06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2321–2330
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2321–2330
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सोऽब्रवीन्मातरं कुन्तीं वनं तमनुजग्मुषीम् ।
अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम् ॥७ ॥
वधूरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि ।
राजा यात्वेष धर्मात्मा तापस्ये कृतनिश्चयः ॥ ८ ॥
उस समय उन्होंने वनकी ओर जाती हुई अपनी माता कुन्तीसे कहा — ‘ रानी मा! आप अपनी पुत्र-वधुओंके साथ लौटिये, नगरको जाइये । मैं राजाके पीछे - पीछे जाऊँगा; क्योंकि ये धर्मात्मा नरेश तपस्याके लिये निश्चय करके वनमें जा रहे हैं, अतः इन्हें जाने दीजिये ' ॥
इत्युक्ता धर्मराजेन बाष्पव्याकुललोचना ।
जगामैव तदा कुन्ती गान्धारीं परिगृह्य ह ॥ ९ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया तो भी वे गान्धारीका हाथ पकड़े चलती ही गयीं ॥ ९ ॥
कुन्त्युवाच
सहदेवे महाराज माप्रसादं कृथाः क्वचित् ।
एष मामनुरक्तो हि राजंस्त्वां चैव सर्वदा ॥ १० ॥
जाते -जाते ही कुन्तीने कहा - महाराज! तुम सहदेवपर कभी अप्रसन्न न होना ।
राजन्! यह सदा मेरे और तुम्हारे प्रति भक्ति रखता आया है ॥ १० ॥
कर्णं स्मरेथाः सततं संग्रामेष्वपलायिनम् ।
अवकीर्णो हि समरे वीरो दुष्प्रज्ञया तदा ॥ ११ ॥
संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले अपने भाई कर्णको भी सदा याद रखना, क्योंकि मेरी ही दुर्बुद्धिके कारण वह वीर युद्धमें मारा गया ॥ ११ ॥
आयसं हृदयं नूनं मन्दाया मम पुत्रक ।
यत् सूर्यजमपश्यन्त्याः शतधा न विदीर्यते ॥ १२ ॥
बेटा! मुझ अभागिनीका हृदय निश्चय ही लोहेका बना हुआ है; तभी तो आज सूर्यनन्दन कर्णको न देखकर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १२ ॥
एवं गते तु किं शक्यं मया कर्तुमरिंदम ।
मम दोषोऽयमत्यर्थं ख्यापितो यन्न सूर्यजः ॥ १३ ॥
शत्रुदमन! ऐसी दशामें मैं क्या कर सकती हूँ । यह मेरा ही महान् दोष है कि मैंने सूर्यपुत्र कर्णका तुमलोगोंको परिचय नहीं दिया ॥ १३ ॥
तन्निमित्तं महाबाहो दानं दद्यास्त्वमुत्तमम् ।
सदैव भ्रातृभिः सार्धं सूर्यजस्यारिमर्दन ॥ १४ ॥
महाबाहो! शत्रुमर्दन! तुम अपने भाइयोंके साथ सदा ही सूर्यपुत्र कर्णके लिये भी उत्तम दान देते रहना ॥ १४ ॥
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द्रौपद्याश्च प्रिये नित्यं स्थातव्यमरिकर्शन ।
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव नकुलश्च कुरूद्वह ॥ १५ ॥
समाधेयास्त्वया राजंस्त्वय्यद्य कुलधूर्गता । शत्रुसूदन! मेरी बहू द्रौपदीका भी सदा प्रिय करते रहना । कुरुश्रेष्ठ! तुम भीमसेन, अर्जुन और नकुलको भी सदा संतुष्ट रखना । आजसे कुरुकुलका भार तुम्हारे ही ऊपर है ॥ १५३ ॥
श्वश्रूश्वशुरयोः पादान् शुश्रूषन्ती वने त्वहम् ॥ १६ ॥
गान्धारीसहिता वत्स्ये तापसी मलपङ्किनी । अब मैं वनमें गान्धारीके साथ शरीरपर मैल एवं कीचड़ धारण किये तपस्विनी बनकर रहूँगी और अपने इन सास- ससुरके चरणोंकी सेवामें लगी रहूँगी ॥ १६३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो वशी ।
