सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 1–10

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 1–10

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[ ट ] ( ६ ) समधिगतं मया भवत्प्रहितं प्रचलप्रमाणपूर्ण पत्रम्, यदर्थं धन्यवादततिं विरामि तत्रभवद्भ्यो भवद्भ्यः । ( श्रीधर्मदेवः-सिद्धान्तालङ्कारः ' सार्वदेशिकसम्पादकः, देहली ) । ( १० ) पं. दीनानाथस्य विशालशास्त्रज्ञानस्य न केवलं वयं प्रशंसामेव कुर्मः, प्रत्युत पण्डितवर्य दिष्ट्या धन्यवादैश्च सम्मान-यामः । प्रार्थयामहे च यत्- पण्डितप्रकाण्डस्य अनन्यसदृशं संस्कृतज्ञानं शास्त्रज्ञानं च वैदिकधर्माय भारतवर्षाय च लाभकरं स्यात् । ( कुलभूषणः ' श्री ' सम्पादकः, श्रीनगर ( कश्मीर ) ( ११ ) अस्मद्विधाने यदि संशयः, तर्हि चास्मन्नेवाङ्क प्रकटिते विद्वदप्रेसराणां सकलशास्त्र सागरालोडन चतुराणां श्रीदीनानाथ-शास्त्रिणां प्रतिवादिमुखमर्दन क्षमः, सकलसंशयविच्छेदकः, प्रमाणपरिबृ ंहितः, प्रबलयुक्ति - पराहतदुरा क्षेपः, सरसतरो लेखोऽनु-वाच्यतां सादरं मननगोचरीकरणीयश्च, येन दुराग्रहमूलका दुरालापा विलीयेरन् ( गलगली श्रीरामाचार्यः चुर्ली श्रीनिवासाचार्यः ' मधुरवाणी - सम्पादकौ. वेलगांव | ) ( १२ )... सम्प्रति श्रीमन्तो हि केवलं तादृशा धुरन्धर लेखकाः सन्ति, येषां साम्यं न कोपि विद्वान् कर्तुं शक्नोति, किं बहूक्तचा-इत्यहो लेखक मूर्धन्यस्य धन्यतेति । ( बालकृष्ण भट्टशास्त्री साहित्या-चार्यः प्रधानाध्यापकः संस्कृत महाविद्यालयः, गुप्तकाशी ( गढ़वाल ) ( १३ ) ' संस्कृतपत्त्रेषु भावत्कलेख भारतीलेखन प्रौढि दर्श दर्श नितरां तुष्यामि । श्री पं. कालूरामशास्त्रिभिः श्री पं. गङ्गाविष्णु-शास्त्रिभिश्च श्रमत्कग्रन्थविषयक उदन्तः श्रीवितः । साम्प्रतम् एकस्मिन् पत्रे मुद्रितः कियांश्चित् तदंशोपि समवलोकितः । प्रश-स्यतमोऽयं भवदीयः प्रयत्नोऽतितराम् " ( माधवाचार्यः शास्त्री महोपदेशकः, कौल- करनाल ) 1 ( १४ ) सूर्य भगवान् लोकसे सुदूरवर्ती हैं, परन्तु व्याप CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ 5 ] प्रकाशसे सबके समीप ही हैं । एवं आपसे यद्यपि साक्षात् परिचय तो नहीं है, तथापि संस्कृतपत्रिकाओं में आपके कई शास्त्रीय लेख देखने - सुनने में आते रहते हैं, इस रीति से आपसे, परिचिति मानते हैं । ( मेधाकर शास्त्री चतुर्वेदी, राजकुमार कालेज, रायपुर. सी.पी. ) ( १५ ) वर्तमान समय में जब कि पाखण्डवादका ही प्राधान्य है, और प्रत्यक्ष प्रमाण ही प्रमाण है, तब युक्तिवाद से ही प्रति-वादिमुखभजन आवश्यक है । आपके लेखों में युक्तिवाद रहते हुए शास्त्रीय - प्रमाण भी रहते हैं । अतः विशेष उपयोगी हैं । आपके लेखोंसे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है ( नन्दकिशोर प्रधा नाध्यापकः, दरबार- संस्कृतविद्यालय, लक्ष्मणबाग, रीवां स्टेट ) । एतदादिक