06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2411–2420
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2411–2420
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न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्रने वैसी बात कही, तब युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा -' धर्मके ज्ञाता महाराज! आप मेरा परित्याग न करें, क्योंकि मैं सर्वथा निरपराध हूँ ॥ २३ ॥
कामं गच्छन्तु मे सर्वे भ्रातरोऽनुचरास्तथा ।
भवन्तमहमन्विष्ये मातरौ च यतव्रतः ॥ २४ ॥
‘ मेरे ये सब भाई और सेवक इच्छा हो तो चले जायँ; किंतु मैं नियम और व्रतका पालन करता हुआ आपकी तथा इन दोनों माताओंकी सेवा करूँगा ॥ २४ ॥
तमुवाचाथ गान्धारी मैवं पुत्र शृणुष्व च ।
त्वय्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे ॥ २५ ॥
गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत् पूजिता वयम् ।
राजा यदाह तत् कार्यं त्वया पुत्र पितुर्वचः ॥ २६ ॥
यह सुनकर गान्धारीने कहा- ' बेटा! ऐसी बात न कहो । मैं जो कहती हूँ उसे सुनो। यह सारा कुरुकुल तुम्हारे ही अधीन है । मेरे श्वशुरका पिण्ड भी तुमपर ही अवलम्बित है; अतः पुत्र! तुम जाओ, तुमने हमारे लिये जितना किया है, वही बहुत है । तुम्हारे द्वारा हमलोगोंका स्वागत - सत्कार भलीभाँति हो चुका है । इस समय महाराज जो आज्ञा दे रहे हैं, वही करो; क्योंकि पिताका वचन मानना तुम्हारा कर्तव्य है ' ॥ २५-२६ ॥ वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तु गान्धार्या कुन्तीमिदमभाषत ।
स्नेहबाष्पाकुले नेत्रे प्रमृज्य रुदतीं वचः ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! गान्धारीके इस प्रकार आदेश देनेपर राजा युधिष्ठिरने अपने आँसूभरे नेत्रोंको पोंछकर रोती हुई कुन्तीसे कहा— ॥ २७ ॥
विसर्जयति मां राजा गान्धारी च यशस्विनी ।
भवत्यां बद्धचित्तस्तु कथं यास्यामि दुःखितः ॥ २८ ॥
‘ माँ! राजा और यशस्विनी गान्धारीदेवी भी मुझे घर लौटनेकी आज्ञा दे रही हैं; किंतु मेरा मन आपमें लगा हुआ है । जानेका नाम सुनकर ही मैं बहुत दुखी हो जाता हूँ । ऐसी दशामें मैं कैसे जा सकूँगा? ॥ २८ ॥
न चोत्सहे तपोविघ्नं कर्तुं ते धर्मचारिणि ।
तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥ २ ९ ॥
‘ धर्मचारिणि! मैं आपकी तपस्यामें विघ्न डालना नहीं चाहता; क्योंकि तपसे बढ़कर कुछ नहीं है । (निष्काम भावपूर्वक ) तपस्यासे परब्रह्म परमात्माकी भी प्राप्ति हो जाती है ॥ २ ९ ॥
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ममापि न तथा राज्ञि राज्ये बुद्धिर्यथा पुरा ।
तपस्येवानुरक्तं मे मनः सर्वात्मना तथा ॥ ३० ॥
' रानी माँ! अब मेरा मन भी पहलेकी तरह राजकाजमें नही लगता है । हर तरहसे तपस्या करनेको ही जी चाहता है ॥ ३० ॥
शून्येयं च मही कृत्स्ना न मे प्रीतिकरी शुभे ।
