06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2381–2390
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2381–2390
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भूरिश्रवाके पिता सोमदत्त भी अपने पिताके साथ ही उस महासमरमें वीरगतिको प्राप्त हुए थे ॥ ४३-४४ ॥
श्रीमतोऽस्य महाबुद्धेः संग्रामेष्वपलायिनः ।
पुत्रस्य ते पुत्रशतं निहतं यद् रणाजिरे ॥ ४५ ॥
तस्य भार्याशतमिदं दुःखशोकसमाहतम् ।
पुनः पुनर्वर्धयानं शोकं राज्ञो ममैव च ॥ ४६ ॥
तेनारम्भेण महता मामुपास्ते महामुने । ‘ आपके पुत्र, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले, परम बुद्धिमान् जो ये श्रीमान् महाराज हैं, इनके जो सौ पुत्र समरांगणमें मारे गये थे, उनकी ये सौ स्त्रियाँ बैठी हैं । ये मेरी बहुएँ दुःख और शोकके आघात सहन करती हुई मेरे और महाराजके भी शोकको बारंबार बढ़ा रही हैं ।महामुने! ये सब - की --सबस शोकके महान् आवेगसे रोती हुई मुझे ही घेरकर बैठी रहती हैं ॥ ४५-४६३ ॥ ये च शूरा महात्मानः श्वशुरा मे महारथाः ॥ ४७ ॥
सोमदत्तप्रभृतयः का नु तेषां गतिः प्रभो । ‘ प्रभो! जो मेरे महामनस्वी श्वशुर शूरवीर महारथी सोमदत्त आदि मारे गये हैं, उन्हें कौन - सी गति प्राप्त हुई है? ॥ ४७३ ॥
तव प्रसादाद् भगवन् विशोकोऽयं महीपतिः ॥ ४८ ॥
यथा स्याद् भविता चाहं कुन्ती चेयं वधूस्तव । - ‘ भगवन्! आपके प्रसादसे ये महाराज, मैं और आपकी बहू कुन्ती – ये सब- के - सब जैसे भी शोकरहित हो जायँ, ऐसी कृपा कीजिये ॥ ४८३ ॥
इत्युक्तवत्यां गान्धार्यां कुन्ती व्रतकृशानना ॥ ४ ९ ॥ प्रच्छन्नजातं पुत्रं तं सस्मारादित्यसंनिभम् । जब गान्धारीने इस प्रकार कहा, तब व्रतसे दुर्बल मुखवाली कुन्तीने गुप्तरूपसे उत्पन्न हुए अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी पुत्र कर्णका स्मरण किया ॥ ४ ९ ॥ तामृषिर्वरदो व्यासो दूरश्रवणदर्शनः ॥ ५० ॥
अपश्यद् दुःखितां देवीं मातरं सव्यसाचिनः । दूरतककी देखने -सुनने और समझनेवाले वरदायक ऋषि व्यासने अर्जुनकी माता कुन्तीदेवीको दुःखमें डूबी हुई देखा ॥ ५० ॥
तामुवाच ततो व्यासो यत् ते कार्यं विवक्षितम् ॥ ५१ ॥
तद् ब्रूहि त्वं महाभागे यत् ते मनसि वर्तते । तब भगवान् व्यासने उनसे कहा - ' महाभागे! तुम्हें किसी कार्यके लिये यदि कुछ कहनेकी इच्छा हो, तुम्हारे मनमें यदि कोई बात उठी हो तो उसे कहो ॥ ५१३ ॥
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श्वशुराय ततः कुन्ती प्रणम्य शिरसा तदा ॥ ५२ ॥
उवाच वाक्यं सव्रीडा विवृण्वाना पुरातनम् ॥ ५३ ॥
तब कुन्तीने मस्तक झुकाकर श्वशुरको प्रणाम किया और लज्जित हो प्राचीन गुप्त रहस्यको प्रकट करते हुए कहा ॥ ५२-५३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि धृतराष्ट्रादिकृतप्रार्थने एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें धृतराष्ट्र आदिकी की हुईप्रार्थनाविषयक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥ Fard
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त्रिंशोऽध्यायः कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना कुन्त्युवाच
