श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 341–350

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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जो सब प्रकारकी हिंसाओंसे अलग रहते हैं, सब कुछ सहते हैं और सबको आश्रय देते रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ९ २

मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति जितेन्द्रियाः ।

भ्रातॄणां चैव सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९ ३ ॥

जो जितेन्द्रिय होकर माता - पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंपर स्नेह रखते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ९ ३ ॥

आढ्याश्च बलवन्तश्च यौवनस्थाश्च भारत ।

ये वै जितेन्द्रिया धीरास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९ ४ ॥

भारत! जो धनी, बलवान् और नौजवान होकर भी अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं, वे धीर पुरुष स्वर्गगामी होते हैं ॥ ९ ४ ॥

अपराधिषु सस्नेहा मृदवो मृदुवत्सलाः ।

आराधनसुखाश्चापि पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥ ९ ५ ॥

जो अपराधियोंके प्रति भी दया रखते हैं, जिनका स्वभाव मृदुल होता है, जो मृदुल स्वभाववाले व्यक्तियोंपर प्रेम रखते हैं तथा जिन्हें दूसरोंकी आराधना ( सेवा ) करनेमें ही सुख मिलता है, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ९ ५ ॥

सहस्रपरिवेष्टारस्तथैव च सहस्रदाः ।

त्रातारश्च सहस्राणां ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९ ६ ॥

जो मनुष्य सहस्रों मनुष्योंको भोजन परोसते, सहस्रोंको दान देते तथा सहस्रोंकी रक्षा करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं ॥ ९ ६ ॥

सुवर्णस्य च दातारो गवां च भरतर्षभ ।

यानानां वाहनानां च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९ ७ ॥

भरतश्रेष्ठ! जो सुवर्ण, गौ, पालकी और सवारीका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ९ ७ ॥

वैवाहिकानां द्रव्याणां प्रेष्याणां च युधिष्ठिर ।

दातारो वाससां चैव ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९ ८ ॥

युधिष्ठिर! जो वैवाहिक द्रव्य, दास-दासी तथा वस्त्र दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ॥ ९ ८ ॥

विहारावसथोद्यानकूपारामसभाप्रपाः ।

वप्राणां चैव कर्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ९९ ॥

जो दूसरोंके लिये आश्रम, गृह, उद्यान, कुआँ, बागीचा, धर्मशाला, पौंसला तथा चहारदीवारी बनवाते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ९९ ॥

निवेशनानां क्षेत्राणां वसतीनां च भारत ।

दातारः प्रार्थितानां च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ १०० ॥

पृष्ठ 342

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भरतनन्दन! जो याचकोंकी याचनाके अनुसार घर, खेत और गाँव प्रदान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ १०० ॥

रसानां चाथ बीजानां धान्यानां च युधिष्ठिर ।

स्वयमुत्पाद्य दातारः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥ १०१ ॥

युधिष्ठिर! जो स्वयं ही पैदा करके रस, बीज और अन्नका दान करते हैं, वे पुरुष स्वर्गगामी होते हैं ॥ १०१ ॥

यस्मिंस्तस्मिन् कुले जाता बहुपुत्राः शतायुषः ।

सानुक्रोशा जितक्रोधाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥ १०२ ॥

जो किसी भी कुलमें उत्पन्न हो बहुत-से पुत्रों और सौ वर्षकी आयुसे युक्त होते हैं, दूसरोंपर दया करते हैं और क्रोधको काबूमें रखते हैं, वे पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ १०२ ॥

