06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 761–770

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 761 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

खेल- खेलमें ही उन अग्निकुमारके द्वारा जब तारकासुर मार डाला गया, तब ऐश्वर्यशाली देवेन्द्र पुनः देवताओंके राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये ॥ ३० ॥

स सेनापतिरेवाथ बभौ स्कन्दः प्रतापवान् ।

ईशो गोप्ता च देवानां प्रियकृच्छङ्करस्य च ॥ ३१ ॥

प्रतापी स्कन्द सेनापतिके ही पदपर रहकर बड़ी शोभा पाने लगे । वे देवताओंके ईश्वर तथा संरक्षक थे और भगवान् शंकरका सदा ही हित किया करते थे ॥ ३१ ॥

हिरण्यमूर्तिभगवानेष एव च पावकिः ।

सदा कुमारो देवानां सैनापत्यमवाप्तवान् ॥ ३२ ॥

ये अग्निपुत्र भगवान् स्कन्द सुवर्णमय विग्रह धारण करते हैं । वे नित्य कुमारावस्थामें ही रहकर देवताओंके सेनापतिपदपर प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ३२ ॥

तस्मात् सुवर्णं मंगल्यं रत्नमक्षय्यमुत्तमम् ।

सहजं कार्तिकेयस्य वह्नेस्तेजः परं मतम् ॥ ३३ ॥

सुवर्ण कार्तिकेयजीके साथ ही उत्पन्न हुआ है और अग्निका उत्कृष्ट तेज माना गया है ।

इसलिये वह मंगलमय, अक्षय एवं उत्तम रत्न है ॥ ३३ ॥

एवं रामाय कौरव्य वसिष्ठोऽकथयत् पुरा ।

तस्मात् सुवर्णदानाय प्रयतस्व नराधिप ॥ ३४ ॥

कुरुनन्दन! नरेश्वर! इस प्रकार पूर्वकालमें वसिष्ठजीने परशुरामको यह सारा प्रसंग एवं सुवर्णकी उत्पत्ति और माहात्म्य सुनाया था। अतः तुम स्वर्णदानके लिये प्रयत्न करो ॥ ३४ ॥

रामः सुवर्णं दत्त्वा हि विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ।

त्रिविष्टपे महत् स्थानमवापासुलभं नरैः ॥ ३५ ॥

परशुरामजी सुवर्णका दान करके सब पापोंसे मुक्त हो गये और स्वर्गमें उस महान् स्थानको प्राप्त हुए जो दूसरे मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि तारकवधोपाख्यानं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें तारकवधका उपाख्यान नामक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

0

पृष्ठ 762

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 762 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्ताशीतितमोऽध्यायः विविध तिथियोंमें श्राद्ध करनेका फल युधिष्ठिर उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया ।

तथैव मे श्राद्धविधिं कृत्स्नं प्रब्रूहि पार्थिव ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा— धर्मात्मन्! पृथ्वीनाथ! आपने जैसे चारों वर्णोंके धर्म बताये हैं, उसी प्रकार अब मेरे लिये श्राद्ध विधिका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरेणैवमुक्तो भीष्मः शान्तनवस्तदा ।

इमं श्राद्धविधिं कृत्स्नं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - ( जनमेजय! ) राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने इस सम्पूर्ण श्राद्धविधिका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् श्राद्धकर्मविधिं शुभम् ।

धन्यं यशस्यं पुत्रीयं पितृयज्ञं परंतप ॥ ३ ॥

भीष्मजी बोले – शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तुम श्राद्ध- कर्मके शुभ विधिको सावधान, होकर सुनो । यह धन, यश और पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला है । इसे पितृयज्ञ कहते हैं ॥ ३ ॥

देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

पिशाचकिन्नराणां च पूज्या वै पितरः सदा ॥ ४ ॥

देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पिशाच और किन्नर –इन सबके लिये पितर सदा ही पूज्य हैं ॥ ४ ॥