भगवन् श्वशुरो मेऽसि दैवतस्यापि दैवतम् ।
स मे देवातिदेवस्त्वं शृणु सत्यां गिरं मम ॥ १ ॥
कुन्ती बोली- भगवन्! आप मेरे श्वशुर हैं, मेरे देवताके भी देवता हैं; अतः मेरे लिये देवताओंसे भी बढ़कर हैं ( आज मैं आपके सामने अपने जीवनका एक गुप्त रहस्य प्रकट करती हूँ) । मेरी यह सच्ची बात सुनिये ॥ १ ॥
तपस्वी कोपनो विप्रो दुर्वासा नाम मे पितुः ।
भिक्षामुपागतो भोक्तुं तमहं पर्यंतोषयम् ॥ २ ॥
एक समयकी बात है, परम क्रोधी तपस्वी ब्राह्मण दुर्वासा मेरे पिताके यहाँ भिक्षाके लिये आये थे । मैंने उन्हें अपने द्वारा की गयी सेवाओंसे संतुष्ट कर लिया ॥
शौचेन त्वागसस्त्यागैः शुद्धेन मनसा तथा ।
कोपस्थानेष्वपि महत्स्त्वकुप्यन्न कदाचन ॥ ३ ॥
मैं शौचाचारका पालन करती, अपराधसे बची रहती और शुद्ध हृदयसे उनकी आराधना करती थी । क्रोधके बड़े - से- बड़े कारण उपस्थित होनेपर भी मैंने कभी उनपर क्रोध नहीं किया ॥ ३ ॥
स प्रीतो वरदो मेऽभूत् कृतकृत्यो महामुनिः ।
अवश्यं ते गृहीतव्यमिति मां सोऽब्रवीद् वचः ॥ ४ ॥
इससे वे वरदायक महामुनि मुझपर बहुत प्रसन्न हुए। जब उनका कार्य पूरा हो गया तब वे बोले — ' तुम्हें मेरा दिया हुआ वरदान अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा' ॥ ४ ॥
ततः शापभयाद् विप्रमवोचं पुनरेव तम् ।
एवमस्त्विति च प्राह पुनरेव स मे द्विजः ॥ ५ ॥
उनकी बात सुनकर मैंने शापके भयसे पुनः उन ब्रह्मर्षिसे कहा - 'भगवन्! ऐसा ही हो । ' तब वे ब्राह्मणदेवता फिर मुझसे बोले- ॥ ५ ॥
धर्मस्य जननी भद्रे भवित्री त्वं शुभानने ।
वशे स्थास्यन्ति ते देवा यांस्त्वमावाहयिष्यसि ॥ ६ ॥
' भद्रे! तुम धर्मकी जननी होओगी । शुभानने! तुम जिन देवताओंका आवाहन करोगी, वे तुम्हारे वशमें हो जायँगे ' ॥ ६ ॥
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इत्युक्त्वान्तर्हितो विप्रस्ततोऽहं विस्मिताभवम् ।
न च सर्वास्ववस्थासु स्मृतिर्मे विप्रणश्यति ॥ ७ ॥
यों कहकर वे ब्रह्मर्षि अन्तर्धान हो गये । उस समय मैं वहाँ आश्चर्यसे चकित हो गयी । किसी भी अवस्थामें उनकी बात मुझे भूलती नहीं थी ॥ ७ ॥
अथ हर्म्यतलस्थाहं रविमुद्यन्तमीक्षती ।
संस्मृत्य तदृषेर्वाक्यं स्पृहयन्ती दिवानिशम् ॥ ८ ॥
एक दिन जब मैं अपने महलकी छतपर खड़ी थी, उगते हुए सूर्यपर मेरी दृष्टि पड़ी ।
महर्षि दुर्वासाके वचनोंका स्मरण करके मैं दिन- रात सूर्यदेवको चाहने लगी ॥ ८ ॥
स्थिताऽहं बालभावेन तत्र दोषमबुद्ध्यती ।
अथ देवः सहस्रांशुर्मत्समीपगतोभवत् ॥ ९ ॥
उस समय मैं बाल - स्वभावसे युक्त थी । सूर्यदेवके आगमनसे किस दोषकी प्राप्ति होगी, इसे मैं नहीं समझ सकी । इधर मेरे आवाहन करते ही भगवान् सूर्य पास आकर खड़े हो गये ॥ ९ ॥
द्विधाकृत्वाऽऽत्मनो देहं भूमौ च गगनेऽपि च ।
तताप लोकानेकेन द्वितीयेनागमत् स माम् ॥ १० ॥
वे अपने दो शरीर बनाकर एकसे आकाशमें रहकर सम्पूर्ण विश्वको प्रकाशित करने लगे और दूसरेसे पृथ्वीपर मेरे पास आ गये ॥ १० ॥
स मामुवाच वेपन्तीं वरं मत्तो वृणीष्व ह ।
गम्यतामिति तं चाहं प्रणम्य शिरसावदम् ॥ ११ ॥
