श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2371–2380
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2371–2380
पृष्ठ 2371
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टाविंशोऽध्यायः महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना वैशम्पायन उवाच
ततः समुपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
व्यासः सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर महात्मा पाण्डवोंके बैठ जानेपर सत्यवतीनन्दन व्यासने इस प्रकार पूछा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र महाबाहो कच्चित् ते वर्धते तपः ।
कच्चिन्मनस्ते प्रीणाति वनवासे नराधिप ॥ २ ॥
‘ महाबाहु धृतराष्ट्र! तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है न? नरेश्वर! वनवासमें तुम्हारा मन तो लगता है न? ॥ २ ॥
कच्चिद् हृदि न ते शोको राजन् पुत्रविनाशजः ।
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि सुप्रसन्नानि तेऽनघ ॥ ३ ॥
‘ राजन्! अब कभी तुम्हारे मनमें अपने पुत्रोंके मारे जानेका शोक तो नहीं होता? निष्पाप नरेश! तुम्हारी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ निर्मल तो हो गयी हैं न? ॥ ३ ॥
कच्चिद् बुद्धिंदृढां कृत्वा चरस्यारण्यकं विधिम् ।
कच्चिद् वधूश्च गान्धारी न शोकेनाभिभूयते ॥ ४ ॥
'क्या तुम अपनी बुद्धिको दृढ़ करके वनवासके कठोर नियमोंका पालन करते हो? बहू गान्धारी कभी शोकके वशीभूत तो नहीं होती? ॥ ४ ॥
महाप्रज्ञा बुद्धिमती देवी धर्मार्थदर्शिनी ।
आगमापायतत्त्वज्ञा कच्चिदेषा न शोचति ॥ ५ ॥
‘ गान्धारी बड़ी बुद्धिमती और महाविदुषी है । यह देवी धर्म और अर्थको समझनेवाली
तथा जन्म - मरणके तत्त्वको जाननेवाली है । इसे तो कभी शोक नहीं होता है ॥ ५ ॥
कच्चित् कुन्ती च राजंस्त्वां शुश्रूषत्यनहंकृता ।
या परित्यज्य स्वं पुत्रं गुरुशुश्रूषणे रता ॥ ६ ॥
‘ राजन्! जो अपने पुत्रोंको त्यागकर गुरुजनोंकी सेवामें लगी हुई है, वह कुन्ती क्या अहंकारशून्य होकर तुम्हारी सेवा शुश्रूषा करती है? ॥ ६ ॥
कच्चिद् धर्मसुतो राजा त्वया प्रत्यभिनन्दितः ।
पृष्ठ 2372
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भीमार्जुनयमाश्चैव कच्चिदेतेऽपि सान्त्विताः ॥ ७ ॥
' क्या तुमने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरका अभिनन्दन किया है? भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवको भी धीरज बँधाया है? ॥ ७ ॥
कच्चिन्नन्दसि दृष्ट्वैतान् कच्चित् ते निर्मलं मनः ।
कच्चिच्च शुद्धभावोऽसि जातज्ञानो नराधिप ॥ ८ ॥
‘ नरेश्वर! क्या इन्हें देखकर तुम प्रसन्न होते हो? क्या इनकी ओरसे तुम्हारे मनकी मैल दूर हो गयी है? क्या ज्ञान- सम्पन्न होनेके कारण तुम्हारे हृदयका भाव शुद्ध हो गया है? ॥ ८ ॥
एतद्धि त्रितयं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु भारत ।
निर्वैरता महाराज सत्यमक्रोध एव च ॥ ९ ॥
‘ महाराज! भरतनन्दन! किसीसे वैर न रखना, सत्य बोलना और क्रोधको सर्वथा त्याग देना – से तीन गुण सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं ॥ ९ ॥