एतदुक्तममुत्रार्थं दैवं पित्र्यं च भारत ।

दानधर्मं च दानस्य यत् पूर्वमृषिभिः कृतम् ॥ १०३ ॥

भारत! यह मैंने तुमसे परलोकमें कल्याण करनेवाले देवकार्य और पितृकार्यका वर्णन किया तथा प्राचीनकालमें ऋषियोंद्वारा बतलाये हुए दानधर्म और दानकी महिमाका भी निरूपण किया है ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्वर्गनरकगामिवर्णने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्वर्गऔर नरकमें जानेवालोंका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८३ श्लोक मिलाकर कुल १११३ श्लोक हैं ) *• जब कोई अपनी कन्याको इस शर्तपर ब्याहता है कि ' इससे जो पहला पुत्र होगा, उसे मैं गोद ले लूँगा और अपना पुत्र मानूँगा ' तो उसे ‘ पुत्रिकाधर्मके अनुसार विवाह' कहते हैं । इस नियमसे प्राप्त होनेवाला पुत्र श्राद्धका अधिकारी नहीं है ।

पृष्ठ 343

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चतुर्विंशोऽध्यायः ब्रह्महत्याके समान पापोंका निरूपण युधिष्ठिर उवाच

इदं मे तत्त्वतो राजन् वक्तुमर्हसि भारत ।

अहिंसयित्वापि कथं ब्रह्महत्या विधीयते ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भरतवंशी नरेश! अब आप मुझे यह ठीक- ठीक बतानेकी कृपा करें कि ब्राह्मणकी हिंसा न करनेपर भी मनुष्यको ब्रह्महत्याका पाप कैसे लगता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

व्यासमामन्त्र्य राजेन्द्र पुरा यत् पृष्टवानहम् ।

तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा — राजेन्द्र! पूर्वकालमें मैंने एक बार व्यासजीको बुलाकर उनसे जो प्रश्न किया था ( तथा उन्होंने मुझे उसका जो उत्तर दिया था), वह सब तुम्हें बता रहा हूँ । तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥

चतुर्थस्त्वं वसिष्ठस्य तत्त्वमाख्याहि मे मुने ।

अहिंसयित्वा केनेह ब्रह्महत्या विधीयते ॥ ३ ॥

मैंने पूछा था — ' मुने! आप वसिष्ठजीके वंशजोंमें चौथी पीढ़ीके पुरुष हैं । कृपया मुझे यह ठीक- ठीक बताइये कि ब्राह्मणकी हिंसा न करनेपर भी किन कर्मोंके करनेसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है? ' ॥ ३ ॥

इति पृष्टो मया राजन् पराशरशरीरजः ।

अब्रवीन्निपुणो धर्मे निःसंशयमनुत्तमम् ॥ ४ ॥

राजन्! मेरे द्वारा इस प्रकार पूछनेपर पराशर- पुत्र धर्मनिपुण व्यासजीने यह संदेहरहित परम उत्तम बात कही - ॥ ४ ॥

ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थे कृशवृत्तिनम् ।

ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात्तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ५ ॥

‘ भीष्म! जिसकी जीविकावृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे ब्राह्मणको भिक्षा देनेके लिये स्वयं बुलाकर जो पीछे देनेसे इनकार कर देता है, उसे ब्रह्महत्यारा समझो ॥ ५ ॥

मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत ।

वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ६ ॥

‘ भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य तटस्थ रहनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा ही समझना चाहिये ॥ ६ ॥

पृष्ठ 344

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गोकुलस्य तृषार्तस्य जलार्थे वसुधाधिप ।

उत्पादयति यो विघ्नं तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ७ ॥

‘ पृथ्वीनाथ! जो प्याससे पीड़ित हुई गौओंके पानी पीनेमें विघ्न डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती जाने ॥ ७ ॥

यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक् शास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् ।

दूषयत्यनभिज्ञाय तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ८ ॥

'जो मनुष्य उत्तम कर्मका विधान करनेवाली श्रुतियों और ऋषिप्रणीत शास्त्रोंपर बिना समझे - बूझे दोषारोपण करता है, उसको भी ब्रह्मघाती ही समझो ॥ ८ ॥

आत्मजां रूपसम्पन्नां महतीं सदृशे वरे ।

न प्रयच्छति यः कन्यां तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ९ ॥

जो अपनी रूपवती कन्याकी बड़ी उम्र हो जानेपर भी उसका योग्य वरके साथ विवाह नहीं करता, उसे ब्रह्महत्यारा जाने ॥ ९ ॥

