श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 391–400
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400
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पुत्रं प्रस्थापयामास प्रतर्दनमरिंदमम् ॥ ३७ ॥
इसके बाद राजाने अपने पुत्र शत्रुदमन प्रतर्दनको वीतहव्यके पुत्रोंका वध करनेके लिये भेजा ॥ ३७ ॥
सरथः स तु संतीर्य गङ्गामाशु पराक्रमी ।
प्रययौ वीतहव्यानां पुरीं परपुरञ्जयः ॥ ३८ ॥
पिताकी आज्ञा पाकर वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला पराक्रमी वीर शीघ्र ही रथसहित गंगापार करके वीतहव्यपुत्रोंकी राजधानीकी ओर चल दिया ॥
वैतहव्यास्तु संश्रुत्य रथघोषं समुद्धतम् ।
निर्ययुर्नगराकारै रथैः पररथारुजैः ॥ ३ ९ ॥
निष्क्रम्य ते नरव्याघ्रा दंशिताश्चित्रयोधिनः ।
प्रतर्दनं समाजग्मुः शरवर्षैरुदायुधाः ॥ ४० ॥
उसके रथकी घोर घरघराहट सुनकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले पुरुषसिंह हैहयराजकुमार कवचसे सुसज्जित होकर शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले नगराकार विशाल रथोंपर बैठे हुए पुरीसे बाहर निकले और धनुष उठाये बाणोंकी वर्षा करते हुए प्रतर्दनपर चढ़ आये ॥ ३ ९ -४० ॥
शस्त्रैश्च विविधाकारै रथौघैश्च युधिष्ठिर ।
अभ्यवर्षन्त राजानं हिमवन्तमिवाम्बुदाः ॥ ४१ ॥
युधिष्ठिर! जैसे बादल हिमालयपर जल बरसाते हैं, उसी प्रकार हैहयराजकुमारोंने रथसमूहोंद्वारा आकर राजा प्रतर्दनपर नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ४१ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां राजा प्रतर्दनः ।
जघान तान् महातेजा वज्रानलसमैः शरैः ॥ ४२ ॥
तब महा तेजस्वी राजा प्रतर्दनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्रोंका निवारण करके वज्र और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंसे उन सबको मार डाला ॥ ४२ ॥
कृत्तोत्तमाङ्गास्ते राजन् भल्लैः शतसहस्रशः ।
अपतन् रुधिरार्द्राङ्गा निकृत्ता इव किंशुकाः ॥ ४३ ॥
राजन्! भल्लोंकी मारसे उनके मस्तकोंके सैकड़ों और हजारों टुकड़े हो गये थे । उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो गये और वे कटे हुए पलाशके वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़े ॥ ४३ ॥
हतेषु तेषु सर्वेषु वीतहव्यः सुतेष्वथ ।
प्राद्रवन्नगरं हित्वा भृगोराश्रममप्युत ॥ ४४ ॥
उन सब पुत्रोंके मारे जानेपर राजा वीतहव्य अपना नगर छोड़कर महर्षि भृगुके आश्रममें भाग गये ॥ ४४ ॥
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ययौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिपः ।
अभयं च ददौ तस्मै राजे राजन् भृगुस्तदा ॥ ४५ ॥
राजन्! वहाँ नरेश्वर वीतहव्यने महर्षि भृगुकी शरण ली । तब भृगुने राजाको अभयदान दे दिया ॥ ४५ ॥
अथानुपदमेवाशु तत्रागच्छत् प्रतर्दनः ।
स प्राप्य चाश्रमपदं दिवोदासात्मजोऽब्रवीत् ॥ ४६ ॥
इतनेहीमें उनके पीछे लगा हुआ दिवोदासकुमार प्रतर्दन भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचा ।
आश्रममें पहुँचकर उसने इस प्रकार कहा- ॥ ४६ ॥
भो भोः केऽत्राश्रमे सन्ति भृगोः शिष्या महात्मनः ।
