06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 691–700
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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' गौओंका नाम - कीर्तन किये बिना न सोये । उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करे । इससे मनुष्यको बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है ॥ १६ ॥
गवां मूत्रपुरीषस्य नोद्विजेत कथंचन ।
न चासां मांसमश्नीयाद् गवां पुष्टिं तथाप्नुयात् ॥ १७ ॥
‘ गौओंके मूत्र और गोबरसे किसी प्रकार उद्विग्न न हो- घृणा न करे और उनका मांस न खाय । इससे मनुष्यको पुष्टि प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
गाश्च संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येत तास्तथा ।
अनिष्टं स्वप्नमालक्ष्य गां नरः सम्प्रकीर्तयेत् ॥ १८ ॥
‘ प्रतिदिन गौओंका नाम ले । उनका कभी अपमान न करे । यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गोमाताका नाम ले ॥ १८ ॥
गोमयेन सदा स्नायात् करीषे चापि संविशेत् ।
श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि प्रतिघातं च वर्जयेत् ॥ १ ९ ॥
' प्रतिदिन शरीरमें गोबर लगाकर स्नान करे । सूखे हुए गोबरपर बैठे । उसपर थूक न फेंके, मल - मूत्र न छोड़े तथा गौओंके तिरस्कारसे बचता रहे ॥ १ ९ ॥
सार्द्रे चर्मणि भुञ्जीत निरीक्षेद् वारुणीं दिशम् ।
वाग्यतः सर्पिषा भूमौ गवां पुष्टिं सदाश्नुते ॥ २० ॥
‘ भीगे हुए गोचर्मपर बैठकर भोजन करे । पश्चिम दिशाकी ओर देखे और मौन हो
भूमिपर बैठकर घीका भक्षण करे । इससे सदा गौओंकी वृद्धि एवं पुष्टि होती है ॥ २० ॥
घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् ।
घृतं दद्याद् घृतं प्राशेद् गवां पुष्टिं सदाश्नुते ॥ २१ ॥
‘ अग्निमें घृतसे हवन करे । घृतसे ही स्वस्तिवाचन कराये । घृतका दान करे और स्वयं भी गौका घृत ही खाय। इससे मनुष्य सदा गौओंकी पुष्टि वृद्धिका अनुभव करता है ॥ २१ ॥
गोमत्या विद्यया धेनुं तिलानामभिमन्त्र्य यः ।
सर्वरत्नमयीं दद्यान्न स शोचेत् कृताकृते ॥ २२ ॥
‘ जो मनुष्य सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त तिलकी धेनुको ' गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि’ इत्यादि गोमती- मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह किये हुए शुभाशुभ कर्मके लिये शोक नहीं करता ॥ २२ ॥
गावो मामुपतिष्ठन्तु हेमशृङ्ग्यः पयोमुचः ।
सुरभ्यः सौरभेय्यश्च सरितः सागरं यथा ॥ २३ ॥
'जैसे नदियाँ समुद्रके पास जाती हैं, उसी तरह सोनेसे मढ़ी हुई सींगोंवाली, दूध देनेवाली सुरभी और सौरभेयी गौएँ मेरे निकट आयें ॥ २३ ॥
गा वै पश्याम्यहं नित्यं गावः पश्यन्तु मां सदा ।
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गावोऽस्माकं वयं तासां यतो गावस्ततो वयम् ॥ २४ ॥
‘ मैं सदा गौओंका दर्शन करूँ और गौएँ मुझपर कृपा- दृष्टि करें । गौएँ हमारी हैं और हम गौओंके हैं । जहाँ गौएँ रहें, वहीं हम रहें ॥ २४ ॥
एवं रात्रौ दिवा चापि समेषु विषमेषु च ।
महाभयेषु च नरः कीर्तयन् मुच्यते भयात् ॥ २५ ॥
' जो मनुष्य इस प्रकार रातमें या दिनमें, सम अवस्थामें या विषम अवस्थामें तथा बड़े-से - बड़े भय आनेपर भी गोमाताका नामकीर्तन करता है, वह भयसे मुक्त हो जाता है ' ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
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एकोनाशीतितमोऽध्यायः गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन वसिष्ठ उवाच
शतं वर्षसहस्राणां तपस्तप्तं सुदुष्करम् ।
गोभिः पूर्वं विसृष्टाभिर्गच्छेम श्रेष्ठतामिति ॥ १ ॥
लोकेऽस्मिन् दक्षिणानां च सर्वासां वयमुत्तमाः ।
भवेम न च लिप्येम दोषेणेति परंतप ॥ २ ॥
अस्मत्पुरीषस्नानेन जनः पूयेत सर्वदा ।
शकृता च पवित्रार्थं कुर्वीरन् देवमानुषाः ॥ ३ ॥
तथा सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
