06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2341–2350

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2341–2350

पृष्ठ 2341

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2341 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकविंशोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता वैशम्पायन उवाच

वनं गते कौरवेन्द्रे दुःखशोकसमन्विताः ।

बभूवुः पाण्डवा राजन् मातृशोकेन चान्विताः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कौरवराज धृतराष्ट्रके वनमें चले जानेपर पाण्डव दुःख और शोकसे संतप्त रहने लगे । माताके विछोहका शोक उनके हृदयको दग्ध किये देता था ॥ १ ॥

तथा पौरजनः सर्वः शोचन्नास्ते जनाधिपम् ।

कुर्वाणाश्च कथास्तत्र ब्राह्मणा नृपतिं प्रति ॥ २ ॥

इसी प्रकार समस्त पुरवासी मनुष्य भी राजा धृतराष्ट्रके लिये निरन्तर शोकमग्न रहते थे तथा ब्राह्मणलोग सदा उन वृद्ध नरेशके विषयमें वहाँ इस प्रकार चर्चा किया करते थे ॥ २ ॥

कथं नु राजा वृद्धः स वने वसति निर्जने ।

गान्धारी च महाभागा सा च कुन्ती पृथा कथम् ॥ ३ ॥

' हाय! हमारे बूढ़े महाराज उस निर्जन वनमें कैसे रहते होंगे? महाभागा गान्धारी तथा कुन्तिभोजकुमारी पृथा देवी भी किस तरह वहाँ दिन बिताती होंगी? ॥ ३ ॥

सुखार्हः स हि राजर्षिरसुखी तद् वनं महत् ।

किमवस्थः समासाद्य प्रज्ञाचक्षुर्हतात्मजः ॥ ४ ॥

' जिनके सारे पुत्र मारे गये, वे प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र सुख भोगनेके योग्य होकर भी उस विशाल वनमें जाकर किस अवस्थामें दुःखके दिन बिताते होंगे? ॥ ४ ॥

सुदुष्कृतं कृतवती कुन्ती पुत्रानपश्यती ।

राज्यश्रियं परित्यज्य वनं सा समरोचयत् ॥ ५ ॥

'कुन्तीदेवीने तो बड़ा ही दुष्कर कर्म किया। अपने पुत्रोंके दर्शनसे वंचित हो राज्यलक्ष्मीको ठुकराकर उन्होंने वनमें रहना पसंद किया है ॥ ५ ॥

विदुरः किमवस्थश्च भ्रातुः शुश्रूषुरात्मवान् ।

स च गावल्गणिर्धीमान् भर्तृपिण्डानुपालकः ॥ ६ ॥

‘ अपने भाईकी सेवामें लगे रहनेवाले मनस्वी विदुरजी किस अवस्थामें होंगे? अपने स्वामीके शरीरकी रक्षा करनेवाले बुद्धिमान् संजय भी कैसे होंगे? ' ॥ ६ ॥

आकुमारं च पौरास्ते चिन्ताशोकसमाहताः ।

तत्र तत्र कथाश्चक्रुः समासाद्य परस्परम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2342

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2342 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बच्चेसे लेकर बूढ़ेतक समस्त पुरवासी चिन्ता और शोकसे पीड़ित हो जहाँ- तहाँ एक-दूसरेसे मिलकर उपर्युक्त बातें ही किया करते थे ॥ ७ ॥

पाण्डवाश्चैव ते सर्वे भृशं शोकपरायणाः ।

शोचन्तो मातरं वृद्धामूषुर्नातिचिरं पुरे ॥ ८ ॥

समस्त पाण्डव तो निरन्तर अत्यन्त शोकमें ही डूबे रहते थे । वे अपनी बूढ़ी माताके लिये इतने चिन्तित हो गये कि अधिक कालतक नगरमें नहीं रह सके ॥ ८ ॥