अधर्मनिरतो मूढो मिथ्या यो वै द्विजातिषु ।

दद्यान्मर्मातिगं शोकं तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ १० ॥

' जो पापपरायण मूढ़ मनुष्य ब्राह्मणोंको अकारण ही मर्मभेदी शोक प्रदान करता है, उसे ब्रह्मघाती जाने ॥

चक्षुषा विप्रहीणस्य पंगुलस्य जडस्य वा ।

हरेत यो वै सर्वस्वं तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ ११ ॥

' जो अन्धे, लूले और गूँगे मनुष्योंका सर्वस्व हर लेता है, उसे ब्रह्मघाती जाने ॥ ११ ॥

आश्रमे वा वने वापि ग्रामे वा यदि वा पुरे ।

अग्निं समुत्सृजेन्मोहात्तं विद्याद् ब्रह्मघातिनम् ॥ १२ ॥

'जो मोहवश आश्रम, वन, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती ही समझना चाहिये ' ॥ १२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्रह्मघ्नकथने चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्महत्यारोंका कथनविषयक चौबीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥

पृष्ठ 345

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पञ्चविंशोऽध्यायः विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

तीर्थानां दर्शनं श्रेयः स्नानं च भरतर्षभ ।

श्रवणं च महाप्राज्ञ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- महाज्ञानी भरतश्रेष्ठ! तीर्थोंका दर्शन, उनमें किया जानेवाला स्नान और उनकी महिमाका श्रवण श्रेयस्कर बताया गया है । अतः मैं तीर्थोंका यथावत् रूपसे वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि भरतर्षभ ।

वक्तुमर्हसि मे तानि श्रोतास्मि नियतं प्रभो ॥ २ ॥

भरतभूषण! इस पृथ्वीपर जो - जो पवित्र तीर्थ हैं, उन्हें मैं नियमपूर्वक सुनना चाहता हूँ । आप उन्हें बतलानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

इमङ्गिरसा प्रोक्तं तीर्थवंशं महाद्युते ।

श्रोतुमर्हसि भद्रं ते प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा- महातेजस्वी नरेश! पूर्वकालमें अंगिरामुनिने तीर्थसमुदायका वर्णन किया था । तुम्हारा भला हो, तुम उसीको सुनो । इससे तुम्हें उत्तम धर्मकी प्राप्ति होगी ॥ ३ ॥

तपोवनगतं विप्रमभिगम्य महामुनिम् ।

पप्रच्छाङ्गिरसं धीरं गौतमः संशितव्रतः ॥ ४ ॥

एक समयकी बात है, महामुनि विप्रवर धैर्यवान् अंगिरा अपने तपोवनमें विराजमान थे । उस समय कठिन व्रतका पालन करनेवाले महर्षि गौतमने उनके पास जाकर पूछा ॥ ४ ॥

अस्ति मे भगवन् कश्चित्तीर्थेभ्यो धर्मसंशयः ।

तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंस महामुने ॥ ५ ॥

' भगवन्! महामुने! मुझे तीर्थोंके सम्बन्धमें कुछ धर्मविषयक संदेह है । वह सब मैं

सुनना चाहता हूँ । आप कृपया मुझे बताइये ॥ ५ ॥

उपस्पृश्य फलं किं स्यात्तेषु तीर्थेषु वै मुने ।

प्रेत्यभावे महाप्राज्ञ तद् यथास्ति तथा वद ॥ ६ ॥

पृष्ठ 346

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‘ महाज्ञानी मुनीश्वर! उन तीर्थोंमें स्नान करनेसे मृत्युके बाद किस फलकी प्राप्ति होती है? इस विषयमें जैसी वस्तुस्थिति है, वह बताइये ' ॥ ६ ॥

अङ्गिराउवाच

सप्ताहं चन्द्रभागां वै वितस्तामूर्मिमालिनीम् ।

विगाह्य वै निराहारो निर्मलो मुनिवद् भवेत् ॥ ७ ॥

अंगिराने कहा – मुने! मनुष्य उपवास करके चन्द्रभागा (चनाव ) और तरंगमालिनी वितस्ता ( झेलम ) -में सात दिनतक स्नान करे तो मुनिके समान निर्मल हो जाता है ॥ ७ ॥

काश्मीरमण्डले नद्यो याः पतन्ति महानदम् ।

ता नदीः सिन्धुमासाद्य शीलवान् स्वर्गमाप्नुयात् ॥ ८ ॥

काश्मीर प्रान्तकी जो - जो नदियाँ महानद सिन्धुमें मिलती हैं, उनमें तथा सिन्धुमें स्नान करके शीलवान् पुरुष मरनेके बाद स्वर्गमें जाता है ॥ ८ ॥

पुष्करं च प्रभासं च नैमिषं सागरोदकम् ।

देविकामिन्द्रमार्गं च स्वर्णबिन्दुं विगाह्य च ॥ ९ ॥

विबोध्यते विमानस्थः सोऽप्सतेभिरभिष्टुतः । पुष्कर, प्रभास, नैमिषारण्य, सागरोदक ( समुद्रजल), देविका, इन्द्रमार्ग तथा स्वर्णविन्दु -इन तीर्थोंमें स्नान करनेसे मनुष्य विमानपर बैठकर स्वर्गमें जाता है और अप्सराएँ उसकी स्तुति करती हुई उसे जगाती हैं ॥ ९ ३ ॥ हिरण्यबिन्दुं विक्षोभ्य प्रयतश्चाभिवाद्य च ॥ १० ॥

कुशेशयं च देवं तं धूयते तस्य किल्बिषम् । जो मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए हिरण्यविन्दु तीर्थमें स्नान करके वहाँके प्रमुख देवता भगवान् कुशेशयको प्रणाम करता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं ॥ १०३ ॥

इन्द्रतोयां समासाद्य गन्धमादनसंनिधौ ॥ ११ ॥

करतोयां कुरङ्गे च त्रिरात्रोपोषितो नरः ।

अश्वमेधमवाप्नोति विगाह्य प्रयतः शुचिः ॥ १२ ॥

गन्धमादन पर्वतके निकट इन्द्रतोया नदीमें और कुरंग क्षेत्रके भीतर करतोया नदीमें संयतचित्त एवं शुद्धभावसे स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ ११-१२ ॥

गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते ।

तथा कनखले स्नात्वा धूतपाप्मा दिवं व्रजेत् ॥ १३ ॥

गंगाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक तीर्थ, नील पर्वत तथा कनखलमें स्नान करके पापरहित हुआ मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है ॥ १३ ॥

पृष्ठ 347

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अपां ह्रद उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् ।

ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यसंधस्त्वहिंसकः ॥ १४ ॥

यदि कोई क्रोधहीन, सत्यप्रतिज्ञ और अहिंसक होकर ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक सलिलह्रद नामक तीर्थमें डुबकी लगाये तो उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥ १४ ॥

यत्र भागीरथी गङ्गा पतते दिशमुत्तराम् ।

महेश्वरस्य त्रिस्थाने यो नरस्त्वभिषिच्यते ॥ १५ ॥

एकमासं निराहारः स पश्यति हि देवताः । जहाँ उत्तर दिशामें भागीरथी गंगा गिरती हैं और वहाँ उनका स्रोत तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है, वह भगवान् महेश्वरका त्रिस्थान नामक तीर्थ है। जो मनुष्य एक मासतक निराहार रहकर वहाँ स्नान करता है, उसे देवताओंका प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥ १५३ ॥

सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च इन्द्रमार्गे च तर्पयन् ॥ १६ ॥

