06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 331–340

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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राजन्! जो ब्राह्मण उन्नत होकर तत्काल ही अवनत और अवनत होकर उन्नत हो जाता है एवं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता है, वह थोड़ा दोषी हो तो भी उसे श्राद्धमें निमन्त्रण देना उचित है ॥ २८ ॥

अकल्कको ह्यतर्कश्च ब्राह्मणो भरतर्षभ ।

संसर्गे भैक्ष्यवृत्तिश्च स राजन् केतनक्षमः ॥ २ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! जो दम्भरहित, व्यर्थ तर्क - वितर्क न करनेवाला तथा सम्पर्क स्थापित करनेके योग्य घरसे भिक्षा लेकर जीवन निर्वाह करनेवाला है, वह ब्राह्मण निमन्त्रण पानेका अधिकारी है ॥ २ ९ ॥

अव्रती कितवः स्तेनः प्राणिविक्रयिको वणिक् ।

पश्चाच्च पीतवान् सोमं स राजन् केतनक्षमः ॥ ३० ॥

राजन्! जो व्रतहीन, धूर्त, चोर, प्राणियोंका क्रय- विक्रय करनेवाला तथा वणिक् - वृत्तिसे जीविका चलानेवाला होकर भी पीछे यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें सोमरसका पान कर चुका है, वह भी निमन्त्रण पानेका अधिकारी है ॥ ३० ॥

अर्जयित्वा धनं पूर्वं दारुणैरपि कर्मभिः ।

भवेत् सर्वातिथिः पश्चात् स राजन् केतनक्षमः ॥ ३१ ॥

नरेश्वर! जो पहले कठोर कर्मोंद्वारा भी धनका उपार्जन करके पीछे सब प्रकारसे अतिथियोंका सेवक हो जाता है, वह श्राद्धमें बुलाने योग्य है ॥ ३१ ॥

ब्रह्मविक्रयनिर्दिष्टं स्त्रिया यच्चार्जितं धनम् ।

अदेयं पितृविप्रेभ्यो यच्च क्लैब्यादुपार्जितम् ॥ ३२ ॥

जो धन वेद बेचकर लाया गया हो या स्त्रीकी कमाईसे प्राप्त हुआ हो अथवा लोगोंके सामने दीनता दिखाकर माँग लाया गया हो, वह श्राद्धमें ब्राह्मणोंको देने योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥

क्रियमाणेऽपवर्गे च यो द्विजो भरतर्षभ ।

न व्याहरति यद्युक्तं तस्याधर्मो गवानृतम् ॥ ३३ ॥

भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मण श्राद्धकी समाप्ति होनेपर ' अस्तु स्वधा' आदि तत्कालोचित वचनोंका प्रयोग नहीं करता है, उसे गायकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है ॥

श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा ।

सोमक्षयश्च मांसं च यदारण्यं युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥

युधिष्ठिर! जिस दिन भी सुपात्र ब्राह्मण, दही, घी, अमावास्या तिथि तथा जंगली कन्द, मूल और फलोंका गूदा प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल है ॥ ३४ ॥

( मुहूर्तानां त्रयं पूर्वमह्नः प्रातरिति स्मृतम् ।

जपध्यानादिभिस्तस्मिन् विप्रैः कार्यं शुभव्रतम् ॥

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दिनका प्रथम तीन मुहूर्त प्रातः काल कहलाता है । उसमें ब्राह्मणोंको जप और ध्यान आदिके द्वारा अपने लिये कल्याणकारी व्रत आदिका पालन करना चाहिये ॥

सङ्गवाख्यं त्रिभागं तु मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तकः ।