प्रयाचित - सम्मतियां बहुत अधिक आई हुई हैं, स्थानाभाववश सब प्रकाशित नहीं ही जा सकीं । ' आलोक ' ग्रन्थ-मालाको स्वयं खरीदकर तथा दूसरोंसे खरीदवाकर सनातनधर्म के प्रचार तथा सातवें सुमनके विकास में सहयोग दें । निवेदक: --नारायणशर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री, प्रभाकर ( बी ० ए ० ). [ प्रकाशक ] [ छ । २. जगद्गुरुशङ्कराचार्य शारदापीठ अनन्तश्री प्रभिनव सच्चिदानन्दतीर्थ स्वामीजी महाराज, द्वारका २३२ ) । ३. स्वर्गीय पं. रेवाशङ्करजी शास्त्री पुरोहित, बम्बई २०० ) । ४. पं. ब्रह्मदत्तजी शर्मा, कादेड़ा ३२२ ) । ५. पं. यशोदानन्दनजी शास्त्री जयतल, गाजियाबाद ४० ) । ६. पं. हरिप्रसादजी शास्त्री ओ. टी., पठानकोट १२५ ), शेष ७५ ) । ७. पं. रामेश्वरजी शास्त्री, जायल, मूंडवा, १५२ ) । ८. भक्त रामशरणदास-जी, पिलखुआ ३२ ) । ६. श्री. छोटेलालजी कानीडिया, कलकत्ता ५० ) । १०. स्वा. पुरुषोत्तमदासजी वैष्णव, जयपुर २५ ) । ११. श्रीफकीरचन्द्र-जी, देहली ३० ) । १२. पं. भवानीशङ्करजी शास्त्री, जयपुर ६१ ) । १३. पं. देवेन्द्रकिशोरजी प्रायुर्वेदाचार्य, गाजियाबाद २५ ) । १४. पं. श्यामसुन्दरजी शास्त्री, सिवानी २५ ) । १५. स्व.पं. दुर्गादत्तनी त्रिपाठी, काशी २५ ) । १६. स्वा. गंगेश्वरानन्दजी महाराज उदासीन, मण्डलेश्वर वृन्दावन ११ ) । १७. पं. वालमुकुन्दजी दैवज्ञ, वम्बई २५ ) । १८. जगद्गुरुशङ्कराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर अनन्तश्री - स्वा. कृष्णवोधाश्रम-जी महाराज, बदरिकाश्रम २०० ) । १६. दण्डिस्वामी श्री १०८ भूमानन्द - तीर्थजी महाराज, हरद्वार २०० ) । २०. ' पण्डित - भूषण ' स्वा. श्रीरामदासजी उदासीन आयुर्वेदाचार्य, देहली १०१ ) । २१. से. श्रीझाँगीरामजी छबीलदासजी, बम्बई २५२ ) । २२. सेठ कुम्भनदास किशनदासजी बम्बई ५१ ) । २३. सेठ भगवानदासजी डी. गान्धी, बम्बई ५१ ) । २४. स्वामीश्री १०८ वासुदेवानन्दजी शास्त्री वेदान्ताचार्य महा-राज, शिमला १०१ ) । २५. पं. पूर्णानन्दजी शास्त्री, देहली २० ) २६. दानवीर पं. कृष्णचन्द्रजी शर्मा देहली २०१ ) । २७. सेठ गोपीलालजी काबरा, मारवाड़ मूंडवा १०१ ) । २८. गो. व्रजनाथजी शर्मा सारस्वत रामवहादुर, आगरा २५ ), शेष ७५ ) । २६. श्री. देसराज हंसराजजी मुंजाल, आगरा, २५ ) । ३०. सेठ हरनारायण गोपालदासजी, बम्बई स ५१ ) । ३१. पं. लोकनाथ - श्याम किशोरजीशर्मा, सूरिनेम ( दक्षिण अमे-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ ज ] रिका ) १०० ) । ३२. स्वामी श्री १००८ वैष्णवाचार्यजीमहाराज श्री-दरवार पिण्डोरीधाम १०१ ) । ३३. मलिक नारायणदास जगन्नाथजी C / o मलिक मघवद्दत्तजी, देहली १०२ ) । ३४. जगद्गुरु श्रीरामानुजा-चार्य - अनन्तश्री - स्वामी - अनिरुद्धाचार्य बेङ्कटाचार्यजी महाराज, चान्द े- ००० ) । ३५. श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य - प्रनन्तश्री - स्वामी श्रीप्रकाशानन्दजी महाराज, हरद्वार १०१ ) । ३६. सेठ जयदयालजी गोयन्दका, ( ' कल्याण ' सञ्चालक ), वांकुड़ा ( पश्चिम बंगाल ) १०० ) । ३७. पं. घमण्डीलालजी शर्मा वी ए. ( आनर्स ), देहली १०० ) ३८. सेठ 1, राधाकृष्णजी कपूर, मेरठ १०१ ) । ३६. गुप्तमहोदय C / o मलिक र मघवद्दत्तजी, देहली १०१ ) । 