श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2351–2360

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2351–2360

पृष्ठ 2351

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चतुर्विंशोऽध्यायः पाण्डवों तथा पुरवासियोंका कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रके दर्शन करना वैशम्पायन उवाच

ततस्ते पाण्डवा दूरादवतीर्य पदातयः ।

अभिजग्मुर्नरपतेराश्रमं विनयानताः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर वे समस्त पाण्डव दूरसे ही अपनी सवारियोंसे उतर पड़े और पैदल चलकर बड़ी विनयके साथ राजाके आश्रमपर आये ॥ १ ॥

स च योधजनः सर्वो ये च राष्ट्रनिवासिनः ।

स्त्रियश्च कुरुमुख्यानां पद्भिरेवान्वयुस्तदा ॥ २ ॥

साथ आये हुए समस्त सैनिक, राज्यके निवासी मनुष्य तथा कुरुवंशके प्रधान पुरुषोंकी स्त्रियाँ भी पैदल ही आश्रमतक गयीं ॥ २ ॥

आश्रमं ते ततो जग्मुर्धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः ।

शून्यं मृगगणाकीर्णं कदलीवनशोभितम् ॥ ३ ॥

ततस्तत्र समाजग्मुस्तापसा नियतव्रताः ।

पाण्डवानागतान् द्रष्टुं कौतूहलसमन्विताः ॥ ४ ॥

धृतराष्ट्रका वह पवित्र आश्रम मनुष्योंसे सूना था । उसमें सब ओर मृगोंके झुंड विचर रहे थे और केलेका सुन्दर उद्यान उस आश्रमकी शोभा बढ़ाता था । पाण्डव लोग ज्यों ही उस आश्रममें पहुँचे त्यों ही वहाँ नियमपूर्वक व्रतोंका पालन करनेवाले बहुत- से तपस्वी कौतूहलवश वहाँ पधारे हुए पाण्डवोंको देखनेके लिये आ गये ॥ ३-४ ॥

तानपृच्छत् ततो राजा क्वासौ कौरववंशभृत् ।

पिता ज्येष्ठो गतोऽस्माकमिति बाष्पपरिप्लुतः ॥ ५ ॥

उस समय राजा युधिष्ठिरने उन सबको प्रणाम करके नेत्रोंमें आँसू भरकर उन सबसे पूछा- ' मुनिवरो! कौरववंशका पालन करनेवाले हमारे ज्येष्ठ पिता इस समय कहाँ गये हैं? ' ॥ ५ ॥

ते तमूचुस्ततो वाक्यं यमुनामवगाहितुम् ।

पुष्पाणामुदकुम्भस्य चार्थे गत इति प्रभो ॥ ६ ॥

उन्होंने उत्तर दिया — ‘प्रभो! वे यमुनामें स्नान करने, फूल लाने और पानीका घड़ा भरनेके लिये गये हुए हैं ' ॥

पृष्ठ 2352

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तैराख्यातेन मार्गेण ततस्ते जग्मुरञ्जसा ।

ददृशुश्चाविदूरे तान् सर्वानथ पदातयः ॥ ७ ॥

यह सुनकर उन्हींके बताये हुए मार्गसे वे सब- के - सब पैदल ही यमुनातटकी ओर चल दिये । कुछ ही दूर जानेपर उन्होंने उन सब लोगोंको वहाँसे आते देखा ॥ ७ ॥

ततस्ते सत्वरा जग्मुः पितुर्दर्शनकाङ्क्षिणः ।

सहदेवस्तु वेगेन प्राधावद् यत्र सा पृथा ॥ ८ ॥

सुस्वरं रुरुदे धीमान् मातुः पादावुपस्पृशन् । फिर तो समस्त पाण्डव अपने ताऊके दर्शनकी इच्छासे बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़े । बुद्धिमान् सहदेव तो बड़े वेगसे दौड़े और जहाँ कुन्ती थी, वहाँ पहुँचकर माताके दोनों चरण पकड़कर फूट - फूटकर रोने लगे ॥ ८३ ॥