विषादमगमद् धीमान् न च किंचिदुवाच ह ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! माताके ऐसा कहनेपर अपने मनको वशमें रखनेवाले धर्मात्मा एवं बुद्धिमान् युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत दुःखी हुए । वे अपने मुँहसे कुछ न बोले ॥ १७ ॥
मुहूर्तमिव तु ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
उवाच मातरं दीनश्चिन्ताशोकपरायणः ॥ १८ ॥
दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर चिन्ता और शोकमें डूबे हुए धर्मराज युधिष्ठिरने मातासे दीन होकर कहा— ॥ १८ ॥
किमिदं ते व्यवसितं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ।
न त्वामभ्यनुजानामि प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ १ ९ ॥
‘ माताजी! आपने यह क्या निश्चय कर लिया? आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ।
मैं आपको वनमें जानेकी अनुमति नहीं दे सकता । आप मुझपर कृपा कीजिये ॥ १ ९ ॥
पुरोद्यतान् पुरा ह्यस्मानुत्साह्य प्रियदर्शने ।
विदुलाया वचोभिस्त्वं नास्मान् संत्यक्तुमर्हसि ॥ २० ॥
‘प्रियदर्शने! पहले जब हमलोग नगरसे बाहर जानेको उद्यत थे, आपने विदुलाके वचनोंद्वारा हमें क्षत्रियधर्मके पालनके लिये उत्साह दिलाया था । अतः आज हमें त्यागकर जाना आपके लिये उचित नहीं है ॥ २० ॥
निहत्य पृथिवीपालान् राज्यं प्राप्तमिदं मया ।
तव प्रज्ञामुपश्रुत्य वासुदेवान्नरर्षभात् ॥ २१ ॥
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' पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे आपका विचार सुनकर ही मैंने बहुत -से राजाओंका संहार करके इस राज्यको प्राप्त किया है ॥ २१ ॥
क्व सा बुद्धिरियं चाद्य भवत्या यच्छ्रुतं मया ।
क्षत्रधर्मे स्थितिं चोक्त्वा तस्याश्श्र्यवितुमिच्छसि ॥ २२ ॥
' कहाँ आपकी वह बुद्धि और कहाँ आपका यह विचार? मैंने आपका जो विचार सुना है, उसके अनुसार हमें क्षत्रिय धर्ममें स्थित रहनेका उपदेश देकर आप स्वयं उससे गिरना चाहती हैं ॥ २२ ॥
अस्मानुत्सृज्य राज्यं च स्नुषा हीमा यशस्विनि ।
कथं वत्स्यसि दुर्गेषु वनेष्वद्य प्रसीद मे ॥ २३ ॥
‘ यशस्विनी मा! भला आप हमको, अपनी इन बहुओंको और इस राज्यको छोड़कर अब उन दुर्गम वनोंमें कैसे रह सकेंगी; अतः हमलोगोंपर कृपा करके यहीं रहिये ' ॥ २३ ॥
इति बाष्पकला वाचः कुन्ती पुत्रस्य शृण्वती ।
सा जगामाश्रुपूर्णाक्षी भीमस्तामिदमब्रवीत् ॥ २४ ॥
अपने पुत्रके ये अश्रुगद्गद वचन सुनकर कुन्तीके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये तो भी वे
रुक न सकीं । आगे बढ़ती ही गयीं । तब भीमसेनने उनसे कहा- ॥ २४ ॥
यदा राज्यमिदं कुन्ति भोक्तव्यं पुत्रनिर्जितम् ।
प्राप्तव्या राजधर्माश्च तदेयं ते कुतो मतिः ॥ २५ ॥
‘ माताजी! जब पुत्रोंके जीते हुए इस राज्यके भोगनेका अवसर आया और राजधर्मके पालनकी सुविधा प्राप्त हुई, तब आपको ऐसी बुद्धि कैसे हो गयी? ॥ २५ ॥
किं वयं कारिताः पूर्वं भवत्या पृथिवीक्षयम् ।
कस्य हेतोः परित्यज्य वनं गन्तुमभीप्ससि ॥ २६ ॥