कच्चित् ते न च मोहोऽस्ति वनवासेन भारत ।
स्ववशे वन्यमन्नं वा उपवासोऽपि वा भवेत् ॥ १० ॥
‘ भारत! वनमें उत्पन्न हुआ अन्न तुम्हारे वशमें रहे अथवा तुम्हें उपवास करना पड़े, सभी दशाओंसे वनवाससे तुम्हें मोह तो नहीं होता है? ॥ १० ॥
विदितं चापि राजेन्द्र विदुरस्य महात्मनः ।
गमनं विधिनानेन धर्मस्य सुमहात्मनः ॥ ११ ॥
‘ राजेन्द्र! महात्मा विदुरके, जो साक्षात् महामना धर्मके स्वरूप थे, इस विधिसे परलोकगमनका समाचार तो तुम्हें ज्ञात हुआ ही होगा ॥ ११ ॥
माण्डव्यशापाद्धि स वै धर्मो विदुरतां गतः ।
महाबुद्धिर्महायोगी महात्मा सुमहामनाः ॥ १२ ॥
' माण्डव्य मुनिके शापसे धर्म ही विदुररूपमें अवतीर्ण हुए थे । वे परम बुद्धिमान्, महान् योगी, महात्मा और महामनस्वी थे ॥ १२ ॥
बृहस्पतिर्वा देवेषु शुक्रो वाप्यसुरेषु च ।
न तथा बुद्धिसम्पन्नो यथा स पुरुषर्षभः ॥ १३ ॥
, ' देवताओंमें बृहस्पति और असुरोंमें शुक्राचार्य भी वैसे बुद्धिमान् नहीं हैं, जैसे पुरुषप्रवर विदुर थे ॥ १३ ॥
तपोबलव्ययं कृत्वा सुचिरात् सम्भृतं तदा ।
माण्डव्येनर्षिणा धर्मो ह्यभिभूतः सनातनः ॥ १४ ॥
' माण्डव्य ऋषिने चिरकालसे संचित किये हुए तपोबलका क्षय करके सनातन धर्मदेवको ( शाप देकर ) पराभूत किया था ॥ १४ ॥
नियोगाद् ब्रह्मणः पूर्वं मया स्वेन बलेन च ।
पृष्ठ 2373
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः ॥ १५ ॥
'मैंने पूर्वकालमें ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार अपने तपोबलसे विचित्रवीर्यके क्षेत्र ( भार्या ) में उस परम बुद्धिमान् विदुरको उत्पन्न किया था ॥ १५ ॥
भ्राता तव महाराज देवदेवः सनातनः ।
धारणान्मनसा ध्यानाद् यं धर्मं कवयो विदुः ॥ १६ ॥
' महाराज! तुम्हारे भाई विदुर देवताओंके भी देवता सनातन धर्म थे । मनके द्वारा धर्मका धारण और ध्यान किया जाता है, इसलिये विद्वान् पुरुष उन्हें धर्मके नामसे जानते हैं ॥
सत्येन संवर्धयति यो दमेन शमेन च ।
अहिंसया च दानेन तप्यमानः सनातनः ॥ १७ ॥
‘जो सत्य, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, अहिंसा और दानके रूपमें सेवित होनेपर जगत्के अभ्युदयका साधक होता है, वह सनातन धर्म विदुरसे भिन्न नहीं है ॥ १७ ॥
येन योगबलाज्जातः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
धर्म इत्येष नृपते प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥ १८ ॥
‘जिस अमित बुद्धिमान् और प्राज्ञ देवताने योगबलसे कुरुराज युधिष्ठिरको जन्म दिया था, वह धर्म विदुरका ही स्वरूप है ॥ १८ ॥
यथा वह्निर्यथा वायुर्यथाऽऽपः पृथिवी यथा ।
यथाऽऽकाशं तथा धर्म इह चामुत्र च स्थितः ॥ १ ९ ॥
‘ जैसे अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाशकी सत्ता इहलोक और परलोकमें भी है, उसी प्रकार धर्म भी उभय लोकमें व्याप्त है ॥ १ ९ ॥
सर्वगश्चैव राजेन्द्र सर्वं व्याप्य चराचरम् ।
दृश्यते देवदेवैः स सिद्धेर्निर्मुक्तकल्मषैः ॥ २० ॥