बान्धवा नः परिक्षीणा बलं नो न यथा पुरा ॥ ३१ ॥
' शुभे! यह सारी पृथ्वी मेरे लिये सूनी हो गयी है; अतः इससे मुझे प्रसन्नता नहीं होती । हमारे सगे - सम्बन्धी नष्ट हो गये; अब हमारे पास पहलेकी तरह सैन्यबल भी नहीं है ॥ ३१ ॥
पञ्चालाः सुभृशं क्षीणाः कथामात्रावशेषिताः ।
न तेषां कुलकर्तारं कंचित् पश्याम्यहं शुभे ॥ ३२ ॥
' पांचालोंका तो सर्वथा नाश ही हो गया । उनकी कथामात्र शेष रह गयी है । शुभे! अब मुझे कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो उनके वंशको चलानेवाला हो ॥ ३२ ॥
सर्वे हि भस्मसान्नीतास्ते द्रोणेन रणाजिरे ।
अवशिष्टाश्च निहता द्रोणपुत्रेण वै निशि ॥ ३३ ॥
‘ प्रायः द्रोणाचार्यने ही सबको समरांगणमें भस्म कर डाला था । जो थोड़े - से बच गये थे, उन्हें द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रातको सोते समय मार डाला ॥ ३३ ॥
चेदयश्चैव मत्स्याश्च दृष्टपूर्वास्तथैव नः ।
केवलं वृष्णिचक्रं च वासुदेवपरिग्रहात् ॥ ३४ ॥
‘ हमारे सम्बन्धी चेदि और मत्स्यदेशके लोग भी जैसे पहले देखे गये थे, वैसे ही अब नहीं रहे । केवल भगवान् श्रीकृष्णके आश्रयसे वृष्णिवंशी वीरोंका समुदाय अबतक सुरक्षित है ॥ ३४ ॥
यद् दृष्ट्वा स्थातुमिच्छामि धर्मार्थं नार्थहेतुतः ।
शिवेन पश्य नः सर्वान् दुर्लभं तव दर्शनम् ॥ ३५ ॥
अविषह्यं च राजा हि तीव्रं चारप्स्यते तपः । ‘ उसे ही देखकर अब मैं केवल धर्मसम्पादनकी इच्छासे यहाँ रहना चाहता हूँ, धनके लिये नहीं । तुम हम सब लोगोंकी ओर कल्याणमयी दृष्टिसे देखो; क्योंकि तुम्हारा दर्शन हमलोगोंके लिये अब दुर्लभ हो जायगा । कारण कि राजा धृतराष्ट्र अब बड़ी कठोर और असह्य तपस्या आरम्भ करेंगे' ॥ ३५३ ॥
एतच्छ्रुत्वा महाबाहुः सहदेवो युधां पतिः ॥ ३६ ॥
युधिष्ठिरमुवाचेदं बाष्पव्याकुललोचनः । यह सुनकर योद्धाओंके स्वामी महाबाहु सहदेव अपने दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले – ॥ ३६३ ॥
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नोत्सहेऽहं परित्यक्तुं मातरं भरतर्षभ ॥ ३७ ॥
प्रतियातु भवान् क्षिप्रं तपस्तप्स्याम्यहं विभो ।
इहैव शोषयिष्यामि तपसेदं कलेवरम् ॥ ३८ ॥
पादशुश्रूषणे रक्तो राज्ञो मात्रोस्तथानयोः । ‘ भरतश्रेष्ठ! मुझमें माताजीको छोड़कर जानेका साहस नहीं है । प्रभो! आप शीघ्र लौट जायँ । मैं यहीं रहकर तपस्या करूँगा और तपके द्वारा अपने शरीरको सुखा डालूँगा । मैं यहाँ महाराज और इन दोनों माताओंके चरणोंकी सेवामें ही अनुरक्त रहना चाहता हूँ' ॥ तमुवाच ततः कुन्ती परिष्वज्य महाभुजम् ॥ ३ ९ ॥
गम्यतां पुत्र मैवं त्वं वोचः कुरु वचो मम ।
आगमा वः शिवाः सन्तु स्वस्था भवत पुत्रकाः ॥ ४० ॥
यह सुनकर कुन्तीने महाबाहु सहदेवको छातीसे लगा लिया और कहा – ' बेटा! ऐसा न कहो । तुम मेरी बात मानो और चले जाओ । पुत्रो! तुम्हारे मार्ग कल्याणकारी हों और तुम सदा स्वस्थ रहो ॥ ३ ९ -४० ॥