लौकिकं सङ्गवेऽर्थ्यं च स्नानादि ह्यथ मध्यमे ॥

उसके बादका तीन मुहूर्त सङ्गव कहलाता है तथा सङ्गवके बादका तीन मुहूर्त मध्याह्न कहलाता है । सङ्गव कालमें लौकिक कार्य देखना चाहिये और मध्याह्नकालमें स्नान-संध्यावन्दन आदि करना उचित है ॥ चतुर्थमपराद्धं तु त्रिमुहूर्तं तु पित्र्यकम् । सायाह्नस्त्रिमुहूर्तं च मध्यमं कविभिः स्मृतम् ॥ ) मध्याह्नके बादका तीन मुहूर्त अपराह्न कहलाता है । यह दिनका चौथा भाग पितृकार्यके लिये उपयोगी है । उसके बादका तीन मुहूर्त सायाह्न कहा गया है । इसे विद्वानोंने दिन और रातके बीचका समय माना है ॥

श्राद्धापवर्गे विप्रस्य स्वधा वै मुदिता भवेत् ।

क्षत्रियस्यापि यो ब्रूयात् प्रीयन्तां पितरस्त्विति ॥ ३५ ॥

ब्राह्मणके यहाँ श्राद्ध समाप्त होनेपर ' स्वधा सम्पद्यताम्' इस वाक्यका उच्चारण करनेपर पितरोंको प्रसन्नता होती है । क्षत्रियके यहाँ श्राद्धकी समाप्तिमें ‘ पितरः प्रीयन्ताम् ’ ( पितर तृप्त हो जायँ) इस वाक्यका उच्चारण करना चाहिये ॥ ३५ ॥

अपवर्गे तु वैश्यस्य श्राद्धकर्मणि भारत ।

अक्षय्यमभिधातव्यं स्वस्ति शूद्रस्य भारत ॥ ३६ ॥

भारत! वैश्यके घर श्राद्धकर्मकी समाप्तिपर ' अक्षय्यमस्तु' ( श्राद्धका दान अक्षय हो ) कहना चाहिये और शूद्रके श्राद्धकी समाप्तिके अवसरपर ' स्वस्ति ' ( कल्याण हो ) इस वाक्यका उच्चारण करना उचित है ॥ ३६ ॥

पुण्याहवाचनं दैवं ब्राह्मणस्य विधीयते ।

एतदेव निरोङ्कारं क्षत्रियस्य विधीयते ॥ ३७ ॥

इसी तरह जब ब्राह्मणके यहाँ देवकार्य होता हो, तब उसमें ॐकारसहित पुण्याहवाचनका विधान है ( अर्थात् ' पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु -आपलोग पुण्याहवाचन करें’ ऐसा यजमानके कहनेपर ब्राह्मणोंको ‘ॐ पुण्याहम्ॐ पुण्याहम्' इस प्रकार कहना चाहिये ) । यही वाक्य क्षत्रियके यहाँ बिना ॐकारके उच्चारण करना चाहिये ॥

वैश्यस्य दैवे वक्तव्यं प्रीयन्तां देवता इति ।

कर्मणामानुपूर्व्येण विधिपूर्वं कृतं शृणु ॥ ३८ ॥

वैश्यके घर देवकर्ममें 'प्रीयन्तां देवता: ' इस वाक्यका उच्चारण करना चाहिये । अब क्रमशः तीनों वर्णोंके कर्मानुष्ठानकी विधि सुनो ॥ ३८ ॥

जातकर्मादिकाः सर्वास्त्रिषु वर्णेषु भारत ।

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ब्रह्मक्षत्रे हि मन्त्रोक्ता वैश्यस्य च युधिष्ठिर ॥ ३ ९ ॥ भरतवंशी युधिष्ठिर! तीनों वर्णोंमें जातकर्म आदि समस्त संस्कारोंका विधान है । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनोंके सभी संस्कार वेद मन्त्रोंके उच्चारण- पूर्वक होने चाहिये ॥ ३ ९ ॥

विप्रस्य रशना मौञ्जी मौर्वी राजन्यगामिनी ।

बाल्वजी ह्येव वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ॥ ४० ॥

युधिष्ठिर! उपनयनके समय ब्राह्मणको मूँजकी, क्षत्रियको प्रत्यञ्जाकी और वैश्यको

शणकी मेखला धारण करनी चाहिये । यही धर्म है ॥ ४० ॥

(पालाशो द्विजदण्डः स्यादश्वत्थः क्षत्रियस्य तु । औदुम्बरश्च वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ॥ ) ब्राह्मणका दण्ड पलाशका, क्षत्रियके लिये पीपलका और वैश्यके लिये गूलरका होना चाहिये । युधिष्ठिर! ऐसा ही धर्म है ॥ दातुः प्रतिग्रहीतुश्च धर्माधर्माविमौ शृणु ।

