06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 281–290

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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किया । मुझे मेरे ही समान एक सहस्र ब्रह्मवादी पुत्र दिये तथा पुत्रोंसहित मेरी दस लाख वर्षकी आयु नियत कर दी ॥ ३८-३९ ॥ पराशर उवाच

प्रसाद्येह पुरा शर्वं मनसाचिन्तयं नृप ।

महातपा महातेजा महायोगी महायशाः ॥ ४० ॥

वेदव्यासः श्रियावासो ब्राह्मणः करुणान्वितः ।

अप्यसावीप्सितः पुत्रो मम स्याद् वै महेश्वरात् ॥ ४१ ॥

पराशरजीने कहा — नरेश्वर! पूर्वकालमें यहाँ मैंने महादेवजीको प्रसन्न करके मन - ही-मन उनका चिन्तन आरम्भ किया । मेरी इस तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे महेश्वरकी कृपासे महातपस्वी, महातेजस्वी, महायोगी, महायशस्वी, दयालु, श्रीसम्पन्न एवं ब्रह्मनिष्ठ वेदव्यासनामक मनोवांछित पुत्र प्राप्त हो ॥ ४०-४१ ॥

इति मत्वा हृदि मतं प्राह मां सुरसत्तमः ।

मयि सम्भावना यास्याः फलात्कृष्णो भविष्यति ॥ ४२ ॥

मेरा ऐसा मनोरथ जानकर सुरश्रेष्ठ शिवने मुझसे कहा- ' मुने! तुम्हारी मेरे प्रति जो सम्भावना है अर्थात् जिस वरको पानेकी लालसा है, उसीसे तुम्हें कृष्ण नामक पुत्र प्राप्त होगा ॥ ४२ ॥

सावर्णस्य मनोः सर्गे सप्तर्षिश्च भविष्यति ।

वेदानां च स वै वक्ता कुरुवंशकरस्तथा ॥ ४३ ॥

इतिहासस्य कर्ता च पुत्रस्ते जगतो हितः ।

भविष्यति महेन्द्रस्य दयितः स महामुनिः ॥ ४४ ॥

अजरश्चामरश्चैव पराशर सुतस्तव ।

एवमुक्त्या स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ४५ ॥

युधिष्ठिर महायोगी वीर्यवानक्षयोऽव्ययः । ‘ सावर्णिक मन्वन्तरके समय जो सृष्टि होगी, उसमें तुम्हारा यह पुत्र सप्तर्षिके पदपर प्रतिष्ठित होगा तथा इस वैवस्वत मन्वन्तरमें वह वेदोंका वक्ता, कौरव- वंशका प्रवर्तक, इतिहासका निर्माता, जगत्‌का हितैषी तथा देवराज इन्द्रका परम प्रिय महामुनि होगा । पराशर! तुम्हारा वह पुत्र सदा अजर- अमर रहेगा। ' युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महायोगी, शक्तिशाली, अविनाशी और निर्विकार भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ माण्डव्य उवाच अचौरश्चौरशङ्कायां शूले भिन्नो ह्यहं तदा ॥ ४६ ॥

तत्रस्थेन स्तुतो देवः प्राह मां वै नरेश्वर ।

मोक्षं प्राप्स्यसि शूलाच्च जीविष्यसि समार्बुदम् ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 282

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रुजा शूलकृता चैव न ते विप्र भविष्यति ।

आधिभिर्व्याधिभिश्चैव वर्जितस्त्वं भविष्यसि ॥ ४८ ॥

माण्डव्य बोले — नरेश्वर! मैं चोर नहीं था तो भी चोरीके संदेहमें मुझे शूलीपर चढ़ा दिया गया । वहींसे मैंने महादेवजीकी स्तुति की । तब उन्होंने मुझसे कहा— ' विप्रवर! तुम शूलसे छुटकारा पा जाओगे और दस करोड़ वर्षोंतक जीवित रहोगे । तुम्हारे शरीरमें इस

शूलके धँसनेसे कोई पीड़ा नहीं होगी । तुम आधि- व्याधिसे मुक्त हो जाओगे ॥ ४६–४८ ॥

पादाच्चतुर्थात् सम्भूत आत्मा यस्मान्मुने तव ।

त्वं भविष्यस्यनुपमो जन्म वै सफलं कुरु ॥ ४ ९ ॥

' मुने! तुम्हारा यह शरीर धर्मके चौथे पाद सत्यसे उत्पन्न हुआ है । अतः तुम अनुपम

सत्यवादी होओगे । जाओ, अपना जन्म सफल करो ॥ ४ ९ ॥

तीर्थाभिषेकं सकलं त्वमविघ्नेन चाप्स्यसि ।

स्वर्गं चैवाक्षयं विप्र विदधामि तवोर्जितम् ॥ ५० ॥

‘ ब्रह्मन्! तुम्हें बिना किसी विघ्न- बाधाके सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका सौभाग्य प्राप्त होगा । मैं तुम्हारे लिये अक्षय एवं तेजस्वी स्वर्गलोक प्रदान करता हूँ' ॥ ५० ॥

एवमुक्त्वा तु भगवान् वरेण्यो वृषवाहनः ।

महेश्वरो महाराज कृत्तिवासा महाद्युतिः ॥ ५१ ॥

सगणो दैवतश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत । महाराज! ऐसा कहकर कृत्तिवासा, महातेजस्वी, वृषभवाहन तथा वरणीय सुरश्रेष्ठ भगवान् महेश्वर अपने गणोंके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ५१ ॥

गालव उवाच विश्वामित्राभ्यनुज्ञातो ह्यहं पितरमागतः ॥ ५२ ॥

अब्रवीन्मां ततो माता दुःखिता रुदती भृशम् ।

कौशिकेनाभ्यनुज्ञातं पुत्रं वेदविभूषितम् ॥ ५३ ॥

न तात तरुणं दान्तं पिता त्वां पश्यतेऽनघ । गालवजीने कहा — राजन्! विश्वामित्र मुनिकी आज्ञा पाकर मैं अपने पिताजीका दर्शन करनेके लिये घरपर आया । उस समय मेरी माता वैधव्यके दुःखसे दुःखी हो जोर- जोरसे रोती हुई मुझसे बोली- ' तात! अनघ! कौशिक मुनिकी आज्ञा लेकर घरपर आये हुए वेदविद्यासे विभूषित तुझ तरुण एवं जितेन्द्रिय पुत्रको तुम्हारे पिता नहीं देख सके ' ॥ ५२-५३ ३ ॥ श्रुत्वा जनन्या वचनं निराशो गुरुदर्शने ॥ ५४ ॥

नियतात्मा महादेवमपश्यं सोऽब्रवीच्च माम् ।

पिता माता च ते त्वं च पुत्र मृत्युविवर्जिताः ॥ ५५ ॥

पृष्ठ 283

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भविष्यथ विश क्षिप्रं द्रष्टासि पितरं क्षये । माताकी बात सुनकर मैं पिताके दर्शनसे निराश हो गया और मनको संयममें रखकर महादेवजीकी आराधना करके उनका दर्शन किया । उस समय वे मुझसे बोले — ‘ वत्स! तुम्हारे पिता, माता और तुम तीनों ही मृत्युसे रहित हो जाओगे । अब तुम अपने घरमें शीघ्र प्रवेश करो । वहाँ तुम्हें पिताका दर्शन प्राप्त होगा' ॥ अनुज्ञातो भगवता गृहं गत्वा युधिष्ठिर ॥ ५६ ॥

अपश्यं पितरं तात इष्टिं कृत्वा विनिःसृतम् ।

उपस्पृश्य गृहीत्वेध्मं कुशांश्च शरणाकुरून् ॥ ५७ ॥

तात युधिष्ठिर! भगवान् शिवकी आज्ञासे मैंने पुनः घर जाकर वहाँ यज्ञ करके यज्ञशालासे निकले हुए पिताका दर्शन किया । वे उस समय समिधा, कुश और वृक्षोंसे अपने - आप गिरे हुए पके फल आदि हव्य पदार्थ लिये हुए थे ॥ ५६-५७ ॥

तान् विसृज्य च मां प्राह पिता सास्राविलेक्षणः ।

प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्क्युपाघ्राय पाण्डव ॥ ५८ ॥

दिष्ट्या दृष्टोऽसि मे पुत्र कृतविद्य इहागतः । पाण्डुनन्दन! उन्हें देखते ही मैं उनके चरणोंमें पड़ गया; फिर पिताजीने भी उन समिधा आदि वस्तुओंको अलग रखकर मुझे हृदयसे लगा लिया और मेरा मस्तक सूँघकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए मुझसे कहा- ' बेटा! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम विद्वान् होकर घर आ गये और मैंने तुम्हें भर आँख देख लिया' ॥ ५८ ॥

वैशम्पायन उवाच एतान्यत्यद्भुतान्येव कर्माण्यथ महात्मनः ॥ ५ ९ ॥

प्रोक्तानि मुनिभिः श्रुत्वा विस्मयामास पाण्डवः ।

ततः कृष्णोऽब्रवीद् वाक्यं पुनर्मतिमतां वरः ॥ ६० ॥

युधिष्ठिरं धर्मनिधिं पुरुहूतमिवेश्वरः । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मुनियोंके कहे हुए महादेवजीके ये अद्भुत चरित्र सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ा विस्मय हुआ । फिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने धर्मनिधि युधिष्ठिरसे उसी प्रकार कहा जैसे श्रीविष्णु देवराज इन्द्रसे कोई बात कहा करते हैं ॥ ५ ९-६०३ ॥ वासुदेव उवाच उपमन्युर्मयि प्राह तपन्निव दिवाकरः ॥ ६१ ॥

अशुभैः पापकर्माणो ये नराः कलुषीकृताः ।

ईशानं न प्रपद्यन्ते तमोराजसवृत्तयः ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 284

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भगवान् श्रीकृष्ण बोले- राजन्! सूर्यके समान तपते हुए- से तेजस्वी उपमन्युने मेरे समीप कहा था कि ‘ जो पापकर्मी मनुष्य अपने अशुभ आचरणोंसे कलुषित हो गये हैं, वे तमोगुणी या रजोगुणी वृत्तिके लोग भगवान् शिवकी शरण नहीं लेते हैं ॥ ६१-६२ ॥

ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावनाः ।

सर्वथा वर्तमानोऽपि यो भक्तः परमेश्वरे ॥ ६३ ॥

सदृशोऽरण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् । ‘ जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं । जो परमेश्वर शिवका भका है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है ॥ ६३ ॥

ब्रह्मत्वं केशवत्वं वा शक्रत्वं वा सुरैः सह ॥ ६४ ॥

त्रैलोक्यस्याधिपत्यं वा तुष्टो रुद्रः प्रयच्छति । ‘ भगवान् रुद्र संतुष्ट हो जायँ तो वे ब्रह्मपद, विष्णुपद, देवताओंसहित देवेन्द्रपद अथवा तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर सकते हैं ॥ ६४३ ॥

मनसापि शिवं तात ये प्रपद्यन्ति मानवाः ॥ ६५ ॥

विधूय सर्वपापानि देवैः सह वसन्ति ते । ' तात! जो मनुष्य मनसे भी भगवान् शिवकी शरण लेते हैं, वे सब पापोंका नाश करके देवताओंके साथ निवास करते हैं ॥ ६५ ॥

भित्त्वा भित्त्वा च कूलानि हुत्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६६ ॥

यजेद् देवं विरूपाक्षं न स पापेन लिप्यते । ‘ बारंबार तालाबके तटभूमिको खोद खोदकर उन्हें चौपट कर देनेवाला और इस सारे जगत्को जलती आगमें झोंक देनेवाला पुरुष भी यदि महादेवजीकी आराधना करता है तो वह पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि युक्तो वा सर्वपातकैः ॥ ६७ ॥

