श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 71–80
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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‘ सुमध्यमे! इसीलिये तुम्हारे लिये नियत किये गये चरु और वृक्षमें मेरा अनुराग हुआ है । तुम भी यही चिन्तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो ' ॥ ३४ ॥
तथा च कृतवत्यौ ते माता सत्यवती च सा ।
अथ गर्भावनुप्राप्ते उभे ते वै युधिष्ठिर ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिर! इस तरह सलाह करके सत्यवती और उसकी माताने उसी तरह उन दोनों
वस्तुओंका अदल - बदलकर उपयोग किया । फिर तो वे दोनों गर्भवती हो गयीं ॥ ३५ ॥
दृष्ट्वा गर्भमनुप्राप्तां भार्यां स च महानृषिः ।
उवाच तां सत्यवतीं दुर्मना भृगुसत्तमः ॥ ३६ ॥
अपनी पत्नी सत्यवतीको गर्भवती अवस्थामें देखकर भृगुश्रेष्ठ महर्षि ऋचीकका मन खिन्न हो गया ॥
व्यत्यासेनोपयुक्तस्ते चरुर्व्यक्तं भविष्यति ।
व्यत्यासः पादपे चापि सुव्यक्तं ते कृतः शुभे ॥ ३७ ॥
उन्होंने कहा – ' शुभे! जान पड़ता है तुमने बदलकर चरुका उपयोग किया है । इसी तरह तुमलोगोंने वृक्षोंके आलिंगनमें भी उलट- फेर कर दिया है - ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है ॥ ३७ ॥
मया हि विश्वं यद्ब्रह्म त्वच्चरौ संनिवेशितम् ।
क्षत्रवीर्यं च सकलं चरौ तस्या निवेशितम् ॥ ३८ ॥
' मैंने तुम्हारे चरुमें सम्पूर्ण ब्रह्मतेजका संनिवेश किया था और तुम्हारी माताके चरुमें समस्त क्षत्रियोचित शक्तिकी स्थापना की थी ' ॥ ३८ ॥
त्रैलोक्यविख्यातगुणं त्वं विप्रं जनयिष्यसि ।
सा च क्षत्रं विशिष्टं वै तत एतत् कृतं मया ॥ ३ ९ ॥
‘ मैंने सोचा था कि तुम त्रिभुवनमें विख्यात गुणवाले ब्राह्मणको जन्म दोगी और तुम्हारी माता सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकी जननी होगी । इसीलिये मैंने दो तरहके चरुओंका निर्माण किया था ॥ ३ ९ ॥
व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात् त्वया मात्रा च ते शुभे ।
तस्मात् सा ब्राह्मणं श्रेष्ठं माता ते जनयिष्यति ॥ ४० ॥
क्षत्रियं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनयिष्यसि ।
न हि ते तत् कृतं साधु मातृस्नेहेन भाविनि ॥ ४१ ॥
' शुभे! तुमने और तुम्हारी माताने अदला- बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रको जन्म देगी और भद्रे! तुम भयंकर कर्म करनेवाले क्षत्रियकी जननी होओगी । भाविनि! माताके स्नेहमें पड़कर तुमने यह अच्छा काम नहीं किया ' ॥ ४०-४१ ॥
सा श्रुत्वा शोकसंतप्ता पपात वरवर्णिनी ।
भूमौ सत्यवती राजन् छिन्नेव रुचिरा लता ॥ ४२ ॥
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राजन्! पतिकी यह बात सुनकर सुन्दरी सत्यवती शोकसे संतप्त हो वृक्षसे कटी हुई मनोहर लताके समान मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४२ ॥
