06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 771–780
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780
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ग्रामप्रेष्यो वार्धुषिको गायनः सर्वविक्रयी ॥ ६ ॥
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।
सामुद्रिको राजभृत्यस्तैलिकः कूटकारकः ॥ ७ ॥
पित्रा विवदमानश्च यस्य चोपपतिर्गृहे ।
अभिशस्तस्तथा स्तेनः शिल्पं यश्चोपजीवति ॥ ८ ॥
पर्वकारश्च सूची च मित्रध्रुक् पारदारिकः ।
अव्रतानामुपाध्यायः काण्डपृष्ठस्तथैव च ॥ ९ ॥
श्वभिश्च यः परिक्रामेद् यः शुना दष्ट एव च ।
परिवित्तिश्च यश्च स्याद् दुश्चर्मा गुरुतल्पगः ॥ १० ॥
कुशीलवो देवलको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ।
ईदृशैर्ब्राह्मणैर्भुक्तमपांक्तेयैर्युधिष्ठिर ॥ ११ ॥
रक्षांसि गच्छते हव्यमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः । जुआरी, गर्भहत्यारा, राजयक्ष्माका रोगी, पशुपालन करनेवाला, अपढ़, गाँवभरका हरकारा, सूदखोर, गवैया, सब तरहकी चीज बेचनेवाला, दूसरोंका घर फूँकनेवाला, विष देनेवाला, माताद्वारा पतिके जीते -जी दूसरे पतिसे उत्पन्न किये हुए पुत्रके घर भोजन करनेवाला, सोमरस बेचनेवाला, सामुद्रिक विद्या ( हस्तरेखा ) से जीविका चलानेवाला, राजाका नौकर, तेल बेचनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, पितासे झगड़ा करनेवाला, जिसके घरमें जार पुरुषका प्रवेश हो वह, कलंकित, चोर, शिल्पजीवी, बहुरूपिया, चुगलखोर, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, व्रतरहित, मनुष्योंका अध्यापक, हथियार बनाकर जीविका चलानेवाला, कुत्ते साथ लेकर घूमनेवाला, जिसे कुत्तेने काटा हो वह, जिसके छोटे भाईका विवाह हो गया हो ऐसा अविवाहित बड़ा भाई, चर्मरोगी, गुरुपत्नीगामी, नटका काम करनेवाला, देवमन्दिरमें पूजासे जीविका चलानेवाला और नक्षत्रोंका फल बताकर जीनेवाला — ये सभी ब्राह्मण पंक्तिसे बाहर रखने योग्य हैं! युधिष्ठिर! ऐसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका खाया हुआ हविष्य राक्षसोंको मिलता है, ऐसा ब्रह्मवादी पुरुषोंका कथन है ॥ ६ -११३ ॥ श्राद्धं भुक्त्वा त्वधीयीत वृषलीतल्पगश्च यः ॥ १२ ॥
पुरीषे तस्य ते मासं पितरस्तस्य शेरते । जो ब्राह्मण श्राद्धका भोजन करके फिर उस दिन वेद पढ़ता है तथा जो वृषली स्त्रीसे समागम करता है, उसके पितर उस दिनसे लेकर एक मासतक उसीकी विष्ठामें शयन करते हैं ॥ १२ ॥
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ॥ १३ ॥
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं च वार्धुषे ।
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद् भवेत् ॥ १४ ॥
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सोमरस बेचनेवालेको जो श्राद्धका अन्न दिया जाता है, वह पितरोंके लिये विष्ठाके तुल्य है । श्राद्धमें वैद्यको जिमाया हुआ अन्न पीब और रक्तके समान पितरोंको अग्राह्य हो जाता है । देवमन्दिरमें पूजा करके जीविका चलानेवालेको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट हो जाता है— उसका कोई फल नहीं मिलता । सूदखोरको दिया हुआ अन्न अस्थिर होता है । वाणिज्यवृत्ति करनेवालेको श्राद्धमें दिये हुए अन्नका दान न इहलोकमें लाभदायक होता है और न परलोकमें ॥ १३-१४ ॥ भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ।