सा च बाष्पाकुलमुखी ददर्श दयितं सुतम् ॥ ९ ॥

बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य समुन्नाम्य च पुत्रकम् ।

गान्धार्याः कथयामास सहदेवमुपस्थितम् ॥ १० ॥

अनन्तरं च राजानं भीमसेनमथार्जुनम् ।

नकुलं च पृथा दृष्ट्वा त्वरमाणोपचक्रमे ॥ ११ ॥

कुन्तीने भी जब अपने प्यारे पुत्र सहदेवको देखा तो उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली । उन्होंने दोनों हाथोंसे पुत्रको उठाकर छातीसे लगा लिया और गान्धारीसे कहा —‘दीदी! सहदेव आपकी सेवामें उपस्थित है ' । तदनन्तर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुलको देखकर कुन्तीदेवी बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर चलीं ॥ ९ –११ ॥

साह्यग्रे गच्छति तयोर्दम्पत्योर्हतपुत्रयोः ।

कर्षन्ती तौ ततस्ते तां दृष्ट्वा संन्यपतन् भुवि ॥ १२ ॥

वे आगे - आगे चलती थीं और उन पुत्रहीन दम्पतिको अपने साथ खींचे लाती थीं । उन्हें देखते ही पाण्डव उनके चरणोंमें पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥

राजा तान् स्वरयोगेन स्पर्शन च महामनाः ।

प्रत्यभिज्ञाय मेधावी समाश्वासयत प्रभुः ॥ १३ ॥

महामना बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने बोलनेके स्वरसे और स्पर्शसे पाण्डवोंको पहचानकर उन सबको आश्वासन दिया ॥ १३ ॥

ततस्ते बाष्पमुत्सृज्य गान्धारीसहितं नृपम् ।

उपतस्थुर्महात्मानो मातरं च यथाविधि ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् अपने नेत्रोंके आँसू पोंछकर महात्मा पाण्डवोंने गान्धारीसहित राजा धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीको विधिपूर्वक प्रणाम किया ॥ १४ ॥

सर्वेषां तोयकलशान् जगृहुस्ते स्वयं तदा ।

पाण्डवा लब्धसंज्ञास्ते मात्रा चाश्वासिताः पुनः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2353

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इसके बाद मातासे बार- बार सान्त्वना पाकर जब पाण्डव कुछ स्वस्थ एवं सचेत हुए तब उन्होंने उन सबके हाथसे जलके भरे हुए कलश स्वयं ले लिये ॥ १५ ॥

तथा नार्यो नृसिंहानां सोऽवरोधजनस्तदा ।

पौरजानपदाश्चैव ददृशुस्तं जनाधिपम् ॥ १६ ॥

तदनन्तर उन पुरुषसिंहोंकी स्त्रियों तथा अन्तःपुरकी दूसरी स्त्रियोंने और नगर एवं जनपदके लोगोंने भी क्रमशः राजा धृतराष्ट्रका दर्शन किया ॥ १६ ॥

निवेदयामास तदा जनं तन्नामगोत्रतः ।

युधिष्ठिरो नरपतिः स चैनं प्रत्यपूजयत् ॥ १७ ॥

उस समय स्वयं राजा युधिष्ठिरने एक-एक व्यक्तिका नाम और गोत्र बताकर परिचय दिया और परिचय पाकर धृतराष्ट्रने उन सबका वाणीद्वारा सत्कार किया ॥ १७ ॥

स तैः परिवृतो मेने हर्षबाष्पाविलेक्षणः ।

राजाऽऽत्मानं गृहगतं पुरेव गजसाह्वये ॥ १८ ॥

उन सबसे घिरे हुए राजा धृतराष्ट्र अपने नेत्रोंसे हर्षके आँसू बहाने लगे । उस समय उन्हें ऐसा जान पड़ा मानो मैं पहलेकी ही भाँति हस्तिनापुरके राजमहलमें बैठा हूँ ॥ १८ ॥

अभिवादितो वधूभिश्च कृष्णाद्याभिः स पार्थिवः गान्धार्या सहितो धीमान् कुन्त्या च प्रत्यनन्दत ॥ १ ९ ॥ तत्पश्चात् द्रौपदी आदि बहुओंने गान्धारी और कुन्तीसहित बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रको प्रणाम किया और उन्होंने भी उन सबको आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया ॥ १ ९ ॥