सर्वं तुदति तत्पापं भावयञ्छिवमात्मना । ‘ समस्त लक्षणोंसे हीन अथवा सब पापोंसे युक्त मनुष्य भी यदि अपने हृदयसे भगवान् शिवका ध्यान करता है तो वह अपने सारे पापोंको नष्ट कर देता है ॥ ६७३ ॥

कीटपक्षिपतङ्गानां तिरश्चामपि केशव ॥ ६८ ॥

महादेवप्रपन्नानां न भयं विद्यते क्वचित् । ‘ केशव! कीट, पतंग, पक्षी तथा पशु भी यदि महादेवजीकी शरणमें आ जायँ तो उन्हें भी कहीं किसीका भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ६८३ ॥

एवमेव महादेवं भक्ता ये मानवा भुवि ॥ ६ ९ ॥

न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मतिः ।

ततः कृष्णोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ७० ॥

पृष्ठ 285

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'इसी प्रकार इस भूतलपर जो मानव महादेवजीके भक्त हैं, वे संसारके अधीन नहीं होते— यह मेरा निश्चित विचार है । ' तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ६ ९ -७० ॥ विष्णुरुवाच आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो वसवोऽथ विश्वे । धातार्यमा शुक्रबृहस्पती च रुद्राः ससाध्या वरुणोऽथगोपः ॥ ७१ ॥

ब्रह्मा शक्रो मारुतो ब्रह्म सत्यं वेदा यज्ञा दक्षिणा वेदवाहाः । सोमो यष्टा यच्च हव्यं हविश्च रक्षा दीक्षा संयमा ये च केचित् ॥ ७२ ॥

स्वाहा वौषट् ब्राह्मणाः सौरभेयी धर्मं चाग्रयं कालचक्रं बलं च । यशो दमो बुद्धिमतां स्थितिश्च शुभाशुभं ये मुनयश्च सप्त ॥ ७३ ॥

अग्रया बुद्धिर्मनसा दर्शने च स्पर्शश्चाग्रयः कर्मणां या च सिद्धिः । गणा देवानामूष्मपाः सोमपाश्च लेखाः सुयामास्तुषिता ब्रह्मकायाः ॥ ७४ ॥

आभासुरा गन्धपा धूमपाश्च वाचा विरुद्धाश्च मनोविरुद्धाः । शुद्धाश्च निर्माणरताश्च देवाः स्पर्शाशना दर्शपा आज्यपाश्च ॥ ७५ ॥

चिन्त्यद्योता ये च देवेषु मुख्या ये चाप्यन्ये देवताश्चाजमीढ । सुपर्णगन्धर्वपिशाचदानवा यक्षास्तथा चारणपन्नगाश्च ॥ ७६ ॥

स्थूलं सूक्ष्मं मृदु चाप्यसूक्ष्मं दुःखं सुखं दुःखमनन्तरं च । सांख्यं योगं तत्पराणां परं च शर्वाज्जातं विद्धि यत् कीर्तितं मे ॥ ७७ ॥

पृष्ठ 286

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 286 का मूल पृष्ठ
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श्रीकृष्ण बोले- अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रगण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ॐकार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट् ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण- शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण- कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे - दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोंमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो ॥ ७१–७७ ॥ तत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्याः सर्वे देवा भुवनस्यास्य गोपाः । आविश्येमां धरणीं येऽभ्यरक्षन् पुरातनीं तस्य देवस्य सृष्टिम् ॥ ७८ ॥

जो इस भूतलमें प्रवेश करके महादेवजीकी पूर्वकृत सृष्टिकी रक्षा करते हैं, जो समस्त जगत्के रक्षक, विभिन्न प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले और श्रेष्ठ हैं, वे सम्पूर्ण देवता भगवान् शिवसे ही प्रकट हुए हैं ॥ विचिन्वन्तस्तपसा तत्स्थवीयः

