06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2401–2410

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2401–2410

पृष्ठ 2401

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुनः दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा नृपो विद्वान् हृष्टोऽभूज्जनमेजयः ।

पितामहानां सर्वेषां गमनागमनं तदा ॥ १ ॥

सौति कहते हैं — अपने समस्त पितामहोंके इस प्रकार परलोकसे आने और जानेका वृत्तान्त सुनकर विद्वान् राजा जनमेजय बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥

अब्रवीच्च मुदा युक्तः पुनरागमनं प्रति ।

कथं नु त्यक्तदेहानां पुनस्तद्रूपदर्शनम् ॥ २ ॥

प्रसन्न होकर वे पुनरागमनके विषयमें संदेह करते हुए बोले- ' भला, जिन्होंने अपने शरीरका परित्याग कर दिया है, उन पुरुषोंका उसी रूपमें दर्शन कैसे हो सकता है? ' ॥ २ ॥

इत्युक्तः स द्विजश्रेष्ठो व्यासशिष्यः प्रतापवान् ।

प्रोवाच वदतां श्रेष्ठस्तं नृपं जनमेजयम् ॥ ३ ॥

उनके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्यासशिष्य विप्रवर वैशम्पायनने उन राजा जनमेजयसे कहा ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

अविप्रणाशः सर्वेषां कर्मणामिति निश्चयः ।

कर्मजानि शरीराणि तथैवाकृतयो नृप ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी बोले – नरेश्वर! यह सिद्धान्त है कि समस्त कर्मोंका फल भोग किये बिना उनका नाश नहीं होता । जीवात्माको जो शरीर और नाना प्रकारकी आकृतियाँ प्राप्त होती हैं, वे सब कर्मजनित ही हैं ॥ ४ ॥

महाभूतानि नित्यानि भूताधिपतिसंश्रयात् ।

तेषां च नित्यसंवासो न विनाशो वियुज्यताम् ॥ ५ ॥

भूतनाथ भगवान्के आश्रयसे पाँचों महाभूत हमारे शरीरोंकी अपेक्षा नित्य हैं । उन नित्य महाभूतोंका अनित्य शरीरोंके साथ संसार- दशामें नित्य संयोग है । अनित्य शरीरोंका नाश होनेपर इन नित्य महाभूतोंका उनसे वियोगमात्र होता है, विनाश नहीं ॥ ५ ॥

अनायासकृतं कर्म सत्यः श्रेष्ठः फलागमः ।

पृष्ठ 2402

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आत्मा चैभिः समायुक्तः सुखदुःखमुपाश्नुते ॥ ६ ॥

कर्तृत्व- अभिमानके बिना अनायास किये जानेवाले कर्मका जो फल प्राप्त होता है, वह सत्य और श्रेष्ठ है अर्थात् मुक्तिदायक है। कर्तृत्व -अभिमान और परिश्रमपूर्वक किये हुए कर्मोंसे बँधा हुआ जीवात्मा सुख - दुःखका उपभोग करता है ॥ ६ ॥

अविनाश्यस्तथायुक्तः क्षेत्रज्ञ इति निश्चयः ।

भूतानामात्मको भावो यथासौ न वियुज्यते ॥ ७ ॥

क्षेत्रज्ञ इस प्रकार कर्मोंसे संयुक्त होकर भी वास्तवमें अविनाशी ही है, यह निश्चित है । किंतु भूतोंके साथ तादात्म्यभाव स्वीकार कर लेनेके कारण वह ज्ञानके बिना उनसे अलग नहीं हो पाता ॥ ७ ॥

यावन्न क्षीयते कर्म तावत् तस्य स्वरूपता ।

क्षीणकर्मा नरो लोके रूपान्यत्वं नियच्छति ॥ ८ ॥

जबतक शरीरके प्रारब्ध - कर्मोंका क्षय नहीं होता तबतक उस जीवकी उस शरीरसे एकरूपता रहती है । जब कर्मोंका क्षय हो जाता है, तब वह दूसरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