ततश्चाश्रममागच्छत् सिद्धचारणसेवितम् ।

दिदृक्षुभिः समाकीर्णं नभस्तारागणैरिव ॥ २० ॥

इसके बाद वे सबके साथ सिद्ध और चारणोंसे सेवित अपने आश्रमपर आये । उस समय उनका आश्रम तारोंसे व्याप्त हुए आकाशकी भाँति दर्शकोंसे भरा था ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि युधिष्ठिरादिधृतराष्ट्रसमागमे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिर आदिका धृतराष्ट्रसे मिलनविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥

पृष्ठ 2354

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पञ्चविंशोऽध्यायः संजयका ऋषियोंसे पाण्डवों, उनकी पत्नियों तथा अन्यान्य स्त्रियोंका परिचय देना वैशम्पायन उवाच

स तैः सह नरव्याघ्रैर्भ्रातृभिर्भरतर्षभ ।

राजा रुचिरपद्माक्षैरासांचक्रे तदाश्रमे ॥ १ ॥

तापसैश्च महाभागैर्नानादेशसमागतैः ।

द्रष्टुं कुरुपतेः पुत्रान् पाण्डवान् पृथुवक्षसः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्र सुन्दर कमलके - से नेत्रोंवाले पुरुषसिंह युधिष्ठिर आदि पाँचों भाइयोंके साथ आश्रममें विराजमान हुए, उस समय वहाँ अनेक देशोंसे आये हुए महाभाग तपस्वीगण कुरुराज पाण्डुके पुत्र - विशाल वक्षःस्थलवाले पाण्डवोंको देखनेके लिये पहलेसे उपस्थित थे ॥ १-२ ॥

तेऽब्रुवन् ज्ञातुमिच्छामः कतमोऽत्र युधिष्ठिरः ।

भीमार्जुनौ यमौ चैव द्रौपदी च यशस्विनी ॥ ३ ॥

उन्होंने पूछा— ‘ हमलोग यह जानना चाहते हैं कि यहाँ आये हुए लोगोंमें महाराज युधिष्ठिर कौन हैं? भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और यशस्विनी द्रौपदीदेवी कौन हैं? ' ॥ ३ ॥

तानाचख्यौ तदा सूतः सर्वांस्तानभिनामतः ।

संजयो द्रौपदीं चैव सर्वाश्चान्याः कुरुस्त्रियः ॥ ४ ॥

उनके इस प्रकार पूछनेपर सूत संजयने उन सबके नाम बताकर पाण्डवों, द्रौपदी तथा कुरुकुलकी अन्य स्त्रियोंका इस प्रकार परिचय दिया ॥ ४ ॥

संजय उवाच य एष जाम्बूनदशुद्धगौर- स्तनुर्महासिंह इव प्रवृद्धः । प्रचण्डघोणः पृथुदीर्घनेत्र- स्ताम्रायताक्षः कुरुराज एषः ॥ ५ ॥

संजय बोले — ये जो विशुद्ध सुवर्णके समान गोरे और सबसे बड़े हैं, देखनेमें महान् सिंहके समान जान पड़ते हैं, जिनकी नासिका नुकीली तथा नेत्र बड़े - बड़े और कुछ-कुछ लालिमा लिये हुए हैं, ये कुरुराज युधिष्ठिर हैं ॥ ५ ॥

अयं पुनर्मत्तगजेन्द्रगामी

पृष्ठ 2355

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प्रतप्तचामीकरशुद्धगौरः ।

पृथ्वायतांसः पृथुदीर्घबाहु- र्वृकोदरः पश्यत पश्यतेमम् ॥ ६ ॥

जो मतवाले गजराजके समान चलनेवाले, तपाये हुए सुवर्णके समान विशुद्ध गौरवर्ण तथा मोटे और चौड़े कन्धेवाले हैं, जिनकी भुजाएँ मोटी और बड़ी - बड़ी हैं, ये ही भीमसेन हैं । आप लोग इन्हें अच्छी तरह देख लें, देख लें ॥। ६ ॥ यस्त्वेष पार्श्वेऽस्य महाधनुष्मान् श्यामो युवा वारणयूथपाभः । सिंहोन्नतांसो गजखेलगामी पद्मायताक्षोऽर्जुन एष वीरः ॥ ७ ॥

