06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 311–320
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २० श्लोक हैं ) Face
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द्वाविंशोऽध्यायः युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण [ मार्कण्डेयजीके द्वारा विविध प्रश्न और नारदजीके द्वारा उनका उत्तर] (युधिष्ठिर उवाच
पुत्रैः कथं महाराज पुरुषस्तरितो भवेत् ।
यावन्न लब्धवान् पुत्रमफलः पुरुषो नृप ॥
युधिष्ठिरने पूछा— नरेश्वर! महाराज! पुत्रोंद्वारा पुरुषका कैसे उद्धार होता है? जबतक पुत्रकी प्राप्ति न हो तबतक पुरुषका जीवन निष्फल क्यों माना जाता है? ॥ भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदेन पुरा गीतं मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है । पूर्वकालमें मार्कण्डेयके पूछनेपर देवर्षि नारदने जो उपदेश दिया था, उसीका इस इतिहासमें उल्लेख हुआ है ॥
पर्वतं नारदं चैवमसितं देवलं च तम् ।
आरुणेयं च रैभ्यं च एतानत्रागतान् पुरा ॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये भोगवत्याः समागमे ।
दृष्ट्वा पूर्वसमासीनान् मार्कण्डेयोऽभ्यगच्छत ॥
पहलेकी बात है, गंगा- यमुनाके मध्यभागमें जहाँ भोगवतीका समागम हुआ है वहीं पर्वत, नारद, असित, देवल, आरुणेय और रैभ्य – ये ऋषि एकत्र हुए थे । इन सब ऋषियोंको वहाँ पहलेसे विराजमान देख मार्कण्डेयजी भी गये ॥
ऋषयस्तु मुनिं दृष्ट्वा समुत्थायोन्मुखाः स्थिताः ।
अर्चयित्वार्हतो विप्रं किं कुर्म इति चाब्रुवन् ॥
ऋषियोंने जब मुनिको आते देखा, तब वे सब--के - सब उठकर उनकी ओर मुख करके खड़े हो गये और उन ब्रह्मर्षिकी उनके योग्य पूजा करके सबने पूछा — ' हम आपकी क्या सेवा करें? ' ॥ मार्कण्डेय उवाच अयं समागमः सद्भिर्यत्नेनासादितो मया ।
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अत्र प्राप्स्यामि धर्माणामाचारस्य च निश्चयम् ॥ मार्कण्डेयजीने कहा — मैंने बड़े यत्नसे सत्पुरुषोंका यह संग प्राप्त किया है । मुझे आशा है, यहाँ धर्म और आचारका निर्णय प्राप्त होगा ॥
ऋजुः कृतयुगे धर्मस्तस्मिन् क्षीणे विमुह्यति ।
युगे युगे महर्षिभ्यो धर्ममिच्छामि वेदितुम् ॥
सत्ययुगमें धर्मका अनुष्ठान सरल होता है । उस युगके समाप्त हो जानेपर धर्मका स्वरूप मनुष्योंके मोहसे आच्छन्न हो जाता है; अतः प्रत्येक युगके धर्मका क्या स्वरूप है? इसे मैं आप सब महर्षियोंसे जानना चाहता हूँ ॥ भीष्म उवाच
ऋषिभिर्नारदः प्रोक्तो ब्रूहि यत्रास्य संशयः ।
धर्माधर्मेषु तत्त्वज्ञ त्वं विच्छेत्तासि संशयान् ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तब सब ऋषियोंने मिलकर नारदजीसे कहा — ' तत्त्वज्ञ देवर्षे! मार्कण्डेयजीको जिस विषयमें संदेह है उसका आप निरूपण कीजिये । क्योंकि धर्म और अधर्मके विषयमें होनेवाले समस्त संशयोंका निवारण करनेमें आप समर्थ हैं ' ॥
ऋषिभ्योऽनुमतो वाक्यं नियोगान्नारदोऽब्रवीत् ।
सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञं मार्कण्डेयं ततोऽब्रवीत् ॥
ऋषियोंकी यह अनुमति और आदेश पाकर नारदजीने सम्पूर्ण धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले मार्कण्डेयजीसे पूछा ॥ नारद उवाच