नानाभावास्तथैकत्वं शरीरं प्राप्य संहताः ।

भवन्ति ते तथा नित्याः पृथग्भावं विजानताम् ॥ ९ ॥

भूत- इन्द्रिय आदि नाना प्रकारके पदार्थ शरीरको पाकर एकत्वको प्राप्त हो गये हैं । जो देह आदिको आत्मासे पृथक् जानते हैं, उन योगियोंके लिये वे सारे पदार्थ नित्य आत्मस्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥

अश्वमेधे श्रुतिश्चेयमश्वसंज्ञपनं प्रति ।

लोकान्तरगता नित्यं प्राणा नित्यं शरीरिणाम् ॥ १० ॥

अश्वमेध यज्ञमें जब अश्वका वध किया जाता है, उस समय जो ' सूर्यं ते चक्षुः वातं प्राणः ' ( तुम्हारे नेत्र सूर्यको और प्राण वायुको प्राप्त हों ) इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं, उनसे यह सूचित होता है कि देहधारियोंके प्राण– इन्द्रियाँ निश्चितरूपसे सर्वदा लोकान्तरमें स्थित होती हैं । ( अतः परलोकमें गये हुए जीवोंका वैसे ही रूपसे इस लोकमें पुनः प्रकट हो जाना असम्भव नहीं है ) ॥ १० ॥

अहं हितं वदाम्येतत् प्रियं चेत् तव पार्थिव ।

देवयाना हि पन्थानः श्रुतास्ते यज्ञसंस्तरे ॥ ११ ॥

पृथ्वीनाथ! तुम्हें प्रिय लगे तो मैं तुम्हारे हितकी बात बताता हूँ । यज्ञ आरम्भ करते

समय तुमने देवयान- मार्गोंकी बात सुनी होगी । वे ही तुम्हारे योग्य हैं ॥ ११ ॥

आहृतो यत्र यज्ञस्ते तत्र देवा हितास्तव ।

यदा समन्विता देवाः पशूनां गमनेश्वराः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 2403

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जब तुमने यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया, तभीसे देवतालोग तुम्हारे हितैषी सुहृद् हो गये । जब इस प्रकार देवता मित्रभावसे युक्त होते हैं, तब वे जीवोंको लोकान्तरकी प्राप्ति करानेमें समर्थ होनेके कारण उनपर अनुग्रह करके उन्हें अभीष्ट लोकोंकी प्राप्ति करा देते ॥ १२ ॥

गतिमन्तश्च तेनेष्ट्वा नान्ये नित्या भवत्न्युत ।

नित्येऽस्मिन् पञ्चके वर्गे नित्ये चात्मनि पूरुषः ॥ १३ ॥

अस्य नानासमायोगं यः पश्यति वृथामतिः ।

वियोगे शोचतेऽत्यर्थं स बाल इति मे मतिः ॥ १४ ॥

इसलिये नित्य जीव यज्ञोंद्वारा देवताओंकी आराधना करके लोकान्तरमें जानेकी शक्ति पाते हैं । जो यज्ञ नहीं करते, वे वैसे नहीं हो पाते । यह पाञ्चभौतिक वर्ग नित्य है और आत्मा भी नित्य है । ऐसी दशामें जो मनुष्य उस आत्माका अनेक प्रकारके देहोंसे सम्बन्ध तथा उनके जन्म और नाशसे आत्माका भी जन्म और नाश समझता है, उसकी बुद्धि व्यर्थ है । इसी प्रकार किसीसे किसीका वियोग हो जानेपर जो अत्यन्त शोक करता है, वह भी मेरे मत बालक ही है ॥ १३-१४ ॥

वियोगे दोषदर्शी यः संयोगं स विसर्जयेत् ।

असङ्गे सङ्गमो नास्ति दुःखं भूवि वियोगजम् ॥ १५ ॥

जो वियोगमें दोष देखता है, वह संयोगका त्याग कर दे; क्योंकि असंग आत्मामें संगम या संयोग नहीं है । जो उसमें संयोगका आरोप करता है, उसीको इस भूतलपर वियोगका दुःख सहना पड़ता है ॥ १५ ॥