उपरोधो भवेदेवमस्माकं तपसः कृते ।
त्वत्स्नेहपाशबद्धा च हीयेयं तपसः परात् ॥ ४१ ॥
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तस्मात् पुत्रक गच्छ त्वं शिष्टमल्पं च नः प्रभो । ' तुम लोगोंके रहनेसे हमलोगोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ेगा । मैं तुम्हारे स्नेहपाशमें बँधकर उत्तम तपस्यासे गिर जाऊँगी, अतः सामर्थ्यशाली पुत्र! चले जाओ । अब हमलोगोंकी आयु बहुत थोड़ी रह गयी है ' ॥ ४१ ॥
एवं संस्तम्भितं वाक्यैः कुन्त्या बहुविधैर्मनः ॥ ४२ ॥
सहदेवस्य राजेन्द्र राज्ञश्चैव विशेषतः । राजेन्द्र! इस तरह अनेक प्रकारकी बातें कहकर कुन्तीने सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरके मनको धीरज बँधाया ॥ ४२ ॥
ते मात्रा समनुज्ञाता राज्ञा च कुरुपुङ्गवाः ॥ ४३ ॥
अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठमामन्त्रयितुमारभन् । माता तथा धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाकर कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंने कुरुकुलतिलक धृतराष्ट्रको प्रणाम किया और उनसे विदा लेनेके लिये इस प्रकार कहा- ॥ ४३३ ॥
युधिष्ठिर उवाच राज्यं प्रतिगमिष्यामः शिवेन प्रतिनन्दिताः ॥ ४४ ॥
अनुज्ञातास्त्वया राजन् गमिष्यामो विकल्मषाः । युधिष्ठिर बोले – महाराज! आपके आशीर्वादसे आनन्दित होकर हमलोग कुशलपूर्वक राजधानी लौट जायँगे । राजन्! इसके लिये आप हमें आज्ञा दें । आपकी आज्ञा पाकर हम पापरहित हो यहाँसे यात्रा करेंगे ॥ ४४ ॥
एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराज्ञा महात्मना ॥ ४५ ॥
अनुजज्ञे स कौरव्यमभिनन्द्य युधिष्ठिरम् । महात्मा धर्मराजके ऐसा कहनेपर राजर्षि धृतराष्ट्रने कुरुनन्दन युधिष्ठिरका अभिनन्दन करके उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी ॥ ४५३ ॥
भीमं च बलिनां श्रेष्ठं सान्त्वयामास पार्थिवः ॥ ४६ ॥
स चास्य सम्यङ्मेधावी प्रत्यपद्यत वीर्यवान् । इसके बाद राजा धृतराष्ट्रने बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको सान्त्वना दी । बुद्धिमान् एवं -पराक्रमी भीमसेनने भी उनकी बातोंको यथार्थरूपसे ग्रहण किया–हृदयसे स्वीकार किया ॥ ४६ ॥
अर्जुनं च समाश्लिष्य यमौ च पुरुषर्षभौ ॥ ४७ ॥
अनुजज्ञे स कौरव्यः परिष्वज्याभिनन्द्य च ।
गान्धार्या चाभ्यनुज्ञाताः कृतपादाभिवादनाः ॥ ४८ ॥
जनन्या समुपाघ्राताः परिष्वक्ताश्च ते नृपम् ।
चक्रुः प्रदक्षिणं सर्वे वत्सा इव निवारणे ॥ ४९ ।
