06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 81–90
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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महर्षि वसिष्ठका ब्रह्माजीके साथ प्रश्नोत्तर
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ततः फलानि पत्राणि शाखाश्चापि मनोहराः ।
शुकस्य दृढभक्तित्वात् श्रीमत्तां प्राप स द्रुमः ॥ ३० ॥
फिर तो उसमें नये- नये पत्ते, फल और मनोहर शाखाएँ निकल आयीं । तोतेकी दृढ़भक्तिके कारण वह वृक्ष पूर्ववत् श्रीसम्पन्न हो गया ॥ ३० ॥
शुकश्च कर्मणा तेन आनृशंस्यकृतेन वै ।
आयुषोऽन्ते महाराज प्राप शक्रसलोकताम् ॥ ३१ ॥
महाराज! वह शुक भी आयु समाप्त होनेपर अपने उस दयापूर्ण बर्तावके कारण इन्द्रलोकको प्राप्त हुआ ॥ ३१ ॥
एवमेव मनुष्येन्द्र भक्तिमन्तं समाश्रितः ।
सर्वार्थसिद्धिं लभते शुकं प्राप्य यथा द्रुमः ॥ ३२ ॥
नरेन्द्र! जैसे भक्तिमान् शुकका सहवास पाकर उस वृक्षने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर ली, उसी प्रकार अपनेमें भक्ति रखनेवाले पुरुषका सहारा पाकर प्रत्येक मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध कर लेता है ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शुकवासवसंवादे पञ्चमोऽध्यायः ॥५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुक और इन्द्रका संवादविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
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षष्ठोऽध्यायः दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन युधिष्ठिरउवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
दैवे पुरुषकारे च किंस्वित् श्रेष्ठतरं भवेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ महाप्राज्ञ पितामह! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वसिष्ठस्य च संवादं ब्रह्मणश्च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस विषयमें वसिष्ठ और ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहण दिया जाता है ॥ २ ॥
दैवमानुषयोः किंस्वित् कर्मणोः श्रेष्ठमित्युत ।
पुरा वसिष्ठो भगवान् पितामहमपृच्छत ॥ ३ ॥
प्राचीन कालकी बात है, भगवान् वसिष्ठने लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा — ' प्रभो! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है? ' ॥ ३ ॥
ततः पद्मोद्भवो राजन् देवदेवः पितामहः ।
उवाच मधुरं वाक्यमर्थवद्धेतुभूषितम् ॥ ४ ॥
राजन्! तब कमलजन्मा देवाधिदेव पितामहने मधुर स्वरमें युक्तियुक्त सार्थक वचन कहा— ॥ ४ ॥
ब्रह्मोवाच
( बीजतो ह्यङ्कुरोत्पत्तिरङ्कुरात् पर्णसम्भवः ।
पर्णान्नालाः प्रसूयन्ते नालात् स्कन्धः प्रवर्तते ॥
स्कन्धात् प्रवर्तते पुष्पं पुष्पान्निर्वर्तते फलम् । फलान्निर्वर्त्यते बीजं बीजं नाफलमुच्यते ॥ ) ब्रह्माजीने कहा – मुने! बीजसे अंकुरकी उत्पत्ति होती है, अंकुरसे पत्ते होते हैं । पत्तोंसे नाल, नालसे तने और डालियाँ होती हैं । उनसे पुष्प प्रकट होता है । फूलसे फल लगता है और फलसे बीज उत्पन्न होता है और बीज कभी निष्फल नहीं बताया गया है ॥