प्रतिलभ्य च सा संज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च ।
उवाच भार्या भर्तारं गाधेयी भार्गवर्षभम् ॥ ४३ ॥
प्रसादयन्त्यां भार्यायां मयि ब्रह्मविदां वर ।
प्रसादं कुरु विप्रर्षे न मे स्यात् क्षत्रियः सुतः ॥ ४४ ॥
थोड़ी देरमें जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्वामी भृगुभूषण ऋचीकके चरणोंमें सिर रखकर प्रणामपूर्वक बोली– ' ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपसे कृपा- प्रसादकी भीख चाहती हूँ । आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भसे क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो ॥ ४३-४४ ॥
कामं ममोग्रकर्मा वै पौत्रो भवितुमर्हति ।
न तु मे स्यात् सुतो ब्रह्मन्नेष मे दीयतां वरः ॥ ४५ ॥
' मेरा पौत्र चाहे उग्रकर्मा क्षत्रियस्वभावका हो जाय; परंतु मेरा पुत्र वैसा न हो । ब्रह्मन्! मुझे यही वर दीजिये ' ॥ ४५ ॥
एवमस्त्विति होवाच स्वां भार्यां सुमहातपाः ।
ततः सा जनयामास जगदग्निं सुतं शुभम् ॥ ४६ ॥
तब उन महातपस्वी ऋषिने अपनी पत्नीसे कहा, ' अच्छा, ऐसा ही हो' । तदनन्तर सत्यवतीने जमदग्निनामक शुभगुणसम्पन्न पुत्रको जन्म दिया ॥ ४६ ॥
विश्वामित्रं चाजनयद् गाधिभार्या यशस्विनी ।
ऋषेः प्रसादाद् राजेन्द्र ब्रह्मर्षेर्ब्रह्मवादिनम् ॥ ४७ ॥
राजेन्द्र! उन्हीं ब्रह्मर्षिके कृपा-प्रसादसे गाधिकी यशस्विनी पत्नीने ब्रह्मवादी विश्वामित्रको उत्पन्न किया ॥
ततो ब्राह्मणतां यातो विश्वामित्रो महातपाः ।
क्षत्रियः सोऽप्यथ तथा ब्रह्मवंशस्य कारकः ॥ ४८ ॥
इसीलिये महातपस्वी विश्वामित्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो ब्राह्मणवंशके प्रवर्तक हुए ॥ ४८ ॥
तस्य पुत्रा महात्मानो ब्रह्मवंशविवर्धनाः ।
तपस्विनो ब्रह्मविदो गोत्रकर्तार एव च ॥ ४९ ॥
उन ब्रह्मवेत्ता तपस्वीके महामनस्वी पुत्र भी ब्राह्मणवंशकी वृद्धि करनेवाले और गोत्रकर्ता हुए ॥ ४ ९ ॥
मधुच्छन्दश्च भगवान् देवरातश्च वीर्यवान् ।
अक्षीणश्च शकुन्तश्च बभ्रुः कालपथस्तथा ॥ ५० ॥
याज्ञवल्क्यश्च विख्यातस्तथा स्थूणो महाव्रतः ।
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उलूको यमदूतश्च तथर्षिः सैन्धवायनः ॥ ५१ ॥
वल्गुजङ्घश्च भगवान् गालवश्च महानृषिः ।
ऋषिर्वज्रस्तथा ख्यातः सालंकायन एव च ॥ ५२ ॥
लीलाढ्यो नारदश्चैव तथा कूर्चामुखः स्मृतः ।
वादुलिर्मुसलश्चैव वक्षोग्रीवस्तथैव च ॥ ५३ ॥
आंघ्रिको नैकदृक् चैव शिलायूपः शितः शुचिः ।
चक्रको मारुतन्तव्यो वातघ्नोऽथाश्वलायनः ॥ ५४ ॥
श्यामायनोऽथ गार्ग्यश्च जाबालिः सुश्रुतस्तथा ।
कारीषिरथ संश्रुत्यः परपौरवतन्तवः ॥ ५५ ॥
महानृषिश्च कपिलस्तथर्षिस्ताडकायनः ।
तथैव चोपगहनस्तथर्षिश्चासुरायणः ॥ ५६ ॥
मार्दमर्षिर्हिरण्याक्षो जङ्गारिर्बाभ्रवायणिः ।