ब्राह्मणस्यानृतेऽधर्मः प्रोक्तः पातकसंज्ञितः ।

चतुर्गुणः क्षत्रियस्य वैश्यस्याष्टगुणः स्मृतः ॥ ४१ ॥

अब दान देने और दान लेनेवालेके धर्माधर्मका वर्णन सुनो । ब्राह्मणको झूठ बोलनेसे जो अधर्म या पातक बताया गया है उससे चौगुना क्षत्रियको और आठगुना वैश्यको लगता है ॥ ४१ ॥

नान्यत्र ब्राह्मणोऽश्नीयात् पूर्वं विप्रेण केतितः ।

यवीयान् पशुहिंसायां तुल्यधर्मो भवेत् स हि ॥ ४२ ॥

यदि किसी ब्राह्मणने पहलेसे ही श्राद्धका निमन्त्रण दे रखा हो तो निमन्त्रित ब्राह्मणको दूसरी जगह जाकर भोजन नहीं करना चाहिये । यदि वह करता है तो छोटा समझा जाता है और उसे पशुहिंसाके समान पाप लगता है ॥ ४२ ॥

तथा राजन्यवैश्याभ्यां यद्यश्नीयात्तु केतितः ।

यवीयान् पशुहिंसायां भागार्धं समवाप्नुयात् ॥ ४३ ॥

यदि उसे क्षत्रिय या वैश्यने पहलेसे निमन्त्रण दे रखा हो और वह कहीं अन्यत्र जाकर भोजन कर ले तो छोटा समझे जानेके साथ ही वह पशुहिंसाके आधे पापका भागी होता है ॥ ४३ ॥

दैवं वाप्यथवा पित्र्यं योऽश्नीयाद् ब्राह्मणादिषु ।

अस्नातो ब्राह्मणो राजंस्तस्याधर्मो गवानृतम् ॥ ४४ ॥

नरेश्वर! जो ब्राह्मण ब्राह्मणादि तीनों वर्णोंके यहाँ देवयज्ञ अथवा श्राद्धमें स्नान किये बिना ही भोजन करता है, उसे गौकी झूठी शपथ खानेके समान पाप लगता है ॥ ४४ ॥

आशौचो ब्राह्मणो राजन् योऽश्नीयाद् ब्राह्मणादिषु ।

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ज्ञानपूर्वमथो लोभात् तस्याधर्मो गवानृतम् ॥ ४५ ॥

राजन्! जो ब्राह्मण अपने घरमें अशौच रहते हुए भी लोभवश जान-बूझकर दूसरे ब्राह्मण आदिके यहाँ श्राद्धका अन्न ग्रहण करता है उसे भी गौकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है ॥ ४५ ॥

अर्थेनान्येन यो लिप्सेत् कर्मार्थं चैव भारत ।

आमन्त्रयति राजेन्द्र तस्याधर्मोऽनृतं स्मृतम् ॥ ४६ ॥

भरतनन्दन! राजेन्द्र! जो तीर्थयात्रा आदि दूसरा प्रयोजन बताकर उसीके बहाने अपनी जीविकाके लिये धन माँगता है अथवा ' मुझे अमुक ( यज्ञादि ) कर्म करनेके लिये धन दीजिये' ऐसा कहकर जो दाताको अपनी ओर अभिमुख करता है उसके लिये भी वही झूठी शपथ खानेका पाप बताया गया है ॥ ४६ ॥

अवेदव्रतचारित्रास्त्रिभिर्वर्णैर्युधिष्ठिर ।

मन्त्रवत्परिविष्यन्ते त्स्याधर्मो गवानृतम् ॥ ४७ ॥

युधिष्ठिर! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वेदव्रतका पालन न करनेवाले ब्राह्मणोंको श्राद्धमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक अन्न परोसते हैं, उन्हें भी गायकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है ॥ ४७ ॥