द्रष्टुमिच्छे मुनिमहं तस्याचक्षत मामिति ॥ ४७ ॥
भाइयो! इस आश्रममें महात्मा भृगुके शिष्य कौन- कौन हैं? मैं महर्षिका दर्शन करना चाहता हूँ । आपलोग उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दे दें ॥ ४७ ॥
स तं विदित्वा तु भृगुर्निश्चक्रामाश्रमात् तदा ।
पूजयामास च ततो विधिना नृपसत्तमम् ॥ ४८ ॥
प्रतर्दनको आया जान भृगुजी आश्रमसे निकले । उन्होंने नृपश्रेष्ठ प्रतर्दनका विधिपूर्वक स्वागत - सत्कार किया ॥
उवाच चैनं राजेन्द्र किं कार्यं ब्रूहि पार्थिव ।
स चोवाच नृपस्तस्मै यदागमनकारणम् ॥ ४ ९ ॥
और इस प्रकार पूछा— ' राजेन्द्र! पृथ्वीनाथ! मुझसे आपका क्या काम है, बताइये । ' तब राजाने उनसे अपने आगमनका जो कारण था, उसे इस प्रकार बताया ॥ ४ ९ ॥ राजोवाच
अयं ब्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् ।
तस्य पुत्रैर्हि मे कृत्स्नो ब्रह्मन् वंशः प्रणाशितः ॥ ५० ॥
राजाने कहा – ब्रह्मन्! राजा वीतहव्यको आप यहाँसे बाहर निकाल दीजिये । विप्रवर! इनके पुत्रोंने मेरे सम्पूर्ण कुलका विनाश कर डाला है ॥ ५० ॥
उत्सादितश्च विषयः काशीनां रत्नसंचयः ।
एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मया ॥ ५१ ॥
अस्येदानीं वधादद्य भविष्याम्यनृणः पितुः । इतना ही नहीं, उनके पुत्रोंने काशिप्रान्तका सारा राज्य उजाड़ डाला और रत्नोंका संग्रह लूट लिया है । बलके घमंडमें भरे हुए इन राजाके सौ पुत्रोंको तो मैंने मार डाला; अब केवल ये ही रह गये हैं । इस समय इनका भी वध करके मैं पिताके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा? ॥ ५१ ॥
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तमुवाच कृपाविष्टो भृगुर्धर्मभृतां वरः ॥ ५२ ॥
नेहास्ति क्षत्रियः कश्चित् सर्वे हीमे द्विजातयः । तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भृगुने दयासे द्रवित होकर उनसे कहा- ' राजन्! यहाँ कोई
क्षत्रिय नहीं है । ये सब - के - सब ब्राह्मण हैं ॥ ५२ ॥
एतत् तु वचनं श्रुत्वा भृगोस्तथ्यं प्रतर्दनः ॥ ५३ ॥
पादावुपस्मृश्य शनैः प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ।
एवमप्यस्मि भगवन् कृतकृत्यो न संशयः ॥ ५४ ॥
महर्षि भृगुका यह यथार्थ वचन सुनकर प्रतर्दन बहुत प्रसन्न हुआ और धीरेसे उनके दोनों चरण छूकर बोला- ' भगवन्! यदि ऐसी बात है तो मैं कृतकृत्य हो गया, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३-५४ ॥
य एष राजा वीर्येण स्वजातिं त्याजितो मया ।
अनुजानीहि मां ब्रह्मन् ध्यायस्व च शिवेन माम् ॥ ५५ ॥
‘ क्योंकि इन राजाको मैंने अपने पराक्रमसे अपनी जाति त्याग देनेके लिये विवश कर दिया । ब्रह्मन्! मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये और मेरा कल्याण - चिन्तन कीजिये ॥ ५५ ॥
त्याजितो हि मया जातिमेष राजा भृगूद्वह ।
ततस्तेनाभ्यनुज्ञातो ययौ राजा प्रतर्दनः ॥ ५६ ॥
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यथागतं महाराज मुक्त्वा विषमिवोरगः । भृगुवंशी महर्षे! मैंने इन राजासे अपनी जातिका त्याग करवा दिया । ' महाराज! तदनन्तर महर्षिकी आज्ञा लेकर राजा प्रतर्दन जैसे साँप अपने विषको त्याग देता है, उसी प्रकार क्रोध छोड़कर जैसे आया था वैसे लौट गया ॥ ५६३ ॥
भूगोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गतः ॥ ५७ ॥
वीतहव्यो महाराज ब्रह्मवादित्वमेव च । नरेश्वर! इस प्रकार राजा वीतहव्य भृगुजीके कथनमात्रसे ब्रह्मर्षि एवं ब्रह्मवादी हो गये ॥ ५७३ ॥
तस्य गृत्समदः पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापरः ॥ ५८ ॥
शक्रस्त्वमिति यो दैत्यैर्निगृहीतः किलाभवत् । उनके पुत्रो गृत्समद हुए जो रूपमें दूसरे इन्द्रके समान थे । कहते हैं, किसी समय दैत्योंने उन्हें यह कहते हुए पकड़ लिया था कि ' तुम इन्द्र हो ' ॥ ५८३ ॥
ऋग्वेदे वर्तते चाग्रया श्रुतिर्यस्य महात्मनः ॥ ५ ९ ॥
यत्र गृत्समदो राजन् ब्राह्मणैः स महीयते ।
स ब्रह्मचारी विप्रर्षिः श्रीमान् गृत्समदोऽभवत् ॥ ६० ॥
ऋग्वेदमें महामना गृत्समदकी श्रेष्ठ श्रुति विद्यमान है ।राजन्! वहाँ ब्राह्मणलोग गृत्समदका बड़ा सम्मान करते हैं । ब्रह्मर्षि गृत्समद बड़े तेजस्वी और ब्रह्मचारी थे ॥ ५ ९ -६० ॥
पुत्रो गृत्समदस्यापि सुचेता अभवद् द्विजः ।
वर्चाः सुचेतसः पुत्रो विहव्यस्तस्य चात्मजः ॥ ६१ ॥
गृत्समद पुत्र सुचेता नामके ब्राह्मण हुए । सुचेताके पुत्र वर्चा और वर्चाके पुत्र विहव्य हुए ॥ ६१ ॥
विहव्यस्य तु पुत्रस्तु वितत्यस्तस्य चात्मजः ।
वितत्यस्य सुतः सत्यः संतः सत्यस्य चात्मजः ॥ ६२ ॥
विहव्यके पुत्रका नाम वितत्य था । वितत्यके पुत्र सत्य और सत्यके पुत्र सन्त हुए ॥ ६२ ॥
श्रवास्तस्य सुतश्चर्षिः श्रवसश्चाभवत् तमः ।
तमसश्च प्रकाशोऽभूत् तनयो द्विजसत्तमः ।
प्रकाशस्य च वागिन्द्रो बभूव जयतां वरः ॥ ६३ ॥
सन्तके पुत्र महर्षि श्रवा, श्रवाके तम और तमके पुत्र द्विजश्रेष्ठ प्रकाश हुए । प्रकाशका पुत्र विजयशीलोंमें श्रेष्ठ वागिन्द्र था ॥ ६३ ॥
तस्यात्मजश्च प्रमितिर्वेदवेदाङ्गपारगः ।
घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत ॥ ६४ ॥
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पुत्र जो वेदों और वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे । प्रमितिके घृताची वागिन्द्रके प्रमिति हुए अप्सरासे रुरुनामक पुत्र हुआ ॥ ६४ ॥
प्रमद्वरायां तु रुरोः पुत्रः समुदपद्यत ।
नको नाम विप्रर्षिर्यस्य पुत्रोऽथ शौनकः ॥ ६५ ॥
रुरुसे प्रमद्वराके गर्भसे ब्रह्मर्षि शुनकका जन्म हुआ, जिनके पुत्र शौनक मुनि हैं ॥ ६५ ॥
एवं विप्रत्वमगमद् वीतहव्यो नराधिपः ।
भृगोः प्रसादाद् राजेन्द्र क्षत्रियः क्षत्रियर्षभ ॥ ६६ ॥
राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! इस प्रकार राजा वीतहव्य क्षत्रिय होकर भी भृगुके प्रसादसे ब्राह्मण हो गये ॥ ६६ ॥
तथैव कथितो वंशो मया गार्त्समदस्तव ।
विस्तरेण महाराज किमन्यदनुपृच्छसि ॥ ६७ ॥
महाराज! इसी तरह मैंने गृत्समदके वंशका भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया है । अब और क्या पूछ रहे हो? ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि वीतहव्योपाख्यानं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वीतहव्यका उपाख्याननामक तीसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ३० ॥
