श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2311–2320
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2311–2320
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‘ धर्मराजने आपसे कहलाया है कि भीमसेन पूर्व वैरका स्मरण करके जो कभी- कभी आपके साथ अन्याय - सा कर बैठते हैं, उसके लिये आप इनपर क्रोध न कीजियेगा ॥ ७ ॥
एवं प्रायो हि धर्मोऽयं क्षत्रियाणां नराधिप ।
युद्धे क्षत्रियधर्मे च निरतोऽयं वृकोदरः ॥ ८ ॥
‘ नरेश्वर! क्षत्रियोंका यह धर्म प्रायः ऐसा ही है । भीमसेन युद्ध और क्षत्रिय- धर्ममें प्रायः निरत रहते हैं ॥
वृकोदरकृते चाहमर्जुनश्च पुनः पुनः ।
प्रसीद याचे नृपते भवान् प्रभुरिहास्ति यत् ॥ ९ ॥
‘ भीमसेनके कटु बर्तावके लिये मैं और अर्जुन दोनों आपसे बार- बार क्षमायाचना करते हैं । नरेश्वर! आप प्रसन्न हों । मेरे पास जो कुछ भी है, उसके स्वामी आप ही हैं ॥ ९ ॥
तद् ददातु भवान् वित्तं यावदिच्छसि पार्थिव ।
त्वमीश्वरोऽस्य राज्यस्य प्राणानामपि भारत ॥ १० ॥
‘ पृथ्वीनाथ! भरतनन्दन! आप जितना धन दान करना चाहें, करें । आप मेरे राज्य और प्राणोंके भी ईश्वर हैं ' ॥ १० ॥
ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च पुत्राणामौर्ध्वदेहिकम् ।
इतो रत्नानि गाश्चैव दासीदासमजाविकम् ॥ ११ ॥
आनयित्वा कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छतु । 'ब्राह्मणोंको माफी जमीन दीजिये और पुत्रोंका श्राद्ध कीजिये । ' युधिष्ठिरने यह भी कहा है कि ' महाराज धृतराष्ट्र मेरे यहाँसे नाना प्रकारके रत्न, गौएँ, दास, दासियाँ और भेंड़-बकरे मँगवाकर ब्राह्मणोंको दान करें ॥ ११३ ॥
दीनान्धकृपणेभ्यश्च तत्र तत्र नृपाज्ञया ॥ १२ ॥
बह्वन्नरसपानाढ्याः सभा विदुर कारय ।
गवां निपानान्यन्यच्च विविधं पुण्यकं कुरु ॥ १३ ॥
‘ विदुरजी! आप राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे दीनों, अन्धों और कंगालोंके लिये भिन्न-भिन्न स्थानोंमें प्रचुर अन्न, रस और पीनेयोग्य पदार्थोंसे भरी हुई अनेक धर्मशालाएँ बनवाइये तथा गौओंके पानी पीनेके लिये बहुत - से पौंसलोंका निर्माण कीजिये । साथ ही दूसरे भी विविध प्रकारके पुण्य कीजिये ॥ १२-१३ ॥
इति मामब्रवीद् राजा पार्थश्चैव धनंजयः ।
यदत्रानन्तरं कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १४ ॥
‘ इस प्रकार राजा युधिष्ठिर और अर्जुनने मुझसे बार- बार कहा है । अब इसके बाद जो कार्य करना हो, उसे आप बताइये ' ॥ १४ ॥
इत्युक्ते विदुरेणाथ धृतराष्ट्रोऽभिनन्द्य तान् ।
मनश्चक्रे महादाने कार्तिक्यां जनमेजय ॥ १५ ॥
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जनमेजय! विदुरके ऐसा कहनेपर धृतराष्ट्रने पाण्डवोंकी बड़ी प्रशंसा की 3 कार्तिककी तिथियोंमें बहुत बड़ा दान करनेका निश्चय किया ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि विदुरवाक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें विदुरका वाक्यविषयक तेरहवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १३ ॥
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चतुर्दशोऽध्यायः राजा धृतराष्ट्रके द्वारा मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध एवं विशाल दान - यज्ञका अनुष्ठान वैशम्पायन उवाच
विदुरेणैवमुक्तस्तु धृतराष्ट्रो जनाधिपः ।