तथैव वृद्धं पितरं हतपुत्रं जनेश्वरम् ।

गान्धारीं च महाभागां विदुरं च महामतिम् ॥ ९ ॥

नैषां बभूव सम्प्रीतिस्तात् विचिन्तयतां तदा ।

न राज्ये न च नारीषु न वेदाध्ययनेषु च ॥ १० ॥

जिनके पुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े ताऊ महाराज धृतराष्ट्रकी, महाभागा गान्धारीकी और परम बुद्धिमान् विदुरकी अधिक चिन्ता करनेके कारण उन्हें कभी चैन नहीं पड़ती थी । न तो राजकाजमें उनका मन लगता था न स्त्रियोंमें । वेदाध्ययनमें भी उनकी रुचि नहीं होती थी ॥ ९ -१० ॥

परं निर्वेदमगमंश्चिन्तयन्तो नराधिपम् ।

तं च ज्ञातिवधं घोरं संस्मरन्तः पुनः पुनः ॥ ११ ॥

राजा धृतराष्ट्रको याद करके वे अत्यन्त खिन्न एवं विरक्त हो उठते थे । भाई- बन्धुओंके उस भयंकर वधका उन्हें बारंबार स्मरण हो आता था ॥ ११ ॥

अभिमन्योश्च बालस्य विनाशं रणमूर्धनि ।

कर्णस्य च महाबाहो संग्रामेष्वपलायिनः ॥ १२ ॥

महाबाहु जनमेजय! युद्धके मुहानेपर जो बालक अभिमन्युका अन्यायपूर्वक विनाश किया गया, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले कर्णका ( परिचय न होनेसे ) जो वध किया गया — इन घटनाओंको याद करके वे बेचैन हो जाते थे ॥ १२ ॥

तथैव द्रौपदेयानामन्येषां सृहृदामपि ।

वधं संस्मृत्य ते वीरा नातिप्रमनसोऽभवन् ॥ १३ ॥

इसी प्रकार द्रौपदीके पुत्रों तथा अन्यान्य सुहृदोंके वधकी बात याद करके उनके मनकी सारी प्रसन्नता भाग जाती थी ॥ १३ ॥

हतप्रवीरां पृथिवीं हृतरत्नां च भारत ।

सदैव चिन्तयन्तस्ते न शर्म चोपलेभिरे ॥ १४ ॥

भरतनन्दन! जिसके प्रमुख वीर मारे गये तथा रत्नोंका अपहरण हो गया, उस पृथ्वीकी दुर्दशाका सदैव चिन्तन करते हुए पाण्डव कभी थोड़ी देरके लिये भी शान्ति नहीं पाते थे ॥ १४ ॥

द्रौपदी हतपुत्रा च सुभद्रा चैव भाविनी ।

पृष्ठ 2343

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2343 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नातिप्रीतियुते देव्यौ तदाऽऽस्तामप्रहृष्ठवत् ॥ १५ ॥

जिनके बेटे मारे गये थे, वे द्रुपदकुमारी कृष्णा और भाविनी सुभद्रा दोनों देवियाँ निरन्तर अप्रसन्न और हर्षशून्य -सी होकर चुपचाप बैठी रहती थीं ॥ १५ ॥

वैराट्यास्तनयं दृष्ट्वा पितरं ते परीक्षितम् ।

धारयन्ति स्म ते प्राणांस्तव पूर्वपितामहाः ॥ १६ ॥

जनमेजय! उन दिनों तुम्हारे पूर्व पितामह पाण्डव उत्तराके पुत्र और तुम्हारे पिता परीक्षित्को देखकर ही अपने प्राणोंको धारण करते थे ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ || इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥

पृष्ठ 2344

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2344 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वाविंशोऽध्यायः माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान वैशम्पायन उवाच

एवं ते पुरुषव्याघ्राः पाण्डवा मातृनन्दनाः ।

स्मरन्तो मातरं वीरा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अपनी माताको आनन्द प्रदान करनेवाले वे पुरुषसिंह वीर पाण्डव इस प्रकार माताकी याद करते हुए अत्यन्त दुखी हो गये थे ॥ १ ॥

