06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 301–310

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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ततः स ऋषिरेकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत ।

आस्यतां रुचितश्छन्दः किं च कार्यं ब्रवीहि मे ॥ ९ ५ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तब ऋषिने एकाग्रचित्त होकर उस स्त्रीसे कहा — 'चुप रहो । मनमें भोगकी रुचि होनेपर स्वेच्छाचार होता है । मेरी रुचि नहीं है, अतः मुझसे यह काम नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त यदि मुझसे कोई काम हो तो बताओ' ॥ ९ ५ ॥

सा स्त्री प्रोवाच भगवन् द्रक्ष्यसे देशकालतः ।

वस तावन्महाभाग कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ ९ ६ ॥

उस स्त्रीने कहा — ‘ भगवन्! महाभाग! देश और कालके अनुसार आपको अनुभव हो जायगा । आप यहाँ रहिये, कृतकृत्य हो जाइयेगा ' ॥ ९ ६ ॥

ब्रह्मर्षिस्तामथोवाच स तथेति युधिष्ठिर ।

वत्स्येऽहं यावदुत्साहो भवत्या नात्र संशयः ॥ ९ ७ ॥

युधिष्ठिर! तब ब्रह्मर्षिने उससे कहा - ' ठीक है, जबतक मेरे मनमें यहाँ रहनेका उत्साह होगा तबतक आपके साथ रहूँगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥ ९ ७ ॥

अथर्षिरभिसम्प्रेक्ष्य स्त्रियं तां जरयार्दिताम् ।

चिन्तां परमिकां भेजे संतप्त इव चाभवत् ॥ ९ ८ ॥

इसके बाद ऋषि उस स्त्रीको जरावस्थासे पीड़ित देख बड़ी चिन्तामें पड़ गये और संतप्त - से हो उठे ॥ ९ ८ ॥

यद् यदङ्गं हि सोऽपश्यत् तस्या विप्रर्षभस्तदा ।

नारमत् तत्र तत्रास्य दृष्टी रूपविरागिता ॥ ९९ ॥

विप्रवर अष्टावक्र उसका जो- जो अंग देखते थे वहाँ -वहाँ उनकी दृष्टि रमती नहीं थी, अपितु उसके रूपसे विरक्त हो उठती थी ॥ ९९ ॥

देवतेयं गृहस्यास्य शापात् किं नु विरूपिता ।

अस्याश्च कारणं वेत्तुं न युक्तं सहसा मया ॥। १०० ॥

वे सोचने लगे ‘ यह नारी तो इस घरकी अधिष्ठात्री देवी है । फिर इसे इतना कुरूप किसने बना दिया? इसकी कुरूपताका कारण क्या है? इसे किसीका शाप तो नहीं लग गया । इसकी कुरूपताका कारण जाननेके लिये सहसा चेष्टा करना मेरे लिये उचित नहीं है ' ॥ १०० ॥

इति चिन्ताविविक्तस्य तमर्थं ज्ञातुमिच्छतः ।

व्यगच्छत् तदहःशेषं मनसा व्याकुलेन तु ॥ १०१ ॥

इस प्रकार व्याकुल चित्तसे एकान्तमें बैठकर चिन्ता करते और उसकी कुरूपताका कारण जाननेकी इच्छा रखते हुए महर्षिका वह सारा दिन बीत चला ॥

अथ सा स्त्री तथोवाच भगवन् पश्य वै रवेः ।

रूपं संध्याभ्रसंरक्तं किमुपस्थाप्यतां तव ॥ १०२ ॥

पृष्ठ 302

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तब उस स्त्रीने कहा — ‘ भगवन्! देखिये, सूर्यका रूप संध्याकी लालीसे लाल हो गया है । इस समय आपके लिये कौन - सी वस्तु प्रस्तुत की जाय? ' ॥ १०२ ॥

स उवाच ततस्तां स्त्रीं स्नानोदकमिहानय ।

उपासिष्ये ततः संध्यां वाग्यतो नियतेन्द्रियः ॥ १०३ ॥

तब ऋषिने उस स्त्रीसे कहा- ' मेरे नहानेके लिये यहाँ जल ले आओ । स्नानके पश्चात् मैं मौन होकर इन्द्रियसंयमपूर्वक संध्योपासना करूँगा' ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवादविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १ ९ ॥ ( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं )

पृष्ठ 303

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विंशोऽध्यायः अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद भीष्म उवाच