ये तु धर्मव्यपेतेषु चारित्रापगतेषु च ।
हव्यं कव्यं प्रयच्छन्ति तेषां तत् प्रेत्य नश्यति ॥ १५ ॥
एक पतिको छोड़कर दूसरा पति करनेवाली स्त्रीके पुत्रको दिया हुआ श्राद्धमें अन्नका दान राखमें डाले हुए हविष्यके समान व्यर्थ हो जाता है । जो लोग धर्मरहित और चरित्रहीन द्विजको हव्य- कव्यका दान करते हैं, उनका वह दान परलोकमें नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥
ज्ञानपूर्वं तु ये तेभ्यः प्रयच्छन्त्यल्पबुद्धयः ।
पुरीषं भुञ्जते तेषां पितरः प्रेत्य निश्चयः ॥ १६ ॥
जो मूर्ख मनुष्य जान- बूझकर वैसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंको श्राद्धमें अन्नका दान करते हैं, उनके पितर परलोकमें निश्चय ही उनकी विष्ठा खाते हैं ॥ १६ ॥
एतानिमान् विजानीयादपांक्तेयान् द्विजाधमान् ।
शूद्राणामुपदेशं च ये कुर्वन्त्यल्पचेतसः ॥ १७ ॥
इन अधम ब्राह्मणोंको पंक्तिसे बाहर रखने योग्य जानना चाहिये । जो मूढ़ ब्राह्मण शूद्रोंको वेदका उपदेश करते हैं, वे भी अपांक्तेय ( अर्थात् पंक्ति - बाहर) ही हैं ॥ १७ ॥
षष्टिं काणः शतं षण्ढः श्वित्री यावत्प्रपश्यति ।
पंक्त्यां समुपविष्टायां तावद् दूषयते नृप ॥ १८ ॥
राजन्! काना मनुष्य पंक्तिमें बैठे हुए साठ मनुष्योंको दूषित कर देता है । जो नपुंसक है, वह सौ मनुष्योंको अपवित्र बना देता है तथा जो सफेद कोढ़का रोगी है, वह बैठे हुए पंक्तिमें जितने लोगोंको देखता है, उन सबको दूषित कर देता है ॥ १८ ॥
यद् वेष्टितशिरा भुंक्ते यद् भुंक्ते दक्षिणामुखः ।
सोपानत्कश्च यद् भुंक्ते सर्वं विद्यात् तदासुरम् ॥ १ ९ ॥
जो सिरपर पगड़ी और टोपी रखकर भोजन करता है, जो दक्षिणकी ओर मुख करके खाता है तथा जूते पहने भोजन करता है, उनका वह सारा भोजन आसुर समझना चाहिये ॥ १ ९ ॥
असूयता च यद् दत्तं यच्च श्रद्धाविवर्जितम् ।
सर्वं तदसुरेन्द्राय ब्रह्मा भागमकल्पयत् ॥ २० ॥
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जो दोषदृष्टि रखते हुए दान करता है और जो बिना श्राद्धके देता है, उस सारे दानको ब्रह्माजीने असुरराज बलिका भाग निश्चित किया है ॥ २० ॥
श्वानश्च पंक्तिदूषाश्च नावेक्षेरन् कथंचन ।
तस्मात् परिसृते दद्यात् तिलांश्चान्ववकीरयेत् ॥ २१ ॥
कुत्तों और पंकिादूषक ब्राह्मणोंकी किसी तरह दृष्टि न पड़े, इसके लिये सब ओरसे घिरे हुए स्थानमें श्राद्धका दान करे और वहाँ सब ओर तिल छींटे ॥ २१ ॥
तिलैर्विरहितं श्राद्धं कृतं क्रोधवशेन च ।
यातुधानाः पिशाचाश्च विप्रलुम्पन्ति तद्धविः ॥ २२ ॥
जो श्राद्ध तिलोंसे रहित होता है, अथवा जो क्रोधपूर्वक किया जाता है, उसके हविष्यको यातुधान ( राक्षस) और पिशाच लुप्त कर देते हैं ॥ २२ ॥
अपांक्तो यावतः पांक्तान् भुञ्जानाननुपश्यति ।
तावत्फलाद् भ्रंशयति दातारं तस्य बालिशम् ॥ २३ ॥
पंक्तिदूषक पुरुष पंक्तिमें भोजन करनेवाले जितने ब्राह्मणोंको देख लेता है, वह मूर्ख दाताको उतने ब्राह्मणोंके दानजनित फलसे वंचित कर देता है ॥ २३ ॥
इमे तु भरतश्रेष्ठ विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः ।
ये त्वतस्तान् प्रवक्ष्यामि परीक्षस्वेह तान् द्विजान् ॥ २४ ॥
भरतश्रेष्ठ! अब जिनका वर्णन किया जा रहा है, इन सबको पंक्तिपावन जानना चाहिये । इनका वर्णन इसलिये करूँगा कि तुम ब्राह्मणोंकी श्राद्धमें परीक्षा कर सको ॥
विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः सर्व एव हि ।
सदाचारपराश्चैव विज्ञेयाः सर्वपावनाः ॥ २५ ॥
विद्या और वेदव्रतमें स्नातक हुए समस्त ब्राह्मण यदि सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हों तो उन्हें सर्वपावन जानना चाहिये ॥ २५ ॥
पांक्तेयांस्तु प्रवक्ष्यामि ज्ञेयास्ते पंक्तिपावनाः ।
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडंगवित् ॥ २६ ॥
अब मैं पांक्तेय ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा। उन्हींको पंक्तिपावन जानना चाहिये । जो त्रिणाचिकेत नामक मन्त्रोंका जप करनेवाला, गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका सेवन करनेवाला, त्रिसुपर्ण नामक ( त्रिसुपर्णमित्यादि ) मन्त्रोंका पाठ करनेवाला है तथा ' ब्रह्ममेतु माम्' इत्यादि तैत्तिरीय प्रसिद्ध शिक्षा आदि छहों अंगोंका ज्ञान रखनेवाला है ये सब पंक्तिपावन हैं ॥ २६ ॥
ब्रह्मदेयानुसंतानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगः ।
मातापित्रोर्यश्च वश्यः श्रत्रियों दशपूरुषः ॥ २७ ॥
जो परम्परासे वेद या पराविद्याका ज्ञाता अथवा उपदेशक है, जो वेदके छन्दोग - पिताके वशमें,,शाखाका विद्वान् है जो ज्येष्ठ साममन्त्रका गायक माता- रहनेवाला और दस
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पीढ़ियोंसे श्रोत्रिय ( वेदपाठी ) है, वह भी पंक्तिपावन है ॥ २७ ॥
ऋतुकालाभिगामी च धर्मपत्नीषु यः सदा ।
वेदविद्याव्रतस्नातो विप्रः पंक्तिं पुनात्युत ॥ २८ ॥
जो अपनी धर्मपत्नियोंके साथ सदा ऋतुकालमें ही समागम करता है, वेद और विद्याके व्रतमें स्नातक हो चुका है, वह ब्राह्मण- पंक्तिको पवित्र कर देता है ॥ २८ ॥
अथर्वशिरसोऽध्येता ब्रह्मचारी यतव्रतः ।
सत्यवादी धर्मशीलः स्वकर्मनिरतश्च सः ॥ २ ९ ॥
जो अथर्ववेदके ज्ञाता, ब्रह्मचारी, नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, धर्मशील और अपने कर्तव्य - कर्ममें तत्पर हैं, वे पुरुष पंक्तिपावन हैं ॥ २ ९ ॥
ये च पुण्येषु तीर्थेषु अभिषेककृतश्रमाः ।
मखेषु च समन्त्रेषु भवन्त्यवभृथप्लुताः ॥ ३० ॥
अक्रोधना ह्यचपलाः क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः ।
सर्वभूतहिता ये च श्राद्धेष्वेतान् निमन्त्रयेत् ॥ ३१ ॥
जिन्होंने पुण्य तीर्थोंमें गोता लगानेके लिये श्रम-प्रयत्न किया है, वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान करके अवभृथ स्नान किया है; जो क्रोधरहित, चपलतारहित, क्षमाशील, मनको वशमें रखनेवाले, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितैषी हैं, उन्हीं ब्राह्मणोंको श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये ॥
एतेषु दत्तमक्षय्यमेते वै पंक्तिपावनाः ।
इमे परे महाभागा विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः ॥ ३२ ॥
