06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 61–70
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70
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गीताप्रेस गोरखपुर शिव- पार्वती
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pary गीताप्रेस, गोरखपुर अर्जुनका भगवान् श्रीकृष्णके साथ प्रश्नोत्तर
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गीताप्रेस गोरखपुर BieMike भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा उत्तराके मृत बालकको जिलानेकी प्रतिज्ञा
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गीताप्रेस गोरखपुर पार्वतीजी भगवान् शङ्करको शरीरधारिणी समस्त नदियोंका परिचय दे रही हैं
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220 गीताप्रेस गोरखपुर युधिष्ठिरका अपने आश्रित कुत्तेके लिये त्याग
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गीताप्रेस गोरखपुर पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु तां वव्रे भार्गवः श्रीमांश्च्यवनस्यात्मसम्भवः ।
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ऋचीक इति विख्यातो विपुले तपसि स्थितः ॥ ८ ॥
उन दिनों च्यवनके पुत्र भृगुवंशी श्रीमान् ऋचीक विख्यात तपस्वी थे और बड़ी भारी
तपस्यामें संलग्न रहते थे । उन्होंने राजा गाधिसे उस कन्याको माँगा ॥ ८ ॥
स तां न प्रददौ तस्मै ऋचीकाय महात्मने ।
दरिद्र इति मत्वा वै गाधिः शत्रुनिबर्हणः ॥ ९ ॥
शत्रुसूदन गाधिने महात्मा ऋचीकको दरिद्र समझकर उन्हें अपनी कन्या नहीं दी ॥ ९ ॥
प्रत्याख्याय पुनर्यातमब्रवीद् राजसत्तमः ।
शुल्कं प्रदीयतां मह्यं ततो वत्स्यसि मे सुताम् ॥ १० ॥
उनके इनकार कर देनेपर जब महर्षि लौटने लगे तब नृपश्रेष्ठ गाधिने उनसे कहा —' महर्षे! मुझे शुल्क दीजिये, तब आप मेरी पुत्रीको विवाहद्वारा प्राप्त कर सकेंगे' ॥ १० ॥
ऋचीक उवाच
किं प्रयच्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नृप ।
दुहितुर्ब्रह्यसंसक्तो माभूत् तत्र विचारणा ॥ ११ ॥
ऋचीकने पूछा – राजेन्द्र! मैं आपकी पुत्रीके लिये आपको क्या शुल्क दूँ? आप निस्संकोच होकर बताइये । नरेश्वर! इसमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
गाधिरुवाच
चन्द्ररश्मिप्रकाशानां हयानां वातरंहसाम् ।
एकतः श्यामकर्णानां सहस्रं देहि भार्गव ॥ १२ ॥
गाधिने कहा — भृगुनन्दन! आप मुझे शुल्करूपमें एक हजार ऐसे घोड़े ला दीजिये जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् और वायुके समान वेगवान् हों तथा जिनका एक - एक कान श्याम रंगका हो ॥ १२ ॥
भीष्म उवाच
ततः स भृगुशार्दूलश्च्यवनस्यात्मजः प्रभुः ।
अब्रवीद् वरुणं देवमादित्यं पतिमम्भसाम् ॥ १३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तब भृगुश्रेष्ठ च्यवनपुत्र शक्तिशाली महर्षि ऋचीकने जलके स्वामी अदितिनन्दन वरुणदेवके पास जाकर कहा- ॥ १३ ॥