‘ राजेन्द्र! धर्मकी सर्वत्र गति है तथा वह सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त करके स्थित है । जिनके समस्त पाप धुल गये हैं, वे सिद्ध पुरुष तथा देवताओंके देवता ही धर्मका साक्षात्कार करते हैं ॥ २० ॥
यो हि धर्मः स विदुरो विदुरो यः स पाण्डवः ।
स एष राजन् दृश्यस्ते पाण्डवः प्रेष्यवत् स्थितः ॥ २१ ॥
‘ जिन्हें धर्म कहते हैं वे ही विदुर थे और जो विदुर थे, वे ही ये पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर हैं, जो इस समय तुम्हारे सामने दासकी भाँति खड़े हैं ॥ २१ ॥
प्रविष्टः स महात्मानं भ्राता ते बुद्धिसत्तमः ।
दृष्ट्वा महात्मा कौन्तेयं महायोगबलान्वितः ॥ २२ ॥
‘ महान् योगबलसे सम्पन्न और बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे भाई महात्मा विदुर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको सामने देखकर इन्हींके शरीरमें प्रविष्ट हो गये हैं ॥ २२ ॥
पृष्ठ 2374
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्वां चापि श्रेयसा योक्ष्ये न चिराद् भरतर्षभ ।
संशयच्छेदनार्थाय प्राप्तं मां विद्धि पुत्रक ॥ २३ ॥
‘ भरतश्रेष्ठ! अब तुम्हें भी मैं शीघ्र ही कल्याणका भागी बनाऊँगा । बेटा! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि इस समय मैं तुम्हारे संशयोंका निवारण करनेके लिये आया हूँ ॥ २३ ॥
न कृतं यैः पुरा कैश्चित् कर्म लोके महर्षिभिः ।
आश्चर्यभूतं तपसः फलं तद् दर्शयामि वः ॥ २४ ॥
‘ पूर्वकालके किन्हीं महर्षियोंने संसारमें अबतक जो चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं किया था, वह भी आज मैं कर दिखाऊँगा। आज मैं तुम्हें अपनी तपस्याका आश्चर्यजनक फल दिखलाता हूँ ॥ २४ ॥
किमिच्छसि महीपाल मत्तः प्राप्तुमभीप्सितम् ।
द्रष्टुं स्प्रष्टुमथ श्रीतुं तत्कर्ताऽस्मि तवानघ ॥ २५ ॥
‘निष्पाप महीपाल! बताओ, तुम मुझसे कौन- सी अभीष्ट वस्तु पाना चाहते हो? किसको देखने, सुनने अथवा स्पर्श करनेकी तुम्हारी इच्छा है? मैं उसे पूर्ण करूँगा ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यासवाक्यविषयक अट्ठाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
पृष्ठ 2375
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( पुत्रदर्शनपर्व ) एकोनत्रिंशोऽध्यायः धृतराष्ट्रका मृत बान्धवोंके शोकसे दुखी होना तथा गान्धारी और कुन्तीका व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध जनमेजय उवाच
वनवासं गते विप्र धृतराष्ट्रे महीपतौ ।
सभार्ये नृपशार्दूल वध्वा कुन्त्या समन्विते ॥ १ ॥
विदुरे चापि संसिद्धे धर्मराजं व्यपाश्रिते ।
वसत्सु पाण्डुपुत्रेषु सर्वेष्वाश्रममण्डले ॥ २ ॥
यत् तदाश्चर्यमिति वै करिष्यामीत्युवाच ह ।
व्यासः परमतेजस्वी महर्षिस्तद् वदस्व मे ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! जब अपनी धर्मपत्नी गान्धारी और बहू कुन्तीके साथ नृपश्रेष्ठ पृथ्वीपति धृतराष्ट्र वनवासके लिये चले गये, विदुरजी सिद्धिको प्राप्त होकर धर्मराज युधिष्ठिरके शरीरमें प्रविष्ट हो गये और समस्त पाण्डव आश्रममण्डलमें निवास करने लगे, उस समय परम तेजस्वी व्यासजीने जो यह कहा था कि ' मैं आश्चर्यजनक घटना प्रकट करूँगा ' वह किस प्रकार हुई? यह मुझे बताइये ॥ १–३ ॥
