06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 521–530
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530
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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः राजा कुशिक और उनकी रानीके द्वारा महर्षि च्यवनकी सेवा युधिष्ठिर उवाच
संशयो मे महाप्राज्ञ सुमहान् सागरोपमः ।
तं शृणु महाबाहो श्रुत्वा व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — महाबाहो! मेरे मनमें एक महासागरके समान महान् संदेह हो गया है । महाप्राज्ञ! उसे सुनिये और सुनकर उसकी व्याख्या कीजिये ॥ १ ॥
कौतूहलं मे सुमहज्जामदग्न्यं प्रति प्रभो ।
रामं धर्मभृतां श्रेष्ठं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
प्रभो! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजीके विषयमें मेरा कौतूहल बढ़ा हुआ है; अतः आप मेरे प्रश्नका विशद विवेचन कीजिये ॥ २ ॥
कथमेष समुत्पन्नो रामः सत्यपराक्रमः ।
कथं ब्रह्मर्षिवंशोऽयं क्षत्रधर्मा व्यजायत ॥ ३ ॥
ये सत्यपराक्रमी परशुरामजी कैसे उत्पन्न हुए? ब्रह्मर्षियोंका यह वंश क्षत्रियधर्मसे सम्पन्न कैसे हो गया? ॥ ३ ॥
तदस्य सम्भवं राजन् निखिलेनानुकीर्तय ।
कौशिकाच्च कथं वंशात् क्षत्राद् वै ब्राह्मणो भवेत् ॥ ४ ॥
अतः राजन्! आप परशुरामजीकी उत्पत्तिका प्रसंग पूर्णरूपसे बताइये । राजा कुशिकका वंश तो क्षत्रिय था, उससे ब्राह्मण जातिकी उत्पत्ति कैसे हुई? ॥ ४ ॥
अहो प्रभावः सुमहानासीद् वै सुमहात्मनः ।
रामस्य च नरव्याघ्र विश्वामित्रस्य चैव हि ॥ ५ ॥
पुरुषसिंह! महात्मा परशुराम और विश्वामित्रका महान् प्रभाव अद्भुत था ॥ ५ ॥
कथं पुत्रानतिक्रम्य तेषां नप्तृष्यथाभवत् ।
एष दोषः सुतान् हित्वा तत्त्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥
राजा कुशिक और महर्षि ऋचीक – ये ही अपने - अपने वंशके प्रवर्तक थे । उनके पुत्र गाधि और जमदग्निको लाँघकर उनके पौत्र विश्वामित्र और परशुराममें ही यह विजातीयताका दोष क्यों आया? इसमें जो यथार्थ कारण हो, उसकी व्याख्या कीजिये ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
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अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
च्यवनस्य च संवादं कुशिकस्य च भारत ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— भारत! इस विषयमें महर्षि च्यवन और राजा कुशिकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ७ ॥
एतं दोषं पुरा दृष्ट्वा भार्गवश्च्यवनस्तदा ।
आगामिनं महाबुद्धिः स्ववंशे मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥
निश्चित्य मनसा सर्वं गुणदोषबलाबलम् ।
दग्धुकामः कुलं सर्वं कुशिकानां तपोधनः ॥ ९ ॥
च्यवनः समनुप्राप्य कुशिकं वाक्यमब्रवीत् ।
वस्तुमिच्छा समुत्पन्ना त्वया सह ममानघ ॥ १० ॥