प्रीतिमानभवद् राजन् राज्ञो जिष्णोश्च कर्मणि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज जनमेजय! विदुरके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्र युधिष्ठिर और अर्जुनके कार्यसे बहुत प्रसन्न हुए ॥ १ ॥
ततोऽभिरूपान् भीष्माय ब्राह्मणानृषिसत्तमान् ।
पुत्रार्थे सुहृदश्चैव स समीक्ष्य सहस्रशः ॥ २ ॥
कारयित्वान्नपानानि यानान्याच्छादनानि च ।
सुवर्णमणिरत्नानि दासीदासमजाविकम् ॥ ३ ॥
कम्बलानि च रत्नानि ग्रामान् क्षेत्रं तथा धनम् ।
सालङ्कारान् गजानश्वान् कन्याश्चैव वरस्त्रियः ॥ ४ ॥
तदनन्तर उन्होंने भीष्मजी तथा अपने पुत्रोंके श्राद्धके लिये सुयोग्य एवं श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियों तथा सहस्रों सुहृदोंको निमन्त्रित किया । निमन्त्रित करके उनके लिये अन्न, पान, सवारी, ओढ़नेके वस्त्र, सुवर्ण, मणि, रत्न, दास -दासी, भेंड़- बकरे, कम्बल, उत्तम- उत्तम रत्न, ग्राम, खेत, धन, आभूषणोंसे विभूषित हाथी और घोड़े तथा सुन्दरी कन्याएँ एकत्र कीं ॥ २– ४ ॥
उद्दिश्योद्दिश्य सर्वेभ्यो ददौ स नृपसत्तमः ।
द्रोणं संकीर्त्य भीष्मं च सोमदत्तं च बाह्निकम् ॥ ५ ॥
दुर्योधनं च राजानं पुत्रांश्चैव पृथक् पृथक् ।
जयद्रथपुरोगांश्च सुहृदश्चापि सर्वशः ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् उन नृपश्रेष्ठने सम्पूर्ण मृत व्यक्तियोंके उद्देश्यसे एक- एकका नाम लेकर उपर्युक्त वस्तुओंका दान किया । द्रोण, भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, राजा दुर्योधन तथा अन्य पुत्रोंका और जयद्रथ आदि सभी सगे - सम्बन्धियोंका नामोच्चारण करके उन सबके निमित्त पृथक् - पृथक् दान किया ॥ ५-६ ॥
स श्राद्धयज्ञो ववृते बहुशो धनदक्षिणः ।
अनेकधनरत्नौघो युधिष्ठिरमते तदा ॥ ७ ॥
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वह श्राद्धयज्ञ युधिष्ठिरकी सम्मतिके अनुसार बहुत -से धनकी दक्षिणासे सुशोभित हुआ । उसमें नाना प्रकारके धन और रत्नोंकी राशियाँ लुटायी गयीं ॥ ७ ॥
अनिशं यत्र पुरुषा गणका लेखकास्तदा ।
युधिष्ठिरस्य वचनादपृच्छन्त स्म तं नृपम् ॥ ८ ॥
आज्ञापय किमेतेभ्यः प्रदायं दीयतामिति ।
तदुपस्थितमेवात्र वचनान्ते ददुस्तदा ॥ ९ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे हिसाब लगाने और लिखनेवाले बहुतेरे कार्यकर्ता वहाँ निरन्तर उपस्थित रहकर धृतराष्ट्रसे पूछते रहते थे कि बताइये, इन याचकोंको क्या दिया जाय? यहाँ सब सामग्री उपस्थित ही है । धृतराष्ट्र ज्यों ही कहते त्यों ही उतना धन उन याचकोंको वे कर्मचारी दे देते थे ॥ ८ - ९ ॥
शतदेये दशशतं सहस्रे चायुतं तथा ।
दीयते वचनाद् राज्ञः कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ॥ १० ॥
बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके आदेशसे जहाँ सौ देना था, वहाँ हजार दिया गया और हजारकी जगह दस हजार बाँटा गया है ॥ १० ॥
एवं स वसुधाराभिर्वर्षमाणो नृपाम्बुदः ।
तर्पयामास विप्रांस्तान् वर्षन् सस्यमिवाम्बुदः ॥ ११ ॥
जिस प्रकार मेघ पानीकी धारा बहाकर खेतीको हरी- भरी कर देता है, उसी प्रकार राजा धृतराष्ट्ररूपी मेघने धनरूपी वारिधाराकी वर्षा करके समस्त ब्राह्मणरूपी खेतीको तृप्त एवं हरी- भरी कर दिया ॥ ११ ॥
ततोऽनन्तरमेवात्र सर्ववर्णान् महामते ।
अन्नपानरसौघेण प्लावयामास पार्थिवः ॥ १२ ॥
महामते! तदनन्तर सभी वर्णके लोगोंको भाँति- भाँतिके भोजन और पीनेयोग्य रस प्रदान करके राजाने उन सबको संतुष्ट कर दिया ॥ १२ ॥