युधिष्ठिरउवाच

पित्र्यं वाप्यथवा दैवं दीयते यत् पितामह ।

एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं दत्तं केषु महाफलम् ॥ ४८ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! देवयज्ञ अथवा श्राद्ध कर्ममें जो दान दिया जाता है, वह कैसे पुरुषोंको देनेसे महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है? मैं इस बातको जानना चाहता हूँ ॥ ४८ ॥

भीष्म उवाच

येषां दाराः प्रतीक्षन्ते सुवृष्टिमिव कर्षकाः ।

उच्छेषपरिशेषं हि तान् भोजय युधिष्ठिर ॥ ४ ९ ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! जैसे किसान वर्षाकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार जिनके घरोंकी स्त्रियाँ अपने स्वामीके खा लेनेपर बचे हुए अन्नकी प्रतीक्षा करती रहती हैं ( अर्थात् जिनके घरमें बनी हुई रसोईके सिवा और कोई अन्नका संग्रह न हो ), उन निर्धन ब्राह्मणोंको तुम अवश्य भोजन कराओ ॥ ४ ९ ॥

चारित्रनिरता राजन् ये कृशाः कृशवृत्तयः ।

अर्थिनश्चोपगच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ॥ ५० ॥

राजन्! जो सदाचारपरायण हों, जिनकी जीविकाका साधन नष्ट हो गया हो और इसीलिये भोजन न मिलनेके कारण जो अत्यन्त दुर्बल हो गये हों, ऐसे लोग यदि याचक

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होकर दाताके पास आते हैं तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥ ५० ॥

तद्भक्तास्तद्गृहा राजंस्तद्बलास्तदपाश्रयाः ।

अर्थिनश्च भवन्त्यर्थे तेषु दत्तं महाफलम् ॥ ५१ ॥

नरेश्वर! जो सदाचारके ही भक्त हैं, जिनके घरमें सदाचारका ही पालन होता है, जिन्हें सदाचारका ही बल है तथा जिन्होंने सदाचारका ही आश्रय ले रखा है, वे यदि आवश्यकता पड़नेपर याचना करते हैं तो उनको दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥ ५१ ॥

तस्करेभ्यः परेभ्यो वा ये भयार्ता युधिष्ठिर ।

अर्थिनो भोक्तुमिच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ॥ ५२ ॥

युधिष्ठिर! चोरों और शत्रुओंके भयसे पीड़ित होकर आये हुए जो याचक केवल भोजन चाहते हैं उन्हें दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥ ५२ ॥

अकल्ककस्य विप्रस्य रौक्ष्यात् करकृतात्मनः ।

वटवो यस्य भिक्षन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५३ ॥

जिसके मनमें किसी तरहका कपट नहीं है, अत्यन्त दरिद्रताके कारण जिसके हाथमें अन्न आते ही उसके भूखे बच्चे ' मुझे दो,' ' मुझे दो' ऐसा कहकर माँगने लगते हैं; ऐसे निर्धन ब्राह्मण और उसके उन बच्चोंको दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ॥ ५३ ॥

हृतस्वा हृतदाराश्च ये विप्रा देशसम्प्लवे ।

अर्थार्थमभिगच्छन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५४ ॥

देशमें विप्लव होनेके समय जिनके धन और स्त्रियाँ छिन गयी हों; वे ब्राह्मण यदि धनकी याचनाके लिये आयें तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ॥ ५४ ॥

व्रतिनो नियमस्थाश्च ये विप्राः श्रुतसम्मताः ।

तत्समाप्त्यर्थमिच्छन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५५ ॥

जो व्रत और नियममें लगे हुए ब्राह्मण वेद - शास्त्रोंकी सम्मतिके अनुसार चलते हैं और अपने व्रतकी समाप्तिके लिये धन चाहते हैं, उन्हें देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ ५५ ॥