पूर्वकालमें भृगुपुत्र च्यवनको यह बात मालूम हुई कि हमारे वंशमें कुशिक - वंशकी कन्याके सम्बन्धसे क्षत्रियत्वका महान् दोष आनेवाला है । यह जानकर उन परम बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठने मन- ही - मन सारे गुण -दोष और बलाबलका विचार किया । तत्पश्चात् कुशिकोंके समस्त कुलको भस्म कर डालनेकी इच्छासे तपोधन च्यवन राजा कुशिकके पास गये और इस प्रकार बोले — ‘ निष्पाप नरेश! मेरे मनमें कुछ कालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा हुई है ' ॥ ८–१० ॥ कुशिक उवाच
भगवन् सहधर्मोऽयं पण्डितैरिह धार्यते ।
प्रदानकाले कन्यानामुच्यते च सदा बुधैः ॥ ११ ॥
कुशिकने कहा — भगवन्! यह अतिथिसेवारूप सहधर्म विद्वान् पुरुष यहाँ सदा धारण करते हैं और कन्याओंके प्रदानकाल अर्थात् कन्याके विवाहके समयमें सदा पण्डितजन इसका उपदेश देते हैं ॥ ११ ॥
यत्तु तावदतिक्रान्तं धर्मद्वारं तपोधन ।
तत्कार्यं प्रकरिष्यामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १२ ॥
तपोधन! अबतक तो इस धर्मके मार्गका पालन नहीं हुआ और समय निकल गया, परंतु अब आपके सहयोग और कृपासे इसका पालन करूँगा । अतः आप मुझे आज्ञा प्रदान करें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥ भीष्म उवाच
अथासनमुपादाय च्यवनस्य महामुनेः ।
कुशिको भार्यया सार्धमाजगाम यतो मुनिः ॥ १३ ॥
इतना कहकर राजा कुशिकने महामुनि च्यवनको बैठनेके लिये आसन दिया और स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे मुनि विराजमान थे ॥
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प्रगृह्य राजा भृंगारं पाद्यमस्मै न्यवेदयत् ।
कारयामास सर्वाश्च क्रियास्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
राजाने स्वयं गड़ुआ हाथमें लेकर मुनिको पैर धोनेके लिये जल निवेदन किया । इसके बाद उन महात्माको अर्घ्य आदि देनेकी सम्पूर्ण क्रियाएँ पूर्ण करायीं ॥ १४ ॥
ततः स राजा च्यवनं मधुपर्कं यथाविधि ।
ग्राहयामास चाव्यग्रो महात्मा नियतव्रतः ॥ १५ ॥
इसके बाद नियमतः व्रत पालन करनेवाले महामनस्वी राजा कुशिकने शान्तभावसे च्यवन मुनिको विधिपूर्वक मधुपर्क भोजन कराया ॥ १५ ॥
सत्कृत्य तं तथा विप्रमिदं पुनरथाब्रवीत् ।
भगवन् परवन्तौ स्वो ब्रूहि किं करवावहे ॥ १६ ॥
इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिका यथावत् सत्कार करके वे फिर उनसे बोले - ‘ भगवन्! हम
दोनों पति-पत्नी आपके अधीन हैं । बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें ॥ १६ ॥
यदि राज्यं यदि धनं यदि गाः संशितव्रत ।
यज्ञदानानि च तथा ब्रूहि सर्वं ददामि ते ॥ १७ ॥
इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते ।
राजा त्वमसि शाध्युर्वीमहं तु परवांस्त्वयि ॥ १८ ॥
' कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! यदि आप राज्य, धन, गौ एवं यज्ञके निमित्त दान लेना चाहते हों तो बतावें । वह सब मैं आपको दे सकता हूँ। यह राजभवन, यह राज्य और यह धर्मानुकूल राज्यसिंहासन – सब आपका है । आप ही राजा हैं, इस पृथ्वीका पालन कीजिये । मैं तो सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ' ॥ १७-१८ ॥