इनके बगलमें जो ये महाधनुर्धर और श्याम रंगके नवयुवक दिखायी देते हैं, जिनके कंधे सिंहके समान ऊँचे हैं, जो हाथियोंके यूथपति गजराजके समान प्रतीत होते हैं और हाथीके ही समान मस्तानी चालसे चलते हैं, ये कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले वीरवर अर्जुन हैं ॥ ७ ॥

कुन्तीसमीपे पुरुषोत्तमौ तु यमाविमौ विष्णुमहेन्द्रकल्पौ । मनुष्यलोके सकले समोऽस्ति ययोर्न रूपे न बले न शीले ॥ ८ ॥

कुन्तीके पास जो ये दो श्रेष्ठ पुरुष बैठे दिखायी देते हैं, ये एक ही साथ उत्पन्न हुए नकुल और सहदेव हैं । ये दोनों भाई भगवान् विष्णु और इन्द्रके समान शोभा पाते हैं । रूप, बल और शीलमें इन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥ ८ ॥

इयं पुनः पद्मदलायताक्षी मध्यं वयः किंचिदिव स्पृशन्ती । नीलोत्पलाभा सुरदेवतेव कृष्णा स्थिता मूर्तिमतीव लक्ष्मीः ॥ ९ ॥

ये जो किंचित् मध्यम वयका स्पर्श करती हुई, नील कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली एवं नील उत्पलकी - सी श्यामकान्तिसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी मूर्तिमती लक्ष्मी तथा देवताओंकी देवी- सी जान पड़ती हैं, ये ही महारानी द्रुपदकुमारी कृष्णा हैं ॥ ९ ॥

अस्यास्तु पार्श्वे कनकोत्तमाभा

यैषा प्रभा मूर्तिमतीव सौमी ।

मध्ये स्थिता सा भगिनी द्विजाग्रया- श्चक्रायुधस्याप्रतिमस्य तस्य ॥ १० ॥

पृष्ठ 2356

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विप्रवरो! इनके बगलमें जो ये सुवर्णसे भी उत्तम कान्तिवाली देवी चन्द्रमाकी मूर्तिमती प्रभा - सी विराजमान हो रही हैं और सब स्त्रियोंके बीचमें बैठी हैं, ये अनुपम प्रभावशाली चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा हैं ॥ १० ॥

इयं च जाम्बूनदशुद्धगौरी पार्थस्य भार्या भुजगेन्द्रकन्या । चित्राङ्गदा चैव नरेन्द्रकन्या यैषा सवर्णार्द्रमधूकपुष्पैः ॥ ११ ॥

ये जो विशुद्ध जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान गौर वर्णवाली सुन्दरी देवी बैठी हैं, ये नताराजकन्या उलूपी हैं तथा जिनकी अंगकान्ति नूतन मधूक- पुष्पोंके समान प्रतीत होती

है, ये राजकुमारी चित्रांगदा हैं । ये दोनों भी अर्जुनकी ही पत्नियाँ हैं ॥ ११ ॥

इयं स्वसा राजचमूपतेश्च प्रवृद्धनीलोत्पलदामवर्णा । पस्पर्ध कृष्णेन सदा नृपो यो वृकोदरस्यैष परिग्रहोऽग्रयः ॥ १२ ॥

ये जो इन्दीवरके समान श्यामवर्णवाली राजमहिला विराजमान हैं, भीमसेनकी श्रेष्ठ पत्नी हैं । ये उस राजसेनापति एवं नरेशकी बहन हैं, जो सदा भगवान् श्रीकृष्णसे टक्कर लेनेका हौसला रखता था ॥ १२ ॥

इयं च राज्ञो मगधाधिपस्य सुता जरासन्ध इति श्रुतस्य । यवीयसो माद्रवतीसुतस्य भार्या मता चम्पकदामगौरी ॥ १३ ॥

साथ ही यह जो चम्पाकी मालाके समान गौरवर्णवाली सुन्दरी बैठी हुई है, यह सुविख्यात मगधनरेश जरासंधकी पुत्री एवं माद्रीके छोटे पुत्र सहदेवकी भार्या है ॥ १३ ॥

इन्दीवरश्यामतनुः स्थिता तु यैषा परासन्नमहीतले च । भार्या मता माद्रवतीसुतस्य ज्येष्ठस्य सेयं कमलायताक्षी ॥ १४ ॥