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पुनः पुनर्निरीक्षन्तः प्रचक्रुस्ते प्रदक्षिणम् । तदनन्तर धृतराष्ट्रने अर्जुन और पुरुषप्रवर नकुल सहदेवको छातीसे लगा उनका अभिनन्दन करके विदा किया । इसके बाद उन पाण्डवोंने गान्धारीके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी आज्ञा ली । फिर माता कुन्तीने उन्हें हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा । जैसे बछड़े अपनी माताका दूध पीनेसे रोके जानेपर बार- बार उसकी ओर देखते हुए उसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं, उसी प्रकार पाण्डवोंने राजा तथा माताकी ओर बार - बार देखते हुए उन नरेशकी परिक्रमा की ॥ ४७–४९ ३ ॥ द्रौपदीप्रमुखाश्चैव सर्वाः कौरवयोषितः ॥ ५० ॥
न्यायतः श्वशुरे वृत्तिं प्रयुज्य प्रययुस्ततः ।
श्वश्रूभ्यां समनुज्ञाताः परिष्वज्याभिनन्दिताः ॥ ५१ ॥
संदिष्टाश्चेति कर्तव्यं प्रययुर्भर्तृभिः सह । द्रौपदी आदि समस्त कौरवस्त्रियोंने अपने श्वशुरको न्यायपूर्वक प्रणाम किया । फिर दोनों सासुओंने उन्हें गलेसे लगाकर आशीर्वाद दे, जानेकी आज्ञा दी और उन्हें उनके
कर्तव्यका उपदेश भी दिया । तत्पश्चात् वे अपने पतियोंके साथ चली गयीं ॥ ५०-५१ ॥
ततः प्रजज्ञे निनदः सूतानां युज्यतामिति ॥ ५२ ॥
उष्ट्राणां क्रोशतां चापि हयानां हेषतामपि ।
ततो युधिष्ठिरो राजा सदारः सहसैनिकः ।
नगरं हास्तिनपुरं पुनरायात् सबान्धवः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर सारथियोंने ‘ रथ जोतो, रथ जोतो ' की पुकार मचायी । फिर ऊँटोंके चिग्घाड़ने और घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाज हुई । इसके बाद अपने घरकी स्त्रियों, भाइयों और सैनिकोंके साथ राजा युधिष्ठिर पुनः हस्तिनापुर नगरको लौट आये ॥ ५२-५३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि युधिष्ठिरप्रत्यागमे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें युधिष्ठिरका प्रत्यागमनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
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(नारदागमनपर्व ) सप्तत्रिंशोऽध्यायः नारदजीसे धृतराष्ट्र आदिके दावानलमें दग्ध हो जानेका हाल जानकर युधिष्ठिर आदिका शोक करना वैशम्पायन उवाच
द्विवर्षोपनिवृत्तेषु पाण्डवेषु यदृच्छया ।
देवर्षिर्नारदो राजन्नाजगाम युधिष्ठिरम् ॥ १
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पाण्डवोंको तपोवनसे आये जब दो वर्ष व्यतीत हो गये, तब एक दिन देवर्षि नारद दैवेच्छासे घूमते -घामते राजा युधिष्ठिरके यहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥
तमभ्यर्च्य महाबाहुः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
आसीनं परिविश्वस्तं प्रोवाच वदतां वरः ॥ २ ॥
महाबाहु कुरुराज युधिष्ठिरने नारदजीकी पूजा करके उन्हें आसनपर बिठाया । जब वे आसनपर बैठकर थोड़ी देर विश्राम कर चुके, तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार पूछा ॥ २ ॥
चिरात्तु नानुपश्यामि भगवन्तमुपस्थितम् ।
कच्चित् ते कुशलं विप्र शुभं वा प्रत्युपस्थितम् ॥ ३ ॥