'यदि ऐसा ही करना था तो आपने इस भूमण्डलका विनाश क्यों करवाया? क्या कारण है कि आप हमें छोड़कर वनमें जाना चाहती हैं? ॥ २६ ॥
वनाच्चापि किमानीता भवत्या बालका वयम् ।
दुःखशोकसमाविष्टौ माद्रीपुत्राविमौ तथा ॥ २७ ॥
‘ जब आपको वनमें ही जाना था, तब आप हमको और दुःख- शोक में डूबे हुए उन माद्रीकुमारोंको बाल्यावस्थामें वनसे नगरमें क्यों ले आयीं? ॥ २७ ॥
प्रसीद मातर्मा गास्त्वं वनमद्य यशस्विनि ।
श्रियं यौधिष्ठिरीं मातर्भुङ्क्ष्व तावद् बलार्जिताम् ॥ २८ ॥
‘ मेरी यशस्विनी मा! आप प्रसन्न हों । आप हमें छोड़कर वनमें न जायँ । बलपूर्वक प्राप्त की हुई राजा युधिष्ठिरकी उस राजलक्ष्मीका उपभोग करें ' ॥ २८ ॥
इति सा निश्चितैवाशु वनवासाय भाविनी ।
लालप्यतां बहुविधं पुत्राणां नाकरोद् वचः ॥ २ ९ ॥
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शुद्ध हृदयवाली कुन्ती देवी वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय कर चुकी थीं; अतः नाना प्रकारसे विलाप करते हुए अपने पुत्रोंका अनुरोध उन्होंने नहीं माना ॥ २ ९ ॥
द्रौपदी चान्वयाच्छ्वश्रूं विषण्णवदना तदा ।
वनवासाय गच्छन्तीं रुदती भद्रया सह ॥ ३० ॥
सासको इस प्रकार वनवासके लिये जाती देख द्रौपदीके मुखपर भी विषाद छा गया ।
वह सुभद्राके साथ रोती हुई स्वयं भी कुन्तीके पीछे - पीछे जाने लगी ॥ ३० ॥
सा पुत्रान् रुदतः सर्वान् मुहुर्मुहुरवेक्षती ।
जगामैव महाप्राज्ञा वनाय कृतनिश्चया ॥ ३१ ॥
कुन्तीकी बुद्धि विशाल थी । वे वनवासका पक्का निश्चय कर चुकी थीं; इसलिये अपने रोते हुए समस्त पुत्रोंकी ओर बार- बार देखती हुई वे आगे बढ़ती ही चली गयीं ॥ ३१ ॥
अन्वयुः पाण्डवास्तां तु सभृत्यान्तःपुरास्तथा ।
ततः प्रमृज्य साश्रूणि पुत्रान् वचनमब्रवीत् ॥ ३२ ॥
पाण्डव भी अपने सेवकों और अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ उनके पीछे - पीछे जाने लगे ।
तब उन्होंने आँसू पोंछकर अपने पुत्रोंसे इस प्रकार कहा ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि कुन्तीवनप्रस्थाने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें कुन्तीका वनको प्रस्थानविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
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सप्तदशोऽध्यायः कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर कुन्त्युवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डव ।
कृतमुद्धर्षणं पूर्वं मया वः सीदतां नृपाः ॥ १ ॥
कुन्ती बोली - महाबाहु पाण्डुनन्दन! तुम जैसा कहते हो, वही ठीक है । राजाओ! पूर्वकालमें तुम नाना प्रकारके कष्ट उठाकर शिथिल हो गये थे, इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ १ ॥
द्यूतापहृतराज्यानां पतितानां सुखादपि ।
ज्ञातिभिः परिभूतानां कृतमुद्धर्षणं मया ॥ २ ॥
जूएमें तुम्हारा राज्य छीन लिया गया था । तुम सुखसे भ्रष्ट हो चुके थे और तुम्हारे ही बन्धु - बान्धव तुम्हारा तिरस्कार करते थे, इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साह प्रदान किया था ॥ २ ॥
कथं पाण्डोर्न नश्येत संततिः पुरुषर्षभाः ।