दीर्घायो तपसा दीप्त वेदवेदाङ्गतत्त्ववित् ।
यत्र ते संशयो ब्रह्मन् समुत्पन्नः स उच्यताम् ॥
नारदजी बोले –तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले दीर्घायु मार्कण्डेयजी! आप तो स्वयं ही वेदों और वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाले हैं, तथापि ब्रह्मन्! जहाँ आपको संशय उत्पन्न हुआ हो वह विषय उपस्थित कीजिये ॥
धर्म लोकोपकारं वा यच्चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि ।
तदहं कथयिष्यामि ब्रूहि त्वं सुमहातपाः ॥
महातपस्वी महर्षे! धर्म, लोकोपकार अथवा और जिस किसी विषयमें आप सुनना
चाहते हों उसे कहिये । मैं उस विषयका निरूपण करूँगा ॥
मार्कण्डेय उवाच
युगे युगे व्यतीतेऽस्मिन् धर्मसेतुः प्रणश्यति ।
कथं धर्मच्छलेनाहं प्राप्नुयामिति मे मतिः ॥
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मार्कण्डेयजी बोले- प्रत्येक युगके बीत जानेपर धर्मकी मर्यादा नष्ट हो जाती है । फिर धर्मके बहानेसे अधर्म करनेपर मैं उस धर्मका फल कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरे मनमें यही प्रश्न उठता है ॥ नारद उवाच
आसीद् धर्मः पुरा विप्र चतुष्पादः कृते युगे ।
ततो ह्यधर्मः कालेन प्रवृत्तः किञ्चिदुन्नतः ॥
नारदजीने कहा - विप्रवर! पहले सत्ययुगमें धर्म अपने चारों पैरोंसे युक्त होकर सबके द्वारा पालित होता था । तदनन्तर समयानुसार अधर्मकी प्रवृत्ति हुई और उसने अपना सिर कुछ ऊँचा किया ॥
ततस्त्रेतायुगं नाम प्रवृत्तं धर्मदूषणम् ।
तस्मिन् व्यतीते सम्प्राप्तं तृतीयं द्वापरं युगम् ॥
तदा धर्मस्य द्वौ पादावधर्मो नाशयिष्यति । तदनन्तर धर्मको अंशतः दूषित करनेवाले त्रेतानामक दूसरे युगकी प्रवृत्ति हुई । जब वह भी बीत गया तब तीसरे युग द्वापरका पदार्पण हुआ । उस समय धर्मके दो पैरोंको अधर्म नष्ट कर देता है ॥ द्वापरे तु परिक्षीणे नन्दिके समुपस्थिते ॥ लोकवृत्तं च धर्मं च उच्यमानं निबोध मे । द्वापरके नष्ट होनेपर जब नन्दिक ( कलियुग ) उपस्थित होता है उस समय लोकाचार और धर्मका जैसा स्वरूप रह जाता है, उसे बताता हूँ, सुनिये ॥ चतुर्थं नन्दिकं नाम धर्मः पादावशेषितः ॥
ततः प्रभृति जायन्ते क्षीणप्रज्ञायुषो नराः ।
क्षीणप्राणधना लोके धर्माचारबहिष्कृताः ॥
चौथे युगका नाम है नन्दिक । उस समय धर्मका एक ही पाद ( अंश) शेष रह जाता है । तभीसे मन्दबुद्धि और अल्पायु मनुष्य उत्पन्न होने लगते हैं । लोकमें उनकी प्राणशक्ति बहुत कम हो जाती है । वे निर्धन तथा धर्म और सदाचारसे बहिष्कृत होते हैं ॥ मार्कण्डेय उवाच
एवं विलुलिते धर्मे लोके चाधर्मसंयुते ।
किं चतुर्वर्णनियतं हव्यं कव्यं न नश्यति ॥
मार्कण्डेयजीने पूछा- जब इस प्रकार धर्मका लोप होकर जगत्में अधर्म छा जाता है तब चारों वर्णोंके लिये नियत हव्य और कव्यका नाश क्यों नहीं हो जाता है? ॥ नारद उवाच
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मन्त्रपूतं सदा हव्यं कव्यं चैव न नश्यति ।
प्रतिगृह्णन्ति तद् देवा दातुर्न्यायात् प्रयच्छतः ॥