ये राजकार्येषु पुरा व्यासक्ता नित्यशोऽभवन् ।

ते राजकार्याणि तदा नाकार्षुः सर्वतः पुरे ॥ २ ॥

प्रविष्टा इव शोकेन नाभ्यनन्दन्त किंचन ।

सम्भाष्यमाणा अपि ते न किंचित् प्रत्यपूजयन् ॥ ३ ॥

जो पहले प्रतिदिन राजकीय कार्योंमें निरन्तर आसक्त रहते थे, वे ही उन दिनों नगरमें कहीं कोई राजकाज नहीं करते थे । मानो उनके हृदयमें शोकने घर बना लिया था । वे किसी भी वस्तुको पाकर प्रसन्न नहीं होते थे । किसीके बातचीत करनेपर भी वे उस बातकी ओर न तो ध्यान देते और न उसकी सराहना करते थे ॥ २-३ ॥

ते स्म वीरा दुराधर्षा गाम्भीर्ये सागरोपमाः ।

शोकोपहतविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन् ॥ ४ ॥

समुद्रके समान गाम्भीर्यशाली दुर्धर्ष वीर पाण्डव उन दिनों शोकसे सुध - बुध खो जानेके कारण अचेत - से हो गये थे ॥ ४ ॥

अचिन्तयंश्च जननीं ततस्ते पाण्डुनन्दनाः ।

कथं नु वृद्धमिथुनं वहत्यतिकृशा पृथा ॥ ५ ॥

तदनन्तर एक दिन पाण्डव अपनी माताके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगे — ‘ हाय! मेरी माता कुन्ती अत्यन्त दुबली हो गयी होंगी । वे उन बूढ़े पति - पत्नी गान्धारी और धृतराष्ट्रकी सेवा कैसे निभाती होंगी? ॥

कथं च स महीपालो हतपुत्रो निराश्रयः ।

पत्न्या सह वसत्येको वने श्वापदसेविते ॥ ६ ॥

' शिकारी जन्तुओंसे भरे हुए उस जंगलमें आश्रयहीन एवं पुत्ररहित राजा धृतराष्ट्र अपनी पत्नीके साथ अकेले कैसे रहते होंगे? ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2345

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2345 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साच देवी महाभागा गान्धारी हतबान्धवा ।

पतिमन्धं कथं वृद्धमन्वेति विजने वने ॥ ७ ॥

'जिनके बन्धु - बान्धव मारे गये हैं, वे महाभागा गान्धारी देवी, उस निर्जन वनमें अपने अन्धे और बूढ़े पतिका अनुसरण कैसे करती होंगी? ॥ ७ ॥

एवं तेषां कथयतामौत्सुक्यमभवत् तदा ।

गमने चाभवद् बुद्धिर्धृतराष्ट्रदिदृक्षया ॥ ८ ॥

इस प्रकार बात करते - करते उनके मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो गयी और उन्होंने धृतराष्ट्रके दर्शनकी इच्छासे वनमें जानेका विचार कर लिया ॥ ८ ॥

सहदेवस्तु राजानं प्रणिपत्येदमब्रवीत् ।

अहो मे भवतो दृष्टं हृदयं गमनं प्रति ॥ ९ ॥

उस समय सहदेवने राजा युधिष्ठिरको प्रणाम करके कहा- ' भैया, मुझे ऐसा दिखायी देता है कि आपका हृदय तपोवनमें जानेके लिये उत्सुक है - यह बड़े हर्षकी बात है ॥ ९ ॥

न हि त्वां गौरवेणाहमशकं वक्तुमञ्जसा ।

गमनं प्रति राजेन्द्र तदिदं समुपस्थितम् ॥ १० ॥

‘ राजेन्द्र! मैं आपके गौरवका खयाल करके संकोचवश वहाँ जानेकी बात स्पष्टरूपसे कह नहीं पाता था । आज सौभाग्यवश वह अवसर अपने - आप उपस्थित हो गया ॥ दिष्ट्या द्रक्ष्यामि तां कुन्तीं वर्तयन्तीं तपस्विनीम् । जटिलां तापसीं वृद्धां कुशकाशपरिक्षताम् ॥ ११ ॥

‘ मेरा अहोभाग्य कि मैं तपस्यामें लगी हुई माता कुन्तीका दर्शन करूँगा । उनके सिरके बाल जटारूपमें परिणत हो गये होंगे! वे तपस्विनी बूढ़ी माता कुश और काशके आसनोंपर शयन करनेके कारण क्षत- विक्षत हो रही होंगी ॥ ११ ॥

प्रासादहर्म्यसंवृद्धामत्यन्तसुखभागिनीम् ।

कदा तु जननीं श्रान्तां द्रक्ष्यामि भृशदुःखिताम् ॥ १२ ॥

'जो महलों और अट्टालिकाओंमें पलकर बड़ी हुई हैं, अत्यन्त सुखकी भागिनी रही हैं, वे ही माता कुन्ती अब थककर अत्यन्त दुःख उठाती होंगी! मुझे कब उनके दर्शन होंगे? ॥ १२ ॥

अनित्याः खलु मर्त्यानां गतयो भरतर्षभ ।

कुन्ती राजसुता यत्र वसत्यसुखिता वने ॥ १३ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! मनुष्योंकी गतियाँ निश्चय ही अनित्य होती हैं, जिनमें पड़कर राजकुमारी कुन्ती सुखोंसे वञ्चित हो वनमें निवास करती हैं ' ॥ १३ ॥

सहदेववचः श्रुत्वा द्रौपदी योषितां वरा ।

पृष्ठ 2346

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2346 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उवाच देवी राजानमभिपूज्याभिनन्द्य च ॥ १४ ॥

सहदेवकी बात सुनकर नारियोंमें श्रेष्ठ महारानी द्रौपदी राजाका सत्कार करके उन्हें प्रसन्न करती हुई बोली– ॥

कदा द्रक्ष्यामि तां देवीं यदि जीवति सा पृथा ।

जीवन्त्या ह्यद्य मे प्रीतिर्भविष्यति जनाधिप ॥ १५ ॥

‘ नरेश्वर! मैं अपनी सास कुन्तीदेवीका दर्शन कब करूँगी? क्या वे अबतक जीवित होंगी? यदि वे जीवित हों तो आज उनका दर्शन पाकर मुझे असीम प्रसन्नता होगी ॥

एषा तेऽस्तु मतिर्नित्यं धर्मे ते रमतां मनः ।

योऽद्यत्वमस्मान् राजेन्द्र श्रेयसा योजयिष्यसि ॥ १६ ॥

' राजेन्द्र! आपकी बुद्धि सदा ऐसी ही बनी रहे। आपका मन धर्ममें ही रमता रहे; क्योंकि आज आप हमलोगोंको माता कुन्तीका दर्शन कराकर परम कल्याणकी भागिनी बनायेंगे ॥ १६ ॥

अग्रपादस्थितं चेमं विद्धि राजन् वधूजनम् ।

काङ्क्षन्तं दर्शनं कुन्त्या गान्धार्याः श्वशुरस्य च ॥ १७ ॥

' राजन्! आपको विदित हो कि अन्तःपुरकी सभी बहुएँ वनमें जानेके लिये पैर आगे बढ़ाये खड़ी हैं । वे सब की सब कुन्ती, गान्धारी तथा ससुरजीके दर्शन करना चाहती ॥ १७ ॥

इत्युक्तः स नृपो देव्या द्रौपद्या भरतर्षभ ।

सेनाध्यक्षान् समानाय्य सर्वानिदमुवाच ह ॥ १८ ॥

‘ भरतभूषण! द्रौपदीदेवीके ऐसा कहनेपर राजा युधिष्ठिरने समस्त सेनापतियोंको बुलाकर कहा- ॥ १८ ॥