स वस्त्रधनरत्नौघो मृदङ्गनिनदो महान् ।
गवाश्वमकरावर्तो नानारत्नमहाकरः ॥ १३ ॥
ग्रामाग्रहारद्वीपाढ्यो मणिहेमजलार्णवः ।
जगत् सम्प्लावयामास धृतराष्ट्रोडुपोद्धतः ॥ १४ ॥
वह दानयज्ञ एक उमड़ते हुए महासागरके समान जान पड़ता था । वस्त्र, धन और रत्न —ये ही उसके प्रवाह थे । मृदंगोंकी ध्वनि उस समुद्रकी गर्जना थी । उसका स्वरूप विशाल था । गाय, बैल और घोड़े उसमें घड़ियालों और भँवरोंके समान जान पड़ते थे । नाना प्रकारके रत्नोंका वह महान् आकर बना हुआ था । दानमें दिये जानेवाले गाँव और माफी भूमि— ये ही उस समुद्रके द्वीप थे । मणि और सुवर्णमय जलसे वह लबालब भरा था और
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धृतराष्ट्ररूपी पूर्ण चन्द्रमाको देखकर उसमें ज्वार- सा उठ गया था। इस प्रकार उस दान-सिन्धुने सम्पूर्ण जगत्को आप्लावित कर दिया था ॥ १३-१४ ॥
एवं स पुत्रपौत्राणां पितॄणामात्मनस्तथा ।
गान्धार्याश्च महाराज प्रददावौर्ध्वदेहिकम् ॥ १५ ॥
महाराज! इस प्रकार उन्होंने पुत्रों, पौत्रों और पितरोंका तथा अपना एवं गान्धारीका भी श्राद्ध किया ॥
परिश्रान्तो यदासीत् स ददद् दानान्यनेकशः ।
निवर्तयामास तदा दानयज्ञं नराधिपः ॥ १६ ॥
जब अनेक प्रकारके दान देते - देते राजा धृतराष्ट्र बहुत थक गये, तब उन्होंने उस दान-यज्ञको बंद किया ॥
एवं स राजा कौरव्य चक्रे दानमहाक्रतुम् ।
नटनर्तकलास्याढ्यं बह्वन्नरसदक्षिणम् ॥ १७ ॥
कुरुनन्दन! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रने दान नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया । उसमें प्रचुर अन्न, रस एवं असंख्य दक्षिणाका दान हुआ । उस उत्सवमें नटों और नर्तकोंके नाच-गानका भी आयोजन किया गया था ॥ १७ ॥
दशाहमेवं दानानि दत्त्वा राजाम्बिकासुतः ।
बभूव पुत्रपौत्राणामनृणो भरतर्षभ ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार लगातार दस दिनोंतक दान देकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र पुत्रों और पौत्रोंके ऋणसे मुक्त हो गये ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि दानयज्ञे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमेंदानयज्ञविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
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पञ्चदशोऽध्यायः गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान वैशम्पायन उवाच
ततः प्रभाते राजा स धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
आहुय पाण्डवान् वीरान् वनवासे कृतक्षणः ॥ १ ॥
गान्धारीसहितो धीमानभ्यनन्दद् यथाविधि । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर ग्यारहवें दिन प्रातः काल गान्धारीसहित बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने वनवासकी तैयारी करके वीर पाण्डवोंको बुलाया और उनका यथावत् अभिनन्दन किया ॥ १३ ॥
कार्तिक्यां कारयित्वेष्टिं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ २ ॥
अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य वल्कलाजिनसंवृतः ।
वधूजनवृतो राजा निर्ययौ भवनात् ततः ॥ ३ ॥