नारदजीने कहा - वेदमन्त्रसे सदा पवित्र होनेके कारण हव्य और कव्य नहीं नष्ट होते हैं । यदि दाता न्यायपूर्वक उनका दान करते हैं तो देवता और पितर उन्हें सादर ग्रहण करते हैं ॥
सत्त्वयुक्तश्च दाता च सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।
अवाप्तकामः स्वर्गे च महीयेत यथेप्सितम् ॥
जो दाता सात्त्विक भावसे युक्त होता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है । यहाँ आप्तकाम होकर वह स्वर्गमें भी अपनी इच्छाके अनुसार सम्मानित होता है ॥ मार्कण्डेय उवाच
चत्वारो ह्यथ ये वर्णा हव्यं कव्यं प्रदास्यते ।
मन्त्रहीनमवज्ञातं तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥
मार्कण्डेयजीने पूछा- यहाँ जो चार वर्णके लोग हैं, उनके द्वारा यदि मन्त्ररहित और अवहेलना- पूर्वक हव्य - कव्यका दान दिया जाय तो उनका वह दान कहाँ जाता है? ॥ नारद उवाच
असुरान् गच्छते दत्तं विप्रै रक्षांसि क्षत्रियैः ।
वैश्यैः प्रेतानि वै दत्तं शूद्रैर्भूतानि गच्छति ॥
नारदजीने कहा — यदि ब्राह्मणोंने वैसा दान किया है तो वह असुरोंको प्राप्त होता है, क्षत्रियोंने किया है तो उसे राक्षस ले जाते हैं, वैश्योंद्वारा किये गये वैसे दानको प्रेत ग्रहण करते हैं और शूद्रोंद्वारा किया गया अवज्ञापूर्वक दान भूतोंको प्राप्त होता है ॥ मार्कण्डेय उवाच
अथ वर्णावरे जाताश्चातुर्वर्ण्योपदेशिनः ।
दास्यन्ति हव्यकव्यानि तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥
मार्कण्डेयजीने पूछा- जो नीच वर्णमें उत्पन्न होकर चारों वर्णोंको उपदेश देते और हव्य - कव्यका दान देते हैं, उनका दिया हुआ दान कहाँ जाता है? ॥ नारद उवाच
वर्णावराणां भूतानां हव्यकव्यप्रदातृणाम् ।
नैव देवा न पितरः प्रतिगृह्णन्ति तत् स्वयम् ॥
नारदजीने कहा-जब नीच वर्णके लोग हव्य- कव्यका दान करते हैं, तब उनके उस दानको न देवता ग्रहण करते हैं न पितर ॥
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यातुधानाः पिशाचाश्च भूता ये चापि नैरृताः ।
तेषां सा विहिता वृत्तिः पितृदैवतनिर्गता ॥
जो यातुधान, पिशाच, भूत और राक्षस हैं, उन्हींके लिये उस वृत्तिका विधान किया गया है । पितरों और देवताओंने वैसी वृत्तिका परित्याग कर दिया है ॥
तेषां सर्वप्रदातॄणां हव्यकव्यं समाहिताः ।
यत् प्रयच्छन्ति विधिवत् तद् वै भुञ्जन्ति देवताः ॥
जो सब कुछ देनेवाले और उस कर्मके अधिकारी हैं, वे एकाग्रचित्त होकर विधिपूर्वक जो हव्य और कव्य समर्पित करते हैं, उसे देवता और पितर ग्रहण करते हैं ॥ मार्कण्डेय उवाच
श्रुतं वर्णावरैर्दत्तं हव्यं कव्यं च नारद ।
सम्प्रयोगे च पुत्राणां कन्यानां च ब्रवीहि मे ॥
मार्कण्डेयजीने पूछा- नारदजी! नीच वर्णके दिये हुए हव्य और कव्योंकी जो दशा होती है, उसे मैंने सुन ली । अब पुत्रों और कन्याओंके विषयमें एवं इनके संयोगके विषयमें मुझे कुछ बातें बताइये ॥ नारदउवाच
कन्याप्रदानं पुत्राणां स्त्रीणां संयोगमेव च ।
आनुपूर्व्यान्मया सम्यगुच्यमानं निबोध मे ॥
नारदजीने कहा- अब मैं कन्या -विवाहके और पुत्रोंके विषयमें एवं स्त्रियोंके संयोगके विषयमें क्रमशः बता रहा हूँ, उसे सुनो ॥
जातमात्रा तु दातव्या कन्यका सदृशे वरे ।
काले दत्तासु कन्यासु पिता धर्मेण युज्यते ॥
जो कन्या उत्पन्न हो जाती है, उसे किसी योग्य वरको सौंप देना आवश्यक होता है ।
यदि ठीक समयपर कन्याओंका दान हो गया तो पिता धर्मफलका भागी होता है ॥
यस्तु पुष्पवतीं कन्यां बान्धवो न प्रयच्छति ।
मासि मासि गते बन्धुस्तस्या भ्रौणघ्न्यमाप्नुते ॥
जो भाई- बन्धु रजस्वलावस्थामें पहुँच जानेपर भी कन्याका किसी योग्य वरके साथ विवाह नहीं कर देता, वह उसके एक-एक मास बीतनेपर भ्रूणहत्याके फलका भागी होता है ॥
यस्तु कन्यां गृहे रुन्ध्याद् ग्राम्यैर्भोगैर्विवर्जिताम् ।
अवध्यातः स कन्याया बन्धुः प्राप्नोति भ्रूणहाम् ॥
जो भाई -बन्धु कन्याको विषय- भोगोंसे वंचित करके घरमें रोके रखता है, वह उस कन्याके द्वारा अनिष्ट चिन्तन किये जानेके कारण भ्रूणहत्याके पापका भागी होता है ॥
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मार्कण्डेय उवाच
केन मङ्गलकृत्येषु विनियुज्यन्ति कन्यकाः ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेनेह महामुने ॥
मार्कण्डेयजीने पूछा- महामुने! किस कारणसे कन्याओंको मांगलिक कर्मोंमें नियुक्त किया जाता है? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ नारद उवाच
नित्यं निवसते लक्ष्मीः कन्यकासु प्रतिष्ठिता ।
शोभना शुभयोग्या च पूज्या मङ्गलकर्मसु ॥
नारदजीने कहा – कन्याओंमें सदा लक्ष्मी निवास करती हैं । वे उनमें नित्य प्रतिष्ठित होती हैं; इसलिये प्रत्येक कन्या शोभासम्पन्न, शुभ कर्मके योग्य तथा मंगल कर्मोंमें पूजनीय होती है ॥
आकरस्थं यथा रत्नं सर्वकामफलोपगम् ।
तथा कन्या महालक्ष्मीः सर्वलोकस्य मङ्गलम् ॥
जैसे खानमें स्थित हुआ रत्न सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्ति करानेवाला होता है, उसी प्रकार महालक्ष्मीस्वरूपा कन्या सम्पूर्ण जगत्के लिये मंगल- कारिणी होती है ॥
एवं कन्या परा लक्ष्मी रतिस्तोषश्च देहिनाम् ।
महाकुलानां चारित्रं वृत्तेन निकषोपलम् ॥
इस तरह कन्याको लक्ष्मीका सर्वोत्कृष्ट रूप जानना चाहिये । उससे देहधारियोंको सुख और संतोषकी प्राप्ति होती है। वह अपने सदाचारके द्वारा उच्च कुलोंके चरित्रकी कसौटी समझी जाती है ॥
आनयित्वा स्वकाद् वर्णात् कन्यकां यो भजेन्नरः ।
दातारं हव्यकव्यानां पुत्रकं या प्रसूयते ॥
जो मनुष्य अपने ही वर्णकी कन्याको विवाहके द्वारा लाकर उसे पत्नीके स्थानपर प्रतिष्ठित करता है, उसकी वह साध्वी पत्नी हव्यकव्य प्रदान करनेवाले पुत्रको जन्म देती है ॥
साध्वी कुलं वर्धयति साध्वी पुष्टिर्गृहे परा ।
साध्वी लक्ष्मी रतिः साक्षात् प्रतिष्ठा संततिस्तथा ॥
साध्वी स्त्री कुलकी वृद्धि करती है । साध्वी स्त्री घरमें परम पुष्टिरूप है तथा साध्वी स्त्री घरकी लक्ष्मी है, रति है, मूर्तिमती प्रतिष्ठा है तथा संतान - परम्पराकी आधार है ॥ मार्कण्डेय उवाच
कानि तीर्थानि भगवन् नृणां देहाश्रितानि वै ।
तानि वै शंस भगवन् याथातथ्येन पृच्छतः ॥
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मार्कण्डेयजीने पूछा— भगवन्! मनुष्योंके शरीरमें कौन- कौन- से तीर्थ हैं? मैं यह
जानना चाहता हूँ । अतः आप यथार्थरूपसे मुझे बताइये ॥
नारद उवाच