सुधां वै लभते भोक्तुं यो नरो जायते पुनः । सप्तगङ्ग, त्रिगङ्ग और इन्द्रमार्ग में पितरोंका तर्पण करनेवाला मनुष्य यदि पुनर्जन्म लेता है तो उसे अमृत भोजन मिलता है ( अर्थात् वह देवता हो जाता है । ) ॥ १६३ ॥

महाश्रम उपस्पृश्य योऽग्निहोत्रपरः शुचिः ॥ १७ ॥

एकमासं निराहारः सिद्धिं मासेन स व्रजेत् । महाश्रम तीर्थमें स्नान करके प्रतिदिन पवित्र भावसे अग्निहोत्र करते हुए जो एक महीनेतक उपवास करता है, वह उतने ही समयमें सिद्ध हो जाता है ॥ १७३ ॥

महाह्रद उपस्पृश्य भृगुतुङ्गे त्वलोलुपः ॥ १८ ॥

त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । जो लोभका त्याग करके भृगुतुङ्ग क्षेत्रके महाह्रद नामक तीर्थमें स्नान करता है और तीन राततक भोजन छोड़ देता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १८३ ॥

कन्याकूप उपस्पृश्य बलाकायां कृतोदकः ॥ १ ९ ॥ देवेषु लभते कीर्तिं यशसा च विराजते ॥ २० ॥

कन्याकूपमें स्नान करके बलाका तीर्थमें तर्पण करनेवाला पुरुष देवताओंमें कीर्ति पाता है और अपने यशसे प्रकाशित होता है ॥ १ ९ -२० ॥

देविकायामुपस्पृश्य तथा सुन्दरिकाह्रदे ।

अश्विन्यां रूपवर्चस्कं प्रेत्य वै लभते नरः ॥ २१ ॥

देविकामें स्नान करके सुन्दरिकाकुण्ड और अश्विनीतीर्थमें स्नान करनेपर मृत्युके पश्चात् दूसरे जन्ममें मनुष्यको रूप और तेजकी प्राप्ति होती है ॥ २१ ॥

महागङ्गामुपस्पृश्य कृत्तिकाङ्गारके तथा ।

पक्षमेकं निराहारः स्वर्गमाप्नोति निर्मलः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 348

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महागङ्गा और कृतिकाङ्गारक तीर्थमें स्नान करके एक पक्षतक निराहार रहनेवाला मनुष्य निर्मल - निष्पाप होकर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २२ ॥

वैमानिक उपस्पृश्य किङ्किणीकाश्रमे तथा ।

निवासेऽप्सरसां दिव्ये कामचारी महीयते ॥ २३ ॥

जो वैमानिक और किङ्किणीकाश्रमतीर्थमें स्नान करता है, वह अप्सराओंके दिव्यलोकमें जाकर सम्मानित होता और इच्छानुसार विचरता है ॥ २३ ॥

कालिकाश्रममासाद्य विपाशायां कृतोदकः ।

ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिसत्रं मुच्यते भवात् ॥ २४ ॥

जो कालिकाश्रममें स्नान करके विपाशा ( व्यास ) नदीमें पितरोंका तर्पण करता है और क्रोधको जीतकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तीन रात वहाँ निवास करता है, वह जन्म-मरणके बन्धनसे छूट जाता है ॥ २४ ॥

आश्रमे कृत्तिकानां तु स्नात्वा यस्तर्पयेत् पितॄन् ।

तोषयित्वा महादेवं निर्मलाः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ २५ ॥

जो कृत्तिकाश्रममें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है और महादेवजीको संतुष्ट करता है, वह पापमुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २५ ॥

महापुर उपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितः शुचिः ।

त्रसानां स्थावराणां च द्विपदानां भयं त्यजेत् ॥ २६ ॥

महापुरतीर्थमें स्नान करके पवित्रतापूर्वक तीन रात उपवास करनेसे मनुष्य चराचर प्राणियों तथा मनुष्योंसे प्राप्त होनेवाले भयको त्याग देता है ॥ २६ ॥

देवदारुवने स्नात्वा धूतपाप्मा कृतोदकः ।

देवलोकमवाप्नोति सप्तरात्रोषितः शुचिः ॥ २७ ॥

जो देवदारुवनमें स्नान करके तर्पण करता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं तथा जो वहाँ सात राततक निवास करता है, वह पवित्र हो मृत्युके पश्चात् देवलोकमें जाता है ॥

शरस्तम्बे कुशस्तम्बे द्रोणशर्मपदे तथा ।

अपां प्रपतनासेवी सेव्यते सोऽप्सरोगणैः ॥ २८ ॥

जो शरसाम्ब, कुशसाम्ब और द्रोणशर्मपदतीर्थके झरनोंमें स्नान करता है वह स्वर्गमें अप्सराओंद्वारा सेवित होता है ॥ २८ ॥

चित्रकूटे जनस्थाने तथा मन्दाकिनीजले ।

विगाह्य वै निराहारो राजलक्ष्म्या निषेव्यते ॥ २ ९ ॥

जो चित्रकूटमें मन्दाकिनीके जलमें तथा जनस्थानमें गोदावरीके जलमें स्नान करके उपवास करता है वह पुरुष राजलक्ष्मीसे सेवित होता है ॥ २ ९ ॥

श्यामायास्त्वाश्रमं गत्वा उषित्वा चाभिषिच्य च ।

एकपक्षं निराहारस्त्वन्तर्धानफलं लभेत् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 349

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श्यामाश्रममें जाकर वहाँ स्नान, निवास तथा एक पक्षतक उपवास करनेवाला पुरुष अन्तर्धानके फलको प्राप्त कर लेता है ॥ ३० ॥

कौशिकीं तु समासाद्य वायुभक्षस्त्वलोलुपः ।

एकविंशतिरात्रेण स्वर्गमारोहते नरः ॥ ३१ ॥

जो कौशिकी नदीमें स्नान करके लोलुपता त्यागकर इक्कीस रातोंतक केवल हवा पीकर रह जाता है वह मनुष्य स्वर्गको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥

मतङ्गवाप्यां यः स्नायादेकरात्रेण सिद्ध्यति ।

विगाहति ह्यनालम्बमन्धकं वै सनातनम् ॥ ३२ ॥

नैमिषे स्वर्गतीर्थे च उपस्पृश्य जितेन्द्रियः ।

फलं पुरुषमेधस्य लभेन्मासं कृतोदकः ॥ ३३ ॥

जो मतङ्गवापी तीर्थमें स्नान करता है, उसे एक रातमें सिद्धि प्राप्त होती है । जो अनालम्ब, अन्धक और सनातन तीर्थमें गोता लगाता है तथा नैमिषारण्यके स्वर्गतीर्थमें स्नान करके इन्द्रिय- संयमपूर्वक एक मासतक पितरोंको जलाञ्जलि देता है उसे पुरुषमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ३२-३३ ॥

गङ्गाह्रद उपस्पृश्य तथा चैवोत्पलावने ।

अश्वमेधमवाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥ ३४ ॥

जो गङ्गाह्रद और उत्पलावनतीर्थमें स्नान करके एक मासतक वहाँ पितरोंका तर्पण करता है, वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ३४ ॥

गङ्गायमुनयोस्तीर्थे तथा कालञ्जरे गिरौ ।

दशाश्वमेधानाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥ ३५ ॥

गङ्गा- यमुनाके सङ्गमतीर्थमें तथा कालञ्जरतीर्थमें एक मासतक स्नान और तर्पण करनेसे दस अश्वमेध- यज्ञोंका फल प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥

षष्टिह्रद उपस्पृश्य चान्नदानाद् विशिष्यते ।

दशतीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथा पराः ॥ ३६ ॥

समागच्छन्ति माघ्यां तु प्रयागे भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! षष्टिह्रद नामक तीर्थमें स्नान करनेसे अन्नदानसे भी अधिक फल प्राप्त होता है । माघ - मासकी अमावास्याको प्रयागराजमें तीन करोड़ दस हजार अन्य तीर्थोंका समागम होता है ॥ ३६३ ॥