वनवासे च कौरव्यः कियन्तं कालमच्युतः ।
युधिष्ठिरो नरपतिर्न्यवसत् सजनस्तदा ॥ ४ ॥
अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर कितने दिनोंतक सब लोगोंके साथ वनमें रहे थे? ॥ ४ ॥
किमाहाराश्च ते तत्र ससैन्या न्यवसन् प्रभो ।
सान्तःपुरा महात्मान इति तद् ब्रूहि मेऽनघ ॥ ५ ॥
प्रभो! निष्पाप मुने! सैनिकों और अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ वे महात्मा पाण्डव क्या आहार करके वहाँ निवास करते थे? ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच तेऽनुज्ञातास्तदा राजन् कुरुराजेन पाण्डवाः ।
पृष्ठ 2376
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विविधान्यन्नपानानि विश्राम्यानुभवन्ति ते ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! कुरुराज धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको नाना प्रकारके अन्न-पान ग्रहण करनेकी आज्ञा दे दी थी; अतः वे वहाँ विश्राम पाकर सभी तरहके उत्तम भोजन करते थे ॥ ६ ॥
मासमेकं विजहुस्ते ससैन्यान्तःपुरा वने ।
अथ तत्रागमद् व्यासो यथोक्तं ते मयानघ ॥ ७ ॥
वे सेनाओं तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ वहाँ एक मासतक वनमें विहार करते रहे ।
अनघ! इसी बीचमें जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है, वहाँ व्यासजीका आगमन हुआ ॥ ७ ॥
तथा च तेषां सर्वेषां कथाभिर्नृपसंनिधौ ।
व्यासमन्वास्यतां राजन्नाजग्मुर्मुनयो परे ॥ ८ ॥
राजन्! राजा धृतराष्ट्रके समीप व्यासजीके पीछे बैठे हुए उन सबलोगोंमें जब उपर्युक्त बातें होती रहीं, उसी समय वहाँ दूसरे - दूसरे मुनि भी आये ॥ ८ ॥
नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः ।
विश्वावसुस्तुम्बुरुश्च चित्रसेनश्च भारत ॥ ९ ॥
भारत! उनमें नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, विश्वावसु, तुम्बुरु तथा चित्रसेन भी थे ॥ ९ ॥
तेषामपि यथान्यायं पूजां चक्रे महातपाः ।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातः कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ १० ॥
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे महातपस्वी कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबकी भी यथोचित पूजा की ॥ १० ॥
निषेदुस्ते ततः सर्वे पूजां प्राप्य युधिष्ठिरात् ।
आसनेषु च पुण्येषु बर्हिणेषु वरेषु च ॥ ११ ॥
युधिष्ठिरसे पूजा ग्रहण करके वे सब- के - सब मोरपंखके बने हुए पवित्र एवं श्रेष्ठ आसनोंपर विराजमान हुए ॥ ११ ॥
तेषु तत्रोपविष्टेषु स तु राजा महामतिः ।
पाण्डुपुत्रैः परिवृतो निषसाद कुरूद्वह ॥ १२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! उन सबके बैठ जानेपर पाण्डवोंसे घिरे हुए परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र बैठे ॥ १२ ॥
गान्धारी चैव कुन्ती च द्रौपदी सात्वती तथा ।
स्त्रियश्चान्यास्तथान्याभिः सहोपविविशुस्ततः ॥ १३ ॥
गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा तथा दूसरी स्त्रियाँ अन्य स्त्रियोंके साथ आस - पास ही एक साथ बैठ गयीं ॥ १३ ॥
तेषां तत्र कथा दिव्या धर्मिष्ठाश्चाभवन् नृप ।
पृष्ठ 2377
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऋषीणां च पुराणानां देवासुरविमिश्रिताः ॥ १४ ॥
नरेश्वर! उस समय उन लोगोंमें धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली दिव्य कथाएँ होने लगीं । प्राचीन ऋषियों तथा देवताओं और असुरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली चर्चाएँ छिड़ गयीं ॥ १४ ॥
ततः कथान्ते व्यासस्तं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठः पुनरेव स तद् वचः ॥ १५ ॥
प्रीयमाणो महातेजाः सर्ववेदविदां वरः । बातचीतके अन्तमें सम्पूर्ण वेदवेत्ताओं और वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महर्षि व्यासजीने प्रसन्न होकर प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रसे पुनः वही बात कही ॥ १५३ ॥
विदितं मम राजेन्द्र यत् ते हृदि विवक्षितम् ॥ १६ ॥
दह्यमानस्य शोकेन तव पुत्रकृतेन वै । ‘ राजेन्द्र! तुम्हारे हृदयमें जो कहनेकी इच्छा हो रही है, उसे मैं जानता हूँ । तुम निरन्तर अपने मरे हुए पुत्रोंके शोकसे जलते रहते हो ॥ १६३ ॥
गान्धार्याश्चैव यद दुःखं हृदि तिष्ठति नित्यदा ॥ १७ ॥
कुन्त्याश्च यन्महाराज द्रौपद्याश्च हृदि स्थितम् । ‘ महाराज! गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदीके हृदयमें भी जो दुःख सदा बना रहता है, वह भी मुझे ज्ञात है ॥ यच्च धारयते तीव्रं दुःखं पुत्रविनाशजम् ॥ १८ ॥
सुभद्रा कृष्णभगिनी तच्चापि विदितं मम । ' श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा अपने पुत्र अभिमन्युके मारे जानेका जो दुःसह दुःख हृदयमें धारण करती है, वह भी मुझसे अज्ञात नहीं है ॥ १८३ ॥
श्रुत्वा समागममिमं सर्वेषां वस्तुतो नृप ॥ १ ९ ॥ संशयच्छेदनार्थाय प्राप्तः कौरवनन्दन । ‘ कौरवनन्दन! नरेश्वर! वास्तवमें तुम सब लोगोंका यह समागम सुनकर तुम्हारे मानसिक संदेहोंका निवारण करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ १ ९ ३ ॥ इमे च देवगन्धर्वाः सर्वे चेमे महर्षयः ॥ २० ॥
पश्यन्तु तपसो वीर्यमद्य मे चिरसम्भृतम् । ' ये देवता, गन्धर्व और महर्षि सब लोग आज मेरी चिरसंचित तपस्याका प्रभाव देखें ॥ २० ॥
तदुच्यतां महाप्राज्ञ कं कामं प्रददामि ते ॥ २१ ॥
प्रवणोऽस्मि वरं दातुं पश्य मे तपसः फलम् ।
पृष्ठ 2378
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' महाप्राज्ञ नरेश! बोलो, मैं तुम्हें कौन-सा अभीष्ट मनोरथ प्रदान करूँ? आज मैं तुम्हें
मनोवाञ्छित वर देनेको तैयार हूँ । तुम मेरी तपस्याका फल देखो' ॥ २१३ ॥
एवमुक्तः स राजेन्द्रो व्यासेनामितबुद्धिना ॥ २२ ॥
मुहूर्तमिव संचिन्त्य वचनायोपचक्रमे । अमित बुद्धिमान् महर्षि व्यासके ऐसा कहनेपर महाराज धृतराष्ट्रने दो घड़ीतक विचार करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ २२ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतश्च सफलं जीवितं च मे ॥ २३ ॥
