श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 531–540

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540

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उसमें अच्छे - अच्छे सैकड़ों बाण रखे गये हों' ॥ ३१ ॥

ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम् ।

भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ॥ ३२ ॥

तब राजा 'जो आज्ञा' कहकर गये और एक विशाल रथ तैयार करके ले आये । उसमें बायीं ओरका बोझ ढोनेके लिये रानीको लगाकर स्वयं वे दाहिनी ओर जुट गये ॥ ३२ ॥

त्रिदण्डं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् ।

सर्वमेतत् तथा दत्त्वा नृपो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३३ ॥

उस रथपर उन्होंने एक ऐसा चाबुक भी रख दिया, जिसमें आगेकी ओर तीन दण्ड थे और जिसका अग्रभाग सूईकी नोंकके समान तीखा था । यह सब सामान प्रस्तुत करके राजाने पूछा— ॥ ३३ ॥

भगवन् क्व रथो यातु ब्रवीतु भृगुनन्दन ।

यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ॥ ३४ ॥

‘ भगवन्! भृगुनन्दन! बताइये, यह रथ कहाँ जाय? ब्रह्मर्षे! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपका रथ चलेगा ' ॥ ३४ ॥

एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाचाथ तं नृपम् ।

इतः प्रभृति यातव्यं पदकं पदकं शनैः ॥ ३५ ॥

श्रमो मम यथा न स्यात् तथा मच्छन्दचारिणौ ।

सुसुखं चैव वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ॥ ३६ ॥

राजाके ऐसा पूछनेपर भगवान् च्यवन मुनिने उनसे कहा - ' यहाँसे तुम बहुत धीरे- धीरे एक- एक कदम उठाकर चलो । यह ध्यान रखो कि मुझे कष्ट न होने पाये । तुम दोनोंको मेरी मर्जीके अनुसार चलना होगा । तुमलोग इस प्रकार इस रथको ले चलो जिससे मुझे अधिक आराम मिले और सब लोग देखें ॥ ३५-३६ ॥

नोत्सार्याः पथिकाः केचित् तेभ्यो दास्ये वसु ह्यहम् ।

ब्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि ॥ ३७ ॥

‘ रास्तेसे किसी राहगीरको हटाना नहीं चाहिये, मैं उन सबको धन दूँगा । मार्गमें जो ब्राह्मण मुझसे जिस वस्तुकी प्रार्थना करेंगे मैं उनको वही वस्तु प्रदान करूँगा ॥ ३७ ॥

सर्वान् दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि ।

क्रियतां निखिलेनैतन्मा विचारय पार्थिव ॥ ३८ ॥

‘ मैं सबको उनकी इच्छाके अनुसार धन और रत्न बाँहूँगा। अतः इन सबके लिये पूरा-पूरा प्रबन्ध कर लो । पृथ्वीनाथ! इसके लिये मनमें कोई विचार न करो ' ॥ ३८ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा भृत्यांस्तथाब्रवीत् ।

यद् यद् ब्रूयान्मुनिस्तत्तत् सर्वं देयमशङ्कितैः ॥ ३ ९ ॥

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मुनिका यह वचन सुनकर राजाने अपने सेवकोंसे कहा – ' ये मुनि जिस-जिस वस्तुके लिये आज्ञा दें, वह सब निःशंक होकर देना' ॥ ३ ९ ॥

ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रियो युग्यमजाविकम् ।

कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चाचलोपमाः ॥ ४० ॥

अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्च सर्वशः ।

हाहाभूतं च तत् सर्वमासीन्नगरमार्तवत् ॥ ४१ ॥

राजाकी इस आज्ञाके अनुसार नाना प्रकारके रत्न, स्त्रियाँ, वाहन, बकरे, भेड़ें, सोनेके अलंकार, सोना और पर्वतोपम गजराज – ये सब मुनिके पीछे -पीछे चले । राजाके सम्पूर्ण मन्त्री भी इन वस्तुओंके साथ थे । उस समय सारा नगर आर्त होकर हाहाकार कर रहा था ॥ ४०-४१ ॥