क्योंकि ये पंक्तिपावन हैं; अतः इन्हें दिया हुआ दान अक्षय होता है । इनके सिवा दूसरे भी महान् भाग्यशाली पंक्तिपावन ब्राह्मण हैं, उन्हें इस प्रकार जानना चाहिये ॥ ३२ ॥
यतयो मोक्षधर्मज्ञा योगाः सुचरितव्रताः । ( पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तथा भागवताः परे । वैखानसाः कुलश्रेष्ठा वैदिकाचारचारिणः ॥ ) ये चेतिहासं प्रयताः श्रावयन्ति द्विजोत्तमान् ॥ ३३ ॥
ये च भाष्यविदः केचिद् ये च व्याकरणे रताः ।
अधीयते पुराणं ये धर्मशास्त्राण्यथापि च ॥ ३४ ॥
अधीत्य च यथान्यायं विधिवत् तस्य कारिणः ।
उपपन्नो गुरुकुले सत्यवादी सहस्रशः ॥ ३५ ॥
अग्रयाः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च ।
यावदेते प्रपश्यन्ति पंक्त्यास्तावत्पुनन्त्युत ॥ ३६ ॥
जो मोक्ष- धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ- धर्मका
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पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं । जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने - पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्तिको जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं ॥ ३३–३६ ॥
ततो हि पावनात्पंक्त्याः पंक्तिपावन उच्यते ।
क्रोशादर्धतृतीयाच्च पावयेदेक एव हि ॥ ३७ ॥
ब्रह्मदेयानुसंतान इति ब्रह्मविदो विदुः । पंक्तिको पवित्र करनेके कारण ही उन्हें पंक्ति - पावन कहा जाता है । ब्रह्मवादी पुरुषोंकी यह मान्यता है कि वेदकी शिक्षा देनेवाले एवं ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंके वंशमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अकेला ही साढ़े तीन कोसतकका स्थान पवित्र कर सकता है ॥ ३७३ ॥
अनृत्विगनुपाध्यायः स चेदग्रासनं व्रजेत् ॥ ३८ ॥
ऋत्विग्भिरभ्यनुज्ञातः पंक्त्या हरति दुष्कृतम् । जो ऋत्विक् या अध्यापक न हो, वह भी यदि ऋत्विजोंकी आज्ञा लेकर श्राद्धमें अग्रासन ग्रहण करता है तो पंक्तिके दोषको हर लेता है अर्थात् दूर कर देता है ॥ अथ चेद् वेदवित् सर्वैः पंक्तिदोषैर्विवर्जितः ॥ ३ ९ ॥ न च स्यात् पतितो राजन् पंक्तिपावन एव सः । राजन्! यदि कोई वेदज्ञ ब्राह्मण सब प्रकारके पंक्तिदोषोंसे रहित है और पतित नहीं हुआ है तो वह पंक्तिपावन ही है ॥ ३ ९ ३ ॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन परीक्ष्यामन्त्रयेद् द्विजान् ॥ ४० ॥
स्वकर्मनिरतानन्यान् कुले जातान् बहुश्रुतान् । इसलिये सब प्रकारकी चेष्टाओंसे ब्राह्मणोंकी परीक्षा करके ही उन्हें श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये । वे स्वकर्ममें तत्पर रहनेवाले, कुलीन और बहुश्रुत होने चाहिये ॥ ४०३ ॥
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ॥ ४१ ॥
न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति । जिसके श्राद्धोंके भोजनमें मित्रोंकी प्रधानता रहती है, उसके वे श्राद्ध एवं हविष्य पितरों और देवताओंको तृप्त नहीं करते हैं तथा वह श्राद्धकर्ता पुरुष स्वर्गमें नहीं जाता है ॥ ४१ ॥
यश्च श्राद्धे कुरुते संगतानि न देवयानेन पथा स याति । स वै मुक्तः पिप्पलं बन्धनाद् वा
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स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्रः ॥ ४२ ॥