‘ भगवन्! इधर दीर्घकालसे मैं आपकी उपस्थिति यहाँ नहीं देखता हूँ । ब्रह्मन्! कुशल तो है न? अथवा आपको शुभकी ही प्राप्ति होती है न? ॥ ३ ॥
के देशाः परिदृष्टास्ते किं च कार्यं करोमि ते ।
तद् ब्रूहि द्विजमुख्य त्वं त्वं ह्यस्माकं परा गतिः ॥ ४ ॥
‘ विप्रवर! इस समय आपने किन -किन देशोंका निरीक्षण किया है? बताइये मैं आपकी क्या सेवा करूँ? क्योंकि आप हमलोगोंकी परम गति हैं' ॥ ४ ॥
नारद उवाच
चिरदृष्टोऽसि मेत्येवमागतोऽहं तपोवनात् ।
परिदृष्टानि तीर्थानि गङ्गा चैव मया नृप ॥ ५ ॥
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नारदजीने कहा — नरेश्वर! बहुत दिन पहले मैंने तुम्हें देखा था, इसीलिये मैं तपोवनसे सीधे यहाँ चला आ रहा हूँ । रास्तेमें मैंने बहुत- से तीर्थों और गङ्गाजीका भी दर्शन किया है ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वदन्ति पुरुषा मेऽद्य गङ्गातीरनिवासिनः ।
धृतराष्ट्रं महात्मानमास्थितं परमं तपः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर बोले – भगवान्! गङ्गाके किनारे रहनेवाले मनुष्य मेरे पास आकर कहा करते हैं कि महामनस्वी महाराज धृतराष्ट्र इन दिनों बड़ी कठोर तपस्यामें लगे हुए हैं ॥
अपि दृष्टस्त्वया तत्र कुशली स कुरूद्वहः ।
गान्धारी च पृथा चैव सूतपुत्रश्च संजयः ॥ ७ ॥
क्या आपने भी उन्हें देखा है? वे कुरुश्रेष्ठ वहाँ कुशलसे तो हैं न? गान्धारी, कुन्ती तथा सूतपुत्र संजय भी सकुशल हैं न? ॥ ७ ॥
कथं च वर्तते चाद्य पिता मम स पार्थिवः ।
श्रोतुमिच्छामि भगवन् यदि दृष्टस्त्वया नृपः ॥ ८ ॥
आजकल मेरे ताऊ राजा धृतराष्ट्र कैसे रहते हैं? भगवन्! यदि आपने उन्हें देखा हो तो मैं उनका समाचार सुनना चाहता हूँ ॥ ८ ॥
नारद उवाच
स्थिरीभूय महाराज शृणु वृत्तं यथातथम् ।
यथा श्रुतं च दृष्टं च मया तस्मिंस्तपोवने ॥ ९ ॥
नारदजीने कहा — महाराज! मैंने उस तपोवनमें जो कुछ देखा और सुना है, वह सारा
वृत्तान्त ठीक- ठीक बतला रहा हूँ । तुम स्थिरचित्त होकर सुनो ॥ ९ ॥
वनवासनिवृत्तेषु भवत्सु कुरुनन्दन ।
कुरुक्षेत्रात् पिता तुभ्यं गङ्गाद्वारं ययौ नृप ॥ १० ॥
गान्धार्या सहितो धीमान् वध्वा कुन्त्या समन्वितः ।
संजयेन च सूतेन साग्निहोत्रः सयाजकः ॥ ११ ॥
कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले नरेश! जब तुमलोग वनसे लौट आये, तब तुम्हारे बुद्धिमान् ताऊ राजा धृतराष्ट्र गान्धारी, बहू कुन्ती, सूत संजय, अग्निहोत्र और पुरोहितके साथ कुरुक्षेत्रसे गङ्गाद्वार ( हरिद्वार ) को चले गये ॥ १०-११ ॥
आतस्थे स तपस्तीव्रं पिता तव तपोधनः ।
वीटां मुखे समाधाय वायुभक्षोऽभवन्मुनिः ॥ १२ ॥
वहाँ जाकर तपस्याके धनी तुम्हारे ताऊने कठोर तपस्या आरम्भ की । वे मुँहमें पत्थरका टुकड़ा रखकर वायुका आहार करते और मौन रहते थे ॥ १२ ॥
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वने स मुनिभिः सर्वैः पूज्यमानो महातपाः ।
त्वगस्थिमात्रशेषः स षण्मासानभवन्नृपः ॥ १३ ॥
उस वनमें जितने ऋषि रहते थे, वे लोग उनका विशेष सम्मान करने लगे । महातपस्वी धृतराष्ट्रके शरीरपर चमड़ेसे ढकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया था । उस अवस्थामें उन्होंने छः महीने व्यतीत किये ॥ १३ ॥
गान्धारी तु जलाहारी कुन्ती मासोपवासिनी ।
संजयः षष्ठभूक्तेन वर्तयामास भारत ॥ १४ ॥
भारत! गान्धारी केवल जल पीकर रहने लगीं । कुन्तीदेवी एक महीनेतक उपवास करके एक दिन भोजन करती थीं और संजय छठे समय अर्थात् दो दिन उपवास करके तीसरे दिन संध्याको आहार ग्रहण करते थे ॥ १४ ॥
अग्नींस्तु याजकास्तत्र जुहुवुर्विधिवत् प्रभो ।
दृश्यतोऽदृश्यतश्चैव वने तस्मिन् नृपस्य वै ॥ १५ ॥
प्रभो! राजा धृतराष्ट्र उस वनमें कभी दिखायी देते और कभी अदृश्य हो जाते थे । यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण वहाँ उनके द्वारा स्थापित की हुई अग्निमें विधिवत् हवन करते रहते थे ॥ १५ ॥
अनिकेतोऽथ राजा स बभूव वनगोचरः ।
ते चापि सहिते देव्यौ संजयश्च तमन्वयुः ॥ १६ ॥
अब राजाका कोई निश्चित स्थान नहीं रह गया । वे वनमें सब ओर विचरते रहते थे । गान्धारी और कुन्ती ये दोनों देवियाँ साथ रहकर राजाके पीछे - पीछे लगी रहती थीं । संजय भी उन्हींका अनुसरण करते थे ॥
संजयो नृपतेर्नेता समेषु विषमेषु च ।
गान्धार्याश्च पृथा चैव चक्षुरासीदनिन्दिता ॥ १७ ॥
ऊँची - नीची भूमि आ जानेपर संजय ही राजा धृतराष्ट्रको चलाते थे और अनिन्दिता सती - साध्वी कुन्ती गान्धारीके लिये नेत्र बनी हुई थीं ॥ १७ ॥
ततः कदाचिद् गङ्गायाः कच्छे स नृपसत्तमः ।
गङ्गायामाप्लुतो धीमानाश्रमाभिमुखोऽभवत् ॥ १८ ॥
तदनन्तर एक दिनकी बात है, बुद्धिमान् नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्रने गङ्गाके कछारमें जाकर उनके जलमें डुबकी लगायी और स्नानके पश्चात् वे अपने आश्रमकी ओर चल पड़े ॥ १८ ॥
अथ वायुः समुद्भूतो दावाग्निरभवन्महान् ।
ददाह तद् वनं सर्वं परिगृह्य समन्ततः ॥ १ ९ ॥
इतनेहीमें वहाँ बड़े जोरकी हवा चली । जिससे उस वनमें बड़ी भारी दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी । उसने चारों ओरसे उस सारे वनको जलाना आरम्भ किया ॥
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दह्यत्सु मृगयूथेषु द्विजिह्वेषु समन्ततः ।
वराहाणां च यूथेषु संश्रयत्सु जलाशयान् ॥ २० ॥
सब ओर मृगोंके झुंड और सर्प दग्ध होने लगे । वनैले सूअर भाग- भागकर जलाशयोंकी शरण लेने लगे ॥ २० ॥
समाविद्धे वने तस्मिन् प्राप्ते व्यसन उत्तमे ।
निराहारतया राजन् मन्दप्राणविचेष्टितः ॥ २१ ॥
असमर्थोऽपसरणे सुकृशे मातरौ च ते । राजन्! सारा वन आगसे घिर गया और उन लोगोंपर बड़ा भारी संकट आ गया । उपवास करनेसे प्राणशक्ति क्षीण हो जानेके कारण राजा धृतराष्ट्र वहाँसे भागनेमें असमर्थ थे, तुम्हारी दोनों माताएँ भी अत्यन्त दुर्बल हो गयी थीं; अतः वे भी भागनेमें असमर्थ थीं ॥ २१ ॥