अथ सा स्त्री तमुवाच बाढमेवं भवत्विति ।

तैलं दिव्यमुपादाय स्नानशाटीमुपानयत् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—- राजन्! ऋषिकी बात सुनकर उस स्त्रीने कहा -‘बहुत अच्छा, ऐसा ही हो' यों कहकर वह दिव्य तेल और स्नानोपयोगी वस्त्र ले आयी ॥

अनुज्ञाता च मुनिना सा स्त्री तेन महात्मना ।

अथास्य तैलेनाङ्गानि सर्वाण्येवाभ्यमृक्षत ॥ २ ॥

फिर उन महात्मा मुनिकी आज्ञा लेकर उस स्त्रीने उनके सारे अंगोंमें तेलकी मालिश की ॥ २ ॥

शनैश्चोत्सादितस्तत्र स्नानशालामुपागमत् ।

भद्रासनं ततश्चित्रमृषिरन्वगमन्नवम् ॥ ३ ॥

फिर उसके उठानेपर वे धीरेसे वहाँ स्नानगृहमें गये । वहाँ ऋषिको एक विचित्र एवं नूतन चौकी प्राप्त हुई ॥ ३ ॥

अथोपविष्टश्च यदा तस्मिन् भद्रासने तदा ।

स्नापयामास शनकैस्तमृषिं सुखहस्तवत् ॥ ४ ॥

जब वे उस सुन्दर चौकीपर बैठ गये तब उस स्त्रीने धीरे- धीरे हाथोंके कोमल स्पर्शसे उन्हें नहलाया ॥ ४ ॥

दिव्यं च विधिवच्चक्रे सोपचारं मुनेस्तदा ।

स तेन सुसुखोष्णेन तस्या हस्तसुखेन च ॥ ५ ॥

व्यतीतां रजनीं कृत्स्नां नाजानात् स महाव्रतः । उसने मुनिके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण दिव्य सामग्री प्रस्तुत की । वे महाव्रतधारी मुनि उसके दिये हुए कुछ - कुछ गरम होनेके कारण सुखदायक जलसे नहाकर उसके हाथोंके सुखद स्पर्शसे सेवित होकर इतने आनन्दविभोर हो गये कि कब सारी रात बीत गयी? इसका उन्हें ज्ञान ही नहीं हुआ ॥ ५३ ॥

तत उत्थाय स मुनिस्तदा परमविस्मितः ॥ ६ ॥

पूर्वस्यां दिशि सूर्यं च सोऽपश्यदुदितं दिवि ।

तस्य बुद्धिरियं किं नु मोहस्तत्त्वमिदं भवेत् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 304

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तदनन्तर वे मुनि अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर उठ बैठे । उन्होंने देखा कि पूर्व-दिशाके आकाशमें सूर्यदेवका उदय हो गया है । वे सोचने लगे, क्या यह मेरा मोह है या वास्तवमें सूर्योदय हो गया है ॥ ६-७ ॥

अथोपास्य सहस्रांशुं किं करोमीत्युवाच ताम् ।

सा चामृतरसप्रख्यं ऋषेरन्नमुपाहरत् ॥ ८ ॥

फिर तो तत्काल स्नान, संध्योपासना और सूर्योपस्थान करके उससे बोले, ‘ अब क्या करूँ? ' तब उस स्त्रीने ऋषिके समक्ष अमृतरसके समान मधुर अन्न परोसकर रखा ॥ ८ ॥

तस्य स्वादुतयान्नस्य न प्रभूतं चकार सः ।

व्यगमच्चाप्यहःशेषं ततः संध्यागमत् पुनः ॥ ९ ॥

उस अन्नके स्वादसे वे इतने आकृष्ट हो गये कि उसे पर्याप्त न मान सके — ‘ बस अब पूरा हो गया ' यह बात न कह सके । इसीमें सारा दिन निकल गया और पुनः संध्याकाल आ पहुँचा ॥ ९ ॥

अथ सा स्त्री भगवन्तं सुप्यतामित्यचोदयत् ।

तत्र वै शयने दिव्ये तस्य तस्याश्च कल्पिते ॥ १० ॥

इसके बाद उस स्त्रीने भगवान् अष्टावक्रसे कहा- ' अब आप सो जाइये । ' फिर वहीं उनके और उस स्त्रीके लिये दो शय्याएँ बिछायी गयीं ॥ १० ॥