परापरज्ञस्त्वपरो नाभिमानादुदीरितः ।

अपरज्ञः परां बुद्धिं ज्ञात्वा मोहाद् विमुच्यते ॥ १६ ॥

दूसरा जो अपने - परायेके ज्ञानमें ही उलझा रहता है, वह अभिमानसे ऊपर नहीं उठ पाता । जो किसीके लिये पराया नहीं है, उस परमात्माको जाननेवाला पुरुष उत्तम बुद्धिको पाकर मोहसे मुक्त हो जाता है ॥ १६ ॥

अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः ।

नाहं तं वेद्मि नासौ मां न च मेऽस्ति विरागता ॥ १७ ॥

वह मुक्त पुरुष अव्यक्तसे ही प्रकट हुआ था और पुनः अव्यक्तमें ही लीन हो गया । न मैं उसे जानता हूँ? न वह मुझे | (फिर तुम भी वैसे ही बन्धनमुक्त क्यों न हो गये? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं । ) मुझमें वैराग्य नहीं है ( पर वैराग्य ही मोक्षका मुख्य साधन है । ) ॥ १७ ॥

येन येन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः ।

तेन तेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्नुते ।

मानसं मनसाऽऽप्नोति शरीरं च शरीरवान् ॥ १८ ॥

पृष्ठ 2404

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यह पराधीन जीव जिस -जिस शरीरसे कर्म करता है, उस उस शरीरसे उसका फल अवश्य भोगता है । मानस कर्मका फल मनसे और शारीरिक कर्मका फल शरीर धारण करके भोगता है ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि जनमेजयं प्रति वैशम्पायनवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें जनमेजयके प्रति वैशम्पायनका वाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥

3- क्योंकि वह इन्द्रियोंका विषय नहीं रहा । २- क्योंकि उसके लिये मुझे जाननेका कोई कारण नहीं रहा ।

पृष्ठ 2405

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना वैशम्पायन उवाच

अदृष्ट्वा तु नृपः पुत्रान् दर्शनं प्रतिलब्धवान् ।

ऋषेः प्रसादात् पुत्राणां स्वरूपाणां कुरूद्वह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं –कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने पहले कभी अपने पुत्रोंको नहीं देखा था, परंतु महर्षि व्यासके प्रसादसे उन्होंने उनके स्वरूपका दर्शन प्राप्त कर लिया ॥ १ ॥

स राजा राजधर्मांश्च ब्रह्मोपनिषदं तथा ।

अवाप्तवान्नरश्रेष्ठो बुद्धिनिश्चयमेव च ॥ २ ॥

विदुरश्च महाप्राज्ञो ययौ सिद्धिं तपोबलात् ।

धृतराष्ट्रः समासाद्य व्यासं चैव तपस्विनम् ॥ ३ ॥

उन नरश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने राजधर्म, ब्रह्मविद्या तथा बुद्धिका यथार्थ निश्चय भी पा लिया था । महाज्ञानी विदुरने तो अपने तपोबलसे सिद्धि प्राप्त की थी; परंतु धृतराष्ट्रने तपस्वी व्यासका आश्रय लेकर सिद्धिलाभ किया था ॥ २-३ ॥ जनमेजय उवाच

ममापि वरदो व्यासो दर्शयेत् पितरं यदि ।

तद्रूपवेषवयसं श्रद्दध्यां सर्वमेव ते ॥ ४ ॥

प्रियं मे स्यात् कृतार्थश्च स्यामहं कृतनिश्चयः ।

प्रसादादृषिमुख्यस्य मम कामः समृध्यताम् ॥ ५ ॥

जनमेजयने कहा — ब्रह्मन्! यदि वरदायक भगवान् व्यास मुझे भी मेरे पिताका उसी रूप, वेश और अवस्थामें दर्शन करा दें तो मैं आपकी बतायी हुई सारी बातोंपर विश्वास कर सकता हूँ । उस अवस्थामें मैं कृतार्थ होकर दृढ़ निश्चयको प्राप्त हो जाऊँगा । इससे मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सिद्ध होगा । आज मुनिश्रेष्ठ व्यासजीके प्रसादसे मेरी इच्छा भी पूर्ण होनी चाहिये ॥ सौतिरुवाच