निर्यातयत मे सेनां प्रभूतरथकुञ्जराम् ।

द्रक्ष्यामि वनसंस्थं च धृतराष्ट्रं महीपतिम् ॥ १ ९ ॥

‘ तुमलोग बहुत - से रथ और हाथी- घोड़ोंसे सुसज्जित सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दो ।

मैं वनवासी महाराज धृतराष्ट्रके दर्शन करनेके लिये चलूँगा ' ॥ १ ९ ॥

स्त्र्यध्यक्षांश्चाब्रवीद् राजा यानानि विविधानि मे ।

सज्जीक्रियन्तां सर्वाणि शिबिकाश्च सहस्रशः ॥ २० ॥

इसके बाद राजाने रनिवासके अध्यक्षोंको आज्ञा दी - ' तुम सब लोग हमारे लिये भाँति-भाँतिके वाहन और पालकियोंको हजारोंकी संख्यामें तैयार करो ॥ २० ॥

शकटापणवेशाश्च कोशः शिल्पिन एव च ।

निर्यान्तु कोषपालाश्च कुरुक्षेत्राश्रमं प्रति ॥ २१ ॥

‘ आवश्यक सामानोंसे लदे हुए छकड़े, बाजार, दुकानें, खजाना, कारीगर और कोषाध्यक्ष — ये सब कुरुक्षेत्रके आश्रमकी ओर रवाना हो जायँ ॥ २१ ॥

पृष्ठ 2347

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2347 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यश्च पौरजनः कश्चिद् द्रष्टुमिच्छति पार्थिवम् ।

अनावृतः सुविहितः स च यातु सुरक्षितः ॥ २२ ॥

' नगरवासियोंमेंसे जो कोई भी महाराजका दर्शन करना चाहता हो, उसे बेरोक - टोक सुविधापूर्वक सुरक्षितरूपसे चलने दिया जाय ॥ २२ ॥

सूदाः पौरोगवाश्चैव सर्वं चैव महानसम् ।

विविधं भक्ष्यभोज्यं च शकटैरुह्यतां मम ॥ २३ ॥

‘ पाकशालाके अध्यक्ष और रसोइये भोजन बनानेके सब सामानों तथा भाँति- भाँतिके भक्ष्य - भोज्य पदार्थोंको मेरे छकड़ोंपर लादकर ले चलें ॥ २३ ॥

प्रयाणं घुष्यतां चैव श्वोभूत इति मा चिरम् ।

क्रियतां पथि चाप्यद्य वेश्मानि विविधानि च ॥ २४ ॥

'नगरमें यह घोषणा करा दी जाय कि ' कल सबेरे यात्रा की जायगी; इसलिये चलनेवालोंको विलम्ब नहीं करना चाहिये । ' मार्गमें हमलोगोंके ठहरनेके लिये आज ही कई तरहके डेरे तैयार कर दिये जायँ ॥ २४ ॥

एवमाज्ञाप्य राजा स भ्रातृभिः सहपाण्डवः ।

श्वोभूते निर्ययौ राजन् सस्त्रीवृद्धपुरःसरः ॥ २५ ॥

राजन्! इस प्रकार आज्ञा देकर सबेरा होते ही अपने भाई पाण्डवोंसहित राजा युधिष्ठिरने स्त्री और बूढ़ोंको आगे करके नगरसे प्रस्थान किया ॥ २५ ॥

स बहिर्दिवसानेव जनौघं परिपालयन् ।

न्यवसन्नृपतिः पञ्च ततोऽगच्छद् वनं प्रति ॥ २६ ॥

बाहर जाकर पुरवासी मनुष्योंकी प्रतीक्षा करते हुए वे पाँच दिनोंतक एक ही स्थानपर टिके रहे । फिर सबको साथ लेकर वनमें गये ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि युधिष्ठिरयात्रायां द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिरकी वनको यात्राविषयक बाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥

पृष्ठ 2348

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2348 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रयोविंशोऽध्यायः सेनासहित पाण्डवोंकी यात्रा और उनका कुरुक्षेत्रमें पहुँचना वैशम्पायन उवाच