मैं उन्हें देखते ही काँपने लगी । वे बोले – ' देवि! मुझसे कोई वर माँगो । ' तब मैंने सिर झुकाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा - ' कृपया यहाँसे चले जाइये ' ॥ ११ ॥
स मामुवाच तिग्मांशुर्वृथाऽऽह्वानं न मे क्षमम् ।
धक्ष्यामि त्वां च विप्रं च येन दत्तो वरस्तव ॥ १२ ॥
तब उन प्रचण्डरश्मि सूर्यने मुझसे कहा- ' मेरा आवाहन व्यर्थ नहीं हो सकता । तुम कोई-न -कोई वर अवश्य माँग लो अन्यथा मैं तुमको और जिसने तुम्हें वर दिया है, उस ब्राह्मणको भी भस्म कर डालूँगा ' ॥ १२ ॥
तमहं रक्षती विप्रं शापादनपकारिणम् ।
पुत्रो मे त्वत्समो देव भवेदिति ततोऽब्रवम् ॥ १३ ॥
ततो मां तेजसाऽऽविश्य मोहयित्वा च भानुमान् ।
उवाच भविता पुत्रस्तवेत्यभ्यगमद् दिवम् ॥ १४ ॥
तब मैं उन निरपराध ब्राह्मणको शापसे बचाती हुई बोली- ' देव! मुझे आपके समान पुत्र प्राप्त हो । ' इतना कहते ही सूर्यदेव मुझे मोहित करके अपने तेजके द्वारा मेरे शरीरमें
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प्रविष्ट हो गये । तत्पश्चात् बोले- ' तुम्हें एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा। ' ऐसा कहकर वे आकाशमें चले गये ॥ १३-१४ ॥
ततोऽहमन्तर्भवने पितृर्वृत्तान्तरक्षिणी ।
गूढोत्पन्नं सुतं बालं जले कर्णमवासृजम् ॥ १५ ॥
तबसे मैं इस वृत्तान्तको पिताजीसे छिपाये रखनेके लिये महलके भीतर ही रहने लगी और जब गुप्तरूपसे बालक उत्पन्न हुआ तो उसे मैंने पानीमें बहा दिया । वही मेरा पुत्र कर्ण था ॥ १५ ॥
नूनं तस्यैव देवस्य प्रसादात् पुनरेव तु ।
कन्याहमभवं विप्र यथा प्राह स मामृषिः ॥ १६ ॥
विप्रवर! उसके जन्मके बाद पुनः उन्हीं भगवान् सूर्यकी कृपासे मैं कन्याभावको प्राप्त हो गयी । जैसा कि उन महर्षिने कहा था, वैसा ही हुआ ॥ १६ ॥
समया मूढया पुत्रो ज्ञायमानोऽप्युपेक्षितः ।
तन्मां दहति विप्रर्षे यथा सुविदितं तव ॥ १७ ॥
ब्रह्मर्षे! मुझ मूढ़ नारीने अपने पुत्रको पहचान लिया तो भी उसकी उपेक्षा कर दी । यह भूल मुझे शोकाग्निसे दग्ध करती रहती है । आपको तो यह बात अच्छी तरह ज्ञात ही है ॥ १७ ॥
यदि पापमपापं वा तवैतद् विवृतं मया ।
तन्मे दहन्तं भगवन् व्यपनेतुं त्वमर्हसि ॥ १८ ॥
भगवन्! मेरा यह कार्य पाप हो या पुण्य, मैंने इसे आपके सामने प्रकट कर दिया । आप मेरे उस दाहक शोकको दूर कर दें ॥ १८ ॥
यच्चास्य राज्ञो विदितं हृदिस्थं भवतोऽनघ ।
तं चायं लभतां काममद्यैव मुनिसत्तम ॥ १ ९ ॥
निष्पाप मुनिश्रेष्ठ! इन महाराजके हृदयमें जो बात है, वह भी आपको विदित ही है । ये अपने मनोरथको आज ही प्राप्त करें, ऐसी कृपा कीजिये ॥ १ ९ ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं व्यासो वेदविदां वरः ।
साधु सर्वमिदं भाव्यमेवमेतद् यथाऽऽत्थ माम् ॥ २० ॥
कुन्तीके इस प्रकार कहनेपर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि व्यासने कहा– ' बेटी! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है, ऐसी ही होनहार थी ॥ २० ॥
अपराधश्च ते नास्ति कन्याभावं गता ह्यसि ।
देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराण्याविशन्ति वै ॥ २१ ॥
‘ इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है; क्योंकि उस समय तुम अभी कुमारी बालिका थी । देवतालोग अणिमा आदि ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होते हैं; अतः दूसरेके शरीरोंमें प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ २१ ॥
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सन्ति देवनिकायाश्च संकल्पाज्जनयन्ति ये ।
वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात् संघर्षेणेति पञ्चधा ॥ २२ ॥
‘ बहुत - से ऐसे देवसमुदाय हैं, जो संकल्प, वचन, दृष्टि, स्पर्श तथा समागम — इन पाँचों प्रकारोंसे पुत्र उत्पन्न करते हैं ॥ २२ ॥
मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण हि न दुष्यति ।
इति कुन्ति विजानीहि व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ २३ ॥
' कुन्ती! देवधर्मके द्वारा मनुष्यधर्म दूषित नहीं होता, इस बातको जान लो । अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ २३ ॥
सर्वं बलवतां पथ्यं सर्वं बलवतां शुचि ।
सर्वं बलवतां धर्मः सर्वं बलवतां स्वकम् ॥ २४ ॥
‘ बलवानोंका सब कुछ ठीक या लाभदायक है । बलवानोंका सारा कार्य पवित्र है ।
बलवानोंका सब कुछ धर्म है और बलवानोंके लिये सारी वस्तुएँ अपनी हैं ' ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि व्यासकुन्तीसंवादे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमेंव्यास और कुन्तीका संवादविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
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एकत्रिंशोऽध्यायः व्यासजीके द्वारा धृतराष्ट्र आदिके पूर्वजन्मका परिचय तथा उनके कहनेसे सब लोगोंका गङ्गा- तटपर जाना व्यास उवाच
भद्रे द्रक्ष्यसि गान्धारि पुत्रान् भ्रातॄन् सखींस्तथा ।
वधूश्च पतिभिः सार्धं निशि सुप्तोत्थिता इव ॥ १ ॥
व्यासजीने कहा- भद्रे गान्धारि! आज रातमें तुम अपने पुत्रों, भाइयों और उनके मित्रोंको देखोगी । तुम्हारी वधुएँ तुम्हें पतियोंके साथ- साथ सोकर उठी हुई- सी दिखायी देंगी ॥ १ ॥
कर्णं द्रक्ष्यति कुन्ती च सौभद्रं चापि यादवी ।
द्रौपदी पञ्च पुत्रांश्च पितॄन् भ्रातॄंस्तथैव च ॥ २ ॥
कुन्ती कर्णको, सुभद्रा अभिमन्युको तथा द्रौपदी पाँचों पुत्रोंको, पिताको और भाइयोंको भी देखेगी ॥ २ ॥
पूर्वमेवैष हृदये व्यवसायोऽभवन्मम ।
यदास्मि चोदितो राज्ञा भवत्या पृथयैव च ॥ ३ ॥
जब राजा धृतराष्ट्रने, तुमने और कुन्तीने भी मुझे इसके लिये प्रेरित किया था, उससे पहले ही मेरे हृदयमें यह ( मृत व्यक्तियोंके दर्शन करानेका) निश्चय हो गया था ॥ ३ ॥
न ते शोच्या महात्मानः सर्व एव नरर्षभाः ।
क्षत्रधर्मपराः सन्तस्तथा हि निधनं गताः ॥ ४ ॥
तुम्हें क्षत्रिय धर्मपरायण होकर तदनुसार ही वीरगतिको प्राप्त हुए उन समस्त महामनस्वी, नरश्रेष्ठ वीरोंके लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये ॥ ४ ॥
भवितव्यमवश्यं तत् सुरकार्यमनिन्दिते ।
अवतेरुस्ततः सर्वे देवभागा महीतलम् ॥ ५ ॥
सती- साध्वी देवि! यह देवताओंका कार्य था और इसी रूपमें अवश्य होनेवाला था; इसलिये सभी देवताओंके अंश इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे ॥ ५ ॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव पिशाचा गुह्यराक्षसाः ।
तथा पुण्यजनाश्चैव सिद्धा देवर्षयोऽपि च ॥ ६ ॥
देवाश्च दानवाश्चैव तथा देवर्षयोऽमलाः ।
त एते निधनं प्राप्ताः कुरुक्षेत्रे रणाजिरे ॥ ७ ॥
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गन्धर्व, अप्सरा, पिशाच, गुह्यक, राक्षस, पुण्यजन, सिद्ध देवर्षि, देवता, दानव तथा निर्मल देवर्षिगण — ये सभी यहाँ अवतार लेकर कुरुक्षेत्रके समरांगणमें वधको प्राप्त हुए हैं ॥ ६-७ ॥
गन्धर्वराजो यो धीमान् धृतराष्ट्र इति श्रुतः ।
स एव मानुषे लोके धृतराष्ट्रः पतिस्तव ॥ ८ ॥
गन्धर्वोंके लोकमें जो बुद्धिमान् गन्धर्वराज धृतराष्ट्रके नामसे विख्यात हैं, वे ही मनुष्यलोकमें तुम्हारे पति धृतराष्ट्रके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ८ ॥
पाण्डुं मरुद्गणाद् विद्धि विशिष्टतममच्युतम् ।
धर्मस्यांशोऽभवत् क्षत्ता राजा चैव युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले राजा पाण्डुको तुम मरुद्गणोंसे भी श्रेष्ठतम
समझो । विदुर धर्मके अंश थे । राजा युधिष्ठिर भी धर्मके ही अंश हैं ॥
कलिं दुर्योधनं विद्धि शकुनिं द्वापरं तथा ।
दुःशासनादीन् विद्धि त्वं राक्षसान् शुभदर्शने ॥ १० ॥
दुर्योधनको कलियुग समझो और शकुनिको द्वापर| शुभदर्शने! अपने दुःशासन आदि पुत्रोंको राक्षस जानो ॥
मरुद्गणाद् भीमसेनं बलवन्तमरिंदमम् ।
विद्धि त्वं तु नरमृषिमिमं पार्थं धनंजयम् ॥ ११ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले बलवान् भीमसेनको मरुद्गणोंके अंशसे उत्पन्न मानो । इन कुन्तीपुत्र धनंजयको तुम पुरातन ऋषि ' नर ' समझो ॥ ११ ॥
नारायणं हृषीकेशमश्विनौ यमजौ तथा ।
यः स वैरार्थमुद्भूतः संघर्षजननस्तथा ।
तं कर्णं विद्धि कल्याणि भास्करं शुभदर्शने ॥ १२ ॥
यश्च पाण्डवदायादो हतः षड्भिर्महारथैः ।
स सोम इह सौभद्रो योगादेवाभवद् द्विधा ॥ १३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण नारायण ऋषिके अवतार हैं । नकुल और सहदेव दोनोंको अश्विनीकुमार समझो । कल्याणि! जो केवल वैर बढ़ानेके लिये उत्पन्न हुआ था और कौरव-पाण्डवोंमें संघर्ष पैदा करानेवाला था, उस कर्णको सूर्य समझो । जिस पाण्डवपुत्रको छः महारथियोंने मिलकर मारा था, उस सुभद्राकुमार अभिमन्युके रूपमें साक्षात् चन्द्रमा ही इस भूतलपर अवतीर्ण हुए थे । वे अपने योगबलसे दो रूपोंमें प्रकट हो गये थे (एक रूपसे चन्द्रलोकमें रहते थे और दूसरेसे भूतलपर) ॥ १२-१३ ॥
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमादित्यं तपतां वरम् ।
लोकांश्च तापयानं वै विद्धि कर्णं च शोभने ॥ १४ ॥
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शोभने! तपनेवालोंमें श्रेष्ठ सूर्यदेव अपने शरीरके दो भाग करके एकसे सम्पूर्ण लोकोंको ताप देते रहे और दूसरे भागसे कर्णके रूपमें अवतीर्ण हुए । इस तरह कर्णको तुम सूर्यरूप जानो ॥ १४ ॥
द्रौपद्या सह सम्भूतं धृष्टद्युम्नं च पावकात् ।
अग्नेर्भागं शुभं विद्धि राक्षसं तु शिखण्डिनम् ॥ १५ ॥