अत्युक्रान्ताश्च धर्मेषु पाषण्डसमयेषु च ।

कृशप्राणाः कृशधनास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५६ ॥

जो पाखण्डियोंके धर्मसे दूर रहते हैं, जिनके पास धनका अभाव है तथा जो अन्न न मिलनेके कारण दुर्बल हो गये हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ॥ ५६ ॥

( व्रतानां पारणार्थाय गुर्वर्थे यज्ञदक्षिणाम् ।

निवेशार्थं च विद्वांसस्तेषां दत्तं महाफलम् ॥

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जो विद्वान् पुरुष व्रतोंका पारण, गुरुदक्षिणा, यज्ञदक्षिणा तथा विवाहके लिये धन चाहते हों, उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ॥

पित्रोश्च रक्षणार्थाय पुत्रदारार्थमेव वा ।

महाव्याधिविमोक्षाय तेषु दत्तं महाफलम् ॥

जो माता- पिताकी रक्षाके लिये, स्त्री- पुत्रोंके पालन तथा महान् रोगोंसे छुटकारा पानेके लिये धन चाहते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ॥ बालाः स्त्रियश्च वाञ्छन्ति सुभक्तं चाप्यसाधनाः । स्वर्गमायान्ति दत्त्वैषां निरयान् नोपयान्ति ते ॥ ) जो बालक और स्त्रियाँ सब प्रकारके साधनोंसे रहित होनेके कारण केवल भोजन

चाहती हैं, उन्हें भोजन देकर दाता स्वर्गमें जाते हैं । वे नरकमें नहीं पड़ते हैं ॥

कृतसर्वस्वहरणा निर्दोषाः प्रभविष्णुभिः ।

स्पृहयन्ति च भुक्त्वान्नं तेषु दत्तं महाफलम् ॥ ५७ ॥

प्रभावशाली डाकुओंने जिन निर्दोष मनुष्योंका सर्वस्व छीन लिया हो, अतः जो खानेके लिये अन्न चाहते हों, उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ॥ ५७ ॥

तपस्विनस्तपोनिष्ठास्तेषां भैक्षचराश्च ये ।

अर्थिनः किञ्चिदिच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ॥ ५८ ॥

जो तपस्वी और तपोनिष्ठ हैं तथा तपस्वी जनोंके लिये ही भीख माँगते हैं, ऐसे याचक यदि कुछ चाहते हैं तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ॥ ५८ ॥

महाफलविधिर्दाने श्रुतस्ते भरतर्षभ ।

निरयं येन गच्छन्ति स्वर्गं चैव हि तत् शृणु ॥ ५ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! किनको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, यह विषय मैंने तुम्हें सुना दिया । अब जिन कर्मोंसे मनुष्य नरक या स्वर्गमें जाते हैं, उन्हें सुनो ॥ ५ ९ ॥

गुर्वर्थमभयार्थं वा वर्जयित्वा युधिष्ठिर ।

येऽनृतं कथयन्ति स्म ते वै निरयगामिनः ॥ ६० ॥

युधिष्ठिर! गुरुकी भलाईके लिये तथा दूसरेको भयसे मुक्त करनेके लिये जो झूठ बोलनेका अवसर आता है, उसे छोड़कर अन्यत्र जो झूठ बोलते हैं वे मनुष्य निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ ६० ॥

परदाराभिहर्तारः परदाराभिमर्शिनः ।

परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिनः ॥ ६१ ॥

जो दूसरोंकी स्त्री चुरानेवाले, परायी स्त्रीका सतीत्व नष्ट करनेवाले तथा दूत बनकर परस्त्रीको दूसरोंसे मिलानेवाले हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ ६१ ॥

ये परस्वापहर्तारः परस्वानां च नाशकाः ।

सूचकाश्च परेषां ये ते वै निरयगामिनः ॥ ६२ ॥

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जो दूसरोंके धनको हड़पनेवाले और नष्ट करनेवाले हैं तथा दूसरोंकी चुगली खानेवाले हैं, उन्हें निश्चय ही नरकमें गिरना पड़ता है ॥ ६२ ॥