यशश्च वो न नश्येत इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ३ ॥
श्रेष्ठ पुरुषो! मैं चाहती थी कि पाण्डुकी संतान किसी तरह नष्ट न हो और तुम्हारे यशका भी नाश न होने पाये । इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ ३ ॥
यूयमिन्द्रसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः ।
मा परेषां मुखप्रेक्षाः स्थेत्येवं तत् कृतं मया ॥ ४ ॥
तुम सब लोग इन्द्रके समान शक्तिशाली और देवताओंके तुल्य पराक्रमी होकर जीविकाके लिये दूसरोंका मुँह न देखो, इसलिये मैंने वह सब किया था ॥ ४ ॥
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपमः ।
पुनर्वने न दुःखी स्या इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ५ ॥
तुम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ और इन्द्रके समान ऐश्वर्यशाली राजा होकर पुनः वनवासका कष्ट न भोगो, इसी उद्देश्यसे मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ ५ ॥
नागायुतसमप्राणः ख्यातविक्रमपौरुषः ।
नायं भीमोऽत्ययं गच्छेदिति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ६ ॥
ये दस हजार हाथियोंके समान बलशाली और विख्यात बल - पराक्रमसे सम्पन्न भीमसेन पराजयको न प्राप्त हों; इसीलिये मैंने युद्धके हेतु उत्साह दिलाया था ॥
भीमसेनादवरजस्तथायं वासवोपमः ।
विजयो नावसीदेत इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ७ ॥
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भीमसेनके छोटे भाई ये इन्द्रतुल्य पराक्रमी विजय- शील अर्जुन शिथिल होकर न बैठ जायँ, इसीलिये मैंने उत्साह दिलाया था ॥ ७ ॥
नकुलः सहदेवश्च तथेमौ गुरुवर्तिनौ ।
क्षुधा कथं न सीदेतामिति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ८ ॥
गुरुजनोंकी आज्ञाके पालनमें लगे रहनेवाले ये दोनों भाई नकुल और सहदेव भूखका कष्ट न उठावें, इसके लिये मैंने तुम्हें उत्साह दिलाया था ॥ ८ ॥
इयं च बृहती श्यामा तथात्यायतलोचना ।
वृथा सभातले क्लिष्टा मा भूदिति च तत् कृतम् ॥ ९ ॥
यह ऊँचे कदवाली श्यामवर्णा विशाललोचना मेरी बहू भरी सभामें पुनः व्यर्थ अपमानित होनेका कष्ट न भोगे, इसी उद्देश्यसे मैंने वह सब किया था ॥ ९ ॥
प्रेक्षतामेव वो भीम वेपन्तीं कदलीमिव ।
स्त्रीधर्मिणीमरिष्टाङ्गीं तथा द्यूतपराजिताम् ॥ १० ॥
दुःशासनो यदा मौर्य्याद् दासीवत् पर्यकर्षत ।
तदैव विदितं मह्यं पराभूतमिदं कुलम् ॥ ११ ॥
भीमसेन! तुम सब लोगोंके देखते - देखते केलेके पत्तेकी तरह काँपती हुई, जूएमें हारी गयी, रजस्वला और निर्दोष अंगवाली द्रौपदीको दुःशासनने मूर्खतावश जब दासीकी भाँति घसीटा था, तभी मुझे मालूम हो गया था कि अब इस कुलका पराभव होकर ही रहेगा ॥
निषण्णाः कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादयः ।
सा दैवं नाथमिच्छन्ती व्यलपत् कुररी यथा ॥ १२ ॥
मेरे श्वशुर आदि समस्त कौरव चुपचाप बैठे थे और द्रौपदी अपने लिये रक्षक चाहती हुई भगवान्को पुकार- पुकारकर कुररीकी भाँति विलाप कर रही थी ॥
केशपक्षे परामृष्टा पापेन हतबुद्धिना ।
यदा दुःशासनेनैषा तदा मुह्याम्यहं नृपाः ॥ १३ ॥
युष्मत्तेजोविवृद्धयर्थं मया ह्युद्धर्षणं कृतम् ।