तौ तीक्ष्णाग्रेण सहसा प्रतोदेन प्रतोदितौ ।

पृष्ठे विद्धौ कटे चैव निर्विकारौ तमूहतुः ॥ ४२ ॥

इतनेहीमें मुनिने सहसा चाबुक उठाया और उन दोनोंकी पीठपर जोरसे प्रहार किया । उस चाबुकका अग्रभाग बड़ा तीखा था । उसकी करारी चोट पड़ते ही राजा - रानीकी पीठ

और कमरमें घाव हो गया । फिर भी वे निर्विकारभावसे रथ ढोते रहे ॥ ४२ ॥

वेपमानौ निराहारौ पञ्चाशद्रात्रकर्षितौ ।

कथंचिदूहतुर्वीरौ दम्पती तं रथोत्तमम् ॥ ४३ ॥

पचास राततक उपवास करनेके कारण वे बहुत दुबले हो गये थे, उनका सारा शरीर काँप रहा था; तथापि वे वीर दम्पति किसी प्रकार साहस करके उस विशाल रथका बोझ ढो रहे थे ॥ ४३ ॥

बहुशो भृशविद्धौ तौ स्रवन्तौ च क्षतोद्भवम् ।

ददृशाते महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ४४ ॥

महाराज! वे दोनों बहुत घायल हो गये थे । उनकी पीठपर जो अनेक घाव हो गये थे, उनसे रक्त बह रहा था । खूनसे लथपथ होनेके कारण वे खिले हुए पलाशके फूलोंके समान दिखायी देते थे ॥ ४४ ॥

तौ दृष्ट्वा पौरवर्गस्तु भृशं शोकसमाकुलः ।

अभिशापभयत्रस्तो न च किंचिदुवाच ह ॥ ४५ ॥

पुरवासियोंका समुदाय उन दोनोंकी यह दुर्दशा देखकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा था। सब लोग मुनिके शापसे डरते थे; इसलिये कोई कुछ बोल नहीं रहा था ॥ ४५ ॥

द्वन्द्वशश्चाब्रुवन् सर्वे पश्यध्वं तपसो बलम् ।

क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठं वीक्षितुं नेह शक्नुमः ॥ ४६ ॥

दो - दो आदमी अलग- अलग खड़े होकर आपसमें कहने लगे – ' भाइयो! सब लोग मुनिकी तपस्याका बल तो देखो, हमलोग क्रोधमें भरे हुए हैं तो भी मुनिश्रेष्ठकी ओर यहाँ

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आँख उठाकर देख भी नहीं सकते ॥ ४६ ॥

अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनः ।

राज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम् ॥ ४७ ॥

‘ इन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि भगवान् च्यवनकी तपस्याका बल अद्भुत है । तथा

महाराज और महारानीका धैर्य भी कैसा अनूठा है । यह अपनी आँखों देख लो ॥ ४७ ॥

श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेनं समूहतुः ।

न चैतयोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ॥ ४८ ॥

‘ ये इतने थके होनेपर भी कष्ट उठाकर इस रथको खींचे जा रहे हैं । भृगुनन्दन च्यवन अभीतक इनमें कोई विकार नहीं देख सके हैं ' ॥ ४८ ॥

भीष्म उवाच

ततः स निर्विकारौ तु दृष्ट्वा भृगुकुलोद्वहः ।

वसु विश्राणयामास यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ४ ९ ॥

भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! भृगुकुलशिरोमणि मुनिवर च्यवनने जब इतनेपर भी राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा तब वे कुबेरकी तरह उनका सारा धन लुटाने लगे ॥ ४ ९ ॥

तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथादिष्टमथाकरोत् ।

ततोऽस्य भगवान् प्रीतो बभूव मुनिसत्तमः ॥ ५० ॥

परंतु इस कार्यमें भी राजा कुशिक बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋषिकी आज्ञाका पालन करने लगे । इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन बहुत संतुष्ट हुए ॥ ५० ॥