नाबीजं जायते किंचिन्न बीजेन बिना फलम् ।
बीजाद् बीजं प्रभवति बीजादेव फलं स्मृतम् ॥ ५ ॥
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बीजके बिना कुछ भी पैदा नहीं होता, बीजके बिना फल भी नहीं लगता । बीजसे बीज प्रकट होता है और बीजसे ही फलकी उत्पत्ति मानी जाती है ॥ ५ ॥
यादृशं वपते बीजं क्षेत्रमासाद्य कर्षकः ।
सुकृते दुष्कृते वापि तादृशं लभते फलम् ॥ ६ ॥
किसान खेतमें जाकर जैसा बीज बोता है उसीके अनुसार उसको फल मिलता है । इसी प्रकार पुण्य या पाप— जैसा कर्म किया जाता है वैसा ही फल मिलता है ॥ ६ ॥
यथा बीजं विना क्षेत्रमुप्तं भवति निष्फलम् ।
तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ७ ॥
जैसे बीज खेतमें बोये बिना फल नहीं दे सकता, उसी प्रकार दैव ( प्रारब्ध) भी पुरुषार्थके बिना नहीं सिद्ध होता ॥ ७ ॥
क्षेत्रं पुरुषकारस्तु दैवं बीजमुदाहृतम् ।
क्षेत्रबीजसमायोगात् ततः सस्यं समृद्ध्यते ॥ ८ ॥
पुरुषार्थ खेत है और दैवको बीज बताया गया है । खेत और बीजके संयोगसे ही अनाज पैदा होता है ॥ ८ ॥
कर्मणः फलनिर्वृत्तिं स्वयमश्नाति कारकः ।
प्रत्यक्षं दृश्यते लोके कृतस्यापकृतस्य च ॥ ९ ॥
कर्म करनेवाला मनुष्य अपने भले या बुरे कर्मका फल स्वयं ही भोगता है । यह बात संसारमें प्रत्यक्ष दिखायी देती है ॥ ९ ॥
शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा ।
कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित् ॥ १० ॥
शुभ कर्म करनेसे सुख और पाप कर्म करनेसे दुःख मिलता है । अपना किया हुआ कर्म सर्वत्र ही फल देता है । बिना किये हुए कर्मका फल कहीं नहीं भोगा जाता ॥ १० ॥
कृती सर्वत्र लभते प्रतिष्ठां भाग्यसंयुताम् ।
अकृती लभते भ्रष्टः क्षते क्षारावसेचनम् ॥ ११ ॥
पुरुषार्थी मनुष्य सर्वत्र भाग्यके अनुसार प्रतिष्ठा पाता है; परंतु जो अकर्मण्य है वह सम्मानसे भ्रष्ट होकर घावपर नमक छिड़कनेके समान असह्य दुःख भोगता है ॥ ११ ॥
तपसा रूपसौभाग्यं रत्नानि विविधानि च ।
प्राप्यते कर्मणा सर्वं न दैवादकृतात्मना ॥ १२ ॥
मनुष्यको तपस्यासे रूप, सौभाग्य और नाना प्रकारके रत्न प्राप्त होते हैं । इस प्रकार कर्मसे सब कुछ मिल सकता है; परंतु भाग्यके भरोसे निकम्मे बैठे रहनेवालेको कुछ नहीं मिलता ॥ १२ ॥
तथा स्वर्गश्च भोगश्च निष्ठा या च मनीषिता ।
सर्वं पुरुषकारेण कृतेनेहोपलभ्यते ॥ १३ ॥
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इस जगत्में पुरुषार्थ करनेसे स्वर्ग, भोग, धर्ममें निष्ठा और बुद्धिमत्ता- इन सबकी उपलब्धि होती है ॥ १३ ॥
ज्योतींषि त्रिदशा नागा यक्षाश्चन्द्रार्कमारुताः ।
सर्वं पुरुषकारेण मानुष्याद् देवतां गताः ॥ १४ ॥
नक्षत्र, देवता, नाग, यक्ष, चन्द्रमा, सूर्य और वायु आदि सभी पुरुषार्थ करके ही मनुष्यलोकसे देवलोकको गये हैं ॥ १४ ॥
अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्यं वा कुलान्वितम् ।
श्रीश्चापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभिः ॥ १५ ॥
जो पुरुषार्थ नहीं करते वे धन, मित्रवर्ग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल तथा दुर्लभ लक्ष्मीका भी उपभोग नहीं कर सकते ॥ १५ ॥
शौचेन लभते विप्रः क्षत्रियो विक्रमेण तु ।
वैश्यः पुरुषकारेण शूद्रः शुश्रूषया श्रियम् ॥ १६ ॥
ब्राह्मण शौचाचारसे, क्षत्रिय पराक्रमसे, वैश्य उद्योगसे तथा शूद्र तीनों वर्णोंकी सेवासे सम्पत्ति पाता है ॥ १६ ॥
नादातांर भजन्त्यर्था न क्लीबं नापि निष्क्रियम् ।
नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम् ॥ १७ ॥
न तो दान न देनेवाले कंजूसको धन मिलता है, न नपुंसकको, न अकर्मण्यको, न कामसे जी चुरानेवालेको, न शौर्यहीनको और न तपस्या न करनेवालेको ही मिलता ॥ १७ ॥
येन लोकास्त्रयः सृष्टा दैत्याः सर्वाश्च देवताः ।
स एष भगवान् विष्णुः समुद्रे तप्यते तपः ॥ १८ ॥
जिन्होंने तीनों लोकों, दैत्यों तथा सम्पूर्ण देवताओंकी भी सृष्टि की है, वे ही ये भगवान् विष्णु समुद्रमें रहकर तपस्या करते हैं ॥ १८ ॥
स्वं चेत् कर्मफलं न स्यात् सर्वमेवाफलं भवेत् ।
लोको दैवं समालक्ष्य उदासीनो भवेन्ननु ॥। १ ९ ॥
यदि अपने कर्मोंका फल न प्राप्त हो तो सारा कर्म ही निष्फल हो जाय और सब लोग भाग्यको ही देखते हुए कर्म करनेसे उदासीन हो जायँ ॥ १ ९ ॥
अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते ।
वृथा श्राम्यति सम्प्राप्य पतिं क्लीबमिवाङ्गना ॥ २० ॥
मनुष्यके योग्य कर्म न करके जो पुरुष केवल दैवका अनुसरण करता है वह दैवका आश्रय लेकर व्यर्थ ही कष्ट उठाता है । जैसे कोई स्त्री अपने नपुंसक पतिको पाकर भी कष्ट ही भोगती है ॥ २० ॥
न तथा मानुषे लोके भयमस्ति शुभाशुभे ।
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तथा त्रिदशलोके हि भयमल्पेन जायते ॥ २१ ॥
इस मनुष्यलोकमें शुभाशुभ कर्मोंसे उतना भय नहीं प्राप्त होता, जितना कि देवलोकमें थोड़े ही पापसे भय होता है ॥ २१ ॥
कृतः पुरुषकारस्तु दैवमेवानुवर्तते ।
न दैवमकृते किंचित् कस्यचिद् दातुमर्हति ॥ २२ ॥
किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवका अनुसरण करता है; परंतु पुरुषार्थ न करनेपर दैव किसीको कुछ नहीं दे सकता ॥ २२ ॥
यथा स्थानान्यनित्यानि दृश्यन्ते दैवतेष्वपि ।
कथं कर्म विना दैवं स्थास्यति स्थापयिष्यति ॥ २३ ॥
देवताओंमें भी जो इन्द्रादिके स्थान हैं वे अनित्य देखे जाते हैं । पुण्यकर्मके बिना दैव कैसे स्थिर रहेगा और कैसे वह दूसरोंको स्थिर रख सकेगा ॥ २३ ॥
न दैवतानि लोकेऽस्मिन् व्यापारं यान्ति कस्यचित् ।
व्यासङ्गं जनयन्त्युग्रमात्माभिभवशङ्कया ॥ २४ ॥
देवता भी इस लोकमें किसीके पुण्यकर्मका अनुमोदन नहीं करते हैं, अपितु अपनी पराजयकी आशंकासे वे पुण्यात्मा पुरुषमें भयंकर आसक्ति पैदा कर देते हैं ( जिससे उनके धर्ममें विघ्न उपस्थित हो जाय ) ॥ २४ ॥