तदानीं विदुलावाक्यैरिति तद् वित्त पुत्रकाः ॥ १४ ॥
राजाओ! जिसकी बुद्धि मारी गयी थी, उस पापी दुःशासनने जब मेरी इस बहूका केश पकड़कर खींचा था, तभी मैं दुःखसे मोहित हो गयी थी । यही कारण था कि उस समय विदुलाके वचनोंद्वारा मैंने तुम्हारे तेजकी वृद्धिके लिये उत्साहवर्धन किया था । पुत्रो! इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥ १३-१४ ॥
कथं न राजवंशोऽयं नश्येत् प्राप्य सुतान् मम ।
पाण्डोरिति मया पुत्रास्तस्मादुद्धर्षणं कृतम् ॥ १५ ॥
मेरे और पाण्डुके पुत्रोंतक पहुँचकर यह राजवंश किसी तरह नष्ट न हो जाय; इसीलिये मैंने तुम्हारे उत्साहकी वृद्धि की थी ॥ १५ ॥
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न तस्य पुत्राः पौत्रा वा क्षतवंशस्य पार्थिव ।
लभन्ते सुकृताँल्लोकान् यस्माद् वंशः प्रणश्यति ॥ १६ ॥
राजन्! जिसका वंश नष्ट हो जाता है, उस कुलके पुत्र या पौत्र कभी पुण्यलोक नहीं पाते; क्योंकि उस वंशका तो नाश ही हो जाता है ॥ १६ ॥
भुक्तं राज्यफलं पुत्रा भर्तुर्मे विपुलं पुरा ।
महादानानि दत्तानि पीतः सोमो यथाविधि ॥ १७ ॥
पुत्रो! मैंने पूर्वकालमें अपने स्वामी महाराज पाण्डुके विशाल राज्यका सुख भोग लिया है, बड़े - बड़े दान दिये हैं और यज्ञमें विधिपूर्वक सोमपान भी किया है ॥ १७ ॥
नाहमात्मफलर्थं वै वासुदेवमचूचुदम् ।
विदुलायाः प्रलापैस्तैः पालनार्थं च तत् कृतम् ॥ १८ ॥
मैंने अपने लाभके लिये श्रीकृष्णको प्रेरित नहीं किया था । विदुलाके वचन सुनाकर जो उनके द्वारा तुम्हारे पास संदेश भेजा था, वह सब तुमलोगोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही किया था ॥ १८ ॥
नाहं राज्यफलं पुत्राः कामये पुत्रनिर्जितम् ।
पतिलोकानहं पुण्यान् कामये तपसा विभो ॥ १ ९ ॥
पुत्रो! मैं पुत्रके जीते हुए राज्यका फल भोगना नहीं चाहती । प्रभो! मैं तपस्याद्वारा पुण्यमय पतिलोकमें जानेकी कामना रखती हूँ ॥ १ ९ ॥
श्वत्रूश्वशुरयोः कृत्वा शुश्रूषां वनवासिनोः ।
तपसा शोषयिष्यामि युधिष्ठिर कलेवरम् ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! अब मैं अपने इन वनवासी सास- ससुरकी सेवा करके तपके द्वारा इस शरीरको सुखा डालूँगी ॥ २० ॥
निवर्तस्व कुरुश्रेष्ठ भीमसेनादिभिः सह ।
धर्मे ते धीयतां बुद्धिर्मनस्तु महदस्तु च ॥ २१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तुम भीमसेन आदिके साथ लौट जाओ । तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी रहे और तुम्हारा हृदय विशाल ( अत्यन्त उदार ) हो ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि कुन्तीवाक्ये सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें कुन्तीका वाक्यविषयक सत्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
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अष्टादशोऽध्यायः पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगातटपर निवास करना वैशम्पायन उवाच
कुन्त्यास्तु वचनं श्रुत्वा पाण्डवा राजसत्तम ।