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एकत्रिंशोऽध्यायः नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर- सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
के पूज्या' वै त्रिलोकेऽस्मिन् मानवा भरतर्षभ ।
विस्तरेण तदाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — भरतश्रेष्ठ! इन तीनों लोकोंमें कौन -कौन- से मनुष्य पूज्य होते हैं? यह विस्तार- पूर्वक बताइये। आपकी बातें सुनते - सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादं वासुदेवस्य चोभयोः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष देवर्षि नारद और भगवान् श्रीकृष्णके संवादरूप इस इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
नारदं प्राञ्जलिं दृष्ट्वा पूजयानं द्विजर्षभान् ।
केशवः परिपप्रच्छ भगवन् कान् नमस्यसि ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, देवर्षि नारदजी हाथ जोड़कर उत्तम ब्राह्मणोंकी पूजा कर रहे थे । यह देखकर भगवान् श्रीकृष्णने पूछा— ' भगवन्! आप किनको नमस्कार कर रहे हैं? ॥ ३ ॥
बहुमानपरस्तेषु भगवन् यान् नमस्यसि ।
शक्यं चेच्छ्रोतुमस्माभिर्ब्रह्येतद् धर्मवित्तम ॥ ४ ॥
‘ प्रभो! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपके हृदयमें जिनके प्रति बहुत बड़ा आदर है तथा आप भी जिनके सामने मस्तक झुकाते हैं, वे कौन हैं? यदि हमें सुनाना उचित समझें तो आप उन पूज्य पुरुषोंका परिचय दीजिये ' ॥ ४ ॥
नारद उवाच
शृणु गोविन्द यानेतान् पूजयाम्यरिमर्दन ।
त्वत्तोऽन्यः कः पुमाँल्लोके श्रोतुमेतदिहार्हति ॥ ५ ॥
नारदजीने कहा – शत्रुमर्दन गोविन्द! मैं जिनका पूजन करता हूँ उनका परिचय सुननेके लिये इस संसारमें आपसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष अधिकारी है? ॥ ५ ॥
वरुणं वायुमादित्यं पर्जन्यं जातवेदसम् ।
स्थाणुं स्कन्दं तथा लक्ष्मीं विष्णुं ब्रह्माणमेव च ॥ ६ ॥
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वाचस्पतिं चन्द्रमसमपः पृथ्वीं सरस्वतीम् ।
सततं ये नमस्यन्ति तान् नमस्याम्यहं विभो ॥ ७ ॥
जो लोग वरुण, वायु, आदित्य, पर्जन्य, अग्नि, रुद्र, स्वामी कार्तिकेय, लक्ष्मी, विष्णु, ब्रह्मा, बृहस्पति, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी और सरस्वतीको सदा प्रणाम करते हैं, प्रभो! मैं उन्हीं पूज्य पुरुषोंको मस्तक झुकाता हूँ ॥
तपोधनान् वेदविदो नित्यं वेदपरायणान् ।
महार्हान् वृष्णिशार्दूल सदा सम्पूजयाम्यहम् ॥ ८ ॥
वृष्णिसिंह! तपस्या ही जिनका धन है, जो वेदोंके ज्ञाता तथा वेदोक्त धर्मका ही आश्रय लेनेवाले हैं, उन परम पूजनीय पुरुषोंकी ही मैं सदा पूजा करता रहता हूँ ॥ ८ ॥
अभुक्त्वा देवकार्याणि कुर्वते येऽविकत्थनाः ।
संतुष्टाश्च क्षमायुक्तास्तान् नमस्याम्यहं विभो ॥ ९ ॥
प्रभो! जो भोजनसे पहले देवताओंकी पूजा करते, अपनी झूठी बड़ाई नहीं करते, संतुष्ट रहते और क्षमाशील होते हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥
सम्यग् यजन्ति ये चेष्टी: क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः ।
