तीखी थी । उन्होंने सुन्दर बाजूबंद पहनकर सर्पमय यज्ञोपवीत धारण कर रखा था ॥ ३८७ ॥

दिव्यां मालामुरसानेकवर्णां समुद्वहन्तं गुल्फदेशावलम्बाम् । चन्द्रं यथा परिविष्टं ससंध्यं वर्षात्यये तद्वदपश्यमेनम् ॥ ३८८ ॥

वे अपने वक्षःस्थलपर अनेक रंगवाली दिव्य माला धारण किये हुए थे, जो गुल्फदेश ( घुटनों ) -तक लटक रही थी । जैसे शरदऋतुमें संध्याकी लालीसे युक्त और घेरेसे घिरे हुए चन्द्रमाका दर्शन होता हो, उसी प्रकार मैंने मालावेष्टित उन भगवान् महादेवजीका दर्शन किया था ॥ ३८८ ॥

प्रमथानां गणैश्चैव समन्तात् परिवारितम् ।

शरदीव सुदुष्प्रेक्ष्यं परिविष्टं दिवाकरम् ॥ ३८९ ॥

प्रमथगणोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए महातेजस्वी महादेव परिधिसे घिरे हुए शरत्कालके सूर्यकी भाँति बड़ी कठिनाईसे देखे जाते थे ॥ ३८ ९ ॥

एकादशशतान्येवं रुद्राणां वृषवाहनम् ।

अस्तुवं नियतात्मानं कर्मभिः शुभकर्मिणम् ॥ ३ ९ ० ॥

इस प्रकार मनको वशमें रखनेवाले और कर्मेन्द्रियोंद्वारा शुभकर्मका ही अनुष्ठान करनेवाले महादेवजीकी, जो ग्यारह सौ रुद्रोंसे घिरे हुए थे, मैंने स्तुति की ॥ ३ ९० ॥

आदित्या बसवः साध्या विश्वेदेवास्तथाश्विनौ ।

विश्वाभिःस्तुतिभिर्देवं विश्वदेवं समस्तुवन् ॥ ३ ९ १ ॥

बारह आदित्य, आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव तथा अश्विनीकुमार – ये भी सम्पूर्ण स्तुतियोंद्वारा सबके देवता महादेवजीकी स्तुति कर रहे थे ॥ ३ ९ १ ॥

शतक्रतुश्च भगवान् विष्णुश्चादितिनन्दनौ ।

ब्रह्मा रथन्तरं साम ईरयन्ति भवान्तिके ॥ ३ ९ २ ॥

इन्द्र तथा वामनरूपधारी भगवान् विष्णु - ये दोनों अदितिकुमार और ब्रह्माजी भगवान् शिवके निकट रथन्तर सामका गान कर रहे थे ॥ ३ ९ २ ॥

योगीश्वराः सुबहवो योगदं पितरं गुरुम् ।

ब्रह्मर्षयश्च ससुतास्तथा देवर्षयश्च वै ॥ ३ ९ ३ ॥

बहुत- से योगीश्वर, पुत्रोंसहित ब्रह्मर्षि तथा देवर्षिगण भी योगसिद्धि प्रदान करनेवाले, पिता एवं गुरुरूप महादेवजीकी स्तुति करते थे ॥ ३ ९ ३ ॥

( महाभूतानि च्छन्दांसि प्रजानां पतयो मखाः ।

सरितः सागरा नागा गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥

विद्याधराश्च गीतेन वाद्यनृत्तादिनार्चयन् ।

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तेजस्विनां मध्यगतं तेजोराशिं जगत्पतिम् ॥ ) महाभूत, छन्द, प्रजापति, यज्ञ, नदी, समुद्र, नाग, गन्धर्व, अप्सरा तथा विद्याधर— ये सब गीत, वाद्य तथा नृत्य आदिके द्वारा तेजस्वियोंके मध्यभागमें विराजमान तेजोराशि जगदीश्वर शिवकी पूजा- अर्चा करते थे ॥

पृथिवी चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।

मासार्धमासा ऋतवो रात्रिः संवत्सराः क्षणाः ॥ ३ ९ ४ ॥

मुहूर्ताश्च निमेषाश्च तथैव युगपर्ययाः ।

दिव्या राजन् नमस्यन्ति विद्याः सत्त्वविदस्तथा ॥ ३ ९ ५ ॥

राजन्! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, नक्षत्र, ग्रह, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, संवत्सर, क्षण, मुहूर्त, निमेष, युगचक्र तथा दिव्य विद्याएँ— ये सब ( मूर्तिमान होकर) शिवजीको नमस्कार कर रहे थे । वैसे ही सत्त्ववेत्ता पुरुष भी भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ॥ ३ ९४-३९ ५ ॥

सनत्कुमारो देवाश्च इतिहासास्तथैव च ।

मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥ ३ ९ ६ ॥

मनवः सप्त सोमश्च अथर्वा सबृहस्पतिः ।

भृगुर्दक्षः कश्यपश्च वसिष्ठः काश्य एव च ॥ ३ ९ ७ ॥

छन्दांसि दीक्षा यज्ञाश्च दक्षिणाः पावको हविः ।

यज्ञोपगानि द्रव्याणि मूर्तिमन्ति युधिष्ठिर ॥ ३ ९ ८ ॥

प्रजानां पालकाः सर्वे सरितः पन्नगा नगाः ।

देवानां मातरः सर्वा देवपत्न्यः सकन्यकाः ॥ ३ ९९ ॥

सहस्राणि मुनीनां च अयुतान्यर्बुदानि च ।

नमस्यन्ति प्रभुं शान्तं पर्वताः सागरा दिशः ॥ ४०० ॥

युधिष्ठिर! सनत्कुमार, देवगण, इतिहास, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, सात मनु, सोम, अथर्वा, बृहस्पति, भृगु, दक्ष, कश्यप, वसिष्ठ, काश्य, छन्द, दीक्षा, यज्ञ, दक्षिणा, अग्नि, हविष्य, यज्ञोपयोगी मूर्तिमान् द्रव्य, समस्त प्रजापालकगण, नदी, नग, नाग, सम्पूर्ण देवमाताएँ, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ, सहस्रों, लाखों, अरबों महर्षि, पर्वत, समुद्र और दिशाएँ — ये सब- के - सब शान्तस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ॥ ३ ९६— ४०० ॥

गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतवादित्रकोविदाः ।

दिव्यतालेषु गायन्तः स्तुवन्ति भवमद्भुतम् ॥ ४०१ ॥

गीत और वाद्यकी कलामें कुशल अप्सराएँ तथा गन्धर्व दिव्य तालपर गाते हुए अद्भुत शक्तिशाली भगवान् भवकी स्तुति करते थे ॥ ४०१ ॥

विद्याधरा दानवाश्च गुह्यका राक्षसास्तथा । सर्वाणि चैव भूतानि स्थावराणि चराणि च ।