इत्युक्तवचने तस्मिन् नृपे व्यासः प्रतापवान् ।

प्रसादमकरोद् धीमानानयच्च परीक्षितम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2406

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सौति कहते हैं — राजा जनमेजयके इस प्रकार कहनेपर परम प्रतापी बुद्धिमान् महर्षि व्यासने उनपर भी कृपा की । उन्होंने राजा परीक्षित्को उस यज्ञभूमिमें बुला दिया ॥ ६ ॥

ततस्तद्रूपवयसमागतं नृपतिं दिवः ।

श्रीमन्तं पितरं राजा ददर्श जनमेजयः ॥ ७ ॥

स्वर्गसे उसी रूप और अवस्थामें आये हुए अपने तेजस्वी पिता राजा परीक्षित्का भूपाल जनमेजयने दर्शन किया ॥ ७ ॥

शमीकं च महात्मानं पुत्रं तं चास्य शृङ्गिणम् ।

अमात्या येये बभूवुश्च राज्ञस्तांश्च ददर्श ह ॥ ८ ॥

उनके साथ ही महात्मा शमीक और उनके पुत्र शृंगी ऋषि भी थे । राजा परीक्षित्के जो मन्त्री थे, उनका भी जनमेजयने दर्शन किया ॥ ८ ॥

ततः सोऽवभृथे राजा मुदितो जनमेजयः ।

पितरं स्नापयामास स्वयं सस्नौ च पार्थिवः ॥ ९ ॥

( परीक्षिदपि तत्रैव बभूव स तिरोहितः । ) तदनन्तर राजा जनमेजयने प्रसन्न होकर यज्ञान्तस्नानके समय पहले अपने पिताको

नहलाया; फिर स्वयं स्नान किया । फिर राजा परीक्षित् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९ ॥

स्नात्वा स नृपतिर्विप्रमास्तीकमिदमब्रवीत् ।

यायावरकुलोत्पन्नं जरत्कारुसुतं तदा ॥ १० ॥

स्नान करके उन नरेशने यायावरकुलमें उत्पन्न जरत्कारुकुमार आस्तीक मुनिसे इस प्रकार कहा – ||

आस्तीक विविधाश्चर्यो यज्ञोऽयमिति मे मतिः ।

यदद्यायं पिता प्राप्तो मम शोकप्रणाशनः ॥ ११ ॥

‘ आस्तीकजी! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, मेरा यह यज्ञ नाना प्रकारके आश्चर्योंका केन्द्र हो रहा है; क्योंकि आज मेरे शोकोंका नाश करनेवाले ये पिताजी भी यहाँ उपस्थित हो गये थे ' ॥ ११ ॥

आस्तीक उवाच

ऋषिर्द्वैपायनो यत्र पुराणस्तपसो निधिः ।

यज्ञे कुरुकुलश्रेष्ठ तस्य लोकावुभौ जितौ ॥ १२ ॥

आस्तीक बोले- कुरुकुलश्रेष्ठ! राजन्! जिसके यज्ञमें तपस्याकी निधि पुरातन ऋषि महर्षि द्वैपायन व्यास विराजमान हों, उसकी तो दोनों लोकोंमें विजय है ॥

श्रुतं विचित्रमाख्यानं त्वया पाण्डवनन्दन ।

सर्पाश्च भस्मसान्नीता गताश्च पदवीं पितुः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2407

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पाण्डवनन्दन! तुमने यह विचित्र उपाख्यान सुना । तुम्हारे शत्रु सर्पगण भस्म होकर तुम्हारे पिताकी ही पदवीको पहुँच गये ॥ १३ ॥