सत्यं धर्मं क्षितिं गाश्च तान् नमस्यामि यादव ॥ १० ॥
यदुनन्दन! जो विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय और मनको वशमें करनेवाले हैं और सत्य, धर्म, पृथ्वी तथा गौओंकी पूजा करते हैं, उन्हींको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥
ये वै तपसि वर्तन्ते वने मूलफलाशनाः ।
असंचयाः क्रियावन्तस्तान् नमस्यामि यादव ॥ ११ ॥
यादव! जो लोग वनमें फल- मूल खाकर तपस्यामें लगे रहते हैं, किसी प्रकारका संग्रह नहीं रखते और क्रियानिष्ठ होते हैं, उन्हींको मैं मस्तक झुकाता हूँ ॥
ये भृत्यभरणे शक्ताः सततं चातिथिव्रताः ।
भुञ्जते देवशेषाणि तान् नमस्यामि यादव ॥ १२ ॥
जो माता- पिता, कुटुम्बीजन एवं सेवक आदि भरण- पोषणके योग्य व्यक्तियोंका पालन करनेमें समर्थ हैं, जिन्होंने सदा अतिथिसेवाका व्रत ले रखा है तथा जो देवयज्ञसे बचे हुए अन्नको ही भोजन करते हैं, मैं उन्हींके सामने नतमस्तक होता हूँ ॥ १२ ॥
ये वेदं प्राप्य दुर्धर्षा वाग्मिनो ब्रह्मचारिणः ।
याजनाध्यापने युक्ता नित्यं तान् पूजयाम्यहम् ॥ १३ ॥
जो वेदका अध्ययन करके दुर्धर्ष और बोलनेमें कुशल हो गये हैं, ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और यज्ञ कराने तथा वेद पढ़ानेमें लगे रहते हैं उनकी मैं सदा पूजा किया करता हूँ ॥ १३ ॥
प्रसन्नहृदयाश्चैव सर्वसत्त्वेषु नित्यशः ।
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आपृष्ठतापात् स्वाध्याये युक्तास्तान् पूजयाम्यहम् ॥ १४ ॥
जो नित्य- निरन्तर समस्त प्राणियोंपर प्रसन्नचित्त रहते और सबेरेसे दोपहरतक वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं, उनका मैं पूजन करता हूँ ॥ १४ ॥
गुरुप्रसादे स्वाध्याये यतन्तो ये स्थिरव्रताः ।
शुश्रूषवोऽनसूयन्तस्तान् नमस्यामि यादव ॥ १५ ॥
यदुकुलतिलक! जो गुरुको प्रसन्न रखने और स्वाध्याय करनेके लिये सदा यत्नशील रहते हैं, जिनका व्रत कभी भंग नहीं होने पाता, जो गुरुजनोंकी सेवा करते और किसीके भी दोष नहीं देखते उनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १५ ॥
सुव्रता मुनयो ये च ब्राह्मणाः सत्यसंगराः ।
वोढारो हव्यकव्यानां तान् नमस्यामि यादव ॥ १६ ॥
यदुनन्दन! जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, मननशील, सत्यप्रतिज्ञ तथा हव्य-कव्यको नियमित -रूपसे चलानेवाले ब्राह्मण हैं उनको मैं मस्तक झुकाता हूँ ॥ १६ ॥
भैक्ष्यचर्यासु निरताः कृशा गुरुकुलाश्रयाः ।
निःसुखा निर्धना ये तु तान् नमस्यामि यादव ॥ १७ ॥
यदुकुलभूषण! जो गुरुकुलमें रहकर भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, तपस्यासे जिनका शरीर दुर्बल हो गया है और जो कभी धन तथा सुखकी चिन्ता नहीं करते हैं उनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १७ ॥
निर्ममा निष्प्रतिद्वन्द्वा निर्हीका निष्प्रयोजनाः ।
ये वेदं प्राप्य दुर्धर्षा वाग्मिनो ब्रह्मवादिनः ॥ १८ ॥
अहिंसानिरता ये च ये च सत्यव्रता नराः ।
दान्ताः शमपराश्चैव तान् नमस्यामि केशव ॥ १ ९ ॥