प्रपाणां च सभानां च संक्रमाणां च भारत ।

अगाराणां च भेत्तारो नरा निरयगामिनः ॥ ६३ ॥

भरतनन्दन! जो पौंसलों, सभाओं, पुलों और किसीके घरोंको नष्ट करनेवाले हैं, वे मनुष्य निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं ॥ ६३ ॥

अनाथां प्रमदां बालां वृद्धां भीतां तपस्विनीम् ।

वञ्चयन्ति नरा ये च ते वै निरयगामिनः ॥ ६४ ॥

जो लोग अनाथ, बूढ़ी, तरुणी, बालिका, भयभीत और तपस्विनी स्त्रियोंको धोखेमें डालते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ ६४ ॥

वृत्तिच्छेदं गृहच्छेदं दारच्छेदं च भारत ।

मित्रच्छेदं तथाऽऽशायास्ते वै निरयगामिनः ॥ ६५ ॥

भरतनन्दन! जो दूसरोंकी जीविका नष्ट करते, घर उजाड़ते, पति-पत्नीमें विछोह डालते, मित्रोंमें विरोध पैदा करते और किसीकी आशा भङ्ग करते हैं, वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं ॥ ६५ ॥

सूचकाः सेतुभेत्तारः परवृत्त्युपजीवकाः ।

अकृतज्ञाश्च मित्राणां ते वै निरयगामिनः ॥ ६६ ॥

जो चुगली खानेवाले, कुल या धर्मकी मर्यादा नष्ट करनेवाले, दूसरोंकी जीविकापर गुजारा करनेवाले तथा मित्रोंद्वारा किये गये उपकारको भुला देनेवाले हैं, वे निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं ॥ ६६ ॥

पाषण्डा दूषकाश्चैव समयानां च दूषकाः ।

ये प्रत्यवसिताश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ६७ ॥

जो पाखण्डी, निन्दक, धार्मिक नियमोंके विरोधी तथा एक बार संन्यास लेकर फिर गृहस्थ - आश्रममें लौट आनेवाले हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ ६७ ॥

विषमव्यवहाराश्च विषमाश्चैव वृद्धिषु ।

लाभेषु विषमाश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ६८ ॥

जिनका व्यवहार सबके प्रति समान नहीं है तथा जो लाभ और वृद्धिमें विषम दृष्टि रखते हैं— ईमानदारीसे उसका वितरण नहीं करते हैं, वे अवश्य ही नरकगामी होते हैं ॥ ६८ ॥

दूतसंव्यवहाराश्च निष्परीक्षाश्च मानवाः ।

प्राणिहिंसाप्रवृत्ताश्च ते वै निरयगामिनः ॥ ६ ९ ॥

जो किसी मनुष्यकी परख करनेमें समर्थ नहीं हैं और दूतका काम करते हैं, जिनकी सदा जीवहिंसामें प्रवृत्ति होती है, वे निश्चय ही नरकमें गिरते हैं ॥ ६ ९ ॥

पृष्ठ 338

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कृताशं कृतनिर्देशं कृतभक्तं कृतश्रमम् ।

भेदैर्ये व्यपकर्षन्ति ते वै निरयगामिनः ॥ ७० ॥

जो वेतनपर रखे हुए परिश्रमी नौकरको कुछ देनेकी आशा देकर और देनेका समय नियत करके उसके पहले ही भेदनीतिके द्वारा उसे मालिकके यहाँसे निकलवा देते हैं, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं ॥ ७० ॥

पर्यश्नन्ति च ये दारानग्निभृत्यातिथींस्तथा ।

उत्सन्नपितृदेवेज्यास्ते वै निरयगामिनः ॥ ७१ ॥

जो पितरों और देवताओंके यजन- पूजनका त्याग करके अग्निमें आहुति दिये बिना तथा अतिथि, पोष्यवर्ग और स्त्री- बच्चोंको अन्न दिये बिना ही भोजन कर लेते हैं, वे निःसंदेह नरकगामी होते हैं ॥ ७१ ॥

वेदविक्रयिणश्चैव वेदानां चैव दूषकाः ।

वेदानां लेखकाश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ७२ ॥

जो वेद बेचते हैं, वेदोंकी निन्दा करते हैं और विक्रयके लिये ही वेदोंके मन्त्र लिखते हैं, वे भी निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ ७२ ॥