एवमुक्ते ततो वाक्ये च्यवनो भार्गवस्तदा ।
कुशिकं प्रत्युवाचेदं मुदा परमया युतः ॥ १ ९ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन मन- ही- मन बड़े प्रसन्न हुए और कुशिकसे इस प्रकार बोले – ॥
न राज्यं कामये राजन् न धनं न च योषितः ।
न च गा न च वै देशान् न यज्ञं श्रूयतामिदम् ॥ २० ॥
‘ राजन्! न मैं राज्य चाहता हूँ न धन । न युवतियोंकी इच्छा रखता हूँ न गौओं, देशों
और यज्ञकी ही । आप मेरी यह बात सुनिये ॥ २० ॥
नियमं किंचिदारप्स्ये युवयोर्यदि रोचते ।
परिचर्योऽस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशङ्कया ॥ २१ ॥
‘ यदि आपलोगोंको जँचे तो मैं एक नियम आरम्भ करूँगा । उसमें आप दोनों पति-पत्नीको सर्वथा सावधान रहकर बिना किसी हिचकके मेरी सेवा करनी होगी' ॥ २१ ॥
एवमुक्ते तदा तेन दम्पती तौ जहर्षतुः ।
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प्रत्यब्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत ॥ २२ ॥
मुनिकी यह बात सुनकर राजदम्पतिको बड़ा हर्ष हुआ । भारत! उन दोनोंने उन्हें उत्तर दिया, ' बहुत अच्छा, हम आपकी सेवा करेंगे ' ॥ २२ ॥
अथ तं कुशिको हृष्टः प्रावेशयदनुत्तमम् ।
गृहोद्देशं ततस्तस्य दर्शनीयमदर्शयत् ॥ २३ ॥
तदनन्तर राजा कुशिक महर्षि च्यवनको बड़े आनन्दके साथ अपने सुन्दर महलके भीतर ले गये । वहाँ उन्होंने मुनिको एक सजा- सजाया कमरा दिखाया, जो देखने योग्य था ॥ २३ ॥
इयं शय्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् ।
प्रयतिष्यावहे प्रीतिमाहर्तुं ते तपोधन ॥ २४ ॥
उस घरको दिखाकर वे बोले – ' तपोधन! यह आपके लिये शय्या बिछी हुई है । आप
इच्छानुसार यहाँ आराम कीजिये । हमलोग आपको प्रसन्न रखनेका प्रयत्न करेंगे ' ॥ २४ ॥
अथ सूर्योऽतिचक्राम तेषां संवदतां तथा ।
अथर्षिश्चोदयामास पानमन्नं तथैव च ॥ २५
इस प्रकार उनमें बातें होते - होते सूर्यास्त हो गया । तब महर्षिने राजाको अन्न और जल ले आनेकी आज्ञा दी ॥ २५ ॥
तमपृच्छत् ततो राजा कुशिकः प्रणतस्तदा ।
किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापयाम्यहम् ॥ २६ ॥
उस समय राजा कुशिकने उनके चरणोंमें प्रणाम करके पूछा — ' महर्षे! आपको कौन-सा भोजन अभीष्ट है? आपकी सेवामें क्या- क्या सामान लाऊँ? ' ॥ २६ ॥
ततः स परया प्रीत्या प्रत्युवाच नराधिपम् ।
औपपत्तिकमाहारं प्रयच्छस्वेति भारत ॥ २७ ॥
भरतनन्दन! यह सुनकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ राजासे बोले – ' तुम्हारे यहाँ जो भोजन तैयार हो, वही ला दो ' ॥ २७ ॥
तद्वचः पूजयित्वा तु तथेत्याह स पार्थिवः ।
यथोपपन्नमाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिप ॥ २८ ॥
नरेश्वर! राजा मुनिके उस कथनका आदर करते हुए ' जो आज्ञा' कहकर गये और जो भोजन तैयार था, उसे लाकर उन्होंने मुनिके सामने प्रस्तुत कर दिया ॥ २८ ॥
ततः स भुक्त्वा भगवान् दम्पती प्राह धर्मवित् ।
स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा बाधते मामिति प्रभो ॥ २ ९ ॥