5. सनातनधर्म में हिन्दुजातिमें ईंटोंका खर्च देने - दिलवाने वाले बहुत T- हैं । यह भी ठीक है, पर यह ' कर्म ' है । यज्ञ करने वाले भी बहुत है, यह भी ' कर्म ' है । ' कर्म ' के साथ ' ज्ञान'का सामञ्जस्य भी अपेक्षित होता है । तभी उस जातिको सफलता प्राप्त होती है । उल्लिखित महो-दयोंने साहाय्यार्थ उक्त द्रव्यराशि देकर ' ज्ञान'यज्ञ में आहुति दी है, इस I प्रकार अन्य महोदयोंको भी इस ज्ञानयज्ञमें संरक्षक वा सहायक बनकर अपनी शुद्ध कमाईका अंश देकर ' आलोक ' ग्रन्थमाला के अग्रिम पुष्पों के प्रकाशन में सहयोग देना चाहिए । ८. तो त जन्माष्टमी I ई स ० २०१६ [ निवेदक-दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वत प्रि. संस्कृत महाविद्यालय, दरीबा कलां दिल्ली -६; [ प्रणेता ] CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ग्रन्थकारके विषय में - विद्वानोंके हार्दिक भाव-( १ ) सनातनधर्मके आधुनिक नवजीवन - दान में बद्धपरिकर सारस्वतों में आपको जो सम्मान प्राप्त है, या यों कहिये - माता सरस्वतीकी मूर्त - उपासना आपके द्वारा जिस प्रकार हुई है, उससे कम से कम सारा संस्कृत - समाज तो चिरपरिचित ही है । आपकी विशुद्ध - सनातनधार्मिक विचार - धारा किन्हों लोगों को न मान्य हो, फिर भी उसका मुझे हार्दिक अभिमान है ।.. ( गोविन्दशास्त्री बैजापुरकर सहसम्पादक ' सन्मार्ग ' काशी । ) ( २ ) भवतां दिगन्तविश्रान्तातुलकीर्ति मधुरवाणी, सूर्योदय, संस्कृत - पत्र द्वारा अप्रतिमविद्वत्तांच विलोक्य परवशीक्रियते जनः । ... ( एस. एस. शास्त्री द्विवेदी पवेन्ज, हलीङ्गड़ी, दक्षिण कनाड़ा । ( ३ ) श्रीमतां सनातनधर्मं सिद्धान्तर हस्यग्रन्थप्रकाशनाभिरुचिः सर्वथा साधीयसी । भाविनी धार्मिक- हिन्दु सन्ततिस्तत्रभवतामुप-कृतिमिमां शिरसा धारयिष्यतीत्यत्र न कापि विप्रतिपत्तिः । " " ( श्रीहरिहरानन्द करपात्रस्वामी धर्मनगर नगवा, काशी । ) ( ४ ) आपके लेख मुझे बड़ े अच्छे लगते हैं और तत्काल छपने योग्य होते है? ( श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, ' वैदिकधर्म, सम्पादक; पारडी ( सूरत ) । ( ५ ) भारतप्रसिद्ध, सद्गुणालङ्कृत, आधुनिक शास्त्रीय मत • मर्दनकारी शास्त्राज्ञाके परमप्रदर्शक, सुप्रसिद्ध शास्त्रार्थज्ञ, विद्या-निधि सारस्वत जी आपकी अद्भुत गवेषणापूर्ण लेखनीकी चम-स्कृतिका ' सिद्धान्त, कल्याण ', आदि पत्रों द्वारा सम्यक् अवलोकन An eGangotri Initiative