पितॄन् पूज्यादितः पश्चाद्देवतास्तर्पयन्ति वै ।

तस्मात् तान् सर्वयज्ञेन पुरुषः पूजयेत् सदा ॥ ५ ॥

मनीषी पुरुष पहले पितरोंकी पूजा करके पीछे देवताओंकी पूजा करते हैं । इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह सदा सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा पितरोंकी पूजा करे ॥ ५ ॥

अन्वाहार्यं महाराज पितॄणां श्राद्धमुच्यते तस्माद् विशेषविधिना विधिः प्रथमकल्पितः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 763

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 763 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाराज! पितरोंके श्राद्धको अन्वाहार्य कहते हैं । अतः विशेष विधिके द्वारा उसका अनुष्ठान पहले करना चाहिये ॥ ६ ॥

सर्वेष्वहःसु प्रीयन्ते कृते श्राद्धे पितामहाः ।

प्रवक्ष्यामि तुतु ते सर्वांस्तिथ्यातिथ्यगुणागुणान् ॥ ७ ॥

सभी दिनोंमें श्राद्ध करनेसे पितर प्रसन्न रहते हैं । अब मैं तिथि और अतिथिके सब गुणागुणका वर्णन करूँगा ॥ ७ ॥

येष्वहःसु कृतैः श्राद्धैर्यत् फलं प्राप्यतेऽनघ ।

तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि यथावत् तन्निबोध मे ॥ ८ ॥

निष्पाप नरेश! जिन दिनोंमें श्राद्ध करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मैं यथार्थरूपसे बताऊँगा, ध्यान देकर सुनो ॥ ८ ॥

पितृनर्च्य प्रतिपदि प्राप्नुयात् सुगृहे स्त्रियः ।

अभिरूपप्रजायिन्यो दर्शनीया बहुप्रजाः ॥ ९ ॥

प्रतिपदा तिथिको पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपने उत्तम गृहमें मनके अनुरूप सुन्दर एवं बहुसंख्यक संतानोंको जन्म देनेवाली दर्शनीय भार्या प्राप्त करता है ॥

स्त्रियो द्वितीयां जायन्ते तृतीयायां तु वाजिनः ।

चतुर्थ्यां क्षुद्रपशवो भवन्ति बहवो गृहे ॥ १० ॥

द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे कन्याओंका जन्म होता है । तृतीयाके श्राद्धसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है, चतुर्थीको पितरोंका श्राद्ध किया जाय तो घरमें बहुत- से छोटे-छोटे पशुओंकी संख्या बढ़ती है ॥ १० ॥

पञ्चम्यां बहवः पुत्रा जायन्ते कुर्वतां नृप ।

कुर्वाणास्तु नराः षष्ठ्यां भवन्ति द्युतिभागिनः ॥ ११ ॥

नरेश्वर! पंचमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके बहुत-से पुत्र होते हैं । षष्ठीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्य कान्तिके भागी होते हैं ॥ ११ ॥

कृषिभागी भवेच्छ्राद्धं कुर्वाणः सप्तमीं नृप ।

अष्टम्यां तु प्रकुर्वाणो वाणिज्ये लाभमाप्नुयात् ॥ १२ ॥

राजन्! सप्तमीको श्राद्ध करनेवाला मनुष्य कृषिकर्ममें लाभ उठाता है और अष्टमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषको व्यापारमें लाभ होता है ॥ १२ ॥

नवम्यां कुर्वतः श्राद्धं भवत्येकशफं बहु ।

विवर्धन्ते तुतु दशमीं गावः श्राद्धान् विकुर्वतः ॥ १३ ॥

नवमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषके यहाँ एक खुरवाले घोड़े आदि पशुओंकी बहुतायत होती है और दशमीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्यके घरमें गौओंको वृद्धि होती है ॥

