06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 701–710
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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पितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् ।
को यज्ञः सर्वयज्ञानां वरिष्ठोऽभ्युपलक्ष्यते ॥ ८ ॥
निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ । एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान् शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता—ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा- ' पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौनन--ससा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है? ॥ ६–८ ॥
किं च कृत्वा परं स्थानं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः ।
केन देवाः पवित्रेण स्वर्गमश्नन्ति वा विभो ॥ ९ ॥
'प्रभो! मनीषी पुरुष कौन- सा कर्म करके उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं तथा किस पवित्र कार्यके द्वारा देवता स्वर्गलोकका उपभोग करते हैं? ॥ ९ ॥
किं च यज्ञस्य यज्ञत्वं क्व च यज्ञः प्रतिष्ठितः ।
देवानामुत्तमं किं च किं च सत्रमितः परम् ॥ १० ॥
‘ यज्ञका यज्ञत्व क्या है? यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? देवताओंके लिये कौन- सी वस्तु उत्तम है? इससे श्रेष्ठ यज्ञ क्या है? ॥ १० ॥
पवित्राणां पवित्रं च यत् तद् ब्रूहि पितर्मम ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः परमधर्मवित् ।
पुत्रायाकथयत् सर्वं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ११ ॥
‘ पिताजी! पवित्रोंमें पवित्र वस्तु क्या है? इन सारी बातोंका मुझसे वर्णन कीजिये । ' भरतश्रेष्ठ! पुत्र शुकदेवका यह वचन सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासने उससे सब बातें ठीक- ठीक बतायीं ॥ ११ ॥
व्यास उवाच
गावः प्रतिष्ठा भूतानां तथा गावः परायणम् ।
गावः पुण्याः पवित्राश्च गोधनं पावनं तथा ॥ १२ ॥
व्यासजी बोले- बेटा! गौएँ सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम आश्रय हैं। गौएँ पुण्यमयी एवं पवित्र होती हैं तथा गोधन सबको पवित्र करनेवाला है ॥
पूर्वमासन्नशृंगा वै गाव इत्यनुशुश्रुम ।
शृंगार्थे समुपासन्त ताः किल प्रभुमव्ययम् ॥ १३ ॥
हमने सुना है कि गौएँ पहले बिना सींगकी ही थीं । उन्होंने सींगके लिये अविनाशी भगवान् ब्रह्माकी उपासना की ॥ १३ ॥
ततो ब्रह्मा तु गाः प्रायमुपविष्टाः समीक्ष्य ह ।
ईप्सितं प्रददौ ताभ्यो गोभ्यः प्रत्येकशः प्रभुः ॥ १४ ॥
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भगवान् ब्रह्माजीने गौओंको प्रायोपवेशन ( आमरण उपवास) करते देख उन गौओंमेंसे प्रत्येकको उनकी अभीष्ट वस्तु दी ॥ १४ ॥
तासां शृंगाण्यजायन्त यस्या यादृङ्मनोगतम् ।
नानावर्णाः शृंगवन्त्यस्ता व्यरोचन्त पुत्रक ॥ १५ ॥
बेटा! वरदान मिलनेके पश्चात् गौओंके सींग प्रकट हो गये । जिसके मनमें जैसे सींगकी इच्छा थी, उसके वैसे ही हो गये । नाना प्रकारके रूप- रंग और सींगसे युक्त हुई उन गौओंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥
ब्रह्मणा वरदत्तास्ता हव्यकव्यप्रदाः शुभाः ।
पुण्याः पवित्राः सुभगा दिव्यसंस्थानलक्षणाः ॥ १६ ॥
ब्रह्माजीका वरदान पाकर गौएँ मंगलमयी, हव्यकव्य प्रदान करनेवाली, पुण्यजनक, पवित्र, सौभाग्यवती तथा दिव्य अंगों एवं लक्षणोंसे सम्पन्न हुईं ॥ १६ ॥
गावस्तेजो महद् दिव्यं गवां दानं प्रशस्यते ।