अवतीर्य रथश्रेष्ठाद् दम्पती तौ मुमोच ह ।

विमोच्य चैतौ विधिवत् ततो वाक्यमुवाच ह ॥ ५१ ॥

उस उत्तम रथसे उतरकर उन्होंने दोनों पति- पत्नीको भार ढोनेके कार्यसे मुक्त कर दिया । मुक्त करके इन दोनोंसे विधिपूर्वक वार्तालाप किया ॥ ५१ ॥

स्निग्धगम्भीरया वाचा भार्गवः सुप्रसन्नया ।

ददानि वां वरं श्रेष्ठं तं ब्रूतामिति भारत ॥ ५२ ॥

भारत! भृगुपुत्र च्यवन उस समय स्नेह और प्रसन्नतासे युक्त गम्भीर वाणीमें बोले — ' मैं तुम दोनोंको उत्तम वर देना चाहता हूँ, बतलाओ क्या दूँ? ' ॥ ५२ ॥

सुकुमारौ च तौ विद्धौ कराभ्यां मुनिसत्तमः ।

पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद् भरतसत्तम ॥ ५३ ॥

भरतभूषण! यह कहते - कहते मुनिश्रेष्ठ च्यवन चाबुकसे घायल हुए उन दोनों सुकुमार राजदम्पतिकी पीठपर स्नेहवश अमृतके समान कोमल हाथ फेरने लगे ॥ ५३ ॥

अथाब्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावयोरिह ।

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विश्रान्तौ च प्रभावात् ते ऊचतुस्तौ तु भार्गवम् ॥ ५४ ॥

अथ तौ भगवान् प्राह प्रहृष्टश्यवनस्तदा ।

न वृथा व्याहृतं पूर्वं यन्मया तद् भविष्यति ॥ ५५ ॥

उस समय राजाने भृगुपुत्र च्यवनसे कहा - ' अब हम दोनोंको यहाँ तनिक भी थकावटका अनुभव नहीं हो रहा है । हम दोनों आपके प्रभावसे पूर्ण विश्राम- सुखका अनुभव करने लगे हैं । ' जब दोनोंने इस प्रकार कहा, तब भगवान् च्यवन पुनः हर्षमें भरकर बोले — ‘ मैंने पहले जो कुछ कहा है, वह व्यर्थ नहीं होगा, पूर्ण होकर ही रहेगा ॥ ५४-५५ ॥

रमणीयः समुद्देशो गंगातीरमिदं शुभम् ।

किंचित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव ॥ ५६ ॥

' पृथ्वीनाथ! यह गंगाका सुन्दर तट बड़ा ही रमणीय स्थान है। मैं कुछ कालतक व्रतपरायण होकर यहीं रहूँगा ॥ ५६ ॥

गम्यतां स्वपुरं पुत्र विश्रान्तः पुनरेष्यसि ।

इहस्थं मां सभार्यस्त्वं द्रष्टासि श्वो नराधिप ॥ ५७ ॥

' बेटा! इस समय तुम अपने नगरमें जाओ और अपनी थकावट दूर करके कल सबेरे अपनी पत्नीके साथ फिर यहाँ आना । नरेश्वर! कल पत्नीसहित तुम मुझे यहीं देखोगे ॥ ५७ ॥

न च मन्युस्त्वया कार्यः श्रेयस्ते समुपस्थितम् ।

यत् काङ्क्षितं ह्यदिस्थं ते तत् सर्वं हि भविष्यति ॥ ५८ ॥

' तुम्हें अपने मनमें खेद नहीं करना चाहिये । अब तुम्हारे कल्याणका समय उपस्थित हुआ है । तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा होगी वह सब पूर्ण हो जायगी' ॥ ५८ ॥