प्रभो! तदनन्तर भोजन करके धर्मज्ञ भगवान् च्यवनने राजदम्पत्तिसे कहा— ' अब मैं सोना चाहता हूँ, मुझे नींद सता रही है ' ॥ २ ९ ॥ ततः शय्यागृहं प्राप्य भगवानृषिसत्तमः ।
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संविवेश नरेशस्तु सपत्नीकः स्थितोऽभवत् ॥ ३० ॥
इसके बाद मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन शयनागारमें जाकर सो गये और पत्नीसहित राजा कुशिक उनकी सेवामें खड़े रहे ॥ ३० ॥
न प्रबोध्योऽस्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गवः ।
संवाहितव्यौ मे पादौ जागृतव्यं च तेऽनिशम् ॥ ३१ ॥
उस समय भृगुपुत्रने उन दोनोंसे कहा-' तुमलोग सोते समय मुझे जगाना मत । मेरे दोनों पैर दबाते रहना और स्वयं भी निरन्तर जागते रहना' ॥ ३१ ॥
अविशङ्कस्तु कुशिकस्तथेत्येवाह धर्मवित् ।
न प्रबोधयतां तौ च दम्पती रजनीक्षये ॥ ३२ ॥
धर्मज्ञ राज कुशिकने निःशंक होकर कहा, ' बहुत अच्छा ' । रात बीती, सबेरा हुआ, किंतु उन पति- पत्नीने मुनिको जगाया नहीं ॥ ३२ ॥
यथादेशं महर्षेस्तु शुश्रूषापरमौ तदा ।
बभूवतुर्महाराज प्रयतावथ दम्पती ॥ ३३ ॥
महाराज! वे दोनों दम्पति मन और इन्द्रियोंको वशमें करके महर्षिके आज्ञानुसार उनकी सेवामें लगे रहे ॥ ३३ ॥
ततः स भगवान् विप्रः समादिश्य नराधिपम् ।
सुष्वापैकेन पार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् ॥ ३४ ॥
उधर ब्रह्मर्षि भगवान् च्यवन राजाको सेवाका आदेश देकर इक्कीस दिनोंतक एक ही करवटसे सोते रह गये ॥ ३४ ॥
स तु राजा निराहारः सभार्यः कुरुनन्दन ।
पर्युपासत तं हृष्टश्च्यवनाराधने रतः ॥ ३५ ॥
कुरुनन्दन! राजा और रानी बिना कुछ खाये - पीये हर्षपूर्वक महर्षिकी उपासना और आराधनामें लगे रहे ॥
भार्गवस्तु समुत्तस्थौ स्वयमेव तपोधनः ।
अकिंचिदुक्त्वा तु गृहान्निश्चक्राम महातपाः ॥ ३६ ॥
बाईसवें दिन तपस्याके धनी महातपस्वी च्यवन अपने आप उठे और राजासे कुछ कहे बिना ही महलसे बाहर निकल गये ॥ ३६ ॥
तमन्वगच्छतां तौ च क्षुधितौ श्रमकर्शितौ ।
भार्यापती मुनिश्रेष्ठस्तावेतौ नावलोकयत् ॥ ३७ ॥
राजा - रानी भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे दुर्बल हो गये थे । तो भी वे मुनिके पीछे - पीछे गये, परंतु उन मुनिश्रेष्ठने इन दोनोंकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं ॥ ३७ ॥
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तयोस्तु प्रेक्षतोरेव भार्गवाणां कुलोद्वहः ।
अन्तर्हितोऽभूद् राजेन्द्र ततो राजापतत् क्षितौ ॥ ३८ ॥
राजेन्द्र! वे भृगुकुलशिरोमणि राजा- रानीके देखते- देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये ।
इससे अत्यन्त दुःखी हो राजा पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३८ ॥
स मुहूर्तं समाश्वस्य सह देव्या महाद्युतिः ।
पुनरन्वेषणे यत्नमकरोत् परमं तदा ॥ ३ ९ ॥
दो घड़ीमें किसी तरह अपनेको सँभालकर वे महातेजस्वी राजा उठे और महारानीको साथ लेकर पुनः मुनिको ढूँढ़नेका महान् प्रयत्न करने लगे ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गतदानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
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त्रिपञ्चशत्तमोऽध्यायः च्यवन मुनिके द्वारा राजा - रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना युधिष्ठिर उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत् तदा ।
भार्या चास्य महाभागा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – पितामह! च्यवन मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर राजा कुशिक और उनकी महान् सौभाग्यशालिनी पत्नीने क्या किया? यह मुझे बताइये ॥ भीष्म उवाच
अदृष्ट्वा स महीपालस्तमृषिं सह भार्यया ।
परिश्रान्तो निववृते व्रीडितो नष्टचेतनः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! पत्नीसहित भूपालने बहुत ढूँढ़नेपर भी जब ऋषिको नहीं देखा तब वे थककर लौट आये । उस समय उन्हें बड़ा संकोच हो रहा था । वे अचेत - से हो गये थे ॥ २ ॥
स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किंचन ।
तदेव चिन्तयामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ॥ ३ ॥
वे दीनभावसे पुरीमें प्रवेश करके किसीसे कुछ बोले नहीं । केवल च्यवन मुनिके चरित्रपर मन- ही- मन विचार करने लगे ॥ ३ ॥
अथ शून्येन मनसा प्रविश्य स्वगृहं नृपः ।
ददर्श शयने तस्मिन् शयानं भृगुनन्दनम् ॥ ४ ॥
राजाने सूने मनसे जब घरमें प्रवेश किया तब भृगुनन्दन महर्षि च्यवनको पुनः उसी शय्यापर सोते देखा ॥ ४ ॥
विस्मितौ तमृषिं दृष्ट्वा तदाश्चर्यं विचिन्त्य च ।
दर्शनात् तस्य तु तदा विश्रान्तौ सम्बभूवतुः ॥ ५ ॥
उन महर्षिको देखकर उन दोनोंको बड़ा विस्मय हुआ । वे उस आश्चर्यजनक घटनापर विचार करके चकित हो गये । मुनिके दर्शनसे उन दोनोंकी सारी थकावट दूर हो गयी ॥ ५ ॥
यथास्थानं च तौ स्थित्वा भूयस्तं संववाहतुः ।
अथापरेण पार्श्वेन सुष्वाप स महामुनिः ॥ ६ ॥
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वे फिर यथास्थान खड़े होकर मुनिके पैर दबाने लगे । अबकी बार वे महामुनि दूसरी करवटसे सोये थे ॥
तेनैव च स कालेन प्रत्यबुद्धयत वीर्यवान् ।
न च तौ चक्रतुः किंचिद् विकारं भयशङ्कितौ ॥ ७ ॥
शक्तिशाली च्यवन मुनि फिर उतने ही समयमें सोकर उठे । राजा और रानी उनके भयसे शंकित थे, अतः उन्होंने अपने मनमें तनिक भी विकार नहीं आने दिया ॥ ७ ॥
प्रतिबुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशाम्पते ।
तैलाभ्यंगो दीयतां मे स्नास्येऽहमिति भारत ॥ ८ ॥
भारत! प्रजानाथ! जब वे मुनि जागे, तब राजा और रानीसे इस प्रकार बोले —'तुमलोग मेरे शरीरमें तेलकी मालिश करो; क्योंकि अब मैं स्नान करूँगा ' ॥ ८ ॥
तौ तथेति प्रतिश्रुत्य क्षुधितौ श्रमकर्शितौ ।
शतपाकेन तैलेन महार्हेणोपतस्थतुः ॥ ९ ॥
यद्यपि राजा - रानी भूख- प्यास से पीड़ित और अत्यन्त दुर्बल हो गये थे तो भी ' बहुत अच्छा ' कहकर वे राजदम्पति सौ बार पकाकर तैयार किये हुए बहुमूल्य तेलको लेकर उनकी सेवामें जुट गये ॥ ९ ॥