ये चैताः सम्प्रयच्छन्ति साधवो वीतमत्सराः ॥ १७ ॥
ते वै सुकृतिनः प्रोक्ताः सर्वदानप्रदाश्च ते ।
गवां लोकं तथा पुण्यमाप्नुवन्ति च तेऽनघ ॥ १८ ॥
गौएँ दिव्य एवं महान् तेज हैं । उनके दानकी प्रशंसा की जाती है । जो सत्पुरुष मात्सर्यका त्याग करके गौओंका दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं । वे सम्पूर्ण दानोंके दाता माने गये हैं । निष्पाप शुकदेव! उन्हें पुण्यमय गोलोककी प्राप्ति होती है ॥ १७-१८ ॥
यत्र वृक्षा मधुफला दिव्यपुष्पफलोपगाः ।
पुष्पाणि च सुगन्धीनि दिव्यानि द्विजसत्तम ॥ १ ९ ॥
द्विजश्रेष्ठ! गोलोकके सभी वृक्ष मधुर एवं सुस्वादु फल देनेवाले हैं । वे दिव्य फल- फूलोंसे सम्पन्न होते हैं । उन वृक्षोंके पुष्प दिव्य एवं मनोहर गन्धसे युक्त होते हैं ॥ १ ९ ॥
सर्वा मणिमयी भूमिः सर्वकाञ्चनवालुका ।
सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पङ्का निरजाः शुभाः ॥ २० ॥
वहाँकी भूमि मणिमयी है । वहाँकी बालुका कांचनचूर्णरूप है । उस भूमिका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुखद होता है । वहाँ धूल और कीचड़का नाम भी नहीं है । वह भूमि सर्वथा मंगलमयी है ॥ २० ॥
रक्तोत्पलवनैश्चैव मणिखण्डैर्हिरण्मयैः ।
तरुणादित्यसंकाशैर्भान्ति तत्र जलाशयाः ॥ २१ ॥
वहाँके जलाशय लाल कमलवनोंसे तथा प्रातः- कालीन सूर्यके समान प्रकाशमान मणिजटित सुवर्णमय सोपानोंसे सुशोभित होते हैं ॥ २१ ॥
महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः ।
नीलोत्पलविमिश्रैश्च सरोभिर्बहुपङ्कजैः ॥ २२ ॥
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वहाँकी भूमि कितने ही सरोवरोंसे शोभा पाती है । उन सरोवरोंमें नीलोत्पलमिश्रित बहुत - से कमल खिले रहते हैं । उन कमलोंके दल बहुमूल्य मणिमय होते हैं और उनके केसर अपनी स्वर्णमयी प्रभासे प्रकाशित होते हैं ॥ २२ ॥
करवीरवनैः फुल्लैः सहस्रावर्तसंवृतैः ।
संतानकवनैः फुल्लैर्वृक्षैश्च समलंकृताः ॥ २३ ॥
उस लोकमें बहुत - सी नदियाँ हैं, जिनके तटोंपर खिले हुए कनेरोंके वन तथा विकसितसंतानक ( कल्पवृक्ष -विशेष ) के वन एवं अन्यान्य वृक्ष उनकी शोभा बढ़ाते हैं । वे वृक्ष और वन अपने मूल भागमें सहस्रों आवर्तोंसे घिरे हुए हैं ॥ २३ ॥
निर्मलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाप्रभैः ।
उद्भूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः ॥ २४ ॥
उन नदियोंके तटोंपर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं ॥ २४ ॥
सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमैः ।
जातरूपमयैश्चान्यैर्हुताशनसमप्रभैः ॥ २५ ।
कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं । वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं । कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत - से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं ॥ २५ ॥
सौवर्णा गिरयस्तत्र मणिरत्नशिलोच्चयाः ।
सर्वरत्नमयैर्भान्ति शृंगैश्चारुभिरुच्छ्रितैः ॥ २६ ॥
वहाँ सोनेके पर्वत तथा मणि और रत्नोंके शैलसमूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊँचे तथा सर्वरत्नमय शिखरोंसे सुशोभित होते हैं ॥ २६ ॥
नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः ।
दिव्यगन्धरसैः पुष्पैः फलैश्च भरतर्षभ ॥ २७ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फूल और फल लगे रहते हैं । वे वृक्ष पक्षियोंसे भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलोंमें दिव्य सुगन्ध और दिव्य रस होते हैं ॥
रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर ।
सर्वकामसमृद्धार्था निःशोका गतमन्यवः ॥ २८ ॥
युधिष्ठिर! वहाँ पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं । गोलोकवासी शोक और क्रोधसे रहित, पूर्णकाम एवं सफलमनोरथ होते हैं ॥ २८ ॥
विमानेषु विचित्रेषु रमणीयेषु भारत ।
मोदन्ते पुण्यकर्माणो विहरन्तो यशस्विनः ॥ २ ९ ॥
भरतनन्दन! वहाँके यशस्वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानोंमें बैठकर यथेष्ट विहार करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं ॥ २ ९ ॥
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उपक्रीडन्ति तान् राजन् शुभाश्चाप्सरसां गणाः ।
एताल्लोँकानवाप्नोति गां दत्त्वा वै युधिष्ठिर ॥ ३० ॥
राजन्! उनके साथ सुन्दरी अप्सराएँ क्रीड़ा करती हैं । युधिष्ठिर! गोदान करके मनुष्य इन्हीं लोकोंमें जाते हैं ॥ ३० ॥
येषामधिपतिः पूषा मारुतो बलवान् बली ।
ऐश्वर्ये वरुणो राजा नाममात्रं युगन्धराः ॥ ३१ ॥
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः ।
प्राजापत्यमिति ब्रह्मन् जपेन्नित्यं यतव्रतः ॥ ३२ ॥
नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और बलवान् वायु जिन लोकोंके अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकोंके ऐश्वर्यपर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकोंमें जाता है । गौएँ युगन्धरा, सुरूपा, बहुरूपा, विश्वरूपा तथा सबकी माताएँ हैं । शुकदेव! मनुष्य संयम-नियमके साथ रहकर गौओंके इन प्रजापतिकथित नामोंका प्रतिदिन जप करे ॥ ३१-३२ ॥
गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः ।
तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान् ॥ ३३ ॥
जो पुरुष गौओंकी सेवा और सब प्रकारसे उनका अनुगमन करता है, उसपर संतुष्ट होकर गौएँ उसे अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं ॥ ३३ ॥
द्रुह्येन्न मनसा वापि गोषु नित्यं सुखप्रदः ।
अर्चयेत सदा चैव नमस्कारैश्च पूजयेत् ॥ ३४ ॥
गौओंके साथ मनसे भी कभी द्रोह न करे, उन्हें सदा सुख पहुँचाये, उनका यथोचित सत्कार करे और नमस्कार आदिके द्वारा उनका पूजन करता रहे ॥ ३४ ॥
दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ।
त्र्यहमुष्णं पिबेन्मूत्रं त्र्यहमुष्णं पिबेत् पयः ॥ ३५ ॥
जो मनुष्य जितेन्द्रिय और प्रसन्नचित्त होकर नित्य गौओंकी सेवा करता है, वह समृद्धिका भागी होता है । मनुष्य तीन दिनोंतक गरम गोमूत्र पीकर रहे, फिर तीन दिनतक गरम गोदुग्ध पीकर रहे ॥ ३५ ॥
गवामुष्णं पयः पीत्वा त्र्यहमुष्णं घृतं पिबेत् ।
त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो भवेत् त्र्यहम् ॥ ३६ ॥
गरम गोदुग्ध पीनेके पश्चात् तीन दिनोंतक गरम- गरम गोघृत पीये । तीन दिनतक गरम घी पीकर फिर तीन दिनोंतक वह वायु पीकर रहे ॥ ३६ ॥
येन देवाः पवित्रेण भुञ्जते लोकमुत्तमम् ।
यत् पवित्रं पवित्राणां तद् घृतं शिरसा वहेत् ॥ ३७ ॥
देवगण भी जिस पवित्र घृतके प्रभावसे उत्तम उत्तम लोकका पालन करते हैं तथा जो पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र है, उससे घृतको शिरोधार्य करे ॥ ३७ ॥
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घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् ।
घृतं प्राशेद् घृतं दद्याद् गवां पुष्टिं तथाश्नुते ॥ ३८ ॥
गायके घीके द्वारा अग्निमें आहुति दे । घृतकी दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये । घृत भोजन करे तथा गोघृतका ही दान करे । ऐसा करनेसे मनुष्य गौओंकी समृद्धि एवं अपनी पुष्टिका अनुभव करता है ॥ ३८ ॥