प्रदातारश्च लोकान् नो गच्छेयुरिति मानद ॥ ४ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं- मानद परंतप! प्राचीन कालमें जब गौओंकी सृष्टि हुई थी, तब उन गौओंने एक लाख वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की थी । उनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम श्रेष्ठता प्राप्त करें । इस जगत् में जितनी दक्षिणा देने योग्य वस्तुएँ हैं, उन सबमें हम उत्तम समझी जायँ । किसी दोषसे लिप्त न हों । हमारे गोबरसे स्नान करनेपर सदा सब लोग पवित्र हों । देवता और मनुष्य पवित्रताके लिये हमेशा हमारे गोबरका उपयोग करें । समस्त चराचर प्राणी भी हमारे गोबरसे पवित्र हो जायँ और हमारा दान करनेवाले मनुष्य हमारे ही लोक ( गोलोकधाम) में जायँ ॥
ताभ्यो वरं ददौ ब्रह्मा तपसोऽन्ते स्वयं प्रभुः ।
एवं भवत्विति प्रभुर्लोकांस्तारयतेति च ॥ ५ ॥
जब उनकी तपस्या समाप्त हुई, तब साक्षात् भगवान् ब्रह्माने उन्हें वर दिया — ‘ गौओ! ऐसा ही हो– तुम्हारे मनमें जो संकल्प है, वह परिपूर्ण हो । तुम सम्पूर्ण जगत्के जीवोंका उद्धार करती रहो' ॥ ५ ॥
उत्तस्थुः सिद्धकामास्ता भूतभव्यस्य मातरः ।
प्रातर्नमस्यास्ता गावस्ततः पुष्टिमवाप्नुयात् ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपनी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जानेपर गौएँ तपस्यासे उठीं । वे भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंकी जननी हैं; अतः प्रतिदिन प्रातः काल उठकर गौओंको प्रणाम करना चाहिये । इससे मनुष्योंको पुष्टि प्राप्त होती है ॥ ६ ॥
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तपसोऽन्ते महाराज गावो लोकपरायणाः ।
तस्माद् गावो महाभागाः पवित्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥
महाराज! तपस्या समाप्त होनेपर गौएँ सम्पूर्ण जगत्का आश्रय बन गयीं; इसलिये वे महान् सौभाग्यशालिनी गौएँ परम पवित्र बतायी जाती हैं ॥ ७ ॥
तथैव सर्वभूतानां समतिष्ठन्त मूर्धनि ।
समानवत्सां कपिलां धेनुं दत्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां ब्रह्मलोके महीयते ॥ ८ ॥
ये समस्त प्राणियोंके मस्तकपर स्थित हैं ( अर्थात् सबसे श्रेष्ठ एवं वन्दनीय हैं ) । जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर कपिल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ॥ ८ ॥
लोहितां तुल्यवत्सां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सूर्यलोके महीयते ॥ ९ ॥
जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा लाल रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर लाल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह सूर्यलोकमें सम्मानित होता है ॥ ९ ॥
समानवत्सां शबलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सोमलोके महीयते ॥ १० ॥
जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा चितकबरी गौको वस्त्र ओढ़ाकर चितकबरे बछड़ेसहित दान करता है, वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है ॥ १० ॥
समानवत्सां श्वेतां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामिन्द्रलोके महीयते ॥ ११ ॥
जो मानव दूध देनेवाली सुलक्षणा श्वेत वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर श्वेत वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, उसे इन्द्रलोकमें सम्मान प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
समानवत्सां कृष्णां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामग्निलोके महीयते ॥ १२ ॥
जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कृष्ण वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर कृष्ण वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १२ ॥
समानवत्सां धूम्रां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां याम्यलोके महीयते ॥ १३ ॥
जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा धूएँ-जैसे रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर धूएँके समान रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह यमलोकमें सम्मानित होता है ॥ १३ ॥
अपां फेनसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां वारुणं लोकमाप्नुते ॥ १४ ॥
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जो जलके फेनके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
वातरेणुसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां वायुलोके महीयते ॥ १५ ॥
जो हवासे उड़ी हुई धूलके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, उसकी वायुलोकमें पूजा होती है ॥ १५ ॥
हिरण्यवर्णां पिंगाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां कौबेरं लोकमश्नुते ॥ १६ ॥
जो सुवर्णके समान रंग तथा पिंगल वर्णके नेत्रवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह कुबेर- लोकको प्राप्त होता है ॥ १६ ॥
पलालधूम्रवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां पितृलोके महीयते ॥ १७ ॥
जो पुआलके धूएँके समान रंगवाली बछड़ेसहित गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह पितृलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ॥
सवत्सां पीवरीं दत्त्वा दृतिकण्ठामलंकृताम् ।
वैश्वदेवमसम्बाधं स्थानं श्रेष्ठं प्रपद्यते ॥ १८ ॥
जो लटकते हुए गलकम्बलसे युक्त मोटी- ताजी सवत्सा गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान देता है, वह बिना किसी बाधाके विश्वेदेवोंके श्रेष्ठ लोकमें पहुँच जाता है ॥ १८ ॥
समानवत्सां गौरीं तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां वसूनां लोकमाप्नुयात् ॥ १ ९ ॥
जो गौर वर्णवाली और दूध देनेवाली शुभलक्षणा गौको वस्त्र ओढ़ाकर समान रंगवाले बछड़ेसहित दान करता है, वह वसुओंके लोकमें जाता है ॥ १ ९ ॥
पाण्डुकम्बलवर्णाभां सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां साध्यानां लोकमाप्नुते ॥ २० ॥
जो श्वेत कम्बलके समान रंगवाली सवत्सा गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह साध्योंके लोकमें जाता है ॥ २० ॥
वैराटपृष्ठमुक्षाणं सर्वरत्नैरलंकृतम् ।
प्रददन्मरुतां लोकान् स राजन् प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥
राजन्! जो विशालपृष्ठभागवाले बैलको सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत करके उसका दान करता है, वह मरुद्गणोंके लोकोंमें जाता है ॥ २१ ॥
वयोपपन्नं लीलांगं सर्वरत्नसमन्वितम् ।
गन्धर्वाप्सरसां लोकान् दत्त्वा प्राप्नोति मानवः ॥ २२ ॥
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जो मनुष्य यौवनसे सम्पन्न और सुन्दर अंगवाले बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित करके उसका दान करता है, वह गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंको प्राप्त करता है ॥ २२ ॥
दृतिकण्ठमनड्वाहं सर्वरत्नैरलंकृतम् ।
दत्त्वा प्रजापतेर्लोकान् विशोकः प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥
जो लटकते हुए गलकम्बलवाले तथा गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत करके ब्राह्मणको देता है, वह शोकरहित हो प्रजापतिके लोकोंमें जाता है ॥ २३ ॥
गोप्रदानरतो याति भित्त्वा जलदसंचयान् ।
विमानेनार्कवर्णेन दिवि राजन् विराजते ॥ २४ ॥
राजन्! गोदानमें अनुरागपूर्वक तत्पर रहनेवाला पुरुष सूर्यके समान देदीप्यमान विमानमें बैठकर मेघमण्डलको भेदता हुआ स्वर्गमें जाकर सुशोभित होता है ॥ २४ ॥
तं चारुवेषाः सुश्रोण्यः सहस्रं सुरयोषितः ।
रमयन्ति नरश्रेष्ठं गोप्रदानरतं नरम् ॥ २५ ॥
उस गोदानपरायण श्रेष्ठ मनुष्यको मनोहर वेष और सुन्दर नितम्बवाली सहस्रों देवांगनाएँ ( अपनी सेवासे ) रमण कराती हैं ॥ २५ ॥
वीणानां वल्लकीनां च नूपुराणां च सिञ्जितैः ।
हासैश्च हरिणाक्षीणां सुप्तः स प्रतिबोध्यते ॥ २६ ॥
वह वीणा और वल्लकीके मधुर गुंजन, मृगनयनी युवतियोंके नूपुरोंकी मनोहर झनकारों तथा हास - परिहासके शब्दोंको श्रवण करके नींद से जागता है ॥ २६ ॥
यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा - स्तावन्ति वर्षाणि महीयते सः । स्वर्गच्युतश्चापि ततो नृलोके प्रसूयते वै विपुले गृहे सः ॥ २७ ॥
गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है । फिर पुण्यक्षीण होनेपर जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब इस मनुष्यलोकमें आकर सम्पन्न घरमें जन्म लेता है ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
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अशीतितमोऽध्यायः गौओं तथा गोदानकी महिमा वसिष्ठ उवाच
घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः ।
घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे ॥ १ ॥
घृतं मे हृदये नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम् ।
घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम् ॥२ ॥
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च ।
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥ ३ ॥
इत्याचम्य जपेत् सायं प्रातश्च पुरुषः सदा ।
यदह्ना कुरुते पापं तस्मात् स परिमुच्यते ॥ ४ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! मनुष्यको चाहिये कि सदा सबेरे और सायंकाल आचमन करके इस प्रकार जप करे- ' घी और दूध देनेवाली, घीकी उत्पत्तिका स्थान, घीको प्रकट करनेवाली, घीकी नदी तथा घीकी भवँररूप गौएँ मेरे घरमें सदा निवास करें । गौका घी मेरे हृदयमें सदा स्थित रहे । घी मेरी नाभिमें प्रतिष्ठित हो । घी मेरे सम्पूर्ण अंगोंमें व्याप्त रहे और घी मेरे मनमें स्थित हो । गौएँ मेरे आगे रहें । गौँएँ मेरे पीछे भी रहें । गौएँ मेरे चारों ओर रहें और मैं गौओंके बीचमें निवास करूँ । ' इस प्रकार प्रतिदिन जप करनेवाला मनुष्य दिनभरमें जो पाप करता है, उससे छुटकारा पा जाता है ॥ १–४ ॥
प्रासादा यत्र सौवर्णा वसोर्धारा च यत्र सा ।
गन्धर्वाप्सरसो यत्र तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥ ५ ॥
सहस्र गौओंका दान करनेवाले मनुष्य जहाँ सोनेके महल हैं, जहाँ स्वर्गगंगा बहती हैं तथा जहाँ गन्धर्व और अप्सराएँ निवास करती हैं, उस स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥
नवनीतपङ्काः क्षीरोदा दधिशैवलसंकुलाः ।
वहन्ति यत्र वै नद्यस्तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥ ६ ॥
सहस्र गौओंका दान करनेवाले पुरुष जहाँ दूधके जलसे भरी हुई, दहीके सेवारसे व्याप्त हुई तथा मक्खनरूपी कीचड़से युक्त हुई नदियाँ बहती हैं, वहीं जाते हैं ॥ ६ ॥
गवां शतसहस्रं तु यः प्रयच्छेद् यथाविधि ।
परां वृद्धिमवाप्याथ स्वर्गलोके महीयते ॥ ७ ॥
जो विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करता है, वह अत्यन्त अभ्युदयको पाकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ ७ ॥
दश चोभयतः पुत्रो मातापित्रोः पितामहान् ।
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दधाति सुकृतान् लोकान् पुनाति च कुलं नरः ॥ ८ ॥
वह मनुष्य अपने माता और पिताकी दस- दस पीढ़ियोंको पवित्र करके उन्हें पुण्यमय लोकोंमें भेजता है और अपने कुलको भी पवित्र कर देता है ॥ ८ ॥
धेन्वाः प्रमाणेन समप्रमाणां धेनुं तिलानामपि च प्रदाय । पानीयदाता च यमस्य लोके न यातनां काञ्चिदुपैति तत्र ॥ ९ ॥
जो गायके बराबर तिलकी गाय बनाकर उसका दान करता है, अथवा जो जलधेनुका दान करता है, उसे यमलोकमें जाकर वहाँकी कोई यातना नहीं भोगनी पड़ती है ॥ ९ ॥
पवित्रमग्रयं जगतः प्रतिष्ठा दिवौकसां मातरोऽथाप्रमेयाः । अन्वालभेद् दक्षिणतो व्रजेच्च दद्याच्च पात्रे प्रसमीक्ष्य कालम् ॥ १० ॥
गौ सबसे अधिक पवित्र, जगत्का आधार और देवताओंकी माता है । उसकी महिमा अप्रमेय है । उसका सादर स्पर्श करे और उसे दाहिने रखकर चले तथा उत्तम समय देखकर उसका सुपात्र ब्राह्मणको दान करे ॥ १० ॥
धेनुं सवत्सां कपिलां भूरिशृंगीं कांस्योपदोहां वसनोत्तरीयाम् । प्रदाय तां गाहति दुर्विगाह्यां याम्यां सभां वीतभयो मनुष्यः ॥ ११ ॥
जो बड़े -बड़े सींगोंवाली कपिला धेनुको वस्त्र ओढ़ाकर उसे बछड़े और काँसीकी दोहनीसहित ब्राह्मणको दान करता है, वह मनुष्य यमराजकी दुर्गम सभामें निर्भय होकर प्रवेश करता है ॥ ११ ॥
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः ।
गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तयेत् ॥ १२ ॥
प्रतिदिन यह प्रार्थना करनी चाहिये कि सुन्दर एवं अनेक प्रकारके रूप - रंगवाली विश्वरूपिणी गोमाताएँ सदा मेरे निकट आयें ॥ १२ ॥
नातः पुण्यतरं दानं नातः पुण्यतरं फलम् ।
नातो विशिष्टं लोकेषु भूतं भवितुमर्हति ॥ १३ ॥
गोदानसे बढ़कर कोई पवित्र दान नहीं है । गोदानके फलसे श्रेष्ठ दूसरा कोई फल नहीं है तथा संसारमें गौसे बढ़कर दूसरा कोई उत्कृष्ट प्राणी नहीं है ॥ १३ ॥
त्वचा लोम्नाथशृंगैर्वा वालैः क्षीरेण मेदसा ।
यज्ञं वहति सम्भूय किमस्त्यभ्यधिकं ततः ॥ १४ ॥
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त्वचा, रोम, सींग, पूँछके बाल, दूध और मेदा आदिके साथ मिलकर गौ ( दूध, दही, घी आदिके द्वारा ) यज्ञका निर्वाह करती है; अतः उससे श्रेष्ठ दूसरी कौन- सी वस्तु है ॥ १४ ॥
यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजंगमम् ।
तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम् ॥ १५ ॥
जिसने समस्त चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्यकी जननी गौको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ १५ ॥
गुणवचनसमुच्चयैकदेशो नृवर मयैष गवां प्रकीर्तितस्ते । न च परमिह दानमस्ति गोभ्यो भवति न चापि परायणं तथान्यत् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे गौओंके गुणवर्णनसम्बन्धी साहित्यका एक लघु अंशमात्र बताया है — दिग्दर्शनमात्र कराया है । गौओंके दानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है, तथा उनके समान दूसरा कोई आश्रय भी नहीं है ॥ १६ ॥
भीष्म उवाच वरमिदमिति भूमिदो विचिन्त्य प्रवरमृषेर्वचनं ततो महात्मा । व्यसृजत नियतात्मवान् द्विजेभ्यः सुबहु च गोधनमाप्तवांश्च लोकान् ॥ १७ ॥
भीष्मजी कहते हैं - महर्षि वसिष्ठके ये वचन सुनकर भूमिदान करनेवाले संयतात्मा महामना राजा सौदासने ' यह बहुत उत्तम पुण्यकार्य है ' ऐसा सोचकर ब्राह्मणोंको बहुत- सी गौएँ दान दी । इससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
Fara Face
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एकाशीतितमोऽध्यायः गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन युधिष्ठिरउवाच
पवित्राणां पवित्रं यच्छिष्टं लोके च यद् भवेत् ।
पावनं परमं चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा — पितामह! संसारमें जो वस्तु पवित्रोंमें भी पवित्र तथा लोकमें पवित्र कहकर अनुमोदित एवं परम पावन हो, उसका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
गावो महार्थाः पुण्याश्च तारयन्ति च मानवान् ।
धारयन्ति प्रजाश्चेमा हविषा पयसा तथा ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! गौएँ महान् प्रयोजन सिद्ध करनेवाली तथा परम पवित्र हैं । ये मनुष्योंको तारनेवाली हैं और अपने दूध- घीसे प्रजावर्गके जीवनकी रक्षा करती हैं ॥ २ ॥
न हि पुण्यतमं किंचिद् गोभ्यो भरतसत्तम ।
एताः पुण्याः पवित्राश्च त्रिषु लोकेषु सत्तमाः ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! गौओंसे बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है । ये पुण्यजनक, पवित्र तथा तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥
देवानामुपरिष्टाच्च गावः प्रतिवसन्ति वै ।
दत्त्वा चैतास्तारयन्ते यान्ति स्वर्गं मनीषिणः ॥ ४ ॥
गौएँ देवताओंसे भी ऊपरके लोकोंमें निवास करती हैं । जो मनीषी पुरुष इनका दान करते हैं, वे अपने आपको तारते हैं और स्वर्गमें जाते हैं ॥ ४ ॥
मान्धाता यौवनाश्वश्च ययातिर्नहुषस्तथा ।
गा वै ददन्तः सततं सहस्रशतसम्मिताः ॥ ५ ॥
गताः परमकं स्थानं देवैरपि सुदुर्लभम् । युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता, ( सोमवंशी ) नहुष और ययाति -ये सदा लाखों गौओंका दान किया करते थे; इससे वे उन उत्तम स्थानोंको प्राप्त हुए हैं, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं ॥ ५३ ॥
अपि चात्र पुरागीतां कथयिष्यामि तेऽनघ ॥ ६ ॥
ऋषीणामुत्तमं धीमान् कृष्णद्वैपायनं शुकः ।
अभिवाद्याह्निककृतः शुचिः प्रयतमानसः ॥ ७ ॥