ऋषीणां देवतानां च सदा भवति विग्रहः ।
कस्य वाचा ह्यदैवं स्याद् यतो दैवं प्रवर्तते ॥ २५ ॥
ऋषियों और देवताओंमें सदा कलह होता रहता है ( देवता ऋषियोंकी तपस्यामें विघ्न डालते हैं तथा ऋषि अपने तपोबलसे देवताओंको स्थानभ्रष्ट कर देते हैं । ) फिर भी दैवके बिना केवल कथन मात्रसे किसको सुख या दुःख मिल सकता है? क्योंकि कर्मके मूलमें दैवका ही हाथ है ॥ २५ ॥
कथं तस्य समुत्पत्तिर्यतो दैवं प्रवर्तते ।
एवं त्रिदशलोकेऽपि प्राप्यन्ते बहवो गुणाः ॥ २६ ॥
दैवके बिना पुरुषार्थकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? क्योंकि प्रवृत्तिका मूल कारण दैव ही है (जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्यकर्म किये हैं, वे ही दूसरे जन्ममें भी पूर्वसंस्कारवश पुण्यमें प्रवृत्त होते हैं । यदि ऐसा न हो तो सभी पुण्यकर्मोंमें ही लग जायँ ) । देवलोकमें भी दैववश ही बहुत - से गुण ( सुखद साधन ) उपलब्ध होते हैं ॥ २६ ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च ॥ २७ ॥
आत्मा ही अपना बन्धु है, आत्मा ही अपना शत्रु है तथा आत्मा ही अपने कर्म और अकर्मका साक्षी है ॥ २७ ॥
कृतं चाप्यकृतं किंचित् कृते कर्मणि सिद्ध्यति ।
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सुकृतं दुष्कृतं कर्म न यथार्थं प्रपद्यते ॥ २८ ॥
प्रबल पुरुषार्थ करनेसे पहलेका किया हुआ भी कोई कर्म बिना किया हुआ - सा हो जाता है और वह प्रबल कर्म ही सिद्ध होकर फल प्रदान करता है । इस तरह पुण्य या पापकर्म अपने यथार्थ फलको नहीं दे पाते हैं ॥ २८ ॥
देवानां शरणं पुण्यं सर्वं पुण्यैरवाप्यते ।
पुण्यशीलं नरं प्राप्य किं दैवं प्रकरिष्यति ॥ २ ९ ॥
देवताओंका आश्रय पुण्य ही है । पुण्यसे ही सब कुछ प्राप्त होता है । पुण्यात्मा पुरुषको पाकर दैव क्या करेगा? ॥ २ ९ ॥
पुरा ययातिर्विभ्रष्टश्यावितः पतितः क्षितौ ।
पुनरारोपितः स्वर्गं दौहित्रैः पुण्यकर्मभिः ॥ ३० ॥
पूर्वकालमें राजा ययाति पुण्य क्षीण होनेपर स्वर्गसे च्युत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े थे; परंतु उनके पुण्यकर्मा दौहित्रोंने उन्हें पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया ॥ ३० ॥
पुरूरवाश्च राजर्षिर्द्विजैरभिहितः पुरा ।
ऐल इत्यभिविख्यातः स्वर्गं प्राप्तो महीपतिः ॥ ३१ ॥
इसी तरह पूर्वकालमें ऐल नामसे विख्यात राजर्षि पुरूरवा ब्राह्मणोंके आशीर्वाद देनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए थे ॥ ३१ ॥
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैः सत्कृतः कोसलाधिपः ।
महर्षिशापात् सौदासः पुरुषादत्वमागतः ॥ ३२ ॥
( अब इसके विपरीत दृष्टान्त देते हैं— ) अश्वमेध आदि यज्ञोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी कोशलनरेश सौदासको महर्षि वसिष्ठके शापसे नरभक्षी राक्षस होना पड़ा ॥ ३२ ॥
अश्वत्थामा च रामश्च मुनिपुत्रौ धनुर्धरौ ।
न गच्छतः स्वर्गलोकं सुकृतेनेह कर्मणा ॥ ३३ ॥