किंचित् तत्त्वं प्राणहेतोर्नतोऽस्मि ।

ददातु देवः स वरानिहेष्टा- नभिष्टुतो नः प्रभुरव्ययः सदा ॥ ७ ९ ॥

ऋषि-मुनि तपस्याद्वारा जिसका अन्वेषण करते हैं, उस सदा स्थिर रहनेवाले अनिर्वचनीय परम सूक्ष्म तत्त्वस्वरूप सदाशिवको मैं जीवन -रक्षा के लिये नमस्कार करता हूँ । जिन अविनाशी प्रभुकी मेरे द्वारा सदा ही स्तुति की गयी है, वे महादेव यहाँ मुझे अभीष्ट वरदान दें ॥ इमं स्तवं संनियतेन्द्रियश्च भूत्वा शुचिर्यः पुरुषः पठेत । अभग्नयोगो नियतो मासमेकं सम्प्राप्नुयादश्वमेधे फलं यत् ॥ ८० ॥

पृष्ठ 287

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जो पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके पवित्र होकर इस स्तोत्रका पाठ करेगा और नियमपूर्वक एक मासतक अखण्डरूपसे इस पाठको चलाता रहेगा, वह अश्वमेध- यज्ञका फल प्राप्त कर लेगा ॥ ८० ॥

वेदान् कृत्स्नान् ब्राह्मणः प्राप्नुयात् तु जयेन्नृपः पार्थ महीं च कृत्स्नाम् । वैश्यो लाभं प्राप्नुयान्नैपुणं च शूद्रो गतिं प्रेत्य तथा सुखं च ॥ ८१ ॥

कुन्तीनन्दन! ब्राह्मण इसके पाठसे सम्पूर्ण वेदोंके स्वाध्यायका फल पाता है । क्षत्रिय समस्त पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर लेता है । वैश्य व्यापारकुशलता एवं महान् लाभका भागी होता है और शूद्र इहलोकमें सुख तथा परलोकमें सद्गति पाता है ॥ ८१ ॥

स्तवराजमिमं कृत्वा रुद्राय दधिरे मनः ।

सर्वदोषापहं पुण्यं पवित्रं च यशस्विनः ॥ ८२ ॥

जो लोग सम्पूर्ण दोषोंका नाश करनेवाले इस पुण्यजनक पवित्र स्तवराजका पाठ करके भगवान् रुद्रके चिन्तनमें मन लगाते हैं, वे यशस्वी होते हैं ॥ ८२ ॥

यावन्त्यस्य शरीरेषु रोमकूपाणि भारत ।

तावन्त्यब्दसहस्राणि स्वर्गे वसति मानवः ॥ ८३ ॥

भरतनन्दन! मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला मनुष्य उतने ही हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है ॥ ८३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वकी कथाविषयक अठारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

पृष्ठ 288

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एकोनविंशोऽध्यायः अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद युधिष्ठिर उवाच

यदिदं सहधर्मेति प्रोच्यते भरतर्षभ ।

पाणिग्रहणकाले तु स्त्रीणामेतत् कथं स्मृतम् ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भरतश्रेष्ठ! जो यह स्त्रियोंके लिये विवाहकालमें सहधर्मकी बात कही जाती है, वह किस प्रकार बतायी गयी है? ॥ १ ॥

आर्ष एष भवेद् धर्मः प्राजापत्योऽथवाऽऽसुरः ।

यदेतत् सहधर्मेति पूर्वमुक्तं महर्षिभिः ॥ २ ॥

महर्षियोंने पूर्वकालमें जो यह स्त्री -पुरुषोंके सहधर्मकी बात कही है, यह आर्ष धर्म है या प्राजापत्य धर्म; अथवा आसुर धर्म है? ॥ २ ॥

संदेहः सुमहानेष विरुद्ध इति मे मतिः ।

इह यः सहधर्मो वै प्रेत्यायं विहितः क्व नु ॥ ३ ॥

मेरे मनमें यह महान् संदेह पैदा हो गया है । मैं तो ऐसा समझता हूँ कि यह सहधर्मका कथन विरुद्ध है । यहाँ जो सहधर्म है, वह मृत्युके पश्चात् कहाँ रहता है? ॥