केशव! जिनके मनमें ममता नहीं है, जो प्रतिद्वन्द्वियोंसे रहित, लज्जासे ऊपर उठे हुए तथा कहीं भी कोई प्रयोजन न रखनेवाले हैं, जो वेदोंके ज्ञानका बल पाकर दुर्धर्ष हो गये हैं, प्रवचन- कुशल और ब्रह्मवादी हैं, जिन्होंने अहिंसामें तत्पर रहकर सदा सत्य बोलनेका व्रत ले रखा है तथा जो इन्द्रियसंयम एवं मनोनिग्रहके साधनमें संलग्न रहते हैं उनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥
देवतातिथिपूजायां युक्ता ये गृहमेधिनः ।
कपोतवृत्तयो नित्यं तान् नमस्यामि यादव ॥ २० ॥
यादव! जो गृहस्थ ब्राह्मण सदा कपोतवृत्तिसे रहते हुए देवता और अतिथियोंकी पूजामें संलग्न रहते हैं, उनको मैं मस्तक झुकाता हूँ ॥ २० ॥
येषां त्रिवर्गः कृत्येषु वर्तते नोपहीयते ।
शिष्टाचारप्रवृत्ताश्च तान् नमस्याम्यहं सदा ॥ २१ ॥
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जिनके कार्योंमें धर्म, अर्थ और काम तीनोंका निर्वाह होता है, किसी एककी भी हानि नहीं होने पाती तथा जो सदा शिष्टाचारमें ही संलग्न रहते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २१ ॥
ब्राह्मणाः श्रुतसम्पन्ना ये त्रिवर्गमनुष्ठिताः ।
अलोलुपाः पुण्यशीलास्तान् नमस्यामि केशव ॥ २२ ॥
केशव! जो ब्राह्मण वेद - शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न, धर्म, अर्थ और कामका सेवन करनेवाले, लोलुपतासे रहित और स्वभावतः पुण्यात्मा हैं उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २२ ॥
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च सुधाभक्षाश्च ये सदा ।
व्रतैश्च विविधैर्युक्तास्तान् नमस्यामि माधव ॥ २३ ॥
माधव! जो नाना प्रकारके व्रतोंका पालन करते हुए केवल पानी या हवा पीकर ही रह जाते हैं तथा जो सदा यज्ञशेष अन्नका ही भोजन करते हैं उनके चरणोंमें मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २३ ॥
अयोनीनग्नियोनींश्च ब्रह्मयोनींस्तथैव च ।
सर्वभूतात्मयोनींश्च तान् नमस्याम्यहं सदा ॥ २४ ॥
जो स्त्री नहीं रखते अर्थात् ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, जो अग्निहोत्रसे युक्त हैं तथा जो वेदोंको धारण करनेवाले हैं और समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप परमात्माको ही सबका कारण माननेवाले हैं उनकी मैं सदा वन्दना करता हूँ ॥ २४ ॥
नित्यमेतान् नमस्यामि कृष्ण लोककरानृषीन् ।
लोकज्येष्ठान् कुलज्येष्ठांस्तमोघ्नाँल्लोकभास्करान् ॥ २५ ॥
श्रीकृष्ण! जो लोकोंकी सृष्टि करनेवाले, संसारमें सबसे श्रेष्ठ, उत्तम कुलमें उत्पन्न, अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले तथा सूर्यके समान जगत्को ज्ञानालोक प्रदान करनेवाले हैं उन ऋषियोंको मैं सदा मस्तक झुकाता हूँ ॥ २५ ॥
तस्मात् त्वमपि वार्ष्णेय द्विजान् पूजय नित्यदा ।
पूजिताः पूजनार्हा हि सुखं दास्यन्ति तेऽनघ ॥ २६ ॥
वार्ष्णेय! अतः आप भी सदा ब्राह्मणोंका पूजन करें । निष्पाप श्रीकृष्ण! वे पूजनीय ब्राह्मण पूजित होनेपर आपको अपने आशीर्वादसे सुख प्रदान करेंगे ॥ २६ ॥
अस्मिल्लोँके सदा ह्येते परत्र च सुखप्रदाः ।
चरन्ते मान्यमाना वै प्रदास्यन्ति सुखं तव ॥ २७ ॥