इसी प्रकार अश्वत्थामा और परशुराम – ये दोनों ही ऋषिपुत्र और धनुर्धर वीर हैं । इन दोनोंने पुण्यकर्म भी किये हैं तथापि उस कर्मके प्रभावसे स्वर्गमें नहीं गये ॥ ३३ ॥
वसुर्यज्ञशतैरिष्ट्वा द्वितीय इव वासवः ।
मिथ्याभिधानेनैकेन रसातलतलं गतः ॥ ३४ ॥
द्वितीय इन्द्रके समान सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा वसु एक ही मिथ्या भाषणके दोषसे रसातलको चले गये ॥ ३४ ॥
बलिर्वैरोचनिर्बद्धो धर्मपाशेन दैवतैः ।
विष्णोः पुरुषकारेण पातालसदनः कृतः ॥ ३५ ॥
विरोचनकुमार बलिको देवताओंने धर्मपाशसे बाँध लिया और भगवान् विष्णुके पुरुषार्थसे वे पातालवासी बना दिये गये ॥ ३५ ॥
शक्रस्योद्गम्य चरणं प्रस्थितो जनमेजयः ।
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द्विजस्त्रीणां वधं कृत्वा किं दैवेन न वारितः ॥ ३६ ॥
राजा जनमेजय द्विज स्त्रियोंका वध करके इन्द्रके चरणका आश्रय ले जब स्वर्गलोकको प्रस्थित हुए, उस समय दैवने उसे आकर क्यों नहीं रोका ॥ ३६ ॥
अज्ञानाद् ब्राह्मणं हत्वा स्पृष्टो बालवधेन च ।
वैशम्पायनविप्रर्षिः किं दैवेन न वारितः ॥ ३७ ॥
ब्रह्मर्षि वैशम्पायन अज्ञानवश ब्राह्मणकी हत्या करके बाल - वधके पापसे भी लिप्त हो गये थे तो भी दैवने उन्हें स्वर्ग जानेसे क्यों नहीं रोका ॥ ३७ ॥
गोप्रदानेन मिथ्या च ब्राह्मणेभ्यो महामखे ।
पुरा नृगश्च राजर्षिः कृकलासत्वमागतः ॥ ३८ ॥
पूर्वकालमें राजर्षि नृग बड़े दानी थे । एक बार किसी महायज्ञमें ब्राह्मणोंको गोदान करते समय उनसे भूल हो गयी; अर्थात् एक गऊको दुबारा दानमें दे दिया, जिसके कारण उन्हें गिरगिटकी योनिमें जाना पड़ा ॥ ३८ ॥
धुन्धुमारश्च राजर्षिः सत्रेष्वेव जरां गतः ।
प्रीतिदायं परित्यज्य सुष्वाप स गिरिव्रजे ॥ ३ ९ ॥
राजर्षि धुन्धुमार यज्ञ करते- करते बूढ़े हो गये तथापि देवताओंके प्रसन्नतापूर्वक दिये हुए वरदानको त्यागकर गिरिव्रजमें सो गये ( यज्ञका फल नहीं पा सके ) ॥
पाण्डवानां हृतं राज्यं धार्तराष्ट्रैर्महाबलैः ।
पुनः प्रत्याहृतं चैव न दैवाद् भुजसंश्रयात् ॥ ४० ॥
महाबली धृतराष्ट्र- पुत्रोंने पाण्डवोंका राज्य हड़प लिया था । उसे पाण्डवोंने पुनः
बाहुबलसे ही वापस लिया । दैवके भरोसे नहीं ॥ ४० ॥
तपोनियमसंयुक्ता मुनयः संशितव्रताः ।
किं ते दैवबलात् शापमुत्सृजन्ते न कर्मणा ॥ ४१ ॥
तप और नियममें संयुक्त रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि क्या दैवबलसे ही किसीको शाप देते हैं, पुरुषार्थके बलसे नहीं? ॥ ४१ ॥
पापमुत्सृजते लोके सर्वं प्राप्य सुदुर्लभम् ।
लोभमोहसमापन्नं न दैवं त्रायते नरम् ॥ ४२ ॥
संसारमें समस्त सुदुर्लभ सुख भोग किसी पापीको प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके पास टिकता नहीं, शीघ्र ही उसे छोड़कर चल देता है । जो मनुष्य लोभ और मोहमें डूबा हुआ है उसे दैव भी संकटसे नहीं बचा सकता ॥
यथाग्निः पवनोद्धूतः सुसूक्ष्मोऽपि महान् भवेत् ।
तथा कर्मसमायुक्तं दैवं साधु विवर्धते ॥ ४३ ॥