आज्ञापयामास ततः सेनां भरतसत्तमः ।

अर्जुनप्रमुखैर्गुप्तां लोकपालोपमैर्नरैः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर भरतकुलभूषण राजा युधिष्ठिरने लोकपालोंके समान पराक्रमी अर्जुन आदि वीरोंद्वारा सुरक्षित अपनी सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥

योगो योग इति प्रीत्या ततः शब्दो महानभूत् ।

क्रोशतां सादिनां तत्र युज्यतां युज्यतामिति ॥ २ ॥

‘ चलनेको तैयार हो जाओ, तैयार हो जाओ ' इस प्रकार उनका प्रेमपूर्ण आदेश प्राप्त होते ही घुड़सवार सब ओर पुकार- पुकारकर कहने लगे, ' सवारियोंको जोतो, जोतो! ' इस तरहकी घोषणा करनेसे वहाँ महान् कोलाहल मच गया ॥ २ ॥

केचिद् यानैर्नरा जग्मुः केचिदश्वैर्महाजवैः ।

काञ्चनैश्च रथैः केचिज्ज्वलितज्वलनोपमैः ॥ ३ ॥

कुछ लोग पालकियोंपर सवार होकर चले और कुछ लोग महान् वेगशाली घोड़ोंद्वारा यात्रा करने लगे । कितने ही मनुष्य प्रज्वलित अग्निके समान चमकीले सुवर्णमय रथोंपर आरूढ़ होकर वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ३ ॥

गजेन्द्रैश्च तथैवान्ये केचिदुष्टैर्नराधिप ।

पदातिनस्तथैवान्ये नखरप्रासयोधिनः ॥ ४ ॥

नरेश्वर! कुछ लोग गजराजोंपर सवार थे और कुछ ऊँटोंपर । कितने ही बघनखों और भालोंसे युद्ध करनेवाले वीर पैदल ही चल रहे थे ॥ ४ ॥

पौरजानपदाश्चैव यानैर्बहुविधैस्तथा ।

अन्वयुः कुरुराजानं धृतराष्ट्रं दिदृक्षवः ॥ ५ ॥

नगर और जनपदके लोग भी राजा धृतराष्ट्रको देखनेकी इच्छासे नाना प्रकारके वाहनोंद्वारा कुरुराज युधिष्ठिरका अनुसरण करते थे ॥ ५ ॥

स चापि राजवचनादाचार्यो गौतमः कृपः ।

सेनामादाय सेनानीः प्रययावाश्रमं प्रति ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2349

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2349 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजा युधिष्ठिरके आदेशसे सेनापति कृपाचार्य भी सेनाको साथ लेकर आश्रमकी ओर चल दिये ॥ ६ ॥

ततो द्विजैः परिवृतः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।

संस्तूयमानो बहुभिः सूतमागधबन्दिभिः ॥ ७ ॥

पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।

रथानीकेन महता निर्जगाम कुरूद्वहः ॥ ८ ॥

तत्पश्चात् ब्राह्मणोंसे घिरे हुए कुरुराज युधिष्ठिर बहुसंख्यक सूत, मागध और वन्दीजनोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए मस्तकपर श्वेत छत्र धारण किये विशाल रथ- सेनाके साथ वहाँसे चले ॥ ७-८ ॥

गजैश्चाचलसंकाशैर्भीमकर्मा वृकोदरः ।

सज्जयन्त्रायुधोपेतैः प्रययौ पवनात्मजः ॥ ९ ॥

भयंकर पराक्रम करनेवाले पवनपुत्र भीमसेन पर्वताकार गजराजोंकी सेनाके साथ जा रहे थे । उन गजराजोंकी पीठपर अनेकानेक यन्त्र और आयुध सुसज्जित किये गये थे ॥ ९ ॥