ये ब्राह्मण सदा इहलोक और परलोकमें भी सुख प्रदान करते हुए विचरते हैं । ये सम्मानित होनेपर आपको अवश्य ही सुख प्रदान करेंगे ॥ २७ ॥
ये सर्वातिथयो नित्यं गोषु च ब्राह्मणेषु च ।
नित्यं सत्ये चाभिरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २८ ॥
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जो सबका अतिथि सत्कार करते तथा गौ -ब्राह्मण और सत्यपर प्रेम रखते हैं वे बड़े-बड़े संकटसे पार हो जाते हैं ॥ २८ ॥
नित्यं शमपरा ये च तथा ये चानसूयकाः ।
नित्यस्वाध्यायिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २ ९ ॥
जो सदा मनको वशमें रखते, किसीके दोषपर दृष्टि नहीं डालते और प्रतिदिन स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं वे दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ॥ २ ९ ॥
सर्वान् देवान् नमस्यन्ति ये चैकं वेदमाश्रिताः ।
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ३० ॥
जो सब देवताओंको प्रणाम करते हैं, एकमात्र वेदका आश्रय लेते, श्रद्धा रखते और इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं वे भी दुस्तर संकटसे छुटकारा पा जाते हैं ॥
तथैव विप्रप्रवरान् नमस्कृत्य यतव्रताः ।
भवन्ति ये दानरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ३१ ॥
इसी प्रकार जो नियमपूर्वक व्रतोंका पालन करते हैं और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उन्हें दान देते हैं वे दुस्तर विपत्ति लाँघ जाते हैं ॥ ३१ ॥
तपस्विनश्च ये नित्यं कौमारब्रह्मचारिणः ।
तपसा भावितात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ३२ ॥
जो तपस्वी, आबालब्रह्मचारी और तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले हैं वे दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ॥ ३२ ॥
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चार्चने रताः ।
शिष्टान्नभोजिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ३३ ॥
जो देवता, अतिथि, पोष्यवर्ग तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहते हैं और यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करते हैं वे भी दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ॥ ३३ ॥
अग्निमाधाय विधिवत् प्रणता धारयन्ति ये ।
प्राप्ताः सोमाहुतिं चैव दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ३४ ॥
जो विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके सदा अग्निदेवकी उपासना और वन्दना करते हुए सर्वदा उस अग्निकी रक्षा करते हैं; तथा उसमें सोमरसकी आहुति देते हैं वे दुस्तर विपत्तिसे पार हो जाते हैं ॥ ३४ ॥
मातापित्रोर्गुरुषु च सम्यग् वर्तन्ति ये सदा ।
यथा त्वं वृष्णिशार्दूलेत्युक्त्वैवं विरराम सः ॥ ३५ ॥
वृष्णिसिंह! जो आपकी ही भाँति माता- पिता और गुरुके प्रति पूर्णतः न्याययुक्त बर्ताव करते हैं वे भी संकटसे पार हो जाते हैं - ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये ॥ ३५ ॥
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय पितृदेवद्विजातिथीन् ।
सम्यक् पूजयसे नित्यं गतिमिष्टामवाप्स्यसि ॥ ३६ ॥