देवर्षिपितृतीर्थानि बाह्मं मध्येऽथ वैष्णवम् ।
नृणां तीर्थानि पञ्चाहुः पाणौ संनिहितानि वै ॥
नारदजीने कहा — मनीषी पुरुष कहते हैं, मनुष्योंके हाथमें ही पाँच तीर्थ हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं — देवतीर्थ, ऋषितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्राह्मतीर्थ और वैष्णवतीर्थ। ( अंगुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ है । कनिष्ठा और अनामिका अंगुलिके मूलभागमें आर्षतीर्थ है । इसीको कायतीर्थ और प्राजापत्यतीर्थ भी कहते हैं । अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्यभागमें पितृतीर्थ है । अंगुष्ठमूलभागमें ब्राह्मतीर्थ है और हथेलीके मध्यभागमें वैष्णवतीर्थ है । ) ॥
आद्यतीर्थं तु तीर्थानां वैष्णवो भाग उच्यते ।
यत्रोपस्पृश्य वर्णानां चतुर्णां वर्धते कुलम् ॥
पितृदैवतकार्याणि वर्धन्ते प्रेत्य चेह च । हाथमें जो वैष्णवतीर्थका भाग है, उसे सब तीर्थोंमें प्रधान कहा जाता है । जहाँ जल रखकर आचमन करनेसे चारों वर्णोंके कुलकी वृद्धि होती है, तथा देवता और पितरोंके कार्यकी इहलोक और परलोकमें वृद्धि होती है ॥ मार्कण्डेय उवाच
धर्मेष्वधिकृतानां तु नराणां मुह्यते मनः ।
कथं न विघ्नं भवति एतदिच्छामि वेदितुम् ॥
मार्कण्डेयजीने पूछा- जो धर्मके अधिकारी हैं, ऐसे मनुष्योंका मन कभी -कभी धर्मके विषयमें संशयापन्न हो जाता है । क्या करनेसे उनके धर्माचरणमें विघ्न न पड़े? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ नारद उवाच अर्थाश्च नार्यश्च समानमेत- च्छ्रेयांसि पुंसामिह मोहयन्ति । रतिप्रमोदात् प्रमदा हरन्ति भोगैर्धनं चाप्युपहन्ति धर्मान् ॥ नारदजीने कहा — धन और नारी दोनोंकी अवस्था एक- सी है । दोनों ही मनुष्योंको कल्याणके पथपर जानेमें बाधा देते हैं—उन्हें मोहित कर लेते हैं । रतिजनित आमोद-प्रमोदसे स्त्रियाँ मनको हर लेती हैं और धन भोगोंके द्वारा धर्मको चौपट कर देता है ॥ हव्यं कव्यं च धर्मात्मा सर्वं तच्छ्रोत्रियोऽर्हति ।
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दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलिताग्नाविवाहुतिः ॥ धर्मात्मा श्रोत्रिय ब्राह्मण समस्त हव्य और कव्यको पानेका अधिकारी है । श्रेष्ठ श्रोत्रियको दिया हुआ हव्य- कव्य प्रज्वलित अग्निमें डाली हुई आहुतिके समान सफल होता है ॥ भीष्मउवाच
इति सम्भाष्य ऋषिभिर्मार्कण्डेयो महातपाः ।
नारदं चापि सत्कृत्य तेन चैवाभिसत्कृतः ॥
भीष्मजी कहते हैं -इस प्रकार ऋषियोंके साथ बात - चीत करके महातपस्वी मार्कण्डेयने नारदजीका सत्कार किया और स्वयं भी वे उनके द्वारा सम्मानित हुए ॥ आमन्त्रयित्वा ऋषिभिः प्रययावाश्रमं मुनिः । ऋषयश्चापि तीर्थानां परिचर्यां प्रचक्रमुः ॥ ) तत्पश्चात् ऋषियोंसे विदा लेकर मार्कण्डेय मुनि अपने आश्रमको चले गये तथा वे ऋषि भी तीर्थोंमें भ्रमण करने लगे ॥ [दाक्षिणात्य अध्याय समाप्त ] युधिष्ठिर उवाच किमाहुर्भरतश्रेष्ठ पात्रं विप्राः सनातनाः ब्राह्मणं लिङ्गिनं चैव ब्राह्मणं वाप्यलिङ्गिनम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — भरतश्रेष्ठ! प्राचीन ब्राह्मण किसको दानका श्रेष्ठ पात्र बताते हैं? दण्ड - कमण्डलु आदि चिह्न धारण करनेवाले ब्रह्मचारी ब्राह्मणको अथवा चिह्नरहित गृहस्थ ब्राह्मणको? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