इसके पास जो नीलकमलके समान श्याम रंगवाली महिला है, वह कमलनयनी सुन्दरी माद्रीके ज्येष्ठ पुत्र नकुलकी पत्नी है ॥ १४ ॥

इयं तु निष्टप्तसुवर्णगौरी राज्ञो विराटस्य सुता सपुत्रा । भार्याभिमन्योर्निहतो रणे यो द्रोणादिभिस्तैर्विरथो रथस्थैः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2357

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यह जो तपाये हुए कुन्दनके समान कान्तिवाली तरुणी गोदमें बालक लिये बैठी है, यह राजा विराटकी पुत्री उत्तरा है । यह उस वीर अभिमन्युकी धर्मपत्नी है, जो महाभारत- युद्धमें रथपर बैठे हुए द्रोणाचार्य आदि अनेक महारथियोंद्वारा रथहीन कर दिया जानेपर मारा गया था ॥ १५ ॥

एतास्तु सीमन्तशिरोरुहा याः शुक्लोत्तरीया नरराजपत्न्यः । राज्ञोऽस्य वृद्धस्य परं शताख्याः स्नुषा नृवीराहतपुत्रनाथाः ॥ १६ ॥

इन सबके सिवा ये जितनी स्त्रियाँ सफेद चादर ओढ़े बैठी हुई हैं, जिनकी माँगोंमें सिन्दूर नहीं है, ये सब दुर्योधन आदि सौ भाइयोंकी पत्नियाँ और इन बूढ़े महाराजकी सौ पुत्रवधुएँ हैं । इनके पति और पुत्र रणमें नरवीरोंद्वारा मारे गये हैं ॥ १६ ॥

एता यथामुख्यमुदाहृता वो ब्राह्मण्यभावादृजुबुद्धिसत्त्वाः । सर्वा भवद्भिः परिपृच्छ्यमाना नरेन्द्रपत्न्यः सुविशुद्धसत्त्वाः ॥ १७ ॥

ब्राह्मणत्वके प्रभावसे सरल बुद्धि और विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियो! आपने सबका परिचय पूछा था; इसलिये मैंने इनमेंसे मुख्य- मुख्य व्यक्तियोंका परिचय दे दिया है । ये सभी राजपत्नियाँ विशुद्ध हृदयवाली हैं ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच एवं स राजा कुरुवृद्धवर्यः समागतस्तैर्नरदेवपुत्रैः । पप्रच्छ सर्वं कुशलं तदानीं गतेषु सर्वेष्वथ तापसेषु ॥ १८ ॥

वैशम्पायनने कहा — इस प्रकार संजयके मुखसे सबका परिचय पाकर जब सभी तपस्वी अपनी - अपनी कुटियामें चले गये, तब कुरुकुलके वृद्ध एवं श्रेष्ठ पुरुष राजा धृतराष्ट्र इस प्रकार उन नरदेवकुमारोंसे मिलकर उस समय सबका कुशल- मंगल पूछने लगे ॥ १८ ॥

योधेषु वाप्याश्रममण्डलं तं मुक्त्वा निविष्टेषु विमुच्य पत्रम् । स्त्रीवृद्धबाले च सुसंनिविष्टे यथार्हतस्तान् कुशलान्यपृच्छत् ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 2358

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पाण्डवोंके सैनिकोंने आश्रममण्डलकी सीमाको छोड़कर कुछ दूरपर समस्त वाहनोंको खोल दिया और वहीं पड़ाव डाल दिया तथा स्त्री, वृद्ध और बालकोंका समुदाय छावनीमें सुखपूर्वक विश्राम लेने लगा । उस समय राजा धृतराष्ट्र पाण्डवोंसे मिलकर उनका कुशल-समाचार पूछने लगे ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि ऋषीन् प्रति युधिष्ठिरादिकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमेंऋषियोंके प्रति युधिष्ठिर आदिका परिचयविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥

पृष्ठ 2359

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षड्विंशोऽध्यायः धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश धृतराष्ट्रउवाच

युधिष्ठिर महाबाहो कच्चित् त्वं कुशली ह्यसि ।

सहितो भ्रातृभिः सर्वैः पौरजानपदैस्तथा ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा – महाबाहो युधिष्ठिर! तुम नगर तथा जनपदकी समस्त प्रजाओं और भाइयोंसहित कुशलसे तो हो न? ॥ १ ॥