एकतः श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् ।
सहस्रं वातवेगानां भिक्षे त्वां देवसत्तम ॥ १४ ॥
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‘ देवशिरोमणे! मैं आपसे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् तथा वायुके समान वेगवान् एक हजार ऐसे घोड़ोंकी भिक्षा माँगता हूँ जिनका एक ओरका कान श्याम रंगका हो ' ॥ १४ ॥
तथेति वरुणो देव आदित्यो भृगुसत्तमम् ।
उवाच यत्र ते छन्दस्तत्रोत्थास्यन्ति वाजिनः ॥ १५ ॥
तब अदितिनन्दन वरुणदेवने उन भृगुश्रेष्ठ ऋचीकसे कहा- बहुत अच्छा, जहाँ आपकी इच्छा होगी, वहींसे इस तरहके घोड़े प्रकट हो जायँगे' ॥ १५ ॥
ध्यातमात्रमृचीकेन हयानां चन्द्रवर्चसाम् ।
गङ्गाजलात् समुत्तस्थौ सहस्रं विपुलौजसाम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर ऋचीकके चिन्तन करते ही गंगाजीके जलसे चन्द्रमाके समान कान्तिवाले एक हजार तेजस्वी घोड़े प्रकट हो गये ॥ १६ ॥
अदूरे कान्यकुब्जस्य गङ्गायास्तीरमुत्तमम् ।
अश्वतीर्थं तदद्यापि मानवैः परिचक्ष्यते ॥ १७ ॥
कन्नौजके पास ही गंगाजीका वह उत्तम तट आज भी मानवोंद्वारा अश्वतीर्थ कहलाता है ॥ १७ ॥
ततो वै गाधये तात सहस्रं वाजिनां शुभम् ।
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ऋचीकः प्रददौ प्रीतः शुल्कार्थं तपतां वरः ॥ १८ ॥
तात! तब तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ऋचीक मुनिने प्रसन्न होकर शुल्कके लिये राजा गाधिको वे एक हजार सुन्दर घोड़े दे दिये ॥ १८ ॥
ततः स विस्मितो राजा गाधिः शापभयेन च ।
ददौ तां समलंकृत्य कन्यां भृगुसुताय वै ॥ १ ९ ॥
तब आश्चर्यचकित हुए राजा गाधिने शापके भयसे डरकर अपनी कन्याको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके भृगुनन्दन ऋचीकको दे दिया ॥ १ ९ ॥
जग्राह विधिवत् पाणिं तस्या ब्रह्मर्षिसत्तमः ।
सा च तं पतिमासाद्य परं हर्षमवाप ह ॥ २० ॥
ब्रह्मर्षिशिरोमणि ऋचीकने उसका विधिवत् पाणिग्रहण किया । वैसे तेजस्वी पतिको पाकर उस कन्याको भी बड़ा हर्ष हुआ ॥ २० ॥
सतुतोष च ब्रह्मर्षिस्तस्या वृत्तेन भारत ।
छन्दयामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम् ॥ २१ ॥
भरतनन्दन! अपनी पत्नीके सद्व्यवहारसे ब्रह्मर्षि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उस परम सुन्दरी पत्नीको मनोवांछित वर देनेकी इच्छा प्रकट की ॥ २१ ॥
मात्रे तत् सर्वमाचख्यौ सा कन्या राजसत्तम ।
अथ तामब्रवीन्माता सुतां किंचिदवाङ्मुखी ॥ २२ ॥
नृपश्रेष्ठ! तब उस राजकन्याने अपनी मातासे मुनिकी कही हुई सब बातें बतायीं । वह सुनकर उसकी माताने संकोचसे सिर नीचे करके पुत्रीसे कहा- ॥ २२ ॥
ममापि पुत्रि भर्ता ते प्रसादं कर्तुमर्हति ।
अपत्यस्य प्रदानेन समर्थश्च महातपाः ॥ २३ ॥
' बेटी! तुम्हारे पतिको पुत्र प्रदान करनेके लिये मुझपर भी कृपा करनी चाहिये, क्योंकि वे महान् तपस्वी और समर्थ हैं ' ॥ २३ ॥
ततः सा त्वरितं गत्वा तत् सर्वं प्रत्यवेदयत् ।
मातुश्चिकीर्षितं राजनृचीकस्तामथाब्रवीत् ॥ २४ ॥