कथंचित् तक्षको मुक्तः सत्यत्वात् तव पार्थिव ।

ऋषयः पूजिताः सर्वे गतिर्दृष्टा महात्मनः ॥ १४ ॥

पृथ्वीनाथ! तुम्हारी सत्यपरायणताके कारण किसी तरह तक्षकके प्राण बच गये हैं । तुमने समस्त ऋषियोंकी पूजा की और महात्मा व्यासकी कहाँतक पहुँच है, इसे प्रत्यक्ष देख लिया ॥ १४ ॥

प्राप्तः सुविपुलो धर्मः श्रुत्वा पापविनाशनम् ।

विमुक्तो हृदयग्रन्थिरुदारजनदर्शनात् ॥ १५ ॥

इस पापनाशक कथाको सुनकर तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति हुई है । उदार हृदयवाले संतोके दर्शनसे तुम्हारे हृदयकी गाँठ खुल गयी - तुम्हारा सारा संशय दूर हो गया ॥ १५ ॥

ये च पक्षधरा धर्मे सद्वृत्तरुचयश्च ये ।

यान् दृष्ट्वा हीयते पापं तेभ्यः कार्या नमस्क्रिया ॥ १६ ॥

जो लोग धर्मके पक्षपाती हैं, जो सदाचारके पालनमें रुचि रखते हैं तथा जिनके दर्शनसे पापका नाश होता है, उन महात्माओंको अब तुम्हें नमस्कार करना चाहिये ॥ १६ ॥

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठात् स राजा जनमेजयः ।

पूजयामास तमृषिमनुमान्य पुनः पुनः ॥ १७ ॥

सौति कहते हैं— शौनक! विप्रवर आस्तीकके मुखसे यह बात सुनकर राजा जनमेजयने उन महर्षि व्यासका बार- बार पूजन और सत्कार किया ॥ १७ ॥

पप्रच्छ तमृषिं चापि वैशम्पायनमच्युतम् ।

कथावशेषं धर्मज्ञो वनवासस्य सत्तम ॥ १८ ॥

साधुशिरोमणे! तत्पश्चात् उन धर्मज्ञ नरेशने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले महर्षि वैशम्पायनसे पुनः धृतराष्ट्रके वनवासकी अवशिष्ट कथा पूछी ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि जनमेजयस्य स्वपितृदर्शने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें जनमेजयके द्वारा अपने पिताका दर्शनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 2408

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षट्त्रिंशोऽध्यायः व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना जनमेजय उवाच

दृष्ट्वा पुत्रांस्तथा पौत्रान् सानुबन्धान् जनाधिपः ।

धृतराष्ट्रः किमकरोद् राजा चैव युधिष्ठिरः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! राजा धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरने परलोकसे आये हुए पुत्रों, पौत्रों तथा सगे - सम्बन्धियोंके दर्शन करके क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं पुत्राणां दर्शनं नृप ।

वीतशोकः स राजर्षिः पुनराश्रममागमत् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- नरेश्वर! मरे हुए पुत्रोंका दर्शन एक महान् आश्चर्यकी घटना थी । उसे देखकर राजर्षि धृतराष्ट्रका दुःख- शोक दूर हो गया । वे फिर अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २ ॥

इतरस्तु जनः सर्वस्ते चैव परमर्षयः ।

प्रतिजग्मुर्यथाकामं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञया ॥ ३ ॥

दूसरे सब लोग तथा महर्षिगण धृतराष्ट्रकी अनुमति ले अपने - अपने अभीष्ट स्थानोंको चले गये ॥ ३ ॥

पाण्डवास्तु महात्मानो लघुभूयिष्ठसैनिकाः ।

पुनर्जग्मुर्महात्मानं सदारास्तं महीपतिम् ॥ ४ ॥

महात्मा पाण्डव छोटे - बड़े सैनिकों और अपनी स्त्रियोंके साथ पुनः महामना राजा धृतराष्ट्रके पीछे - पीछे गये ॥ ४ ॥