निर्हृतैश्च यवैर्गोभिर्मासं प्रश्रितयावकः ।
ब्रह्महत्यासमं पापं सर्वमेतेन शुध्यते ॥ ३ ९ ॥
गौओंके गोबरसे निकाले हुए जौकी लप्सीका एक मासतक भक्षण करे । इससे मनुष्य ब्रह्महत्या - जैसे पापसे भी छुटकारा पा जाता है ॥ ३ ९ ॥
पराभवाच्च दैत्यानां देवैः शौचमिदं कृतम् ।
ते देवत्वमपि प्राप्ताः संसिद्धाश्च महाबलाः ॥ ४० ॥
जब दैत्योंने देवताओंको पराजित कर दिया, तब देवताओंने इसी प्रायश्चित्तका अनुष्ठान किया । इससे उन्हें पुनः ( नष्ट हुए) देवत्वकी प्राप्ति हुई तथा वे महाबलवान् और परम सिद्ध हो गये ॥ ४० ॥
गावः पवित्राः पुण्याश्च पावनं परमं महत् ।
ताश्च दत्त्वा द्विजातिभ्यो नरः स्वर्गमुपाश्नुते ॥ ४१ ॥
गौएँ परम पावन, पवित्र और पुण्यस्वरूपा हैं। वे महान् देवता हैं। उन्हें ब्राह्मणोंको देकर मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है ॥ ४१ ॥
गवां मध्ये शुचिर्भूत्वा गोमतीं मनसा जपेत् ।
पुताभिरद्भिराचम्य शुचिर्भवति निर्मलः ॥ ४२ ॥
पवित्र जलसे आचमन करके पवित्र होकर गौओंके बीचमें गोमतीमन्त्र (गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि इत्यादि) का मन-ही- मन जप करे । ऐसा करनेसे वह अत्यन्त शुद्ध एवं निर्मल ( पापमुक्त ) हो जाता है ॥ ४२ ॥
अग्निमध्ये गवां मध्ये ब्राह्मणानां च संसदि ।
विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः पुण्यकर्मिणः ॥ ४३ ॥
अध्यापयेरन् शिष्यान् वै गोमतीं यज्ञसम्मिताम् ।
त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा गोमतीं लभते वरम् ॥ ४४ ॥
विद्या और वेदव्रतमें निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे अग्नियों और गौओंके बीचमें तथा ब्राह्मणोंकी सभामें शिष्योंको यज्ञतुल्य गोमतीविद्याकी शिक्षा दें । जो तीन राततक उपवास करके गोमती - मन्त्रका जप करता है, उसे गौओंका वरदान प्राप्त होता है ॥ ४३-४४ ॥ पुत्रकामश्च लभते पुत्रं धनमथापि वा । पतिकामा च भर्तारं सर्वकामांश्च मानवः ।
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गावस्तुष्टाः प्रयच्छन्ति सेविता वै न संशयः ॥ ४५ ॥
पुत्रकी इच्छावाला पुत्र और धन चाहनेवाला धन पाता है । पतिकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको मनके अनुकूल पति मिलता है । सारांश यह है कि गौओंकी आराधना करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है । गौएँ मनुष्योंद्वारा सेवित और संतुष्ट होकर उन्हें सब कुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥
एवमेता महाभागा यज्ञियाः सर्वकामदाः ।
रोहिण्य इति जानीहि नैताभ्यो विद्यते परम् ॥ ४६ ॥
इस प्रकार ये महाभाग्यशालिनी गौएँ यज्ञका प्रधान अंग हैं और सबको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाली हैं । तुम इन्हें रोहिणी समझो । इनसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है ॥ ४६ ॥
इत्युक्तः स महातेजाः शुकः पित्रा महात्मना ।
पूजयामास गां नित्यं तस्मात् त्वमपि पूजय ॥ ४७ ॥
युधिष्ठिर! अपने महात्मा पिता व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी शुकदेवजी प्रतिदिन गौकी सेवा--पूजा'करने लगे; इसलिये तुम भी गौओंकी सेवा - पूजा करो ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
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द्वयशीतितमोऽध्यायः लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना युधिष्ठिर उवाच
मया गवां पुरीषं वै श्रिया जुष्टमिति श्रुतम् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं संशयोऽत्र पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - पितामह! मैंने सुना है कि गौओंके गोबरमें लक्ष्मीका निवास है; किंतु इस विषयमें मुझे संदेह है; अतः इसके सम्बन्धमें मैं यथार्थ बात सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गोभिर्नृपेह संवादं श्रिया भरतसत्तम ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष गौ और लक्ष्मीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
श्रीः कृत्वेह वपुः कान्तं गोमध्येषु विवेश ह ।
गावोऽथ विस्मितास्तस्या दृष्ट्वा रूपस्य सम्पदम् ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, लक्ष्मीने मनोहर रूप धारण करके गौओंके झुंडमें प्रवेश किया ।
उनके रूप- वैभवको देखकर गौएँ आश्चर्यचकित हो उठीं ॥ ३ ॥
गाव ऊचुः
कासि देवि कुतो वा त्वं रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
विस्मिताः स्म महाभागे तव रूपस्य सम्पदा ॥ ४ ॥
गौओंने पूछा—देवि! तुम कौन हो और कहाँसे आयी हो? इस पृथ्वीपर तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है । महाभागे! तुम्हारी इस रूप-सम्पत्ति से हमलोग बड़े आश्चर्यमें पड़ गये हैं ॥ ४ ॥
इच्छाम त्वां वयं ज्ञातुं का त्वं क्व च गमिष्यसि ।
तत्त्वेन वरवर्णाभे सर्वमेतद् ब्रवीहि नः ॥ ५ ॥
इसलिये हम तुम्हारा परिचय जानना चाहती हैं । तुम कौन हो और कहाँ जाओगी? वरवर्णिनि! ये सारी बातें हमें ठीक- ठीक बताओ ॥ ५ ॥
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श्रीरुवाच
लोककान्तास्मि भद्रं वः श्रीर्नामाहं परिश्रुता ।
मया दैत्याः परित्यक्ता विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥ ६ ॥
लक्ष्मी बोलीं- गौओ! तुम्हारा कल्याण हो । मैं इस जगत् में लक्ष्मी नामसे प्रसिद्ध हूँ । सारा जगत् मेरी कामना करता है । मैंने दैत्योंको छोड़ दिया, इसलिये वे सदाके लिये नष्ट हो गये हैं ॥ ६ ॥
मयाभिपन्ना देवाश्च मोदन्ते शाश्वतीः समाः ।
इन्द्रो विवस्वान् सोमश्च विष्णुरापोऽग्निरेव च ॥ ७ ॥
मेरे ही आश्रयमें रहनेके कारण इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, जलके अधिष्ठाता देवता वरुण और अग्नि आदि देवता सदा आनन्द भोग रहे हैं ॥ ७ ॥
मयाभिपन्नाः सिध्यन्ते ऋषयो देवतास्तथा ।
यान् नाविशाम्यहं गावस्ते विनश्यन्ति सर्वशः ॥ ८ ॥
देवताओं तथा ऋषियोंको मुझसे अनुगृहीत होनेपर ही सिद्धि मिलती है । गौओ! जिनके शरीरमें मैं प्रवेश नहीं करती, वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मया जुष्टाः सुखान्विताः ।
एवंप्रभावं मां गावो विजानीत सुखप्रदाः ॥ ९ ॥
धर्म, अर्थ और काम मेरा सहयोग पाकर ही सुखद होते हैं; अतः सुखदायिनी गौओ! मुझे ऐसे ही प्रभावसे सम्पन्न समझो ॥ ९ ॥
इच्छामि चापि युष्मासु वस्तुं सर्वासु नित्यदा ।
आगत्य प्रार्थये युष्मान् श्रीजुष्टा भवताथ वै ॥ १० ॥
मैं तुम सब लोगोंके भीतर भी सदा निवास करना चाहती हूँ और इसके लिये स्वयं ही तुम्हारे पास आकर प्रार्थना करती हूँ। तुमलोग मेरा आश्रय पाकर श्रीसम्पन्न हो जाओ ॥ १० ॥
गाव ऊचुः
अध्रुवा चपला च त्वं सामान्या बहुभिः सह ।
न त्वामिच्छाम भद्रं ते गम्यतां यत्र रंस्यसे ॥ ११ ॥
गौओंने कहा- देवि! तुम चंचला हो । कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती । इसके सिवा तुम्हारा बहुतोंके साथ एक- सा सम्बन्ध है; इसलिये हम तुम्हें नहीं चाहती हैं । तुम्हारा कल्याण हो । तुम जहाँ आनन्दपूर्वक रह सको, जाओ ॥ ११ ॥
वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयाद्य वै ।
यथेष्टं गम्यतां तत्र कृतकार्या वयं त्वया ॥ १२ ॥
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हमारा शरीर तो यों ही हृष्ट- पुष्ट और सुन्दर है। हमें तुमसे क्या काम? तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ । तुमने दर्शन दिया, इतनेहीसे हम कृतार्थ हो गयीं ॥ १२ ॥
[ I भगवती लक्ष्मीकी गौओंसे आश्रयके लिये प्रार्थना श्रीरुवाच
किमेतद् वः क्षमं गावो यन्मां नेहाभिनन्दथ ।
न मां सम्प्रति गृह्णीध्वं कस्माद् वै दुर्लभां सतीम् ॥ १३ ॥
लक्ष्मीजीने कहा- गौओ! यह क्या बात है? क्या यही तुम्हारे लिये उचित है कि तुम मेरा अभिनन्दन नहीं करती? मैं सती-साध्वी हूँ, दुर्लभ हूँ । फिर भी इस समय तुम मुझे स्वीकार क्यों नहीं करती? ॥ १३ ॥
सत्यं च लोकवादोऽयं लोके चरति सुव्रताः ।
स्वयं प्राप्ते परिभवो भवतीति विनिश्चयः ॥ १४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली गौओ! लोकमें जो यह प्रवाद चल रहा है कि ' बिना बुलाये स्वयं किसीके यहाँ जानेपर निश्चय ही अनादर होता है। ' यह ठीक ही जान पड़ता है ॥ १४ ॥
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महदुग्रं तपः कृत्वा मां निषेवन्ति मानवाः ।
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ॥ १५ ॥
देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य बड़ी उग्र तपस्या करके मेरी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करते हैं ॥ १५ । ।
प्रभाव एष वो गावः प्रतिगृह्णीत मामिह ।
नावमन्या ह्यहं सौम्यास्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ १६ ॥
सौम्य स्वभाववाली गौओ! यह तुम्हारा प्रभाव है कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आयी हूँ । अतः तुम मुझे यहाँ ग्रहण करो । चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कहीं भी मैं अपमान पानेके योग्य नहीं हूँ ॥ १६ ॥
गाव ऊचुः
नावमन्यामहे देवि न त्वां परिभवामहे ।
अध्रुवा चलचित्तासि ततस्त्वां वर्जयामहे ॥ १७ ॥
गौओंने कहा- देवि! हम तुम्हारा अपमान या अनादर नहीं करतीं । केवल तुम्हारा त्याग कर रही हैं । वह भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है । तुम कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती ॥ १७ ॥
बहुना च किमुक्तेन गम्यतां यत्र वाञ्छसि ।
वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयानघे ॥ १८ ॥
इस विषयमें बहुत बात करनेसे क्या लाभ? तुम जहाँ जाना चाहो – चली जाओ । अनघे! हम सब लोगोंका शरीर तो यों ही हृष्ट - पुष्ट और सुन्दर है; अतः तुमसे हमें क्या काम है? ॥ १८ ॥
श्रीरुवाच
अवज्ञाता भविष्यामि सर्वलोकस्य मानदाः ।
प्रत्याख्यानेन युष्माकं प्रसादः क्रियतां मम ॥ १ ९ ॥
लक्ष्मीने कहा – दूसरोंको सम्मान देनेवाली गौओ! तुम्हारे त्याग देनेसे मैं सम्पूर्ण जगत्के लिये अवहेलित और उपेक्षित हो जाऊँगी, इसलिये मुझपर कृपा करो ॥ १ ९ ॥
महाभागा भवत्यो वै शरण्याः शरणागताम् ।
परित्रायन्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् ॥ २० ॥
तुम महान् सौभाग्यशालिनी और सबको शरण देनेवाली हो । मैं भी तुम्हारी शरणमें आयी हूँ । तुम्हारी भक्त हूँ। मुझमें कोई दोष भी नहीं है; अतः तुम मेरी रक्षा करो -मुझे अपना लो ॥ २० ॥
माननामहमिच्छामि भवत्यः सततं शिवाः ।
अप्येकांगेष्वधो वस्तुमिच्छामि च सुकुत्सिते ॥ २१ ॥