राजन्! तदनन्तर सत्यवतीने तुरंत जाकर माताकी वह सारी इच्छा ऋचीकसे निवेदन की । तब ऋचीकने उससे कहा- ॥ २४ ॥
गुणवन्तमपत्यं सा अचिराज्जनयिष्यति ।
मम प्रसादात् कल्याणि माभूत् ते प्रणयोऽन्यथा ॥ २५ ॥
‘ कल्याणि! मेरे प्रसादसे तुम्हारी माता शीघ्र ही गुणवान् पुत्रको जन्म देगी । तुम्हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा ॥ २५ ॥
तव चैव गुणश्लाघी पुत्र उत्पत्स्यते महान् ।
अस्मद्वंशकरः श्रीमान् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २६ ॥
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' तुम्हारे गर्भसे भी एक अत्यन्त गुणवान् और महान् तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा, जो
हमारी वंशपरम्पराको चलायेगा । मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ २६ ॥
ऋतुस्नाता च साश्वत्थं त्वं च वृक्षमुदुम्बरम् ।
परिष्वजेथाः कल्याणि तत एवमवाप्स्यथः ॥ २७ ॥
‘ कल्याणि! तुम्हारी माता ऋतुस्नानके पश्चात् पीपलके वृक्षका आलिंगन करे और तुम गूलरके वृक्षका । इससे तुम दोनोंको अभीष्ट पुत्रकी प्राप्ति होगी ' ॥ २७ ॥
चरुद्वयमिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते ।
त्वं च सा चोपभुञ्जीतं ततः पुत्राववाप्स्यथः ॥ २८ ॥
‘पवित्र मुसकानवाली देवि! मैंने ये दो मन्त्रपूत चरु तैयार किये हैं । इनमेंसे एकको तुम
खा लो और दूसरेको तुम्हारी माता । इससे तुम दोनोंको पुत्र प्राप्त होंगे' ॥ २८ ॥
ततः सत्यवती हृष्टा मातरं प्रत्यभाषत ।
यदृचीकेन कथितं तच्चाचख्यौ चरुद्वयम् ॥ २ ९ ॥
तब सत्यवतीने हर्षमग्न होकर ऋचीकने जो कुछ कहा था, वह सब अपनी माताको बताया और दोनोंके लिये तैयार किये हुए पृथक् - पृथक् चरुओंकी भी चर्चा की ॥ २ ९ ॥
तामुवाच ततो माता सुतां सत्यवतीं तदा ।
पुत्रि पूर्वोपपन्नायाः कुरुष्व वचनं मम ॥ ३० ॥
उस समय माताने अपनी पुत्री सत्यवतीसे कहा - ' बेटी! माता होनेके कारण पहलेसे मेरा तुमपर अधिकार है; अतः तुम मेरी बात मानो ' ॥ ३० ॥
भर्त्रा य एष दत्तस्ते चरुर्मन्त्रपुरस्कृतः ।
एनं प्रयच्छ मह्यं त्वं मदीयं त्वं गृहाण च ॥ ३१ ॥
' तुम्हारे पतिने जो मन्त्रपूत चरु तुम्हारे लिये दिया है, वह तुम मुझे दे दो और मेरा चरु तुम ले लो ॥ ३१ ॥
व्यत्यासं वृक्षयोश्चापि करवाव शुचिस्मिते ।
यदि प्रमाणं वचनं मम मातुरनिन्दिते ॥ ३२ ॥
‘ पवित्र हास्यवाली मेरी अच्छी बेटी! यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो हमलोग वृक्षोंमें भी अदल- बदल कर लें ' ॥ ३२ ॥
स्वमपत्यं विशिष्टं हि सर्व इच्छत्यनाविलम् ।
व्यक्तं भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति ॥ ३३ ॥
‘ प्रायः सभी लोग अपने लिये निर्मल एवं सर्वगुणसम्पन्न श्रेष्ठ पुत्रकी इच्छा करते हैं । अवश्य ही भगवान् ऋचीकने भी चरु निर्माण करते समय ऐसा तारतम्य रखा होगा ॥ ३३ ॥
ततो मे त्वच्चरौ भावः पादपे च सुमध्यमे ।
कथं विशिष्टो भ्राता मे भवेदित्येव चिन्तय ॥ ३४ ॥