यन्मे समागमोऽद्येह भवद्भिः सह साधुभिः । ‘ भगवन्! आज मैं धन्य हूँ, आपलोगोंकी कृपाका पात्र हूँ तथा मेरा यह जीवन भी सफल है; क्योंकि आज यहाँ आप जैसे साधु - महात्माओंका समागम मुझे प्राप्त हुआ है ॥ २३६ ॥
अद्य चाप्यवगच्छामि गतिमिष्टामिहात्मनः ॥ २४ ॥
ब्रह्मकल्पैर्भवद्भिर्यत् समेतोऽहं तपोधनाः । ‘ तपोधनो! आप ब्रह्मतुल्य महात्माओंका जो संग मुझे प्राप्त हुआ उससे मैं समझता हूँ कि यहाँ अपने लिये अभीष्ट गति मुझे प्राप्त हो गयी ॥ २४३ ॥
दर्शनादेव भवतां पूतोऽहं नात्र संशयः ॥ २५ ॥
विद्यते न भयं चापि परलोकान्ममानघाः । ' इसमें संदेह नहीं कि मैं आपलोगोंके दर्शनमात्रसे पवित्र हो गया । निष्पाप महर्षियो! अब मुझे परलोकसे कोई भय नहीं है ॥ २५३ ॥
किं तु तस्य सुदुर्बुद्धेर्मन्दस्यापनयैर्भृशम् ॥ २६ ॥
दूयते मे मनो नित्यं स्मरतः पुत्रगृद्धिनः । ‘परन्तु अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले उस मन्दमति दुर्योधनके अन्यायोंसे जो मेरे सारे पुत्र मारे गये हैं, उन्हें पुत्रोंमें आसक्त रहनेवाला मैं सदा याद करता हूँ; इसलिये मेरे मनसे बड़ा दुःख होता है ॥ २६३ ॥
अपापाः पाण्डवा येन निकृताः पापबुद्धिना ॥ २७ ॥
घातिता पृथिवी येन सहया सनरद्विपा । पापपूर्ण विचार रखनेवाले उस दुर्योधनने निरपराध पाण्डवोंको सताया तथा घोड़ों, मनुष्यों और हाथियोंसहित इस सारी पृथ्वीके वीरोंका विनाश करा डाला ॥ २७ ॥
राजानश्च महात्मानो नानाजनपदेश्वराः ॥ २८ ॥
आगम्य मम पुत्रार्थे सर्वे मृत्युवशं गताः । अनेक देशोंके स्वामी महामनस्वी नरेश मेरे पुत्रकी सहायताके लिये आकर सब - के - सब मृत्युके अधीन हो गये ॥ २८३ ॥
पृष्ठ 2379
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ये ते पितॄंश्च दारांश्च प्राणांश्च मनसः प्रियान् ॥ २ ९ ॥ परित्यज्य गताः शूराः प्रेतराजनिवेशनम् । वे सब शूरवीर भूपाल अपने पिताओं, पत्नियों, प्राणों और मनको प्रिय लगनेवाले भोगोंका परित्याग करके यमलोकको चले गये ॥ २ ९ ३ ॥ का नु तेषां गतिर्ब्रह्मन् मित्रार्थे ये हता मृधे ॥ ३० ॥
तथैव पुत्रपौत्राणां मम ये निहता युधि । ‘ ब्रह्मन्! जो मित्रके लिये युद्धमें मारे गये उन राजाओंकी क्या गति हुई होगी? तथा जो रणभूमिमें वीरगतिको प्राप्त हुए हैं, उन मेरे पुत्रों और पौत्रोंको किस गतिकी प्राप्ति हुई होगी? ॥ ३० ॥
दूयते मे मनोऽभीक्ष्णं घातयित्वा महाबलम् ॥ ३१ ॥
भीष्मं शान्तनवं वृद्धं द्रोणं च द्विजसत्तमम् । ‘ महाबली शान्तनुनन्दन भीष्म तथा वृद्ध ब्राह्मणप्रवर द्रोणाचार्यका वध कराकर मेरे मनको बारंबार दुःसह संताप प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥
मम पुत्रेण मूढेन पापेनाकृतबुद्धिना ॥ ३२ ॥
क्षयं नीतं कुलं दीप्तं पृथिवीराज्यमिच्छता । ‘ अपवित्र बुद्धिवाले मेरे पापी एवं मूर्ख पुत्रने समस्त भूमण्डलके राज्यका लोभ करके अपने दीप्तिमान् कुलका विनाश कर डाला ॥ ३२३ ॥
एतत् सर्वमनुस्मृत्य दह्यमानो दिवानिशम् ॥ ३३ ॥
न शान्तिमधिगच्छामि दुःखशोकसमाहतः ।
इति मे चिन्तयानस्य पितः शान्तिर्न विद्यते ॥ ३४ ॥