तत्राश्रमपदं धीमान् ब्रह्मर्षिर्लोकपूजितः ।

मुनिः सत्यवतीपुत्रो धृतराष्ट्रमभाषत ॥ ५ ॥

उस समय लोकपूजित बुद्धिमान् सत्यवतीनन्दन ब्रह्मर्षि व्यास भी उस आश्रमपर गये तथा इस प्रकार बोले – ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्र महाबाहो शृणु कौरवनन्दन ।

श्रुतं ते ज्ञानवृद्धानामृषीणां पुण्यकर्मणाम् ॥ ६ ॥

श्रद्धाभिजनवृद्धानां वेदवेदाङ्गवेदिनाम् ।

धर्मज्ञानां पुराणानां वदतां विविधाः कथाः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2409

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मा स्म शोके मनः कार्षीर्दिष्टे न व्यथते बुधः ' कौरवनन्दन महाबाहु धृतराष्ट्र! तुमने श्रद्धा और कुलमें बढ़े- चढ़े, वेद- वेदांगवेत्ता, ज्ञानवृद्ध, पुण्यकर्मा एवं धर्मज्ञ प्राचीन महर्षियोंके मुखसे नाना प्रकारकी कथाएँ सुनी हैं; अतः अपने मनसे शोकको निकाल दो; क्योंकि विद्वान् पुरुष प्रारब्धके विधानमें दुःख नहीं मानते हैं ॥ ६-७ ॥ श्रुतं देवरहस्यं ते नारदाद् देवदर्शनात् ॥ ८ ॥

गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूतां गतिं शुभाम् ।

यथा दृष्टास्त्वया पुत्रास्तथा कामविहारिणः ॥ ९ ॥

' तुमने देवदर्शी नारद मुनिसे देवताओंका गुप्त रहस्य भी सुन लिया है । वे सब वीर क्षत्रिय- धर्मके अनुसार शस्त्रोंसे पवित्र हुई शुभ गतिको प्राप्त हुए हैं । जैसा कि तुमने देखा है, तुम्हारे सभी पुत्र इच्छानुसार विहार करनेवाले स्वर्गवासी हुए हैं ॥ ८ - ९ ॥

युधिष्ठिरः स्वयं धीमान् भवन्तमनुरुध्यते ।

सहितो भ्रातृभिः सर्वैः सदारः ससुहृज्जनः ॥ १० ॥

‘ ये बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर अपने समस्त भाइयों, घरकी स्त्रियों और सुहृदोंके साथ स्वयं तुम्हारी सेवामें लगे हुए हैं ॥ १० ॥

विसर्जयैनं यात्वेष स्वराज्यमनुशासताम् ।

मासः समधिकस्तेषामतीतो वसतां वने ॥ ११ ॥

' अब इन्हें विदा कर दो । ये जायँ और अपने राज्यका काम सँभालें । इन लोगोंको वनमें रहते एक महीनेसे अधिक हो गया ॥ ११ ॥

एतद्धि नित्यं यत्नेन पदं रक्ष्यं नराधिप ।

बहुप्रत्यर्थिकं ह्येतद् राज्यं नाम कुरूद्वह ॥ १२ ॥

‘ कुरुश्रेष्ठ! नरेश्वर! राज्यके बहुत - से शत्रु होते हैं; अतः इसकी सदा ही यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये ' ॥ १२ ॥

इत्युक्तः कौरवो राजा व्यासेनातुलतेजसा ।

युधिष्ठिरमथाहूय वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥

अनुपम तेजस्वी व्यासजीके ऐसा कहनेपर प्रवचनकुशल कुरुराज धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको बुलाकर इस प्रकार कहा- ॥ १३ ॥