ये च त्वामनुजीवन्ति कच्चित् तेऽपि निरामयाः ।

सचिवा भृत्यवर्गाश्च गुरवश्चैव ते नृप ॥ २ ॥

नरेश्वर! जो तुम्हारे आश्रित रहकर जीवन - निर्वाह करते हैं, वे मन्त्री, भृत्यवर्ग और गुरुजन भी सुखी और स्वस्थ तो हैं न? ॥ २ ॥

कच्चित् तेऽपि निरातङ्का वसन्ति विषये तव ।

कच्चिद् वर्तसि पौराणीं वृत्तिं राजर्षिसेविताम् ॥ ३ ॥

क्या वे भी तुम्हारे राज्यमें निर्भय होकर रहते हैं? क्या तुम प्राचीन राजर्षियोंसे सेवित पुरानी रीति - नीतिका पालन करते हो? ॥ ३ ॥

कच्चिन्न्यायाननुच्छिद्य कोशस्तेऽभिप्रपूर्यते ।

अरिमध्यस्थमित्रेषु वर्तसे चानुरूपतः ॥ ४ ॥

क्या तुम्हारा खजाना न्यायमार्गका उल्लंघन किये बिना ही भरा जाता है । क्या तुम शत्रु, मित्र और उदासीन पुरुषोंके प्रति यथायोग्य बर्ताव करते हो? ॥ ४ ॥

ब्राह्मणानग्रहारैर्वा यथावदनुपश्यसि ।

कच्चित् ते परितुष्यन्ति शीलेन भरतर्षभ ॥ ५ ॥

भरतश्रेष्ठ! क्या तुम ब्राह्मणोंको माफी जमीन देकर उनपर यथोचित दृष्टि रखते हो? क्या तुम्हारे शील- स्वभावसे वे संतुष्ट रहते हैं? ॥ ५ ॥

शत्रवोऽपि कुतः पौरा भृत्या वा स्वजनोऽपि वा ।

कच्चिद् यजसि राजेन्द्र श्रद्धावान् पितृदेवताः ॥ ६ ॥

राजेन्द्र! पुरवासी स्वजनों और सेवकोंकी तो बात ही क्या है, क्या शत्रु भी तुम्हारे बर्तावसे संतुष्ट रहते हैं? क्या तुम श्रद्धापूर्वक देवताओं और पितरोंका यजन करते हो? ॥ ६ ॥

अतिथीनन्नपानेन कच्चिदर्चसि भारत ।

पृष्ठ 2360

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कच्चिन्नयपथे विप्राः स्वकर्मनिरतास्तव ॥ ७ ॥

क्षत्रिया वैश्यवर्गा वा शूद्रा वापि कुटुम्बिनः । भारत! क्या तुम अन्न और जलके द्वारा अतिथियोंका सत्कार करते हो? क्या तुम्हारे राज्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा कुटुम्बीजन न्याय मार्गका अवलम्बन करते हुए अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहते हैं? ॥ ७३ ॥

कच्चित् स्त्रीबालवृद्धं ते न शोचति न याचते ॥ ८ ॥

जामयः पूजिताः कच्चित् तव गेहे नरर्षभ । नरश्रेष्ठ! तुम्हारे राज्यमें स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंको दुःख तो नहीं भोगना पड़ता? वे जीविकाके लिये भीख तो नहीं माँगते हैं? तुम्हारे घरमें सौभाग्यवती बहू- बेटियोंका आदर-सत्कार तो होता है न? ॥ ८३ ॥

कच्चिद् राजर्षिवंशोऽयं त्वामासाद्य महीपतिम् ॥ ९ ॥

यथोचितं महाराज यशसा नावसीदति । महाराज! राजर्षियोंका यह वंश तुम जैसे राजाको पाकर यथोचित प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है न? इसे यशसे वंचित होकर अपयशका भागी तो नहीं होना पड़ता है? ॥ ९ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्येवंवादिनं तं स न्यायवित् प्रत्यभाषत ॥ १० ॥

कुशलप्रश्नसंयुक्तं कुशलो वाक्यकर्मणि । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धृतराष्ट्रके इस प्रकार कुशल- समाचार पूछनेपर बातचीत करनेमें कुशल न्याय- वेत्ता राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा- ॥ १०३ ॥