‘ ये सारी बातें याद करके मैं दिन - रात जलता रहता हूँ । दुःख और शोकसे पीड़ित होनेके कारण मुझे शान्ति नहीं मिलती है । पिताजी! इन्हीं चिन्ताओंमें पड़े - पड़े मुझे कभी शान्ति नहीं प्राप्त होती' ॥ ३३-३४ ॥ वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा विविधं तस्य राजर्षेः परिदेवितम् ।
पुनर्नवीकृतः शोको गान्धार्या जनमेजय ॥ ३५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजर्षि धृतराष्ट्र का वह भाँति- भाँतिसे विलाप सुनकर गान्धारीका शोक फिरसे नया- सा हो गया ॥ ३५ ॥
कुन्त्या द्रुपदपुत्र्याश्च सुभद्रायास्तथैव च ।
तासां च वरनारीणां वधूनां कौरवस्य ह ॥ ३६ ॥
कुन्ती, दौपदी, सुभद्रा तथा कुरुराजकी उन सुन्दरी बहुओंका शोक भी फिरसे उमड़ आया ॥ ३६ ॥
पृष्ठ 2380
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पुत्रशोकसमाविष्टा गान्धारी त्विदमब्रवीत् ।
श्वशुरं बद्धनयना देवी प्राञ्जलिरुत्थिता ॥ ३७ ॥
आँखोंपर पट्टी बाँधे गान्धारी देवी श्वशुरके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं और पुत्रशोकसे संतप्त होकर इस प्रकार बोलीं ॥ ३७ ॥
षोडशेमानि वर्षाणि गतानि मुनिपुङ्गव ।
अस्य राज्ञो हतान् पुत्रान् शोचतो न शमो विभो ॥ ३८ ॥
मुनिवर! प्रभो! इन महाराजको अपने मरे हुए पुत्रोंके लिये शोक करते आज सोलह वर्ष बीत गये; किंतु अबतक इन्हें शान्ति नहीं मिली ॥ ३८ ॥
पुत्रशोकसमाविष्टो निःश्वसन् ह्येष भूमिपः ।
न शेते वसतीः सर्वा धृतराष्ट्रो महामुने ॥ ३ ९ ॥
'महामुने! ये भूमिपाल धृतराष्ट्र पुत्रशोकसे संतप्त हो सदा लम्बी साँस खींचते और
आहें भरते रहते हैं । इन्हें रातभर कभी नींद नहीं आती ॥ ३ ९ ॥
लोकानन्यान् समर्थोऽसि स्रष्टुं सर्वांस्तपोबलात् ।
किमु लोकान्तरगतान् राज्ञो दर्शयितुं सुतान् ॥ ४० ॥
‘ आप अपने तपोबलसे इन सब लोकोंकी दूसरी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं, फिर लोकान्तरमें गये हुए पुत्रोंको एक बार राजासे मिला देना आपके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ४० ॥
इयं च द्रौपदी कृष्णा हतज्ञातिसुता भृशम् ।
शोचत्यतीव सर्वासां स्नुषाणां दयिता स्नुषा ॥ ४१ ॥
'यह द्रुपदकुमारी कृष्णा मुझे अपनी समस्त पुत्र -वधुओंमें सबसे अधिक प्रिय है । इस बेचारीके भाई- बन्धु और पुत्र सभी मारे गये हैं; जिससे यह अत्यन्त शोकमग्न रहा करती है ॥ ४१ ॥
तथा कृष्णस्य भगिनी सुभद्रा भद्रभाषिणी ।
सौभद्रवधसंतप्ता भृशं शोचति भाविनी ॥ ४२ ॥
‘ सदा मंगलमय वचन बोलनेवाली श्रीकृष्णकी बहन भाविनी सुभद्रा सर्वदा अपने पुत्र अभिमन्युके वधसे संतप्त हो निरन्तर शोकमें ही डूबी रहती है ॥
इयं च भूरिश्रवसो भार्या परमसम्मता ।
भर्तृव्यसनशोकार्ता भृशं शोचति भाविनी । ४३ ॥
यस्यास्तु श्वशुरो धीमान् बाह्लिकः स कुरूद्वहः ।
निहतः सोमदत्तश्च पित्रा सह महारणे ॥ ४४ ॥
' ये भूरिश्रवाकी परम प्यारी पत्नी बैठी है, जो पतिकी मृत्युके शोकसे व्याकुल हो अत्यन्त दुःखमें मग्न रहती है । इसके बुद्धिमान् श्वशुर कुरुश्रेष्ठ बाह्लिक भी मारे गये हैं ।