स्ववृत्तिमभिपन्नाय लिङ्गिने चेतराय च ।
देयमाहुर्महाराज उभावेतौ तपस्विनौ ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - महाराज! जीवन-रक्षाके लिये अपनी वर्णाश्रमोचित वृत्तिका आश्रय लेनेवाले चिह्नधारी या चिह्नरहित किसी भी ब्राह्मणको दान दिया जाना उचित बताया गया है; क्योंकि स्वधर्मका आश्रय लेनेवाले ये दोनों ही तपस्वी एवं दानपात्र ॥ २ ॥
युधिष्ठिर उवाच
श्रद्धया परया पूतो यः प्रयच्छेद् द्विजातये ।
हव्यं कव्यं तथा दानं को दोषः स्यात् पितामह ॥ ३ ॥
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युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! जो केवल उत्कृष्ट श्रद्धासे ही पवित्र होकर ब्राह्मणको हव्य- कव्य तथा अन्य वस्तुका दान देता है, उसे अन्य प्रकारकी पवित्रता न होनेके कारण किस दोषकी प्राप्ति होती है? ॥ ३ ॥
भीष्मउवाच
श्रद्धापूतो नरस्तात दुर्दान्तोऽपि न संशयः ।
पूतो भवति सर्वत्र किमुत त्वं महाद्युते ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! मनुष्य जितेन्द्रिय न होनेपर भी केवल श्रद्धामात्रसे पवित्र हो जाता है — इसमें संशय नहीं है । महातेजस्वी नरेश! श्रद्धापूत मनुष्य सर्वत्र पवित्र होता है, फिर तुम - जैसे धर्मात्माके पवित्र होनेमें तो संदेह ही क्या है? ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवेषु सततं नरः ।
कव्यप्रदाने तु बुधाः परीक्ष्यं ब्राह्मणं विदुः ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! विद्वानोंका कहना है कि देवकार्यमें कभी ब्राह्मणकी परीक्षा न करे, किंतु श्राद्धमें अवश्य उसकी परीक्षा करे; इसका क्या कारण है? ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
न ब्राह्मणः साधयते हव्यं दैवात् प्रसिद्ध्यति ।
देवप्रसादादिज्यन्ते यजमानैर्न संशयः ॥ ६ ॥
भीष्मजीने कहा- बेटा! यज्ञ- होम आदि देवकार्यकी सिद्धि ब्राह्मणके अधीन नहीं है, वह दैवसे सिद्ध होता है । देवताओंकी कृपासे ही यजमान यज्ञ करते हैं । इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
ब्राह्मणान् भरतश्रेष्ठ सततं ब्रह्मवादिनः ।
मार्कण्डेयः पुरा प्राह इति लोकेषु बुद्धिमान् ॥ ७ ॥
भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने बहुत पहलेसे ही यह बता रखा है कि श्राद्धमें सदा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको ही निमन्त्रित करना चाहिये ( क्योंकि उसकी सिद्धि सुपात्र ब्राह्मणके ही अधीन है ) ॥ ७ ॥
युधिष्ठिरउवाच
अपूर्वोऽप्यथवा विद्वान् सम्बन्धी वा यथा भवेत् ।
तपस्वी यज्ञशीलो वा कथं पात्रं भवेत् तु सः ॥ ८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- जो अपरिचित, विद्वान्, सम्बन्धी, तपस्वी अथवा यज्ञशील हों, इनमेंसे कौन किस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न होनेपर श्राद्ध एवं दानका उत्तम पात्र हो सकता है? ॥ ८ ॥