जो मनुष्य श्राद्धमें भोजन देकर उससे मित्रता जोड़ता है, वह मृत्युके बाद देवमार्गसे नहीं जाने पाता । जैसे पीपलका फल डंठलसे टूटकर नीचे गिर जाता है, वैसे ही श्राद्धको मित्रताका साधन बनानेवाला पुरुष स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ ४२ ॥
तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत दद्यान्मित्रेभ्यः संग्रहार्थं धनानि । यन्मन्यते नैव शत्रुं न मित्रं तं मध्यस्थं भोजयेद्धव्यकव्ये ॥ ४३ ॥
इसलिये श्राद्धकर्ताको चाहिये कि वह श्राद्धमें मित्रको निमन्त्रण न दे। मित्रोंको संतुष्ट करनेके लिये धन देना उचित है । श्राद्धमें भोजन तो उसे ही कराना चाहिये जो शत्रु या मित्र न होकर मध्यस्थ हो ॥ ४३ ॥
यथोषरे बीजमुप्तं न रोहे- न्न चावप्ता प्राप्नुयाद् बीजभागम् ।
एवं श्राद्धं भुक्तमनर्हमाणे- र्न चेह नामुत्र फलं ददाति ॥ ४४ ॥
जैसे ऊसरमें बोया हुआ बीज न तो जमता है और न बोनेवालेको उसका कोई फल मिलता है, उसी प्रकार अयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराया हुआ श्राद्धका अन्न न इस लोकमें लाभ पहुँचाता है, न परलोकमें ही कोई फल देता है ॥ ४४ ॥
ब्राह्मणो ह्यनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति ।
तस्मै श्राद्धं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥ ४५ ॥
जैसे घास-- फूसकी आग शीघ्र ही शान्त हो जाती है, उसी प्रकार स्वाध्यायहीन ब्राह्मण तेजहीन हो जाता है, अतः उसे श्राद्धका दान नहीं देना चाहिये, क्योंकि राखमें कोई भी हवन नहीं करता ॥ ४५ ॥
सम्भोजनी नाम पिशाचदक्षिणा सा नैव देवान् न पितॄनुपैति । इहैव सा भ्राम्यति हीनपुण्या शालान्तरे गौरिव नष्टवत्सा ॥ ४६ ॥
जो लोग एक- दूसरेके यहाँ श्राद्धमें भोजन करके परस्पर दक्षिणा देते और लेते हैं, उनकी वह दान -दक्षिणा पिशाच-दक्षिणा कहलाती है । वह न देवताओंको मिलती है, न पितरोंको । जिसका बछड़ा मर गया है ऐसी पुण्यहीना गौ जैसे दुखी होकर गोशालामें ही चक्कर लगाती रहती है, उसी प्रकार आपसमें दी और ली हुई दक्षिणा इसी लोकमें रह जाती है, वह पितरोंतक नहीं पहुँचने पाती ॥ ४६ ॥
यथाग्नौ शान्ते घृतमाजुहोति
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तन्नैव देवान् न पितॄनुपैति । तथा दत्तं नर्तने गायने च यां चानृते दक्षिणामावृणोति ॥ ४७ ॥
उभौ हिनस्ति न भुनक्ति चैषा या चानृते दक्षिणा दीयते वै । आघातिनी गर्हितैषा पतन्ती तेषां प्रेतान् पातयेद् देवयानात् ॥ ४८ ॥
जैसे आग बुझ जानेपर जो घृतका हवन किया जाता है, उसे न देवता पाते हैं, न पितर; उसी प्रकार नाचनेवाले, गवैये और झूठ बोलनेवाले अपात्र ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। अपात्र पुरुषको दी हुई दक्षिणा न दाताको तृप्त करती है न दान लेनेवालेको; प्रत्युत दोनोंका ही नाश करती है । यही नहीं, वह विनाशकारिणी निन्दित दक्षिणा दाताके पितरोंको देवयान मार्गसे नीचे गिरा देती है ॥ ४७-४८ ॥
ऋषीणां समये नित्यं ये चरन्ति युधिष्ठिर ।
निश्चिताः सर्वधर्मज्ञास्तान् देवा ब्राह्मणान् विदुः ॥ ४ ९ ॥