भूतिर्विभूतिः सूतश्च सुरकृत् तु तथैव च ॥ ५७ ॥
अरालिर्नाचिकश्चैव चाम्पेयोज्जयनौ तथा ।
नवतन्तुर्बकनखः सेयनो यतिरेव च ॥ ५८ ॥
अम्भोरुहश्चारुमत्स्यः शिरीषी चाथ गार्दभिः ।
ऊर्जयोनिरुदापेक्षी नारदी च महानृषिः ॥ ५ ९ ॥
विश्वामित्रात्मजाः सर्वे मुनयो ब्रह्मवादिनः । भगवान् मधुच्छन्दा, शक्तिशाली देवरात, अक्षीण, शकुन्त, बभ्रु, कालपथ, विख्यात याज्ञवल्क्य, महाव्रती स्थूण, उलूक, यमदूत, सैन्धवायन ऋषि, भगवान् वल्गुजंघ, महर्षि गालव, वज्रमुनि, विख्यात सालंकायन, लीलाढ्य, नारद, कूर्चामुख, वादुलि, मुसल, वक्षोग्रीव, आङ्घ्रिक, नैकदृक्, शिलायूप, शित, शुचि, चक्रक, मारुतन्तव्य, वातघ्न, आश्वलायन, श्यामायन, गार्ग्य, जाबालि, सुश्रुत, कारीषि, संश्रुत्य, पर, पौरव, तन्तु, महर्षि कपिल, मुनिवर ताडकायन, उपगहन, आसुरायण ऋषि, मार्दमर्षि, हिरण्याक्ष, जंगारि, बाभ्रवायणि, भूति, विभूति, सूत, सुरकृत्, अरालि, नाचिक, चाम्पेय, उज्जयन, नवतन्तु, बकनख, सेयन, यति, अम्भोरुह, चारुमत्स्य, शिरीषी, गार्दभि, ऊर्जयोनि, उदापेक्षी और महर्षि नारदी — ये सभी विश्वामित्रके पुत्र एवं ब्रह्मवादी ऋषि थे ॥ ५०–५९ ॥ तथैव क्षत्रियो राजन् विश्वामित्रो महातपाः ॥ ६० ॥
ऋचीकेनाहितं ब्रह्म परमेतद् युधिष्ठिर । राजा युधिष्ठिर! महातपस्वी विश्वामित्र यद्यपि क्षत्रिय थे तथापि ऋचीक मुनिने उनमें परम उत्कृष्ट ब्रह्मतेजका आधान किया था ॥ ६० ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ६१ ॥
विश्वामित्रस्य वै जन्म सोमसूर्याग्नितेजसः ।
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भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सोम, सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी विश्वामित्रके जन्मका सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताया है ॥ ६१३ ॥
यत्र यत्र च संदेहो भूयस्ते राजसत्तम ।
तत्र तत्र च मां ब्रूहि च्छेत्तास्मि तव संशयम् ॥ ६२ ॥
नृपश्रेष्ठ! अब फिर तुम्हें जहाँ-जहाँ संदेह हो उस- उस विषयकी बात मुझसे पूछो । मैं तुम्हारे संशयका निवारण करूँगा ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विश्वामित्रोपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंविश्वामित्रका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
Fara O FURU
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पञ्चमोऽध्यायः स्वामिभक्त एवं दयालु पुरुषकी श्रेष्ठता बतानेके लिये इन्द्र और तोतेके संवादका उल्लेख युधिष्ठिर उवाच
आनृशंस्यस्य धर्मज्ञ गुणान् भक्तजनस्य च ।
श्रोतुमिच्छामि धर्मज्ञ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा — धर्मज्ञ पितामह! अब मैं दयालु और भक्त पुरुषोंके गुण सुनना चाहता हूँ; अतः कृपा करके मुझे उनके गुण ही बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वासवस्य च संवादं शुकस्य च महात्मनः ॥ २ ॥
भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! इस विषयमें भी महामनस्वी तोते और इन्द्रका जो संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
विषये काशिराजस्य ग्रामान्निष्क्रम्य लुब्धकः ।
सविषं काण्डमादाय मृगयामास वै मृगम् ॥ ३ ॥
काशिराजके राज्यकी बात है, एक व्याध विषमें बुझाया हुआ बाण लेकर गाँवसे निकला और शिकारके लिये किसी मृगको खोजने लगा ॥ ३ ॥
तत्र चामिषलुब्धेन लुब्धकेन महावने ।
अविदूरे मृगान् दृष्ट्वा बाणः प्रतिसमाहितः ॥ ४ ॥
उस महान् वनमें थोड़ी ही दूर जानेपर मांसलोभी व्याधने कुछ मृगोंको देखा और उनपर बाण चला दिया ॥ ४ ॥
तेन दुर्वारितास्त्रेण निमित्तचपलेषुणा ।
महान् वनतरुस्तत्र विद्धो मृगजिघांसया ॥ ५ ॥
व्याधका वह बाण अमोघ था; परंतु निशाना चूक जानेके कारण मृगको मारनेकी इच्छासे छोड़े गये उस बाणने एक विशाल वृक्षको वेध दिया ॥ ५ ॥
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स तीक्ष्णविषदिग्धेन शरेणातिबलात् क्षतः ।
उत्सृज्य फलपत्राणि पादपः शोषमागतः ॥ ६ ॥
तीखे विषसे पुष्ट हुए उस बाणसे बड़े जोरका आघात लगनेके कारण उस वृक्षमें जहर फैल गया । उसके फल और पत्ते झड़ गये और धीरे - धीरे वह सूखने लगा ॥ ६ ॥
तस्मिन् वृक्षे तथाभूते कोटरेषु चिरोषितः ।
न जहाति शुको वासं तस्य भक्त्या वनस्पतेः ॥ ७ ॥
उस वृक्षके खोंखलेमें बहुत दिनोंसे एक तोता निवास करता था। उसका उस वृक्षके प्रति बड़ा प्रेम हो गया था, इसलिये वह उसके सूखनेपर भी वहाँका निवास छोड़ नहीं रहा था ॥ ७ ॥
निष्प्रचारो निराहारो ग्लानः शिथिलवागपि ।
कृतज्ञः सह वृक्षेण धर्मात्मा सोऽप्यशुष्यत ॥ ८ ॥
वह धर्मात्मा एवं कृतज्ञ तोता कहीं आता-जाता नहीं था । चारा चुगना भी छोड़ चुका था । वह इतना शिथिल हो गया था कि उससे बोलातक नहीं जाता था । इस प्रकार उस वृक्षके साथ वह स्वयं भी सूखता चला जा रहा था ॥ ८ ॥
तमुदारं महासत्त्वमतिमानुषचेष्टितम् ।
समदुःखसुखं दृष्ट्वा विस्मितः पाकशासनः ॥ ९ ॥
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उसका धैर्य महान् था । उसकी चेष्टा अलौकिक दिखायी देती थी । दुःख और सुखमें समान भाव रखनेवाले उस उदार तोतेको देखकर पाकशासन इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ९ ॥
ततश्चिन्तामुपगतः शक्रः कथमयं द्विजः ।
तिर्यग्योनावसम्भाव्यमानृशंस्यमवस्थितः ॥ १० ॥
इन्द्र यह सोचने लगे कि यह पक्षी कैसे ऐसी अलौकिक दयाको अपनाये बैठा है, जो पक्षीकी योनिमें प्रायः असम्भव है ॥ १० ॥
अथवा नात्र चित्रं हि अभवद् वासवस्य तु ।
प्राणिनामपि सर्वेषां सर्वं सर्वत्र दृश्यते ॥ ११ ॥
अथवा इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि सब जगह सब प्राणियोंमें सब तरहकी बातें देखनेमें आती हैं — ऐसी भावना मनमें लानेपर इन्द्रका मन शान्त हुआ ॥ ११ ॥