उस दिन कार्तिककी पूर्णिमा थी । उसमें उन्होंने वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंसे यात्राकालोचित इष्टि करवाकर वल्कल और मृगचर्म धारण किये और अग्निहोत्रको आगे करके पुत्र - वधुओंसे घिरे हुए राजा धृतराष्ट्र राजभवन से बाहर निकले ॥ २-३ ॥ ततः स्त्रियः कौरवपाण्डवानां याश्चापराः कौरवराजवंश्याः । तासां नादः प्रादुरासीत् तदानीं वैचित्रवीर्ये नृपतौ प्रयाते ॥ ४ ॥
विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार प्रस्थान करनेपर कौरवों और पाण्डवोंकी स्त्रियाँ तथा कौरवराजवंशकी अन्यान्य महिलाएँ सहसा रो पड़ीं । उनके रोनेका महान् शब्द उस समय सब ओर गूँज उठा था ॥ ततो लाजैः सुमनोभिश्च राजा विचित्राभिस्तद् गृहं पूजयित्वा । सम्पूज्यार्थैर्भृत्यवर्गं च सर्वं ततः समुत्सृज्य ययौ नरेन्द्रः ॥ ५ ॥
घरसे निकलकर राजा धृतराष्ट्रने लावा और भाँति- भाँतिके फूलोंसे उस राजभवनकी पूजा की और समस्त सेवकवर्गका धनसे सत्कार करके उन सबको छोड़कर वे महाराज वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥
ततो राजा प्राञ्जलिर्वेपमानो युधिष्ठिरः सस्वरं बाष्पकण्ठः ।
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विमुच्योच्चैर्महानादं हि साधो क्व यास्यसीत्यपतत् तात भूमौ ॥ ६ ॥
तात! उस समय राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़े हुए काँपने लगे । आँसुओंसे उनका गला भर आया। वे जोर- जोरसे महान् आर्तनाद करते हुए फूट- फूटकर रोने लगे । और ‘ महात्मन्!
आप मुझे छोड़कर कहाँ चले जा रहे हैं । ' ऐसा कहते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६ ॥
तथार्जुनस्तीव्रदुःखाभितप्तो मुहुर्मुहुर्निःश्वसन् भारताग्र्यः । युधिष्ठिरं मैवमित्येवमुक्त्वा निगृह्याथो दीनवत् सीदमानः ॥ ७ ॥
उस समय भरतवंशके अग्रगण्य वीर अर्जुन दुस्सह दुःखसे संतप्त हो बारंबार लंबी साँस खींचते हुए वहाँ युधिष्ठिरसे बोले — ' भैया! आप ऐसे अधीर न हो जाइये । ' यों कहकर वे उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर दीनकी भाँति शिथिल होकर बैठ गये ॥ ७ ॥
वृकोदरः फाल्गुनश्चैव वीरौ माद्रीपुत्रौ विदुरः संजयश्च । वैश्यापुत्रः सहितो गौतमेन धौम्यो विप्राश्चान्वयुर्बाष्पकण्ठाः ॥ ८ ॥
कुन्ती गान्धारीं बद्धनेत्रां व्रजन्तीं स्कन्धासक्तं हस्तमथोद्वहन्ती । राजा गान्धार्याः स्कन्धदेशेऽवसज्य पाणिं ययौ धृतराष्ट्रः प्रतीतः ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् युधिष्ठिरसहित भीमसेन, अर्जुन, वीर माद्रीकुमार, विदुर, संजय, वैश्यापुत्र युयुत्सु, कृपाचार्य, धौम्य तथा और भी बहुत - से ब्राह्मण आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठ होकर उनके पीछे - पीछे चले । आगे- आगे कुन्ती अपने कंधेपर रखे हुए गान्धारीके हाथको पकड़े चल रही थीं । उनके पीछे आँखोंपर पट्टी बाँधे गान्धारी थी और राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके कंधेपर हाथ रखे निश्चिन्ततापूर्वक चले जा रहे थे ॥ ८- ९ ॥
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तथा कृष्णा द्रौपदी सात्वती च बालापत्या चोत्तरा कौरवी च । चित्राङ्गदा याश्च काश्चित्स्त्रियोऽन्याः सार्धं राज्ञा प्रस्थितास्ता वधूभिः ॥ १० ॥
द्रुपदकुमारी कृष्णा, सुभद्रा, गोदमें नन्हा सा बालक लिये उत्तरा, कौरव्यनागकी पुत्री उलूपी, बभ्रुवाहनकी माता चित्रांगदा तथा अन्य जो कोई भी अन्तःपुरकी स्त्रियाँ थीं; वे सब अपनी बहुओंसहित राजा धृतराष्ट्रके साथ चल पड़ीं ॥ १० ॥
तासां नादो रुदतीनां तदासीद् राजन् दुःखात् कुररीणामिवोच्चैः । ततो निष्पेतुर्ब्राह्मणक्षत्रियाणां विट्शूद्राणां चैव भार्याः समान्तात् ॥ ११ ॥
राजन्! उस समय वे सब स्त्रियाँ दुःखसे व्याकुल हो कुररियोंके समान उच्चस्वरसे विलाप कर रही थीं । उनके रोनेका कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया था । उसे सुनकर पुरवासी ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रोंकी स्त्रियाँ भी चारों ओरसे घर छोड़कर बाहर निकल आयीं ॥ ११ ॥
तन्निर्याणे दुःखितः पौरवर्गो
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गजाह्वये चैव बभूव राजन् । यथा पूर्वं गच्छतां पाण्डवानां द्यूते राजन् कौरवाणां सभायाः ॥ १२ ॥
राजन्! जैसे पूर्वकालमें द्यूतक्रीड़ाके समय कौरवसभासे निकलकर वनवासके लिये पाण्डवोंके प्रस्थान करनेपर हस्तिनापुरके नागरिकोंका समुदाय दुःखमें डूब गया था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके जाते समय भी समस्त पुरवासी शोकसे संतप्त हो उठे थे ॥ १२ ॥
या नापश्यंश्चन्द्रमसं न सूर्यं रामाः कदाचिदपि तस्मिन् नरेन्द्रे । महावनं गच्छति कौरवेन्द्रे शोकेनार्ता राजमार्गं प्रपेदुः ॥ १३ ॥
रनिवासकी जिन रमणियोंने कभी बाहर आकर सूर्य और चन्द्रमाको भी नहीं देखा था, वे ही कौरवराज धृतराष्ट्रके महावनके लिये प्रस्थान करते समय शोकसे व्याकुल होकर खुली सड़कपर आ गयी थीं ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्याणे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका नगरसे निकलनाविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
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षोडशोऽध्यायः धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना वैशम्पायन उवाच
ततः प्रासादहर्म्येषु वसुधायां च पार्थिव ।
नारीणां च नराणां च निःस्वनः सुमहानभूत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - पृथ्वीनाथ! तदनन्तर महलों और अट्टालिकाओंमें तथा पृथ्वीपर भी रोते हुए नर- नारियोंका महान् कोलाहल छा गया ॥ १ ॥
स राजा राजमार्गेण नृनारीसंकुलेन च ।
कथंचिन्निर्ययौ धीमान् वेपमानः कृताञ्जलिः ॥ २ ॥
सारी सड़क पुरुषों और स्त्रियोंकी भीड़से भरी हुई थी । उसपर चलते हुए बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र बड़ी कठिनाईसे आगे बढ़ पाते थे । उनके दोनों हाथ जुड़े हुए थे और शरीर काँप रहा था ॥ २ ॥
स वर्द्धमानद्वारेण निर्ययौ गजसाह्वयात् ।
विसर्जयामास च तं जनौघं स मुहुर्मुहुः ॥ ३ ॥
राजा धृतराष्ट्र वर्धमान नामक द्वारसे होते हुए हस्तिनापुरसे बाहर निकले । वहाँ पहुँचकर उन्होंने बारंबार आग्रह करके अपने साथ आये हुए जनसमूहको विदा किया ॥ ३ ॥
वनं गन्तुं च विदुरो राज्ञा सह कृतक्षणः ।
संजयश्च महामात्रः सूतो गावल्गणिस्तथा ॥ ४ ॥
विदुर और गवल्गणकुमार महामात्र सूत संजयने राजाके साथ ही वनमें जानेका निश्चय कर लिया था ॥ ४ ॥
कृपं निवर्तयामास युयुत्सुं च महारथम् ।
धृतराष्ट्रो महीपालः परिदाप्य युधिष्ठिरे ॥ ५ ॥
महाराज धृतराष्ट्रने कृपाचार्य और महारथी युयुत्सुको युधिष्ठिरके हाथों सौंपकर लौटाया ॥ ५ ॥
निवृत्ते पौरवर्गे च राजा सान्तःपुरस्तदा ।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो निवर्तितुमियेष ह ॥ ६ ॥
पुरवासियोंके लौट जानेपर अन्तःपुरकी रानियोंसहित राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रकी आज्ञा लेकर लौट जानेका विचार किया ॥ ६ ॥