स्वर्गो मृतानां भवति सहधर्मः पितामह ।

पूर्वमेकस्तु म्रियते क्व चैकस्तिष्ठते वद ॥ ४ ॥

पितामह! जबकि मरे हुए मनुष्योंका स्वर्गवास हो जाता है एवं पति और पत्नीमेंसे एककी पहले मृत्यु हो जाती है, तब एक व्यक्तिमें सहधर्म कहाँ रहता है? यह बताइये ॥ ४ ॥

नानाधर्मफलोपेता नानाकर्मनिवासिताः ।

नानानिरयनिष्ठान्ता मानुषा बहवो यदा ॥ ५ ॥

जब बहुत - से मनुष्य नाना प्रकारके धर्मफलसे संयुक्त होते हैं, नाना प्रकारके कर्मवश विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हैं और शुभाशुभ कर्मोंके फल- स्वरूप स्वर्ग-नरक आदि नाना अवस्थाओंमें पड़ते हैं, तब वे सहधर्मका निर्वाह किस प्रकार कर सकते हैं? ॥ ५ ॥

अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति ।

यदानृताः स्त्रियस्तात सहधर्मः कुतः स्मृतः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 289

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धर्मसूत्रकार यह निश्चितरूपसे कहते हैं कि स्त्रियाँ असत्यपरायण होती हैं । तात! जब स्त्रियाँ असत्यवादिनी ही हैं तब उन्हें साथ रखकर सहधर्मका अनुष्ठान कैसे किया जा सकता है? ॥ ६ ॥

अनृताः स्त्रिय इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते ।

धर्मोऽयं पूर्विका संज्ञा उपचारः क्रियाविधिः ॥ ७ ॥

वेदोंमें भी यह बात पढ़ी गयी है कि स्त्रियाँ असत्यभाषिणी होती हैं, ऐसी दशामें उनका वह असत्य भी सहधर्मके अन्तर्गत आ सकता है, किंतु असत्य कभी धर्म नहीं हो सकता; अतः दाम्पत्यधर्मको जो सहधर्म कहा गया है, यह उसकी गौण संज्ञा है । वे पति- पत्नी साथ रहकर जो भी कार्य करते हैं, उसीको उपचारतः धर्म नाम दे दिया गया है ॥ ७ ॥

गह्वरं प्रतिभात्येतन्मम चिन्तयतोऽनिशम् ।

निःसंदेहमिदं सर्वं पितामह यथाश्रुति ॥ ८ ॥

पितामह! मैं ज्यों - ज्यों इस विषयपर विचार करता हूँ, त्यों- त्यों यह बात मुझे अत्यन्त दुर्बोध प्रतीत होती है । अतः आपने इस विषयमें जो कुछ श्रुतिका विधान हो, उसके अनुसार यह सब समझाइये जिससे मेरा संदेह दूर हो जाय ॥ ८ ॥

यदैतद् यादृशं चैतद् यथा चैतत् प्रवर्तितम् ।

निखिलेन महाप्राज्ञ भवानेतद् ब्रवीतु मे ॥ ९ ॥

महामते! यह सहधर्म जबसे प्रचलित हुआ, जिस रूपमें सामने आया और जिस प्रकार इसकी प्रवृत्ति हुई, ये सारी बातें आप मुझे बताइये ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

अष्टावक्रस्य संवादं दिशया सह भारत ॥ १० ॥

भीष्मजीने कहा - भरतनन्दन! इस विषयमें अष्टावक्र मुनिका उत्तर दिशाकी अधिष्ठात्रीदेवीके साथ जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १० ॥

निर्वेष्टुकामस्तु पुरा अष्टावक्रो महातपाः ।

ऋषेरथ वदान्यस्य वव्रे कन्यां महात्मनः ॥ ११ ॥

पूर्वकालकी बात है, महातपस्वी अष्टावक्र विवाह करना चाहते थे, उन्होंने इसके लिये महात्मा वदान्य ऋषिसे उनकी कन्या माँगी ॥ ११ ॥