चातुराश्रम्यबाह्याश्च श्रुतिबाह्याश्च ये नराः ।

विकर्मभिश्च जीवन्ति ते वै निरयगामिनः ॥ ७३ ॥

जो मनुष्य चारों आश्रमों और वेदोंकी मर्यादासे बाहर हैं तथा शास्त्रविरुद्ध कर्मोंसे ही जीविका चलाते हैं, उन्हें निश्चय ही नरकमें गिरना पड़ता है ॥ ७३ ॥

केशविक्रयिका राजन् विषविक्रयिकाश्च ये ।

क्षीरविक्रयिकाश्चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ७४ ॥

राजन्! जो ( ब्राह्मण ) केश, विष और दूध बेचते हैं, वे भी नरकमें ही जाते हैं ॥ ७४ ॥

ब्राह्मणानां गवां चैव कन्यानां च युधिष्ठिर ।

येऽन्तरं यान्ति कार्येषु ते वै निरयगामिनः ॥ ७५ ॥

युधिष्ठिर! जो बाह्मण, गौ तथा कन्याओंके लिये हितकर कार्यमें विघ्न डालते हैं, वे भी अवश्य ही नरकगामी होते हैं ॥ ७५ ॥

शस्त्रविक्रयिकाश्चैव कर्तारश्च युधिष्ठिर ।

शल्यानां धनुषां चैव ते वै निरयगामिनः ॥ ७६ ॥

राजा युधिष्ठिर! जो ( ब्राह्मण ) हथियार बेचते और धनुष- बाण आदि शस्त्रोंको बनाते हैं, वे नरकगामी होते हैं ॥ ७६ ॥

शिलाभिः शङ्कुभिर्वापि श्वभ्रैर्वा भरतर्षभ ।

ये मार्गमनुरुन्धन्ति ते वै निरयगामिनः ॥ ७७ ॥

भरतश्रेष्ठ! जो पत्थर रखकर, काँटे बिछाकर और गड्ढे खोदकर रास्ता रोकते हैं, वे भी नरकमें ही गिरते हैं ॥ ७७ ॥

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उपाध्यायांश्च भृत्यांश्च भक्ताश्चं भरतर्षभ ।

ये त्यजन्त्यविकारांस्त्रींस्ते वै निरयगामिनः ॥ ७८ ॥

भरतभूषण! जो अध्यापकों, सेवकों तथा अपने भक्तोंको बिना किसी अपराधके ही त्याग देते हैं, उन्हें भी नरकमें ही गिरना पड़ता है ॥ ७८ ॥

अप्राप्तदमकाश्चैव नासानां वेधकाश्च ये ।

बन्धकाश्च पशूनां ये ते वै निरयगामिनः ॥ ७९ ॥

जो काबूमें न आनेवाले पशुओंका दमन करते, नाथते अथवा कटघरेमें बंद करते हैं, वे नरकगामी होते हैं ॥ ७९ ॥

अगोप्तारश्च राजानो बलिषड्भागतस्कराः ।

समर्थाश्चाप्यदातारस्ते वै निरयगामिनः ॥ ८० ॥

जो राजा होकर भी प्रजाकी रक्षा नहीं करते और उसकी आमदनीके छठे भागको लगानके रूपमें लूटते रहते हैं तथा जो समर्थ होनेपर भी दान नहीं करते, उन्हें भी निःसंदेह नरकमें जाना पड़ता है ॥ ८० ॥

( संश्रुत्य चाप्रदातारो दरिद्राणां विनिन्दकाः ।

श्रोत्रियाणां विनीतानां दरिद्राणां विशेषतः ॥

क्षमिणां निन्दकाश्चैव ते वै निरयगामिनः । ) जो देनेकी प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, दरिद्रोंकी एवं विनयशील निर्धन श्रोत्रियोंकी और क्षमाशीलोंकी निन्दा करते हैं, वे भी अवश्य ही नरकमें जाते हैं ॥