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[ अ ] करते हुए हृदयको यथार्थ शान्ति प्राप्तिका सुप्रतीक प्राप्त होता है । ... ( मनमोहन पुरी, मु. निबाउर पो. साईखेड़ा, जि. होशङ्गावाद, सौ. पी. ) । ( ६ ) समयाभावकी विकट परिस्थिति में होते हुए भी कई - कई ' कों तक धारावाही रूपसे संस्कृत - हिन्दी पत्रों में लेख लिखना स्तुत्य, श्लाघनीय, सराहनीय है । इस महान् परिश्रमसे पता चलता है कि - श्रीमान्का सनातनधर्म - प्रेम ' निंदहि श्राप सराहें मीना ' के अनुसार जितना मीनको जल प्यारा नहीं है, उससे अधिक प्यारा होनेके कारण सराहनीय है । साधारण लोगों-की कौन कहे, अधिकांश विद्वान् भी धर्म की ओर से उदासीन ही हैं । बड़ े - बड़ े व्याकरणाचार्यों, साहित्याचार्यों से मैं मिला । एकदम उन्हें सनातनधर्म के प्रचार से भी क्या, चर्चासे भी उदासीन पाया । “ वर्तमान समय में श्रीमान्को छोड़कर अन्य विद्वान्, पत्रों में सना-तनधर्म - सम्बन्धी लेख लिखनेसे उदासीन हैं - इससे सनातनधर्मका ठोस प्रचार नहीं हो पाता । आपके लेखोंसे श्रीमान्का शास्त्रोंके जबर्दस्त अध्ययनका तथा पृथक् परिश्रम करने का पता चलता है । --- ( इन्दुशेखर सिंह राठौर, अध्यक्ष वीहटवीरम - जि. सीतापुर ) ( ७ ) आप पत्रोंमें कुछ न कुछ लिखते ही रहते हैं, इससे प्रसन्नता होती है । आपके लेखों के पढ़नेसे ज्ञात होता है कि - आप का स्वाध्याय उच्चकोटिका है । आप व्याकरणके एक महान् पण्डित जान पड़ते हैं ।... ( शिवपूजन सिंह [ आर्यसमाजके प्रसिद्ध लेखक ] दयानन्द वैदिक - शोधस्थान कानपुर ( ८ ) आपके, लेख अत्यन्त गवेषणापूर्ण एवं हमारी दृष्टिमें महत्त्वपूर्ण हैं । हम यत्न करेंगे कि वे यथाशीघ्र छप सकें ( महेशे-चन्द्र स. सम्पादक ' वैदिकधर्म ', किल्ला पारडी ) ' श्रीसनातनधर्मालोक ' - परिचय । ' ( प्रथम - संस्करण से ) हमने ‘ श्री सनातनधर्मालोक ' नामक दससहस्र पृष्ठ के महाग्रन्थका जोकि सनातनधर्मका, महाभारत सिद्ध होगा, संस्कृत तथा हिन्दी में निर्माण किया हुआ है । ६ उसका प्रकाशन धार्मिक - जनता के लिए कितना लाभप्रद श प्रमाणित होगा यह उसकी विषय - सूची से प्रतीत होगा । f हम इस ग्रन्थमालाका प्रकाशन करने जा रहे हैं, तदर्थं क बहुत व्यय होगा । संरक्षकोंके लिए एक सहस्र रुपया अ रखा गया है । सम्मान्य सहायकोंके लिए पांच सौ रुपया, प्र मान्य सहायकों के लिए २५० ) रुं ० तथा साधारण सहायकों का एक सौ रुपया रखा गया है । इसके प्रकाशन ग्र से भारतधर्मकी रक्षा होगी । सज्जनोंको शीघ्र ही सहायता भिजवानी चाहिये । उसकी विषयसूची दी जाती है, पाठकगरण अवधान दें । जो विषय इसमें समान हैं, उनमें पूर्वसे नवीनता होगी, यह जान लेना चाहिये । इसमें श्री १००८ श्री स्वामी करपात्री । इस जी महाराजकी स्वहस्त लिखित सम्मतिकी प्रतिलिपि हैं देकर उक्त ग्रन्थकी हिन्दी में विषयसूची दी जावेगी । CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat. An eGangotri Initiative