माद्रीपुत्रावपि तथा हयारोहौ सुसंवृतौ ।

जग्मतुः शीघ्रगमनौ संनद्धकवचध्वजौ ॥ १० ॥

माद्रीकुमार नकुल और सहदेव भी घोड़ोंपर सवार थे और घुड़सवारोंसे ही घिरे हुए शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे । उन्होंने अपने शरीरमें कवच और घोड़ोंकी पीठपर ध्वज बाँध रखे थे ॥ १० ॥

अर्जुनश्च महातेजा रथेनादित्यवर्चसा ।

वशी श्वेतैर्हयैर्युक्तैर्दिव्येनान्वगमन्नृपम् ॥ ११ ॥

महातेजस्वी जितेन्द्रिय अर्जुन श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी दिव्य रथपर आरूढ़ हो राजा युधिष्ठिरका अनुसरण करते थे ॥ ११ ॥

द्रौपदीप्रमुखाश्चापि स्त्रीसंघाः शिबिकायुताः ।

स्त्र्यध्यक्षगुप्ताः प्रययुर्विसृजन्तोऽमितं वसु ॥ १२ ॥

द्रौपदी आदि स्त्रियाँ भी शिबिकाओंमें बैठकर दीन- दुखियोंको असंख्य धन बाँटती हुई जा रही थीं । रनिवासके अध्यक्ष सब ओरसे उनकी रक्षा कर रहे थे ॥

समृद्धरथहस्त्यश्चं वेणुवीणानुनादितम् ।

शुशुभे पाण्डवं सैन्यं तत् तदा भरतर्षभ ॥ १३ ॥

पाण्डवोंकी सेनामें रथ, हाथी और घोड़ोंकी अधिकता थी । उसमें कहीं वंशी बजती थी और कहीं वीणा । भरतश्रेष्ठ! इन वाद्योंकी ध्वनिसे निनादित होनेके कारण वह पाण्डव- सेना उस समय बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १३ ॥

नदीतीरेषु रम्येषु सरःसु च विशाम्पते ।

पृष्ठ 2350

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2350 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वासान् कृत्वा क्रमेणाथ जग्मुस्ते कुरुपुङ्गवाः ॥ १४ ॥

प्रजानाथ! वे कुरुश्रेष्ठ वीर नदियोंके रमणीय तटों तथा अनेक सरोवरोंपर पड़ाव डालते हुए क्रमशः आगे बढ़ते गये ॥ १४ ॥

युयुत्सुश्च महातेजा धौम्यश्चैव पुरोहितः ।

युधिष्ठिरस्य वचनात् पुरगुप्तिं प्रचक्रतुः ॥ १५ ॥

महातेजस्वी युयुत्सु और पुरोहित धौम्य मुनि युधिष्ठिरके आदेशसे हस्तिनापुरमें ही रहकर राजधानीकी रक्षा करते थे ॥ १५ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा कुरुक्षेत्रमवातरत् ।

क्रमेणोत्तीर्य यमुनां नदीं परमपावनीम् ॥ १६ ॥

उधर राजा युधिष्ठिर क्रमशः आगे बढ़ते हुए परम पावन यमुना नदीको पार करके कुरुक्षेत्रमें जा पहुँचे ॥ १६ ॥

स ददर्शाश्रमं दूराद् राजर्षेस्तस्य धीमतः ।

शतयूपस्य कौरव्य धृतराष्ट्रस्य चैव ह ॥ १७ ॥

कुरुनन्दन! वहाँ पहुँचकर उन्होंने दूरसे ही बुद्धिमान् राजर्षि शतयूप तथा धृतराष्ट्रके आश्रमको देखा ॥ १७ ॥

ततः प्रमुदितः सर्वो जनस्तद् वनमञ्जसा ।

विवेश सुमहानादैरापूर्य भरतर्षभ ॥ १८ ॥

भरतभूषण! इससे उन सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उस वनमें महान् कोलाहल फैलाते हुए अनायास ही प्रवेश किया ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्राश्रमगमने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिर आदिका धृतराष्ट्रके आश्रमपर गमनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