इत्येवमुक्तः कुशिकः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।

प्रोवाच मुनिशार्दूलमिदं वचनमर्थवत् ॥ ५ ९ ॥

मन्युर्महाभाग पूतौ स्वो भगवंस्त्वया ।

संवृतौ यौवनस्थौ स्वो वपुष्मन्तौ बलान्वितौ ॥ ६० ॥

मुनिके ऐसा कहनेपर राजा कुशिकने मन - ही - मन अत्यन्त प्रसन्न होकर उन मुनिश्रेष्ठसे यह अर्थयुक्त वचन कहा –' भगवन्! महाभाग! आपने हमलोगोंको पवित्र कर दिया । हमारे मनमें तनिक भी खेद या रोष नहीं है । हम दोनोंकी तरुण अवस्था हो गयी तथा हमारा शरीर सुन्दर और बलवान् हो गया ॥ ५ ९ -६० ॥

प्रतोदेन व्रणा ये मे सभार्यस्य त्वया कृताः ।

तान् न पश्यामि गात्रेषु स्वस्थोऽस्मि सह भार्यया ॥ ६१ ॥

‘ आपने पत्नीसहित मेरे शरीरपर चाबुक मार- मारकर जो घावकर दिये थे, उन्हें भी अब

मैं अपने अंगोंमें नहीं देख रहा हूँ। मैं पत्नीसहित पूर्ण स्वस्थ हूँ ॥ ६१ ॥

इमां च देवीं पश्यामि वपुषाप्सरसोपमाम् ।

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श्रिया परमया युक्तां यथा दृष्टा पुरा मया ॥ ६२ ॥

‘ मैं अपनी इन महारानीको परम उत्तम कान्तिसे युक्त तथा अप्सराके समान मनोहर देख रहा हूँ । ये पहले मुझे जैसी दिखायी देती थीं वैसी ही हो गयी हैं ॥ ६२ ॥

तव प्रसादसंवृत्तमिदं सर्वं महामुने ।

नैतच्चित्रं तु भगवंस्त्वयि सत्यपराक्रम ॥ ६३ ॥

‘ महामुने! यह सब आपके कृपाप्रसादसे सम्भव हुआ है। भगवन्! आप सत्यपराक्रमी हैं । आप - जैसे तपस्वियोंमें ऐसी शक्तिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है' ॥ ६३ ॥

इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं कुशिकं च्यवनस्तदा ।

आगच्छेथाः सभार्यश्च त्वमिहेति नराधिप ॥ ६४ ॥

उनके ऐसा कहनेपर मुनिवर च्यवन पुनः राजा कुशिकसे बोले– ' नरेश्वर! तुम पुनः अपनी पत्नीके साथ कल यहाँ आना ' ॥ ६४ ॥

इत्युक्तः समनुज्ञातो राजर्षिरभिवाद्य तम् ।

प्रययौ वपुषा युक्तो नगरं देवराजवत् ॥ ६५ ॥

महर्षिकी यह आज्ञा पाकर राजर्षि कुशिक उन्हें प्रणाम करके विदा ले देवराजके समान तेजस्वी शरीरसे युक्त हो अपने नगरकी ओर चल दिये ॥ ६५ ॥

तत एनमुपाजग्मुरमात्याः सपुरोहिताः ।

बलस्था गणिकायुक्ताः सर्वाः प्रकृतयस्तथा ॥ ६६ ॥

तदनन्तर उनके पीछे - पीछे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, नर्तकियाँ तथा समस्त प्रजावर्गके लोग चले ॥ ६६ ॥

तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिया परमया ज्वलन् ।

प्रविवेश पुरं हृष्टः पूज्यमानोऽथ बन्दिभिः ॥ ६७ ॥

उनसे घिरे हुए राजा कुशिक उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहे थे । उन्होंने बड़े हर्षके साथ