कुप्यभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन्नेकादशीं नृप ।

ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते तस्य वेश्मनि ॥ १४ ॥

पृष्ठ 764

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 764 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाराज! एकादशीको श्राद्ध करनेवाला मानव सोने -चाँदीको छोड़कर शेष सभी प्रकारके धनका भागी होता है । उसके घरमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र जन्म लेते हैं ॥ १४ ॥

द्वादश्यामीहमानस्य नित्यमेव प्रदृश्यते ।

रजतं बहुवित्तं च सुवर्णं च मनोरमम् ॥ १५ ॥

द्वादशीको श्राद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषको सदा ही मनोरम सुवर्ण, चाँदी तथा बहुत - से धनकी प्राप्ति होती देखी जाती है ॥ १५ ॥

ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठः कुर्वन् श्राद्धं त्रयोदशीम् ।

अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे ॥ १६ ॥

युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं चतुर्दशीम् ।

अमावास्यां तु निर्वापात् सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १७ ॥

त्रयोदशीको श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने कुटुम्बी -जनोंमें श्रेष्ठ होता है; परंतु जो चतुर्दशीको श्राद्ध करता है, उसके घरमें नवयुवकोंकी मृत्यु अवश्य होती है तथा श्राद्ध करनेवाला मनुष्य स्वयं भी युद्धका भागी होता है ( इसलिये चतुर्दशीको श्राद्ध नहीं करना चाहिये ) । अमावास्याको श्राद्ध करनेसे वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १६-१७ ॥

कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् ।

श्राद्धकर्मणि तिथ्यस्तु प्रशस्ता न तथेतराः ॥ १८ ॥

कृष्ण- पक्षमें केवल चतुर्दशीको छोड़कर दशमीसे लेकर अमावास्यातककी सभी तिथियाँ श्राद्धकर्ममें जैसे प्रशस्त मानी गयी हैं, वैसे दूसरी प्रतिपदासे नवमीतक नहीं ॥ १८ ॥

यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद् विशिष्यते ।

तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्णादपराह्नो विशिष्यते ॥ १ ९ ॥

जैसे पूर्व ( शुक्ल) पक्षकी अपेक्षा अपर ( कृष्ण) पक्ष श्राद्धके लिये श्रेष्ठ माना है, उसी प्रकार पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न उत्तम माना जाता है ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

पृष्ठ 765

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 765 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टाशीतितमोऽध्यायः श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

किंस्विद् दत्तं पितृभ्यो वै भवत्यक्षयमीश्वर ।

किं हविश्चिररात्राय किमानन्त्याय कल्पते ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! पितरोंके लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तुके दानसे पितर अधिक दिनतक और किसके दानसे अनन्त कालतक तृप्त रहते हैं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

हवींषि श्राद्धकल्पे तु यानि श्राद्धविदो विदुः ।

तानि मे शृणु काम्यानि फलं चैव युधिष्ठिर ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! श्राद्धवेत्ताओंने श्राद्ध - कल्पमें जो हविष्य नियत किये हैं,

वे सब - के - सब काम्य हैं । मैं उनका तथा उनके फलका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥

तिलैब्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलैस्तथा ।

दत्तेन मासं प्रीयन्ते श्राद्धेन पितरो नृप ॥ ३ ॥

नरेश्वर! तिल, ब्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करनेसे पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहती है ॥ ३ ॥

वर्धमानतिलं श्राद्धमक्षयं मनुरब्रवीत् ।

सर्वेष्वेव तु भोज्येषु तिलाः प्राधान्यतः स्मृताः ॥ ४ ॥

मनुजीका कथन है कि जिस श्राद्धमें तिलकी मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है । श्राद्ध - सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य पदार्थोंमें तिलोंका प्रधानरूपसे उपयोग बताया गया ॥ ४ ॥

गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोच्यते ।

यथा गव्यं तथा युक्तं पायसं सर्पिषा सह ॥ ५ ॥

यदि श्राद्धमें गायका दही दान किया जाय तो उससे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति होती बतायी गयी है । गायके दहीका जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृतमिश्रित खीरका भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥

गाथाश्चाप्यत्र गायन्ति पितृगीता युधिष्ठिर ।

सनत्कुमारो भगवान् पुरा मय्यभ्यभाषत ॥ ६ ॥

पृष्ठ 766

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 766 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युधिष्ठिर! इस विषयमें पितरोंद्वारा गायी हुई गाथाका भी विज्ञ पुरुष गान करते हैं ।

पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने मुझे यह गाथा बतायी थी ॥ ६ ॥

अपि नः स्वकुले जायाद् यो नो दद्यात्त्रयोदशीम् ।

मवासु सर्पिःसंयुक्तं पायसं दक्षिणायने ॥ ७ ॥

पितर कहते हैं — ‘ क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायनमें आश्विन मासके कृष्णपक्षमें मघा और त्रयोदशी तिथिका योग होनेपर हमारे लिये घृतमिश्रित खीरका दान करेगा? ॥ ७ ॥

आजेन वापि लौहेन मघास्वेव यतव्रतः ।

हस्तिच्छायासु विधिवत् कर्णव्यजनवीजितम् ॥ ८ ॥

' अथवा वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करके मघा नक्षत्रमें ही हाथीके शरीरकी छायामें बैठकर उसके कानरूपी व्यजनसे हवा लेता हुआ अन्न-विशेष - चावलका बना हुआ पायस या लौहशाकसे विधिपूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा? ॥ ८ ॥

एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।

यत्रासौ प्रथितो लोकेष्वक्षय्यकरणो वटः ॥ ९ ॥

‘ बहुत - से पुत्र पानेकी अभिलाषा रखनी चाहिये, उनमेंसे यदि एक भी उस गया--तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात अक्षयवट विद्यमान है, जो श्राद्धके फलको अक्षय बनानेवाला है ॥ ९ ॥

आपो मूलं फलं मांसमन्नं वापि पितृक्षये ।

यत् किंचिन्मधुसम्मिश्रं तदानन्त्याय कल्पते ॥ १० ॥

‘ पितरोंकी क्षय- तिथिको जल, मूल, फल, उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधुमिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्तकालतक तृप्ति देनेवाला है ' ॥ १० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पेऽष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

पृष्ठ 767

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 767 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोननवतितमोऽध्यायः विभिन्न नक्षत्रोंमें श्राद्ध करनेका फल भीष्म उवाच

यमस्तु यानि श्राद्धानि प्रोवाच शशबिन्दवे ।

तानि मे शृणु काम्यानि नक्षत्रेषु पृथक् पृथक् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! यमने राजा शशबिन्दुको भिन्न - भिन्न नक्षत्रोंमें किये जानेवाले जो काम्य श्राद्ध बताये हैं; उनका वर्णन मुझसे सुनो ॥ १ ॥

श्राद्धं यः कृत्तिकायोगे कुर्वीत सततं नरः ।

अग्नीनाधाय सापत्यो यजेत विगतज्वरः ॥ २ ॥

जो मनुष्य सदा कृत्तिका नक्षत्रके योगमें अग्निकी स्थापना करके पुत्रसहित श्राद्ध या पितरोंका यजन करता है, वह रोग और चिन्तासे रहित हो जाता है ॥ २ ॥

अपत्यकामो रोहिण्यां तेजस्कामो मृगोत्तमे ।

क्रूरकर्मा ददच्छ्राद्धमार्द्रायां मानवो भवेत् ॥ ३ ॥

संतानकी इच्छावाला पुरुष रोहिणीमें और तेजकी कामनावाला पुरुष मृगशिरा नक्षत्रमें श्राद्ध करे । आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मनुष्य क्रूरकर्मा होता है ( इसलिये आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये ) ॥ ३ ॥

धनकामो भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं पुनर्वसौ ।

पुष्टिकामोऽथ पुष्येण श्राद्धमीहेत मानवः ॥ ४ ॥

धनकी इच्छावाले पुरुषको पुनर्वसु नक्षत्रमें श्राद्ध करना चाहिये । पुष्टिकी कामनावाला पुरुष पुष्यनक्षत्रमें श्राद्ध करे ॥ ४ ॥

आश्लेषायां ददच्छ्राद्धं धीरान् पुत्रान् प्रजायते ।

ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठो मघासु श्राद्धमावपन् ॥ ५ ॥

आश्लेषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष धीर पुत्रोंको जन्म देता है । मघामें श्राद्ध एवं पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अपने कुटुम्बी जनोंमें श्रेष्ठ होता है ॥ ५ ॥

फल्गुनीषु ददच्छ्राद्धं सुभगः श्राद्धदो भवेत् ।

अपत्यभागुत्तरासु हस्तेन फलभाग् भवेत् ॥ ६ ॥

पूर्वाफाल्गुनी श्राद्धका दान देनेवाला मानव सौभाग्यशाली होता है । उत्तराफाल्गुनीमें श्राद्ध करनेवाला संतानवान् और हस्तनक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला अभीष्ट फलका भागी होता है ॥ ६ ॥

चित्रायां तु ददच्छ्राद्धं लभेद् रूपवतः सुतान् ।

स्वातियोगे पितॄनर्च्य वाणिज्यमुपजीवति ॥ ७ ॥

पृष्ठ 768

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 768 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चित्रामें श्राद्धका दान करनेवाले पुरुषको रूपवान् पुत्र प्राप्त होते हैं । स्वातीके योगमें पितरोंकी पूजा करनेवाला वाणिज्यसे जीवन - निर्वाह करता है ॥ ७ ॥

बहुपुत्रो विशाखासु पुत्रमीहन् भवेन्नरः ।

अनुराधासु कुर्वाणो राजचक्रं प्रवर्तयेत् ॥ ८ ॥

विशाखामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य यदि पुत्र चाहता हो तो बहुसंख्यक पुत्रोंसे सम्पन्न होता है । अनुराधामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष दूसरे जन्ममें राजमण्डलका शासक होता है ॥ ८ ॥

आधिपत्यं व्रजेन्मर्त्यो ज्येष्ठायामपवर्जयन् ।

नरः कुरुकुलश्रेष्ठ ऋद्धो दमपुरःसरः ॥ ९ ॥

कुरुकुलश्रेष्ठ! ज्येष्ठा नक्षत्रमें इन्द्रियसंयमपूर्वक पिण्डदान करनेवाला मनुष्य समृद्धिशाली होता है और प्रभुत्व प्राप्त करता है ॥ ९ ॥

मूले त्वारोग्यमृच्छेत यशोऽऽषाढासु चोत्तमम् ।

उत्तरासु त्वषाढासु वीतशोकश्चरेन्महीम् ॥ १० ॥

मूलमें श्राद्ध करनेसे आरोग्यकी प्राप्ति होती है और पूर्वाषाढ़ामें उत्तम यशकी । उत्तराषाढ़ामें पितृयज्ञ करनेवाला पुरुष शोकशून्य होकर पृथ्वीपर विचरण करता है ॥ १० ॥

श्राद्धं त्वभिजिता कुर्वन् भिषक्सिद्धिमवाप्नुयात् ।

श्रवणेषु ददच्छ्राद्धं प्रेत्य गच्छेत् स सद्गतिम् ॥ ११ ॥

अभिजित् नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला वैद्यविषयक सिद्धि पाता है । श्रवण नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मानव मृत्युके पश्चात् सद्गतिको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥

राज्यभागी धनिष्ठायां भवेत नियतं नरः ।

नक्षत्रे वारुणे कुर्वन् भिषक्सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥

धनिष्ठामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य नियमपूर्वक राज्यका भागी होता है । वारुण नक्षत्र-शतभिषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष वैद्यविषयक सिद्धिको पाता है ॥ १२ ॥