ततः सुखासीनमृषिं वाग्यतौ संववाहतुः ।
न च पर्याप्तमित्याह भार्गवः सुमहातपाः ॥ १० ॥
ऋषि आनन्दसे बैठ गये और वे दोनों दम्पति मौन हो उनके शरीरमें तेल मलने लगे । परंतु महातपस्वी भृगुपुत्र च्यवनने अपने मुँहसे एक बार भी नहीं कहा कि ' बस, अब रहने दो, तेलकी मालिश पूरी हो गयी' ॥ १० ॥
यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षयामास भार्गवः ।
तत उत्थाय सहसा स्नानशालां विवेश ह ॥ ११ ॥
भृगुपुत्रने इतनेपर भी जब राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा, तब सहसा उठकर वे स्नानागारमें चले गये ॥ ११ ॥
क्लृप्तमेव तु तत्रासीत् स्नानीयं पार्थिवोचितम् ।
असत्कृत्य च तत् सर्वं तत्रैवान्तरधीयत ॥ १२ ॥
स मुनिः पुनरेवाथ नृपतेः पश्यतस्तदा ।
नासूयां चक्रतुस्तौ च दम्पती भरतर्षभ ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ स्नानके लिये राजोचित सामग्री पहलेसे ही तैयार करके रखी गयी थी; किंतु उस सारी सामग्रीकी अवहेलना करके – उसका किंचित् भी उपयोग न करके वे मुनि पुनः राजाके देखते - देखते वहीं अन्तर्धान हो गये; तो भी उन पति- पत्नीने उनके प्रति दोष-दृष्टि नहीं की ॥ १२-१३ ॥ अथ स्नातः सः भगवान् सिंहासनगतः प्रभुः ।
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दर्शयामास कुशिकं सभार्यं कुरुनन्दन ॥ १४ ॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर शक्तिशाली भगवान् च्यवन मुनि पत्नीसहित राजा कुशिकको स्नान करके सिंहासनपर बैठे दिखायी दिये ॥ १४ ॥
संहृष्टवदनो राजा सभार्यः कुशिको मुनिम् ।
सिद्धमन्नमिति प्रह्वो निर्विकारो न्यवेदयत् ॥ १५ ॥
उन्हें देखते ही पत्नीसहित राजाका मुख प्रसन्नतासे मुनिके पास जाकर विनयपूर्वक यह निवेदन किया कि ' भोजनखिल उठातैयार। उन्होंने॥ निर्विकारभावसे१५ ॥
आनीयतामिति मुनिस्तं चोवाच नराधिपम् ।
स राजा समुपाजहे तदन्नं सह भार्यया ॥ १६ ॥
तब मुनिने राजासे कहा - 'ले आओ । ' आज्ञा पाकर पत्नीसहित नरेशने मुनिके सामने भोजन - सामग्री प्रस्तुत की ॥ १६ ॥
मांसप्रकारान् विविधान् शाकानि विविधानि च ।
वेसवारविकारांश्च पानकानि लघूनि च ॥ १७ ॥
रसालापूपकांश्चित्रान् मोदकानथ खाण्डवान् ।
रसान् नानाप्रकारांश्च वन्यं च मुनिभोजनम् ॥ १८ ॥
फलानि च विचित्राणि राजभोज्यानि भूरिशः ।
बदरेङ्गुदकाश्मर्यभल्लातकफलानि च ॥ १९ ॥
गृहस्थानां च यद् भोज्यं यच्चापि वनवासिनाम् ।
सर्वमाहारयामास राजा शापभयात् ततः ॥ २० ॥
नाना प्रकारके फलोंके गूदे, भाँति- भाँतिके साग, अनेक प्रकारके व्यंजन, हलके पेय पदार्थ, स्वादिष्ट पूए, विचित्र मोदक ( लड्डू), खाँड, नाना प्रकारके रस, मुनियोंके खानेयोग्य जंगली कंद - मूल, विचित्र फल, राजाओंके उपभोगमें आनेवाले अनेक प्रकारके पदार्थ, वेर, इंगुद, काश्मर्य, भल्लातक फल तथा गृहस्थों और वानप्रस्थोंके खाद्य पदार्थ – सब कुछ राजाने शापके डरसे मँगाकर प्रस्तुत कर दिया था ॥ १७–२० ॥
अथ सर्वमुपन्यस्तमग्रतश्च्यवनस्य तत् ।