पृथक् चैव तथा सुप्तौ सा स्त्री स च मुनिस्तदा ।

तथार्धरात्रे सा स्त्री तु शयनं तदुपागमत् ॥ ११ ॥

उस समय वह स्त्री और मुनि दोनों अलग - अलग सो गये । जब आधी रात हुई तब वह स्त्री उठकर मुनिकी शय्यापर आ बैठी ॥ ११ ॥

अष्टावक्र उवाच

न भद्रे परदारेषु मनो मे सम्प्रसज्जति ।

उत्तिष्ठ भद्रे भद्रं ते स्वयं वै विरमस्व च ॥ १२ ॥

अष्टावक्र बोले — भद्रे! मेरा मन परायी स्त्रियोंमें आसक्त नहीं होता है । तुम्हारा भला हो, यहाँसे उठो और स्वयं ही इस पापकर्मसे विरत हो जाओ ॥ १२ ॥

भीष्मउवाच

सा तदा तेन विप्रेण तथा तेन निवर्तिता ।

स्वतन्त्रास्मीत्युवाचर्षिं न धर्मच्छलमस्ति ते ॥ १३ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिके लौटानेपर उसने कहा — ' मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मेरे साथ समागम करनेसे आपके धर्मकी छलना नहीं होगी ' ॥ १३ ॥

अष्टावक्र उवाच

पृष्ठ 305

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नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणामस्वतन्त्रा हि योषितः ।

प्रजापतिमतं ह्येतन्न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १४ ॥

अष्टावक्र बोले — भद्रे! स्त्रियोंकी स्वतन्त्रता नहीं सिद्ध होती; क्योंकि वे परतन्त्र मानी गयी हैं । प्रजापतिका यह मत है कि स्त्री स्वतन्त्र रहनेयोग्य नहीं है ॥ १४ ॥

स्त्र्युवाच

बाधते मैथुनं विप्र मम भक्तिं च पश्य वै ।

अधर्मं प्राप्स्यसे विप्र यन्मां त्वं नाभिनन्दसि ॥ १५ ।

स्त्री बोली - ब्रह्मन्! मुझे मैथुनकी भूख सता रही है । आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, इसपर भी तो दृष्टिपात कीजिये । विप्रवर! यदि आप मुझे संतुष्ट नहीं करते हैं तो आपको पाप लगेगा ॥ १५ ॥

अष्टावक्र उवाच

हरन्ति दोषजातानि नरं जातं यथेच्छकम् ।

प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वशयनं व्रज ॥ १६ ॥

अष्टावक्रने कहा— भद्रे! स्वेच्छाचारी मनुष्यको ही सब प्रकारके पापसमूह अपनी ओर खींचते हैं । मैं धैर्यके द्वारा सदा अपने मनको काबूमें रखता हूँ; अतः तुम अपनी शय्यापर लौट जाओ ॥ १६ ॥

स्त्र्युवाच

शिरसा प्रणमे विप्र प्रसादं कर्तुमर्हसि ।

भूमौ निपतमानायाः शरणं भव मेऽनघ ॥ १७ ॥

स्त्री बोली - अनघ! विप्रवर! मैं सिर झुकाकर प्रणाम करती हूँ और आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ । आप मुझपर कृपा करें और मुझे शरण दें ॥ १७ ॥

यदि वा दोषजातं त्वं परदारेषु पश्यसि ।

आत्मानं स्पर्शयाम्यद्य पाणिं गृह्णीष्व मे द्विज ॥ १८ ॥

ब्रह्मन्! यदि आप परायी स्त्रियोंके साथ समागममें दोष देखते हैं तो मैं स्वयं आपको

अपना दान करती हूँ । आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये ॥ १८ ॥

न दोषो भविता चैव सत्येनैतद् ब्रवीम्यहम् ।

स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्मः सोऽस्तु वै मयि ।

त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम् ॥ १ ९ ॥

मैं सच कहती हूँ, आपको कोई दोष नहीं लगेगा । आप मुझे स्वतन्त्र समझिये । इसमें जो पाप होता है, वह मुझे ही लगे । मेरा चित्त आपके ही चिन्तनमें लगा है । मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मुझे स्वीकार कीजिये ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 306

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अष्टावक्र उवाच

स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे ब्रूहि कारणमत्र वै ।

नास्ति त्रिलोके स्त्री काचिद् या वै स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ २० ॥