क्षान्तान् दान्तांस्तथा प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् ।

त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥ ८१ ॥

जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय तथा दीर्घकालतक साथ रहे हुए विद्वानोंको अपना काम निकल जानेके बाद त्याग देते हैं, वे नरकमें गिरते हैं ॥ ८१ ॥

बालानामथ वृद्धानां दासानां चैव ये नराः ।

अदत्त्वा भक्षयन्त्यग्रे ते वै निरयगामिनः ॥ ८२ ॥

जो बालकों, बूढ़ों और सेवकोंको दिये बिना ही पहले स्वयं भोजन कर लेते हैं, वे भी निःसंदेह नरकगामी होते हैं ॥ ८२ ॥

एते पूर्वं विनिर्दिष्टाः प्रोक्ता निरयगामिनः ।

भागिनः स्वर्गलोकस्य वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ ८३ ॥

भरतश्रेष्ठ! पहलेके संकेतके अनुसार यहाँ नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया गया है ।

अब स्वर्गलोकमें जानेवालोंका परिचय देता हूँ, सुनो ॥ ८३ ॥

सर्वेष्वेव तु कार्येषु दैवपूर्वेषु भारत ।

हन्ति पुत्रान् पशून् कृत्स्नान् ब्राह्मणातिक्रमः कृतः ॥ ८४ ॥

पृष्ठ 340

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भरतनन्दन! जिनमें पहले देवताओंकी पूजा की जाती है, उन समस्त कार्योंमें यदि ब्राह्मणका अपमान किया जाय तो वह अपमान करनेवालेके समस्त पुत्रों और पशुओंका नाश कर देता है ॥ ८४ ॥

दानेन तपसा चैव सत्येन च युधिष्ठिर ।

ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८५ ॥

जो दान, तपस्या और सत्यके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ॥ ८५ ॥

शुश्रूषाभिस्तपोभिश्च विद्यामादाय भारत ।

ये प्रतिग्रहनिःस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८६ ॥

भारत! जो गुरुशुश्रूषा और तपस्यापूर्वक वेदाध्ययन करके प्रतिग्रहमें आसक्त नहीं होते, वे लोग स्वर्गगामी होते हैं ॥ ८६ ॥

भयात्पापात्तथा बाधाद् दारिद्रयाद् व्याधिधर्षणात् ।

यत्कृते प्रतिमुच्यन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८७ ॥

जिनके प्रयत्नसे मनुष्य भय, पाप, बाधा, दरिद्रता तथा व्याधिजनित पीड़ासे छुटकारा पा जाते हैं, वे लोग स्वर्गमें जाते हैं ॥ ८७ ॥

क्षमावन्तश्च धीराश्च धर्मकार्येषु चोत्थिताः ।

मङ्गलाचारसम्पन्नाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥ ८८ ॥

जो क्षमावान्, धीर, धर्मकार्यके लिये उद्यत रहनेवाले और मांगलिक आचारसे सम्पन्न हैं, वे पुरुष भी स्वर्गगामी होते हैं ॥ ८८ ॥

निवृत्ता मधुमांसेभ्यः परदारेभ्य एव च ।

निवृत्ताश्चैव मद्येभ्यस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ८९ ॥

जो मद, मांस, मदिरा और परस्त्रीसे दूर रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ८९ ॥

आश्रमाणां च कर्तारः कुलानां चैव भारत ।

देशानां नगराणां च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९० ॥

भारत! जो आश्रम, कुल, देश और नगरके निर्माता तथा संरक्षक हैं, वे पुरुषस्वर्गमें जाते हैं ॥ ९ ० ॥

वस्त्राभरणदातारो भक्तपानान्नदास्तथा ।

कुटुम्बानां च दातारः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥ ९ १ ॥

जो वस्त्र, आभूषण, भोजन, पानी तथा अन्न दान करते हैं एवं दूसरोंके कुटुम्बकी वृद्धिमें सहायक होते हैं, वे पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ९ १ ॥

सर्वहिंसानिवृत्ताश्च नराः सर्वसहाश्च ये ।

सर्वल्याश्रयभूताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९ २ ॥