व्रीडिताः संन्यवर्तन्त पाञ्चाल्या सहिताऽनघाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! कुन्तीकी बात सुनकर निष्पाप पाण्डव बहुत लज्जित हुए और द्रौपदीके साथ वहाँसे लौटने लगे ॥ १ ॥
ततः शब्दो महानेव सर्वेषामभवत् तदा ।
अन्तःपुराणां रुदतां दृष्ट्वा कुन्तीं तथागताम् ॥ २ ॥
प्रदक्षिणमथावृत्य राजानं पाण्डवास्तदा ।
अभिवाद्य न्यवर्तन्त पृथां तामनिवर्त्य वै ॥ ३ ॥
कुन्तीको इस प्रकार वनवासके लिये उद्यत देख रनिवासकी सारी स्त्रियाँ रोने लगीं । उन सबके रोनेका महान् शब्द सब ओर गूँज उठा । उस समय पाण्डव कुन्तीको लौटानेमें सफल न हो राजा धृतराष्ट्रकी परिक्रमा और अभिवादन करके लौटने लगे ॥ २-३ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
गान्धारीं विदुरं चैव समाभाष्यावगृह्य च ॥ ४ ॥
तब महातेजस्वी अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने गान्धारी और विदुरको सम्बोधित करके उनका हाथ पकड़कर कहा – ॥
युधिष्ठिरस्य जननी देवी साधु निवर्त्यताम् ।
यथा युधिष्ठिरः प्राह तत् सर्वं सत्यमेव हि ॥ ५ ॥
' गान्धारी और विदुर! तुमलोग युधिष्ठिरकी माता कुन्तीदेवीको अच्छी तरह समझा-बुझाकर लौटा दो । युधिष्ठिर जैसा कह रहे हैं, वह सब ठीक ही है ॥ ५ ॥
पुत्रैश्वर्यं महदिदमपास्य च महाफलम् ।
का नु गच्छेद् वनं दुर्गं पुत्रानुत्सृज्य मूढवत् ॥ ६ ॥
पुत्रोंका महान् फलदायक यह महान् ऐश्वर्य छोड़कर और पुत्रोंका त्याग करके कौन नारी मूढ़की भाँति दुर्गम वनमें जायगी? ॥ ६ ॥
राज्यस्थया तपस्तप्तुं कर्तुं दानव्रतं महत् ।
अनया शक्यमेवाद्य श्रूयतां च वचो मम ॥ ७ ॥
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यह राज्यमें रहकर भी तपस्या कर सकती है और महान् दान- व्रतका अनुष्ठान करनेमें समर्थ हो सकती है; अतः यह आज मेरी बात ध्यान देकर सुने ॥ ७ ॥
गान्धारि परितुष्टोऽस्मि वध्वाः शुश्रूषणेन वै ।
तस्मात् त्वमेनां धर्मज्ञे समनुज्ञातुमर्हसि ॥ ८ ॥
‘ धर्मको जाननेवाली गान्धारी! मैं बहू कुन्तीकी सेवा - शुश्रूषासे बहुत संतुष्ट हूँ; अतः आज तुम इसे घर लौटनेकी आज्ञा दे दो ' ॥ ८ ॥
इत्युक्ता सौबलेयी तु राज्ञा कुन्तीमुवाच ह ।
तत् सर्वं राजवचनं स्वं च वाक्यं विशेषवत् ॥ ९ ॥
राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर सुबलकुमारी गान्धारीने कुन्तीसे राजाकी आज्ञा कह सुनायी और अपनी ओरसे भी उन्हें लौटनेके लिये विशेष जोर दिया ॥ ९ ॥
न च सा वनवासाय देवी कृतमतिं तदा ।
शक्नोत्युपावर्तयितुं कुन्तीं धर्मपरां सतीम् ॥ १० ॥
परंतु धर्मपरायणा सती- साध्वी कुन्तीदेवी वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय कर चुकी थीं; अतः गान्धारीदेवी उन्हें घरकी ओर लौटा न सकीं ॥ १० ॥
तस्यास्तांतु स्थितिं ज्ञात्वा व्यवसायं कुरुस्त्रियः ।
निवृत्तांश्च कुरुश्रेष्ठान् दृष्ट्वा प्ररुरुदुस्तदा ॥ ११ ॥
कुन्तीकी यह स्थिति और वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय जान कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको निराश लौटते देख कुरुकुलकी सारी स्त्रियाँ फूट- फूटकर रोने लगीं ॥ ११ ॥
उपावृत्तेषु पार्थेषु सर्वास्वेव वधूषु च ।
ययौ राजा महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो वनं तदा ॥ १२ ॥