अष्टावक्रने कहा— भद्रे! तुम स्वतन्त्र कैसे हो? इसमें जो कारण हो, वह बताओ! तीनों लोकोंमें कोई ऐसी स्त्री नहीं है जो स्वतन्त्र रहने योग्य हो ॥ २० ॥

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।

पुत्राश्च स्थाविरे काले नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता ॥ २१ ॥

कुमारावस्थामें पिता इसकी रक्षा करते हैं, जवानीमें वह पतिके संरक्षणमें रहती है और बुढ़ापेमें पुत्र उसकी देखभाल करते हैं। इस प्रकार स्त्रियोंके लिये स्वतन्त्रता नहीं है ॥ २१ ॥

स्त्र्युवाच

कौमारं ब्रह्मचर्यं मे कन्यैवास्मि न संशयः ।

पत्नीं कुरुष्व मां विप्र श्रद्धां विजहि मा मम ॥ २२ ॥

स्त्री बोली - विप्रवर! मैं कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचारिणी हूँ; अतः कन्या ही हूँ — इसमें

संशय नहीं है । अब आप मुझे पत्नी बनाइये । मेरी श्रद्धाका नाश न कीजिये ॥

अष्टावक्र उवाच

यथा मम तथा तुभ्यं यथा तुभ्यं तथा मम ।

जिज्ञासेयमृषेस्तस्य विघ्नः सत्यं न किं भवेत् ॥ २३ ॥

अष्टावक्रने कहा — जैसी मेरी दशा है, वैसी तुम्हारी है और जैसी तुम्हारी दशा है, वैसी मेरी है । यह वास्तवमें वदान्य ऋषिके द्वारा परीक्षा ली जा रही है या सचमुच यह कोई विघ्न तो नहीं है? ॥ २३ ॥

आश्चर्यं परमं हीदं किं नु श्रेयो हि मे भवेत् ।

दिव्याभरणवस्त्रा हि कन्येयं मामुपस्थिता ॥ २४ ॥

( वे मन-ही - मन सोचने लगे— ) यह पहले वृद्धा थी और अब दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्यारूप होकर मेरी सेवामें उपस्थित है । यह बड़े ही आश्चर्यकी बात है । क्या यह मेरे लिये कल्याणकारी होगा? ॥ २४ ॥

किं त्वस्याः परमं रूपं जीर्णमासीत् कथं पुनः ।

कन्यारूपमिहाद्यैवं किमिवात्रोत्तरं भवेत् ॥ २५ ॥

परंतु इसका यह परम सुन्दर रूप पहले जराजीर्ण कैसे हो गया था और अब यहाँ यह कन्यारूप कैसे प्रकट हो गया? ऐसी दशामें यहाँ उसके लिये क्या उत्तर हो सकता है? ॥ २५ ॥

यथा परं शक्तिधृतेर्न व्युत्थास्ये कथंचन ।

पृष्ठ 307

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न रोचते हि व्युत्थानं सत्येनासादयाम्यहम् ॥ २६ ॥

मुझमें कामको दमन करनेकी शक्ति है और पूर्वप्राप्त मुनि- कन्याको किसी तरह भी प्राप्त करनेका धैर्य बना हुआ है । इस शक्ति और धृतिके ही सहारे मैं किसी तरह विचलित नहीं होऊँगा । मुझे धर्मका उल्लंघन अच्छा नहीं लगता । मैं सत्यके सहारेसे ही पत्नीको प्राप्त करूँगा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवादविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

पृष्ठ 308

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एकविंशोऽध्यायः अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवाद, अष्टावक्रका अपने घर लौटकर वदान्य ऋषिकी कन्याके साथ विवाह करना युधिष्ठिर उवाच

न बिभेति कथं सा स्त्री शापाच्च परमद्युतेः ।

कथं निवृत्तो भगवांस्तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! वह स्त्री उन महातेजस्वी ऋषिके शापसे डरती कैसे नहीं थी; और वे भगवान् अष्टावक्र किस तरह वहाँसे लौटे थे? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अष्टावक्रोऽन्वपृच्छत् तां रूपं विकुरुषे कथम् ।

न चानृतं ते वक्तव्यं ब्रूहि ब्राह्मणकाम्यया ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! सुनो, अष्टावक्रने उस स्त्रीसे पूछा, ' तुम अपना रूप बदलती क्यों रहती हो? बताओ, यदि मुझ जैसे ब्राह्मणसे सम्मान पानेकी इच्छा हो तो झूठ न बोलना' ॥ २ ॥

स्त्र्युवाच

द्यावापृथिव्योर्यत्रैषा काम्या ब्राह्मणसत्तम ।

शृणुष्वावहितः सर्वं यदिदं सत्यविक्रम ॥ ३ ॥

स्त्री बोली- ब्राह्मणशिरोमणे! स्वर्गलोक हो या मर्त्यलोक, जिस किसी भी स्थानमें स्त्री और पुरुष निवास करते हैं, वहाँ उनमें परस्पर संयोगकी यह कामना सदा बनी रहती है । सत्यपराक्रमी विप्र! यह सब जो रूपपरिवर्तनकी लीला की गयी है, उसका कारण बताती हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ३ ॥

जिज्ञासेयं प्रयुक्ता मे स्थिरीकर्तुं तवानघ ।

अव्युत्थानेन ते लोका जिताः सत्यपराक्रम ॥ ४ ॥

निर्दोष ब्राह्मण! आपको दृढ़ करनेके लिये आपकी परीक्षा लेनेके उद्देश्यसे ही मैंने यह कार्य किया है। सत्यपराक्रमी द्विज! आपने अपने धर्मसे विचलित न होकर समस्त पुण्यलोकोंको जीत लिया है ॥ ४ ॥

उत्तरां मां दिशं विद्धि दृष्टं स्त्रीचापलं च ते ।

स्थविराणामपि स्त्रीणां बाधते मैथुनज्वरः ॥ ५ ॥

आप मुझे उत्तरदिशा समझें । स्त्रीमें कितनी चपलता होती है - यह आपने प्रत्यक्ष देखा है । बूढ़ी स्त्रियोंको भी मैथुनके लिये होनेवाला कामजनित संताप कष्ट देता रहता है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 309

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(अविश्वासान्न व्यसनी नातिसक्तोऽप्रवासकः । विद्वान् सुशीलः पुरुषः सदारः सुखमश्नुते ॥ ) जो कहीं भी विश्वास न करनेके कारण किसी व्यसनमें नहीं फँसता, कहीं भी अधिक आसक्त नहीं होता, परदेशमें नहीं रहता तथा जो विद्वान् और सुशील है, वही पुरुष स्त्रीके साथ रहकर सुख भोगता है ॥

तुष्टः पितामहस्तेऽद्य तथा देवाः सवासवाः ।

स त्वं येन च कार्येण सम्प्राप्तो भगवानिह ॥ ६ ॥

प्रेषितस्तेन विप्रेण कन्यापित्रा द्विजर्षभ ।

तवोपदेशं कर्तुं वै तच्च सर्वं कृतं मया ॥ ७ ॥

आज आपके ऊपर ब्रह्माजी तथा इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हैं । भगवन् द्विजश्रेष्ठ! आप यहाँ जिस कार्यसे आये हैं, वह सफल हो गया । उस कन्याके पिता वदान्य ऋषिने मेरे

पास आपको उपदेश देनेके लिये भेजा था । वह सब मैंने कर दिया ॥ ६-७ ॥

क्षेमैर्गमिष्यसि गृहं श्रमश्च न भविष्यति ।

कन्यां प्राप्स्यसि तां विप्र पुत्रिणी च भविष्यति ॥ ८ ॥

विप्रवर! अब आप कुशलपूर्वक अपने घरको जायँगे और मार्गमें आपको कोई श्रम अथवा कष्ट नहीं होगा । उस मनोनीत कन्याको आप प्राप्त कर लेंगे और आपके द्वारा वह पुत्रवती भी होगी ही ॥ ८ ॥

काम्यया पृष्टवांस्त्वं मां ततो व्याहृतमुत्तमम् ।

अनतिक्रमणीया सा कृत्स्नौर्लोकैस्त्रिभिः सदा ॥ ९ ॥

आपने जाननेकी इच्छासे मुझसे यह बात पूछी थी, इसलिये मैंने अच्छे ढंगसे सब कुछ बता दिया । तीनों लोकोंके सम्पूर्ण निवासियोंके लिये भी ब्राह्मणकी आज्ञा कदापि उल्लंघनीय नहीं होती ॥ ९ ॥

गच्छस्व सुकृतं कृत्वा किं चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि ।

यावद् ब्रवीमि विप्रर्षे अष्टावक्र यथातथम् ॥ १० ॥

ब्रह्मर्षि अष्टावक्र! आप पुण्यका उपार्जन करके जाइये । और क्या सुनना चाहते हैं? कहिये, मैं वह सब कुछ यथार्थरूपसे बताऊँगी ॥ १० ॥

ऋषिणा प्रसादिता चास्मि तव हेतोर्द्विजर्षभ ।

तस्य सम्माननार्थं मे त्वयि वाक्यं प्रभाषितम् ॥ ११ ॥

द्विजश्रेष्ठ! वदान्य मुनिने आपके लिये मुझे प्रसन्न किया था; अतः उनके सम्मानके लिये ही मैंने ये सारी बातें कही हैं ॥ ११ ॥

भीष्म उवाच श्रुत्वा तु वचनं तस्याः स विप्रः प्राञ्जलिः स्थितः ।

पृष्ठ 310

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अनुज्ञातस्तया चापि स्वगृहं पुनराव्रजत् ॥ १२ ॥

भीष्मजी कहते हैं - भारत! उस स्त्रीकी बात सुनकर विप्रवर अष्टावक्र उसके सामने

हाथ जोड़कर खड़े हो गये । फिर उसकी आज्ञा ले पुनः अपने घरको लौट आये ॥ १२ ॥

गृहमागत्य विश्रान्तः स्वजनं परिपृच्छ्य च ।

अभ्यगच्छच्च तं विप्रं न्यायतः कुरुनन्दन ॥ १३ ॥

कुरुनन्दन! घर आकर उन्होंने विश्राम किया और स्वजनोंसे पूछकर वे न्यायानुसार फिर ब्राह्मण वदान्यके घर गये ॥ १३ ॥

पृष्टश्च तेन विप्रेण दृष्टं त्वेतन्निदर्शनम् ।

प्राह विप्रं तदा विप्रः सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥ १४ ॥

ब्राह्मणने उनकी यात्राके विषयमें पूछा, तब उन्होंने प्रसन्नचित्तसे जो कुछ वहाँ देखा था, सब बताना आरम्भ किया- ॥ १४ ॥

भवता समनुज्ञातः प्रास्थितो गन्धमादनम् ।

तस्य चोत्तरतो देशे दृष्टं मे दैवतं महत् ॥ १५ ॥

तया चाहमनुज्ञातो भवांश्चापि प्रकीर्तितः ।

श्रावितश्चापि तद्वाक्यं गृहं चाभ्यागतः प्रभोः ॥ १६ ॥

' महर्षे! आपकी आज्ञा पाकर मैं उत्तर दिशामें गन्धमादनपर्वतकी ओर चल दिया । उससे भी उत्तर जानेपर मुझे एक महती देवीका दर्शन हुआ । उसने मेरी परीक्षा ली और आपका भी परिचय दिया । प्रभो! फिर उसने अपनी बात सुनायी और उसकी आज्ञा लेकर मैं अपने घर आ गया ' ॥

तमुवाच तदा विप्रः सुतां प्रतिगृहाण मे ।

नक्षत्रविधियोगेन पात्रं हि परमं भवान् ॥ १७ ॥

तब ब्राह्मण वदान्यने कहा- ' आप उत्तम नक्षत्रमें विधिपूर्वक मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण कीजिये; क्योंकि आप अत्यन्त सुयोग्य पात्र हैं ' ॥ १७ ॥

भीष्म उवाच

अष्टावक्रस्तथेत्युक्त्वा प्रतिगृह्य च तां प्रभो ।

कन्यां परमधर्मात्मा प्रीतिमांश्चाभवत् तदा ॥ १८ ॥

भीष्मजी कहते हैं- प्रभो! तदनन्तर ' तथास्तु' कहकर परम धर्मात्मा अष्टावक्रने उस

कन्याका पाणिग्रहण किया । इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १८ ॥

कन्यां तां प्रतिगृह्यैव भार्या परमशोभनाम् ।

उवास मुदितस्तत्र स्वाश्रमे विगतज्वरः ॥ १ ९ ॥

उस परम सुन्दरी कन्याका पत्नीरूपमें दान पाकर अष्टावक्र मुनिकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे अपने आश्रममें उसके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ १ ९ ॥