जैसे थोड़ी - सी भी आग वायुका सहारा पाकर बहुत बड़ी हो जाती है, उसी प्रकार पुरुषार्थका सहारा पाकर दैवका बल विशेष बढ़ जाता है ॥ ४३ ॥
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यथा तैलक्षयाद् दीपः प्रह्लासमुपगच्छति ।
तथा कर्मक्षयाद् दैवं प्रह्रासमुपगच्छति ॥ ४४ ॥
जैसे तेल समाप्त हो जानेसे दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्मके क्षीण हो जानेपर दैव भी नष्ट हो जाता है ॥ ४४ ॥
विपुलमपि धनौघं प्राप्य भोगान् स्त्रियो वा पुरुष इह न शक्तः कर्महीनो हि भोक्तुम् । सुनिहितमपि चार्थं दैवतै रक्ष्यमाणं पुरुष इह महात्मा प्राप्नुते नित्ययुक्तः ॥ ४५ ॥
उद्योगहीन मनुष्य धनका बहुत बड़ा भण्डार, तरह- तरहके भोग और स्त्रियोंको पाकर भी उनका उपभोग नहीं कर सकता; किंतु सदा उद्योगमें लगा रहनेवाला महामनस्वी पुरुष देवताओंद्वारा सुरक्षित तथा गाड़कर रखे हुए धनको भी प्राप्त कर लेता है ॥ ४५ ॥
व्ययगुणमपि साधुं कर्मणा संश्रयन्ते भवति मनुजलोकाद् देवलोको विशिष्टः । बहुतरसुसमृद्ध्या मानुषाणां गृहाणि पितृवनभवनाभं दृश्यते चामराणाम् ॥ ४६ ॥
जो दान करनेके कारण निर्धन हो गया है, ऐसे सत्पुरुषके पास उसके सत्कर्मके कारण देवता भी पहुँचते हैं और इस प्रकार उसका घर मनुष्यलोककी अपेक्षा श्रेष्ठ देवलोक- सा हो जाता है । परंतु जहाँ दान नहीं होता वह घर बड़ी भारी समृद्धिसे भरा हो तो भी देवताओंकी दृष्टिमें वह श्मशानके ही तुल्य जान पड़ता है ॥ ४६ ॥
न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं व्यपनयति विमार्गं नास्ति दैवे प्रभुत्वम् । गुरुमिव कृतमग्रयं कर्म संयाति दैवं नयति पुरुषकारः संचितस्तत्र तत्र ॥ ४७ ॥
इस जीव- जगत्में उद्योगहीन मनुष्य कभी फूलता- फलता नहीं दिखायी देता । दैवमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह उसे कुमार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगा दे । जैसे शिष्य गुरुको
आगे करके चलता है उसी तरह दैव पुरुषार्थको ही आगे करके स्वयं उसके पीछे चलता है ।
संचित किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवको जहाँ चाहता है, वहाँ- वहाँ ले जाता है ॥ ४७ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया वै मुनिसत्तम ।
फलं पुरुषकारस्य सदा संदृश्य तत्त्वतः ॥ ४८ ॥
मुनिश्रेष्ठ! मैंने सदा पुरुषार्थके ही फलको प्रत्यक्ष देखकर यथार्थरूपसे ये सारी बातें तुम्हें बतायी हैं ॥ ४८ ॥
अभ्युत्थानेन दैवस्य समारब्धेन कर्मणा ।
विधिना कर्मणा चैव स्वर्गमार्गमवाप्नुयात् ॥ ४ ९ ॥
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मनुष्य दैवके उत्थानसे आरम्भ किये हुए पुरुषार्थसे उत्तम विधि और शास्त्रोक्त सत्कर्मसे ही स्वर्गलोकका मार्ग पा सकता है ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दैवपुरुषकारनिर्देशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दैव और पुरुषार्थका निर्देशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं )