06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2421–2430
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2421–2430
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Mira गान्धारी च महाभागा जननी च पृथा तव ॥ ३१ ॥
दावाग्निना समायुक्ते स च राजा पिता तव ।
संजयस्तु महामात्रस्तस्माद् दावादमुच्यत ॥ ३२ ॥
इसके बाद महाभागा गान्धारी, तुम्हारी माता कुन्ती तथा तुम्हारे ताऊ राजा धृतराष्ट्र— ये तीनों ही दावाग्निमें जलकर भस्म हो गये; परंतु महामात्य संजय उस दावाग्निसे जीवित बच गये हैं ॥ ३१-३२ ॥
गङ्गाकूले मया दृष्टस्तापसैः परिवारितः ।
स तानामन्त्र्य तेजस्वी निवेद्यैतच्च सर्वशः ॥ ३३ ॥
प्रययौ संजयो धीमान् हिमवन्तं महीधरम् । मैंने संजयको गंगातटपर तापसोंसे घिरा देखा है। बुद्धिमान् और तेजस्वी संजय तापसोंको यह सब समाचार बताकर उनसे विदा ले हिमालयपर्वतपर चले गये ॥ ३३३ ॥
एवं स निधनं प्राप्तः कुरुराजो महामनाः ॥ ३४ ॥
गान्धारी च पृथा चैव जनन्यौ ते विशाम्पते । प्रजानाथ! इस प्रकार महामनस्वी कुरुराज धृतराष्ट्र तथा तुम्हारी दोनों माताएँ गान्धारी और कुन्ती मृत्युको प्राप्त हो गयीं ॥ ३४ ॥
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यदृच्छयानुव्रजता मया राज्ञः कलेवरम् ॥ ३५ ॥
तयोश्च देव्योरुभयोर्मया दृष्टानि भारत । भरतनन्दन! वनमें घूमते समय अकस्मात् राजा धृतराष्ट्र तथा उन देवियोंके मृत शरीर मेरी दृष्टिमें पड़े थे ॥ ३५३ ॥
ततस्तपोवने तस्मिन् समाजग्मुस्तपोधनाः ॥ ३६ ॥
श्रुत्वा राज्ञस्तदा निष्ठां न त्वशोचन् गतीश्च ते । तदनन्तर राजाकी मृत्युका समाचार सुनकर बहुत -से तपोधन उस तपोवनमें आये । उन्होंने उनके लिये कोई शोक नहीं किया; क्योंकि उन तीनोंकी सद्गतिके विषयमें उनके मनमें संशय नहीं था ॥ ३६३ ॥
तत्राश्रौषमहं सर्वमेतत् पुरुषसत्तम ॥ ३७ ॥
यथा च नृपतिर्दग्धो देव्यौ ते चेति पाण्डव । पुरुषप्रवर पाण्डव! जिस प्रकार राजा धृतराष्ट्र तथा उन दोनों देवियोंका दाह हुआ है, यह सारा समाचार मैंने वहीं सुना था ॥ ३७ ॥
न शोचितव्यं राजेन्द्र स्वतः स पृथिवीपतिः ॥ ३८ ॥
प्राप्तवानग्निसंयोगं गान्धारी जननी च ते । राजेन्द्र! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और तुम्हारी माता कुन्ती - तीनोंने स्वतः अग्निसंयोग प्राप्त किया था; अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ ३८३ ॥
वैशम्पायन उवाच एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषां पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ३ ९ ॥ निर्याणं धृतराष्ट्रस्य शोकः समभवन्महान् । वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रका यह परलोकगमनका समाचार सुनकर उन सभी महामना पाण्डवोंको बड़ा शोक हुआ ॥ ३ ९ ३ ॥ अन्तःपुराणां च तदा महानार्तस्वरोऽभवत् ॥ ४० ॥
पौराणां च महाराज श्रुत्वा राज्ञस्तदा गतिम् । महाराज! उनके अन्तः पुरमें उस समय महान् आर्तनाद होने लगा । राजाकी वैसी गति सुनकर पुरवासियोंमें भी हाहाकार मच गया ॥ ४०३ ॥
अहो धिगिति राजा तु विक्रुश्य भृशदुःखितः ॥ ४१ ॥
ऊर्ध्वबाहुः स्मरन् मातुः प्ररुरोद युधिष्ठिरः । ' अहो! धिक्कार है! ' इस प्रकार अपनी निन्दा करके राजा युधिष्ठिर बहुत दुःखी हो गये तथा दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर अपनी माताको याद करके फूट- फूटकर रोने लगे ॥ ४१३३ || भीमसेनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते ॥ ४२ ॥
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अन्तःपुरेषु च तदा सुमहान् रुदितस्वनः ।
प्रादुरासीन्महाराज पृथां श्रुत्वा तथागताम् ॥ ४३ ॥
भीमसेन आदि सभी भाई रोने लगे । महाराज! कुन्तीकी वैसी दशा सुनकर अन्तःपुरमें भी रोने - बिलखनेका महान् शब्द सुनायी देने लगा ॥ ४२-४३ ॥
तं च वृद्धं तथा दग्धं हतपुत्रं नराधिपम् ।
अन्वशोचन्त ते सर्वे गान्धारीं च तपस्विनीम् ॥ ४४ ॥
पुत्रहीन बूढ़े राजा धृतराष्ट्र तथा तपस्विनी गान्धारी देवीको इस प्रकार दग्ध हुई सुनकर सब लोग बारंबार शोक करने लगे ॥ ४४ ॥
तस्मिन्नुपरते शब्दे मुहूर्तादिव भारत ।
निगृह्य बाष्पं धैर्येण धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥ ४५ ॥
भरतनन्दन! दो घड़ी बाद जब रोने - धोनेकी आवाज बंद हुई, तब धर्मराज युधिष्ठिर धैर्यपूर्वक अपने आँसू पोंछकर नारदजीसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि दावाग्निना धृतराष्ट्रादिदाहे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निसे दाहविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
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अष्टात्रिंशोऽध्यायः नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन युधिष्ठिर उवाच
तथा महात्मनस्तस्य तपस्युग्रे च वर्ततः ।
अनाथस्येव निधनं तिष्ठत्स्वास्मासु बन्धुषु ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले – भगवन्! हम जैसे बन्धु बान्धवोंके रहते हुए भी कठोर तपस्यामें लगे हुए महामना धृतराष्ट्रकी अनाथके समान मृत्यु हुई, यह कितने दुःखकी बात है? ॥ १ ॥
दुर्विज्ञेया गतिर्ब्रह्मन् पुरुषाणां मतिर्मम ।
यत्र वैचित्रवीर्योऽसौ दग्ध एवं वनाग्निना ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! मेरा तो ऐसा मत है कि मनुष्योंकी गतिका ठीक-ठीक ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है; जब कि विचित्रवीर्यकुमार धृतराष्ट्रको इस तरह दावानलसे दग्ध होकर मरना पड़ा ॥ २ ॥
यस्य पुत्रशतं श्रीमदभवद् बाहुशालिनः ।
नागायुतबलो राजा स दग्धो हि दवाग्निना ॥ ३ ॥
जिन बाहुबलशाली नरेशके सौ पुत्र थे, जो स्वयं भी दस हजार हाथियोंके समान बलवान् थे, वे ही दावानलसे जलकर मरे हैं, यह कितने दुःखकी बात है? ॥
यं पुरा पर्यवीजन्त तालवृन्तैर्वरस्त्रियः ।
तं गृध्राः पर्यवीजन्त दावाग्निपरिकालितम् ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें सब ओरसे ताड़के पंखोंद्वारा हवा करती थीं, उन्हें दावानलसे दग्ध हो जानेपर गीधोंने अपनी पाँखोंसे हवा की है ॥ ४ ॥
सूतमागधसंघैश्च शयानो यः प्रबोध्यते ।
धरण्यां स नृपः शेते पापस्य मम कर्मभिः ॥ ५ ॥
जो बहुमूल्य शय्यापर सोते थे और जिन्हें सूत तथा मागधोंके समुदाय मधुर गीतोंद्वारा जगाया करते थे, वे ही महाराज मुझ पापीकी करतूतोंसे पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥ ५ ॥
न च शोचामि गान्धारीं हतपुत्रां यशस्विनीम् ।
पतिलोकमनुप्राप्तां तथा भर्तृव्रते स्थिताम् ॥ ६ ॥
मुझे पुत्रहीना यशस्विनी गान्धारीके लिये उतना शोक नहीं है, क्योंकि वे पातिव्रत्य-धर्मका पालन करती थीं; अतः पतिलोकमें गयी हैं ॥ ६ ॥
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पृथामेव च शोचामि या पुत्रैश्वर्यमृद्धिमत् ।
उत्सृज्य सुमहद् दीप्तं वनवासमरोचयत् ॥ ७ ॥
मैं तो उन माता कुन्तीके लिये ही अधिक शोक करता हूँ, जिन्होंने पुत्रोंके समृद्धिशाली एवं परम समुज्ज्वल ऐश्वर्यको ठुकराकर वनमें रहना पसंद किया था ॥ ७ ॥
धिग् राज्यमिदमस्माकं धिग् बलं धिक् पराक्रमम् ।
क्षत्रधर्मं च धिग् यस्मान्मृता जीवामहे वयम् ॥ ८ ॥
हमारे इस राज्यको धिक्कार है, बल और पराक्रमको धिक्कार है तथा इस क्षत्रिय-धर्मको भी धिक्कार है! जिससे आज हमलोग मृतकतुल्य जीवन बिता रहे हैं ॥
सुसूक्ष्मा किल कालस्य गतिर्द्विजवरोत्तम ।
यत् समुत्सृज्य राज्यं सा वनवासमरोचयत् ॥ ९ ॥
विप्रवर! कालकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है, जिससे प्रेरित होकर माता कुन्तीने राज्य त्यागकर वनमें ही रहना ठीक समझा ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरस्य जननी भीमस्य विजयस्य च ।
अनाथवत् कथं दग्धा इति मुह्यामि चिन्तयन् ॥ १० ॥
युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुनकी माता अनाथकी भाँति कैसे जल गयी, यह सोचकर मैं मोहित हो जाता हूँ ॥ १० ॥
वृथा संतर्पितो वह्निः खाण्डवे सव्यसाचिना ।
उपकारमजानन् स कृतघ्न इति मे मतिः ॥ ११ ॥
सव्यसाची अर्जुनने जो खाण्डववनमें अग्निदेवको तृप्त किया था, वह व्यर्थ हो गया । वे उस उपकारको याद न रखनेके कारण कृतघ्न हैं- ऐसी मेरी धारणा है ॥ ११ ॥
यत्रादहत् स भगवान् मातरं सव्यसाचिनः ।
कृत्वा यो ब्राह्मणच्छद्म भिक्षार्थी समुपागतः ॥ १२ ॥
धिगग्निं धिक् च पार्थस्य विश्रुतां सत्यसंधताम् । जो एक दिन ब्राह्मणका वेश बनाकर अर्जुनसे भीख माँगने आये थे, उन्हीं भगवान् अग्निदेवने अर्जुनकी माँको जलाकर भस्म कर दिया । अग्निदेवको धिक्कार है! अर्जुनकी जो सुप्रसिद्ध सत्यप्रतिज्ञता है, उसको भी धिक्कार है! ॥ १२३ ॥
इदं कष्टतरं चान्यद् भगवन् प्रतिभाति मे ॥ १३ ॥
वृथाग्निना समायोगो यदभूत् पृथिवीपतेः । भगवन्! राजा धृतराष्ट्रके शरीरको जो व्यर्थ ( लौकिक) अग्निका संयोग प्राप्त हुआ, यह दूसरी अत्यन्त कष्ट देनेवाली बात जान पड़ती है ॥ १३३ ॥
तथा तपस्विनस्तस्य राजर्षेः कौरवस्य ह ॥ १४ ॥
कथमेवंविधो मृत्युः प्रशास्य पृथिवीमिमाम् ।
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जिन्होंने पहले इस पृथ्वीका शासन करके अन्तमें वैसी कठोर तपस्याका आश्रय लिया था, उन कुरुवंशी राजर्षिको ऐसी मृत्यु क्यों प्राप्त हुई? ॥ १४३ ॥
तिष्ठत्सु मन्त्रपूतेषु तस्याग्निषु महावने ॥ १५ ॥
वृथाग्निना समायुक्तो निष्ठां प्राप्तः पिता मम । हाय, उस महान् वनमें मन्त्रोंसे पवित्र हुई अग्नियोंके रहते हुए भी मेरे ताऊ लौकिक अग्निसे दग्ध होकर क्यों मृत्युको प्राप्त हुए? ॥ १५३ ॥
मन्ये पृथा वेपमाना कृशा धमनिसंतता ॥ १६ ॥
हा तात! धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभये । मैं तो समझता हूँ कि अत्यन्त दुर्बल हो जानेके कारण जिनके शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियाँतक स्पष्ट दिखायी देती थीं, वे मेरी माता कुन्ती अग्निका महान् भय उपस्थित होनेपर ‘ हा तात! हा धर्मराज! ' कहकर कातर पुकार मचाने लगी होंगी ॥ १६३ ॥
भीम पर्याप्नुहि भयादिति चैवाभिवाशती ॥ १७ ॥
समन्ततः परिक्षिप्ता माताभून्मे दवाग्निना । ‘ भीमसेन! इस भयसे मुझे बचाओ, ऐसा कहकर चारों ओर चीखती - चिल्लाती हुई मेरी माताको दावानलने जलाकर भस्म कर दिया होगा ॥ १७३ ॥
सहदेवः प्रियस्तस्याः पुत्रेभ्योऽधिक एव तु ॥ १८ ॥
न चैनां मोक्षयामास वीरो माद्रवतीसुतः । सहदेव मेरी माताको अपने सभी पुत्रोंसे अधिक प्रिय था; परंतु वह वीर माद्रीकुमार भी माँको उस संकटसे बचा न सका ॥ १८३ ॥
तच्छ्रुत्वा रुरुदुः सर्वे समालिङ्ग्य परस्परम् ॥ १ ९ ॥ पाण्डवाः पञ्च दुःखार्ता भूतानीव युगक्षये । यह सुनकर समस्त पाण्डव एक- दूसरेको हृदयसे लगाकर रोने लगे । जैसे प्रलयकालमें पाँचों भूत पीडित हो जाते हैं, उसी प्रकार उस समय पाँचों पाण्डव दुःखसे आतुर हो उठे ॥ १ ९ ३ ॥ तेषां तु पुरुषेन्द्राणां रुदतां रुदितस्वनः ॥ २० ॥
प्रासादाभोगसंरुद्धे अन्वरौत्सीत् स रोदसी ॥ २१ ॥
वहाँ रोदन करते हुए उन पुरुषप्रवर पाण्डवोंके रोनेका शब्द महलके विस्तारसे अवरुद्ध हुए भूतल और आकाशमें गूँजने लगा ॥ २०-२१ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि युधिष्ठिरविलापे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें युधिष्ठिरका विलापविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३८ ॥
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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती - इन तीनोंकी हड्डियोंको गङ्गामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना नारद उवाच
नासौ वृथाग्निना दग्धो यथा तत्र श्रुतं मया ।
वैचित्रवीर्यो नृपतिस्तत् ते वक्ष्यामि सुव्रत ॥ १ ॥
नारदजीने कहा –उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रका दाह व्यर्थ ( लौकिक ) अग्निसे नहीं हुआ है । इस विषयमें मैंने वहाँ जैसा सुना था, वह सब तुम्हें बाताऊँगा ॥ १ ॥
वनं प्रविशतानेन वायुभक्षेण धीमता ।
अग्नयः कारयित्वेष्टिमुत्सृष्टा इति नः श्रुतम् ॥ २ ॥
हमारे सुननेमें आया है कि वायु पीकर रहनेवाले वे बुद्धिमान् नरेश जब घने वनमें प्रवेश करने लगे, उस समय उन्होंने याजकोंद्वारा इष्टि कराकर तीनों अग्नियोंको वहीं त्याग दिया ॥ २ ॥
याजकास्तु ततस्तस्य तानग्नीन्निर्जने वने ।
समुत्सृज्य यथाकामं जग्मुर्भरतसत्तम ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उनकी उन अग्नियोंको उसी निर्जन वनमें छोड़कर उनके याजकगण इच्छानुसार अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ३ ॥
स विवृद्धस्तदा वह्निर्वने तस्मिन्नभूत् किल ।
तेन तद् वनमादीप्तमिति ते तापसाब्रुवन् ॥ ४ ॥
कहते हैं, वही अग्नि बढ़कर उस वनमें सब ओर फैल गयी और उसीने उस सारे वनको भस्मसात् कर दिया — यह बात मुझसे वहाँके तापसोंने बतायी थी ॥ ४ ॥
स राजा जाह्नवीतीरे यथा ते कथितं मया ।
तेनाग्निना समायुक्तः स्वेनैव भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे राजा गंगाके तटपर, जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है, उस अपनी ही अग्निसे दग्ध हुए हैं ॥
एवमावेदयामासुर्मुनयस्ते ममानघ ।
ये ते भागीरथीतीरे मया दृष्टा युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
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निष्पाप नरेश! गंगाजीके तटपर मुझे जिनके दर्शन हुए थे, उन मुनियोंने मुझसे ऐसा ही बताया था ॥ ६ ॥
एवं स्वेनाग्निना राजा समायुक्तो महीपते ।
मा शोचिथास्त्वं नृपतिं गतः स परमां गतिम् ॥ ७ ॥
पृथ्वीनाथ! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र अपनी ही अग्निसे दाहको प्राप्त हुए हैं, तुम उन
नरेशके लिये शोक न करो । वे परम उत्तम गतिको प्राप्त हुए हैं ॥ ७ ॥
गुरुशुश्रूषया चैव जननी ते जनाधिप ।
प्राप्ता सुमहतीं सिद्धिमिति मे नात्र संशयः ॥ ८ ॥
जनेश्वर! तुम्हारी माता कुन्तीदेवी गुरुजनोंकी सेवाके प्रभावसे बहुत बड़ी सिद्धिको प्राप्त हुई हैं, इस विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है ॥ ८ ॥
कर्तुमर्हसि राजेन्द्र तेषां त्वमुदकक्रियाम् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैरेतदत्र विधीयताम् ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! अब अपने सब भाइयोंके साथ जाकर तुम्हें उन तीनोंके लिये जलांजलि देनी चाहिये । इस समय यहाँ इसी कर्तव्यका पालन करना चाहिये ॥ ९ ॥
वैशम्पायनउवाच
ततः स पृथिवीपालः पाण्डवानां धुरंधरः ।
निर्ययौ सहसोदर्यः सदारश्च नरर्षभः ॥ १० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब पाण्डव- धुरन्धर पृथ्वीपाल नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने भाइयों और स्त्रियोंके साथ नगरसे बाहर निकले ॥ १० ॥
पौरजानपदाश्चैव राजभक्तिपुरस्कृताः ।
गङ्गां प्रजग्मुरभितो वाससैकेन संवृताः ॥ ११ ॥
उनके साथ राजभक्तिको सामने रखनेवाले पुरवासी और जनपदनिवासी भी थे । वे सब एक वस्त्र धारण करके गंगाजीके समीप गये ॥ ११ ॥
ततोऽवगाह्य सलिले सर्वे ते नरपुङ्गवाः ।
युयुत्सुमग्रतः कुत्वा ददुस्तोयं महात्मने ॥ १२ ॥
उन सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने गंगाजीके जलमें स्नान करके युयुत्सुको आगे रखते हुए महात्मा धृतराष्ट्रके लिये जलांजलि दी ॥ १२ ॥
गान्धार्याश्च पृथायाश्च विधिवन्नामगोत्रतः ।
शौचं निर्वर्तयन्तस्ते तत्रोषुर्नगराद् बहिः ॥ १३ ॥
फिर विधिपूर्वक नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए गान्धारी और कुन्तीके लिये भी उन्होंने जल-दान किया । तत्पश्चात् शौचसम्पादन या अशौचनिवृत्तिके लिये प्रयत्न करते हुए वे सब लोग नगरसे बाहर ही ठहर गये ॥ १३ ॥
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प्रेषयामास स नरान् विधिज्ञानाप्तकारिणः ।
गङ्गाद्वारं नरश्रेष्ठो यत्र दग्धोऽभवनृपः ॥ १४ ॥
तत्रैव तेषां कृत्यानि गङ्गाद्वारेऽन्वशात् तदा ।
कर्तव्यानीति पुरुषान् दत्तदेयान्महीपतिः ॥ १५ ॥
नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरने जहाँ राजा धृतराष्ट्र दग्ध हुए थे, उस स्थानपर भी हरद्वारमें विधि-विधानके जाननेवाले विश्वासपात्र मनुष्योंको भेजा और वहीं उनके श्राद्धकर्म करनेकी आज्ञा दी । फिर उन भूपालने उन पुरुषोंको दानमें देनेयोग्य नाना प्रकारकी वस्तुएँ अर्पित कीं ॥
द्वादशेऽहनि तेभ्यः स कृतशौचो नराधिपः ।
ददौ श्राद्धानि विधिवद् दक्षिणावन्ति पाण्डवः ॥ १६ ॥
शौच- सम्पादनके लिये दशाह आदि कर्म कर लेनेके पश्चात् पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने बारहवें दिन धृतराष्ट्र आदिके उद्देश्यसे विधिवत् श्राद्ध किया तथा उन श्राद्धोंमें ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणाएँ दीं ॥ १६ ॥
धृतराष्ट्रं समुद्दिश्य ददौ स पृथिवीपतिः ।
सुवर्णं रजतं गाश्च शय्याश्च सुमहाधनाः ॥ १७ ॥
गान्धार्याश्चैव तेजस्वी पृथायाश्च पृथक् पृथक् ।
संकीर्त्य नामनी राजा ददौ दानमनुत्तमम् ॥ १८ ॥
तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्तीके लिये पृथक् - पृथक् उनके नाम ले - लेकर सोना, चाँदी, गौ तथा बहुमूल्य शय्याएँ प्रदान कीं तथा परम उत्तम दान दिया ॥ १७-१८ ॥
यो यदिच्छति यावच्च तावत् स लभते नरः ।
शयनं भोजनं यानं मणिरत्नमथो धनम् ॥ १ ९ ॥
यानमाच्छादनं भोगान् दासीश्च समलंकृताः ।
ददौ राजा समुद्दिश्य तयोर्मात्रोर्महीपतिः ॥ २० ॥
उस समय जो मनुष्य जिस वस्तुको जितनी मात्रामें लेना चाहता, वह उस वस्तुको उतनी ही मात्रामें प्राप्त कर लेता था । राजा युधिष्ठिरने अपनी उन दोनों माताओंके उद्देश्यसे शय्या, भोजन, सवारी, मणि, रत्न, धन, वाहन, वस्त्र, नाना प्रकारके भोग तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दासियाँ प्रदान कीं ॥ १ ९ -२० ॥
ततः स पृथिवीपालो दत्त्वा श्राद्धान्यनेकशः ।
प्रविवेश पुरं राजा नगरं वारणाह्वयम् ॥ २१ ॥
इस प्रकार अनेक बार श्राद्धके दान देकर पृथ्वीपाल राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नामक नगरमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥
ते चापि राजवचनात् पुरुषा ये गताभवन् ।
संकल्प्य तेषां कुल्यानि पुनः प्रत्यागमंस्ततः ॥ २२ ॥