ततः स नृपतिर्दृष्ट्वा वह्निमायान्तमन्तिकात् ॥ २२ ॥
इदमाह ततः सूतं संजयं जयतां वरः । तदनन्तर विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने उस अग्निको निकट आती जान सूत संजयसे इस प्रकार कहा- ॥ २२३ ॥
गच्छ संजय यत्राग्निर्न त्वां दहति कर्हिचित् ॥ २३ ॥
वयमत्राग्निना युक्ता गमिष्यामः परां गतिम् । ' संजय! तुम किसी ऐसे स्थानमें भाग जाओ, जहाँ यह दावाग्नि तुम्हें कदापि जला न सके । हमलोग तो अब यहीं अपनेको अग्निमें होम कर परम गति प्राप्त करेंगे ' ॥ २३ ॥
तमुवाच किलोद्विग्नः संजयो वदतां वरः ॥ २४ ॥
राजन् मृत्युरनिष्टोऽयं भविता ते वृथाग्निना ।
न चोपायं प्रपश्यामि मोक्षणे जातवेदसः ॥ २५ ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ संजयने अत्यन्त उद्विग्न होकर कहा- ' राजन्! इस लौकिक अग्निसे आपकी मृत्यु होना ठीक नहीं है, ( आपके शरीरका दाह - संस्कार तो आहवनीय अग्निमें होना चाहिये । ) किंतु इस समय इस दावानलसे छुटकारा पानेका कोई उपाय भी मुझे नहीं दिखायी देता ॥ २४-२५ ॥
यदत्रानन्तरं कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ।
इत्युक्तः संजयेनेदं पुनराह स पार्थिवः ॥ २६ ॥
‘ अब इसके बाद क्या करना चाहिये - यह बतानेकी कृपा करें । ' संजयके ऐसा कहनेपर राजाने फिर कहा- ॥ २६ ॥
नैष मृत्युरनिष्टो नो निःसृतानां गृहात् स्वयम् ।
जलमग्निस्तथा वायुरथवापि विकर्षणम् ॥ २७ ॥
तापसानां प्रशस्यन्ते गच्छ संजय मा चिरम् ।
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‘ संजय! हमलोग स्वयं गृहस्थाश्रमका परित्याग करके चले आये हैं, अतः हमारे लिये इस तरहकी मृत्यु अनिष्टकारक नहीं हो सकती । जल, अग्नि तथा वायुके संयोगसे अथवा उपवास करके प्राण त्यागना तपस्वियोंके लिये प्रशंसनीय माना गया है; इसलिये अब तुम
शीघ्र यहाँसे चले जाओ । विलम्ब न करो' ॥ २७३ ॥
इत्युक्त्वा संजयं राजा समाधाय मनस्तथा ॥ २८ ॥
प्राङ्मुखः सह गान्धार्या कुन्त्या चोपाविशत् तदा । संजयसे ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने मनको एकाग्र किया और गान्धारी तथा कुन्तीके साथ वे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये ॥ २८३ ॥
संजयस्तं तथा दृष्ट्वा प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ २९ ॥
उवाच चैनं मेधावी युङ्क्ष्वात्मानमिति प्रभो । उन्हें उस अवस्थामें देख मेधावी संजयने उनकी परिक्रमा की और कहा - 'महाराज! अब अपनेको योगयुक्त कीजिये ॥ २ ९ ३ ॥ ऋषिपुत्रो मनीषी स राजा चक्रेऽस्य तद् वचः ॥ ३० ॥
सन्निरुध्येन्द्रियग्राममासीत् काष्ठोपमस्तदा । महर्षि व्यासके पुत्र मनीषी राजा धृतराष्ट्रने संजयकी वह बात मान ली । वे इन्द्रियसमुदायको रोककर काष्ठकी भाँति निश्चेष्ट हो गये ॥ ३०३ ॥