ततः सर्वं समानीय तच्च शय्यासनं मुनिः ॥ २१ ॥
वस्त्रैः शुभैरवच्छाद्य भोजनोपस्करैः सह ।
सर्वमादीपयामास च्यवनो भृगुनन्दनः ॥ २२ ॥
यह सब सामग्री च्यवन मुनिके आगे परोसकर रखी गयी । मुनिने वह सब लेकर उसको तथा शय्या और आसनको भी सुन्दर वस्त्रोंसे ढक दिया । इसके बाद भृगुनन्दन च्यवनने भोजन- सामग्रीके साथ उन वस्त्रोंमें भी आग लगा दी ॥ २१-२२ ॥
न च तौ चक्रतुः क्रोधं दम्पती सुमहामती ।
तयोः सम्प्रेक्षतोरेव पुनरन्तर्हितोऽभवत् ॥ २३ ॥
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परंतु उन परम बुद्धिमान् दम्पतिने उनपर क्रोध नहीं प्रकट किया । उन दोनोंके देखते-ही - देखते वे मुनि फिर अन्तर्धान हो गये ॥ २३ ॥
तथैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा ।
सभार्यो वाग्यतः श्रीमान् न च कोपं समाविशत् ॥ २४ ॥
वे श्रीमान् राजर्षि अपनी स्त्रीके साथ उसी तरह वहाँ रातभर चुपचाप खड़े रह गये; किंतु उनके मनमें क्रोधका आवेश नहीं हुआ ॥ २४ ॥
नित्यसंस्कृतमन्नं तु विविधं राजवेश्मनि ।
शयनानि च मुख्यानि परिषेकाश्च पुष्कलाः ॥ २५ ॥
प्रतिदिन भाँति - भाँतिका भोजन तैयार करके राजभवनमें मुनिके लिये परोसा जाता, अच्छे - अच्छे पलंग बिछाये जाते तथा स्नानके लिये बहुत - से पात्र रखे जाते थे ॥ २५ ॥
वस्त्रं च विविधाकारमभवत् समुपार्जितम् ।
न शशाक ततो द्रष्टुमन्तरं च्यवनस्तदा ॥ २६ ॥
पुनरेव च विप्रर्षिः प्रोवाच कुशिकं नृपम् ।
सभार्यो मां रथेनाशु वह यत्र ब्रवीम्यहम् ॥ २७ ॥
अनेक प्रकारके वस्त्र ला- लाकर उनकी सेवामें समर्पित किये जाते थे । जब ब्रह्मर्षि च्यवन मुनि इन सब कार्योंमें कोई छिद्र न देख सके, तब फिर राजा कुशिकसे बोले — ' तुम स्त्रीसहित रथमें जुत जाओ और मैं जहाँ कहूँ, वहाँ मुझे शीघ्र ले चलो ' ॥ २६-२७ ॥
तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम् ।
क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत सांग्रामिको रथः ॥ २८ ॥
तब राजाने निःशंक होकर उन तपोधनसे कहा - ' बहुत अच्छा, भगवन्! क्रीड़ाका रथ तैयार किया जाय या युद्धके उपयोगमें आनेवाला रथ? ' ॥ २८ ॥
इत्युक्तः स मुनी राज्ञा तेन हृष्टेन तद्वचः ।
च्यवनः प्रत्युवाचेदं हृष्टः परपुरंजयम् ॥ २ ९ ॥
हर्षमें भरे हुए राजाके इस प्रकार पूछनेपर च्यवनमुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले उन नरेशसे कहा- ॥ २ ९ ॥
सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते सांग्रामिको मतः ।
सायुधः सपताकश्च शक्तीकनकयष्टिमान् ॥ ३० ॥
‘ राजन्! तुम्हारा जो युद्धोपयोगी रथ है, उसीको शीघ्र तैयार करो । उसमें नाना प्रकारके
अस्त्र- शस्त्र रखे रहें । पताका, शक्ति और सुवर्णदण्ड विद्यमान हों ॥ ३० ॥
किङ्किणीस्वननिर्घोषो युक्तस्तोरणकल्पनैः ।
जाम्बूनदनिबद्धश्च परमेषुशतान्वितः ॥ ३१ ॥
'उसमें लगी हुई छोटी- छोटी घंटियोंके मधुर शब्द सब ओर फैलते रहें । वह रथ वन्दनवारोंसे सजाया गया हो । उसके ऊपर जाम्बूनद नामक सुवर्ण जड़ा हुआ हो तथा