माघमासं प्रयागे तु नियतः संशितव्रतः ॥ ३७ ॥

स्नात्वा तु भरतश्रेष्ठ निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् । भरतश्रेष्ठ! जो नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते हुए माघके महीनेमें प्रयागमें स्नान करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गमें जाता है ॥ ३७३ ॥

मरुद्गण उपस्पृश्य पितॄणामाश्रमे शुचिः ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 350

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वैवस्वतस्य तीर्थे च तीर्थभूतो भवेन्नरः । जो पवित्र भावसे मरुद्गण तीर्थ, पितरोंके आश्रम तथा वैवस्वततीर्थमें स्नान करता है, वह मनुष्य स्वयं तीर्थरूप हो जाता है ॥ ३८३ ॥

तथा ब्रह्मसरो गत्वा भागीरथ्यां कृतोदकः ॥ ३ ९ ॥ एकमासं निराहारः सोमलोकमवाप्नुयात् ॥ ४० ॥

जो ब्रह्मसरोवर ( पुष्करतीर्थ) और भागीरथी गङ्गामें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता और वहाँ एक मासतक निराहार रहता है उसे चन्द्रलोककी प्राप्ति होती है ॥ ३ ९ -४० ॥

उत्पातके नरः स्नात्वा अष्टावक्रे कृतोदकः ।

द्वादशाहं निराहारो नरमेधफलं लभेत् ॥ ४१ ॥

उत्पातक तीर्थमें स्नान और अष्टावक्र तीर्थमें तर्पण करके बारह दिनोंतक निराहार रहनेसे नरमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥

अश्मपृष्ठे गयायां च निरविन्दे च पर्वते ।

तृतीयां क्रौञ्चपद्यां च ब्रह्महत्यां विशुध्यते ॥ ४२ ॥

गयामें अश्मपृष्ठ (प्रेतशिला ) - पर पितरोंको पिण्ड देनेसे पहली, निरविन्द पर्वतपर पिण्डदान करनेसे दूसरी तथा क्रौञ्चपदी नामक तीर्थमें पिण्ड अर्पित करनेसे तीसरी ब्रह्महत्याको दूर करके मनुष्य सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥ ४२ ॥

कलविङ्क उपस्पृश्य विद्याच्च बहुशो जलम् ।

अग्नेः पुरे नरः स्नात्वा अग्निकन्यापुरे वसेत् ॥ ४३ ॥

कलविङ्क तीर्थमें स्नान करनेसे अनेक तीर्थोंमें गोते लगानेका फल मिलता है ।

अग्निपुर तीर्थमें स्नान करनेसे अग्निकन्यापुरका निवास प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥

करवीरपुरे स्नात्वा विशालायां कृतोदकः ।

देवह्रद उपस्पृश्य ब्रह्मभूतो विराजते ॥ ४४ ॥

करवीरपुरमें स्नान, विशालामें तर्पण और देवह्रदमें मज्जन करनेसे मनुष्य ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ ४४ ॥

पुनरावर्तनन्दां च महानन्दां च सेव्य वै ।

नन्दने सेव्यते दान्तस्त्वप्सरोभिरहिंसकः ॥ ४५ ॥

जो सब प्रकारकी हिंसाका त्याग करके जितेन्द्रिय- भावसे आवर्तनन्दा और महानन्दा तीर्थका सेवन करता है उसकी स्वर्गस्थ नन्दनवनमें अप्सराएँ सेवा करती हैं ॥ ४५ ॥

उर्वशीं कृत्तिकायोगे गत्वा चैव समाहितः ।

लौहित्ये विधिवत् स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ४६ ॥

जो कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिकाका योग होनेपर एकाग्रचित्त हो उर्वशी तीर्थ और लौहित्य तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करता है उसे पुण्डरीक यज्ञका फल मिलता है ॥ ४६ ॥

रामह्रद उपस्पृश्य विपाशायां कृतोदकः ।