पूर्वप्रोष्ठपदाः कुर्वन् बहून् विन्दत्यजाविकान् ।

उत्तरासु प्रकुर्वाणो विन्दते गाः सहस्रशः ॥ १३ ॥

पूर्वभाद्रपदा श्राद्ध करनेवाला बहुत-से भेड़- बकरोंका लाभ लेता है और उत्तराभाद्रपदामें श्राद्ध करनेवाला सहस्रों गौएँ पाता है ॥ १३ ॥

बहुकुप्यकृतं वित्तं विन्दते रेवतीं श्रितः ।

अश्विनीष्वश्वान् विन्देत भरणीष्वायुरुत्तमम् ॥ १४ ॥

श्राद्धमें रेवतीका आश्रय लेनेवाला ( अर्थात् रेवतीमें श्राद्ध करनेवाला ) पुरुष सोने-चाँदीके सिवा अन्य नाना प्रकारके धन पाता है । अश्विनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ोंकी और भरणीमें श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे उत्तम आयुकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥

पृष्ठ 769

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 769 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इमं श्राद्धविधिं श्रुत्वा शशबिन्दुस्तथाकरोत् ।

अक्लेशेनाजयच्चापि महीं सोऽनुशशास ह ॥ १५ ॥

इस श्राद्धविधिका श्रवण करके राजा शशबिन्दुने वही किया । उन्होंने बिना किस क्लेशके ही पृथ्वीको जीता और उसका शासनसूत्र अपने हाथमें ले लिया ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

पृष्ठ 770

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 770 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवतितमोऽध्यायः श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन युधिष्ठिरउवाच

कीदृशेभ्यः प्रदातव्यं भवेच्छ्राद्धं पितामह ।

द्विजेभ्यः कुरुशार्दूल तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! कैसे ब्राह्मणको श्राद्धका दान ( अर्थात् निमन्त्रण ) देना चाहिये? कुरुश्रेष्ठ! आप इसका मेरे लिये स्पष्ट वर्णन करें ॥ १ ॥

भीष्मउवाच

ब्राह्मणान् न परीक्षेत क्षत्रियो दानधर्मवित् ।

दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्यायमाहुः परीक्षणम् ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा – राजन्! दान- धर्मके ज्ञाता क्षत्रियको देवसम्बन्धी कर्म ( यज्ञ-यागादि) में ब्राह्मणकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, किंतु पितृकर्म ( श्राद्ध ) में उनकी परीक्षा न्यायसंगत मानी गयी है ॥ २ ॥

देवताः पूजयन्तीह दैवेनैवेह तेजसा ।

उपेत्य तस्माद् देवेभ्यः सर्वेभ्यो दापयेन्नरः ॥ ३ ॥

देवता अपने दैव तेजसे ही इस जगत्में ब्राह्मणोंका पूजन ( समादर) करते हैं; अतः देवताओंके उद्देश्यसे सभी ब्राह्मणोंके पास जाकर उन्हें दान देना चाहिये ॥ ३ ॥

श्राद्धे त्वथ महाराज परीक्षेद् ब्राह्मणान् बुधः ।

कुलशीलवयोरूपैर्विद्ययाभिजनेन च ॥ ४ ॥

किंतु महाराज! श्राद्धके समय विद्वान् पुरुष कुल, शील (उत्तम आचरण), अवस्था, रूप, विद्या और पूर्वजोंके निवासस्थान आदिके द्वारा ब्राह्मणकी अवश्य परीक्षा करे ॥ ४ ॥

तेषामन्ये पंक्तिदूषास्तथान्ये पंक्तिपावनाः ।

अपांक्तेयास्तु ये राजन् कीर्तयिष्यामि तान् शृणु ॥ ५ ॥

ब्राह्मणोंमें कुछ तो पंक्तिदूषक होते हैं और कुछ पंक्तिपावन । राजन्! पहले पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा, सुनो ॥ ५ ॥

कितवो भ्रूणहा यक्ष्मी पशुपालो निराकृतिः ।