कुन्तीके सभी पुत्र और सारी बहुएँ जब लौट गयीं, तब महाज्ञानी राजा धृतराष्ट्र वनकी ओर चले ॥
पाण्डवाश्चातिदीनास्ते दुःखशोकपरायणाः ।
यानैः स्त्रीसहिताः सर्वे पुरं प्रविविशुस्तदा ॥ १३ ॥
उस समय पाण्डव अत्यन्त दीन और दुःख- शोकमें मग्न हो रहे थे । उन्होने वाहनोंपर बैठकर स्त्रियोंसहित नगरमें प्रवेश किया ॥ १३ ॥
तदहृष्टमनानन्दं गतोत्सवमिवाभवत् ।
नगरं हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ॥ १४ ॥
उस दिन बालक, वृद्ध और स्त्रियोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्ष और आनन्दसे रहित तथा उत्सवशून्य - सा हो रहा था ॥ १४ ॥
सर्वे चासन् निरुत्साहाः पाण्डवा जातमन्यवः ।
कुन्त्या हीनाः सुदुःखार्ता वत्सा इव विनाकृताः ॥ १५ ॥
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समस्त पाण्डवोंका उत्साह नष्ट हो गया था । वे दीन एवं दुखी हो गये थे । कुन्तीसे बिछुड़कर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो वे बिना गायके बछड़ोंके समान व्याकुल हो गये थे ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रस्तु तेनाह्ना गत्वा सुमहदन्तरम् ।
ततो भागीरथीतीरे निवासमकरोत् प्रभुः ॥ १६ ॥
उधर राजा धृतराष्ट्रने उस दिन बहुत दूरतक यात्रा करके संध्याके समय गंगाके तटपर निवास किया ॥ १६ ॥
प्रादुष्कृता यथान्यायमग्नयो वेदपारगैः ।
व्यराजन्त द्विजश्रेष्ठैस्तत्र तत्र तपोवने ॥ १७ ॥
वहाँके तपोवनमें वेदोंके पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने जहाँ -तहाँ विधिपूर्वक जो आग प्रकट करके प्रज्वलित की थी, वह बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १७ ॥
प्रादुष्कृताग्निरभवत् स च वृद्धो नराधिपः ।
स राजाग्नीन् पर्युपास्य हुत्वा च विधिवत् तदा ॥ १८ ॥
संध्यागतं सहस्रांशुमुपातिष्ठत भारत । भरतनन्दन! फिर बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने भी अग्निको प्रकट एवं प्रज्वलित किया । त्रिविध अग्नियोंकी उपासना करके उनमें विधिपूर्वक आहुति दे राजाने संध्याकालिक सूर्यदेवका उपस्थान किया ॥ १८३ ॥
विदुरः संजयश्चैव राज्ञः शय्यां कुशैस्ततः ॥ १९ ॥
चक्रतुः कुरुवीरस्य गान्धार्याश्चाविदूरतः । तदनन्तर विदुर और संजयने कुरुप्रवीर राजा धृतराष्ट्रके लिये कुशोंकी शथ्या बिछा दी । उनके पास ही गान्धारीके लिये एक पृथक् आसन लगा दिया ॥ १ ९ ॥ गान्धार्याःसंनिकर्षे तु निषसाद कुशे सुखम् ॥ २० ॥
युधिष्ठिरस्य जननी कुन्ती साधुव्रते स्थिता । गान्धारीके निकट ही उत्तम व्रतमें स्थित हुई युधिष्ठिरकी माता कुन्ती भी कुशासनपर सोयीं और उसीमें उन्होंने सुख माना ॥ २० ॥
तेषां संश्रवणे चापि निषेदुर्विदुरादयः ॥ २१ ॥
याजकाश्च यथोद्देशं द्विजा ये चानुयायिनः । विदुर आदि भी राजासे उतनी ही दूरपर सोये, जहाँसे उनकी बोली सुनायी दे सके । यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण तथा राजाके साथ आये हुए अन्य द्विज यथायोग्य स्थानपर सोये ॥ २१ || प्राधीतद्विजमुख्या सा सम्प्रज्वलितपावका ॥ २२ ॥
बभूव तेषां रजनी ब्राह्मीव प्रीतिवर्धिनी ।