ततो ब्राह्मणवेषेण मानुषं रूपमास्थितः ।
अवतीर्य महीं शक्रस्तं पक्षिणमुवाच ह ॥ १२ ॥
तदनन्तर वे ब्राह्मणके वेशमें मनुष्यका रूप धारण करके पृथ्वीपर उतरे और उस शुक पक्षीसे बोले— ॥ १२ ॥
शुक भो पक्षिणां श्रेष्ठ दाक्षेयी सुप्रजा त्वया ।
पृच्छे त्वां शुकमेनं त्वं कस्मान्न त्यजसि द्रुमम् ॥ १३ ॥
'पक्षियोंमें श्रेष्ठ शुक! तुम्हें पाकर दक्षकी दौहित्री शुकी उत्तम संतानवाली हुई है । मैं तुमसे पूछता हूँ कि अब इस वृक्षको क्यों नहीं छोड़ देते हो? ' ॥ १३ ॥
अथ पृष्टः शुकः प्राह मूर्ध्ना समभिवाद्य तम् ।
स्वागतं देवराज त्वं विज्ञातस्तपसा मया ॥ १४ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर शुकने मस्तक नवाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा
—'देवराज! आपका स्वागत है । मैंने तपस्याके बलसे आपको पहचान लिया है ' ॥
ततो दशशताक्षेण साधु साध्विति भाषितम् ।
अहो विज्ञानमित्येवं मनसा पूजितस्ततः ॥ १५ ॥
यह सुनकर सहस्रनेत्रधारी इन्द्रने मन- ही-मन कहा-' वाह! वाह! क्या अद्भुत विज्ञान है! ' ऐसा कहकर उन्होंने मनसे ही उसका आदर किया ॥ १५ ॥
तमेवं शुभकर्माणं शुकं परमधार्मिकम् ।
विजानन्नपि तां प्रीतिं पप्रच्छ बलसूदनः ॥ १६ ॥
‘ वृक्षके प्रति इस तोतेका कितना प्रेम है ' इस बातको जानते हुए भी बलसूदन इन्द्रने शुभकर्म करनेवाले उस परम धर्मात्मा शुकसे पूछा— ॥ १६ ॥
निष्पत्रमफलं शुष्कमशरण्यं पतत्रिणाम् ।
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किमर्थं सेवसे वृक्षं यदा महदिदं वनम् ॥ १७ ॥
' शुक! इस वृक्षके पत्ते झड़ गये, फल भी नहीं रहे । यह सूख जानेके कारण पक्षियोंके बसेरे लेने योग्य नहीं रह गया है । जब यह विशाल वन पड़ा हुआ है तब तुम इस ठूंठ वृक्षका सेवन किसलिये करते हो? ॥ १७ ॥
अन्येऽपि बहवो वृक्षाः पत्रसंच्छन्नकोटराः ।
शुभाः पर्याप्तसंचारा विद्यन्तेऽस्मिन् महावने ॥ १८ ॥
‘ इस विशाल वनमें और भी बहुत- से वृक्ष हैं जिनके खोखले हरे -हरे पत्तोंसे आच्छादित हैं, जो सुन्दर हैं तथा जिनपर पक्षियोंके संचारके लिये योग्य पर्याप्त स्थान हैं ॥ १८ ॥
गतायुषमसामर्थ्यं क्षीणसारं हतश्रियम् ।
विमृश्य प्रज्ञया धीर जहीमं स्थविरं द्रुमम् ॥ १ ९ ॥
' धीर शुक! इस वृक्षकी आयु समाप्त हो गयी, शक्ति नष्ट हो गयी । इसका सार क्षीण हो गया और इसकी शोभा भी छिन गयी । अपनी बुद्धिके द्वारा इन सब बातोंपर विचार करके अब इस बूढ़े वृक्षको त्याग दो ' ॥ १ ९ ॥ भीष्म उवाच
तदुपश्रुत्य धर्मात्मा'शुकः शक्रेण भाषितम् ।
सुदीर्घमतिनिःश्वस्य दीनो वाक्यमुवाच ह ॥ २० ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इन्द्रकी यह बात सुनकर धर्मात्मा शुकने लंबी साँस खींचकर दीनभावसे यह बात कही - ॥ २० ॥
अनतिक्रमणीयानि दैवतानि शचीपते ।
यत्राभवत् तव प्रश्नस्तन्निबोध सुराधिप ॥ २१ ॥