युधिष्ठिर! जो सदा ऋषियोंके बताये हुए धर्ममार्गपर चलते हैं, जिनकी बुद्धि एक निश्चयपर पहुँची हुई है तथा जो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं, उन्हींको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ४ ९ ॥
स्वाध्यायनिष्ठा ऋषयो ज्ञाननिष्ठास्तथैव च ।
तपोनिष्ठाश्च बोद्धव्याः कर्मनिष्ठाश्च भारत ॥ ५० ॥
भारत! ऋषि- मुनियोंमें किन्हींको स्वाध्यायनिष्ठ, किन्हींको ज्ञाननिष्ठ, किन्हींको तपोनिष्ठ और किन्हींको कर्मनिष्ठ जानना चाहिये ॥ ५० ॥
कव्यानि ज्ञाननिष्ठेभ्यः प्रतिष्ठाप्यानि भारत ।
तत्र ये ब्राह्मणान् केचिन्न निन्दन्ति हि ते नराः ॥ ५१ ॥
भरतनन्दन! उनमें ज्ञाननिष्ठ महर्षियोंको ही श्राद्धका अन्न जिमाना चाहिये । जो लोग ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करते, वे ही श्रेष्ठ मनुष्य हैं ॥ ५१ ॥
ये तु निन्दन्ति जल्पेषु न ताञ्छ्राद्धेषु भोजयेत् ।
ब्राह्मणा निन्दिता राजन् हन्युस्त्रैपुरुषं कुलम् ॥ ५२ ॥
वैखानसानां वचनमृषीणां श्रूयते नृप ।
दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणान् वेदपारगान् ॥ ५३ ॥
राजन्! जो बातचीतमें ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं, उन्हें श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये । नरेश्वर! वानप्रस्थ ऋषियोंका यह वचन सुना जाता है कि ‘ ब्राह्मणोंकी निन्दा होनेपर वे निन्दा करनेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं । ' वेदवेत्ता ब्राह्मणोंकी दूरसे ही परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५२-५३ ॥
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प्रियो वा यदि वा द्वेष्यस्तेषां तु श्राद्धमावपेत् ।
यः सहस्रं सहस्राणां भोजयेदनृतान् नरः ।
एकस्तान्मन्त्रवित् प्रीतः सर्वानर्हति भारत ॥ ५४ ॥
भारत! वेदज्ञ पुरुष अपना प्रिय हो या अप्रिय- इसका विचार न करके उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये । जो दस लाख अपात्र ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसके यहाँ उन सबके बदले एक ही सदा संतुष्ट रहनेवाला वेदज्ञ ब्राह्मण भोजन करनेका अधिकारी है, अर्थात् लाखों मूर्खोकी अपेक्षा एक सत्पात्र ब्राह्मणको भोजन कराना उत्तम है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं ) Paca
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एकनवतितमोऽध्यायः शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
केन संकल्पितं श्राद्धं कस्मिन् काले किमात्मकम् ।
भृग्वंगिरसिके काले मुनिना कतरेण वा ॥ १ ॥
कानि श्राद्धानि वर्ज्यानि कानि मूलफलानि च ।
धान्यजात्यश्च का वर्ज्यास्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! श्राद्ध कब प्रचलित हुआ? सबसे पहले किस महर्षिने इसका संकल्प किया अर्थात् प्रचार किया? श्राद्धका स्वरूप क्या है? यदि भृगु और अंगिराके समयमें इसका प्रारम्भ हुआ तो किस मुनिने इसको प्रकट किया? श्राद्धमें कौन-कौनसे कर्म, कौन - कौनसे फल मूल और कौन- कौनसे अन्न त्याग देने योग्य हैं? वह मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥ भीष्म उवाच
यथा श्राद्धं सम्प्रवृत्तं यस्मिन् काले यदात्मकम् ।