सुप्रभां नाम वै नाम्ना रूपेणाप्रतिमां भुवि ।

गुणप्रभावशीलेन चारित्रेण च शोभनाम् ॥ १२ ॥

उस कन्याका नाम था सुप्रभा । इस पृथ्वीपर उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी । गुण, प्रभाव, शील और चरित्र सभी दृष्टियों से वह परम सुन्दर थी ॥ १२ ॥

पृष्ठ 290

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सा तस्य दृष्ट्वैव मनो जहार शुभलोचना ।

वनराजी यथा चित्रा वसन्ते कुसुमाचिता ॥ १३ ॥

जैसे वसंतऋतु सुन्दर फूलों से सजी हुई विचित्र वनश्रेणी मनुष्यके मनको लुभा लेती है, उसी प्रकार उस शुभलोचना मुनिकुमारीने दर्शनमात्रसे अष्टावक्रका मन चुरा लिया था ॥ १३ ॥

ऋषिस्तमाह देया मे सुता तुभ्यं हि तच्छृणु ।

( अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ह्यप्रवासी प्रियंवदः ।

सुरूपः सम्मतो वीरः शीलवान् भोगभुक्छविः ॥

दारानुमतयज्ञश्च सुनक्षत्रामथोद्वहेत् । स्वभर्त्रा स्वजनोपेत इह प्रेत्य च मोदते ॥ ) गच्छ तावद् दिशं पुण्यामुत्तरां द्रक्ष्यसे ततः ॥ १४ ॥

वदान्य ऋषिने अष्टावक्रके माँगनेपर इस प्रकार उत्तर दिया- ' विप्रवर! जिसके दूसरी कोई स्त्री न हो, जो परदेशमें न रहता हो, विद्वान्, प्रिय वचन बोलनेवाला, लोकसम्मानित, वीर, सुशील, भोग भोगनेमें समर्थ, कान्तिमान् और सुन्दर पुरुष हो, उसीके साथ मुझे अपनी पुत्रीका विवाह करना है । जो स्त्रीकी अनुमतिसे यज्ञ करता और उत्तम नक्षत्रवाली कन्याको व्याहता है, वह पुरुष अपनी पत्नीके साथ तथा पत्नी अपने पतिके साथ रहकर दोनों ही इहलोक और परलोकमें आनन्द भोगते हैं । मैं तुम्हें अपनी कन्या अवश्य दे दूँगा, परंतु पहले एक बात सुनो, यहाँसे परम पवित्र उत्तर दिशाकी ओर चले जाओ । वहाँ तुम्हें उसका दर्शन होगा ' ॥ १४ ॥

अष्टावक्र उवाच

किं द्रष्टव्यं मया तत्र वक्तुमर्हति मे भवान् ।

तथेदानीं मया कार्यं यथा वक्ष्यति मां भवान् ॥ १५ ॥

अष्टावक्रने पूछा – महर्षे! उत्तर दिशामें जाकर मुझे किसका दर्शन करना होगा? आप यह बतानेकी कृपा करें तथा उस समय मुझे क्या और किस प्रकार करना चाहिये, यह भी आप ही बतायेंगे ॥ १५ ॥

वदान्य उवाच

धनदं समतिक्रम्य हिमवन्तं च पर्वतम् ।

रुद्रस्यायतनं दृष्ट्वा सिद्धचारणसेवितम् ॥ १६ ॥

वदान्यने कहा — वत्स! तुम कुबेरकी अलकापुरीको लाँघकर जब हिमालय पर्वतको भी लाँघ जाओगे तब तुम्हें सिद्धों और चारणोंसे सेवित रुद्रके निवासस्थान कैलास पर्वतका दर्शन होगा ॥ १६ ॥

संहृष्टैः पार्षदैर्जुष्टं नृत्यद्भिर्विविधाननैः ।