अजातशत्रो भद्रं ते शृणु मे भ्रातृभिः सह ।

त्वत्प्रसादान्महीपाल शोको नास्मान् प्रबाधते ॥ १४ ॥

‘ अजातशत्रो! तुम्हारा कल्याण हो । तुम अपने भाइयोंसहित मेरी बात सुनो । भूपाल! तुम्हारे प्रसादसे अब हमलोगोंको किसी प्रकारका शोक कष्ट नहीं दे रहा है ॥ १४ ॥

रमे चाहं त्वया पुत्र पुरेव गजसाह्वये ।

नाथेनानुगतो विद्वन् प्रियेषु परिवर्तिना ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2410

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प्राप्तं पुत्रफलं त्वत्तः प्रीतिर्मे परमा त्वयि ।

न मे मन्युर्महाबाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ॥ १६ ॥

' बेटा! तुम्हारे साथ रहकर तथा तुम जैसे रक्षकसे सुरक्षित होकर मैं उसी तरह आनन्दका अनुभव कर रहा हूँ, जैसे पहले हस्तिनापुरमें करता था । विद्वन्! प्रियजनोंकी सेवामें लगे रहनेवाले तुम्हारे द्वारा मुझे पुत्रका फल प्राप्त हो गया । तुमपर मेरा बहुत प्रेम है । महाबाहो! पुत्र! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति किंचिन्मात्र भी क्रोध नहीं है; अतः तुम राजधानीको जाओ, अब विलम्ब न करो ॥ १५-१६ ॥

भवन्तं चेह सम्प्रेक्ष्य तपो मे परिहीयते ।

तपोयुक्तं शरीरं च त्वां दृष्ट्वा धारितं पुनः ॥ १७ ॥

' तुमको यहाँ देखकर मेरी तपस्यामें बाधा पड़ रही है । यह शरीर तपस्यामें लगा दिया था, परंतु तुम्हें देखकर फिर इसकी रक्षा करने लगा ॥ १७ ॥

मातरौ ते तथैवेमे शीर्णपर्णकृताशने ।

मम तुल्यव्रते पुत्र न चिरं वर्तयिष्यतः ॥ १८ ॥

बेटा! मेरी ही तरह तुम्हारी ये दोनों माताएँ भी व्रत धारणपूर्वक सूखे पत्ते चबाकर रहा करती हैं । अब ये अधिक दिनोंतक जीवन धारण नहीं कर सकतीं ॥ १८ ॥

दुर्योधनप्रभृतयो दृष्टा लोकान्तरं गताः ।

व्यासस्य तपसो वीर्याद् भवतश्च समागमात् ॥ १ ९ ॥

प्रयोजनं च निर्वृत्तं जीवितस्य ममानघ ।

उग्रं तपः समास्थास्ये त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ २० ॥

' तुम्हारे समागम और व्यासजीके तपोबलसे मुझे अपने परलोकवासी पुत्र दुर्योधन आदिके दर्शन हो गये; इसलिये मेरे जीवित रहनेका प्रयोजन पूरा हो गया । अनघ! अब मैं

कठोर तपस्यामें संलग्न होऊँगा । तुम इसके लिये मुझे अनुमति दे दो ॥ १ ९-२० ॥

त्वय्यद्य पिण्डः कीर्तिश्च कुलं चेदं प्रतिष्ठितम् ।

श्वो वाद्य वा महाबाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ॥ २१ ॥

‘ महाबाहो! आजसे पितरोंके पिण्डका, सुयशका और इस कुलका भार भी तुम्हारे ही ऊपर है । पुत्र! आज या कल अवश्य चले जाओ; विलम्ब न करना ॥

राजनीतिः सुबहुशः श्रुता ते भरतर्षभ ।

संदेष्टव्यं न पश्यामि कृतं मे भवता विभो ॥ २२ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! प्रभो! तुमने राजनीति बहुत बार सुनी है; अतः तुम्हें संदेश देने लायक कोई

बात मुझे नहीं दिखायी देती । तुमने मेरे लिये बहुत कुछ किया है ॥

वैशम्पायन उवाच इत्युक्तवचनं तं तु नृपो राजानमब्रवीत् ।