तुम्हें यह भी ज्ञात होना चाहिये कि जो द्रौपदीके साथ अग्निसे प्रकट हुआ था, वह धृष्टद्युम्न अग्निका शुभ अंश था और शिखण्डीके रूपमें एक राक्षसने अवतार लिया था ॥ १५ ॥
द्रोणं बृहस्पतेर्भागं विद्धि द्रौणिं च रुद्रजम् ।
भीष्मं च विद्धि गाङ्गेयं वसुं मानुषतां गतम् ॥ १६ ॥
द्रोणाचार्यको बृहस्पतिका और अश्वत्थामाको रुद्रका अंश जानो । गंगापुत्र भीष्मको मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण हुआ एक वसु समझो ॥ १६ ॥
एवमेते महाप्रज्ञे देवा मानुष्यमेत्य हि ।
ततः पुनर्गताः स्वर्गं कृते कर्मणि शोभने ॥ १७ ॥
महाप्रज्ञे! शोभने! इस प्रकार ये देवता कार्यवश मानव- शरीरमें जन्म ले अपना काम पूरा कर लेनेपर पुनः स्वर्गलोकको चले गये हैं ॥ १७ ॥
यच्च वै हृदि सर्वेषां दुःखमेतच्चिरं स्थितम् ।
तदद्य व्यपनेष्यामि परलोककृताद् भयात् ॥ १८ ॥
तुम सब लोगोंके हृदयमें इनके लिये पारलौकिक भयके कारण जो चिरकालसे दुःख भरा हुआ है, उसे आज दूर कर दूँगा ॥ १८ ॥
सर्वे भवन्तो गच्छन्तु नदीं भागीरथीं प्रति ।
तत्र द्रक्ष्यथ तान् सर्वान् ये हतास्तत्र संयुगे ॥ १ ९ ॥
इस समय तुम सब लोग गङ्गाजीके तटपर चलो । वहीं सबको समरांगणमें मारे गये अपने सभी सम्बन्धियोंके दर्शन होंगे ॥ १ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच
इति व्यासस्य वचनं श्रुत्वा सर्वो जनस्तदा ।
महता सिंहनादेन गङ्गामभिमुखो ययौ ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! महर्षि व्यासका यह वचन सुनकर सब लोग महान् सिंहनाद करते हुए प्रसन्नतापूर्वक गङ्गातटकी ओर चल दिये ॥ २० ॥
धृतराष्ट्रश्च सामात्यः प्रययौ सह पाण्डवैः ।
सहितो मुनिशार्दूलैर्गन्धर्वैश्च समागतैः ॥ २१ ॥
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राजा धृतराष्ट्र अपने मन्त्रियों, पाण्डवों, मुनिवरों तथा वहाँ आये हुए गन्धर्वोंके साथ गङ्गाजीके समीप गये ॥ २१ ॥
ततो गङ्गां समासाद्य क्रमेण स जनार्णवः ।
निवासमकरोत् सर्वो यथाप्रीति यथासुखम् ॥ २२ ॥
क्रमशः वह सारा जनसमुद्र गङ्गातटपर जा पहुँचा और सब लोग अपनी- अपनी रुचि तथा सुख - सुविधाके अनुसार जहाँ- तहाँ ठहर गये ॥ २२ ॥
राजा च पाण्डवैः सार्धमिष्टे देशे सहानुगः ।
निवासमकरोद् धीमान् सस्त्रीवृद्धपुरःसरः ॥ २३ ॥
बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र स्त्रियों और वृद्धोंको आगे करके पाण्डवों तथा सेवकोंके साथ वहाँ अभीष्ट स्थानमें ठहरे ॥ २३ ॥
जगाम तदहश्चापि तेषां वर्षशतं यथा ।
निशां प्रतीक्षमाणानां दिदृक्षूणां मृतान् नृपान् ॥ २४ ॥
मृत राजाओंको देखनेकी इच्छासे सभी लोग वहाँ रात होनेकी प्रतीक्षा करते रहे; अतः वह दिन उनके लिये सौ वर्षोंके समान जान पड़ा तो भी वह धीरे- धीरे बीत ही गया ॥ २४ ।
अथ पुण्यं गिरिवरमस्तमभ्यगमद् रविः ।
ततः कृताभिषेकास्ते नैशं कर्म समाचरन् ॥ २५ ॥
तदनन्तर सूर्यदेव परम पवित्र अस्ताचलको जा पहुँचे । उस समय सब लोग स्नान करके सायंकालोचित संध्यावन्दन आदि कर्म करने लगे ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि गङ्गातीरगमने एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें सबका गङ्गातीरपर गमनविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