नगरमें प्रवेश किया । उस समय वन्दीजन उनके गुण गा रहे थे ॥ ६७ ॥

ततः प्रविश्य नगरं कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः ।

भुक्त्वा सभार्यो रजनीमुवास स महाद्युतिः ॥ ६८ ॥

नगरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्णकालकी सम्पूर्ण क्रियाएँ सम्पन्न कीं । फिर पत्नीसहित भोजन करके उन महातेजस्वी नरेशने रातको महलमें निवास किया ॥ ६८ ॥

ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवनं परस्परं विगतरुजाविवामरौ । ननन्दतुः शयनगतौ वपुर्धरौ श्रिया युतौ द्विजवरदत्तया तदा ॥ ६ ९ ॥ वे दोनों पति- पत्नी नीरोग देवताओंके समान दिखायी देते थे । वे एक दूसरेके शरीरमें नयी जवानीका प्रवेश हुआ देखकर शय्यापर सोये - सोये बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे ।

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द्विजश्रेष्ठ च्यवनकी दी हुई उत्तम शोभासे सम्पन्न नूतन शरीर धारण किये वे दोनों दम्पति बहुत प्रसन्न थे ॥ ६ ९ ॥ अथाप्यृषिर्भृगुकुलकीर्तिवर्धन- स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत् । मनीषया बहुविधरत्नभूषितं ससर्ज यन्न पुरि शतक्रतोरपि ॥ ७० ॥

इधर भृगुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले, तपस्याके धनी महर्षि च्यवनने गंगातटके तपोवनको अपने संकल्पद्वारा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित करके समृद्धिशाली एवं नयनाभिराम बना दिया । वैसा कमनीय कानन इन्द्रपुरी अमरावतीमें भी नहीं था ॥ ७० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

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चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना भीष्म उवाच

ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामनाः ।

कृतपूर्वाह्निकः प्रायात् सभार्यस्तद् वनं प्रति ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तत्पश्चात् रात्रि व्यतीत होनेपर महामना राजा कुशिक जागे और पूर्वाह्णकालके नैत्यिक नियमोंसे निवृत्त होकर अपनी रानीके साथ उस तपोवनकी ओर चल दिये ॥ १ ॥

ततो ददर्श नृपतिः प्रासादं सर्वकाञ्चनम् ।

मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ २ ॥

वहाँ पहुँचकर नरेशने एक सुन्दर महल देखा, जो सारा का सारा सोनेका बना हुआ था । उसमें मणियोंके हजारों खम्भे लगे हुए थे और वह अपनी शोभासे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥

तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा ।

पर्वतान् रूप्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजाः ॥ ३ ॥

चित्रशालाश्च विविधास्तोरणानि च भारत ।

शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम् ॥ ४ ॥

भारत! उस समय राजा कुशिकने वहाँ शिल्पियोंके अभिप्रायके अनुसार निर्मित और भी बहुत - से दिव्य पदार्थ देखे । कहीं चाँदीके शिखरोंसे सुशोभित पर्वत, कहीं कमलोंसे भरे सरोवर, कहीं भाँति - भाँतिकी चित्रशालाएँ तथा तोरण शोभा पा रहे थे । भूमिपर कहीं सोनेसे मढ़ा हुआ पक्का फर्श और कहीं हरी - हरी घासकी बहार थी ॥

सहकारान् प्रफुल्लांश्च केतकोद्दालकान् वरान् ।

अशोकान् सहकुन्दांश्च फुल्लांश्चैवातिमुक्तकान् ॥ ५ ॥

चम्पकांस्तिलकान् भव्यान् पनसान् वञ्जुलानपि ।

पुष्पितान् कर्णिकारांश्च तत्र तत्र ददर्श ह ॥ ६ ॥

अमराइयोंमें बौर लगे थे । जहाँ- तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे । राजा और रानीने उन सबको देखा ॥ ५-६ ॥

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श्यामान् वारणपुष्पांश्च तथाष्टपदिका लताः ।

तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपतिः ॥ ७ ॥

राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया ॥ ७ ॥

रम्यान् पद्मोत्यलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा ।

विमानप्रतिमांश्चापि प्रासादान् शैलसंनिभान् ॥ ८ ॥

कहीं कमल और उत्पलसे भरे हुए रमणीय सरोवर शोभा पाते थे । कहीं पर्वत- सदृश ऊँचे - ऊँचे महल दिखायी देते थे जो विमानके आकारमें बने हुए थे । वहाँ सभी ऋतुओंके फूल खिले हुए थे ॥ ८ ॥

शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत ।

आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च ॥ ९ ॥

भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं ॥ ९ ॥

पर्यङ्कान् रत्नसौवर्णान् परार्ध्यास्तरणावृतान् ।

भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम् ॥ १० ॥

सोनेके बने हुए रत्नजटित पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे । विभिन्न स्थानोंमें अनन्त भक्ष्य, भोज्य पदार्थ रखे गये थे ॥ १० ॥

वाणीवादान् शुकांश्चैव सारिकान् भृंगराजकान् ।

कोकिलान् शतपत्रांश्च सकोयष्टिककुक्कुभान् ॥ ११ ॥

मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहान् जीवजीवकान् ।

चकोरान् वानरान् हंसान् सारसांश्चक्रसाह्वयान् ॥ १२ ॥

समन्ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी- सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं । भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु- पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं ॥ ११-१२ ॥ क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव ॥ १३ ॥

कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह ।

न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नृपः ॥ १४ ॥

पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड- की- झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं । कहीं गन्धर्वोंके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन- पाशमें बँधे हुए थे । उन सबको राजाने देखा । वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे ॥ १३-१४ ॥ गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् ।

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हंसान् सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिवः ॥ १५ ॥

राजा कभी संगीतकी मधुर ध्वनि सुनते, कभी वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष उनके कानोंमें पड़ता और कभी हंसोंकी मीठी वाणी उन्हें सुनायी देती थी ॥ १५ ॥

तं दृष्ट्वात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा ।

स्वप्नोऽयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु ॥ १६ ॥

उस अति अद्भुत दृश्यको देखकर राजा मन-ही-मन सोचने लगे – ' अहो! यह स्वप्न है या मेरे चित्तमें भ्रम हो गया है अथवा यह सब कुछ सत्य ही है ॥ १६ ॥

अहो सह शरीरेण प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् ।

उत्तरान् वा कुरून् पुण्यानथवाप्यमरावतीम् ॥ १७ ॥

‘ अहो! क्या मैं इसी शरीरसे परम गतिको प्राप्त हो गया हूँ अथवा पुण्यमय उत्तरकुरु या अमरावतीपुरीमें - आ पहुँचा हूँ ॥ १७ ॥

किंचेदं महदाश्चर्यं सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् ।

एवं संचिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुंगवम् ॥ १८ ॥

‘ यह महान् आश्चर्यकी बात जो मुझे दिखायी दे रही है, क्या है? ' इस तरह वे बारंबार विचार करने लगे । राजा इस प्रकार सोच ही रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिप्रवर च्यवनपर पड़ी ॥ १८ ॥

तस्मिन् विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले ।

महार्हे शयने दिव्ये शयानं भृगुनन्दनम् ॥ १ ९ ॥

मणिमय खम्भोंसे युक्त सुवर्णमय विमानके भीतर बहुमूल्य दिव्य पर्यंकपर वे भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे ॥

तमभ्ययात् प्रहर्षेण नरेन्द्रः सह भार्यया ।

अन्तर्हितस्ततो भूयश्च्यवनः शयनं च तत् ॥ २० ॥

उन्हें देखते ही पत्नीसहित महाराज कुशिक बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े । इतनेहीमें फिर

महर्षि च्यवन अन्तर्धान हो गये । साथ ही उनका वह पलंग भी अदृश्य हो गया ॥ २० ॥

ततोऽन्यस्मिन् वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् ।

कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम् ॥ २१ ॥

तदनन्तर वनके दूसरे प्रदेशमें राजाने फिर उन्हें देखा, उस समय वे महान् व्रतधारी महर्षि कुशकी चटाईपर बैठकर जप कर रहे थे ॥ २१ ॥

एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम् ।

क्षणेन तद् वनं चैव ते चैवाप्सरसां गणाः ॥ २२ ॥

गन्धर्वाः पादपाश्चैव सर्वमन्तरधीयत ।

निःशब्दमभवच्चापि गंगाकूलं पुनर्नृप ॥ २३ ॥

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इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवनने अपनी योगशक्तिसे राजा कुशिकको मोहमें डाल दिया । एक ही क्षणमें वह वन, वे अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व और वृक्ष सब- के - सब अदृश्य हो गये । नरेश्वर! गंगाका वह तट पुनः शब्द- रहित हो गया ॥ २२-२३ ॥

कुशवल्मीकभूयिष्ठं बभूव च यथा पुरा ।

ततः स राजा कुशिकः सभार्यस्तेन कर्मणा ॥ २४ ॥

विस्मयं परमं प्राप्तस्तद् दृष्ट्वा महदद्भुतम् ।

ततः प्रोवाच कुशिको भार्यां हर्षसमन्वितः ॥ २५ ॥

वहाँ पहलेके ही समान कुश और बाँबीकी अधिकता हो गयी । तत्पश्चात् पत्नीसहित राजा कुशिक ऋषिका वह महान् अद्भुत प्रभाव देखकर उनके उस कार्यसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए । इसके बाद हर्षमग्न हुए कुशिकने अपनी पत्नीसे कहा- ॥ २४-२५ ॥

पश्य भद्रे यथा भावाश्चित्रा दृष्टाः सुदुर्लभाः ।

प्रसादाद् भृगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोबलात् ॥ २६ ॥

‘ कल्याणी! देखो, हमने भृगुकुलतिलक च्यवन मुनिकी कृपासे कैसे - कैसे अद्भुत और

परम दुर्लभ पदार्थ देखे हैं । भला, तपोबलसे बढ़कर और कौन -सा बल है? ॥

तपसा तदवाप्यं हि यत् तु शक्यं मनोरथैः ।

त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते ॥ २७ ॥

‘जिसकी मनके द्वारा कल्पना मात्र की जा सकती है, वह वस्तु तपस्यासे साक्षात् सुलभ हो जाती है । त्रिलोकीके राज्यसे भी तप ही श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥

तपसा हि सुतप्तेन शक्यो मोक्षस्तपोबलात् ।

अहो प्रभावो ब्रह्मर्षेश्यवनस्य महात्मनः ॥ २८ ॥

‘ अच्छी तरह तपस्या करनेपर उसकी शक्तिसे मोक्षतक मिल सकता है । इन ब्रह्मर्षि महात्मा च्यवनका प्रभाव अद्भुत है ॥ २८ ॥

इच्छयैष तपोवीर्यादन्याँल्लोकान् सृजेदपि ।

ब्राह्मणा एव जायेरन् पुण्यवाग्बुद्धिकर्मणः ॥ २ ९ ॥

‘ ये इच्छा करते ही अपनी तपस्याकी शक्तिसे दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं । इस पृथ्वीपर ब्राह्मण ही पवित्रवाक्, पवित्रबुद्धि और पवित्र कर्मवाले होते हैं ॥

उत्सहेदिह कृत्वैव कोऽन्यो वै च्यवनादृते ।

ब्राह्मण्यं दुर्लभं लोके राज्यं हि सुलभं नरैः ॥ ३० ॥

' महर्षि च्यवनके सिवा दूसरा कौन है, जो ऐसा महान् कार्य कर सके? संसारमें मनुष्योंको राज्य तो सुलभ हो सकता है, परंतु वास्तविक ब्राह्मणत्व परम दुर्लभ है ॥ ३० ॥

ब्राह्मण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् ।

इत्येवं चिन्तयानः स विदितश्च्यवनस्य वै ॥ ३१ ॥