' शचीवल्लभ! दैवका उल्लंघन नहीं किया जा सकता । देवराज! जिसके विषयमें आपने प्रश्न किया है, उसकी बात सुनिये ॥ २१ ॥
अस्मिन्नहं द्रुमे जातः साधुभिश्च गुणैर्युतः ।
बालभावेन संगुप्तः शत्रुभिश्च न धर्षितः ॥ २२ ॥
' मैंने इसी वृक्षपर जन्म लिया और यहीं रहकर अच्छे - अच्छे गुण सीखे हैं । इस वृक्षने अपने बालककी भाँति मुझे सुरक्षित रखा और मेरे ऊपर शत्रुओंका आक्रमण नहीं होने
दिया । ' ॥ २२ ॥
किमनुक्रोश्य वैफल्यमुत्पादयसि मेऽनघ ।
आनृशंस्याभियुक्तस्य भक्तस्यानन्यगस्य च ॥ २३ ॥
‘ निष्पाप देवेन्द्र! इन्हीं सब कारणोंसे मेरी इस वृक्षके प्रति भक्ति है । मैं दयारूपी धर्मके पालनमें लगा हूँ और यहाँसे अन्यत्र नहीं जाना चाहता। ऐसी दशामें आप कृपा करके मेरी सद्भावनाको व्यर्थ बनानेकी चेष्टा क्यों करते हैं? ' ॥ २३ ॥
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अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् ।
अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रयच्छति ॥ २४ ॥
‘ श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये दूसरोंपर दया करना ही महान् धर्मका सूचक है । दयाभाव श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा ही आनन्द प्रदान करता है ॥ २४ ॥
त्वमेव दैवतैः सर्वैः पृच्छ्यसे धर्मसंशयात् ।
अतस्त्वं देवदेवानामाधिपत्ये प्रतिष्ठितः ॥ २५ ॥
‘ धर्मके विषयमें संशय होनेपर सब देवता आपसे ही अपना संदेह पूछते हैं । इसीलिये आप देवाधिदेवोंके अधिपति पदपर प्रतिष्ठित हैं ॥ २५ ॥
नार्हसे मां सहस्राक्ष द्रुमं त्याजयितुं चिरात् ।
समर्थमुपजीव्येमं त्यजेयं कथमद्य वै ॥ २६ ॥
‘ सहस्राक्ष! आप इस वृक्षको मुझसे छुड़ानेके लिये प्रयत्न न कीजिये । जब यह समर्थ था तब मैंने दीर्घकालसे इसीके आश्रयमें रहकर जीवन धारण किया है और आज जब यह शक्तिहीन हो गया तब इसे छोड़कर चल दूँ– यह कैसे हो सकता है? ' ॥ २६ ॥
तस्य वाक्येन सौम्येन हर्षितः पाकशासनः ।
शुकं प्रोवाच धर्मात्मा आनृशंस्येन तोषितः ॥ २७ ॥
तोतेकी इस कोमल वाणीसे पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई । धर्मात्मा देवेन्द्रने शुककी दयालुतासे संतुष्ट हो उससे कहा- ॥ २७ ॥
वरं वृणीष्वेति तदा स च वव्रे वरं शुकः ।
आनृशंस्यपरो नित्यं तस्य वृक्षस्य सम्भवम् ॥ २८ ॥
' शुक! तुम मुझसे कोई वर माँगो । ' तब दयापरायण शुकने यह वर माँगा कि ‘ यह वृक्ष पहलेकी ही भाँति हरा- भरा हो जाय' ॥ २८ ॥
विदित्वा च दृढां भक्तिं तां शुके शीलसम्पदम् ।
प्रीतः क्षिप्रमथो वृक्षममृतेनावसिक्तवान् ॥ २ ९ ॥
तोतेकी इस सुदृढ़ भक्ति और शील- सम्पत्तिको जानकर इन्द्रको और भी प्रसन्नता हुई ।
उन्होंने तुरंत ही उस वृक्षको अमृतसे सींच दिया ॥ २ ९ ॥
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Commit धर्मात्मा शुक और इन्द्रकी बातचीत