येन संकल्पितं चैव तन्मे शृणु जनाधिप ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! श्राद्धका जिस समय और जिस प्रकार प्रचलन हुआ, जो इसका स्वरूप है तथा सबसे पहले जिसने इसका संकल्प किया अर्थात् प्रचार किया, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
स्वायम्भुवोऽत्रिः कौरव्य परमर्षिः प्रतापवान् तस्य वंशे महाराज दत्तात्रेय इति स्मृतः ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन! महाराज! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीसे महर्षि अत्रिकी उत्पत्ति हुई । वे बड़े प्रतापी ऋषि थे । उनके वंशमें दत्तात्रेयजीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ४ ॥
दत्तात्रेयस्य पुत्रोऽभून्निमिर्नाम तपोधनः ।
निमेश्चाप्यभवत् पुत्रः श्रीमान्नाम श्रिया वृतः ॥ ५ ॥
दत्तात्रेयके पुत्र निमि हुए, जो बड़े तपस्वी थे । निमिके भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम था श्रीमान् । वह बड़ा कान्तिमान् था ॥ ५ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रान्ते स कृत्वा दुष्करं तपः ।
कालधर्मपरीतात्मा निधनं समुपागतः ॥ ६ ॥
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उसने पूरे एक हजार वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या करके अन्तमें काल - धर्मके अधीन होकर प्राण त्याग दिया ॥
निमिस्तु कृत्वा शौचानि विधिदृष्टेन कर्मणा ।
संतापमगमत् तीव्रं पुत्रशोकपरायणः ॥ ७ ॥
फिर निमि शास्त्रोक्त कर्मद्वारा अशौच निवारण करके पुत्र - शोकमें मग्न हो अत्यन्त संतप्त हो उठे ॥ ७ ॥
अथ कृत्वोपहार्याणि चतुर्दश्यां महामतिः ।
तमेव गणयन् शोकं विरात्रे प्रत्यबुध्यत ॥ ८ ॥
तदनन्तर परम बुद्धिमान् निमि चतुर्दशीके दिन श्राद्धमें देने योग्य सब वस्तुएँ एकत्रित करके पुत्रशोकसे ही चिन्तित हो रात बीतनेपर ( अमावास्याको श्राद्ध करनेके लिये ) प्रातः काल उठे ॥ ८ ॥
तस्यासीत् प्रतिबुद्धस्य शोकेन व्यथितात्मनः ।
मनः संवृत्य विषये बुद्धिर्विस्तारगामिनी ॥ ९ ॥
ततः संचिन्तयामास श्राद्धकल्पं समाहितः । प्रातःकाल जागनेपर उनका मन पुत्रशोकसे व्यथित होता रहा; किन्तु उनकी बुद्धि बड़ी विस्तृत थी । उसके द्वारा उन्होंने मनको शोककी ओरसे हटाया और एकाग्रचित्त होकर श्राद्धविधिका विचार किया ॥ ९ ३ ॥ यानि तस्यैव भोज्यानि मूलानि च फलानि च ॥ १० ॥
उक्तानि यानि चान्नानि यानि चेष्टानि तस्य ह ।
तानि सर्वाणि मनसा विनिश्चित्य तपोधनः ॥ ११ ॥
फिर श्राद्धके लिये शास्त्रोंमें जो फल- मूल आदि भोज्य पदार्थ बताये गये हैं तथा उनमेंसे जो- जो पदार्थ उनके पुत्रको प्रिय थे, उन सबका मन-ही- मन निश्चय करके उन तपोधनने संग्रह किया ॥ १०-११ ॥
अमावास्यां महाप्राज्ञो विप्रानानाय्य पूजितान् ।
दक्षिणावर्तिकाः सर्वा बृसीः स्वयमथाकरोत् ॥ १२ ॥
तदनन्तर, उन महान् बुद्धिमान् मुनिने अमावास्याके दिन सात ब्राह्मणोंको बुलाकर उनकीपूजा की और उनके लिये स्वयं ही प्रदक्षिण भावसे मोड़े हुए कुशके आसन बनाकर उन्हें उनपर बिठाया ॥ १२ ॥
सप्त विप्रांस्ततो भोज्ये युगपत् समुपानयत् ।
ऋते च लवणं भोज्यं श्यामाकान्नं ददौ प्रभुः ॥ १३ ॥
प्रभावशाली निमिने उन सातोंको एक ही साथ भोजनके लिये अलोना सावाँ परोसा ॥ १३ ॥
दक्षिणाग्रास्ततो दर्भा विष्टरेषु निवेशिताः ।